केरल सरकार का विवादास्पद अध्यादेश अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला

  •  डॉ. वेदप्रताप वैदिक
  •  नवंबर 24, 2020   13:24
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केरल सरकार का विवादास्पद अध्यादेश अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला

इस तरह के, बल्कि इससे भी कमजोर कानून को 2015 में सर्वोच्च न्यायालय ने रद्द कर दिया था। वह 2000 में बने सूचना तकनीक कानून की धारा 66 ए थी। अदालत ने उसे संविधान द्वारा प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के विरुद्ध माना था।

केरल की वामपंथी सरकार को हुआ क्या है ? उसने ऐसा अध्यादेश जारी करवा दिया है, जिसे अदालतें तो असंवैधानिक घोषित कर ही देंगी, उस पर अब उसके विपक्षी दलों ने भी हमला बोल दिया है। इस अध्यादेश का उद्देश्य यह बताया गया है कि इससे महिलाओं और बच्चों पर होने वाले शाब्दिक हमलों से उन्हें बचाया जा सकेगा। केरल पुलिस एक्ट की इस धारा 118 (ए) के अनुसार उस व्यक्ति को तीन साल की जेल या 10 हजार रु. जुर्माना या दोनों होंगे, ''जो किसी व्यक्ति या समूह को धमकाएगा, गालियां देगा, शर्मिंदा या बदनाम करेगा।''

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इस तरह के, बल्कि इससे भी कमजोर कानून को 2015 में सर्वोच्च न्यायालय ने रद्द कर दिया था। वह 2000 में बने सूचना तकनीक कानून की धारा 66 ए थी। अदालत ने उसे संविधान द्वारा प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के विरुद्ध माना था। केरल के इस अध्यादेश में तो किसी खबर या लेख या बहस के जरिए यदि किसी के प्रति कोई गलतफहमी फैलती है या उसे मानसिक कष्ट होता है तो उसी आरोप में पुलिस उसे सीधे गिरफ्तार कर सकती है। पुलिस को इतने अधिकार दे दिए गए हैं कि वह किसी शिकायत या रपट के बिना भी किसी को भी गिरफ्तार कर सकती है। क्या केरल में अब रूस का स्तालिन-राज या चीन का माओ-राज कायम होगा ? 

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जाहिर है कि यह अध्यादेश बिना सोचे-समझे जारी किया गया है। बिल्कुल इसी तरह का गैर-जिम्मेदाराना काम केरल की वामपंथी सरकार ने ‘नागरिकता संशोधन कानून’ के विरुद्ध विधानसभा में प्रस्ताव पारित करके किया था। वह संघीय कानून के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में भी चली गई थी। देश की दक्षिणपंथी सरकारों पर जिस संकीर्णता का आरोप हमारे वामपंथी लगाते हैं, वैसे ही और उससे कहीं ज्यादा संकीर्णता अब वे खुद भी दिखा रहे हैं। केरल की कम्युनिस्ट सरकार इस कानून के सहारे अनेक पत्रकारों, लेखकों और विपक्षी नेताओं को डराने और कठघरों में खड़ा करने का काम करेगी। आश्चर्य तो इस बात का है कि आरिफ मोहम्मद खान जैसे राज्यपाल ने, जो अनुभवी राजनीतिज्ञ और कानून के पंडित हैं, ऐसे अध्यादेश पर दस्तखत कैसे कर दिए ? उन्होंने पहले भी राज्य सरकार को कुछ गलत पहल करने से रोका था और इस अध्यादेश को भी वे लगभग डेढ़ माह तक रोके रहे लेकिन केरल या केंद्र के सभी वामपंथी और विपक्षी नेताओं ने भी मुंह पर पट्टी बांधे रखी तो उन्होंने भी सोचा होगा कि वे अपने सिर बल क्यों मोल लें ? उनके दस्तखत करते ही कांग्रेसी और भाजपा नेताओं तथा देश के बड़े अखबारों ने इस अध्यादेश की धज्जियां उड़ाना शुरू कर दीं। इसके पहले कि सर्वोच्च न्यायालय इसे रद्द कर दे, केरल सरकार इसे अपनी मौत मर जाने दे तो बिल्कुल सही होगा।

डॉ. वेदप्रताप वैदिक







पूरी दुनिया में बज रहा मेक इन इंडिया वैक्सीन का डंका, भारत की वैक्सीन मैत्री से पड़ोसी देश गद्गद्

  •  नीरज कुमार दुबे
  •  जनवरी 23, 2021   12:14
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पूरी दुनिया में बज रहा मेक इन इंडिया वैक्सीन का डंका, भारत की वैक्सीन मैत्री से पड़ोसी देश गद्गद्

पड़ोसी देशों में वैक्सीन की जो खेपें पहुँच रही हैं वह वहाँ के नेताओं ही नहीं जनता के भी चेहरे पर मुस्कान ला रही हैं क्योंकि इन देशों को समझ आ गया है कि मुश्किल समय का साथी सिर्फ भारत ही है। भारत ही है जो महामारी के खिलाफ मानवता की इस लड़ाई में नेतृत्वकर्ता बनकर उभरा है।

मुश्किल समय में नेता के नेतृत्व की और दोस्त की दोस्ती की परीक्षा होती है। कोरोना महामारी के दौरान भारत ने कुशलता के साथ वायरस के खिलाफ लड़ाई लड़ी और दुनिया को भी हर संभव मदद दी। अब जब भारत में घरेलू स्तर पर निर्मित दो कोरोना वैक्सीन आ गयी हैं तो सिर्फ अपने ही लोगों को सुरक्षित करना भारत की प्राथमिकता नहीं है बल्कि विश्वगुरु भारत एक बार फिर पूरी दुनिया की मदद कर रहा है और इस वैक्सीन मैत्री की शुरुआत पड़ोसी देशों को खेप भेजे जाने से शुरू हो चुकी है। पड़ोस प्रथम और लोक प्रथम को वरीयता देते हुए भारत सहायता अनुदान के तहत भूटान, मालदीव, बांग्लादेश, नेपाल, म्यांमा, मॉरीशस और सेशेल्स को कोविड-19 के टीके की आपूर्ति कर चुका है और श्रीलंका तथा अफगानिस्तान को भी जल्द ही टीके की खेप भेजी जायेगी। यही नहीं कई अन्य बड़े-बड़े देशों ने तो दुनिया में सबसे बड़े दवा उत्पादक देशों में से एक भारत से कोरोना वायरस का टीका खरीदने के लिए संपर्क किया है। पूरी दुनिया में मेक इन इंडिया वैक्सीन का डंका बज रहा है लेकिन बताया जा रहा है कि पाकिस्तान ने अभी तक भारतीय टीके के लिए संपर्क नहीं किया है क्योंकि उसे चीन से मिलने वाली वैक्सीन का इंतजार है। देखना होगा कि मुश्किल समय में पुराने अंडरगारमेंट्स के मास्क बना कर पाकिस्तान को महंगे दाम पर बेचने वाला चीन वैक्सीन के नाम पर इमरान सरकार को क्या थमाता है।

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बात भारतीय टीकों की करें तो हम आपको बता दें कि भारत में इस समय कोरोना वायरस के दो टीके- कोविशील्ड और कोवैक्सीन लगाये जा रहे हैं। पहले चरण में अग्रिम मोर्चे पर तैनात स्वास्थ्य कर्मियों को टीके दिये जा रहे हैं। भारत के प्रधानमंत्री ही नहीं बल्कि विदेश मंत्री और रक्षा मंत्री तक कह चुके हैं कि पूरा विश्व हमारा परिवार है और हम सबकी हर संभव मदद करेंगे। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपने ट्वीट में इस संबंध में कहा था कि भारत वैश्विक समुदाय की स्वास्थ्य सेवा जरूरतों को पूरा करने के लिये ‘भरोसेमंद’ सहयोगी बनकर काफी सम्मानित महसूस कर रहा है। उन्होंने बताया था कि अभी टीकों की आपूर्ति शुरू होगी तथा आने वाले दिनों में और काफी कुछ होगा। प्रधानमंत्री के इस ऐलान के बाद पड़ोसी देशों ही नहीं बल्कि अन्य देशों की भी उम्मीदें भारत से और बढ़ गयी हैं।

भारत के पड़ोसी देशों में कोरोना वैक्सीन की जो खेपें पहुँच रही हैं वह वहाँ के नेताओं ही नहीं जनता के भी चेहरे पर मुस्कान ला रही हैं क्योंकि इन देशों को समझ आ गया है कि मुश्किल समय का साथी सिर्फ भारत ही है। भारतीय विमानों के अपने देश की धरती पर उतरते ही अलग-अलग देशों के लोगों के मन में उम्मीदों और आशाओं का ज्वार उमड़ रहा है। भारत ही है जो महामारी के खिलाफ मानवता की इस लड़ाई में नेतृत्वकर्ता बनकर उभरा है। चीन ने तो मुश्किल समय में भी मदद के नाम पर व्यापार किया लेकिन भारत ने सबकी सहायता की। मालदीव में जब भारतीय टीकों की खेप पहुँची तो वहां के विदेश मंत्री का भावुक कर देने वाला संबोधन सुनने लायक था जोकि उन्होंने धाराप्रवाह हिन्दी में दिया। धन्यवाद, धन्यवाद, धन्यवाद कह कर उन्होंने भारतीय प्रधानमंत्री और जनता का शुक्रिया अदा किया।

'कोविशील्ड' टीके की 15 लाख खुराकें म्यांमार को, 20 लाख खुराक बांग्लादेश को, 10 लाख खुराक नेपाल को, डेढ़ लाख खुराक भूटान को, सेशल्स को 50 हजार खुराक और मॉरीशस तथा मालदीव को एक-एक लाख खुराक भेजी जा चुकी हैं। इसके अलावा ब्राजील और मोरक्को को खेप भेजे जाने के साथ टीके की वाणिज्यिक आपूर्ति भी शुरू हो गयी है। खास बात यह है कि भारत ने सिर्फ वैक्सीन भेज कर ही अपने कर्तव्य की इतिश्री नहीं की बल्कि टीके की आपूर्ति से पहले प्रशासनिक एवं परिचालन संबंधी आयामों को शामिल करते हुए संबंधित देशों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम भी आयोजित किया गया जो प्राप्तकर्ता देशों के टीकाकरण प्रबंधकों, कोल्ड चेन अधिकारियों, संवाद अधिकारियों और डाटा प्रबंधकों के लिये था।

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भारत के पड़ोसी देशों की ही बात करें तो भूटान राज परिवार सहित विदेश मंत्री तांडी दोरजी ने इस उदार तोहफे के लिये भारत के प्रति आभार जताया था। दूसरी ओर एक ट्वीट में मालदीव के राष्ट्रपति इब्राहिम मोहम्मद सोलिह ने टीके के लिये प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को धन्यवाद दिया। नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने भी 10 लाख खुराक भेजने के लिए भारत सरकार को धन्यवाद देते हुए ट्वीट किया, “नेपाल को कोविड टीके की दस लाख खुराक भेजने के लिए मैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी और सरकार तथा भारत के लोगों को धन्यवाद देता हूं। यह सहायता ऐसे समय दी गई है जब भारत को अपने लोगों को भी टीका लगाना है।” ओली के ट्वीट का जवाब देते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट किया, “धन्यवाद प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली। कोविड-19 महामारी से मुकाबले के लिए नेपाल के लोगों की सहायता करने के प्रति भारत प्रतिबद्ध है। टीका भारत में निर्मित है और महामारी को वैश्विक स्तर पर रोकने में मददगार साबित होगा।'' उधर, बांग्लादेश के विदेश राज्य मंत्री मोहम्मद शहरयार आलम ने कहा है कि दक्षिण एशिया को क्षेत्रीय स्तर पर सहयोग करने की जरुरत है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने भारत के पड़ोसी देशों को टीका उपलब्ध करा कर ‘बेहतरीन उदाहरण’ पेश किया है।

-नीरज कुमार दुबे







प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत का लोकतंत्र और मजबूत हुआ

  •  ललित गर्ग
  •  जनवरी 22, 2021   11:24
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत का लोकतंत्र और मजबूत हुआ

मूल्यों की राजनीति करने वालों के सम्मुख बड़ा संकट है। जबकि राजनीति को सत्ता का हथियार मानने वाले समाधान के लिए कदम उठाने में भय महसूस कर रहे हैं। डर है सत्ता से विमुख हो जाने का। पर यदि दायित्व से विमुखता की स्थिति बनी तो यह लोकतंत्र के लिये ज्यादा बड़ा खतरा है।

लोकतंत्र के रूप में दुनिया में सबसे अधिक सशक्त माने जाने वाले एवं सराहे जाने वाले अमेरिका के ताजा घटनाक्रम के बाद भारत के लोकतंत्र को दुनिया अचंभे की तरह देख रही है। बिना किसी राजनीतिक पूर्वाग्रह के यह कहना गलत नहीं होगा कि भारत का लोकतंत्र सशक्त हो रहा है और तमाम बाधाओं के लोकतंत्र का अस्तित्व अक्षुण्ण दिखाई दे रहा है। देश की आम-जनता को प्रधानमन्त्री के रूप में नरेन्द्र मोदी पर भरोसा है और वह भारत के भाग्यविधाता के रूप में उभर कर ईमानदारी, सेवा, समर्पण भाव से राष्ट्र को सशक्त बनाने का कार्य कर रहे हैं। गत सात वर्षों में एक भी आरोप उन पर नहीं लग सका तो अब उनके देशहित के निर्णयों की छिछालेदार करने के प्रयास हो रहे हैं, फिर भी उनके नेतृत्व में लोकतंत्र मजबूत हो रहा है।

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कोई किसी का भाग्य विधाता नहीं होता। कोई किसी का निर्माता नहीं होता। भारतीय संस्कृति के इस मूलमंत्र को समझने की शक्ति भले ही वर्तमान राजनीतिज्ञों में न हो, पर इस नासमझी से सत्य एवं लोकतंत्र की अस्मिता एवं अस्तित्व का अंत तो नहीं हो सकता। अंत तो उसका होता है जो सत्य का विरोधी है, अंत तो उसका होता है जो जनभावना के साथ विश्वासघात करता है, अंत तो उसका होता है जिसने राजनीतिक मर्यादाओं को लांघा है। जनमत एवं जन विश्वास तो दिव्य शक्ति है। उसका उपयोग आदर्शों, सिद्धांतों और मर्यादाओं की रक्षा के लिए हो। तभी अपेक्षित लक्ष्यों की प्राप्ति होगी। तभी होगा राष्ट्रीय समस्याओं का समाधान। तभी होगी अपनत्व और विश्वास की पुनः प्रतिष्ठा। वरना राजनीतिक मूल्यों की लक्ष्मण रेखा जिसने भी लांघी, वक्त के रावण ने उसे उठा लिया। कांग्रेस सहित विभिन्न राजनीतिक दलों की वर्तमान स्थिति को देखते हुए ऐसा ही प्रतीत होता है।

भारत की राजनीति के उच्च शिखर पर नेतृत्व करने वाले अभी भी जीवनदानी, घर-द्वार छोड़ने वाले ऐसे राजनेता हैं, जिन पर भारत की जनता को भरोसा है। परन्तु एक कहावत है, ’अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता।’ अन्यथा ऐसा ही चलता रहा तो भारत की राजनीति में समर्पित व जीवनदानी राजनेताओं का अकाल हो जायेगा। वैसे भी लोकतंत्र में सबका साथ-सबका विकास का दर्शन निहित है। कहा जाता है कि 'अच्छे लोग’ राजनीति में आयें। प्रश्न यह है कि ’अच्छे लोग’ की परिभाषा क्या है? योग्य, कर्मठ, ईमानदार, ’न खायेंगे न खाने देंगे’ के सिद्धान्तों पर चलने वाले, क्या इन्हें अच्छे लोग कहा जायेगा? लेकिन इनके पास धन-बल और बाहुबल नहीं होगा, फलतः वे चुनाव नहीं जीत सकेंगे। इसलिये वर्तमान परिप्रेक्ष्य में इन्हें अयोग्य कहा जाने लगा है। तब फिर प्रश्न उठता है कि राजनीति की दशा व दिशा सुधरेगी कैसे ? लोकतंत्र में ईमानदारी का वर्चस्व कैसे स्थापित होगा ?

मूल्यों की राजनीति करने वालों के सम्मुख बड़ा संकट है। जबकि राजनीति को सत्ता का हथियार मानने वाले समाधान के लिए कदम उठाने में भय महसूस कर रहे हैं। डर है सत्ता से विमुख हो जाने का। पर यदि दायित्व से विमुखता की स्थिति बनी तो यह देश के लोकतंत्र के लिये ज्यादा बड़ा खतरा है। इसी तरह, हरेक सफल लोकतंत्र अपने नागरिकों से भी कुछ अपेक्षाएं रखता है। उसकी सबसे बड़ी अपेक्षा यही होती है कि संवाद के जरिए हरेक विवाद सुलझाएं जाएं, ताकि कानून-व्यवस्था के लिए कोई मसला न खड़ा हो और समाज के ताने-बाने को नुकसान न पहुंचे। भारत जैसे बहुलवादी देश में तो संवादों की अहमियत और अधिक है। फिर असहमति और मुखर विरोध किस कदर प्रभावी हो सकते हैं, किसान आन्दोलन इसका ताजा सुबूत है। मगर देश के रचनात्मक माहौल को ऐसे विवादों एवं आन्दोलनों से कोई नुकसान न पहुंचे, यह सुनिश्चित करना सरकार से अधिक विभिन्न राजनीतिक दलों, विचारधाराओं एवं नागरिक समाज की जिम्मेदारी है। एक खुले और विमर्शवादी देश-समाज में ही ऐसी संभावनाएं फल-फूल सकती हैं। उदारता किसी धर्म की कमजोरी नहीं, बल्कि उसका सबसे बड़ा संबल होती है, यह बात उससे बेजा लाभ उठाने की धृष्टता करने वालों और उसके रक्षकों, दोनों को समझने की जरूरत है।

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लोकतंत्र में अतिश्योक्तिपूर्ण विरोध और दमनचक्र जैसे उपाय किसी भी समस्या का समाधान नहीं कर सकते। इस मौलिक सत्य व सिद्धांत की जानकारी से आज का राजनीतिक वर्ग अनभिज्ञ है। सत्ता के मोह ने, वोट के मोह ने शायद उनके विवेक का अपहरण कर लिया है। कहीं कोई स्वयं शेर पर सवार हो चुका है तो कहीं किसी नेवले ने सांप को पकड़ लिया है। न शेर पर से उतरते बनता है, न सांप को छोड़ते बनता है। धरती पुत्र, जन रक्षक, पिछड़ों के मसीहा और धर्मनिरपेक्षता के पक्षधर का मुखौटा लगाने वाले आज जन विश्वास का हनन करने लगे हैं। जनादेश की परिभाषा अपनी सुविधानुसार करने लगे हैं। देश के राष्ट्रवादी, चिन्तनशील, ईमानदार आम जनमानस को एकजुट होना होगा। दूरदृष्टि के साथ भारत के भविष्य की चिन्ता करनी होगी। राजनीतिक क्षेत्र के नकारात्मक व सकारात्मक सोच का भेद समझना होगा। उन्माद, अविश्वास, राजनैतिक अनैतिकता, दमन एवं संदेह का वातावरण उत्पन्न हो गया है। उसे शीघ्र कोई दूर कर सकेगा, ऐसी सम्भावना दिखाई नहीं देती। ऐसी अनिश्चय और भय की स्थिति किसी भी राष्ट्र के लिए संकट की परिचायक है। जिनकी भरपाई मुश्किल है। भाईचारा, सद्भाव, निष्ठा, विश्वास, करुणा यानि कि जीवन मूल्य खो रहे हैं। मूल्य अक्षर नहीं होते, संस्कार होते हैं, आचरण होते हैं, इनसे ही लोकतंत्र सशक्त बनता है।

राजनीति गिरावट का ही परिणाम है कि भारत के साथ आजादी पाने वाले अनेक देश समृद्धि के उच्च शिखरों पर आरोहण कर रहे हैं जबकि भारत गरीबी उन्मूलन और आम आदमी को संपन्न बनाने की दिशा में अभी भी संघर्ष ही कर रहा है। राजनीतिक दलों, जनप्रतिनिधियों और सरकार में महत्वपूर्ण पद संभालने वालों की गुणवत्ता को देखकर इसका स्पष्ट आभास होता है कि भारतीय लोकतंत्र के संचालन में व्यापक गिरावट आयी है। बताया जाता है कि देश में फिलहाल 36 प्रतिशत सांसद और विधायकों के खिलाफ आपराधिक मामले चल रहे हैं। पारिवारिक मिल्कियत जैसे राजनीतिक दल, धार्मिक हितों से जुड़े समूह, धनबल-बाहुबल और उत्तराधिकार की महत्ता खासी बढ़ गई है। यहां तक कि अगर कुछ विषय विशेषज्ञ पेशेवरों को भी सरकार में महत्वपूर्ण पद मिलते हैं तो अधिकांश मामलों में वे भी पद प्रदान करने वाली पार्टी के अहसान तले ही दबे रहते हैं और किसी वाजिब मसले पर एक राजनेता के रूप में अपनी आवाज बुलंद करने से हिचकते हैं। जबकि सरकार में होने का तकाजा ही यही होता है कि नेता एक राजनेता के रूप में उभरकर अधिक से अधिक लोगों की भलाई के लिए कदम उठाएं, न कि अपने राजनीतिक दल के हितों को पोषित करें।

अफसोस की बात यही है कि परिपक्व लोकतंत्रों में भी ईमानदार, चरित्र सम्पन्न एवं नैतिक राजनेताओं की प्रजाति धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही है। राजनीतिक दलों में संख्या-बल का बढ़ना एक सूत्री कार्यक्रम बन गया और गुणवत्ता-बल दोयम दर्जे पर हो गया है। राजनैतिक दल भी चुनाव जीतने का एक सूत्री कार्यक्रम बना चुके हैं जो उनकी मजबूरी भी है। चुनाव भी राजनीति का एक सक्रिय भाग है। विपक्ष में वे रहना ही नहीं चाहते और आदर्श विपक्ष की भूमिका का निर्वहन वे जानते ही नहीं हैं। सत्ता से पैसा तथा पैसे से सत्ता अर्जित करने का क्रम बन गया है और भ्रष्टाचार ने अपना विराट व विकृत स्वरूप बना लिया है। अहम बात तो यह है कि राजनीति में प्रवेश के पहले वे क्या थे और फिर क्या से क्या हो गये ? कितने ही राजनेता भ्रष्टाचार के कारण जेल जा चुके हैं, जो पकड़ा गया वो चोर है और जिसे नहीं पकड़ पा रहे हैं वे मौज कर रहे हैं, नीति-नियंता, भारत के भाग्य विधाता बने हैं।

-ललित गर्ग







तांडव मचा रहे ओटीटी प्लेटफॉर्म पर कानूनी लगाम लगाना बेहद जरूरी हो गया है

  •  प्रो. सुधांशु त्रिपाठी
  •  जनवरी 21, 2021   13:31
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तांडव मचा रहे ओटीटी प्लेटफॉर्म पर कानूनी लगाम लगाना बेहद जरूरी हो गया है

तांडव वेब सीरीज विवाद के वातावरण में एक प्रश्न साफ तौर पर उठता है कि हिंदु जाति या हिंदू धर्म को आहत करने से इस वेब निर्देशक अली अब्बास जफर या ऐसे कलाकारों या ऐसे अन्य मुसलमानों को तथा इसी प्रकार के कुछ अन्य लोगों को क्या मिलता है।

तांडव वेब सीरीज और अन्य कई ऐसी सीरीजों ने हिंदू धर्म की आस्था और धार्मिक भावनाओं को एक बार फिर जानबूझ कर चोट पहुंचायी है। इस सीरीज में भगवान शिवजी को एक अत्याधुनिक पुरूष के रूप में आड़ी तिरछी रेखाओं का चेहरा बनाये हुए दिखाया गया है जिसमें उनके मजाक उड़ाने की बात किसी से छिपी नहीं है। सभी जानते हैं कि भगवान शिवजी का स्थान हिंदू धर्म में स्वीकार किये गये एकमात्र पूर्ण, सर्वशक्तिमान, सर्वव्याप्त एवं अविनाशी ब्रह्म के तीन रूपों- अर्थात् ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश या शिव में से एक तथा उन्हीं के समान सर्वोच्च एवं पवित्रतम है। हिंदू धर्म के अनुसार तीनों ईश्वर एक ही ब्रह्म के तीन रूप हैं जहाँ सृष्टि के निर्माणकर्ता ब्रह्माजी, पालनकर्ता विष्णुजी तथा संहारकर्ता शिवजी अनादि काल से स्थापित हैं। अतः भारत तथा संपूर्ण विश्व में रह रहे लाखों करोड़ों हिंदुओं की कालातीत आस्था के प्रतीक ऐसे सर्वोच्च एवं सर्वशक्तिमान पूर्ण ब्रह्म को एक साधारण नाटकीय रूप में दिखाना निश्चय ही उनका मजाक उड़ाना तथा उन आस्थावान हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं पर गंभीर कुठाराघात करना नहीं है तो और क्या है। इसी प्रकार से ओटीटी प्लेटफॉर्म पर कई अन्य वेब सीरीज दिखाई जा रही हैं जिनमें अभद्रता और अश्लीलता का नंगा नाच दर्शकों को दिखाया जा रहा है जिनका लक्ष्य कहीं न कहीं हिंदुओं की सामाजिक व्यवस्था तथा धार्मिक कर्मकाण्ड आदि का उपहास करना ही होता है।

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लगभग दो दशक पहले देश के एक तथाकथित प्रख्यात चित्रकार मकबूल फिदा हुसैन ने हिंदू धर्म के अनुसार विद्या एवं संगीत की देवी माँ सरस्वती का अभद्र चित्र दिखा कर हिंदू धर्म की भावनाओं को आहत किया था। उनके अन्य कुछ चित्रों में भी इसी प्रकार का हिंदू धर्म विरोधी विद्रूप चित्रण देखा गया था जिसका जनता ने पुरजोर विरोध किया था। जैसा देखा जा रहा है कि पिछले कई वर्षों से देश की फिल्म इंडस्ट्री और अन्य मीडिया जगत, जिसमें प्रिंट मीडिया भी शामिल है, इसी प्रकार फिल्मों के माध्यम से या मनोरंजनकारी कार्यक्रमों/ सीरीयल्स द्वारा हिंदू धर्म को नीचा दिखाने और हिंदुओं को अपमानित करने का कार्य करते आ रहे हैं। अभी कुछ महीने पहले रिलीज हुई फिल्म मिर्जापुर में भी एक ब्राह्मण को बहुत बुरा दिखाया गया है जबकि इसके विपरीत दूसरे मुसलमान को बहुत अच्छा प्रदर्शित किया गया है। ऐसा ही परिदृश्य पूर्व की कई फिल्मों में भी दिखाया गया था जहाँ एक मंदिर का हिंदू पुजारी बहुत भ्रष्ट और चरित्रहीन होता है जबकि वहीं एक मौलवी बेहद चरित्रवान और हर प्रकार से पाक साफ दिखलाया जाता है। वस्तुतः अच्छाई और बुराई सभी के अंदर होती है जोकि सामान्य मानव स्वभाव होता है और इसका किसी धर्म विशेष से कोई संबध नहीं है।  

ऐसे वातावरण में एक प्रश्न साफ तौर पर उठता है कि हिंदु जाति या हिंदू धर्म को आहत करने से इस वेब निर्देशक अली अब्बास जफर या ऐसे कलाकारों या ऐसे अन्य मुसलमानों को तथा इसी प्रकार के कुछ अन्य लोगों को क्या मिलता है। इन लोगों का हिंदुओं ने क्या नुकसान किया है जिस वजह से ये लोग हिंदू धर्म से नफरत करते हैं और हिंदुओं से बैर रखते हैं। सभी जानते हैं कि हिंदू बेहद शांत तथा सभी को गले लगाने में विश्वास करते हैं जिस कारण आक्रमणकारी तथा अशांत किस्म के लोग उन्हें कायर तथा अकर्मण्य कहते रहे हैं। निःसंदेह हिंदुओं के प्रति ऐसी धारणा देश और समाज के लिये विभाजनकारी है जो हिंदुओं में भी प्रतिक्रिया को बढ़ावा दे रही है। यद्यपि इस विवाद का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू भी है जिसके अनुसार इस वेब सीरीज को जानबूझ कर विवादित करना तथा इसके द्वारा दर्शकों में उत्सुकता बढ़ा कर ज्यादा से ज्यादा कमाई करना है तथा विरोध किये जाने पर एक लाईन की माफी मांग लेना है जैसा कि इस तांडव के विवाद में भी हुआ है क्योंकि ओटीटी पर प्रदर्शन के संबध में न कोई सेंसर बोर्ड का कैंची है न ही भारत सरकार का कोई दंडात्मक प्रावधान है जिससे ऐसे कार्यक्रमों के निर्माता, निर्देशक और कलाकार डरें और इस प्रकार के वैमनस्य को पैदा कर मुनाफा कमाने का घोर आपराधिक कृत्य कदापि न करें।

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अतः देश में ओटीटी पर ऐसे वेब सीरीजों के प्रदर्शन के संबंध में भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय द्वारा निर्मित दिशा-निर्देशों एवं कठोर कानूनों की तत्काल आवश्यकता है जिससे कोई भी व्यक्ति या समुदाय इस प्रकार के अश्लील चित्रण या प्रदर्शन द्वारा किसी समुदाय विशेष की धार्मिक भावनाओं पर कुठाराघात कदापि न कर सके, जिससे भारतीय समाज में अभद्रता फैले और सामाजिक सौहार्द को खतरा पैदा हो या फिर इन कारणों से अकारण ही अशांति का तांडव शुरू हो जाये तथा देश की सामाजिक संस्कृति को गंभीर चोट पहुँचे।

-प्रो. सुधांशु त्रिपाठी

आचार्य- राजनीति विज्ञान

उ0 प्र0 राजर्षि टण्डन मुक्त विश्वविद्यालय

प्रयागराज, उ0प्र0।







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