शादीशुदा मर्द का Live-in-Relationship में रहना अपराध नहीं, पत्नी से Unnatural Sex अपराध नहींः कोर्ट ने दिये दो महत्वपूर्ण फैसले

इलाहाबाद और ग्वालियर उच्च न्यायालय के ये फैसले भारतीय न्याय व्यवस्था में बदलते दृष्टिकोण को दर्शाते हैं। जहां एक ओर सहमति से बने संबंधों को सुरक्षा देने पर जोर है, वहीं दूसरी ओर विवाह के भीतर के मामलों को लेकर कानून की सीमाओं को स्पष्ट किया गया है।
देश के अलग अलग उच्च न्यायालयों द्वारा हाल ही में दिए गए दो महत्वपूर्ण फैसलों ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता, वैवाहिक संबंधों और कानून की सीमाओं को लेकर नई बहस को जन्म दिया है। एक ओर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सहमति से बने लिव-इन संबंधों को संरक्षण देने की बात कही है, वहीं दूसरी ओर मध्य प्रदेश के ग्वालियर स्थित उच्च न्यायालय ने विवाह के भीतर तथाकथित अप्राकृतिक संबंधों को अपराध मानने से इंकार कर दिया है।
सबसे पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले की बात करें तो आपको बता दें कि न्यायालय ने अपने एक महत्वपूर्ण आदेश में कहा है कि यदि कोई विवाहित पुरुष किसी वयस्क महिला के साथ उसकी सहमति से लिव-इन संबंध में रह रहा है, तो यह अपने आप में कोई अपराध नहीं है। न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि कानून और नैतिकता को अलग अलग रखा जाना चाहिए और केवल सामाजिक सोच के आधार पर किसी के अधिकारों को नहीं छीना जा सकता।
यह टिप्पणी न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और न्यायमूर्ति तरुण सक्सेना की पीठ ने 25 मार्च को एक याचिका की सुनवाई के दौरान की। यह याचिका एक ऐसे जोड़े की ओर से दायर की गई थी, जिन्हें महिला के परिवार से जान का खतरा बताया गया था। रिपोर्टों के मुताबिक, महिला के परिवार ने आरोप लगाया था कि पुरुष पहले से विवाहित है और उसने 18 वर्षीय युवती को बहला फुसला कर अपने साथ रखा है। साथ ही यह भी कहा गया था कि विवाहित होने के बावजूद दूसरी महिला के साथ रहना अपराध है। हालांकि न्यायालय ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि यदि दोनों पक्ष वयस्क हैं और आपसी सहमति से साथ रह रहे हैं, तो इसे किसी भी अपराध के तहत नहीं लाया जा सकता।
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हम आपको बता दें कि इस मामले में महिला ने शाहजहांपुर के पुलिस अधीक्षक को आवेदन देकर बताया था कि वह अपनी इच्छा से उक्त पुरुष के साथ रह रही है और उसके परिवार वाले इस संबंध का विरोध कर रहे हैं। उसने यह भी आशंका जताई थी कि उसके साथ ऑनर किलिंग जैसी घटना हो सकती है। न्यायालय ने इस पर गंभीर रुख अपनाते हुए कहा कि दो वयस्कों की सुरक्षा सुनिश्चित करना पुलिस का मूल कर्तव्य है। अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि दोनों याचिकाकर्ताओं को सुरक्षा प्रदान की जाए। साथ ही अदालत ने यह भी आदेश दिया कि महिला के परिवार के सदस्य उन्हें किसी भी प्रकार से परेशान न करें, न उनके घर जाएं और न ही सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से संपर्क करें। पुलिस अधीक्षक को व्यक्तिगत रूप से उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी सौंपी गई। इसके अलावा अदालत ने भारतीय न्याय संहिता की धारा 87 के तहत दर्ज मामले में दोनों को अंतरिम राहत देते हुए गिरफ्तारी पर रोक लगा दी।
वहीं दूसरी ओर ग्वालियर स्थित उच्च न्यायालय ने एक अहम फैसले में कहा कि विवाह के भीतर पति पर अप्राकृतिक संबंध का आरोप भारतीय दंड संहिता की धारा 377 के तहत अपराध नहीं माना जा सकता। न्यायमूर्ति मिलिंद रमेश फडके ने भिंड जिले के एक मामले में यह फैसला सुनाया। अदालत ने कहा कि यदि पत्नी द्वारा लगाए गए आरोपों को सही भी मान लिया जाए, तब भी वह वैवाहिक संबंध के दायरे में आते हैं और उन्हें धारा 377 के तहत अपराध नहीं माना जा सकता।
अदालत ने अपने निर्णय में बताया कि 2013 में कानून में संशोधन के बाद बलात्कार की परिभाषा को विस्तारित किया गया था, जिसमें कई प्रकार के यौन कृत्य शामिल किए गए। लेकिन इसके बावजूद कानून में यह अपवाद आज भी मौजूद है कि पति द्वारा अपनी पत्नी के साथ किया गया यौन संबंध बलात्कार नहीं माना जाएगा। इसी आधार पर अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों को धारा 377 के तहत नहीं लाया जा सकता। हालांकि अदालत ने दहेज उत्पीड़न, मारपीट और आपराधिक धमकी जैसे अन्य आरोपों को खारिज नहीं किया और कहा कि इनकी सुनवाई निचली अदालत में जारी रहेगी।
देखा जाये तो इन दोनों फैसलों से यह स्पष्ट होता है कि न्यायालय व्यक्तिगत स्वतंत्रता और कानूनी अधिकारों को प्राथमिकता दे रहे हैं। अदालतों ने यह भी संकेत दिया है कि सामाजिक नैतिकता या पारिवारिक दबाव के आधार पर किसी वयस्क के अधिकारों का हनन नहीं किया जा सकता। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे फैसले आने वाले समय में लिव-इन संबंधों और वैवाहिक विवादों से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
बहरहाल, इलाहाबाद और ग्वालियर उच्च न्यायालय के ये फैसले भारतीय न्याय व्यवस्था में बदलते दृष्टिकोण को दर्शाते हैं। जहां एक ओर सहमति से बने संबंधों को सुरक्षा देने पर जोर है, वहीं दूसरी ओर विवाह के भीतर के मामलों को लेकर कानून की सीमाओं को स्पष्ट किया गया है। इन निर्णयों से यह संदेश साफ है कि कानून का आधार केवल विधिक प्रावधान होंगे, न कि समाज की बदलती धारणाएं।
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