IMEC से जुड़ने को आतुर हैं Egypt, Oman, Lebanon, Greece, Cyprus, Modi का Strategic Corridor दुनियाभर में छा गया

फ्रांस के राष्ट्रपति के IMEC विशेष दूत जेरार्ड मेस्त्राले ने नई दिल्ली में साफ कहा है कि IMEC के विस्तार पर फैसला मौजूदा आठ हस्ताक्षरकर्ता सरकारें ही करेंगी। उल्लेखनीय है कि भारत, अमेरिका, सऊदी अरब, यूएई, फ्रांस, जर्मनी, इटली और यूरोपीय संघ इसके मौजूदा हस्ताक्षरकर्ता हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कूटनीति और भारत की कनेक्टिविटी रणनीति का असर अब साफ दिखाई देने लगा है। भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा यानी IMEC को लेकर दुनिया के कई देश भारत के साथ जुड़ने में दिलचस्पी दिखा रहे हैं। मिस्र, लेबनान और ओमान ने IMEC के साथ काम करने की इच्छा जताई है, जबकि ग्रीस और साइप्रस इसके पूर्ण सदस्य बनने के इच्छुक हैं। यानी 2023 में भारत की पहल से शुरू हुआ यह गलियारा अब धीरे-धीरे अपना दायरा बढ़ा रहा है और बदलते वैश्विक हालात में भारत की रणनीतिक ताकत का बड़ा केंद्र बनता जा रहा है।
फ्रांस के राष्ट्रपति के IMEC विशेष दूत जेरार्ड मेस्त्राले ने नई दिल्ली में साफ कहा है कि IMEC के विस्तार पर फैसला मौजूदा आठ हस्ताक्षरकर्ता सरकारें ही करेंगी। उल्लेखनीय है कि भारत, अमेरिका, सऊदी अरब, यूएई, फ्रांस, जर्मनी, इटली और यूरोपीय संघ इसके मौजूदा हस्ताक्षरकर्ता हैं। वर्ष 2023 में G20 शिखर सम्मेलन के दौरान सामने आया यह प्रोजेक्ट भारत को अरब प्रायद्वीप के रास्ते यूरोप से जोड़ने के लिए समुद्री मार्ग, रेल नेटवर्क, ऊर्जा ढांचे और डिजिटल कनेक्टिविटी को एक साथ जोड़ने की परिकल्पना करता है।
सबसे अहम बात यह है कि इस साल के अंत तक IMEC की पहली मंत्रीस्तरीय बैठक होने की उम्मीद है। अब तक इसकी गतिविधियां मुख्यतः स्टीयरिंग कमेटी के स्तर तक सीमित रही हैं। मंत्रीस्तरीय बैठक न केवल परियोजना को राजनीतिक गति दे सकती है, बल्कि इसके भौगोलिक दायरे और सदस्यता विस्तार पर भी बड़ा फैसला संभव है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि जॉर्डन और इजरायल मूल समझौते में उल्लिखित थे, हालांकि वे आठ हस्ताक्षरकर्ताओं में शामिल नहीं हैं।
युद्ध ने बदली IMEC की तस्वीर
देखा जाये तो पश्चिम एशिया में जारी युद्ध और तनाव ने IMEC के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है, लेकिन साथ ही इसकी जरूरत भी पहले से कहीं ज्यादा बढ़ा दी है। होर्मुज और बाब-अल-मंदेब जैसे अहम समुद्री रास्तों पर बढ़ते खतरे ने यह साफ कर दिया है कि IMEC को किसी एक संवेदनशील मार्ग पर निर्भर नहीं रहना होगा। सवाल यही है कि जिस कॉरिडोर का मकसद सुरक्षित और वैकल्पिक व्यापार मार्ग देना है, अगर वही कुछ जोखिम भरे रास्तों पर निर्भर रहा तो वह कितना भरोसेमंद साबित होगा?
यही कारण है कि 2026 का IMEC, 2023 के IMEC से बिल्कुल अलग दिखाई दे रहा है। अब इसे एक सीधी लाइन वाले कॉरिडोर के बजाय 'नेटवर्क ऑफ कॉरिडोर्स' के रूप में देखने की जरूरत महसूस की जा रही है। अंतरराष्ट्रीय आर्थिक सहयोग और विकास संगठन की मैरी-एस्टेल रे के अनुसार बदलते हालात ने मूल कॉरिडोर की संरचना बदल दी है और अब व्यापारियों के लिए कई वैकल्पिक मार्गों और विकल्पों की जरूरत है। साथ ही इस बदलाव में ओमान की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो गई है। ओमान अरब प्रायद्वीप के लिए एक वैकल्पिक प्रवेश द्वार बन सकता है और उसके बंदरगाह होर्मुज तथा बाब-अल-मंदेब के जोखिम से बचने वाली व्यवस्था में अहम भूमिका निभा सकते हैं। सोहर और यूएई के फुजैराह के बीच प्रस्तावित रेल संपर्क इसी नई रणनीतिक सोच की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
'लाइन' नहीं, ऐसा नेटवर्क जिसे दुश्मन तोड़ न सके
विशेषज्ञों का मानना है कि एक ही मार्ग पर निर्भर रहने वाला कॉरिडोर युद्ध या भू-राजनीतिक संकट में आसानी से बाधित हो सकता है। इसके विपरीत कई बंदरगाहों, रेल मार्गों और समुद्री विकल्पों वाला नेटवर्क संकट के दौरान अपना रास्ता बदल सकता है। यही IMEC की नई रणनीतिक दिशा बन सकती है। फुजैराह जैसे होर्मुज के बाहर स्थित बंदरगाहों को मजबूत करना, ओमान के सोहर और सलालाह जैसे विकल्पों को जोड़ना तथा मिस्र और अन्य संभावित मार्गों को नेटवर्क में शामिल करना इस परियोजना को ज्यादा प्रभावी बना सकता है। देखा जाये तो इसका अर्थ केवल IMEC की सीमा बढ़ाना नहीं, बल्कि उसकी पूरी भौगोलिक संरचना को फिर से डिजाइन करना है।
भारत के हाथ में डिजिटल कमान भी
साथ ही भारत केवल भौतिक कनेक्टिविटी पर निर्भर नहीं है। पूर्व बंदरगाह सचिव राजेश कुमार सिन्हा के मुताबिक IMEC की लॉजिस्टिक प्रक्रिया को पूरी तरह डिजिटल बनाना आवश्यक है। भारत ने यूएई के साथ मिलकर MAITRI (Master Application for International Trade and Regulatory Interface) विकसित किया है, जो मई में लाइव हुआ। यह डिजिटल ढांचा आगे IMEC के दूसरे हिस्सों में भी दोहराया जा सकता है।
IMEC का लक्ष्य सिर्फ सामान पहुंचाना नहीं, बल्कि तेज, सस्ता और सुरक्षित व्यापार तंत्र तैयार करना है। मूल परिकल्पना के अनुसार इससे ट्रांजिट समय में 40 प्रतिशत तक और लॉजिस्टिक लागत में करीब 30 प्रतिशत तक कमी लाई जा सकती है। इसके साथ ग्रीन हाइड्रोजन, स्वच्छ ऊर्जा और सुरक्षित डिजिटल कनेक्टिविटी भी इस परियोजना के महत्वपूर्ण हिस्से हैं।
चीन के सामने भारत का रणनीतिक दांव
इसके अलावा, IMEC का महत्व केवल व्यापार तक सीमित नहीं है। यह चीन की Belt and Road Initiative के सामने एक वैकल्पिक वैश्विक कनेक्टिविटी मॉडल भी प्रस्तुत करता है। साथ ही अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हालिया समर्थन ने इस परियोजना को फिर राजनीतिक ऊर्जा दी है। हालांकि अमेरिकी समर्थन का वित्तीय समर्थन में बदलना अभी निश्चित नहीं माना जा रहा।
साथ ही भारत के लिए इसका सामरिक अर्थ और भी बड़ा है। यदि IMEC बहु-मार्गीय नेटवर्क में बदलता है, तो भारत पश्चिम एशिया और यूरोप के बीच व्यापार, ऊर्जा, डिजिटल कनेक्टिविटी और लॉजिस्टिक्स का महत्वपूर्ण केंद्र बन सकता है। इसके अलावा, यह भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को भी मजबूत करेगा। यानी भारत किसी एक शक्ति या किसी एक व्यापारिक मार्ग पर निर्भर हुए बिना कई देशों और कई कॉरिडोरों के साथ समानांतर साझेदारी आगे बढ़ा सकेगा।
भारत पहले ही IMEC के साथ-साथ International North-South Transport Corridor और Eastern Maritime Corridor जैसे अन्य संपर्क मार्गों पर काम कर रहा है। यही व्यापक रणनीति भारत को केवल IMEC का हिस्सा नहीं, बल्कि भविष्य के वैश्विक कनेक्टिविटी नेटवर्क का केंद्रीय खिलाड़ी बना सकती है।
असली चुनौती: कॉरिडोर को जमीन पर उतारना
हालांकि तस्वीर पूरी तरह आसान नहीं है। कई रेल लिंक, बंदरगाह और कनेक्टिविटी परियोजनाएं अभी विकास के दौर में हैं। युद्ध जोखिम, बीमा लागत, पूंजी की लागत और क्षेत्रीय अस्थिरता IMEC को व्यावसायिक रूप से चुनौतीपूर्ण बनाती है। भारत के सामने निर्यात के लिए पर्याप्त कार्गो उपलब्ध कराने की चुनौती भी है। इसके लिए मजबूत प्रशासनिक ढांचे की जरूरत होगी। जैसे कि एक साझा कानूनी या संस्थागत व्यवस्था, बेहतर डिजिटल एकीकरण, देशों के बीच समन्वय और व्यापारियों तथा निजी क्षेत्र की सक्रिय भागीदारी।
बहरहाल, पश्चिम एशिया के संकट ने IMEC की जरूरत को कम नहीं किया, बल्कि इसे और बढ़ा दिया है। अब कोशिश इसे एक ही रास्ते तक सीमित रखने की नहीं, बल्कि ऐसे मजबूत नेटवर्क में बदलने की है, जिसमें किसी एक महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग के बंद होने पर भी व्यापार जारी रह सके। इस पूरी रणनीति में भारत की भूमिका बेहद अहम है। भारत अब केवल दूसरे देशों तक पहुंचने वाले रास्ते का हिस्सा नहीं बनना चाहता, बल्कि ऐसे नए रास्ते तैयार करने में प्रमुख भूमिका निभा रहा है, जो आने वाले समय में वैश्विक व्यापार की दिशा तय कर सकते हैं।
-नीरज कुमार दुबे
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