लाल गलियारे का अंत: शाह की 'जीरो टॉलरेंस' नीति ने रची सुरक्षा की नई इबारत

अमित शाह ने बार-बार एक और महत्वपूर्ण बात कही है—'संवाद और पुनर्वास'। उन्होंने उन युवाओं के लिए हमेशा 'लाल कालीन' बिछाई है जो गुमराह होकर हिंसा की राह पर चले गए थे। सरकार की आत्मसमर्पण नीति को इतना आकर्षक और सुलभ बनाया गया कि हजारों नक्सलियों ने मुख्यधारा में लौटने का फैसला किया।
भारत की आंतरिक सुरक्षा के इतिहास में यदि किसी एक समस्या ने दशकों तक देश की प्रगति को बाधित किया और हजारों निर्दोषों का लहू बहाया, तो वह नक्सलवाद था। एक समय ऐसा भी था जब तत्कालीन सरकारों ने इसे देश के लिए 'सबसे बड़ा खतरा' स्वीकार किया था, लेकिन इसके समाधान के लिए वह ठोस राजनीतिक इच्छाशक्ति नहीं दिखाई थी जो आज नजर आ रही है। आज जब हम 2026 के मुहाने पर खड़े हैं, तो भारत के नक्शे से 'लाल गलियारे' का सिकुड़ता दायरा और बस्तर के जंगलों में गूंजती शांति इस बात का प्रमाण है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मार्गदर्शन और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की 'जीरो टॉलरेंस' नीति ने इस नासूर को जड़ से उखाड़ फेंकने का काम किया है।अमित शाह ने गृह मंत्रालय की कमान संभालते ही नक्सलवाद को केवल एक स्थानीय कानून-व्यवस्था की समस्या मानने के बजाय इसे एक राष्ट्रव्यापी सुरक्षा चुनौती के रूप में चिन्हित किया और इसे समाप्त करने के लिए 'समाधान' और 'लौह प्रहार' जैसी रणनीतियों का सूत्रपात किया।
अमित शाह की कार्यशैली का सबसे प्रमुख पहलू उनका 'परिणाम-आधारित' दृष्टिकोण है। उन्होंने अपने विभिन्न भाषणों में बार-बार इस बात पर जोर दिया है कि नक्सलवाद का अस्तित्व केवल बंदूकों के दम पर नहीं, बल्कि विकास की कमी और वैचारिक भ्रम के कारण टिका हुआ था। शाह ने उन 'अर्बन नक्सल' समूहों को भी बेनकाब किया जो शहरों में बैठकर जंगलों में हिंसा फैलाने वालों के लिए वैचारिक कवच तैयार करते थे। गृह मंत्री का मानना है कि लोकतंत्र में हिंसा का कोई स्थान नहीं है, और यदि कोई समूह हथियार उठाकर संविधान को चुनौती देता है, तो उसे उसी की भाषा में जवाब देना राज्य का उत्तरदायित्व है। इसी सोच के तहत उन्होंने सुरक्षा बलों को वह 'फ्री हैंड' दिया, जिसकी मांग वे दशकों से कर रहे थे। आज सुरक्षा बल न केवल नक्सलियों के गढ़ों में घुसकर प्रहार कर रहे हैं, बल्कि उन दुर्गम इलाकों में भी तिरंगा फहरा रहे हैं जहाँ पहले जाना असंभव माना जाता था।
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पिछले कुछ वर्षों में, विशेष रूप से छत्तीसगढ़, ओडिशा और झारखंड के सीमावर्ती इलाकों में सैकड़ों नए सुरक्षा कैंप स्थापित किए गए हैं। इन कैंपों ने नक्सलियों की रसद, सूचना तंत्र और छिपने के ठिकानों को पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया है। अमित शाह ने व्यक्तिगत रूप से इन क्षेत्रों का दौरा कर जवानों का मनोबल बढ़ाया और उन्हें आधुनिक तकनीक, ड्रोन, सैटेलाइट इमेजरी और संचार के बेहतर साधनों से लैस किया। गृह मंत्री ने संसद में स्पष्ट किया था कि जब तक अंतिम नक्सली हथियार नहीं डाल देता या उसका सफाया नहीं हो जाता, तब तक सरकार चैन से नहीं बैठेगी। अमित शाह की रणनीति केवल सैन्य कार्यवाही तक सीमित नहीं रही है। उनके भाषणों का एक बड़ा हिस्सा 'विकास' को समर्पित रहा है। उनका तर्क है कि जहाँ सड़क पहुँचती है, वहाँ नक्सलवाद पीछे हट जाता है। इसी सोच के साथ उन्होंने सड़क संपर्क परियोजनाओं को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। हजारों किलोमीटर लंबी सड़कों का जाल उन इलाकों में बिछाया गया जहाँ कभी नक्सलियों का खौफ हुआ करता था। शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी क्रांतिकारी बदलाव आए हैं। एकलव्य मॉडल स्कूलों के माध्यम से जनजातीय बच्चों को मुख्यधारा से जोड़ना और मोबाइल टावरों के जरिए डिजिटल इंडिया को घने जंगलों तक पहुँचाना शाह के 'सर्वांगीण विकास' मॉडल का हिस्सा है। जब एक आदिवासी युवक के हाथ में बंदूक के बजाय स्मार्टफोन और रोजगार के अवसर आए, तो नक्सलियों की भर्ती प्रक्रिया स्वतः ही ध्वस्त हो गई।
अमित शाह ने बार-बार एक और महत्वपूर्ण बात कही है—'संवाद और पुनर्वास'। उन्होंने उन युवाओं के लिए हमेशा 'लाल कालीन' बिछाई है जो गुमराह होकर हिंसा की राह पर चले गए थे। सरकार की आत्मसमर्पण नीति को इतना आकर्षक और सुलभ बनाया गया कि हजारों नक्सलियों ने मुख्यधारा में लौटने का फैसला किया। शाह ने अपने भाषणों में स्पष्ट संदेश दिया कि सरकार उन लोगों के प्रति सहानुभूति रखती है जो भटक गए हैं, लेकिन जो निर्दोषों की हत्या और विकास कार्यों में बाधा डालेंगे, उन्हें सुरक्षा बलों के लौह प्रहार का सामना करना पड़ेगा। यह 'कैरेट एंड स्टिक' (पुरस्कार और दंड) की नीति ही थी जिसने नक्सली संगठनों के भीतर दरार पैदा कर दी और उनके नेतृत्व को कमजोर कर दिया।
आज झारखंड का 'बूढ़ा पहाड़' हो या छत्तीसगढ़ का 'अबूझमाड़', इन क्षेत्रों की पहचान अब आतंक के बजाय प्रगति से होने लगी है। अमित शाह ने सुरक्षा बलों, राज्य सरकारों और खुफिया एजेंसियों के बीच जिस तरह का समन्वय स्थापित किया, वह प्रशासनिक कौशल का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। उन्होंने 'यूनिफाइड कमांड' के माध्यम से सूचनाओं के आदान-प्रदान को तेज किया, जिससे ऑपरेशन की सटीकता बढ़ी और सुरक्षा बलों के हताहत होने की दर में भारी कमी आई।
अमित शाह का योगदान आधुनिक भारत के निर्माण में एक ऐसे सेनापति के रूप में देखा जाएगा जिसने देश की आंतरिक एकता को खंडित करने वाली सबसे बड़ी शक्ति को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया। उनके नेतृत्व में भारत ने न केवल नक्सलियों को हराया है, बल्कि उन लाखों लोगों के मन में विश्वास जगाया है जो दशकों तक डर और अभाव के साये में जीने को मजबूर थे। आज का भारत अब 'लाल गलियारे' के अंत का जश्न मना रहा है और विकास के नए क्षितिज की ओर अग्रसर है, जहाँ गोलियों की जगह कलम होगी और भय की जगह स्वाभिमान होगा।
भारत भूषण अरजरिया,
प्रभारी मीडिया काउंसिल ऑफ इंडिया
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