महिला कोटे से जुड़े संविधान बिल के लुढ़कने के सियासी निहितार्थ

हालांकि, सरकार ने शेष दो बिल (परिसीमन और अन्य) आगे नहीं बढ़ाए, क्योंकि वे मुख्य बिल पर निर्भर थे। एचएम अमित शाह और पीएम मोदी विपक्ष के विरोध को कांग्रेस के इतिहास से जोड़कर जनता में प्रचार करेंगे। यह 2029 चुनावों से पहले राजनीतिक ध्रुवीकरण तेज कर सकता है।
इंडिया गठबंधन की विपक्षी एकजुटता ने पुनः सत्ताधारी गठबंधन एनडीए की नींद उड़ा दी है। ऐसा इसलिए कि लोकसभा में संविधान (131वां संशोधन) विधेयक 2026, जो लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण लाने से जुड़ा था, 16 अप्रैल 2026 को वोटिंग में गिर गया। इसके पक्ष में 298 और विपक्ष में 230 वोट पड़े, जबकि न्यूनतम दो-तिहाई बहुमत (लगभग 352 वोट) की आवश्यकता थी, जो सरकार के रणनीतिकारों ने नहीं जुटा पाए। शायद पहली बार सदन में अमित शाह की रणनीति पिट गई। इसका राजनीतिक प्रभाव यह रहा कि मोदी सरकार के लिए 12 साल में पहली बड़ी संवैधानिक हार हुई है, जो विपक्ष की एकजुटता को दर्शाता है।
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने इसे "संविधान पर हमला" बताकर कांग्रेस-विपक्ष की रणनीति की जीत घोषित की, जबकि भाजपा इसे विपक्ष विरोधी हथियार बनाने की योजना बना रही है। एक सत्ता विरोधी रणनीति के तहत जहां विपक्ष ने बिल को "छलावा" करार दिया, वहीं दावा किया कि यह परिसीमन और चुनावी नक्शा बदलने की साजिश है। वहीं, एक एनडीए नेता के अनुसार, बिल गिरने से सरकार अब सड़क पर विपक्ष को महिलाओं के अधिकारों के नाम पर घेरेगी।
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हालांकि, सरकार ने शेष दो बिल (परिसीमन और अन्य) आगे नहीं बढ़ाए, क्योंकि वे मुख्य बिल पर निर्भर थे। एचएम अमित शाह और पीएम मोदी विपक्ष के विरोध को कांग्रेस के इतिहास से जोड़कर जनता में प्रचार करेंगे। यह 2029 चुनावों से पहले राजनीतिक ध्रुवीकरण तेज कर सकता है। लेकिन इसका साइड इफेक्ट्स पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के विधानसभा चुनावों में भी दिख सकता है, क्योंकि विपक्षी एकजुटता का पुनः संदेश गया है।
वहीं, मोदी सरकार महिला आरक्षण बिल को दोबारा लाने के लिए रणनीतिक बदलाव कर सकती है, खासकर 16 अप्रैल 2026 को लोकसभा में हार के बाद। समझा जाता है कि सरकार नई विधेयक रणनीति के तहत दो या तीन नए विधेयक ला सकती है: पहला लोकसभा सीटें बढ़ाकर (543 से 850 तक) 33% महिला आरक्षण सुनिश्चित करेगा, जिसमें एससी/एसटी के लिए सब-कोटा भी शामिल होगा। लेकिन फिर सवाल उठेगा कि ओबीसी और ईडब्ल्यूएस के लिए क्यों नहीं? दूसरा परिसीमन आयोग स्थापित करेगा, लेकिन इसे राज्यों के अनुमोदन से अलग रखा जा सकता है ताकि दो-तिहाई बहुमत आसान हो।
सरकार का मानना है कि विपक्ष से सहमति निर्माण के बाद आवश्यक कदम उठाए जाएंगे, क्योंकि पीएम मोदी सभी दलों को पत्र लिखकर सर्वसम्मति की अपील कर चुके हैं, इसी सिलसिले में कांग्रेस और अन्य विपक्षियों से बातचीत जारी है। महिला कोटा बिल को 2029 चुनावों से पहले लागू करने के लिए 2011 जनगणना पर आधारित संशोधन पर जोर दिया, और नई जनगणना-परीक्षण का इंतजार खत्म किया जाएगा। इसके निमित्त संसदीय प्रक्रिया यह हैं कि विशेष सत्र बुलाकर संशोधित बिल पेश करना संभव होगा, जहां 18 घंटे लोकसभा और 10 घंटे राज्यसभा चर्चा होगी। वहीं सड़क पर प्रचार के साथ विपक्ष को ओबीसी हितों पर घेराव, जिससे राजनीतिक दबाव बनेगा। यह 2029 से पहले बहुमत जुटाने की कोशिश होगी।
इस प्रकार देखा जाए तो महिला आरक्षण बिल को 2029 से पहले लागू करना संवैधानिक रूप से जटिल है, क्योंकि इसके लिए परिसीमन प्रक्रिया अनिवार्य है जो 2011 जनगणना पर आधारित होनी चाहिए। इसका संभावित विकल्प संशोधित बिल पुनर्प्रस्तावहै जिसके तहत सरकार दोबारा संशोधित विधेयक ला सकती है, जिसमें लोकसभा सीटें बढ़ाकर (543 से 850 तक) 33% महिला कोटा सुनिश्चित हो, लेकिन विपक्ष सहमति के बिना दो-तिहाई बहुमत मुश्किल है। इसलिए विपक्ष से सर्वसम्मति की पहल तेज है। सरकार सभी दलों से बातचीत तेज कर विशेष सत्र बुलाना, परिसीमन को अलग रखकर बिल पास करवाना, हालांकि विपक्ष इसे "परिसीमन साजिश" मान रहा है।
जहाँ तक व्यावहारिक बाधाओं की बात है तो परिसीमन आयोग को पब्लिक हियरिंग और प्रक्रिया में कम से कम 2-3 वर्ष लगते हैं, इसलिए 2029 चुनाव से पहले पूरा होना असंभव है। वहीं बिल गिरने से अब अगली जनगणना (2031) और उसके बाद के परिसीमन तक (2034+) देरी तय, दक्षिणी राज्यों की चिंताएं टल सकती हैं। सरकार सड़क प्रचार पर जोर देगी। वहीं विपक्ष ने लोकसभा में गिरे महिला आरक्षण संविधान संशोधन बिल पर मुख्य रूप से परिसीमन प्रक्रिया, ओबीसी/एससी/एसटी सब-कोटा और राजनीतिक साजिश को लेकर आपत्तियां दर्ज कीं। मुख्य आपत्तियां निम्नलिखित हैं:-
पहला, परिसीमन साजिश: बिल को लोकसभा/विधानसभा सीटें बढ़ाने और 2011 जनगणना पर परिसीमन से जोड़ा गया, जिसे विपक्ष ने उत्तर भारत (विशेषकर भाजपा शासित राज्यों) को लाभ पहुंचाने वाली "सीट रिबनिंग" करार दिया। फलतः दक्षिणी राज्य अपनी सीटें खोने के डर से विरोधी हो गए।
दूसरा, ओबीसी/ईडब्ल्यूएस आरक्षण अनुपस्थिति: 33% महिला कोटा में ओबीसी, ईडब्ल्यूएस के लिए सब-कोटा न होने से सामाजिक न्याय का उल्लंघन ठहराया, और इसे "सवर्ण महिलाओं के लिए" नया मौका बताया।
तीसरा, संविधान पर हमला: राहुल गांधी ने इसे "संविधान बचाओ" का मुद्दा बनाया, और दावा किया कि बिल चुनावी नक्शा बदलकर विपक्ष कमजोर करेगा।
इस प्रकार राजनीतिक तर्क देते हुए विपक्ष ने इसे "छलावा" कहा, क्योंकि लागू होने में 2029-34 तक देरी होगी। इसलिए एकजुट होकर वोटिंग में भाजपा नीत एनडीए को हराया।
वहीं, मोदी सरकार ने विपक्ष की आपत्तियों का जवाब देते हुए बिल को महिलाओं के सशक्तिकरण का ऐतिहासिक कदम बताया, जो 25-30 साल पहले ही लागू हो जाना चाहिए था। परिसीमन पर स्पष्टीकरण देते हुए सरकार ने कहा कि परिसीमन 2011 जनगणना पर आधारित होगा, जो निष्पक्ष है और दक्षिणी राज्यों को नुकसान नहीं पहुंचाएगा; यह सीट वृद्धि के साथ संतुलित होगा। अमित शाह ने चुनौती दी कि यदि विपक्ष संशोधन चाहे तो सदन एक घंटा रोकें, वे तुरंत बदलाव लाएंगे।
वहीं, ओबीसी/एससी/एसटी कोटा पर जवाब देते हुए सरकार ने ओबीसी/ईडब्ल्यूएस सब-कोटा की मांग पर अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए सरकार ने स्पष्ट कहा कि संविधान धर्म या जाति आधारित अतिरिक्त आरक्षण की अनुमति नहीं देता; इसलिए मौजूदा एससी/एसटी कोटा में महिलाओं को प्राथमिकता रहेगी। पीएम मोदी ने विपक्ष को "महिलाओं के खिलाफ" करार दिया, और कहा कि पंचायत स्तर पर सफलता साबित हो चुकी है।
हालांकि राजनीतिक आरोपों का खंडन करते हुए और नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के "संविधान पर हमला" सम्बन्धी दावे पर शाह ने कहा कि विपक्ष सैद्धांतिक रूप से सहमत था लेकिन वोटिंग में नकारा; अब सड़क पर इसका जवाब मिलेगा। सभी दलों से सर्वसम्मति की अपील की गई।
उल्लेखनीय है कि महिला आरक्षण बिल (संविधान 131वां संशोधन विधेयक 2026) के प्रमुख प्रावधान लोकसभा, और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए कुल सीटों का एक-तिहाई आरक्षण सुनिश्चित करने से जुड़े हैं, जिसका
मुख्य प्रावधान इस प्रकार है:-
पहला, आरक्षण का दायरा: लोकसभा, राज्य विधानसभाओं और दिल्ली विधानसभा में कुल सीटों का 33% महिलाओं के लिए आरक्षित, जिसमें एससी/एसटी आरक्षित सीटों का भी एक-तिहाई हिस्सा शामिल है।
दूसरा, परिसीमन प्रक्रिया: 2011 जनगणना पर आधारित परिसीमन आयोग द्वारा सीटों का आवंटन और रोटेशन, जिसमें लोकसभा सीटें 543 से बढ़ाकर 850 तक प्रस्तावित है।
तीसरा, अवधि और प्रभावी तिथि: 15 वर्ष के लिए (संसद द्वारा विस्तार योग्य), अगले परिसीमन के बाद 2029 चुनावों से लागू होगा।
चौथा, अतिरिक्त विशेषताएं: रोटेशन आधारित सीटें प्रत्येक परिसीमन में बदलेंगी, लेकिन ओबीसी/ईडब्ल्यूएस सब-कोटा शामिल नहीं होना भी विवाद का कारण बना।
- कमलेश पांडेय
वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
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