एस्ट्रोसैट ने खोजा तारों के गोलाकार गुच्छे में सितारों का नया समूह

By डॉ. निरुज मोहन रामानुजम | Publish Date: Mar 13 2019 6:55PM
एस्ट्रोसैट ने खोजा तारों के गोलाकार गुच्छे में सितारों का नया समूह
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चूंकि तारों के एक गोलाकार गुच्छे में विभिन्न द्रव्यमान वाले तारे होते हैं, जिनकी रासायनिक संरचना लगभग समान होती है। इसलिए किसी समय हम इनमें एक साथ, अपने विकास के विभिन्न चरणों में विभिन्न द्रव्यमानों के तारों की अवस्था देख सकते हैं।

पुणे। (इंडिया साइंस वायर): सितंबर 2015 में प्रमोचित की गयी भारतीय मल्टी-वेवलेंथ अंतरिक्ष वेधशाला-एस्ट्रोसैट निरंतर रोमांचक जानकारियां दे रही है। इस वेधशाला का उपयोग करते हुए, तिरुवनंतपुरम और मुंबई के खगोलविदों ने तारों के गोलाकार गुच्छे (ग्लोब्यूलर क्लस्टर) एनजीसी-2808 में पराबैंगनी तारों की एक नई श्रेणी की खोज की है।
 
तारों के गोलाकार गुच्छों (ग्लोब्यूलर क्लस्टर) में हजारों से लाखों तारे होते हैं, जो एक इकाई के रूप में गतिमान रहते हैं। इन तारों के गुरुत्वाकर्षण के फलस्वरूप वह गुच्छा अपनी आकृति बनाये रखता है और यह माना जाता है कि इन सब तारों का जन्म लगभग एक ही समय में एक साथ हुआ होगा। हमारी आकाशगंगा मंदाकिनी या मिल्की-वे में लगभग 150 गोलाकार गुच्छे हैं, इनमें से कुछ संभवतः आकाशगंगा के सबसे पुराने पिण्ड होंगे।
 


तारे जन्म लेते हैं, युवावस्था में पहुंचते हैं और फिर उनकी मृत्यु हो जाती है। विकास की इन विभिन्न स्थितियों के आने में जो समय लगता है वह हमारी कल्पना से परे है। भारतीय अंतरिक्ष विज्ञान और प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईएसटी), तिरुवनंतपुरम में एमएससी के स्नातकोत्तर छात्र और अनुसंधान दल की सदस्य, राशि जैन ने बताया कि "बड़े द्रव्यमान वाले तारे तेजी से विकास करते हैं, फिर कुछ लाख वर्षों तक प्रकाशित रहकर एक अत्यंत दर्शनीय मृत्यु को प्राप्त होते हैं। जबकि, हमारे सूर्य या उससे छोटे तारे, अरबों वर्षों में धीरे-धीरे विकसित होते हैं।” 
 
चूंकि तारों के एक गोलाकार गुच्छे में विभिन्न द्रव्यमान वाले तारे होते हैं, जिनकी रासायनिक संरचना लगभग समान होती है। इसलिए किसी समय हम इनमें एक साथ, अपने विकास के विभिन्न चरणों में विभिन्न द्रव्यमानों के तारों की अवस्था देख सकते हैं। आज से 5 अरब वर्ष बाद जब सूर्य लाल रंग का विशाल दानव तारा बन जाएगा तो वह इन्हीं तारों जैसी अवस्थाओं से गुज़रेगा। जो तारे सूर्य से अधिक बड़े होते हैं उनका विकास क्रम बहुत भिन्न होता है और वे अंततः पराबैंगनी प्रकाश में बहुत उज्ज्वल बनते हैं क्योंकि वे स्वाभाविक रूप से अधिक गर्म होते हैं। इसलिए तारों के गोलाकार गुच्छे तारकीय विकास के सिद्धांतों का परीक्षण करने के लिए अच्छी प्रयोगशाला साबित होते हैं।
हमारी जानकारी में एनजीसी-2808 सबसे विशाल गोलाकार समूहों में से एक है, और हमसे 47,000 प्रकाश वर्ष की दूरी पर स्थित है। इस समूह का अध्ययन करने के लिए शोधकर्ताओं के दल ने एस्ट्रोसैट में लगी अल्ट्रावायलेट इमेजिंग टेलीस्कोप (यूवीआईटी) का उपयोग किया।
 
एनजीसी-2808 के इस चित्र में दूरस्थ-पराबैंगनी उत्सर्जन को नीले और निकटवर्ती-पराबैंगनी उत्सर्जन को पीले रंग में दर्शाया गया है। इस शोध कार्य का नेतृत्व करने वाली आईआईएसटी की प्रो. सरिता विग ने कहा, "हम गोलाकार समूहों में तारों की विभिन्न रासायनिक संरचना की श्रेणियों का एक पराबैंगनी प्रकाश में परिप्रेक्ष्य प्राप्त करना चाहते थे और यूवीआईटी ने हमें यह अवसर प्रदान किया।" 


 
शोधकर्ताओं को विभिन्न पराबैंगनी फिल्टरों के माध्यम से ली गई छवियों में 12,000 से अधिक तारों की अलग-अलग पहचान करने में सफलता मिली है। इस अध्ययन से जुड़े टाटा मूलभूत अनुसंधान संस्थान के प्रोफेसर स्वर्ण घोष ने कहा कि “विभिन्न फिल्टरों में उनकी चमक को नापकर हम इन पराबैंगनी-प्रकाशमान गर्म तारों के तापमान का अनुमान लगा सके, फिर इसके द्वारा हम इन तारों को अलग-अलग समूहों में बांट सके।“
 
यह एक सामान्य धारणा थी कि ऐसे समूहों में सभी तारे एक ही उम्र के होते होंगे क्योंकि इनका जन्म एक ही विशाल धूल और गैस के बदल से हुआ था, पर इसके विपरीत, हाल के अध्ययनों से पता चला है कि कई गोलाकार गुच्छों में तारों की एक से अधिक रासायनिक संरचना वाली प्रजातियां मिलती हैं। यह अंतर कैसे उत्पन्न होता है अभी अच्छी तरह से समझा नहीं जा सका है, हालांकि एक प्रचलित सिद्धांत द्वारा इस डेटा को बहुत कुछ समझा जा सकता है। एनजीसी-2808 कुछ विशिष्ट है क्योंकि इसके दृश्य प्रकाश में अवलोकन से हमें पता चला है कि इसमें तारों की कम से कम पांच अलग-अलग रासायनिक संरचना वाली प्रजातियां मौजूद हैं।
यूवीआईटी पर पराबैंगनी फिल्टरों के संयोजन का उपयोग करते हुए, शोधकर्ताओं ने प्रत्येक फिल्टर में उनकी चमक के आधार पर गर्म तारों के विभिन्न समूहों को अलग-अलग करने का प्रयास किया और अपेक्षानुरूप प्रत्येक विकासवादी चरण में तारों की पहचान करने में सफल रहे। हालांकि, उन्होंने पहली बार यह भी पाया कि विकसित तारों का एक वर्ग, जिसे ‘रेड हॉरिजॉन्टल ब्रांच’ कहा जाता है, वास्तव में दो अलग-अलग समूहों से मिलकर बने होते हैं। चूंकि आकाश में तारों की स्थितियां उन्हें पता थीं, इसीलिए वे ध्यान से देख पाए कि ऐसे तारों के विभिन्न वर्ग तारों के गुच्छे में कहां स्थित थे। उनका यह विश्लेषण व्यापक रूप से स्वीकृत उस मॉडल के साथ असहमति की ओर इशारा करता है, जो यह बताता है कि कैसे किसी एक समूह में तारों की विभिन्न रासायनिक प्रजातियां उत्पन्न होती हैं।
 
यूवीआईटी की अत्यंत उच्च विभेदन क्षमता (रिजॉल्यूशन) और इसके कई फिल्टरों का लाभ उठाते हुए अन्य गोलाकार समूहों के अलग-अलग तारों के इसी प्रकार के अध्ययन से खगोलविदों को यह समझने में मदद मिल सकती है कि ऐसे समूहों में ये तारकीय रासायनिक श्रेणियां कैसे बनती हैं। अध्ययन के परिणामों को शोध पत्रिकामंथली नोटिसेज़ ऑफ रॉयल एस्ट्रोनॉमिकल सोसायटी में प्रकाशित किया जाएगा)। (इंडिया साइंस वायर)
 
(डॉ. निरुज मोहन रामानुजम खगोलशास्त्री हैं और एस्ट्रोनॉमिकल सोसायटी ऑफ इंडिया की पब्लिक आउटरीच ऐंड एजुकेशन कमेटी के सदस्य हैं।)
 
(भाषांतरण : पीयूष पाण्डेय)

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