पहले चरण के चुनाव में सभी राजनीतिक दलों ने उत्तर प्रदेश में झोंकी अपनी ताकत

By अजय कुमार | Publish Date: Apr 10 2019 4:34PM
पहले चरण के चुनाव में सभी राजनीतिक दलों ने उत्तर प्रदेश में झोंकी अपनी ताकत
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बात आठों सीटों पर मुकाबले की कि जाए तो सहारनपुर से भाजपा के मौजूदा सांसद राघव लखन पाल, कांग्रेस के इमरान मसूद और बसपा के फजलुर्रहमान के बीच त्रिकोणीय मुकाबला है। यहां भाजपा को मुस्लिम वोटों में बंटवारे की उम्मीद है।

उत्तर प्रदेश में प्रथम चरण के लिए प्रचार शाम पांच बजे समाप्त हो गया हैं। यहां 11 अप्रैल को मतदान होना है। प्रथम चरण में सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, बागपत, बिजनौर, गाजियाबाद, गौतमबुद्धनगर, मेरठ और कैराना लोकसभा सीट पर मुकाबला है। जिन आठ लोकसभा सीटों पर मतदान होना है, वहां 2014 में भाजपा ने विपक्ष का सफाया करते हुए सभी सीटें जीती थीं। परंतु कैराना उप−चुनाव में बीजेपी को मिली करारी हार के बाद यहां के हालात काफी बदले हुए हैं। बसपा−सपा और रालोद मिलकर चुनाव लड़ रहे हैं तो कांग्रेस भी अबकी बार यहां मुकाबले में नजर आ रही है। चुनाव प्रचार के अंतिम दिन बिजनौर में कांग्रेस प्रत्याशी नसीमुददीन और सहारनपुर में इमरान मसूद के पक्ष में रोड शो करने आईं प्रियंका वाड्रा के समर्थकों की बिजनौर में भाजपाइयों से भिडंत हो गई। पुलिस ने काफी मुश्किल से हालात संभाले। 


बात आठों सीटों पर मुकाबले की कि जाए तो सहारनपुर से भाजपा के मौजूदा सांसद राघव लखन पाल, कांग्रेस के इमरान मसूद और बसपा के फजलुर्रहमान के बीच त्रिकोणीय मुकाबला है। यहां भाजपा को मुस्लिम वोटों में बंटवारे की उम्मीद है। यहां मायावती ने मुस्लिम वोट बंटे न इस बात की हिदायत दी है। बागपत में केन्द्रीय मंत्री सतपाल सिंह और रालोद के उपाध्यक्ष जयंत सिंह के बीच सीधा मुकाबला है। यहां कांग्रेस ने कोई प्रत्याशी नहीं उतारा है। जिसके चलते जयंत की स्थिति मजबूत नजर आ रही है। बशर्ते जाट और मुस्लिम एक साथ आ जाएं। मुजफ्फरनगर में भाजपा के संजीव बालियान और रालोद के अध्यक्ष अजीत सिंह चौधरी के बीच टक्कर है। अजित सिंह ने आखिरी चुनाव लड़ने की बात कहकर वोटरों पर मनोवैज्ञानिक बढ़ाने का दांव चला है। यहां भी कांग्रेस ने अपना प्रत्याशी नहीं उतारा है। कैराना में भाजपा के प्रदीप चौधरी और सपा की तबसुम हसन के बीच सीधा मुकाबला है। कांग्रेस ने यहां हरेन्द्र चौधरी को टिकट दिया है। तबस्सुम पिछला उप−चुनाव रालोद के टिकट से जीती थीं। गाजियाबाद में केन्द्रीय मंत्री भाजपा के उम्मीदवार जनरल वीके सिंह और सपा के सुरेश बंसल और कांग्रेस की डॉली शर्मा मैदान में हैं। प्रियंका गांधी ने डॉली के समर्थन में यहा रोड शो किया था। गौतमबुद्धनगर में केन्द्रीय मंत्री भाजपा उम्मीदवार डॉ. महेश शर्मा और बसपा के सतवीर नागर और कांग्रेस के अरविंद सिंह के बीच मुकाबला है। यहां का वोट गणित बसपा के पक्ष में जाता दिख रहा है। बिजनौर में भाजपा के कुंवर भारतेन्द्र और बसपा के मलूक नागर के बीच सीधी टक्कर है। कांग्रेस के प्रत्याशी और पूर्व बसपा नेता नसीमुददीन सिददीकी भी यहां मुकाबले को रोचक बना रही हैं। जाट गूजर और मुस्लिम बाहुल्य इस सीट से मायावती एक बार चुनाव जीत और एक बार हार भी चुकी हैं। मेरठ में भाजपा के राजेन्द्र अग्रवाल, बसपा के हाजी याकूब कुरैंशी और कांग्रेस के हरेन्द्र अग्रवाल के बीच मुकाबला। पीएम मोदी ने यहां से लोकसभा चुनाव का शंखनाद किया था।
 
भाजपा कें सामने अपने तीन केंद्रीय मंत्रियों डॉ. सतपाल सिंह, डॉ महेश शर्मा और विदेश राज्यमंत्री सेवानिवृत्त मेजर जरनल वीके सिंह की सीट बचाए रखने की चुनौती है। साथ ही प्रदेश के गन्ना राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) सुरेश राणा, आयुष राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) धर्मसिंह सैनी, खाद्य−रसद राज्यमंत्री अतुल गर्ग की भी अपने घरों में पकड़ व पहुंच भी पहले चरण की कसौटी पर कसी जानी है। 
2014 का लोकसभा चुनाव और 2017 का विधानसभा चुनाव यह साफ कर चुका है कि पहले चरण के मतदान से बना माहौल कमोबेश अंतिम चरण के मतदान तक सियासी दलों के लिए वातावरण बनाता है। उक्त दोनों चुनाव में पश्चिमी यूपी से ही मतदान का सिलसिला शुरू हुआ था, जिससे बने माहौल का लाभ भाजपा को अगले सभी चरणों में मिला था। इस बार भी चुनौवी माहौल का लाभ भाजपा को अगले सभी चरणों में मिला था। इस बार चुनावी समर की शुरूवात पश्चिमी यूपी से ही हो रही है। पश्चिमी यूपी और उसमें भी खास तौर से यह इलाका एक तरह से सियासी प्रयोगशाला बनकर सामने आया है। वजह, इस इलाके की आबादी की समीकरण हो या जातियों का समीकरण और हिंदू−मुसलमानों की आबादी का अनुपात। देवबंद जैसी संस्था की इस इलाके में मौजूदगी हो या कैराना जैसे मुद्दे अथवा मुजफ्फरनगर जैसा माहौल। भाजपा और उसके विपक्षी दल अपने−अपने तरीके से वोटों का ध्रुवीकरण करने की कोशिश करते है। इस बार भी ये कोशिशें सभी तरफ से होती दिख रही है। जाहिर है कि पहले चरण का मतदान इन कोशिशों सें बने माहौल का रूख भी बताएगा।
 
यहां पिछले दिनों जबर्दस्त चुनाव प्रचार देखने को मिला था। बीजेपी की तरफ से मोदी और गठबंधन की तरफ से माया−अखिलेश और चौधरी अजित सिंह ने देवबंद में जनसभा करके अपने प्रत्याशियों का हौसला बढ़ाने का काम किया। यूपी के सीएम योगी, केन्द्रीय मंत्री राजनाथ सिंह सहित भाजपा के कई स्टार प्रचारक भी यहां प्रचार करते नजर आएं बात मुददों की कि जाए तो  विपक्ष गन्ना किसानों का बकाया, बेरोजगारी, महिलाओं पर अत्याचार, किसानों की आत्महत्या को तो भाजपा राष्ट्रवाद, सर्जिकल स्ट्राइक, किसानों छोटे व्यापारियों को पेंशन जैसे मुददो के सहारे हैं। मुस्लिम लीग, मुसलमान, मुजफ्फरनगर दंगा भी प्रचार के दौरान चर्चा में रहा।


पिछले लोकसभा चुनावों पर नजर डाली जाए तो 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने 2013 में मुजफ्फनगर नगर सहित कई जिलों में हुई साम्प्रदायिक हिंसा को बड़ा मुद्दा बनाते हुए अखिलेश सरकार को तुष्टिकरण की राजनीति के लिए घेरा था। तब जाट−दलितों ने  भाजपा के पक्ष में जमकर मतदान किया था। अबकी बार मोदी की लोकप्रियता का ग्राफ गिरने और सपा−बसपा के गठबंधन से जमीनी हालात बदले हैं। कांग्रेस ने भी अबकी से पूरी ताकत झोंक रखी है। कांग्रेस किसके लिए मुसीबत का सबब बनेगी यह मतगणना वाले दिन ही पता चलेगा। 
 
कांग्रेस के घोषणा पत्र में राहुल गांधी ने न्यूनतम आय योजना को जो पाशा फेंका है, उसकी तथा भाजपा के वायदों किसानों−छोटे व्यापारियों को पेंशन एवं राष्ट्रवाद आदि को भी प्रथम चरण में कसौटी पर कसा जाएगा।
 
- अजय कुमार

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