यूपी में रूठों को मनाने में जुटी भाजपा, पहले और दूसरे चरण में बागी और मुसलमान कर सकते हैं परेशान

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अंकित सिंह । Jan 19, 2022 6:01PM
भाजपा के लिए चुनौती सिर्फ किसान ही नहीं है। पार्टी के लिए इस वक्त चुनौतियां अपने भी खड़े कर रहे हैं। दरअसल, टिकट कटने से कई नेता पार्टी के खिलाफ बगावत कर चुके हैं। मेरठ से लेकर मथुरा और आगरा तथा मुजफ्फरनगर में कई नेताओं ने पार्टी के खिलाफ आवाज बुलंद कर दी है।

उत्तर प्रदेश चुनाव को लेकर राजनीतिक सक्रियता बढ़ी हुई है। मुख्य मुकाबला सत्तारूढ़ भाजपा और समाजवादी पार्टी के बीच में है। भाजपा ने शुरुआत के 2 चरणों के लिए अपने उम्मीदवारों की सूची जारी कर दी है। पहले के दो चरणों में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में चुनाव होने हैं। माना जा रहा है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश कहीं ना कहीं इस बार भाजपा के लिए काफी अहम रहने वाला है। किसानों की नाराजगी को देखते हुए कृषि कानूनों को वापस लिया गया था। किसान आंदोलन के दौरान सबसे ज्यादा किसान पश्चिमी उत्तर प्रदेश के ही भाजपा के खिलाफ मुखर थे। माना जा रहा है कि कृषि कानूनों को वापस लिए जाने के बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भाजपा के लिए राह थोड़ी आसान जरूर हुई है लेकिन अब भी कई चुनौतियां है जिसे भगवा पार्टी को पार करना है।

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पहले चरण की चुनौती

उत्तर प्रदेश में पहले चरण में 11 जिलों के 58 सीटों पर चुनाव होने हैं। इन 58 सीटों के लिए नामांकन की प्रक्रिया भी शुरू हो गई है। पहले चरण में शामली, मुजफ्फरनगर, बागपत, मेरठ, गाजियाबाद, गौतम बुद्ध नगर, हापुड़, अलीगढ़, बुलंदशहर, आगरा और मथुरा में चुनाव है। माना जा रहा है कि शामली, मुजफ्फरनगर, बागपत, आगरा और मथुरा के किसान भाजपा से काफी नाराज थे। ऐसे में किसानों को अपने साथ लाना फिलहाल पार्टी के लिए बड़ी चुनौती है। भाजपा किसानों को मनाने में भी जुट गई है। इसके अलावा आखिरी समय में उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से किसानों के लिए कई राहत भरे कदम भी उठाए गए। 

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बागियों की चुनौती

भाजपा के लिए चुनौती सिर्फ किसान ही नहीं है। पार्टी के लिए इस वक्त चुनौतियां अपने भी खड़े कर रहे हैं। दरअसल, टिकट कटने से कई नेता पार्टी के खिलाफ बगावत कर चुके हैं। मेरठ से लेकर मथुरा और आगरा तथा मुजफ्फरनगर में कई नेताओं ने पार्टी के खिलाफ आवाज बुलंद कर दी है। माना जा रहा है कि नेताओं की नाराजगी भाजपा के लिए चुनौतियां और बढ़ा सकती है। यही कारण है कि पार्टी के बड़े नेताओं की ओर से उन्हें लगातार साधने की कोशिश की जा रही है। 2017 की बात करें तो इन 58 सीटों में से भाजपा के पास 54 सीटें हैं। पिछले परफॉर्मेंस को दोहराने के लिए इस बार पार्टी ने कई सीटों पर अपने प्रत्याशी बदले हैं। जिन्हें टिकट नहीं दिया गया है वह बगावत की राह पकड़ चुके हैं। 

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बगावत करने वालों में मेरठ के हस्तिनापुर विधानसभा सीट से टिकट की आस लगाए बैठे गोपाल पाली हैं। इस सीट से भाजपा ने मौजूदा विधायक दिनेश खटीक को अपना प्रत्याशी बनाया है। मेरठ शहर सीट से भाजपा ने कमल दत्त शर्मा को टिकट दिया है। हालांकि यहां दावेदारी पंडित सुनील भराला भी पेश कर रहे थे। अब सुनील भराला ने कमल दत्त शर्मा के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। कुछ ऐसा ही हाल मुजफ्फरनगर के मीरापुर सीट पर है जहां भाजपा ने प्रशांत गुर्जर को प्रत्याशी बनाया है। प्रशांत गुर्जर गाजियाबाद रहते हैं। ऐसे में वहां के स्थानीय नेताओं ने उन्हें बाहरी कहना शुरू कर दिया है और जमकर विरोध कर रहे हैं। मथुरा में भी भाजपा के लिए कुछ ऐसी ही कहानी है। 2017 में मामुली वोटों से हारे एसके शर्मा को इस बार भाजपा ने टिकट नहीं दिया है। उन्होंने पार्टी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।

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दूसरे चरण की चुनौती

उत्तर प्रदेश में दूसरे चरण में जिन जिलों में चुनाव होने हैं। उनमें सहारनपुर, बिजनौर, अमरोहा, संभल, मुरादाबाद, रामपुर, बरेली, बदायूं और शाहजहांपुर शामिल है। इन जिलों में भाजपा के लिए चुनौतियां पहले की अपेक्षा अधिक होगी क्योंकि दूसरे चरण में मतदान वाली 55 सीटों में से ज्यादातर मुस्लिम बहुल वाले सीट हैं। चुनावों के दौरान बरेलवी (बरेली) तथा देवबंद (सहारनपुर) के मुस्लिम धर्म गुरुओं की भी सक्रियता बढ़ जाती है। वर्ष 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में इस इलाके की 55 सीटों में से 38 सीटें भाजपा को, 15 सीटें समाजवादी पार्टी (सपा) को 15 और दो सीटें कांग्रेस को मिली थीं। लोकसभा चुनाव में इस इलाके की 11 सीटों में सात सीटें बसपा-सपा गठबंधन के हिस्‍से आयीं। इनमें से चार सीटों (सहारनपुर, नगीना, बिजनौर और अमरोहा) पर बसपा जीती जबकि सपा को मुरादाबाद, संभल और रामपुर में तीन सीटों पर जीत मिली थी। इससे एक बात साफ है कि इस गढ़ में मुस्लिम, जाट और दलित मतदाताओं के गठजोड़ का फार्मूला कामयाब हुआ था। सपा के एक और नेता ने दावा किया कि सपा, रालोद गठबंधन के साथ, भाजपा से इस्तीफा देकर आए स्वामी प्रसाद मौर्य और धर्म सिंह सैनी तथा महान दल के केशव देव मौर्य का समीकरण बहुत मजबूत साबित होगा और भाजपा का यहां से सफाया हो जाएगा। बहरहाल, स्वामी प्रसाद की बेटी संघमित्रा मौर्य अभी बदायूं से भाजपा की सांसद हैं और उन्होंने दल छोड़ा नहीं है।

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