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    <title><![CDATA[Hindi News - News in Hindi - Latest News in Hindi | Prabhasakshi]]></title>
    <description><![CDATA[Latest News in Hindi, Breaking Hindi News, Hindi News Headlines, ताज़ा ख़बरें, Prabhasakshi.com पर]]></description>
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      <title><![CDATA[बलूचिस्तान का 70% क्षेत्र गंवाया, खैबर को तालिबान ने कब्जाया, PoK में गोलियों से आवाज को दबाया, किस पाकिस्तान पर हुकूमत कर रहे मुनीर-शहबाज?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/from-pok-to-balochistan-munir-pakistan-army-losing-control]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>राजनीतिक अनिश्चितता, सीमा पार से बढ़ता आतंकवाद और सड़कों पर भड़कता जन-आक्रोश पाकिस्तान इस वक्त एक साथ कई मोर्चों पर गंभीर संकट से जूझ रहा है। तस्वीर साफ़ है। एक कब्जे वाले इलाके में कराया गया दिखावटी चुनाव, खून-खराबे में तब्दील होते सड़कों के विरोध-प्रदर्शन, पुलिस थानों पर बरसाती गोलियों वाले सिरफिरे आतंकी, और सेना के इशारों पर नाचती सरकार की धज्जियां उड़ाते विद्रोही! गजब की बात तो यह है कि कभी जिनके दम पर पाकिस्तान उछलता था, आज वही पुराने दोस्त उसके सबसे बड़े दुश्मन बन बैठे हैं। सोने पर सुहागा यह कि जेल में बंद पूर्व प्रधानमंत्री की एक आवाज पर आज भी सड़कों पर हुजूम उमड़ पड़ता है और हालत यह आ चुकी है कि खुद सरकार भी मान रही है कि सिस्टम पूरी तरह ध्वस्त हो चुका है। कहानी की शुरुआत करते हैं पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर (PoK) से करते हैं।&nbsp; इस्लामाबाद की सरकार ने सोचा था कि 10 अगस्त तक निपटाने के लिए यहाँ एक ढर्रे वाला लोकल इलेक्शन करा देंगे। लेकिन नेताओं की रैलियों की जगह, पाकिस्तान के गैर-कानूनी कब्जे में पिस रही जनता ने यह पूरी गर्मी सड़कों के उग्र आंदोलनों में बिता दी। इस पूरे बवाल के केंद्र में 'जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी' (JAC) खड़ा है। शुरुआत बहुत सीधी-सादी मांगों सस्ती बिजली, सब्सिडी वाला आटा, टैक्स में छूट और शासन में सही नुमाइंदगी से हुई थी। लेकिन अब यह चिंगारी पूरे पाकिस्तान के लिए ऐसा नासूर बन चुकी है, जिसे बुझाना इस्लामाबाद के बस के बाहर की बात दिख रही है!</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/business/tewolde-gebremariam-was-set-to-become-the-pia-chief-but-the-tata-group-won-the-race" target="_blank">Tewolde Gebremariam बनने वाले थे PIA चीफ, लेकिन Tata Group ने मारी बाजी, अब संभालेंगे Air India</a></h3><h2>बगावत की आवाज को गोलियों से दबाने की कोशिश</h2><div>समय के साथ, इसकी मांगें एक बहुत बड़ी राजनीतिक चुनौती बन गईं। सबसे विस्फोटक मांग थी। स्थानीय विधानसभा में बाहरी शरणार्थियों के लिए आरक्षित 12 सीटों को खत्म करना। JAC का तर्क है कि इन सीटों से पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में रहने वाले लोगों की राजनीतिक आवाज़ कमजोर होती है। बढ़ते गुस्से पर इस्लामाबाद की प्रतिक्रिया मजबूरी में आई है। सुरक्षा बलों ने निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर स्नाइपर से गोलीबारी की है। भारत का कहना है कि पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में कम से कम 90 लोग मारे गए हैं और सैकड़ों घायल हुए हैं। हाल के हफ्तों में कर्फ्यू, रास्ते बंद करने और कार्यकर्ताओं की बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियों के साथ सख्ती और बढ़ गई है। अशांति और सख्ती के इसी माहौल में इस्लामाबाद अब पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में स्थानीय चुनाव करा रहा है। लेकिन वोटिंग पूरी होने से पहले ही, स्थानीय कार्यकर्ता इन चुनावों को धांधली वाला बता रहे हैं। वे JAC को आतंकवादी संगठन घोषित किए जाने को गलत कदम मानते हैं। लेकिन सड़कों पर उतरे आम लोगों के लिए, सरकार के रवैये ने इस संकट को और गहरा कर दिया है। राजनीतिक अधिकारों की मांग कर रहे प्रदर्शनकारियों को अब आतंकवादी बताया जा रहा है। उनका कहना है कि इस लेबल का इस्तेमाल उनके विरोध को आपराधिक ठहराने के लिए किया जा रहा है।&nbsp;</div><h2>बलूचिस्तान का एक तिहाई हिस्सा पाक ने गंवाया</h2><div>पाकिस्तान के सबसे बड़े सूबे क्वेटा बलूचिस्तान का इलाका वैसे तो लगभग 45% क्षेत्र में फैला है। ईरान से इसकी सीमा भी लगती है। बलूचिस्तान में दूर दूर तक खाली मैदान और रेगिस्तान हैं। यहां की वीरानगी में इन दिनों बागी तेवर और तेज हो गए हैं। बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (बीएलए) के लड़ाके अलग देश की मांग कर रहे हैं। हालात ये हैं कि बलूच लड़ाकों और पश्तून (पठान) विद्रोहियों का बलूचिस्तान सूबे के लगभग 70% हिस्से पर कब्जा है। अब सवाल केवल यह नहीं है कि पाकिस्तानी सुरक्षा बल कितने विद्रोहियों को ढेर करते हैं या गिरफ्तार करते हैं। असली सवाल यह है कि क्या पाकिस्तानी सरकार पुलिस स्टेशन खुले रख सकती है, हाईवे पर यातायात चला सकती है, बाजार और कारोबार सामान्य रख सकती है और लोगों को बिना डर के यात्रा करने की सुरक्षा दे सकती है? बलूचिस्तान के कई इलाकों में हथियारबंद लड़ाके क्वेटा, खुजदार और मसतुंग जैसे शहरों में घुसकर पुलिस थानों और सरकारी दफ्तरों पर हमले करते हैं। बीएलए के लड़ाके और पश्तून गुट सड़कों पर अस्थायी चौकियां बना रहे हैं और वाहनों की तलाशी लेते हैं। खुलेआम वसूली भी होती है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/rushkar-ahmed-an-accused-in-a-grooming-gang-case-who-absconded-after-securing-bail-from-uk-police" target="_blank">UK Police से ज़मानत लेकर फरार Grooming Gang का आरोपी, Rushkar Ahmed अब PoK Assembly में बैठेगा</a></h3><h2>खनिज और पोर्ट पर चीन-अमेरिका का कब्जा</h2><div>बलूचिस्तान को पाकिस्तान की खनिजों की खदान भी कहते हैं। बात शुरू की तो खुजदार शहर के युवक मोमिन का पाक सरकार पर गुस्सा फूट पड़ा। मोमिन कहते हैं यहां के ग्वादर पोर्ट पर चीन का कब्जा है। चीन ने सीपैक के नाम पर यहां लगभग 3 लाख करोड़ रुपए का निवेश किया है। ग्वादर पोर्ट पर चीन की फिशिंग बोट्स का कब्जा है। स्थानीय बलूच मछुआरों को चीनी बोट्स खदेड़ देती हैं। इनकी बोट्स बड़ी और ज्यादा पावर वाली होती हैं। ज्यादातर बलूच मछुआरों के पास अब भी पालदार नौकाएं हैं। बलूच बेरोजगार हो रहे हैं। 55 साल के असलम का कहना है कि यहां के रेअर अर्थ मिनरल पर अमेरिका का कब्जा है। पाक आर्मी चीफ मुनीर अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प के सामने मिनरल की नुमाइश करते हैं। इस खजाने पर केवल बलूचों का हक है।</div><h2>खैबर पर तालिबानी शरिया वाली सरकार ने जमाया कब्जा</h2><div>खैबर पख्तूनख्वा पाकिस्तान का फ्रंटियर यानी सरहदी इलाका है। डूरंड लाइन पाक और अफगानिस्तान को अलग करती है। अफगानिस्तान में तालिबान सरकार के पांच साल में खैबर के अधिकांश इलाके में इन्हीं का दबदबा है। 2 अगस्त को पाकिस्तान के उत्तर-पश्चिमी खैबर पख्तूनख्वा (KP) प्रांत में आतंकवाद-विरोधी रैली के दौरान हुए आत्मघाती बम धमाके में कम से कम 17 लोगों की मौत हो गई और दो दर्जन से ज़्यादा लोग घायल हो गए। मरने वालों में ज़्यादातर आम नागरिक और पुलिस अधिकारी थे। यह हमला प्रांत की स्वात घाटी के काबल शहर में हुआ, जहाँ प्रदर्शनकारी एक पुलिस स्टेशन के पास जमा होकर नारे लगा रहे थे और घाटी में शांति और अमन की मांग कर रहे थे। 'स्वात पीस रैली' नाम की इस रैली का आयोजन स्थानीय आदिवासी परिषद 'स्वात अमन जिरगा' ने किया था। यह बम धमाका पाकिस्तान के लिए आंतरिक सुरक्षा और जान-माल के नुकसान के लिहाज़ से बेहद गंभीर रहे साल की एक और घटना है। 'डॉन' की एक रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान सशस्त्र बलों के एक प्रवक्ता ने शुक्रवार (31 जुलाई) को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया कि 2026 में पाकिस्तान में आतंकवाद की 3,145 घटनाएं हुईं, जिनमें से 1,971 घटनाएं KP में हुईं। जुलाई 2026 तक, आतंकवादी घटनाओं में 800 से ज़्यादा पाकिस्तानी मारे जा चुके हैं, जिनमें 300 से ज़्यादा सुरक्षाकर्मी शामिल हैं। खैबर में पाक सरकार के कानून नहीं तालिबान का शरिया चलता है। दरअसल, इस इलाके में विभाजन के समय से ही कबिलाई व्यवस्था लागू रही है। स्वात, सैदू, मिंगोरा और मर्दन में 'लोया जिरगा' के जरिए ही कानून चलता है। ये जिस जगह असल में शरिया कानून को लागू करती है। अफगान तालिबान इसका है। इमरान खान की सरकार ने 2021 में टीटीपी के साथ सुलह की कोशिश की, लेकिन इमरान की गद्दी जाते ही टीटीपी ने खैबर में अपने दबदबे को और बढ़ा लिया है। खैबर के वजीरिस्तान में पाकिस्तान सेना कई सैन्य ऑपरेशन कर चुकी है, लेकिन यहां अब टीटीपी काबिज है। आए दिन टीटीपी के हमलों के कारण स्कूल और कॉलेज बंद रहते हैं। खैबर पख्तूनख्वा में टीटीपी के आए दिन होने वाले हमलों से पाक सेना में खौफ है। इस साल टीटीपी फौज पर 145 से ज्यादा हमले कर चुकी है, इनमें 48 सैनिक मारे गए। खैबर में डूरंड लाइन पर अभी पाक सेना की 50 फौजी चौकियां खाली हैं। 22 पोस्ट पर ही पाक फौज तैनात है।&nbsp;</div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 06 Aug 2026 14:23:12 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/from-pok-to-balochistan-munir-pakistan-army-losing-control</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[जुबान बिगड़ी हुई थी उदयनिधि की, पहली बार मिला सवा शेर, सत्ता में आते ही विजय ने धरा थलापति अवतार]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/udhayanidhi-had-a-foul-tongue-but-for-the-first-time-he-met-his-match]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>1989 की 25 मार्च को तमिलनाडु विधानसभा में बजट पेश किया जा रहा था। जयललिता की पार्टी एआईएडीएमके ने हाल के ही विधानसभा चुनाव में 27 सीटें जीती थीं और तमिलनाडु की विधानसभा को विपक्ष में एक महिला नेता मिली थी। उस वक्त डीएमके सरकार में थी और मुख्यमंत्री थे एम करुणानिधी। सदन में जैसे ही बजट भाषण पढ़ा जाना शुरू हुआ जयललिता और उनकी पार्टी के नेताओं ने विधानसभा में हंगामा शुरू कर दिया। हंगामा इतना बढ़ा कि एआईएडीएमके के किसी नेता ने करुणानिधी की तरफ फाइल फेंकी जिससे उनका चश्मा गिरकर टूट गया। जययलिता ने जब देखा कि हंगामा ज्यादा बढ़ रहा है तो वो सदन से बाहर जाने लगी। तभी मंत्री दुरई मुरगन आ गए और उन्होंने जयललिता को बाहर जाने से रोका और उनकी साड़ी खींची जिससे उनकी साड़ी फट गई और वो खुद भी जमीन पर गिर गईं। सत्ता पक्ष यानी डीएमके और विपक्ष यानी एआईएडीएमके के सदस्यों के बीच विधानसभा में हाथा-पाई हुई। अपनी फटी हुई साड़ी के साथ जयललिता विधानसभा से बाहर आ गईं। यही वो दिन था जब जयललिता ने सदन से निकलते हुए कहा था कि वो मुख्यमंत्री बनकर ही इस सदन में वापस आएंगी वरना कभी नहीं आएंगी।कई बार जिंदगी में हुई घटना बहुत कुछ बदलकर रख देती है। कई बार इतिहास की घटनाएं ऐसी होती हैं जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता। अब एक बार फिर तमिलनाडु की राजनीति में एक महिला का नाम चर्चा में है। इस बार विवाद अभिनेत्री तृषा कृष्णन से जुड़ा है। बयान जो सीधे तौर पर तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी जोसेफ विजय के लिए था लेकिन इसमें नाम जुड़ा है एक्ट्रेस त्रिशा कृष्णन का भी। पूरा मामला समझ लेते हैं।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/mri/from-pk-to-owaisi-how-these-lone-warriors-are-single-handedly-changing-the-course-of-politics" target="_blank">सिर्फ एक बंदा काफ़ी है: PK से ओवैसी तक...कैसे अकेले दम पर राजनीति का रुख बदलने में लगे ये 'लोन वॉरियर्स'</a></h3><div>3 अगस्त 2026 यानी बीते सोमवार की बात है। जब सुर्खियों में बांकीपुर और दतिया के उपचुनाव के परिणामों की चर्चा थी तब तमिलनाडु के थंजाऊर में किसानों का एक प्रदर्शन चल रहा था। कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच कावेरी नदी के पानी को लेकर विवाद है। कावेरी नदी का पानी कर्नाटक से होकर तमिलनाडु पहुंचता है। तमिलनाडु का आरोप है कि कर्नाटक की सरकार पानी ही नहीं छोड़ती। जिसकी वजह से राज्य के किसानों को मुसीबत का सामना करना पड़ रहा है। सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी नहीं मिल पाता। यह है मुद्दा। इसे ही लेकर तमिलनाडु में किसान संगठन प्रदर्शन कर रहे हैं। प्रदर्शन का नेतृत्व किसान नेता अय्या कन्नू कर रहे हैं। इस समय प्रदर्शन तेज इसलिए हुआ है क्योंकि तमिलनाडु के कावेरी डेल्टा वाले इलाके में कुरवाई फसल बोई गई है। यह धान की ही फसल होती है जिसकी बुवाई जून जुलाई और सितंबर अक्टूबर में होती है। बुवाई के वक्त चाहिए होता है भरपूर पानी क्योंकि कर्नाटक ने तमिलनाडु के लिए कावेरी का पानी नहीं छोड़ा है। तो प्रदर्शन शुरू हो गया है। द प्रिंट की एक रिपोर्ट के मुताबिक कन्नू ने तमिलनाडु के मुख्यमंत्री विजय से सुप्रीम कोर्ट में मुकदमा दायर करने और राज्य के किसानों के लिए ₹1 लाख करोड़ के मुआवजे की मांग करने की अपील की है। कन्नू का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक सरकार को हर महीने तमिलनाडु के लिए पानी छोड़ने का निर्देश दिया था। अब तक कर्नाटक के पास 80 टीएमसी यानी 1000 मिलियन क्यूबिक फीट से ज्यादा पानी है। कर्नाटक के सीएम डी के शिव कुमार ने तमिलनाडु के लिए 3500 क्यूसेक पानी छोड़ने से इंकार कर दिया। अगर वे पानी नहीं छोड़ते हैं तो वे कर्नाटक में नुकसान करेंगे और वे अपने लोगों और राज्य को बचाने के लिए 25,000 क्यूसेक पानी छोड़ रहे हैं। हमारे सीएम जोसेफ विजय को सुप्रीम कोर्ट में मुकदमा दायर करके कर्नाटक से ₹1 लाख करोड़ की मुआवजे की मांग करनी चाहिए। प्रोटेस्ट के निशाने पर कर्नाटक सरकार के साथ-साथ तमिलनाडु की विजय सरकार भी है। तो विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष और मुख्य विपक्षी पार्टी डीएमके के नेता उदयनिधि स्टालिन पहुंच गए थपुर जहां प्रोटेस्ट जारी था। प्रोटेस्ट के दौरान उदयनिधि स्पीच देना शुरू करते हैं।&nbsp;</div><h2>उदयनिधि ने&nbsp; क्या कह दिया, जो पुलिस उठा ले गई?&nbsp;</h2><div>लगातार सरकार और सीएम विजय पर निशाना साधते हैं। जब उदयनिधि बोल रहे थे तब मंच के सामने मौजूद लोग एक्ट्रेस त्रिशा कृष्णन का नाम चिल्लाने लगते हैं। उदयनिधि चुप हो जाते हैं। फिर पानी के ही रेफरेंस से एक आपत्तिजनक टिप्पणी करते हैं। मंच पर मौजूद और सामने खड़े लोग हंसने लगते हैं। फिर उदयनिधि एक पॉज लेते हुए कहते हैं, मैं कावेरी नदी के पानी की बात कर रहा हूं। जिसने इस बात पर मुहर ही लगा दी कि उदयनिधि के बयान को जिस तरह से समझा जा रहा है, वह असल में वही कहना भी चाह रहे थे। बयान आया तो विवाद शुरू हुआ। विजय की पार्टी टीवी ने उदयनिधि को निशाने पर ले लिया। पूर्व बीजेपी नेता के अन्नामलई ने भी इस बयान की आलोचना की। उन्होंने कहा जब मैं कल वैगई नदी की सफाई कर रहा था तो मैंने सोचा क्या इससे भी बुरा प्रदूषण कहीं हो सकता है। फिर मैंने उदयनिधि स्टालिन का भाषण सुना। उदयनिधि के बयान के खिलाफ तमिलनाडु पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर लिया। द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक थवरुर ईस्ट पुलिस ने बीएएनएस की धारा 196, 192, 352, 79, 296 बी 61, 3512 और आईटी एक्ट की धारा 67 के तहत मुकदमा दर्ज किया है। मुकदमा दर्ज होने के बाद 4 अगस्त को तमिलनाडु पुलिस की एक टीम उदयनिधि के आवास पर पहुंच गई। पहले उनकी लीगल टीम और पुलिस के बीच बातचीत होती रही। कारवाई टालने की कोशिश हुई। लेकिन आखिरकार पुलिस ने उदयनिधि को हिरासत में ले लिया।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/mri/why-did-thousands-of-muslims-forcibly-enter-spain" target="_blank"> स्पेन में जबरन क्यों घुसे हजारों मुस्लिम? डरा देगी इसके पीछे की कहानी, मेलोनी ने दी धमकी, मोदी हुए अलर्ट</a></h3><h2>उदयनिधि को पहली बार सवा शेर मिला</h2><div>दरअसल जब तमिलनाडु में डीएमके की सरकार थी तो उदयनिधि स्टालिन कुछ भी बोलकर निकल जाते थे। कभी सनातन को डेंगू-मलेरिया कहा और इसका खात्मा करने की बात की, तो कभी हिन्दी भाषा को लेकर विवादित बयान दिया। अपनी सरकारी मशीनरी और कानूनी पेचिदगियों का इस्तेमाल कर वे हर बार निकल जाते थे। लेकिन इस बार मामला उन्होंने राज्य के मुख्यमंत्री सी जोसेफ विजय के खिलाफ निजी टिप्पणी का था। विपक्ष के नेता उदयनिधि स्टालिन की जुबान एक बार फिर बिगड़ी और इस बार नतीजा पहले से कहीं ज्यादा कठोर निकला. चेन्नई स्थित उनके घर से पुलिस ने उन्हें उठा लिया। पूर्व सीएम के बेटे उदयनिधि को पहली बार 'सवा शेर' मिला। सीएम विजय ने इस पर तत्काल कार्रवाई की और 24 घंटे से कम समय में भी एक्शन लिया। उन्होंने साफ संदेश दे दिया कि बड़बोले बयानों का जवाब अब सिर्फ शब्द नहीं, बल्कि पुलिस कार्रवाई भी हो सकती है। यह घटना सिर्फ कानूनी कार्रवाई नहीं, बल्कि राजनीतिक संदेश भी है। विजय की सरकार ने साफ दिखाया कि विपक्ष के नेता होने के बावजूद कोई भी व्यक्ति व्यक्तिगत टिप्पणियों और अभद्र बयानों से ऊपर नहीं है।</div><h2>CM विजय पर गुस्साए स्टालिन</h2><div>डीएम के नेता उदयनधि स्टालिन की गिरफ्तारी के बाद उनके पिता और डीएम के प्रमुख एमके स्टालिन ने सीएम विजय और उनकी सरकार पर जमकर निशाना साधा। उन्होंने कहा अहंकार हमेशा विनाश का रास्ता दिखाता है। एमके स्टालिन ने सोशल मीडिया प्लेटफार्म एक्स पर लंबा चौड़ा पोस्ट लिखकर सरकार पर कई गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि जिस वक्त उदयनिधि को हिरासत में लिया गया वो तंजाबुर में कावेरी नदी के पानी के मुद्दे पर सरकार के खिलाफ आंदोलन कर रहे थे। उनके मुताबिक उदयनिधि किसानों के हक की बात उठा रहे थे और सरकार की नाकामी को लोगों के सामने रख रहे थे। शालिनी ने कहा कि सीएम विजय कावेरी जल विवाद का कोई समाधान नहीं निकाल पाए हैं। इतना ही नहीं मेघदातू बांध के मुद्दे पर भी सरकार कोई ठोस कदम नहीं उठा सकी। इसका सबसे ज्यादा नुकसान किसानों को हो रहा है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा किसान पानी के लिए परेशान हैं। उनकी फसलें सूख रही है। लेकिन मंत्री सीएम की फिल्म देखकर भावुक हो रहे हैं। इस बयान के जरिए उन्होंने सरकार की प्राथमिकताओं पर सवाल उठाया। एम के स्टालिन ने यह भी आरोप लगाया कि उदयनिधि की गिरफ्तारी का असली मकसद उन्हें विधानसभा के बजट सत्र से दूर रखना था। उनका कहना है कि 5 अगस्त को बजट सत्र शुरू होना है और सरकार नहीं चाहती कि उदयनिधि उसमें हिस्सा ले। उन्होंने पूछा कि अगर पुलिस को सिर्फ पूछताछ ही करनी थी तो चेन्नई में भी यह काम हो सकता था। फिर उदयनिधि को तंजाबुर क्यों ले जाया गया। स्टालिन का कहना है कि इससे साफ पता चलता है कि कारवाई राजनीतिक वजहों से की गई। एम के स्टालिन ने यह भी दावा किया कि मद्रास हाईकोर्ट ने कहा है कि उदयनिधि को उसी दिन रिहा किया जाए। उनके मुताबिक अदालत का यह आदेश सरकार के रवैया पर बड़ा झटका है और दिखाता है कि गिरफ्तारी को लेकर सवाल उठ रहे हैं। उन्होंने सीएम विजय पर हमला बोलते हुए कहा कि सत्ता में आने के बाद से उनकी सरकार विरोधियों को निशाना बनाने में ज्यादा व्यस्त है। स्टालिन का आरोप है कि सरकार लोकतांत्रिक तरीके से विरोध की आवाज सुनने की बजाय विपक्ष के नेताओं को गिरफ्तार कराने का रास्ता अपना रही है। उदयनिधि के बयान को लेकर भी एम के स्टालिन ने उनका बचाव किया। उन्होंने कहा कि उदयनिधि ने अपने भाषण में किसी का नाम नहीं लिया था और ना ही कोई अश्लील बात कही थी। उनका कहना है कि बयान को गलत तरीके से पेश किया जा रहा है। स्टालिन ने यह भी कहा कि अगर कभी उदयनिधि से कोई गलती होती है तो वो बिना देर किए माफी मांग लेते हैं। इसीलिए इस पूरे&nbsp; मामले को बेवजह बड़ा बनाया जा रहा है।&nbsp;</div><h2>मद्रास कोर्ट में क्या-क्या हुआ?</h2><div>इसके बाद मामला मद्रास हाई कोर्ट पहुंचा जहां उनकी अग्रिम जमानत पर सुनवाई हुई। सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ वकील विजय नारायण ने अदालत को बताया कि उदयनिधि स्टालिन को औपचारिक रूप से गिरफ्तार किया गया है और उन्हें तंजावुर ले जाया जाएगा, लेकिन उन्हें हिरासत में रखने का कोई इरादा नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि पूछताछ पूरी होने के बाद उन्हें जमानत पर रिहा कर दिया जाएगा।</div><h2>जमानत मिलने के बाद क्या बोले उदयनिधि?</h2><div>जमानत मिलने के बाद उदयनिधि स्टालिन ने पुलिस की कार्रवाई पर भी गंभीर आरोप लगाए। प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने कहा कि तमिलनाडु सरकार मद्रास कोर्ट में कह रही थी कि मुझे गिरफ्तार करने का कोई इरादा नहीं है, लेकिन पूछताछ के नाम पर करीब 3,000 पुलिसकर्मी तैनात कर दिए गए। मुझे चेन्नई से तंजावुर सड़क मार्ग से ऐसे ले जाया गया, जैसे मैं कोई आतंकवादी हूं।</div><h2>महिलाओं को लेकर पहले भी विवादों में रहे हैं उदयनिधि</h2><div>तृषा कृष्णन को लेकर हुआ यह विवाद कोई पहला मौका नहीं है जब उदयनिधि स्टालिन महिलाओं पर दिए गए बयानों से फंसे हों। इससे पहले भी वह कई बार ऐसे बयानों के कारण आलोचना झेल चुके हैं। कुछ समय पहले जब वह मुख्यमंत्री जोसेफ विजय पर हमला बोल रहे थे, तब उन्होंने विजय की पत्नी संगीता सोर्नालिंगम का नाम भी बीच में घसीट लिया था। उन्होंने उनके निजी जीवन से जुड़ी खबरों को अपने राजनीतिक भाषण का मुख्य हिस्सा बनाया था। उस समय भी विपक्ष ने उन पर यह गंभीर आरोप लगाया था कि वह अपनी राजनीतिक लड़ाई जीतने के लिए परिवार की महिलाओं को बीच में लेकर आते हैं। इससे पहले 2021 के विधानसभा चुनाव के दौरान भी ऐसा ही देखने को मिला था।</div><h2>परिस्थितियाँ भिन्न, मगर सोच वही पुरानी</h2><div>वर्ष 1989 में तमिलनाडु विधानसभा के भीतर जयललिता के साथ हुई बदसलूकी और हाल ही में तृषा कृष्णन पर हुई विवादित छींटाकशी—दिखने में ये दोनों घटनाएँ बिल्कुल अलग हैं। एक तरफ जहाँ लोकतांत्रिक सदन की मर्यादा तार-तार हुई थी और सीधा शारीरिक हमला हुआ था, वहीं दूसरी तरफ एक राजनीतिक मंच से सरेआम घटिया और अमर्यादित बयानबाज़ी की गई। इन दोनों घटनाओं के दौर, स्थान और तरीके भले बदल गए हों, लेकिन इनके पीछे की मानसिकता रत्ती भर नहीं बदली। ये दोनों मामले घूम-फिरकर एक ही कड़वे और गंभीर सवाल पर लाकर खड़ा करते हैं—आखिर तमिलनाडु के सियासी अखाड़े में बार-बार महिलाओं को ही सॉफ्ट टारगेट क्यों बनाया जाता है? अपनी राजनीतिक रंजिशों और गंदे शह-मात के खेल में आख़िर कब तक महिलाओं के सम्मान को ढाल बनाया जाता रहेगा?</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 05 Aug 2026 14:24:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/udhayanidhi-had-a-foul-tongue-but-for-the-first-time-he-met-his-match</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[सिर्फ एक बंदा काफ़ी है: PK से ओवैसी तक...कैसे अकेले दम पर राजनीति का रुख बदलने में लगे ये 'लोन वॉरियर्स']]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/from-pk-to-owaisi-how-these-lone-warriors-are-single-handedly-changing-the-course-of-politics]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>बिहार में जिस सीट पर प्रशांत किशोर की जीत हुई है, यह वो सीट है जिसको लेकर दबी जुबान में अक्सर बीजेपी वाले कहते थे कि यहां कुत्ता बिल्ली भी चुनाव लड़ा देंगे तो वो जीत जाएगा। और वो गलत नहीं कहते थे। हां, क्योंकि यह बांकीपुर था। बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन का अपना घर जिस सीट से वह एक दो बार नहीं लगातार पांच बार जीते थे और यहीं से जीतकर वह दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी के अध्यक्ष बन गए। 15 साल से यहां कमल का बटन लगातार दब रहा था और नतीजा पहले से ही लिखा था और ताना उस आदमी को मारा जा रहा था जिसने 243 सीटों पर लड़कर शून्य जीता था। जिसको लेकर बिहार में मीम भी वायरल हुए थे। प्रशांत तब खुलकर कहते थे कि मैं मरा नहीं हूं अभी अभी जिंदा हूं। अभी मैं मरा नहीं हूं। अभी नहीं मरा हूं। जब मर जाऊंगा तो फिर लिखना अभी मरा नहीं हूं। अब इस लाइन का मतलब समझ में आ रहा है। पटना के गिनती वाले हॉल में राउंड द राउंड वही मजाक भारी पड़ता गया जैसे पंचायत में आपको याद होगा। विधायक जी हार गए थे और सामने वाली पार्टी जीत गई थी। प्रशांत किशोर के समर्थक भी वैसे ही डांस कर रहे हैं। कह रहे हैं कि आज सावन के सोमवार के दिन बाबा का आशीर्वाद मिल गया। पीके ने केवल एक सीट का चुनाव नहीं जीता है। बांकीपुर बीजेपी की प्रतिष्ठा से जुड़ी सी और 1995 से ये सीट बीजेपी के पास रही थी। पहले पटना वेस्ट और फिर 2008 के परिसीमन के बाद बांकीपुर से पांच बार नितिन और उससे पहले उनके पिता नवीन प्रसाद सिन्हा तीन बार इस सीट से विधायक रहे। प्रशांत किशोर ने इस सिलसिले को तोड़ दिया है। बिहार के बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर की जीत ने देश की राजनीति में एक नए ट्रेंड को रेखांकित किया है। भले ही प्रशांत किशोर, चंद्रशेखर आजाद (आजाद समाज पार्टी), असदुद्दीन ओवैसी (AIMIM) और जयराम महतो (JLKM) जैसे नेता अपनी-अपनी पार्टियों के अकेले सांसद या विधायक हों, लेकिन संसद और विधानसभाओं से लेकर जनता के बीच इनकी आवाज और राजनीतिक प्रभाव किसी बड़ी पार्टी से कम नहीं है। ऐसे में आइए जानते हैं कि कैसे&nbsp; एकल राजनीतिक चेहरे अपने मुद्दों, सोशल मीडिया पकड़ और बेबाक नेतृत्व के दम पर पारंपरिक बहुदलीय व्यवस्था के बीच अपनी एक मजबूत और असरदार पहचान बना रहे हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/priyanka-gandhi-says-people-are-bored-of-bjp-after-upchunav-results" target="_blank">उपचुनाव नतीजों पर Priyanka Gandhi बोलीं, भाजपा से ऊब चुके हैं लोग</a></h3><h2>प्यादे से वजीर को मात देने वाला दांव हुआ फेल</h2><div>पटना का दिल है बांकीपुर गांधी मैदान से सटा इलाका पढ़े लिखे लोग दुकानदार नौकरी पेशा वो इलाका जहां शाम को चाय की दुकान पर राजनीति उबलती है और वोट हमेशा एक तरफ गिरता है। 2010 से यहां एक ही चेहरा जीतता है नितिन नवीन सफेद कुर्ता माथे तिलक पटना की गलियों में जाना पहचाना आदमी और उससे पहले उनके पिताजी यही जीतते थे यानी यह सीट पार्टी के लिए सीट थोड़ी थी घर की बैठक थी कि यहां यहां तो हम जीते यहां कौन सा टेंशन है? फिर हुआ यह कि नितिन नवीन की किस्मत अचानक से उछाल मार दी गई। पार्टी ने उन्हें राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया। राज्यसभा चले गए और फिर पीछे ये सीट खाली। भाजपा तो ये मान के बैठी थी कि भाई घर है हमारा। 15 साल का रिकॉर्ड है। जीत पक्की है।&nbsp; बीजेपी ने प्रशांत किशोर के विरुद्ध एक मंडल कार्यकर्ता नीरज कुमार सिन्हा को उम्मीदवार बनाया। बीजेपी के रणनीतिकार&nbsp; बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की पंक्ति को अर्थ देने की कोशिश की- चौराहे पर लुटता चीर, प्यादे से पिट गया वजीर...! वर्ष 2025 विधानसभा के चुनावी जंग में बुरी तरह पिटे प्रशांत किशोर के लिए बांकीपुर किसी कोरामीन से कम नहीं।&nbsp; बीजेपी की रणनीति थी कि एक साधारण कार्यकर्ता से प्रशांत किशोर को पराजित कर उनकी आखिरी उम्मीद को ध्वस्त किया जाए।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/nitin-navin-bankipur-datia-bypoll-result-review" target="_blank">BJP अध्यक्ष नितिन नवीन ने Bankipur और Datia उपचुनाव नतीजों पर कही यह बात</a></h3><h2>चंद्रशेखर आज़ाद</h2><div>किशोर से पहले, भीम आर्मी के प्रमुख चंद्रशेखर आज़ाद 2024 के लोकसभा चुनावों में अपनी पार्टी 'आज़ाद समाज पार्टी (कांशीराम)' के टिकट पर उत्तर प्रदेश की नगीना सीट से सांसद चुने गए थे। उन्होंने बीजेपी उम्मीदवार को 1.51 लाख वोटों से हराया था। 38 वर्षीय आज़ाद, जो दलितों के एक प्रमुख नेता हैं, ने 2022 में गोरखपुर अर्बन सीट से यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के खिलाफ अपना पहला चुनाव लड़ा था, लेकिन वे हार गए और उन्हें सिर्फ़ 3% वोट मिले। सांसद चुने जाने के बाद, आज़ाद संसद के अंदर और बाहर दलितों और मुसलमानों की एक बड़ी आवाज़ बनकर उभरे हैं। उन्हें लोकसभा में अलग-अलग मुद्दों पर बहस में हिस्सा लेने का समय मिलता है, साथ ही संसद के बाहर अपने आंदोलन के दौरान उन्हें सांसद का प्रोटोकॉल भी मिलता है। मध्य प्रदेश के दतिया विधानसभा उपचुनाव में उनकी पार्टी के उम्मीदवार दामोदर यादव तीसरे स्थान पर रहे। सोमवार को घोषित नतीजों में कांग्रेस उम्मीदवार घनश्याम सिंह ने बीजेपी के आशुतोष तिवारी को 6,016 वोटों से हराया, जबकि दामोदर को 22,527 वोट मिले।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/prashant-kishor-jibe-at-bjp-a-30-year-old-fortress-crumbled-in-just-30-days" target="_blank">Prashant Kishor का BJP पर तंज: 30 साल का किला सिर्फ 30 दिनों में ढहा</a></h3><h2>जयराम महतो</h2><div>जयराम महतो, जिन्हें 'टाइगर' के नाम से भी जाना जाता है, झारखंड विधानसभा में अपनी पार्टी 'झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा' (JLKM) के अकेले विधायक हैं। उन्होंने 2024 का लोकसभा चुनाव गिरिडीह से निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर लड़ा था और उन्हें 3.47 लाख वोट मिले थे। इसके बाद, नवंबर 2024 के विधानसभा चुनावों से पहले चुनाव आयोग ने JLKM को मान्यता दी, जिसमें वे डुर्मी सीट से चुने गए। उन्होंने बेरमो से भी चुनाव लड़ा था, लेकिन वहां वे दूसरे स्थान पर रहे। 31 साल के महतो OBC कुडमी समुदाय के उभरते हुए नेता हैं और झारखंड के युवाओं के बीच काफी लोकप्रिय हैं। सोशल मीडिया पर उनके वीडियो को बहुत ज़्यादा लोग देखते हैं। इन वीडियो में वे राजनीतिक जागरूकता, राजनीतिक नेताओं द्वारा जमा की गई संपत्ति, लोगों की गरीबी और इस बात पर बात करते हैं कि कैसे झारखंड में बाहरी लोगों को सरकारी नौकरियां मिलती हैं। अपने चुनावी नामांकन हलफनामे में उन्होंने YouTube को अपनी आय का स्रोत बताया था। महतो, आज़ाद और किशोर में एक आम बात यह है कि वे अपनी-अपनी पार्टियों के युवा संस्थापक हैं और उन्होंने बदलाव और न्याय तथा नई राजनीति के अपने एजेंडे से लोगों के बीच अपनी पहचान बनाई है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/prashant-kishor-dismantles-bjp-35-year-stronghold-in-bankipur-historic-victory-for-jan-suraaj" target="_blank">Prashant Kishor ने Bankipur में BJP के 35 साल के गढ़ को ध्वस्त किया, Jan Suraaj की ऐतिहासिक जीत</a></h3><h2>असदुद्दीन ओवैसी</h2><div>AIMIM के प्रमुख और हैदराबाद से पांच बार सांसद रहे 57 वर्षीय असदुद्दीन ओवैसी लोकसभा में अपनी पार्टी के अकेले सदस्य हैं। देश में मुसलमानों की एक अहम आवाज़ के तौर पर उभरने के कारण उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली है। वे संसद और दूसरे सार्वजनिक मंचों पर बड़े राष्ट्रीय मुद्दे उठाने के लिए जाने जाते हैं, जिनमें मुस्लिम समुदाय से जुड़े मुद्दे भी शामिल हैं। हालांकि AIMIM एक पुरानी पार्टी है, लेकिन ओवैसी ने इसके विस्तार की अगुवाई की है। अब तेलंगाना, बिहार और महाराष्ट्र समेत कई राज्यों में पार्टी के कई विधायक और पार्षद हैं।</div><div><br></div><div><br></div><div><br></div><div><br></div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 04 Aug 2026 13:43:04 +0530</pubDate>
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      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
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      <title><![CDATA[ स्पेन में जबरन क्यों घुसे हजारों मुस्लिम? डरा देगी इसके पीछे की कहानी, मेलोनी ने दी धमकी, मोदी हुए अलर्ट]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/why-did-thousands-of-muslims-forcibly-enter-spain]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>गरीबी और राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं टकराती हैं तब सीमाओं के मानचित्र धुंधले पड़ जाते हैं। और जब कोई देश मानव आबादी को एक जियोपॉलिटिकल हथियार की तरह इस्तेमाल करने लगे तो मंजर वही होता है जो इस वक्त स्पेन के अफ्रीकी एनक्लेव सोटा में नजर आ रहा है। भूमध्य सागर का वो मुहाना जो अफ्रीका और यूरोप के बीच व्यापार का सेतु होना चाहिए था। पिछले 24 घंटों में एक अंतहीन मानवीय और सुरक्षा संकट का गवाह बन चुका है। नागरिक तैर कर बाढ़ फांदकर चट्टानों को पार कर स्पेनिश सरजमी पर दाखिल हो चुके हैं। कम से कम 34 जिंदगियां समुद्र के खारे पानी में खामोश हो गई। सड़कें इस वक्त सहमी हुई है। दुकानें बंद हैं और स्पेन के प्रधानमंत्री पेड्रो सांजेस को इसे देश की प्रादेशिक अखंडता पर हमला करार देकर सेना उतारनी पड़ी। लेकिन सवाल सिर्फ हजारों प्रवासियों का नहीं है। सवाल यह है कि आखिर क्या वजह है कि मोरक्को की सीमा से अचानक इतनी बड़ी इंसानी लहर स्पेन में उमड़ पड़ी? क्या यह महज बेहतर जिंदगी की तलाश है या फिर यूरोप की दहलीज पर खेला जा रहा एक बड़ा जिओपॉलिटिकल गेम। आंकड़ों को ध्यान से देखिए। सोटा की कुल आबादी है 83,000 के आसपास और सिर्फ एक दिन के भीतर वहां 60,000 लोग घुस आते हैं। यानी शहर की कुल आबादी का 70%। समुद्र के रास्त मीलों दूर तक तैर कर आते युवा चट्टानों के सहारे आगे बढ़ते बच्चे और महिलाएं और फिर थिएटर के बाजारों में पसरती दहशत। वहां के लोकल्स का कहना है कि उन्होंने अपने जीवन में ऐसा उग्र और अनकंट्रोल्ड मंजर पहले कभी नहीं देखा। अस्पताल के सुरक्षाकर्मियों से लेकर आम नागरिकों तक में डर का माहौल है। स्पेन की सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक फैसला दिया था कि समुद्र में रोके गए प्रवासियों को बिना कानूनी प्रक्रिया के तुरंत मुरक्को वापस नहीं भेजा जा सकता। और इसी फैसले की आड़ में आपराधिक नेटवर्क और अफवाहों ने ऐसा तहलका मचाया कि हजारों लोग एक साथ सीमा पर टूट पड़े।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/pok-roads-stained-red-with-blood-piles-of-bodies-internet-services-suspended-across-entire-region" target="_blank">खून से लाल हुई PoK की सड़कें, लाशों का लगा अंबार, पूरे इलाके में इंटरनेट सेवाएँ बंद</a></h3><h2>स्पेन में क्यों बने इमरजेंसी जैसे हालात?</h2><div>मोरक्को के तटीय शहर फनीदेक से स्पेन की जो दूरी है यह सिर्फ 3 से 5 किमी है। एक तरफ मोरक्को है जहां पर बेरोजगारी है, भुखमरी है, बदहाली है। वहीं दूसरी तरफ थोड़ी ही दूरी पर ताकतवर यूरोपीय संघ और विकसित देश स्पेन मौजूद है। स्पेन में इस टाइम पर आपको बता दें कि इमरजेंसी जैसी सिचुएशन बन चुकी है। हजारों लोग स्विमिंग करते हुए स्पेन के कोस्टल टाउन की तरफ पहुंच रहे हैं ताकि वह बॉर्डर्स के अंदर घुसकर सीधे यूरोपियन यूनियन में फैल सके। फेवरेबल वेदर का फायदा उठाकर यह लोग धड़ल्ले से समंदर पार कर रहे हैं। इस दौरान कई लोग डूबे भी हैं। लेकिन भीड़ की रफ्तार जो है यह कम नहीं हो रही। इसमें से कई सारे लोग मोरक्को के हैं। कई अफ्रीकी युवा भी शामिल हैं। इन्हें यह सही वक्त क्यों लगता है बॉर्डर पार करने के लिए? अब आप उसे समझिए क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ऑफ स्पेन ने हाल ही में एक रूलिंग पास की थी कि जो भी लोग समंदर के रास्ते आ रहे हैं स्पेन के अंदर आप उनको तुरंत के तुरंत वापस नहीं भेजोगे। आपको बकायदा लीगल प्रोसेस देना होगा। बस अदालत की इसी फैसले ने इन घुसपैठियों के लिए खुला दरवाजा खोल दिया। स्थाई लोग यह कह रहे हैं कि लीडर्स नेशनल इमरजेंसी लगाओ। हम इन माइग्रेंट्स को हैंडल नहीं कर सकते हैं। हमारे पास रिसोर्सेज खत्म हो चुके हैं। दबाव 1000% बढ़ चुका है। लेकिन स्पेन की सरकार कोई स्ट्रांग एक्शन क्यों नहीं ले पा रही है? अब आप उसे समझिए क्योंकि वहां है कोलीजन गवर्नमेंट।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/jordan-air-defense-intercepts-iranian-missiles-as-us-saudi-forces-strike-iraq-militias" target="_blank">जॉर्डन ने हवाई रक्षा प्रणाली से ईरानी मिसाइलें गिराईं, अमेरिका और सऊदी अरब ने इराक में किए हमले</a></h3><h2>48 घंटे के अंदर 8000 से ज्यादा माइग्रेंट्स</h2><div>यूरोप में&nbsp; पहले भी देखा गया है मई 202 में 2021 में ऐसा हुआ था कि 48 घंटे के अंदर 8000 से ज्यादा माइग्रेंट्स पहुंच गए यानी कि पहले भी इस तरीके से ओवरवेल्म हो चुका है। वहां का जो पूरा सिस्टम है, जो अपरेटस है वो बहुत ज्यादा ओवरवेल्म हो चुका है। लॉ एंड ऑर्डर की सिचुएशन बन चुकी है। जो हुवा जीसस हैं उन्होंने भी ये इस बार भी अपील करी है कि फोर्सेस को भेजा जाए। यानी कि एक सिक्योरिटी फोर्सेस को भेजकर एक आर्म्ड उनको मदद दी जाए ताकि कोई सुरक्षा को लेकर कोई स्थिति ना बने। अगर इस तरीके से मोरक्को के रास्ते लोग आते हैं तो दिक्कत हो सकती है। इस बीच स्पेन के जो प्राइम मिनिस्टर हैं पेड्रो सशेस उन्होंने भी एक्स पर एक पोस्ट किया है। उन्होंने बताया है कि जो गवर्नमेंट है स्पेन की वो पूरी तरीके से कमिटेड है में जो स्थिति बनी है उस पर एक इमीडिएट रिस्पांस देने के लिए। उन्होंने बताया है कि जितने भी जरूरी रिसोर्सेज हैं उन्हें मोबिलाइज कर दिया गया है। मुरक्को के साथ में भी बातचीत चल रही है। इंटरनेशनल अथॉरिटीज के साथ में बातचीत चल रही है और जैसी जरूरत पड़ेगी नॉर्मल को इस्टैब्लिश करने की उसके लिए कदम उठाए जाएंगे।&nbsp;</div><h2>स्पेन के पड़ोसी देशों की उड़ी नींद</h2><div>सोशलिस्ट पार्टी लेफ्ट और सेंटर लेफ्ट सब ने मिलकर यहां पर सरकार बना रखी है सबके अपने-अपने ओपिनियंस हैं। इसका खामियाजा भुगत रहे हैं वहां के नागरिक नेटिव्स। उधर पोलैंड जैसे देश का रवैया भी अलग है। पोलैंड साफ यह कहता है कि हम माइग्रेशन को अपने देश के खिलाफ हथियार नहीं बनने देंगे। बेलारूस बॉर्डर पर उसने इलेक्ट्रिफाइड सर्विलांस और आर्मी बिठा रखी है। कहा है कि ड्रामा यहां पर नहीं चल सकता। लेकिन स्पेन के इस कोहराम को देखकर यूरोप के जो बाकी देश हैं इनकी नींदें उड़ चुकी। इटली के प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने सीधा अल्टीमेटम दे दिया है स्पेन को। मेलोनी ने यह साफ कहा है ट्वीट करते हुए कि अगर स्पेन बॉर्डर संभालने में नाकामयाब रहा तो इटली यहां पर मुख दर्शक बनकर नहीं रहेगा। जरूरत पड़ी तो स्पेन के साथ जो एग्रीमेंट हुआ है एरिया की व्यवस्था को संभालने का उसे यह निलंबित भी कर सकते हैं। आखिर सेटा इतना अहम क्यों है उसे समझिए क्योंकि यह अफ्रीका और यूरोप के बीच का इकलौता लैंड बॉर्डर है। इस बार हजारों की संख्या में युवा और नाबालिक बॉर्डर के गेट को तोड़ते हुए स्पेन के अंदर घुस आए हैं। कुछ ने मोरको की तरफ से वाटर कैनन का सामना भी किया तो कुछ ने समंदर में लाशों के बीज तैर कर अपनी जान को जोखिम में डालकर बॉर्डर पार। रिपोर्ट्स जो कहती है उसके मुताबिक इस रूट पर दर्जनों लोगों की जान अब तक जा चुकी है। लेकिन इसके बावजूद भी यह स्पेन में घुस रहे हैं।&nbsp;</div><h2>स्पेन इन सब में मजबूर क्यों है?</h2><div>स्पेन की जो जन दर दुनिया में है वो सबसे कम है और हर साल 1 लाख ज्यादा लोग जो हैं वो यहां पर रिटायर हो रहे हैं। कृषि पर्यटन और निर्माण क्षेत्रों को जिंदा रखने के लिए स्पेन को हर साल लाखों विदेशी कामगारों की जरूरत पड़ती है। यहां के जो प्रधानमंत्री हैं इनकी जो सरकार है यह प्रवासियों को कानूनी दर्जा और वर्क परमिट देने की योजना पर काम कर रही है ताकि देश की जो अर्थव्यवस्था है यह ठप ना पड़े। एक तरफ अपनी इकॉनमी को बचाने के लिए स्पेन मजबूर है तो दूसरी तरफ बेकाबू होती हुई यह भीड़ और टूटती हुई सीमाएं। सवाल यह है कि क्या यूरोप अपनी नीतियों के चक्कर में खुद अपने ही विनाश का रास्ता खोल रहा है या फिर स्पेन का यह नर्क से स्वर्ग वाला खेल यूरोप के बाकी देशों को भी तबाह कर देगा।&nbsp;</div><h2>मेलोनी ने दी स्पेन को धमकी</h2><div>सेउटा संकट पर इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने स्पेन के साथ शेंगेन फ्री-ट्रैवेल (बिना वीजा यात्रा) को रोकने दी धमकी दे डाली। मेलोनी ने कहा कि सेउटा से आ रही तस्वीरें चौंकाने वाली हैं और एक बार फिर यह दिखाती हैं कि बेकाबू आप्रवासन यूरोप की सीमाओं के लिए एक ठोस खतरा है।&nbsp;</div><h2>भारत के लिए अलर्ट रहने की जरूरत</h2><div>भारत के संदर्भ में असम और पश्चिम बंगाल दोनों राज्य लंबे समय से अवैध घुसपैठ की समस्या से प्रभावित रहे हैं। स्पेन के इस घटनाक्रम से सीख लेते हुए भारत को इन राज्यों के लिए विशेष सतर्कता बरतने की आवश्यकता है। पश्चिम बंगाल और असम की बांग्लादेश से लगी अंतरराष्ट्रीय सीमा का एक बड़ा हिस्सा नदियों, दलदल और जंगलों से घिरा है। यहाँ भौतिक रूप से कंटीली बाड़ लगाना कठिन होता है, जिससे घुसपैठियों और मानव तस्करों को घुसपैठ का आसान अवसर मिल जाता है। उत्तर-पूर्व भारत को शेष भारत से जोड़ने वाला सिलीगुड़ी कॉरिडोर पश्चिम बंगाल के पास स्थित है। इस क्षेत्र के आसपास अनियंत्रित घुसपैठ भारत की अखंडता और सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बन सकती है। स्पेन का संकट यह संदेश देता है कि घुसपैठ केवल एक मानवीय या क्षेत्रीय मुद्दा नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर राष्ट्रीय संप्रभुता से जुड़ा विषय है। भारत को असम और बंगाल की सीमाओं पर स्मार्ट फेंसिंग, ड्रोन निगरानी, BSF का सशक्तिकरण और अवैध दस्तावेजों पर सख्त कार्रवाई के जरिए सीमा तंत्र को अभेद्य बनाने की आवश्यकता है।&nbsp;</div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 01 Aug 2026 13:42:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/why-did-thousands-of-muslims-forcibly-enter-spain</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[5 अगस्त को क्या बड़ा होने वाला है?  डोभाल की एंट्री, गेम सेट,  40 मिनट में कैसे पलट दिया पूरा गेम]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/what-major-event-is-set-to-unfold-on-august-5-doval-entry-game-set]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>5 अगस्त की तारीख से पहले देश के सुरक्षा और रणनीतिक चक्रव्यूह में एक बड़ी हलचल देखने को मिल रही है। दिल्ली में उच्चस्तरीय बैठकों का दौर लगातार जारी है। इस हलचल के दो बड़े मायने निकाले जा रहे हैं-पहला यह कि क्या सरकार किसी बहुत बड़े नीतिगत या रणनीतिक कदम की तैयारी में है? या फिर खुफिया इनपुट्स के आधार पर किसी बड़ी चुनौती को नाकाम करने के लिए यह आपातकालीन मीटिंग्स बुलाई जा रही हैं? इंटेलिजेंस एजेंसियों का अलर्ट और बैठकों की यह रफ्तार बता रही है कि आने वाले दिनों में कुछ बड़ा होने वाला है। इस रणनीतिक हलचल का सबसे बड़ा सबूत तब देखने को मिला, जब संसद भवन के अंदर टॉप लीडरशिप की यह महा-बैठक शुरू हुई। दरअसल, जिस वक्त संसद के भीतर बवाल अपने चरम पर था। विपक्ष के सांसद वेल तक पहुँच चुके थे, ज़ोरदार नारेबाजी हो रही थी और स्पीकर बार-बार शांति की अपील कर रहे थे। एंटी-पेपर लीक बिल पर किसी भी तरह चर्चा आगे बढ़ाने की कोशिश हो रही थी और पूरा देश अपने टीवी स्क्रीन पर इस राजनीतिक शोर-शराबे को टकटकी लगाए देख रहा था। लेकिन ठीक उसी पल कैमरे के फ़्रेम में एक ऐसी एंट्री होती है, जिसने लुटियंस दिल्ली के बड़े-बड़े सियासी पंडितों से लेकर विदेशी खुफिया एजेंसियों के कान खड़े कर दिए! देश के सबसे बड़े 'जेम्स बॉन्ड'—यानी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल बिल्कुल खामोशी से संसद भवन में दाखिल होते हैं। बाहर से देखने पर यह बेहद सामान्य-सी रूटीन विजिट लग रही थी, जिसे सरकारी सूत्रों ने भी सामान्य दौरा ही बताया। लेकिन... जो लोग अजीत डोभाल की कार्यशैली और उनके ट्रैक रिकॉर्ड को जानते हैं, उन्हें यह समझने में एक सेकंड भी नहीं लगा कि इस हंगामे के शोर के पीछे किसी बहुत बड़े, बेहद सीक्रेट कोवर्ट ऑपरेशन की फ़ाइल पर मोहर लग रही है!असल में संसद के वेल में हो रहा हंगामा सिर्फ एक राजनीतिक ड्रामा था। जबकि असल एक्शन संसद भवन के एक बंद कमरे के अंदर चल रहा था। यह कमरा देश के गृह मंत्री अमित शाह का था। जंतर-मंतर पर हुआ हालिया विरोध प्रदर्शन और उसके अंदर भड़की सोची समझी हिंसा के बाद में अमित शाह ने एक मैराथन सिक्योरिटी मीटिंग बुलाई थी। करीब 40 मिनट तक चली इस हाई लेवल मीटिंग के अंदर इंटेलिजेंस ब्यूरो यानी कि आईबी के चीफ, केंद्रीय गृह सचिव और तमाम पैरामिलिट्री फोर्सेस के डायरेक्टर जनरल मौजूद थे। इसके तुरंत बाद अमित शाह और अजीत डोभाल की एक एकांत मुलाकात भी हुई।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/supreme-court-directs-centre-for-russia-ukraine-war" target="_blank">Supreme Court का निर्देश: Russia Ukraine War पीड़ितों की सहायता के लिए नोडल अधिकारी नियुक्त हो</a></h3><h2>पहली बार आईबी चीफ को दिल्ली की कमान</h2><div>द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, इस बैठक में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, विदेश मंत्री एस. जयशंकर, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल शामिल हुए हैं। इनके अलावा बैठक में उपस्थित रहने वाले अन्य मंत्रियों में स्वास्थ्य मंत्री जे.पी. नड्डा, पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी और वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल शामिल हैं। यह बैठक किस विषय पर हो रही है, यह अभी स्पष्ट नहीं है। नीट (NEET) के प्रश्नपत्र लीक के विरोध में छात्रों के प्रदर्शन से पूरा देश दहल उठा था। जनमत के भारी दबाव के चलते शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा। इस माहौल में सरकार पर दबाव बनाए रखने के लिए विपक्ष भी पूरी तरह मताबिभूत है। आंदोलनकारी छात्रों पर पुलिसिया बर्बरता और दमन का आरोप लगाते हुए विरोधी सांसद लगातार विरोध-प्रदर्शन कर रहे हैं। इस पूरे घटनाक्रम में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से माफी मांगने की मांग भी उठी है। इस पूरे घटनाक्रम से पहले अगर थोड़ा पीछे जाएं तो 21 जुलाई को कमिश्नर ऑफ पुलिस दिल्ली चेंज होते हैं और पहली बार दिल्ली की पुलिस की हिस्ट्री में एक आईबी का ऑफिसर पुलिस कमिश्नर बनता है। अचानक दिल्ली में एक आवश्यकता पड़ी ऐसे चीफ की जिसके पास में इंटेलिजेंस का बैकअप है।&nbsp; दिल्ली हमेशा से एक टारगेट रही है आतंकवाद का। क्योंकि जिसने दिल्ली में एक सनसनी पैदा कर दी उसने पूरे भारत को हिला दिया और पूरे भारत को हिला दिया।&nbsp;</div><h2>अचानक संसद क्यों पहुंचे NSA अजीत डोभाल</h2><div>डोभाल का वहां होना कोई इत्तेफाक नहीं था। भारत का एजुकेशन सिस्टम और उसके अंदर होने वाली सेंधमारी अब सीधे तौर पर इंटरनल सिक्योरिटी का मामला बन चुकी है। विदेशी ताकतें और उनके लोकल प्यादे अच्छी तरीके से जानते हैं कि अगर भारत के युवाओं को भड़काना है तो उन्हें उनके भविष्य को लेकर के डरा दिया जाए। पेपर लीक माफिया सिर्फ पैसे नहीं कमा रहा है बल्कि वो अनजाने में ही देश के भीतर फ्रस्ट्रेशन और गुस्से का एक ऐसा बारूद तैयार कर रहा है जिससे कोई भी विदेशी टूलकिट एक माचिस की तिल्ली से उड़ा सकती है। दोस्तों युवाओं के अंदर असंतोष फैला करके उन्हें सड़कों पर उतारने की साजिशों को रोकने के लिए यह एंटी पेपर लीक बिल एक ब्रह्मास्त्र की तरह लाया गया है।</div><h2>सुप्रीम कोर्ट से भी नहीं मिली उपद्रवियों को राहत</h2><div>सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि विरोध प्रदर्शन के नाम पर पब्लिक प्रॉपर्टी को जलाना, हिंसा करना और कानून तोड़ना किसी भी हाल के अंदर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। दंगाई चाहे किसी भी विचारधारा का हो उसे रियायत नहीं मिलेगी। कोर्ट के इस स्पष्ट आदेश के बाद में सीजीपी के वो नेता जो मंच से सीना ठोक के कह रहे थे कि हम एक-एक प्रदर्शनकारी के ऊपर से केस वापस करवा लेंगे वो अचानक से गायब हो चुके हैं। अब हालात यह हैं कि जोश में आकर के गालियां देने वाले युवा स्टेशनों के चक्कर काट रहे हैं, रो रहे हैं, माफी मांग रहे हैं और उनका पूरा करियर दांव पर लग चुका है। उन्हें समझ में आ गया है कि उनके राजनीतिक आकाओं ने सिर्फ अपने एजेंडे के लिए उनका इस्तेमाल किया और अब उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया गया है।&nbsp;</div><h2>खुफिया एजेंसियों के हाथ ऐसा कौन सा डिजिटल सबूत लग गया है?</h2><div>मोदी सरकार और अजीत डोभाल का गेम प्लान सिर्फ सड़क पर पत्थर फेंकने वाले मोहरों तक सीमित नहीं है। असली स्ट्राइक उन लोगों पर हो रही है जो एयर कंडीशन कमरों के अंदर बैठकर के पूरी हिंसा की स्क्रिप्ट लिख रहे थे। इसी कड़ी के अंदर दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल यानी कि आईएफएसओ ने एक ऐसा कदम उठाया है जिसने डिजिटल दुनिया के अंदर तहलका मचा दिया है। Facebook, एक्स, YouTube और Instagram जैसी दुनिया की सबसे बड़ी सोशल मीडिया कंपनियों को दिल्ली पुलिस ने सीधा और कड़ा अल्टीमेटम भेजा है। रिपोर्ट्स और इंटेलिजेंस इनपुट इशारा कर रहे हैं कि जंतरमंतर की हिंसा और देश भर के अंदर फैलाए जा रहे फैक्ट नैरेटिव के पीछे एक बहुत बड़ा इंटरनेशनल मनी ट्रेल है। करोड़ों रुपए की विदेशी फंडिंग के जरिए एक खास इकोसिस्टम इंटरनेट के ऊपर भ्रामक वीडियोस और हेट स्पीच की बाढ़ ला रहा है।&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 31 Jul 2026 14:37:30 +0530</pubDate>
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      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[क्या CJP प्रदर्शन के उपद्रवियों की FIR सरकार वापस ले सकती है? कानून का चौंकाने वाला जवाब!]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/can-the-government-withdraw-firs-against-cjp-protest-agitators-the-law-surprising-answer]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>सड़कों पर ऐसा हंगामा मचा कि लगा देश की राजधानी दिल्ली नहीं, बल्कि किसी बॉलीवुड की फुल-ऑन एक्शन फिल्म का सेट बन गई हो! मामला नीट पेपर लीक का था और मैदान में उतरी थी अपनी कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी)। मांगने तो आए थे शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा और अपनी तमाम शर्तें पूरी कराने की जिद्द, लेकिन सोमवार 20 जुलाई को कहानी में ऐसा ट्विस्ट आया कि सीधे सुरक्षा की धज्जियां उड़ गईं। प्रशासन ने सीधे-सादे तरीके से जंतर-मंतर पर धरना देने की परमिशन क्या दी, सीजेपी के सुरमों को लगा कि पूरी दिल्ली ही उनकी है! जैसे ही संसद का मानसून सत्र शुरू होने वाला था, इन लोगों ने 'बैरिकेड तोड़ो, आगे बढ़ो' का नारा पकड़ लिया और हाई-सिक्योरिटी वाले नो-एंट्री इलाके में संसद घेराव करने के लिए कूच कर दिया। फिर क्या था? शांतिपूर्ण प्रदर्शन का चोला उतरा और सड़कों पर पत्थरबाजी, खींचतान और सुरक्षाकर्मियों के साथ जबरदस्त एक्शन मोड ऑन हो गया।&nbsp; दिन-दहाड़े राजधानी की सड़कों पर ऐसा गदर काटा गया कि सरकार से लेकर आम जनता तक, सब थम-से गए। सीजेपी के नेता अपनी जिद पर अड़े रहे, उपद्रवी सड़कें जाम करके सरकार की नाक में दम करते रहे और आखिर में केंद्र सरकार को घुटने टेककर उनकी सारी शर्तें मानने का वादा करना पड़ा। जंतर-मंतर के शांत कोने से शुरू होकर संसद के दरवाजे तक पहुँचने वाले इस 'हाई-वोल्टेज पॉलिटिकल थ्रिलर' ने पूरे देश को सन्न करके रख दिया!</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/become-an-influencer-you-are-doing-well-abhijit-dipke-jibe-at-pm-modi" target="_blank">इन्फ्लुएंसर बन जाइए, आप अच्छा कर रहे हैं, अभिजीत दिपके का PM मोदी पर तंज</a></h3><h2>बिहार और असम की सरकारेंप्रदर्शनकारियों के खिलाफ सभी FIR वापस लेने का दिया भरोसा&nbsp;</h2><div>नोटिफिकेशन में कहा गया है कि हिरासत में लिए गए या गिरफ्तार लोगों को रिहा कर दिया जाएगा और 26 जुलाई को शाम 6 बजे से पहले विरोध प्रदर्शन में शामिल लोगों के खिलाफ कोई और सख्त कार्रवाई नहीं की जाएगी।&nbsp; बिहार सरकार के गृह विभाग द्वारा जारी नोटिफिकेशन में कहा गया है, पूरे राज्य में 26.07.2026 को शाम 6 बजे से पहले विरोध प्रदर्शन में शामिल किसी भी व्यक्ति के खिलाफ सरकार द्वारा कोई दंडात्मक या प्रतिशोधात्मक कानूनी कार्रवाई नहीं की जाएगी। साथ ही, उक्त विरोध प्रदर्शनों में भाग लेने के कारण 26.07.2026 को शाम 6 बजे से पहले लोगों के खिलाफ दर्ज सभी मौजूदा FIR, आपराधिक शिकायतों या कारण बताओ नोटिस को वापस लेने की कानूनी प्रक्रिया तुरंत शुरू की जाएगी। इसके अलावा, 26.07.2026 को शाम 6 बजे से पहले दर्ज मामलों के सिलसिले में गिरफ्तार या हिरासत में लिए गए सभी लोगों को तुरंत रिहा किया जाएगा। आखिर में, स्पेशल सेक्रेटरी क्षत्रनील सिंह के हस्ताक्षर वाले नोटिफिकेशन में यह भी कहा गया है कि 26.07.2026 को शाम 6 बजे से पहले दर्ज इन सभी मामलों में, भविष्य में भी ऐसे लोगों के खिलाफ सीधे या परोक्ष रूप से कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी। बिहार सरकार ने कहा कि CJP प्रदर्शनकारियों के खिलाफ FIR वापस लेने का उसका कदम, परीक्षा और उच्च शिक्षा के क्षेत्रों में जवाबदेही और सुधार की मांग को लेकर हाल ही में हुए विरोध-प्रदर्शनों के जवाब में उठाया गया था। गौरतलब है कि बिहार पुलिस ने विरोध-प्रदर्शन के दौरान हुई हिंसा—जिसमें पत्थरबाजी और आगजनी शामिल थी—के सिलसिले में लगभग 694 लोगों को हिरासत में लिया था। पुलिस के अनुसार, CJP प्रदर्शनकारियों की वजह से 91 पुलिसकर्मी और 13 आम नागरिक घायल हुए, जबकि 15 सरकारी वाहनों को नुकसान पहुंचा। विरोध-प्रदर्शन के दौरान हुई हिंसा में एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी की एक आंख चली गई। बिहार में विरोध प्रदर्शन ऑल-इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) और रिवोल्यूशनरी यूथ एसोसिएशन (RYA) ने नई दिल्ली में CJP के विरोध प्रदर्शन के समर्थन में आयोजित किए थे। 28 जुलाई को जारी एक अलग प्रेस विज्ञप्ति में, असम के गृह और राजनीतिक विभाग ने घोषणा की कि वह CJP प्रदर्शनकारियों के खिलाफ सभी मामले और अन्य कानूनी कार्यवाही वापस ले लेगा। विभाग ने बताया कि कुल पांच मामले दर्ज किए गए थे और 13 प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार किया गया था। जंतर-मंतर पर 36 दिन तक चले आंदोलन को खत्म करने के लिए हुई बातचीत के दौरान, BJP के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने CJP से जो वादा किया था, उसी के तहत BJP सरकारें FIR वापस लेने का भरोसा दे रही हैं। बिहार और असम सरकारों की ओर से ये नोटिफ़िकेशन तब जारी किए गए, जब CJP के राष्ट्रीय प्रवक्ता आशुतोष रंका ने दावा किया कि पुलिस कार्रवाई न करने के समझौते का “उल्लंघन” किया जा रहा है। उन्होंने प्रदर्शनकारियों के ख़िलाफ़ दर्ज FIR को तुरंत वापस लेने की मांग की और चेतावनी दी कि ऐसा न होने पर “हम फिर से विरोध-प्रदर्शन करने को मजबूर होंगे।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/parliament-street-police-directed-to-issue-a-dd-number-upon-receiving-a-complaint" target="_blank">Delhi High Court का बड़ा फैसला, Parliament Street Police को शिकायत पर DD Number देने का दिया निर्देश</a></h3><h2>क्या CJP और उसके प्रदर्शनकारी कानून से ऊपर हैं?</h2><div>CJP नेताओं की एक मांग यह थी कि सरकार किसी भी प्रदर्शनकारी के खिलाफ कोई सख्त कार्रवाई न करे। उन लोगों के खिलाफ भी नहीं जिन्होंने विरोध-प्रदर्शन के दौरान पुलिसकर्मियों पर हमला किया, हंगामा किया और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाया और ऐसे प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पहले से दर्ज FIR वापस ले ले। साफ है कि पार्टी उन उपद्रवियों को बचाने की कोशिश कर रही थी जिन्होंने हिंसा के जरिए सरकार पर दबाव बनाने में उसकी मदद की थी, जिसकी वजह से सुरक्षाकर्मियों को बल प्रयोग करना पड़ा। जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के विरोध-प्रदर्शन में और उसके आसपास मौजूद लोगों की दिल्ली पुलिस द्वारा की गई जांच में पाया गया कि भीड़ में शामिल बड़ी संख्या में लोगों का पहले से आपराधिक रिकॉर्ड रहा है। हैरानी की बात है और देश के आम, कानून का पालन करने वाले नागरिकों के लिए निराशाजनक भी, कि केंद्र सरकार ने इस मांग को भी मान लिया। सरकार के इस फैसले से देश के आम नागरिकों के मन में कई सवाल उठते हैं, जैसे: क्या देश की चुनी हुई सरकार को उपद्रवियों के सामने इस कदर ब्लैकमेल किया जा सकता है? क्या सड़कों को बंधक बनाने वाले, सरकारी संपत्ति को फूंकने वाले और समाज के ताने-बाने को तार-तार करने वाले हुड़दंगियों को यूं ही साफ़-साफ़ बाइज्जत बरी होने दिया जाएगा? और अगर किताबी-कानूनी भाषा में बात करें, तो क्या देश की कार्यपालिका के पास इतनी ताकत है कि वो एक बार शुरू हो चुकी कानूनी प्रक्रिया का गला घोंट दे? क्या सरकार के पास वाकई यह कानूनी अधिकार या वीटो पावर है कि वो उन असामाजिक तत्वों के खिलाफ दर्ज FIR वापस ले ले, जिन्होंने पूरे देश की राजधानी को ब्लैकमेल करके रख दिया था? आइए, इन सवालों के कानूनी जवाब तलाशने के लिए कानून की किताबों के पन्ने पलटते हैं!</div><h2>अपराध केवल व्यक्ति नहीं राज्य के खिलाफ भी माना जाता है</h2><div>आपराधिक कानून किसी अपराध को सिर्फ़ एक व्यक्ति के खिलाफ़ नहीं, बल्कि पूरे समाज के खिलाफ़ गलत काम मानता है। यही वजह है कि जब भी कोई अपराध होता है, तो राज्य अपराधी पर मुकदमा चलाने के लिए कदम उठाता है। यह नियम एक कानूनी सुरक्षा के तौर पर काम करता है, जिसका मकसद कमज़ोर पीड़ितों के अधिकारों की रक्षा करना और समाज में शांति और व्यवस्था बनाए रखना है। इस कानूनी सुरक्षा का ही एक हिस्सा यह नियम भी है कि एक बार जब कानूनी प्रक्रिया शुरू हो जाती है, तो इसे अदालत की मंज़ूरी के बिना रोका नहीं जा सकता। कानूनी प्रक्रिया शुरू करने का एक तरीका है अपराध के बारे में FIR दर्ज कराना। एक बार जब किसी अपराध के लिए FIR दर्ज हो जाती है, तो इसे अदालत की मंज़ूरी के बिना रद्द या वापस नहीं लिया जा सकता। इस नियम के पीछे मकसद यह है कि पीड़ित पर किसी प्रभावशाली या ताकतवर अपराधी के खिलाफ़ कानूनी कार्रवाई न करने का दबाव न डाला जा सके। मौजूदा हालात में भले ही सरकार ने हिंसक प्रदर्शनकारियों के खिलाफ़ दर्ज सभी FIR वापस लेने का वादा किया हो, लेकिन वह सीधे ऐसा नहीं कर सकती। हालाँकि, कुछ ऐसे कानूनी प्रावधान हैं जिनके तहत FIR वापस ली जा सकती है या कानूनी कार्यवाही रोकी जा सकती है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/mri/is-a-movement-like-the-cjp-one-brewing-in-pakistan-why-is-general-asim-munir-wary-of-gen-z" target="_blank">Pakistan में होने वाला है CJP जैसा आंदोलन? क्यों 'Gen Z' से घबराए हुए हैं जनरल असीम मुनीर!</a></h3><h2>कोर्ट के बाहर समझौता</h2><div>भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 में एक कानूनी प्रावधान है जो आपराधिक मुकदमे में शामिल पक्षों को कोर्ट के बाहर या पूरे मुकदमे की प्रक्रिया से गुज़रे बिना मामले को 'सुलझाने' की इजाज़त देता है। हालाँकि, यह सुविधा केवल कुछ छोटे अपराधों के लिए ही मिलती है, जिनका असर आमतौर पर निजी हितों पर पड़ता है और जिन्हें BNSS के तहत 'कंपाउंडेबल' (समझौता-योग्य) अपराधों की श्रेणी में रखा गया है। कंपाउंडेबल अपराधों की सूची BNSS की धारा 359 में दी गई है और वे इसी धारा के तहत आते हैं। कंपाउंडेबल अपराधों के कुछ उदाहरण हैं - मामूली चोट पहुँचाना, धोखाधड़ी, घर में बिना इजाज़त घुसना (house-trespass), गलत तरीके से रोकना (wrongful restraint) के कुछ मामले और चोरी। रेप, हत्या, दंगा और डकैती जैसे गंभीर अपराध कंपाउंडेबल नहीं होते हैं। जहाँ कुछ कंपाउंडेबल अपराधों में कोर्ट की इजाज़त के बिना समझौता किया जा सकता है, वहीं कुछ मामलों में कोर्ट की मंज़ूरी ज़रूरी होती है। सरकार इस प्रावधान का इस्तेमाल नहीं कर पाएगी क्योंकि CJP विरोध-प्रदर्शनों के दौरान हुई हिंसा की घटनाएँ - जैसे सुरक्षाकर्मियों पर हमला, पत्थरबाज़ी, और पुलिस की गाड़ियों व सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाना - निश्चित रूप से कंपाउंडेबल अपराधों की श्रेणी में नहीं आती हैं।</div><h2>FIR रद्द करना या वापस लेना</h2><div>अच्छी बात यह है कि एक बार FIR दर्ज होने के बाद, उसे या मामले को वापस लेना एग्जीक्यूटिव (कार्यपालिका) के अधिकार क्षेत्र से बाहर होता है। FIR दर्ज होने के बाद, मामला न्यायपालिका के हाथ में आ जाता है। एग्जीक्यूटिव संबंधित पुलिस स्टेशन को FIR वापस लेने का आदेश नहीं दे सकता और न ही संबंधित कोर्ट या मजिस्ट्रेट को FIR के आधार पर आगे की कार्रवाई न करने का निर्देश दे सकता है। यह व्यवस्था पीड़ित और यहां तक ​​कि कमजोर राज्य को भी ताकत के दम पर किए जाने वाले दबाव या जबरदस्ती के आगे झुकने से बचाती है। इससे यह सवाल उठता है कि अगर कानून एग्जीक्यूटिव (कार्यपालिका) को FIR रद्द करने या वापस लेने की ताकत नहीं देता है, तो सरकार ने हिंसक प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज सभी FIR वापस लेने का वादा क्यों किया? खैर, एक और तरीका है जिससे आरोपी को बरी किया जा सकता है या केस बंद किया जा सकता है, और वह है पुलिस की क्लोजर रिपोर्ट।</div><h2>क्लोजर रिपोर्ट</h2><div>जांच पूरी होने के बाद पुलिस BNSS की धारा 193 के तहत क्लोजर रिपोर्ट या फाइनल रिपोर्ट दाखिल करती है। यह रिपोर्ट उन मामलों में दाखिल की जाती है जिनमें पुलिस को FIR में बताए गए अपराध के होने का कोई शुरुआती सबूत नहीं मिलता, आरोपी का पता नहीं चल पाता, या शिकायत झूठी पाई जाती है। सिर्फ़ इतना ही नहीं। क्लोज़र रिपोर्ट फ़ाइल करने से ही केस बंद नहीं हो जाता; यह इस बात पर निर्भर करता है कि कोर्ट क्लोज़र रिपोर्ट को स्वीकार करता है या आगे जांच का आदेश देता है। अगर कोर्ट पुलिस की जांच से संतुष्ट है, तो वह क्लोज़र रिपोर्ट स्वीकार कर सकता है और केस बंद कर सकता है। ऐसे में FIR रिकॉर्ड पर बनी रहती है, लेकिन केस बंद हो जाता है। लेकिन अगर कोर्ट पुलिस की जांच के नतीजों से संतुष्ट नहीं है, तो वह आगे जांच का आदेश दे सकता है।&nbsp;</div><div>सुप्रीम कोर्ट एक स्वतंत्र जांच पर विचार कर रहा है</div><div>इस बीच, सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए साफ कहा है कि सीजेपी विरोध प्रदर्शनों के दौरान जिन लोगों ने कानून अपने हाथ में लिया, उन्हें कानून का सामना करना ही होगा। कोर्ट ने एक अंतरिम आदेश जारी कर अधिकारियों को पहले से दर्ज FIR की जांच जारी रखने की अनुमति दे दी है। भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि पुलिस और प्रदर्शनकारियों, दोनों के खिलाफ लगे आरोपों की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए। हालांकि, शीर्ष अदालत ने उन राज्यों को निर्देश दिया जहां ऐसे विरोध प्रदर्शन हुए थे कि वे बिना किसी आपराधिक रिकॉर्ड वाले प्रदर्शनकारियों को रिहा कर दें। सर्वोच्च न्यायालय का यह रुख CJP नेतृत्व को पसंद नहीं आया, जो ऐसा व्यवहार करते हैं मानो वे और उनके गुंडे कानून से ऊपर हों। CJP उन गुंडों के लिए छूट चाहता था जिन्होंने विरोध प्रदर्शनों के दौरान भारी उपद्रव मचाया था और सरकार के प्रभाव का इस्तेमाल करके उन्हें कानून की पकड़ से बचाना चाहता था। यह कहने की जरूरत नहीं है कि गुंडों को उनके गैर-कानूनी कामों के लिए बख्श देने की CJP की मांग का न तो कोई कानूनी आधार है और न ही कोई नैतिक आधार।</div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 30 Jul 2026 14:14:26 +0530</pubDate>
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      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Pakistan में होने वाला है CJP जैसा आंदोलन? क्यों 'Gen Z' से घबराए हुए हैं जनरल असीम मुनीर!]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/is-a-movement-like-the-cjp-one-brewing-in-pakistan-why-is-general-asim-munir-wary-of-gen-z]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>कॉकरोच जनता पार्टी के नेतृत्व में हुए Gen Z के प्रदर्शनों के आगे आखिरकार सरकार को झुकना पड़ा है। शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे और शिक्षा सुधारों के वादे के साथ ही यह जन-आंदोलन तो थम गया, लेकिन भारत भी दक्षिण एशिया के उन देशों की फेहरिस्त में शामिल हो गया है जहाँ छात्रों और युवाओं के आंदोलन ने सियासी कुर्सी को हिला कर रख दिया। साल 2022 से 2025 के बीच छात्रों के आंदोलन से बांग्लादेश और नेपाल में में सरकारें गिरी, इंडोनेशिया में मंत्रियों की वीआईपी सुविधाएं छीनी गई, कई रिफॉर्म हुए। अब भारत में कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन के बाद शिक्षा मंत्री का इस्तीफा भी हो गया। लेकिन छात्रों के इन आंदोलनों से अछूता रहा । हमारा पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान, लेकिन भला क्यों? आखिर श्रीलंका से लेकर भारत तक दक्षिण एशिया को मथ देने वाली यह 'युवा क्रांति' रेडक्लिफ रेखा के उस पार जाकर क्यों थम जाती है? क्यों पाकिस्तान में छात्र आंदोलन उस तरह इतिहास नहीं बदल पा रहे हैं जैसे उसके पड़ोसियों में हुआ? आइए समझते हैं इस खामोशी की असली वजह।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/having-lost-faith-in-the-us-why-did-kuwait-after-being-trounced-by-iran-rush-to-pakistan" target="_blank">अमेरिका से उठा भरोसा, ईरान से पिटने वाला कुवैत क्यों दौड़ा पाकिस्तान?</a></h3><h2>इतिहास पर गौर करना जरूरी</h2><div>7 जनवरी 1953 में करांची में छात्रों ने अपनी मांगों को लेकर बड़ा प्रदर्शन आयोजित किया था। पाकिस्तान को बने अभी तीन साल ही गुजरे थे। ये पाकिस्तान का पहला बड़ा छात्रों का प्रदर्शन था। इसलिए सरकार ने इस पर अलग से नजर बनाई हुई थी। छात्रों की मांगे बहुत साधारण सी थी। शिक्षा का बजट बढ़ाया जाए, यूनिवर्सिटी की फीस कम की जाए और छात्रों को कैंपस में बेहतर सुविधाएं दी जाए। इन प्रदर्शन को पाकिस्तान का उस वक्त का वामपंथी डेमोक्रेटिक स्टूडेंट फेडरेशन (डीएसएफ) लीड कर रहा था। चूंकि पाकिस्तान का पहला इतना बड़ा छात्रों का प्रदर्शन था तो भारी संख्या में पुलिस तैनाती हुई। जिस बात की सबसे ज्यादा आशंका थी वही हो गया। प्रदर्शन के दौरान हिंसा हुई। पुलिस की गोली चली और करीब सात छात्रों की जान चली गई। इसलिए हर 7 जनवरी को दिन को स्टूडेंट्स मार्टियर डे के रूप में न&nbsp; किया जाने लगा। इस आंदोलन ने डीएसएफ को सरकार की नजर में ला दिया था। वो कोल्ड वॉर का दौर था और पाकिस्तान अमेरिका के करीब जा रहा था। वामपंथी विचारधारा के प्रति सरकार बेहद सख्त&nbsp; सरकार का आरोप था कि डीएसएफ के कई नेताओं के शब्द कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ पाकिस्तान से हैं औऱ संगठन वामपंथी राजनीति पाकिस्तान में फैला रहा है। इसलिए 1954 में सरकार ने डीएसएफ पर प्रतिबंध लगा दिया। डीएसएफ पर प्रतिबंध के बाद उसके कार्यकर्ताओं ने हार नहीं मानी और 1956 में नेशनल स्टूडेंट्स फेडरेशन (एनएसएफ) की स्थापना की।&nbsp;</div><div>1968 में अयूब खान के दौर में पाकिस्तान में सरकार के खिलाफ प्रदर्शन शुरू हुए तो उनमें सबसे आगे नेशनल स्टूडेंट्स फेडरेशन था। प्रदर्शन की वजह से एनएसएफ के कई छात्र जेल भी गए। लेकिन इन प्रदर्शनों की वजह से जनरल अयूब खान की सरकार चली गई। इसलिए बाद में जाकर जब जिया उल हक की सरकार आई तो उन्होंने कोई रिस्क ही नहीं लिया। पहले&nbsp; तो एनएसएफ को बैन किया। इसके अलावा पूरे पाकिस्तान में छात्र राजनीति पर बट्टा लगा दिया गया। यूनिवर्सिटी और कॉलेजों में स्टूडेंट यूनियन पर बैन लग गया। ये बैन आज तक लगा हुआ है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/people-of-pok-enemies-of-pakistan-like-india-khawaja-asif-statement-on-killing-of-14-civilians" target="_blank">PoK के लोग भारत की तरह पाकिस्तान के दुश्मन, 14 नागरिकों की हत्या पर ख्वाजा आसिफ का शर्मनाक बयान</a></h3><h2>पाकिस्तान की कमज़ोर छात्र राजनीति</h2><div>दक्षिण एशिया के ज़्यादातर देशों के उलट, पाकिस्तान में छात्र राजनीति की कोई मज़बूत परंपरा नहीं है। यह भारत और बांग्लादेश जैसे देशों से बिल्कुल अलग है, जहाँ बड़ी राजनीतिक पार्टियाँ अपने असरदार छात्र और युवा संगठन बनाए रखती हैं। ये संगठन राजनीतिक गतिविधियों को संगठित और सक्रिय करने का काम करते हैं और हाल के युवा-नेतृत्व वाले विरोध प्रदर्शनों में इन्होंने अहम भूमिका निभाई है। माइकल कुगेलमैन के अनुसार, इसकी जड़ें काफी हद तक जनरल ज़िया-उल-हक के सैन्य शासन की विरासत से जुड़ी हैं, जिसने छात्र राजनीति पर रोक लगा दी थी। उन्होंने एक्स पर लिखा जनरल ज़िया ने 1980 के दशक में छात्र संघों पर प्रतिबंध लगा दिया था और ज़्यादातर मामलों में उन्हें फिर से बहाल नहीं किया गया है। पाकिस्तान में युवाओं की बड़ी आबादी और एक्टिविज़्म में छात्रों/युवाओं की अहम भूमिका को देखते हुए, उस प्रतिबंध के असर को नज़रअंदाज़ नहीं किया जाना चाहिए। ध्यान देने वाली बात है कि इस प्रतिबंध से पहले पाकिस्तान में छात्र राजनीति खूब फल-फूल रही थी। 1968-69 के बड़े जन-आंदोलन में छात्र समूह सबसे आगे थे; इस आंदोलन के कारण राष्ट्रपति अयूब खान को महीनों तक चले देशव्यापी विरोध-प्रदर्शनों के बाद इस्तीफ़ा देना पड़ा था। हालाँकि, ज़िया के शासनकाल में छात्र यूनियनों को दबाने की कार्रवाई एक अहम मोड़ साबित हुई, जिससे राजनीतिक लामबंदी के केंद्र के तौर पर कैंपस की भूमिका कमज़ोर पड़ गई। तब से, पाकिस्तान में युवाओं के नेतृत्व वाले बहुत कम देशव्यापी आंदोलन हुए हैं। एक उल्लेखनीय अपवाद 'स्टूडेंट्स सॉलिडैरिटी मार्च' था, जो 2018 से 2022 के बीच हर साल आयोजित किया गया। इसमें छात्र यूनियनों को बहाल करने और छात्रों को ज़्यादा अधिकार देने की मांग की गई थी। कार्यकर्ताओं की बार-बार की मांगों के बावजूद, छात्र यूनियनों पर प्रतिबंध ज़्यादातर बना हुआ है। नतीजतन, पाकिस्तान में उस तरह के संगठित कैंपस नेटवर्क का अभाव है, जिन्होंने दक्षिण एशिया के अन्य हिस्सों में युवा आंदोलनों को मज़बूती दी है।&nbsp;</div><h2>पाकिस्तान में बिखरे हुए विरोध आंदोलन</h2><div>पाकिस्तान की सत्ता को चुनौती देने वाले विरोध आंदोलनों की कोई कमी नहीं है। बलूचिस्तान में, कार्यकर्ताओं ने ज़्यादा प्रांतीय स्वायत्तता, ज़बरदस्ती लोगों को गायब करने की प्रथा को खत्म करने और प्रांत की विशाल खनिज संपदा में उचित हिस्सेदारी की मांग को लेकर लगातार प्रदर्शन किए हैं, हालांकि उनके अभियान अक्सर लंबे समय से चल रहे हिंसक बलूच विद्रोह की वजह से दब जाते हैं। इसी तरह, पाकिस्तान के कब्ज़े वाले कश्मीर में 'जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी' के नेतृत्व में अशांति की लहर देखी गई है। इस कमेटी ने बिजली की बढ़ती कीमतों से लेकर शरणार्थियों के लिए विधानसभा में 12 सीटें आरक्षित करने जैसे मुद्दों पर विरोध प्रदर्शन आयोजित किए हैं। हालांकि, अहम फ़र्क यह है कि ये आंदोलन ज़्यादातर अपने-अपने इलाकों और मुद्दों तक ही सीमित रहे हैं। पड़ोसी दक्षिण एशियाई देशों में युवाओं के नेतृत्व में हुए आंदोलनों के उलट, ये आंदोलन एक ऐसे देशव्यापी आंदोलन में नहीं बदल पाए हैं जो इस्लामाबाद को चुनौती दे सके। पाकिस्तान के कई युवा भी इसी बात से सहमत हैं। बीबीसी उर्दू से बात करते हुए, एक युवा ने कहा कि भारत में CJP के नेतृत्व में हुए विरोध प्रदर्शनों से सबसे बड़ी सीख यह मिली कि प्रदर्शनकारी एक साझा मकसद के लिए एकजुट हो सकते हैं। पाकिस्तान में छात्रों, कंटेंट क्रिएटर्स और यहां तक ​​कि अखबारों के संपादकीय लेखों ने भी CJP के नेतृत्व वाले Gen Z आंदोलन की तारीफ़ की है, जिसके कारण शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफ़ा देना पड़ा। फिर भी, युवाओं को एकजुट करने में सक्षम मज़बूत संगठनों की कमी और पाकिस्तान के मौजूदा विरोध आंदोलनों के एक संयुक्त मोर्चे के रूप में एकजुट होने में असमर्थ या अनिच्छुक होने के कारण, ऐसा नहीं लगता कि देश की Gen Z उस तरह के युवा-नेतृत्व वाले विद्रोहों को दोहरा पाएगी जिन्होंने बाकी दक्षिण एशिया को हिलाकर रख दिया है।</div><h2>साउथ एशिया में हुए सभी आंदोलन की जो वजह अलग-अलग</h2><div>हाल ही में साउथ एशिया में हुए सभी प्रदर्शन नेपाल में बांग्लादेश में, श्रीलंका में इन सब का जो संदर्भ था वो अलग-अलग था। जैसे नेपाल में करप्शन का मुद्दा सबसे बड़ा था। जब सोशल मीडिया में मंत्रियों के बच्चों की आलीशान जिंदगी दिखने लगी तो सरकार ने सोशल मीडिया ही बैन कर दिया। फिर आंदोलन भड़का और हिंसा के बाद वहां सरकार गिरी नेपाल में। बांग्लादेश में सरकारी नौकरी में शेख हसीना ने सेना से जुड़े हुए सेना के जो बच्चे थे उनको रिजर्वेशन दे रही थी। इसलिए आम छात्रों ने इसका विरोध किया और जब प्रदर्शनकारियों पर क्रैक डाउन हुआ तो हिंसा भड़क गई और फिर शेख हसीना की भी वहां से सरकार चली गई। उसी तरह इंडोनेशिया में सरकार के मंत्रियों के वीआईपी प्रोटोकॉल पर उनके वीआईपी कल्चर पर पाबंदी लगाने के लिए छात्रों ने प्रदर्शन किए। प्रदर्शन के बाद सरकार ने कई बदलाव किए और वहां पे उनकी मांगे मानी गई और भारत का उदाहरण तो आप जानते ही हैं कि नीट पेपर लीक में सरकार की जवाबदेही मांगी गई और शिक्षा मंत्री का इस्तीफा मांगा गया। यानी इन सभी देशों में आप देखिए कि आंदोलन की जो वजह है वो आपको अलग-अलग मिलेंगी। जबकि जो आंदोलन अतीत में हुए और एक दूसरे को इंस्पायर किया।</div><h2>सेना का डर</h2><div>ऐसा नहीं है कि पाकिस्तान में प्रदर्शन होने की कोई वजह ही नहीं है। वहां की अर्थव्यवस्था कई बरस से वेंटिलेटर में है। आईएमएफ के इंजेक्शन से वो सर्वाइव कर रही है। शिक्षा व्यवस्था का भी यही हाल है। चुनाव फेयर नहीं है। सेना के इशारे पर सब कुछ चल रहा है। यहां तक कि न्यायपालिका पर भी वहां सवालों के घेरे में उसे लिया जा रहा है। यानी मुद्दे पर्याप्त हैं प्रदर्शन करने के लिए। लेकिन सेना वहां के लोगों को आंदोलन खड़े करने का मौका ही नहीं देती है। आपने इमरान खान, गजा, ईरान या किसी पश्चिमी देश में हुई किसी घटना के खिलाफ पाकिस्तान में प्रदर्शनों के बारे में तो सुना होगा। लेकिन शिक्षा व्यवस्था या रोजगार पर प्रदर्शन के बारे में अक्सर वहां से कोई ऐसी घटना या ऐसी कोई खबर सुनाई नहीं देती है क्योंकि वहां के आम लोग इस तरह के मुद्दों में पड़ना ही नहीं चाहते हैं। वो सीधी वजह है क्योंकि वहां की सेना क्रैक डाउन कर देती है। आखिरी बार अक्टूबर 2025 में कराची में बढ़ती महंगाई और कम वेतन की वजह से कई संगठन इकट्ठे हुए थे। इनमें सिंध एंप्लाइज एयंस एसईए सबसे आगे था। लेकिन क्या हुआ? वहां भी आंदोलन को दबा दिया गया। ईरान, गजा या पश्चिमी देश में हुई घटना पर भी जब आंदोलन होते हैं तो उन्हें भी सरकार कुचल देती है। जब पाकिस्तान ट्रंप के गजा पीस प्लान में शामिल हुआ था तब तहरीकलबैक पाकिस्तान ने एक हाईवे ही बंद कर दिया था। अंत में क्या हुआ? हिंसा हुई। इसी तरह ईरान के मुद्दे पर प्रदर्शन जब बहुत बढ़ने लगे तो आसिम मुनीर ने ये कह दिया कि जिन्हें ईरान से ज्यादा प्यार है वो ईरान ही चले जाएं।&nbsp; इस आंदोलन को भी कुचल दिया गया।&nbsp;</div><h2>प्रदर्शन कभी आंदोलन में नहीं बदल पाए</h2><div>जो प्रदर्शन आंदोलन में बदल भी पाए हैं उन्हें मेन स्ट्रीम पॉलिटिक्स और मेन स्ट्रीम मीडिया से ही साइडलाइन कर दिया गया। बलूचिस्तान और पाकिस्तान ऑक्युपाइड कश्मीर यानी पीओके का उदाहरण ही&nbsp; देख लीजिए। बलूचिस्तान में कई बरसों से प्रदर्शन चल रहे हैं। वहां लोगों की मांग यह है कि उन्हें भी पाकिस्तान के दूसरे शहरियों की तरह यानी पंजाबियों की तरह सिंधियों की तरह अधिकार मिले। जो गैस बलोचिस्तान से निकाली जाती है वो पहले कराची तक पहुंच जाती है। लेकिन बलोच लोगों को लकड़ी जलाकर चूल्हे में खाना बनाना क्यों पड़ता है? उसी तरह पाकिस्तान ऑक्यूपाइड कश्मीर पीओके में प्रदर्शन जो है वो महंगाई को लेकर बहुत लंबे वक्त से चल रहे हैं। और अब इलेक्शन में रिफॉर्म की मांग भी वहां की जा रही है।</div><h2>आखिर पाकिस्तान पीओके में क्या करने वाला है?</h2><div>पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में जबरदस्त बवाल चल रहा है। खबरें हैं कि पाकिस्तानी सेना की गोलियों में 14 आम लोग मारे गए हैं। लगभग पूरे पीओके में घेराबंदी है। कम्युनिकेशन ब्लैकआउट है। इंटरनेट नदारद है। चौक चौराहों पर सिर्फ सुरक्षा बलों की बंदूके दिखाई दे रही हैं। पैरामिलिट्री फोर्स बुलाई गई है। दूसरे सूबों से पुलिस के दस्ते मंगाए जा रहे हैं। पाकिस्तान के 14,000 रेंजर्स सड़कों पर कश्त कर रहे हैं। लेकिन यह सब किसी दंगे या हंगामे की वजह से नहीं हो रहा। यह सब वहां के चुनाव की तैयारियों का हिस्सा है। पीओके में चुनाव शुरू हो चुके हैं। पहले चरण के नतीजे भी आ गए हैं और चुनाव का विरोध करने वालों पर पाकिस्तान की पुलिस फायरिंग कर रही है। 28 जुलाई को पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू कश्मीर में पहले फेस के चुनाव के नतीजे घोषित हुए। 27 जुलाई को मीरपुर डिवीजन की 13 सीटों पर हुए चुनाव में नौ पर नवाज शरीफ की पीएमएलएन पार्टी ने जीत दर्ज की। जबकि चार सीटों पर भुट्टो परिवार की पाकिस्तान पीपल्स पार्टी पीपीपी ने जीत दर्ज की। पाकिस्तान की सत्ता में इस वक्त इन दोनों पार्टियों ने मिलकर गठबंधन की सरकार बना रखी है। नवाज शरीफ के छोटे भाई शहबाज शरीफ पाकिस्तान के प्रधानमंत्री हैं। लेकिन पीओके में यह दोनों पार्टियां अलग-अलग चुनाव लड़ रही हैं। वोटिंग के दौरान हिंसा की खबरें भी सामने आई।&nbsp;&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 29 Jul 2026 14:48:17 +0530</pubDate>
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      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[PM Modi Video Block Controversy: टेक्निकल ग्लिच या एल्गोरिदम की आड़ में Meta कर रहा मनमानी? ]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/pm-modi-video-block-meta-acting-arbitrarily-under-guise-of-technical-glitches-algorithms]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>पीएम मोदी का जेन-जी वाला वीडियो फेसबुक से गायब हो गया था। कुछ घंटों तक यूजर्स को सिर्फ ये मैसेज दिख रहा था कि लीगल रिक्वेस्ट के कारण ये वीडियो अब आपके एरिया में उपलब्ध नहीं है। इसके बाद सोशल मीडिया पर सवाल उठने लगे कि क्या भारत में ही प्रधानमंत्री का वीडियो ब्लॉक कर दिया गया है? मामला बढ़ने के बाद मेटा की ओर से सफाई आई और उसके बाद वीडियो भी वापस आया और कहा गया कि टेक्निकल ग्लिच था और मेटा की तरफ से माफी भी मांगी गई। हुआ ये था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में अपना सेल्फी जेन-जी वीडियो फेसबुक और इंस्टाग्राम पर पोस्ट किया था। इस वीडियो में उन्होंने युवाओं से संवाद किया और नीट समेत जो बाकी कंपटेटिव एग्जाम और पेपर लीक की घटनाओं का जिक्र करते हुए कहा कि सरकार इसके खिलाफ सख्त कदम उठाने जा रही है। उन्होंने ये भी कहा कि अगले कैबिनेट में इस विषय पर महत्वपूर्ण फैसले भी हमारी कैबिनेट लेगी। लेकिन मंगलवार तड़के 1:25 मिनट के करीब कई यूजर्स जब ये वीडियो देख रहे थे तो स्क्रीन पर नजर आ रहा था कि लीगल रिक्वेस्ट के कारण ये वीडियो अब उपलब्ध नहीं है। वीडियो के साथ एक ऑप्शन See Why का आता है यानी क्यों ये वीडियो उपलब्ध नहीं है? उस पर क्लिक करने पर यही जानकारी दिखाई दे रही थी। हालांकि नोटिस में ये नहीं बताया गया था कि किस कानून या किस सरकारी एजेंसी के रिक्वेस्ट पर वीडियो को ब्लॉक किया गया था। कुछ ही घंटों में फेसबुक पर वीडियो दोबारा से लौट आया। मेटा की ओर से साफ किया गया कि ये किसी सरकारी आदेश या कानूनी कार्रवाई का मामला नहीं था बल्कि टेक्निकल ग्लिच की वजह से ऐसा हुआ था। कंपनी ने इस गलती के लिए सरकार से माफी भी मांगी। मामला सामने आने के बाद भाजपा ने मेटा पर निशाना साधा।&nbsp;केंद्र सरकार ने इस घटना को बहुत गंभीरता से लिया है और इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने मेटा और इंस्टाग्राम के ग्लोबल प्रमुखों को समन जारी किया है।</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/pm-modi-busy-with-instagram-reels-gaurav-gogoi-says-government-is-not-serious-about-nta" target="_blank">PM Modi इंस्टाग्राम Reels पर व्यस्त? गौरव Gogoi बोले- NTA पर सरकार गंभीर नहीं</a></h3><h2>बच्चों के यौन शोषण से जुड़े विज्ञापनों के मामले में मेटा को किया गया था तलब</h2><p>जुलाई की शुरुआत में मेटा सरकार की नज़र में आ गया। BBC की एक जांच में पता चला कि Instagram यूज़र्स को ऐसे विज्ञापन और कंटेंट दिखा रहा था जो बच्चों के यौन शोषण और दुर्व्यवहार से जुड़ी सामग्री को बढ़ावा देते थे। बीबीसी-आई की एक पड़ताल में पाया गया है कि इंस्टाग्राम भारत में पैसे लेकर ऐसे विज्ञापन चला रहा है, जिनके ज़रिए बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्री का प्रसार हो रहा है। इस रिपोर्ट के प्रकाशित होने के बाद इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने अधिकारियों को मेटा से स्पष्टीकरण मांगने और उसे तलब करने का निर्देश दिया।</p><h2>WhatsApp के Username फीचर पर रोक</h2><p>जुलाई में भारत ने WhatsApp के उस नए फ़ीचर को रोल आउट करने पर रोक लगाने का आदेश दिया था, जिससे यूज़र्स यूनीक यूज़रनेम का इस्तेमाल करके चैट कर सकते थे। इसकी वजह यह थी कि इससे ऑनलाइन धोखाधड़ी और फ़िशिंग स्कैम बढ़ सकते थे। ऐसा इसलिए था क्योंकि WhatsApp का यूज़रनेम फ़ीचर लोगों को अपना फ़ोन नंबर बताए बिना चैट करने की सुविधा देता। भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने एक नोटिस में WhatsApp से पूछा है कि साइबर अपराध बढ़ाने वाले फ़ीचर को लॉन्च करने के लिए भारतीय क़ानून के तहत उसके ख़िलाफ़ कार्रवाई क्यों न की जाए। मंत्रालय ने यह भी कहा कि उसे लगता है कि यह फ़ीचर "ऑनलाइन धोखाधड़ी, फ़िशिंग, डिजिटल अरेस्ट स्कैम और किसी और का रूप धरकर किए जाने वाले हमलों" की घटनाओं को काफ़ी बढ़ा सकता है, क्योंकि इससे अपराधी अपना फ़ोन नंबर बताए बिना संभावित पीड़ितों से संपर्क कर सकते हैं। इसके जवाब में WhatsApp ने एक बयान में कहा कि यह फ़ीचर अभी लाइव नहीं हुआ है और इसमें सुरक्षा के उपाय किए गए हैं, जैसे कि हाई-प्रोफ़ाइल यूज़रनेम को सुरक्षित रखना और किसी और का रूप धरने या धोखाधड़ी का पता लगाने के तरीक़े शामिल करना।</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/business/government-summons-meta-official-after-pm-modi-facebook-post-removed" target="_blank">प्रधानमंत्री की पोस्ट हटाने के बाद सरकार ने मेटा के वैश्विक लोक नीति प्रमुख को किया तलब</a></h3><h2>जुकरबर्ग ने 2024 के चुनाव में किया बीजेपी की हार का दावा! मेटा ने मांगी माफी</h2><p>पिछले साल जनवरी में मेटा ने भारत से भी माफ़ी मांगी थी। यह माफ़ी तब मांगी गई जब CEO मार्क ज़करबर्ग ने जो रोगन के पॉडकास्ट पर 2024 के भारतीय चुनावों के नतीजों को लेकर टिप्पणी की, जिससे विवाद खड़ा हो गया था। ज़करबर्ग ने दावा किया था कि भारत समेत कई देशों में कोविड के बाद हुए चुनावों में मौजूदा सरकारों को सत्ता गंवानी पड़ी। भारतीय सरकारी अधिकारियों ने तुरंत इस दावे का खंडन किया। ज़करबर्ग की टिप्पणियों पर ध्यान देते हुए, IT मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा कि भारत के 2024 के चुनाव मौजूदा सरकार के लिए बहुत बड़ी कामयाबी रहे, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाले नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस (NDA) ने निर्णायक रूप से तीसरा कार्यकाल हासिल किया। वैष्णव ने 64 करोड़ से ज़्यादा लोगों के भारी मतदान का ज़िक्र किया और ज़करबर्ग की बातों को तथ्यात्मक रूप से गलत बताया। इस टिप्पणी के बाद, मेटा इंडिया के वाइस प्रेसिडेंट शिवनाथ ठुकराल ने एक्स पर लिखा कि मार्क की यह बात कि 2024 के चुनावों में कई मौजूदा सरकारें दोबारा नहीं चुनी गईं, कई देशों के लिए तो सही है, लेकिन भारत के लिए नहीं। ठुकराल ने इस टिप्पणी को अनजाने में हुई गलती बताते हुए खेद जताया और दोहराया कि भारत मेटा के लिए एक अहम बाज़ार बना हुआ है। उन्होंने आगे कहा कि हम इस अनजाने में हुई गलती के लिए माफ़ी मांगना चाहते हैं। भारत मेटा के लिए बेहद महत्वपूर्ण देश है और हम इसके इनोवेटिव भविष्य का अहम हिस्सा बनने के लिए उत्सुक हैं। मेटा के लिए, भारत सरकार और न्यायपालिका के साथ ये टकराव अच्छे संकेत नहीं हैं। स्टेटिस्टा के डेटा के अनुसार, 2025 तक भारत में इंस्टाग्राम के सबसे ज़्यादा यूज़र्स (480 मिलियन से ज़्यादा) हैं, जो अमेरिका के मुक़ाबले दोगुने से भी ज़्यादा हैं। यहाँ फ़ेसबुक के भी 400 मिलियन से ज़्यादा यूज़र्स हैं, जो दुनिया में सबसे ज़्यादा हैं। देश में WhatsApp की भी मज़बूत मौजूदगी है, जिसके लगभग 853 मिलियन यूज़र्स हैं।</p><h2>WhatsApp को भारत छोड़ने की 'सुप्रीम' चेतावनी</h2><p>सुप्रीम कोर्ट ने WhatsApp और उसकी पेरेंट कंपनी Meta को साफ चेतावनी दी। अदालत ने कहा कि नागरिकों की प्राइवेसी के अधिकार के साथ कोई कंपनी खेल नहीं सकती। यहां तक कहा गया कि अगर नियम नहीं मान सकते, तो भारत छोड़ने का विकल्प भी खुला है। इस विवाद की जड़ WhatsApp की प्राइवेसी पॉलिसी थी। WhatsApp सालों से यह कहता आ रहा है कि उसके मैसेज End-To-End Encrypted (E2EE) हैं और कोई तीसरा शख्स उन्हें नहीं पढ़ सकता। लेकिन समस्या मैसेज के कंटेंट की नहीं, बल्कि यूज़र डेटा की है। इसी साल फरवरी के महीने में सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के दौरान जजों ने WhatsApp के रवैये पर सीधी आपत्ति जताई। अदालत ने कहा कि WhatsApp यूज़र्स को यह नहीं कह सकता कि पॉलिसी मानो या ऐप छोड़ दो। इस मामले की सुनवाई के दौरान, भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि WhatsApp की मोनोपॉली (एकाधिकार) के कारण यूज़र्स के पास कोई वास्तविक विकल्प नहीं बचता है और उन्होंने इसके डेटा से जुड़े तौर-तरीकों की तुलना "निजी जानकारी की चोरी" से की। सीजेआई ने आगे कहा था कि आप इस देश के संवैधानिक मूल्यों का मज़ाक उड़ा रहे हैं। हम इसे तुरंत खारिज कर देंगे। आप लोगों के निजता के अधिकार के साथ इस तरह कैसे खिलवाड़ कर सकते हैं? कंज्यूमर के पास कोई विकल्प नहीं है। आपने एकाधिकार बना लिया।&nbsp;</p><p>&nbsp;</p>]]></description>
      <pubDate>Tue, 28 Jul 2026 15:35:24 +0530</pubDate>
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      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Cockroaches का बाप! अब आरक्षण और E-20, एक दिन में 2 मिलियन फॉलोअर्स, ये 2 अकाउंट उड़ाएंगे सरकार की नींद?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/2-million-followers-in-a-single-day-will-these-two-accounts-give-the-government-sleepless-nights]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>क्या देश में नया आंदोलन शुरू होने जा रहा है? क्या सड़कों से उठकर इंटरनेट के सर्वर को हिला देने वाला एक नया युवा विद्रोह भारत की सबसे पुरानी और संवेदनशील व्यवस्था को चुनौती दे रहा है?&nbsp;सोशल मीडिया का 'रील' वाला ज़माना अब सिर्फ मनोरंजन तक सीमित नहीं रहा, यह देश का नया डिजिटल आंदोलन केंद्र बन चुका है। जिस तरह 'कॉकरोच जनता पार्टी' ने इंस्टाग्राम के ज़रिए ज़मीनी आक्रोश खड़ा किया और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को कुर्सी छोड़ने पर मजबूर कर दिया, उसने विरोध के एक नए दौर की शुरुआत कर दी है। आज अलग-अलग मांगों के साथ इंस्टाग्राम पर कई नए मोर्चे खुल रहे हैं। ज़ाहिर है, इस डिजिटल दौर में अगर इंस्टाग्राम को जेन-जी (Gen-Z) पीढ़ी का नया 'जंतर-मंतर' कहा जाए, तो यह रत्ती भर भी गलत नहीं होगा।&nbsp;<span style="font-size: 1rem;">एक डिजीटल विस्फोट ने पिछले 24 से 48 घंटों में पूर देश के सियासी और सामाजिक हल्कों में तहलका मचा दिया है। कॉकरोच जनता पार्टी ने जिस तरीके से शिक्षा व्यवस्था को लेकर आंदोलन किया उसके ठीक बाद अब सोशल मीडिया के दीवारों पर एक ही नारा गूंज रहा है- आरक्षण हटाओ आंदोलन! समानता के अधिकार, योग्यता और न्याय इन तीन शब्दों के ईर्द-गिर्द बुने गए नए अभियान जिसे रिजर्वेशन हटाओ आंदोलन यानी आरएचए का नाम दिया गया है। इस आंदोलन का मुख्य मकसद भारत की मौजूदा जाति आधारित आरक्षण व्यवस्था का विरोध करना और कॉलेज एडमिशन से लेकर सरकारी नौकरियों में मेरिट यानी योग्यता को एकमात्र आधार बनाने की मांग करना है। जो लोग आंदोलन कर रहे हैं, उनका नारा है कि सारी जातियां एक समान, मेरा बस ये देश महान। इनका तर्क है कि 21वीं सदी के भारत में हर नागरिक को बिना किसी कोटे या जितगत भेदभाव के एक समान अवसर यानी फुल ऑपरच्युनिटी मिलनी चाहिए। हालांकि इनका ये भी कहना है कि वो किसी समुदाय के खिलाफ नहीं हैं बल्कि उनका प्रस्ताव ये है कि सरकार को रोजमर्रा के सार्वजनिक जिंदगी में जाति की पहचान को ही पहचानना बंद कर देना चाहिए ताकी जातिवाद जड़ से खत्म हो सके।&nbsp;</span></p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/uddhav-bold-ram-mandir-donation-embezzlement-case-ram-raksha-andolan-against-bjp-district-level" target="_blank">राम मंदिर दान गबन मामले पर Uddhav Thackeray का बड़ा दांव! BJP के खिलाफ अब जिला स्तर पर 'राम रक्षा आंदोलन'</a></h3><h2>24 घंटे में 10 लाख से अधिक फॉलोअर्स&nbsp;</h2><p><span style="font-size: 1rem;">इस आंदोलन के सोशल मीडिया हैंडल का नाम रिजर्वेशन हटाओ मूवमेंट है। ये अकाउंट हाल फिलहाल एक्टिव हुआ। लेकिन रफ्तार का आलम ये है कि 24 से 48&nbsp; घंटे के अंदर-अंदर 10 लाख से अधिक फॉलोअर्स बन चुके थे। यानी की एक मिलियन फॉलोअर्स हो चुके थे। लेकिन देखते ही देखते एमआरआई लिखे जाने तक 4.3 मिलियन तक चला गया। इस पेज पर अब तक कई सारे पोस्ट किए जा चुके हैं जो ये बताने के लिए काफी है कि कैसे इस मुद्दे को उठाया जा रहा है। इनमें पोल, रील और छात्र-छात्राओं के इंटरव्यूज शामिल हैं। किसी भी सोशल मीडिया मूवमेंट के इतिहास में सबसे तेजी से बढ़ने वाले हैंडल्स में से एक बन चुका है। देश की जनता और सोशल मीडिया यूजर्स के मन में सबसे बड़ा सवाल अब ये है कि आखिर इस डिजिटल क्रांति को जन्म देने वाला लड़का कौन है?</span></p><h2>डिजिटल क्रांति को जन्म किसने दिया</h2><p>बहुत ज्यादा तथ्यों की पड़ताल करेंगे तो आपको बहुत सारे चेहरे नजर आएंगे जो इसके सपोर्ट में यानी कि रिजर्वेशन हटना चाहिए। इसके सपोर्ट में वीडियो बना रहे हैं। लेकिन कोई इसका सिंगल फाउंडर सामने नहीं आया है। हां, एक लड़का जरूर बहुत आगे आकर वीडियो बना रहा है। लग रहा है कि यह सारा आंकड़ा उसी का हो सकता है। फिलहाल पेज के बायो में लिखा है बैक बाय सिटीजंस हु बिलीव रिफॉर्म डिर्व्स अ बॉयज। यानी यह उन आम नागरिकों और छात्रों द्वारा संचालित है जो व्यवस्था में सुधार चाहते हैं। इस पेज पर कई युवा रिजर्वेशन हटाओ का नारा देते हुए सरकार और आरएसएस से भी सवाल पूछते दिख रही हैं।&nbsp; मेरा फर्ज है सवाल पूछना। क्यों भारतीय जनता पार्टी चुप है? क्यों कांग्रेस चुप है? क्यों आम आदमी पार्टी चुप है? यही एकमात्र ऐसा मुद्दा था जिस पे सारी पार्टियां चुप हैं। कोई इस पे नहीं बोलता। सब लोग एक ही थाली में खाना खाते हैं ये लोग। सबका पता होता है कि कौन सा पार्लियामेंट में कानून पास होने वाला है, कौन सा नहीं होने वाला और सिर्फ एक्टिंग करते हैं। जनता को बरगलाने का काम करते हैं। भारतीय जनता पार्टी से बस एक खुशी की चीज यह है कि वो देशद्रोही नहीं है। राजनीतिक पार्टी जरूर है। देशद्रोही नहीं है कम से कम।&nbsp;</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/uproar-over-ram-mandir-funds-uddhav-thackeray-targets-bjp-ram-raksha-andolan-to-begin-on-july-5" target="_blank">Ram Mandir फंड पर घमासान: Uddhav Thackeray का BJP पर वार, 5 जुलाई से राम रक्षा आंदोलन</a></h3><h2>क्या देश में कोई नया बड़ा ऑन ग्राउंड प्रोटेस्ट होने जा रहा है?&nbsp;</h2><p>इसका जवाब है बिल्कुल नहीं फिलहाल नहीं। इस आंदोलन के एडमिन और रणनीतिकारों ने बहुत ही सोची समझी रणनीति अपनाई है। उन्होंने इसे फर्स्ट पीसफुल ऑनलाइन प्रोटेस्ट बताया है। पेज के जरिए युवाओं से अपील की गई है कि वह सड़कों पर ना उतरे। मतलब कि सड़कों पर उतर कर लाठियां खाने के बजाय या कानून व्यवस्था बिगाड़ने के बजाय डिजिटल ताकत का इस्तेमाल करें। समर्थकों को निर्देश दिया गया है कि वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, बीजेपी और सीजेपी के सोशल मीडिया कमेंट सेक्शन में जाकर पूरी तरीके से शांतिपूर्ण तरीके से रिजर्वेशन हटाओ लिखकर अपनी मांग को दर्ज कराएं। हालांकि इस ऑनलाइन अभियान की संवेदनशीलता को देखते हुए देश के कुछ हिस्सों खासकर देश की राजधानी दिल्ली में प्रशासन पूरी तरीके से अलर्ट है। छात्र संगठनों की हर हलचल पर नजर रखी जा रही है और एतिहातन सुरक्षा व्यवस्था के पुख्ता इंतजाम किए गए हैं ताकि इंटरनेट का यह उबाल सड़कों पर किसी बड़ी अव्यवस्था का रूप ना ले सके। इस पूरे आंदोलन का एक और पहलू भी है जिसे भी आपके लिए समझना जरूरी है। जहां एक तरफ देश का जेंजी युवा मेरिट और आर्थिक आधार पर अवसरों की मांग कर रहा है तो वहीं दूसरी तरफ सामाजिक न्याय के समर्थकों का दृढ़ तर्क यह है कि भारत में भैया सदियों से सामाजिक असमानता चली आ रही है। जातिगत भेदभाव और प्रतिनिधित्व की कमी है और उसे दूर करने के लिए आरक्षण आज भी बेहद जरूरी संवैधानिक हथियार है। हालांकि सवाल इस बात पर भी उठता है कि 700 साल पहले अगर किसी के ऊपर अत्याचार हुआ तो इसका मतलब यह कतई नहीं है कि आने वाले 7000 साल तक उसके ऊपर अत्याचार ही होगा। लोग आगे बढ़ रहे हैं। यह जो रिजर्वेशन अब तक मिला है इसका फायदा हुआ है। लोग स्टेबल हुए हैं और आज भी अगर कोई एससी एसटी है और किसी अच्छी पोजीशन पर है तो उसके बच्चे को भी वही सारी चीजें फेस करनी होंगी जो उसके पूर्वजों ने किया होगा। जाहिर सी बात है यह बिल्कुल कुतर्क लगता है। शायद इसीलिए खुलकर इस पर बहस हो रही है और यह जो प्रोटेस्ट कर रही हैं इनका भी कहना है कि तार्किक बहस होनी चाहिए।&nbsp;</p><h2>आरक्षण पर बहस</h2><p>जेई परीक्षा में 2023 में जो एससी एसटी हैं उनका कट ऑफ 37 था और जनरल का 90 के करीब था। मतलब कि 90 से भी ज्यादा प्रतिशत तो जनरल कास्ट के लड़के हैं वो 90 नंबर लाकर भी सिलेक्ट नहीं हुए और जो दूसरे लड़के वो 38 नंबर लाकर सिलेक्ट हो गए। इसी तरह 2025 के नीट का एग्जाम का रिजल्ट तो आपको याद ही होगा जिसपर खूब बवाल मचा था। हुआ यह था कि -40 लाने वाले का सिलेक्शन हो गया था। -40 मतलब कोरा कागज भी अगर चुपचाप आप दे देते हैं फिर भी जीरो आते हैं। माइनस लाने के लिए आपको एक्स्ट्रा टैलेंट की जरूरत पड़ती है। जो कि नीट 2025 में हुआ था। रोहिणी कमीशन की रिपोर्ट कहती है कि 37% वैसी जातियां जो ओबीसी में डाल दी गई हैं उन्हें कभी ओबीसी का लाभ मिला ही नहीं। मतलब यह कि 2600 से ज्यादा जातियों को ओबीसी में डाला गया है। यानी किसी को कुछ नहीं मिल रहा तो ओबीसी में डाल दो। ओबीसी में इतने सारे लोगों को भर दिया गया है कि उनमें से आधे से ज्यादा लोगों ने कभी ओबीसी का लाभ ही नहीं उठाया। इसलिए जब कोई नेता बोले कि ओबीसी रिजर्वेशन बढ़ा देंगे तो क्योंकि ऑलरेडी 2600 जातियां है। 80 साल के आसपास होने जा रहे हैं इस रिजर्वेशन पॉलिसी के। 78 साल हो गए हैं। इस रिजर्वेशन पॉलिसी से देश के 20% दलित और 12% आदिवासियों में से कितने प्रतिशत को लाभ मिला है? भारत की कुल जनसंख्या का मात्र 3% टोटल सरकारी नौकरी है।&nbsp;</p><h2>E20 जनता पार्टी क्या है?</h2><p>E20 जनता पार्टी कोई आधिकारिक राजनीतिक दल या संस्था नहीं है, बल्कि सोशल मीडिया पर छिड़ा एक डिजिटल अभियान है। इस मुहिम की शुरुआत उन वाहन चालकों और नागरिकों ने की है, जो E20 पेट्रोल (20% एथेनॉल ब्लेंडेड) के साथ-साथ 100% शुद्ध पेट्रोल की उपलब्धता की मांग कर रहे हैं। इस अभियान से जुड़े लोगों का मानना है कि सरकार E20 पेट्रोल की आपूर्ति भले जारी रखे, लेकिन पेट्रोल पंपों पर बिना एथेनॉल वाला सामान्य पेट्रोल भी मिलना चाहिए ताकि विकल्प चुनना ग्राहकों के हाथ में हो। सोशल मीडिया पर यह कैंपेन तेजी से ट्रेंड कर रहा है और लोग इससे जुड़ते जा रहे हैं। इनका तर्क सीधा है—E20 पेट्रोल उपलब्ध कराया जाए, लेकिन शुद्ध पेट्रोल का विकल्प बंद न हो, ताकि उपभोक्ता खुद तय कर सके कि उसकी गाड़ी के लिए क्या सही है। इस ऑनलाइन मुहिम को लोगों का लगातार समर्थन मिल रहा है।&nbsp;</p><p>&nbsp;</p>]]></description>
      <pubDate>Mon, 27 Jul 2026 14:22:00 +0530</pubDate>
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      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[सोनम बेवफा निकले? बेपटरी हो रहा आंदोलन या कुछ और है वजह, वांगचुक के अनशन तोड़ने की इनसाइड स्टोरी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/is-sonam-wangchuk-betray-what-really-happened-behind-the-scenes]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज बात उस सवाल की, जिसने देश के लाखों छात्रों और युवाओं के दिल में एक कसक छोड़ दी है। लद्दाख के पर्यावरणविद सोनम वांगचुक जिन्होंने नीट (NEET) के छात्रों की आवाज़ बनकर 26 दिनों तक अन्न का एक दाना नहीं उठाया, जब उन्होंने मंत्रियों से मुलाकात के बाद अपना अनशन तोड़ा... तो जश्न की जगह सन्नाटा और सवालों का बवंडर खड़ा हो गया! अजीबोगरीब मोड़ देखिए जो लोग 26 दिन से सोनम वांगचुक को कोस रहे थे, आज वही उन्हें ‘महान’ और ‘समझदार’ बता रहे हैं।&nbsp; जो छात्र, जो समर्थक कल तक उनके नाम का नारा लगा रहे थे, आज वही दबी ज़ुबान में पूछ रहे हैं- सोनम सर, ये क्या कर दिया? क्या यह बेवफ़ाई है? तो आज सबसे बड़ा और कड़वा सवाल यही है-क्या सोनम वांगचुक ने छात्रों का भरोसा तोड़ा या फिर उन्होंने दूरदर्शिता और समझदारी दिखाई? क्या सोनम सच में बेवफ़ा हैं... या फिर आंदोलन की बाज़ी पलटने वाले सबसे समझदार खिलाड़ी? आइए, आज के एमआरआई में इसी गुत्थी की इनसाइड स्टोरी से पर्दा उठाते हैं।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/government-should-speak-directly-to-us-cjp-leader-sourav-das-ready-for-meeting-jantar-mantar" target="_blank">Paper Leak Case: सरकार सीधे हमसे बात करे, Jantar Mantar पर मीटिंग के लिए तैयार CJP नेता Sourav Das</a></h3><h2>सीजेआई के व्यंग्य से उपजी पार्टी और उसका धरणा</h2><div>लोकतंत्र में प्रतिरोध का मतलब है अपने हक की लड़ाई के लिए आवाज उठाना। गलत के खिलाफ बोलना और देश चलाने का जिम्मा लेने वालों से जवाबदेही तलब करना। भारत का इतिहास ऐसे ही सफल जन आंदोलनों से लिखा गया है। आजादी की लड़ाई से लेकर 70 के दशक के जेपी मूवमेंट और फिर निर्भया आंदोलन तक हर बड़े बदलाव की नींव सड़क पर ही रखी गई है। जब देश का नौजवान सड़क पर उतरता है तो उसके सीने में सिस्टम के खिलाफ एक जायज आग होती है। सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया कॉकरोच शब्द देते हैं। एक आदमी कॉकरोच के नाम से मीम पेज बनाता है। फॉर्म भरवाता है। इंडिया आता है। 4 500 700 लोग नजर आते हैं। आठ दिन बाद सोनम वांगचुक जैसा चेहरा आता है। एक मीम पेज Instagram पेज सडनली एक बड़ा आंदोलन बन जाता है। देश दुनिया में सबकी निगाहें जाती हैं। भीड़ बढ़ने जा लगती है। हालत यह होती है कि जनता सड़क से संसद जाने को तैयार हो जाती है। नीट परीक्षा में धांधली और पेपर लीक के सताए लाखों स्टूडेंट्स ने जब दिल्ली के जंतर-मंतर पर डेरा डाला तो भारत के मुख्य न्यायाधीश के व्यंग से उपजी कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी ने इस आंदोलन का नेतृत्व संभालने का जिम्मा लिया था। लोग समर्थन भी कर रहे थे और 20 जुलाई को जब चलो संसद का नारा सीजेपी लीडरशिप ने दिया तो देश भर से छात्र दिल्ली पहुंचे। तब तक भी आंदोलन में एक गजब की मासूमियत थी। बच्चे फूल बांट रहे थे।&nbsp;</div><h2>नीट पेपर लीक से सताए छात्रों को मिला आंदोलन का चेहरा</h2><div>अपनी मांगों को लेकर साफ शब्दों में गुजारिश कर रहे थे। यह सोचकर कि सरकार उनकी सुनेगी। लेकिन जुलाई के आखिरी हफ्ते तक आते-आते इस शांतिपूर्ण प्रतिरोध की तस्वीर अचानक बदल गई। पुलिस और छात्रों के बीच खूनी झड़पें हुई। मीडिया के कैमरे तोड़े गए और पुलिस की गाड़ियों पर तलवारें लहराई गई। सीजेपी का आंदोलन 6 जून को शुरू हुआ था। 28 जून को सोनम वांगचुक के अनशन पर बैठने के साथ ही इसे एक मजबूत नैतिक केंद्र मिल गया। लेकिन सरकार ने हफ्तों तक इन छात्रों की कोई सुध नहीं ली। कोई बातचीत का दरवाजा नहीं खोला गया। इसके उलट 18 जुलाई को पुलिस ने वाकचुक को जबरदस्ती उठाकर अस्पताल पहुंचा दिया। जब आप एक शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक मांग को पुलिस के बूटों तले कुचलने की कोशिश करते हैं तो सड़क पर गुस्सा फटना तय हो जाता है। 20 जुलाई को चलो संसद मार्च के दिन हालात बेकाबू हो गए। 1400 पुलिसकर्मियों की घेराबंदी, बैरिकेड्स और आंसू गैस के गोलों ने दिल्ली को छावनी में तब्दील कर दिया। दर्जनों छात्रों के सर फूटे। जब सत्ता संवाद के बजाय डंडे की भाषा बोलती है तो भीड़ का सब्र भी जवाब दे देता है।&nbsp;</div><h2>जब वांगचुक ने अपना अनशन तोड़ा</h2><div>23 जुलाई की आधी रात के कुछ देर बाद, वांगचुक ने 26 दिनों से चल रहा अपना अनशन खत्म किया। राजधानी के मेदांता अस्पताल का एक वीडियो दिखाता है कि यह सब कैसे हुआ। केंद्रीय मंत्री नड्डा और सिंह का हाथ थामे हुए वांगचुक ने कहा कि अपना अनशन खत्म करके मैं आभारी और खुश हूँ। धन्यवाद। फिर अपनी पत्नी की ओर मुड़कर उन्होंने कहा गीतांजलि हमेशा मेरे साथ रही हैं। मैं आपको धन्यवाद नहीं देना चाहता, बल्कि अपनी भावनाएं ज़ाहिर करना चाहता हूँ। बाद में जेपी नड्डा वांगचुक को सरकार के आश्वासन पढ़कर सुनाते हुए दिखे। मंत्री ने कहा कि सरकार दिल्ली के जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण विरोध करने वालों और 20 जुलाई, 2026 को संसद तक मार्च में शामिल होने वालों के खिलाफ़ केस दर्ज न करने को लेकर सकारात्मक है। सरकार पहले ही बातचीत के ज़रिए पेपर लीक और परीक्षाओं से जुड़े शिक्षा सुधारों का समाधान निकालने का भरोसा दे चुकी है। इसके अलावा, सरकार हाल ही में हुए NEET पेपर लीक के कारण आत्महत्या करने वालों के परिवारों को उचित मुआवज़ा देने पर भी सकारात्मक रूप से विचार कर रही है। खास बात यह है कि शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े का कोई ज़िक्र नहीं किया गया, जो 28 जून को भूख हड़ताल शुरू करते समय वांगचुक की शुरुआती मांग थी।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/passports-of-rioters-to-be-revoked-delhi-police-takes-a-tough-stance-amidst-cjp-protests" target="_blank">दंगा करने वालों का पासपोर्ट होगा रद्द! CJP प्रोटेस्ट के बीच दिल्ली पुलिस सख्त</a></h3><h2>आधी रात सरकार से क्या हुई बात</h2><div>इस प्रोटेस्ट को और ज्यादा मजबूती तब मिली जब सोनम वांगचुक इस प्रोटेस्ट में शामिल हुए और उन्होंने भूख हड़ताल शुरू कर दी। एक तरह से कहें तो उस दिन के बाद सोनम वांगचुक इस प्रोटेस्ट की रीड बन गए थे। क्योंकि सोनम वांगचुक के जुड़ने के बाद वो लोग भी इस प्रोटेस्ट में आए जो दरअसल पर्यावरण को बचाने की देख रखते हैं। एक गंभीरता उन्होंने गंभीरता उन्होंने दे दी इस प्रोटेस्ट को। मगर लंबे वक्त के बाद अब लगभग 26 दिन के अनशन के बाद भूख हड़ताल के बाद। अब उन्होंने मतलब जूस पिया वो भी जेपी नड्डा के हाथ से।&nbsp; जेपी नड्डा के हाथ से इस इस वजह से जरूरी हो जाता है क्योंकि उसी सरकार के खिलाफ यह लोग लगातार आवाजें उठा रहे थे। इस मुलाकात का एक वीडियो जारी होता है। जिसमें स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा सोनम वांगचुक को जूस पिला रहे हैं। सिर्फ जेपी नड्डा ही वहां पर नहीं होते बल्कि सरकार की तरफ से प्रधानमंत्री कार्यालय में जो राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह की भी मौजूदगी होती है। सरकार ने बताने की कोशिश की कि पीएमओ से भी एक मिनिस्टर को भेजा गया है।&nbsp; जेपी नड्डा भी अंग्रेजी में अपनी बात रख रहे हैं और सोनम मानचुक भी अपनी बात को अंग्रेजी में ही रखा है। तो कुछ दो ढाई मिनट का वीडियो है। दोनों साइड्स का जहां वो सेटिस्फेक्शन खोजना चाहती थी वो आपको सुनने को मिल जाएगा। जेपी नड्डा भरोसा दिलाते हैं कि सरकार पॉजिटिव है। मतलब सरकार की नियत है कि जो जंतर-मंतर पर प्रोटेस्ट जो पीसफुल कर रहे थे उनके खिलाफ हम मुकदमा नहीं लिखने जा रहे हैं। उन्होंने कहा उन्होंने कहा कि हम पॉजिटिव हैं। मतलब हम यह करेंगे। उसके बाद उन्होंने कहा कि जिन्होंने 20 तारीख को मार्च किया उन पर भी मुकदमे या कोई पनिटिव एक्शन ना हो उसे लेकर भी सरकार पॉजिटिव है। जेपी नड्डा ये भी कहते हैं कि जो विक्टिम ऑफ पेपर लीक जिन बच्चों ने अपना जीवन समाप्त किया नीट पेपर लीक होने के बाद में रीट से पहले 20 बच्चे हैं। उनके लिए सूटेबल कंपनसेशन को लेकर भी सरकार पॉजिटिव है। गौरतलब है कि सोनम वागंचुक ने पिछला खत लिखा था उसमें उन्होंने यही कहा था कि लगातार सत्ता के और विपक्ष के सांसद मुझसे संपर्क कर रहे हैं। आग्रह कर रहे हैं कि मैं अपना अनशन समाप्त कर दूं और मैं इस बारे में गंभीरता से सोचूंगा। मैं कर दूंगा यह। यदि सरकार पहले उन्होंने कहा पहले इस्तीफे की मांग की। फिर उसके बाद उन्होंने यह कहा कि यदि सदन में चर्चा हो जाए और मुझसे आकर के कोई अस्पताल में मिल ले। अब जो आखिरी हालिया खत था उसमें उन्होंने लिखा था कि यदि सरकार यह वादा कर दे कि जिन बच्चों ने आंदोलन किया है उन पर कोई मुकदमा नहीं किया जाएगा। उनको उस चीज के लिए सजा नहीं दिया जाएगा तो फिर मैं अनशन छोडूंगा। तो वो बातें&nbsp; होती दिख रही हैं।&nbsp;</div><h2>दोनों पक्षों ने एक दूसरे के पसंद की बात कर दी</h2><div>सोनम अंग्रेजी में वो भी कहते हैं कि मुझसे मुझे जानकर खुशी है कि सरकार और विपक्ष की ओर से यह आश्वासन मुझे दिया गया है कि जो नीट है और जो दूसरी मतलब शिक्षा से जुड़ी जो बाकी यंत्रणाएं हैं उनमें रिफॉर्म को लेकर और अकाउंटेबिलिटी एनश्योर करने के लिए या जो लैप्सेस हुए हैं उनकी जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए पार्लियामेंट के फ्लोर पर डिस्कशन होगा। फिर उसके बाद की तरफ से कहा ही जा रहा था। उसके बाद और बड़ी रोचक भाषा में उन्होंने कहा कि एट अ सूटेबल टाइम एक मुफीद वक्त पर जो आगे वो कहते हैं, आई एम नो वन टू डिक्टेट। मैं नहीं तय करूंगा वो। उसमें यह जो नीट वाला मामला हुआ है। उसमें शिक्षा मंत्रालय कंसर्न मिनिस्ट्री वो कह रहे हैं अकाउंटेबिलिटी इन द मिनिस्ट्री एंड द मिनिस्टर यानी कि मंत्री और मंत्रालय में जो लोग हैं उनकी जो जवाबदेही होगी उसको लेकर के कदम उठाए जाएंगे जो कि सरकार कंसीडर ही कर रही होगी। यानी जो सरकार की पहले ही मंशा है लेकिन सूटेबल टाइम और आई एम नो वन टू डिक्टेट। ये दो बातें कि सरकार को कोई ये डिक्टेट नहीं करेगा कि कब लेकिन उन्होंने कहा कि मुझे भरोसा दिलाया गया। फिर&nbsp; आगे वो कहते हैं फिर वो जो छात्रों से अपनी अपील करते हैं कि आप अभी संयम बना के रखें। हिंसा ना करें। उन्होंने कहा कि मैं हिंसा का समर्थन नहीं करता हूं। फिर उसके बाद उन्होंने ये भी कहा कि जो एंटी सोशल एलिमेंट्स हैं उनकी जो करतूतें हैं उनका समर्थन नहीं करता हूं।&nbsp; उन्होंने कहा कि जो मांग है उस पर जरूर ध्यान दिया जाए।&nbsp;</div><h2>एक्शन मोड में आए पीएम मोदी</h2><div>गुरुवार रात 11:52 बजे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक सेल्फी वीडियो संदेश पोस्ट करके सीधा छात्रों से संपर्क साधा और NEET पेपर लीक विवाद के बीच उन्हें आश्वासन दिया कि सरकार उनके साथ खड़ी है। यह स्वीकार करते हुए कि पेपर लीक कोई मामूली मुद्दा नहीं है, उन्होंने कड़ी कार्रवाई का वादा किया। इसमें शुक्रवार को कैबिनेट द्वारा एक प्रस्तावित कानून पर निर्णय लेना भी शामिल है, जिसमें परीक्षा में धांधली करने वालों के लिए फास्ट-ट्रैक अदालतों और कड़े दंड का प्रावधान है। प्रधानमंत्री का यह प्रयास उनके संचार के पारंपरिक तरीके से काफी अलग था। किसी आधिकारिक स्थान से टीवी पर दिए जाने वाले संबोधन के बजाय, मोदी ने तीन मिनट से भी छोटा सेल्फी वीडियो चुना—जो विशेष रूप से युवाओं और डिजिटल-फ़र्स्ट दर्शकों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया प्रतीत होता है। छात्रों को दोस्तों कहकर संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि मैं जानता हूं कि पेपर लीक कोई मामूली मुद्दा नहीं है। इससे लाखों छात्रों और उनके माता-पिता को भारी कष्ट हुआ है। इसीलिए, पेपर लीक की घटना के बाद से पिछले ढाई महीनों में कई कदम उठाए गए हैं। दोषियों को गिरफ्तार कर लिया गया है और वे अब जेल में हैं। पीएम मोदी ने कहा कि सरकार केवल इतनी कार्रवाई से संतुष्ट होने वाली नहीं है। उन्होंने बताया कि आज उन्होंने संबंधित विभागों को पेपर लीक मामलों के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने के निर्देश दिए थे। विभागों ने लगातार मेहनत करके देर रात इसका मसौदा तैयार कर उन्हें सौंप दिया है।</div><h2>क्या सच में बेपटरी हो रहा आंदोलन</h2><div>जब आंदोलन सड़क पर पुलिस से भिड़ने लगता है, वही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी भी बन जाता है। महात्मा गांधी ने चौराचोरी की हिंसक घटना के बाद अपना पूरा असहयोग आंदोलन ही वापस ले लिया था। क्योंकि वह जानते थे कि हिंसा से हासिल की गई जीत कभी स्थाई नहीं होती। यहां हमें यह भी समझना होगा कि महात्मा गांधी ने जब साल 1917 में चंपारण सत्याग्रह किया या फिर साल 1920 में असहयोग आंदोलन तो इन बड़े आंदोलनों से लगभग एक दशक पहले उन्होंने अपने समर्थकों को अहिंसक आंदोलन के लिए तैयार करना शुरू कर दिया था। साल 1909 में उनकी किताब हिंस स्वराज छपी थी। जिसमें उन्होंने अहिंसक आंदोलन की वकालत की थी और जब वह आंदोलन करने उतरे तो उनके समर्थकों के लिए अहिंसा का विचार कोई नया नहीं था। लेकिन सीजेपी के मामले में कहानी थोड़ी अलग है क्योंकि उनके आंदोलन में अहिंसा की ऐसी कोई वैचारिक पृष्ठभूमि मौजूद नहीं है और यह बात सिर्फ आंदोलन करने वाले युवाओं पर ही नहीं इस आंदोलन के अगवा माने जाने वाले लड़कों पर भी लागू होती है। महात्मा गांधी सत्य पर भी उतना ही जोर देते थे और सीजेपी के प्रोटेस्ट में भी यह फर्क तब दिखता है जब इनके लीडर्स एक तरफ कहते हैं कि वह इस मंच को राजनीति का अखाड़ा नहीं बनने देंगे। लेकिन बाद में तमाम विपक्षी नेता उनके ही मंच से अपना स्कोर सेटल करते नजर आते हैं।&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 24 Jul 2026 14:07:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/is-sonam-wangchuk-betray-what-really-happened-behind-the-scenes</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[क्या प्रदर्शन में अपनी पहचान छिपा सिविल ड्रेस में तैनात हो सकते हैं पुलिसकर्मी,  SC के फैसले और कानून में 'Police Identity' पर क्या है नियम?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/can-police-personnel-be-deployed-in-plainclothes-concealing-their-identity]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>दिल्ली का जंतर-मंतर, गूंजते नारे और शिक्षा मंत्री के इस्तीफे पर अड़ा विपक्ष... लेकिन इस विरोध प्रदर्शन के बीच अब खाकी खुद कटघरे में खड़ी हो गई है। NEET पेपर लीक मामले में CJP के उग्र प्रदर्शन के दौरान 'सादे कपड़ों' और 'बिना नाम की पट्टियों' वाले पुलिसकर्मियों पर प्रदर्शनकारियों को बर्बरता से निशाना बनाने के गंभीर आरोप लगे हैं। सोशल मीडिया पर घिरने के बाद दिल्ली पुलिस मुख्यालय को बैकफुट पर आना पड़ा और 22 जुलाई को एक बड़ा फरमान जारी करना पड़ा कि प्रोटेस्ट साइट पर तैनात सभी जवान अनिवार्य रूप से अपनी पूरी वर्दी में रहेंगे। सवाल यह है कि क्या यह फैसला खाकी पर उठे सवालों को दबा पाएगा?</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/business/turmoil-in-stock-market-and-rising-crude-oil-prices-rupee-slides-to-a-low-of-9659-against-dollar" target="_blank">Share Market में कोहराम और Crude Oil के बढ़ते दाम, Dollar के मुकाबले 96.59 के रिकॉर्ड स्तर पर लुढ़का रुपया</a></h3><h2>CJP के विरोध प्रदर्शन के दौरान क्या हुआ?</h2><div>NEET पेपर लीक और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की मांग को लेकर 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) की ओर से आयोजित विरोध प्रदर्शन सोमवार को उम्मीद से कहीं ज़्यादा बड़ा हो गया। जब भीड़ संसद की ओर बढ़ी, तो पुलिस ने लाठीचार्ज किया, जिससे पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच हिंसक झड़पें हुईं। पुलिस और भीड़ में शामिल लोगों, दोनों को चोटें आईं। एक प्रदर्शनकारी अभी भी ICU में है। शाम तक सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो में सादे कपड़ों में कुछ अनजान लोग पुलिस वाली लाठियां लिए प्रदर्शनकारियों पर हमला करते दिखे। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने सोशल मीडिया पर दिल्ली पुलिस से सवाल किया, सादे कपड़ों में लाठी लिए ये गुंडे कौन हैं? हमें पीटने के लिए आपने किसे काम पर रखा है? कुछ और वीडियो में वर्दी पहने दिल्ली पुलिस और RAF के जवान बिना नेमप्लेट के दिखाई दिए। इन क्लिप्स में प्रदर्शनकारी अधिकारियों की वीडियो बनाते हुए उनसे पूछ रहे हैं, आपकी नेमप्लेट कहाँ है? प्लीज़ हमें जवाब दें, जबकि जवान कोई जवाब नहीं दे रहे हैं। दिल्ली पुलिस ने इन आरोपों या वीडियो पर सार्वजनिक रूप से कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। लेकिन 'द इंडियन एक्सप्रेस' को पता चला है कि फ़ोर्स ने निर्देश जारी किए हैं कि जंतर-मंतर पर तैनात सभी जवान वर्दी में ही रिपोर्ट करें, न कि आम कपड़ों में।&nbsp;</div><h2>दिल्ली पुलिस ने क्या आदेश जारी किया है?</h2><div>बुधवार शाम को, दिल्ली पुलिस ने विरोध प्रदर्शन वाली जगह पर कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए तैनात सभी कर्मचारियों को यूनिफॉर्म में ड्यूटी पर आने का निर्देश दिया।</div><div>अधिकारियों के मुताबिक, यह निर्देश सभी संबंधित यूनिट्स को दिया गया था, जिसमें अधिकारियों और कर्मचारियों से कहा गया कि वे विरोध प्रदर्शन वाली जगह पर कानून-व्यवस्था से जुड़ी ड्यूटी के दौरान यूनिफॉर्म पहनें। ये निर्देश तब आए जब सोशल मीडिया पर कई वीडियो वायरल हुए, जिनमें सादे कपड़ों में कुछ लोग सोमवार (20 जुलाई) को संसद तक मार्च के दौरान पुलिस की लाठियां लिए हुए प्रदर्शनकारियों पर हमला करते दिखे। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने सोशल मीडिया पोस्ट के ज़रिए दिल्ली पुलिस से सवाल किया सादे कपड़ों में लाठियां लिए ये गुंडे कौन हैं? हमें पीटने के लिए आपने किसे काम पर रखा है?एक और घटना में, कैमरे पर एक पत्रकार के साथ सादे कपड़ों में एक व्यक्ति मारपीट करता हुआ दिखाई दिया, जबकि दिल्ली पुलिस का एक हवलदार भी वहां मौजूद था। वह व्यक्ति सादे कपड़ों में था और उसने अपनी पहचान बताने या यह बताने से इनकार कर दिया कि वह किस अधिकार के तहत ऐसा कर रहा था।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/jordan-shoots-down-iranian-missiles-in-aqaba-heightened-tension-in-region-following-us-strikes" target="_blank">West Asia Crisis: Jordan ने Aqaba में मार गिराईं Iranian Missiles, US Strikes के बाद क्षेत्र में भारी तनाव</a></h3><h2>क्या अपनी पहचान छिपाना कानूनी है?</h2><div>हालांकि कुछ खास ऑपरेशन, जैसे कि खुफिया जानकारी जुटाने के काम में, पहचान छिपाने या किसी और का रूप धरने की असल में ज़रूरत होती है, लेकिन आम पुलिसिंग कानूनी प्रक्रियाओं और अदालती दिशानिर्देशों के आधार पर की जाती है। सार्वजनिक व्यवस्था और शांति बनाए रखने के नियम BNSS के चैप्टर XI (धारा 148 से 160, जो पहले CrPC का चैप्टर X था) में दिए गए हैं। हालांकि, इसमें साफ़ तौर पर यह नहीं बताया गया है कि कानून-व्यवस्था की स्थिति के दौरान पुलिसकर्मियों या सशस्त्र बलों के जवानों को अपनी पहचान बतानी ज़रूरी है या नहीं, लेकिन सूत्रों का कहना है कि कानून के तहत सिर्फ़ मजिस्ट्रेट या "पुलिस अधिकारी" ही भीड़ को तितर-बितर कर सकते हैं, जिससे उनकी पहचान ज़ाहिर होती है। तर्क यह है कि हथियारों से लैस अज्ञात लोगों की भीड़ कानूनी तौर पर किसी सार्वजनिक सभा को तितर-बितर होने के लिए नहीं कह सकती। दिल्ली में प्रैक्टिस करने वाले एक क्रिमिनल लॉयर ने कहा कि अगर किसी पुलिस अधिकारी की पहचान नहीं हो पा रही है, तो भीड़ को तितर-बितर करने का उसका आदेश कानूनी रूप से मान्य नहीं होगा। डीके बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (1997) मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने गिरफ्तारी और हिरासत के लिए विस्तृत सुरक्षा उपाय तय किए थे। इनमें यह शर्त भी शामिल थी कि गिरफ्तारी करने वाले अधिकारी की पहचान साफ ​​और आसानी से दिखने वाली होनी चाहिए। हालांकि यह फैसला गिरफ्तारी से जुड़ा था, न कि भीड़ को काबू करने से, लेकिन वकीलों का कहना है कि यह ज़बरदस्ती वाली शक्तियों का इस्तेमाल करते समय पुलिस अधिकारियों की पहचान ज़ाहिर होने पर न्यायपालिका के व्यापक ज़ोर को दिखाता है। अगस्त 2025 में आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने YSRCP विधायक नल्लापारेड्डी प्रसन्ना कुमार रेड्डी की याचिका पर सुनवाई करते हुए सवाल उठाया कि नागरिकों से यह कैसे उम्मीद की जा सकती है कि वे सादे कपड़ों में मौजूद कर्मियों को पुलिस अधिकारी के तौर पर पहचानें, जबकि वे अपनी सरकारी ड्यूटी कर रहे हों। रेड्डी, जिन पर पुलिस अधिकारी को ड्यूटी करने से रोकने का आरोप था, ने तर्क दिया था कि पुलिस अधिकारी वर्दी में नहीं थे।&nbsp;</div><h2>तो फिर पुलिस अपनी पहचान उजागर करने से क्यों बचती है?</h2><div>पुलिस अधिकारियों का तर्क है कि सार्वजनिक रूप से पहचान उजागर करने से कर्मियों को लंबे समय तक कानूनी कार्यवाही, ऑनलाइन उत्पीड़न और यहां तक ​​कि उनके परिवार को भी धमकियों का सामना करना पड़ सकता है। दिल्ली पुलिस के एक पूर्व अधिकारी ने कहा कि यह चलन जम्मू-कश्मीर, पंजाब और छत्तीसगढ़ जैसे संघर्ष वाले इलाकों से शुरू हुआ, जहाँ सुरक्षाकर्मी अक्सर नेमप्लेट या रैंक का निशान लगाने से बचते थे क्योंकि इससे उग्रवादियों के लिए उन्हें निशाना बनाना आसान हो सकता था। समय के साथ, ऐसा लगता है कि यह आम पुलिसिंग में भी शामिल हो गया है। उन्होंने आगे कहा कि हालाँकि सुरक्षा से जुड़ी असाधारण स्थितियों में यह चलन समझ में आता है, लेकिन कानून-व्यवस्था बनाए रखने की सामान्य ड्यूटी में इसे लागू करना विवाद का विषय बना हुआ है।</div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 23 Jul 2026 13:59:23 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/can-police-personnel-be-deployed-in-plainclothes-concealing-their-identity</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Iran के सपोर्ट में उतरे ऐसे खतरनाक लड़ाके, Bab-Al-Mandeb बंद,  MBS को अमेरिका बचा पाएगा? ]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/formidable-fighters-rally-in-support-of-iran-bab-el-mandeb-shut-dow]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>13 जुलाई 2026 को एक हवाई जहाज तेहरान से उड़ान भरकर यमन की तरफ बढ़ रहा था। उस हवाई जहाज में इंसार अल्लाह यानी हूती विद्रोहियों के अधिकारी सवार थे। ये अधिकारी ईरान में अयातुल्लाह अली खामनेई के जनाजे से लौट रहे थे। 13 जुलाई की शाम को जब प्लेन सना इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर उतरने ही वाला था कि तभी रनवे पर धड़ाधड़ कई मिसाइलें दागी गई। पूरा रनवे तबाह हो गया। ऐसे रनवे पर प्लेन का लैंड होना मुमकिन नहीं था। इसलिए आनन-फानन में प्लेन की डायरेक्शन मोड़ी गई और उसे सना की बजाए यमन के एक अन्य हवाई अड्डे हुदैदा में उतारा गया। हूती अधिकारी सुरक्षित अपने देश पहुंच चुके थे। लेकिन इस घटना ने ये सवाल खड़ा कर दिया था कि आखिर प्लेन की लैंडिंग के कुछ देर पहले किसने रनवे में हमला करवाया होगा। इसके पीछे क्या वजह रही होगी। हूतियों ने इसकी जांच की तो पता चला की इसके पीछे सऊदी अरब का हाथ है। ये पता चलने के फौरन बाद हूतियों ने सऊदी अरब पर हमला बोल दिया। सऊदी अरब के अभा एयरपोर्ट को निशाना बनाया गया। सऊदी अरब ने इस हमले की निंदा करते हुए बदला लेने की बात कही। लेकिन फिर कोई हमला सऊदी की तरफ से नहीं किया गया। हूती विद्रोहियों की तरफ से कहा गया कि अगर सऊदी ने कोई हमला किया तो उसके तेल भंडार और बंदरगाहों को तबाह कर दिया जाएगा। कई दिनों तक सऊदी और हूती एक दूसरे को धमका रहे थे। लेकिन 20 जुलाई को हूतियों ने ऐसा ऐलान कर दिया है, जिसने मोहम्मद बिन सलमान की नींद जरूर उड़ा दी होगी।</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/major-meeting-between-s-jaishankar-and-marco-rubio-in-manila" target="_blank">Manila में S Jaishankar और Marco Rubio की बड़ी बैठक: Trade, Tariffs और AI पर बनी नई रणनीति</a></h3><h2>&nbsp;बाब अल-मंदेब बंद!</h2><p>हूती सेना के प्रवक्ता या सारी ने 20 जुलाई को ऐलान किया कि वह सऊदी अरब के खिलाफ मेरिटाइम एंबागो लगाने जा रहे हैं। यानी उनके समुद्री व्यापार पर पूरी तरह से रोक लगा देंगे। इसके तहत हूती लाल सागर और अदन की खाड़ी को जोड़ने वाले बाब अल-मंदेब बंद करने की कोशिश करेंगे। हूतियों का कहना है कि वो सऊदी की तरफ से यमन पर लगाए गए ब्लॉकेड के जवाब में यह ब्लॉकेड लगा रहे हैं। यह भी स्ट्रीट ऑफ हॉर्मोस की तरह ही एक अहम ग्लोबल शिपिंग पॉइंट है। दुनिया का लगभग 15% समुद्री व्यापार इसी रास्ते से होकर गुजरता है। हुतियों ने अभी केवल सऊदी के जहाजों पर रोक लगाने का ऐलान किया है। बाकी किसी जहाज पर कोई भी पाबंदी नहीं है। पर इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ना तय है। स्टेट ऑफ फार्मर्स बंद होने के बाद सऊदी अरब के तेल एक्सपोर्ट के लिए बाब अल-मंदेब अहम रास्ता बन गया था। ऐसे में अगर सऊदी का व्यापार वहां से रुकता है तो तेल की सप्लाई में और भी ज्यादा कमी आ जाएगी। न्यूज़ एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक बाबल मंदीप स्टेट को पूरी तरह बंद करने से ग्लोबल तेल सप्लाई 7% तक कम हो जाएगी। इस बीच अमेरिका ने पहली बार ईरान के साथ दोबारा शुरू हुई झड़प में घायल हुए सैनिकों की जानकारी दी है। अमेरिकी रक्षा विभाग पेंटागन ने बताया कि 7 जुलाई से अब तक लगभग 100 सैनिक घायल हुए हैं। पेंटागन ने अमेरिकी मीडिया की ओर से घायल सैनिकों की जानकारी छिपाए जाने के आरोप के बाद यह जवाब दिया है। मीडिया में कहा जा रहा था कि सरकार ना तो अपने बुलेटिन में घायल सैनिकों की जानकारी दे रही है और ना ही यह बता रही है कि कितने हथियार खर्च किए हुए हैं। पेंटागन ने इन आरोपों से इंकार किया है। कहा है कि हाल में घायल सैनिकों में से अधिकतर को मामूली चोटें आई थी। 96% से ज्यादा सैनिक सर्विस पर वापस लौट भी आए हैं।&nbsp;</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/high-level-meeting-amidst-iran-tensions-doval-holds-secret-meeting-with-saudi-arabia" target="_blank">Iran से बवाल के बीच बड़ी बैठक, सऊदी के साथ डोभाल ने की सीक्रेट मीटिंग</a></h3><h2>सऊदी के लिए लाल सागर इतना महत्वपूर्ण कैसे हो गया?</h2><p>ईरान युद्ध के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य में रुकावटों के बाद, सऊदी अरब ने अपने कच्चे तेल के निर्यात का ज़्यादातर हिस्सा फारस की खाड़ी से हटाकर लाल सागर की ओर मोड़ दिया। अब सऊदी अरामको के कच्चे तेल के निर्यात का 70 प्रतिशत से अधिक हिस्सा देश के भीतर 746 मील लंबी ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन के ज़रिए पहुँचाया जाता है। यह पाइपलाइन तेल उत्पादन वाले अबकैक और घावर जैसे पूर्वी क्षेत्रों को यानबू में स्थित लाल सागर के निर्यात टर्मिनल से जोड़ती है। इस बदलाव ने यानबू को सऊदी अरब का मुख्य एक्सपोर्ट हब बना दिया है। हाल के शिपिंग डेटा से पता चलता है कि यानबू से एक्सपोर्ट हाल के हफ़्तों में औसतन लगभग 4 मिलियन बैरल प्रति दिन रहा है, जबकि एक साल पहले यह लगभग 973,000 बैरल प्रति दिन था। जून तक, कुछ अनुमानों के अनुसार यानबू से कच्चे तेल का एक्सपोर्ट रिकॉर्ड 4.77 मिलियन बैरल प्रति दिन तक पहुँच गया। यूरोप जाने वाले सऊदी टैंकर स्वेज नहर से होते हुए उत्तर की ओर जाते हैं, जबकि एशियाई बाज़ारों के लिए जाने वाले कार्गो बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य से होते हुए दक्षिण की ओर जाते हैं। होर्मुज़ जलडमरूमध्य में पहले से ही रुकावटें होने के कारण, रेड सी दुनिया भर में तेल की सप्लाई बनाए रखने के लिए सऊदी अरब का मुख्य वैकल्पिक रास्ता बन गया है। खबर है कि सऊदी अरब इस वैकल्पिक एक्सपोर्ट कॉरिडोर को मज़बूत करने के लिए रेड सी तट तक अपने पाइपलाइन नेटवर्क का विस्तार करने पर भी विचार कर रहा है।</p><h2>क्यों है बाब अल मंदेब का अहम</h2><p>इस रास्ते का महत्व आज का नहीं है। करीब 3000 साल पहले भी मिस्र, अरब, भारत और पूर्वी अफ्रीका के बीच जो मसालों, सोना, लोबान और रेशम का जो व्यापार था इसी समंदर के रास्ते से होता था। बाद में रोमन साम्राज्य, अरब व्यापारियों, उस्मानी साम्राज्य और फिर यूरोपीय औपनिवेशिक शक्तियों ने भी इसी रास्ते का इस्तेमाल किया था। लेकिन जब 1869 में स्वेज नहर खुली तब बाबल मंदब की जो भूमिका थी वो और बढ़ गई। इसकी अहमियत और बढ़ गई और फिर इसे समुद्री बहुत इंपॉर्टेंट महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में दुनिया के गिना जाने लगा। इसकी ये वजह थी क्योंकि अब जहाजों को अफ्रीका का चक्कर लगा के नहीं जाना पड़ता था और एशिया से यूरोप की जो दूरी थी वो हजारों किलोमीटर कम हो गई थी। आज इसी रास्ते से दुनिया का लगभग 10 से 12% समुद्री व्यापार गुजरता है। ओआरएफ की रिपोर्ट में जिक्र मिलता है कि हर साल यहां से एक ट्रिलियन डॉलर का सामान गुजरता है। भारतीय रुपयों में यह रकम करीब ₹87 लाख करोड़ की होती है। अगर तेल और गैस को भी इसमें जोड़ दिया जाए तो यह रकम और ज्यादा हो जाएगी। सामान्य परिस्थितियों में जैसे 2023 में हम देखते हैं गजा वॉर के पहले यहां से लगभग 93 लाख बैरल प्रतिदिन कच्चा तेल और पेट्रोलियम के जो प्रोडक्ट्स थे वो इसी रास्ते से गुजरते थे। लेकिन हूती विद्रोहियों ने गजा में इसराइली हमलों के विरोध में यहां से गुजरने वाले जहाजों पर हमला शुरू कर दिया।&nbsp;</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/several-of-trump-drones-and-fighter-jets-destroyed-india-takes-major-action-in-iran" target="_blank">ट्रंप के कई ड्रोन, लड़ाकू विमान तबाह, ईरान में भारत का बड़ा एक्शन</a></h3><h2>कौन-कौन से देश अपना सामान भेजते हैं?&nbsp;</h2><p>चीन इस रास्ते का सबसे ज्यादा इस्तेमाल करता है। चीन से यूरोप जाने वाले इलेक्ट्रॉनिक्स, मोबाइल फोन, कंप्यूटर, सोलर पैनल, मशीनें, खिलौने सब यहीं से जाते हैं। यूरोप भी एशियाई देशों को यहीं से सामान बेचता है। महंगी महंगी यूरोपियन कंपनी की जो कारें हैं, विमान के पुरजे हैं, मशीनें हैं, लग्जरी सामान हैं वो सब यहीं से होकर गुजरता है। सोचिए इतना जरूरी रास्ता है यह। और इसी रास्ते पर अब सऊदी अरब के जहाजों को उड़ाने की धमकी मिल रही है। अगर एक भी सऊदी अरब के जहाज को होती सक्सेसफुली टारगेट कर लेते हैं तो दूसरे जहाज भी यहां से गुजरने से डरेंगे और करोड़ों डॉलर का व्यापार ठप्प पड़ सकता है। इस इस वजह से सऊदी अरब औरतियों के बीच पिछले 4 साल से एक सीज फायर चल रहा था।&nbsp;</p><h2>हूती गुट की नाकेबंदी से तेल की सप्लाई में कैसे रुकावट आ सकती है?</h2><p>हालांकि हूथियों ने यह साफ़ नहीं किया है कि वे अपनी समुद्री नाकेबंदी को असल में कैसे लागू करेंगे, लेकिन इस घोषणा से यह डर बढ़ गया है कि लाल सागर से गुज़रने वाले कमर्शियल जहाज़ एक बार फिर हमले का निशाना बन सकते हैं। बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य लाल सागर का दक्षिणी प्रवेश द्वार है और यह दुनिया के सबसे अहम समुद्री 'चोकपॉइंट' (संकरे और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण समुद्री रास्ते) में से एक है। अगर इसे बंद किया जाता है या इसमें लंबे समय तक रुकावट आती है, तो एक अभूतपूर्व स्थिति पैदा हो जाएगी जिसमें होर्मुज जलडमरूमध्य और बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य, दोनों पर एक साथ पाबंदियां लग जाएंगी। यानबू से एशिया तक कच्चा तेल ले जाने वाले टैंकरों के लिए बाब अल-मंदेब से गुज़रना ज़रूरी है। इस रास्ते पर होदेइदाह और अदन की खाड़ी के पास काम कर रही हूथी एंटी-शिप मिसाइलों, बैलिस्टिक मिसाइलों, ड्रोन और बिना चालक वाले समुद्री जहाजों से खतरा हो सकता है। यहाँ तक कि स्वेज नहर के ज़रिए यानबू से उत्तर की ओर यूरोप जाने वाले जहाजों को भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं माना जा सकता, क्योंकि लाल सागर के अंदर शिपिंग लेन या तेल से जुड़े बुनियादी ढांचे पर संभावित हमलों की चिंता बनी हुई है। एक और चिंता यानबू शहर के सुरक्षित न होने की है। यह बंदरगाह हूथी-कब्जे वाले उत्तरी यमन से लगभग 800 मील उत्तर-पश्चिम में स्थित है और 2022 के समझौते से पहले हूथी हमलों का शिकार हो चुका है। जानकारों का कहना है कि अगर स्टोरेज टैंक, लोडिंग टर्मिनल या पंपिंग स्टेशन पर लंबी दूरी के ड्रोन या मिसाइल से सफल हमले होते हैं, तो सऊदी के एक्सपोर्ट के काम पर सीधा असर पड़ सकता है। अगर इंश्योरेंस प्रीमियम बढ़ते रहे या इंश्योरेंस कंपनियां युद्ध के जोखिम का कवरेज पूरी तरह से बंद कर दें, तो शिपिंग कंपनियां ज़्यादा जोखिम वाले इलाकों में अपने जहाज़ भेजने से हिचकिचा सकती हैं। ऐसी स्थिति में कई जहाज़ों को रेड सी के बजाय केप ऑफ़ गुड होप होते हुए अफ्रीका का चक्कर लगाकर जाना पड़ सकता है।</p><h2>क्या अमेरिका देगा साथ</h2><p>हूतियों से अकेले उलझना सऊदी अरब के लिए इस बार मुश्किल होगा। ऊपर से इस बात में भी संशय बना हुआ है कि क्या मुसीबत की घड़ी में अमेरिका उसे बचाने आएगा? सऊदी अरब को बचाने आएगा? क्योंकि हॉर्मूस खोलने की मुहिम में तो सऊदी अरब ने अमेरिका को ऐन वक्त में धोखा दे दिया था। उसे अपने एयरबेस का इस्तेमाल नहीं करने दिया था। जिसकी वजह से अमेरिका का पूरा का पूरा ऑपरेशन ही फेल हो गया था। ऐसे में देखना होगा कि सऊदी अरब इस समस्या को कैसे सुलझाता है।&nbsp;&nbsp;</p>]]></description>
      <pubDate>Wed, 22 Jul 2026 14:03:49 +0530</pubDate>
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      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[देश के 22 करोड़ मुसलमान अब करेंगे चुनाव का बहिष्कार? ओवैसी-खुर्शीद-मदनी समेत मुस्लिम नेताओं  के 24 जुलाई को दिल्ली वाली बैठक का एजेंडा क्या है!]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/will-the-country-220-million-muslims-now-boycott-the-elections]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>दिल्ली की सियासत में इन दिनों दो अलग-अलग मोर्चों पर बड़ी हलचल देखने को मिल रही है। एक तरफ जहां 'कॉकरोच जनता पार्टी' (सीजेपी) के बैनर तले युवाओं और छात्रों का प्रदर्शन सड़क पर उग्र रूप ले रहा है और सरकार के खिलाफ तीखी नारेबाजी हो रही है, वहीं दूसरी तरफ अंदरखाने एक अलग ही राजनीतिक रणनीति तैयार की जा रही है। प्रमुख मुस्लिम नेताओं और धर्मगुरुओं की अगुवाई में एक ऐसा एजेंडा आकार ले रहा है, जिसकी गूंज आने वाले दिनों में देश की सियासत को गरमा सकती है।&nbsp; सवाल यह उठ रहा है कि क्या एक तरफ छात्रों के आंदोलन और दूसरी तरफ इस नई गोलबंदी के बीच लोकतंत्र की आड़ में सरकार पर दबाव बनाने या कोई नया मोर्चा खोलने की तैयारी है? क्या यह सब महज संयोग है या लोकतांत्रिक व्यवस्था के तहत सरकार पर चौतरफा दबाव बनाने की कोई बड़ी पटकथा? आइए समझते हैं राजधानी दिल्ली में बन रहे इस नए सियासी समीकरण का पूरा गणित। दरअसल इंडियन मुस्लिम फॉर सिविल राइट्स यानी आईएमसीआर नामक संगठन ने आगामी 24 जुलाई को दिल्ली में एक बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण बैठक का ऐलान कर दिया है। इस बैठक में मुस्लिम समुदाय की कई बड़ी और जानीमानी हस्तियों के छूटने की खबर है। कहा तो यह भी जा रहा है कि इस मंच पर कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद और एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी समेत कई राजनीतिक दलों के मुस्लिम सांसद एक साथ नजर आएंगे। यानी मंच बड़े लेवल पर सजाया जाएगा। इतना ही नहीं जमात इस्लामी, जमात अहले हदीस और ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल अवार्ड जैसे प्रभावशाली संगठनों के नुमाइंदे भी इस चर्चा का हिस्सा बनने जा रहे हैं।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/mri/scientist-or-activist-the-real-story-of-sonam-wangchuk" target="_blank">पिता का अनशन तुड़वाने दिल्ली से खुद इंदिरा चलकर आईं, क्या है सोनम वांगचुक का असली सच?</a></h3><h2>क्यों हुलाया गया सम्मेलन</h2><div>यह कोई आम सम्मेलन नहीं है बल्कि यह सम्मेलन इसलिए बुलाया गया है ताकि देश के मुसलमानों को लोकतंत्र के खिलाफ खड़ा किया जा सके। करोड़ों मुसलमानों को चुनाव के बहिष्कार के लिए उकसाया जा सके। आप सोच रहे होंगे कि आखिर मुसलमानों के बड़े ठेकेदार रहनुमा इकट्ठा होकर क्या करने वाले हैं? क्या भारत के खिलाफ मोदी सरकार के खिलाफ कोई बड़ी साजिश रचने की प्लानिंग हो रही है? दरअसल बैठक के आधिकारिक एजेंडे में मदरसे पर होने वाली प्रशासनिक कारवाई, समान नागरिक संहिता यानी यूसीसी और मुस्लिम समुदाय से जुड़े अन्य मुद्दे बुलडोजर एक्शन को शामिल किया गया है। लेकिन इस पूरे सम्मेलन में जो बात सबसे ज्यादा ध्यान खींचती है और जो सबसे ज्यादा चौंकाने वाली है वो है चुनाव का बहिष्कार।&nbsp; चुनाव का बहिष्कार। अब सवाल यह है कि कौन करने वाला है चुनाव का बहिष्कार? क्या मुस्लिम अब वोट नहीं डालेंगे? संगठन की ओर से यह संकेत दे दिए गए हैं कि इस बैठक में महात्मा गांधी के ऐतिहासिक असहयोग आंदोलन की तर्ज पर मुस्लिम समुदाय के जरिए चुनावी प्रक्रिया का पूरी तरह से बहिष्कार करने की रणनीति पर चर्चा की जाएगी। कभी सोचा है कि जब से मोदी सरकार सत्ता में आई है तब से सबसे ज्यादा तकलीफ किसे हो रही है?</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/mri/120-resignations-government-swings-into-immediate-action-why-is-there-an-exodus-at-isro" target="_blank">120 इस्तीफे...एक्शन में आई सरकार, ISRO में भगदड़ क्यों मची है? भारत की 'स्पेस मिस्ट्री' का MRI स्कैन</a></h3><h2>मसलमान करेंगे चुनाव का बहिष्कार?</h2><div>विपक्षी दलों को और उनसे भी ज्यादा मुसलमानों को, मौलानाओं को जिनकी दुकान पर हथौड़ा चल रहा है। वही बार-बार चिल्लाते हैं, बैठक बुलाते हैं, माहौल गरमाते हैं। किसी ना किसी बहन मुसलमानों को इकट्ठा कर सरकार के खिलाफ भड़काने की कोशिश में लग जाते हैं। अब देखिए ना यह जो बैठक बुलाई जा रही है, इसमें क्या मुद्दे उठाए जा रहे हैं। गौर से सुनिए। मदरसों पर चल रहे बुलडोजर एक्शन। बुलडोजर एक्शन मजहब देखकर नहीं बल्कि अवैध चीजें देखकर किया जा रहा है। फिर चाहे उसकी जद में मस्जिद आए या फिर मंदिर आए। दस्तावेज है तो बच जाएंगे। नहीं है अवैध है तो जाहिर सी बात है बुलडोजर की जद में जाएंगे। लेकिन इस चीज से ना तो हिंदुओं को दिक्कत है। इस चीज से ना तो अवैध कारनामे जो कर रहे हैं उन्हें दिक्कत हो रही है। लेकिन दिक्कत किसे हो रही है?&nbsp; देश भर में यूसीसी कानून का भी मुसलमान ही विरोध कर रहे हैं। जब एक देश है तो सभी धर्मों के लिए एक कानून क्यों नहीं हो सकता? जबकि इस कानून से बेटियों को उनका हक मिल रहा है। तलाक शादी के नियम बन रहे हैं। कुप्रथाएं बंद हो रही हैं। लेकिन फिर भी चंद मुसलमानों को दिक्कत है। सिर्फ इतना ही नहीं। अब उत्तराखंड में मदरसा बोर्ड के खत्म करने पर ही आ जाते हैं। क्या कोई बच्चा धार्मिक शिक्षा के साथ-साथ बाकी शिक्षा ग्रहण करेगा? डॉक्टर इंजीनियर बनेगा तो किसी को तकलीफ होगी? नहीं। जाहिर सी बात है नहीं होगी। फिर इस चीज से चंद मुसलमानों को तकलीफ क्यों हो रही है?&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/mri/a-dent-in-the-russia-india-nuclear-partnership-why-kudankulam-is-back-in-the-headlines" target="_blank">रूस-भारत की परमाणु साझेदारी में सेंध? क्यों कुडनकुलम फिर से सुर्खियों में है</a></h3><h2>क्या हो सकता है इसका असर</h2><div>अगर सरकार निशाना बनाती या फिर अनदेखी करती हर चीज की सुविधा ना मिलती। बोलने की आजादी ना मिलती। हर चीज का तो हक मिल रहा है। अब देखिए ना इसी तकलीफ को लेकर मुसलमानों के ठेकेदार मंच सजा रहे हैं और मुसलमानों को ही भड़काने के लिए साजिश रचते नजर आ रहे हैं। जब कहीं मुसलमानों को भड़काकर देश के लोकतंत्र के खिलाफ किया गया कोई विरोध प्रदर्शन खड़ा किया जाता है तो उसका कितना नेगेटिव असर हुआ है चलिए इस पर भी आ जाते हैं। आयोजकों का सीधा-सीधा तर्क है। राजनीतिक दलों के जरिए मुसलमानों की लगातार की जा रही अनदेखी के विरोध में यह कदम उठाया जा सकता है। लेकिन यहां एक बड़ा और बुनियादी सवाल खड़ा होता है कि क्या इस तरह की अपीलों से देश का ही नुकसान नहीं होगा? जिस लोकतंत्र ने स्वतंत्र भारत को एक सूत्र में पिरोकर रखा क्या उसके बहिष्कार से किसी मुस्लिम समुदाय का भला हो सकता है? इतिहास गवाह है कि जब भी मजहब या पंथ के आधार पर लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं से दूरी बनाने का प्रयास किया गया है। उसके परिणाम हमेशा नकारात्मक यानी नेगेटिव ही रहे हैं। तो ऐसे में अगर हम अतीत के पन्नों को पलटे तो ऐसी रूढ़िवादी और अलगाववादी सोच के परिणाम साफ दिखाई देते हैं। पड़ोसी देश पाकिस्तान की शह पर कश्मीर में हुरियत जैसे अलगाववादी गुटों ने कई बार चुनावों के बहिष्कार का नारा दिया था।&nbsp;</div><h2>2005 में इराक के सुन्नी मुसलमानों ने किया था चुनाव का बहिष्कार</h2><div>कश्मीर के आम नागरिक लंबे समय तक एक स्वस्थ और पारदर्शी लोकतांत्रिक प्रक्रिया से मरहूम रहे और वहां तो विकास की रफ्तार भी थमी रही। आपने देखा होगा वैश्विक स्तर पर देखें तो साल 2005 में इराक के सुन्नी मुसलमानों ने अमेरिकी प्रभाव का आरोप लगाते हुए चुनाव का पूरी तरह से बहिष्कार कर दिया था। इस बहिष्कार का परिणाम क्या हुआ सबने देखा। संसद में सुन्नी समुदाय का प्रतिनिधित्व किसी गिनती में नहीं रहा। जिससे देश में शिया सुन्नी टकराव की एक नई और हिंसक लहर शुरू हो गई। और इसी तरह साल 2014 में बहरीन के शिया मुसलमानों ने भी वही रास्ता चुना जिसके कारण वहां सुन्नी मुस्लिम दलों ने एक तरफ़ा जीत हासिल की और वहां का विपक्ष आज तक राजनीतिक रूप से खुद को स्थापित करने के लिए संघर्ष कर रहा है। इन तमाम वैश्विक और घरेलू उदाहरणों से यह साफ है कि लोकतंत्र से दूरी बनाना कभी भी किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकता।&nbsp;</div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 21 Jul 2026 13:41:51 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/will-the-country-220-million-muslims-now-boycott-the-elections</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[पिता का अनशन तुड़वाने दिल्ली से खुद इंदिरा चलकर आईं, क्या है सोनम वांगचुक का असली सच?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/scientist-or-activist-the-real-story-of-sonam-wangchuk]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>यह कहानी उस अपराजेय डोगरा सेनापति की है, जिसने उत्तर के दुर्जय शिखरों और बर्फीली वादियों को चीरकर भारत की सीमाओं का ऐसा विस्तार किया जिसकी मिसाल इतिहास में विरली ही मिलती है। कहलूर रियासत के एक साधारण से गाँव में जन्मे और ज़मीन के पारिवारिक विवाद के कारण अपना घर छोड़ने वाले जोरावर सिंह कहलुरिया ने हरिद्वार के मैदानों से लेकर जम्मू के दुर्गम क्षेत्रों तक न सिर्फ युद्ध की कलाएँ सीखीं, बल्कि महाराजा रणजीत सिंह, राजा संसार चंद और डोगरा राजा गुलाब सिंह जैसे महान शासकों के भरोसे को जीतकर अपने पराक्रम का लोहा मनवाया। भीमगढ़ किले की कमान से लेकर किश्तवाड़ की गवर्नरशिप तक का सफर तय करने वाले इस वीर की तलवार ने साल 1834 में जब लद्दाख के बर्फीले रास्तों का रुख किया, तो उसने तिब्बत से अफगानिस्तान तक फैले व्यापारिक मार्गों की तकदीर और डोगरा साम्राज्य की सीमाओं का इतिहास हमेशा-हमेशा के लिए बदलकर रख दिया। लद्दाख आधिकारिक तौर पर हमेशा के लिए जम्मू की डोगरा रियासत का हिस्सा बन गया और फिर जम्मू कश्मीर के साथ ही सन 47 में लद्दाख भारत का हिस्सा बना। कट टू आजादी के 72 साल बाद तारीख 5 अगस्त 2019 जगह देश की संसद जहां देश भर से चुनकर आए जनता के प्रतिनिधि बैठे हैं लेकिन एक सांसद महोदय खड़े हैं। देश के गृह मंत्री अमित शाह सफेद कुर्ता और गाढ़े भूरे रंग की सदरी। हाथ में कागजों का पुलिंदा है। जिनमें अलग-अलग पन्नों पर स्टिकी नोट्स चसपा थे। इन कागजों को हाथ में लिए अमित शाह जम्मू कश्मीर से जुड़े दो बिल और दो प्रस्ताव पेश करते हैं। यह बिल और प्रस्ताव पास होते ही जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 हमेशा के लिए खत्म हो जाता है। साथ ही जम्मू कश्मीर को दो भागों में बांट दिया जाता है। दोनों को ही केंद्र शासित प्रदेश बना दिया जाता है। पहला जम्मू कश्मीर विधानसभा के साथ, और दूसरा लद्दाख बगैर विधानसभा के।&nbsp; जो लद्दाख सेनाओं की लड़ाई के बाद जम्मू कश्मीर का हिस्सा बनाया गया था, उसे एक बार फिर कश्मीर से अलग कर दिया गया। इस फैसले को लद्दाख में खुशखबरी की तरह सेलिब्रेट किया गया। सेलिब्रेशन का पहला बयान आया लद्दाख के एक इंजीनियर, साइंटिस्ट, शिक्षाविद और सोशल एक्टिविस्ट की तरफ से जिन्हें हिंदुस्तान ने उनके असली नाम से कम और आमिर खान की फिल्म से मिले नाम से ज्यादा जाना। थ्री इडियट्स वाले फुनसुक बांगरु। असली नाम सोनम वांगचुक। वांगचुक ने 5 अगस्त 2019 की रात सोशल मीडिया पर लिखा, प्रधानमंत्री जी आपका धन्यवाद। लद्दाख नरेंद्र मोदी और पीएमओ का धन्यवाद करता है और उन्होंने लद्दाख के लंबे समय से चले आ रहे सपने को पूरा किया। ठीक 30 साल पहले अगस्त 1989 में लद्दाख के नेताओं ने केंद्र शासित प्रदेश यानी यूटी का दर्जा पाने के लिए आंदोलन शुरू किया था। उन सभी का धन्यवाद जिन्होंने इस लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण में मदद की। लेकिन बहुत जल्द सोनम वांगचुक का शुक्राना अंदाज बदल जाता है और वह कहने लगते हैं कि इससे तो बेहतर था कि हम जम्मू कश्मीर का ही हिस्सा रहते। अब सोनम वांगचुक एक बार फिर से चर्चा में हैं। दिल्ली के जंतर-मंतर पर अनशन पर बैठे सोशल एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक अब अस्पताल में भर्ती हैं। पुलिस दिल्ली हाई कोर्ट का निर्देश का हवाला देते हुए 18 जुलाई को उन्हें जबरन सफ़दरजंग अस्पताल ले गई थी। अस्पताल में उन्होंने ड्रिप या मुंह से कोई भी तरल पदार्थ लेने से इनकार कर दिया है और कहा है कि उनका अनशन जारी रहेगा। लेकिन उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म एक्स पर पोस्ट कर अपना अनशन ख़त्म करने के लिए तीन शर्तें रखीं। सोनम वांगचुक ने जो शर्तें रखी हैं उनमें कहा गया है कि सरकार प्रश्नपत्र लीक होने जैसी घटनाओं समेत शिक्षा व्यवस्था की 'हाल की नाकामियों' का जिम्मा लेती है या फिर राजनीतिक दल संसद में इस मुद्दे को उठाने का भरोसा देते हैं या फिर अलग-अलग दलों के सांसद और नेता अस्पताल आकर उनसे मिलकर आश्वासन देते हैं तो वो अपना अनशन ख़त्म कर देंगे। ऐसे में आइए जानते हैं कि सोनम वांगचुक आखिर है कौन? टाइम मैगजीन ने सोनम वांगचुक को लेकर क्या कहा था? वांगचुक को किस काम के लिए रमन मैक्से अवार्ड मिला था? सोनम वांगचुक को एनएसए के तहत क्यों गिरफ्तार किया गया था?</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/cjp-protest-cockroach-janata-party-members-march-to-lay-siege-to-parliament-clash-with-police" target="_blank">CJP Protest: संसद घेरने चले कॉकरोच जनता पार्टी के लोग, Police से हुई तीखी झड़प</a></h3><h2>रेंचो का किरदार, जंतर-मंतर का अनशन और शुरुआती सफर</h2><div>साल 2009 में एक फिल्म आई थी। फिल्म का नाम था थ्री इडियट्स। मशहूर डायरेक्टर राजकुमार हिरानी ने इस फिल्म को डायरेक्ट किया था। फिल्म में आमिर खान, आर माधवन, शर्मन जोशी और करीना कपूर सहित कई काबिल एक्टर्स थे। 3 इडियट्स फिल्म में एक डायलॉग है। बेटा काबिल बनो काबिल। कामयाबी तो झक मार के पीछे आएगी। फिल्म का यह मशहूर डायलॉग रेंचो नाम का किरदार बोलता है। इस किरदार को आमिर खान ने बेहतरीन तरीके से पर्दे पर निभाया। कहा जाता है कि आमिर खान का यह किरदार लद्दाख के शिक्षाविद सोनम वांगचुक से प्रेरित है। हालांकि आमिर खान सोनम वांगचुक दोनों ने इस बात को खारिज किया है कि फिल्म का किरदार रॉनचो वांगचुक से प्रेरित है। लेकिन स्पष्टीकरण फिल्म आने के बहुत दिन बाद आया था। संयोग देखिए कि यही सोनम वांगचुक दिल्ली के जंतरमंतर पर 20 दिनों से आमरण अनशन पर बैठे थे। उनका कहना है कि बच्चे तभी काबिल बन पाएंगे जब देश की शिक्षा व्यवस्था में से बेईमानी खत्म होगी और पेपर लीक जैसी समस्या का समाधान होगा। सोनम वांगचुक के जीवन की कहानी भी बेहद दिलचस्प है। अमेरिका की मशहूर पत्रिका टाइम मैगजीन ने द 100 मोस्ट इन्फ्लुएंशियल क्लाइमेट लीडर्स ऑफ 2025 नाम से एक लिस्ट जारी की। इस लिस्ट में सोनम वांगचुक का भी नाम शामिल था। मैगजीन ने नाम के साथ सोनम वांगचुक का परिचय देते हुए जो कहा वह पढ़ने लायक है। वांगचुक एक इंजीनियर, शिक्षाविद और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। पिछले महीने उन्हें लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने के प्रदर्शन के चलते गिरफ्तार किया गया था। वांगचुक पिछले एक दशक से प्राचीन सांस्कृतिक परंपरा कृत्रिम ग्लेशियर बनाने में नई वैज्ञानिक तकनीकों को शामिल करने का काम कर रहे हैं। सोनम वांगचुक किसी भी परिचय के मोहताज नहीं है। पिछले कुछ सालों में वह लगातार चर्चा में बने हुए हैं।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/police-lathi-charge-cjp-protesters-demonstrators-begin-behaving-bizarrely" target="_blank">CJP प्रोटेस्ट पर पुलिस लाठीचार्ज, अजीब-अजीब हरकतें करने लगे प्रदर्शनकारी</a></h3><h2>42 साल पहले इंदिरा गांधी ने खुद तुड़वाया था अनशन!</h2><div>सोनम वांगचुक आज देश भर में चर्चा का नाम है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिस परिवार से सोनम वांगचुक आते हैं उस परिवार का आंदोलन और लद्दाख की राजनीति से रिश्ता आज का नहीं बल्कि 40 साल से भी ज्यादा पुराना है। आज जिस तरह सोनम वांगचुक भूख हड़ताल पर बैठे हैं, ठीक उसी तरह 42 साल पहले उनके पिता भी अनशन पर बैठे थे। फर्क सिर्फ इतना था कि उस वक्त देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी खुद दिल्ली से लेह पहुंच गई थी और अपने हाथों से उनका अनशन तुड़वाया था। सोनम वांगचुक के पिता का नाम था सोनम वांग्याल। सोनम वांग्याल सिर्फ एक राजनेता नहीं थे बल्कि लद्दाख की पहचान और अधिकारों के लिए लड़ने वाले प्रमुख नेताओं में गिने जाते थे। 1975 में वे जम्मू कश्मीर विधानसभा के सदस्य बने और बाद में राज्य सरकार में मंत्री भी रहे। यही वह दौर था जब लद्दाख के लोगों को लगता था कि उनकी आवाज श्रीनगर की राजनीति में दब जाती है। लद्दाख के लोगों की सबसे बड़ी मांग थी कि उन्हें अनुसूचित जाति यानी कि शेड्यूल ट्राइब का दर्जा मिले ताकि शिक्षा, नौकरी और राजनीतिक प्रतिनिधित्व में उन्हें संवैधानिक सुरक्षा मिल सके। यही मांग आगे चलकर एक बड़े जन आंदोलन में बदल गई। साल था 1984। सोनम वांग्याल ने लद्दाख के लोगों के अधिकारों की मांग को लेकर भूख हड़ताल शुरू कर दी। उनकी मांग साफ थी कि लद्दाख को अनुसूचित जनजाति यानी एसटी का दर्जा दिया जाए। अनशन लंबा खिसने लगा। जैसे-जैसे उनकी तबीयत बिगड़ती गई, मामला दिल्ली तक पहुंच गया। उस समय देश की प्रधानमंत्री थी इंदिरा गांधी। रिपोर्टों के मुताबिक मामला इतना गंभीर हो गया कि इंदिरा गांधी खुद लेह पहुंची। सोनम बांगियाल से मुलाकात की और उन्हें भरोसा दिलाया कि उनकी मांग पर गंभीरता से विचार किया जाएगा। इसके बाद उन्होंने अपने हाथों से जूस पिलाकर उनका अनशन तुड़वाया।&nbsp;&nbsp;</div><h2 style="font-family: &quot;Source Sans Pro&quot;, -apple-system, BlinkMacSystemFont, &quot;Segoe UI&quot;, Roboto, &quot;Helvetica Neue&quot;, Arial, sans-serif, &quot;Apple Color Emoji&quot;, &quot;Segoe UI Emoji&quot;, &quot;Segoe UI Symbol&quot;; color: rgb(0, 0, 0);">सिसमोल की स्थापना, 'ऑपरेशन न्यू होप' और सामाजिक पहल</h2><div>भारत के उत्तरी कोने पर बसा लद्दाख अब एक केंद्र शासित प्रदेश यानी यूनियन टेरिटरी है। लेकिन साल 2019 से पहले तक वह जम्मू कश्मीर राज्य का हिस्सा हुआ करता था। इसी लद्दाख के लेह जिले के अलची के पास साल 1966 में सोनम वांगचुक का जन्म हुआ। वांगचुक एक इंटरव्यू में बताते हुए कहते हैं कि उनका गांव बहुत छोटा था। केवल पांच ही घर थे गांव में। वहां कोई भी स्कूल नहीं था। 9 साल तक वह किसी भी स्कूल में नहीं गए। 9 साल की उम्र में वांगचुक का दाखिला श्रीनगर के एक स्कूल में करवाया गया। इसके बाद उन्होंने दिल्ली के एक केंद्रीय विद्यालय से पढ़ाई की।&nbsp;</div><div>12वीं करने के बाद वांगचुक दोबारा से श्रीनगर लौटे। यहां उन्होंने नेशनल इंस्टट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी यानी एनआईटी श्रीनगर से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में बीटेक किया। जब वांगचुक बीटेक कर रहे थे तो साल 1987 का था। इसी दौरान उनकी दिलचस्पी मशीनों में बढ़ी और वांगचुक ने किताबों की थ्योरी रटने के बजाय स्किल सीखने और सिखाने पर जोर दिया। वांगचुक की इंजीनियरिंग की पढ़ाई जब खत्म हुई तो उन्होंने कहीं नौकरी करने के बजाय साल 1988 में अपने भाई और पांच अन्य दोस्तों के साथ मिलकर सिसमोल यानी स्टूडेंट्स एजुकेशनल एंड कल्चरल मूवमेंट ऑफ लद्दाख नाम का एक स्कूल खोला। उनके इस स्कूल में बेहद प्रैक्टिकल तरीके से एजुकेशन दी जाती थी। बाद के दिनों में वांगचुक ने अपने स्कूल में ऑपरेशन न्यू होप नाम से एक प्रोग्राम शुरू किया। इस प्रोग्राम के तहत लद्दाख के सरकारी स्कूलों में एजुकेशन रिफॉर्म शुरू हुआ। इस रिफॉर्म में लोकलाइज्ड टेक्स्ट बुक्स और टीचर्स की ट्रेनिंग दी जाने लगी। यह सोनम वांगचुक का एजुकेशन को लेकर बेहद सुंदर विज़न था। अब साल आता है 1993 का। जून का महीना था। सोनम वांगचुक ने लद्दाख में एक मैगज़ीन का प्रकाशन शुरू किया। इस मैगज़ीन का नाम था लद्दाख स्मेलोंग। यह बात बड़ी हैरतनुमा लगती है कि अगस्त 2005 तक यह मैगज़ीन लद्दाख की एकमात्र प्रिंट मैगज़ीन थी और इसके संपादक थे सोनम वांगचुक। ऐसा कोई भी साल नहीं है जब वांगचुक ने लद्दाख और उससे जुड़े मुद्दों के लिए कोई सकारात्मक काम नहीं किया हो। साल 2002 में उन्होंने लद्दाख वंटरी नेटवर्क एलवीएन की स्थापना की। दरअसल यह संगठन लद्दाख में काम कर रहे एनजीओ को एक मंच पर लाने के लिए बनाया गया था। खुद वांगचुक साल 2005 तक इस संगठन की एग्जीक्यूटिव कमेटी के सेक्रेटरी रहे। 2004 की बात है। केंद्र में नई यूपीए सरकार आ चुकी थी। मनमोहन सिंह देश के प्रधानमंत्री थे। उसी साल लद्दाख हिल काउंसिल सरकार का विज़न डॉक्यूमेंट लद्दाख 2025 नाम से तैयार किए जाने के लिए एक कमेटी बनाई गई। इसी कमेटी में वांगचुक को शिक्षा और पर्यटन पर नीति को तैयार करने की जिम्मेदारी सौंपी गई। साल 2005 में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इस रिपोर्ट को लॉन्च किया। वांगचुक ने नई तकनीकी और नए मेथड से काम करना कभी बंद नहीं किया।</div><h2>आइस स्तूप' का आविष्कार, हायल यूनिवर्सिटी और मैगसेसे पुरस्कार</h2><div>&nbsp;साल 2013 में उन्होंने आइस स्तूप नाम से एक अद्भुत प्रोजेक्ट शुरू किया। दरअसल जब गर्मी का मौसम आता है तो लद्दाख के किसानों को खेती के लिए पानी की कमी का सामना करना पड़ता है। अमूमन पानी की कमी अप्रैल और मई के महीने में ही होती है और उसी समय बुवाई का समय होता है यानी खेती का पीक टाइम। वांगचुक ने इसका तोड़ आइस स्तूप प्रोजेक्ट से निकाला। लद्दाख में ठंड के मौसम में भारी बर्फबारी होती है। वांगचुक ने बर्फबारी के समय ही उस बर्फ को इकट्ठा करके स्तूप बना दिया। यह एक आर्टिफिशियल ग्लेशियर जैसा था और जैसे-जैसे गर्मी का मौसम आता इस स्तूप की बर्फ पिघलकर पानी में तब्दील होती। साल 2014 के आखिर तक वांगचुक ने दो मंजिला कई आई स्तूप का स्ट्रक्चर बनाया जिसमें करीब 1.5 लाख लीटर पानी स्टोर किया जा सकता था। यह इस प्रोजेक्ट की सफलता को दिखाता था। बाद में यह तकनीक बहुत मशहूर हुई और इसे विदेशों में भी पहचान मिली। इसे लद्दाख के अलावा हिमालय और आल्प्स के क्षेत्रों में भी अपनाया गया। साल 2016 में वांगशुक ने हिमालयन इंस्टट्यूट ऑफ अल्टरनेटिव्स लद्दाख यानी हायल की स्थापना की। यह एक अलग तरह की यूनिवर्सिटी है जिसमें पहाड़ी इलाकों के युवाओं को नए ढंग से पर्यावरण और सांस्कृतिक सहित तमाम एजुकेशन दी जाती है। इस यूनिवर्सिटी की स्थापना के 2 साल बाद साल 2018 में एजुकेशन रिफॉर्म और कम्युनिटी बिल्डिंग के लिए वांगचुक को रमन मैक्ससे अवार्ड से सम्मानित किया गया।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/no-investigation-report-received-trust-waning-sonam-wangchuk-wife-writes-letter" target="_blank">जांच रिपोर्ट नहीं मिली, भरोसा कम...सोनम वांगचुक की पत्नी ने चिट्ठी लिख दूसरे अस्पताल में शिफ्ट करने की मांग की</a></h3><h2>लद्दाख के पर्यावरण को लेकर समय-समय पर आंदोलन करते रहे</h2><div>उनके पिता वांगियाल कांग्रेस के नेता रहे हैं। उनके पिता सोनम वांग्याल साल 1975 में जम्मू कश्मीर सरकार में मंत्री थे। वांगचुक भी लद्दाख के पर्यावरण को लेकर समय-समय पर आंदोलन करते रहे। 26 जनवरी 2023 को उन्होंने लद्दाख के जलवायु परिवर्तन से बिगड़ते हालात पर खारदंगला पास के पास जाकर अनशन शुरू किया। हालांकि प्रशासन ने उन्हें पहले ही हाउस अरेस्ट कर लिया था। प्रशासन का दावा था कि दर्रे का तापमान शून्य से -40° तक होता है। इसलिए वहां अनशन करने से वांगचुक की जान को खतरा था। 30 सितंबर 2024 को अपनी मांगों के समर्थन में लद्दाख से दिल्ली तक पैदल मार्च के दौरान सोनम वांगचुक और उनके समर्थकों को दिल्ली पुलिस ने सिंधु बॉर्डर पर हिरासत में ले लिया। बाद में उन्हें 2 अक्टूबर 2024 को रिहा कर दिया गया।</div><h2>सोनम वांगचुक के अनशन ख़त्म करने की शर्तों को लेकर क्यों उठ रहे हैं सवाल?</h2><div>सोनम वांगचुक नीट परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं के लिए धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की मांग को लेकर ही अनशन पर बैठे थे। वांगचुक की शर्तों में धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की शर्त का न होना लोगों को चौंका रहा है।</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 20 Jul 2026 14:32:15 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/scientist-or-activist-the-real-story-of-sonam-wangchuk</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[120 इस्तीफे...एक्शन में आई सरकार, ISRO में भगदड़ क्यों मची है? भारत की 'स्पेस मिस्ट्री' का MRI स्कैन]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/120-resignations-government-swings-into-immediate-action-why-is-there-an-exodus-at-isro]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>क्या भारत के स्पेस ड्रीम्स को अपनों की ही नज़र लग गई है? क्या अंतरिक्ष में तिरंगा लहराने वाला हमारा इसरो, अंदरूनी 'रॉकेट लीक' से जूझ रहा है? जी हां, आंकड़ा बहुत बड़ा है और चिंता उससे भी गहरी! सोचिए, जिस संगठन में 14 हजार लोग काम करते हों, वहां से 100 लोगों का जाना शायद समंदर से एक लोटा पानी निकालने जैसा लगे। लेकिन ठहरिए, गणित इतना सीधा नहीं है। असली झटका तो तब लगता है जब इसरो के सबसे वीआईपी सैटेलाइट सेंटर के 1339 कर्मचारियों में से 80 टॉप के वैज्ञानिक अचानक बाय-बाय कह देते हैं! हद तो तब हो जाती है जब बाहुबली रॉकेट GSLV Mk-III के डायरेक्टर विक्रम जोसेफ और चंद्रयान-3 की कामयाबी के पीछे खड़े प्रोजेक्ट मैनेजर आदित्य रल्लापल्ली जैसे दिग्गज भी अपना केबिन खाली कर देते हैं। आखिर ऐसा क्या हुआ कि देश का सबसे बड़ा स्पेस स्टेशन, वैज्ञानिकों के लिए एक स्टॉप-ओवर बनकर रह गया है? क्यों आज देश के सबसे बड़े दिमाग यानी आईआईटी (IIT) के टॉपर्स इसरो की दहलीज पर कदम रखने से भी कतरा रहे हैं? देरी, खिंचती डेडलाइन्स और सेंट्रलाइज्ड फैसले... क्या इसरो के अंदर कोई अंदरूनी मंदी चल रही है? आज इसी 'स्पेस मिस्ट्री'का एमआरआई स्कैन करेंगे।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/government-halts-mass-resignations-of-isro-scientists" target="_blank">ISRO Scientists के सामूहिक इस्तीफों पर सरकार की रोक, Gaganyaan Project के लिए लागू हुए New Rules</a></h3><h2>स्पेस सेक्टर में 5 साल के भीतर 400 प्राइवेट स्टार्टअप</h2><div>भारत से पहले ही बहुत से वैज्ञानिक समय-समय पर नासा जाते रहे हैं। आज नासा के अंदर जो प्रमुख वैज्ञानिक हैं उनमें बड़ी संख्या भारतीयों की है। लेकिन आज भारत के अंदर ही वैज्ञानिक नहीं रुक रहे हैं। इसके पीछे के मेजर रीजन क्या हैं? 2014 में एक भी शायद प्राइवेट सेक्टर कंपनी हमारे स्पेस में नहीं थी। आज 500 से ज्यादा कंपनियां स्पेस के अंदर प्राइवेट सेक्टर के अंदर एंट्री कर चुकी हैं। 2020 में जैसे ही प्राइवेट सेक्टर ओपन किया तमाम प्रकार की कंपनीज़ इस सेक्टर में लाइन लगाकर आ गई। आज भारत की टॉप कंपनीज के अगर नाम लें जो बीते 5 साल के अंदर तेजी से बढ़कर आई हैं। उनमें स्काई रूट एयररोस्पेस का नाम है। ऐसे ही अग्निकुल कॉस्मोस का नाम है। पिक्सल का नाम है। गैलेक्स का नाम है। दिगंतारा, बेलटेक्का नाम है। दो नाम&nbsp; स्काई रूट और अग्निकुल है ये तो बहुत ही तेजी से आगे चल रहे हैं। बिलियन डॉलर कंपनी बन चुकी हैं। ये इन्होंने इतना तेजी से फंडिंग उठाई है। टॉप फाइव में देखा जाए तो स्काई रूट और अग्निकुल का नाम है। स्काई रूट तो अपना भी विक्रम करके वन टू थ्री नाम से रॉकेट भी बना चुका है। सफल परीक्षण कर चुका है। सेटेलाइट और रॉकेट बनाने में अब ये तेजी से लोग आगे निकलते हुए आ रहे हैं।&nbsp; 400 प्राइवेट स्टार्टअप इंडिया के अंदर बीते 5 साल के अंदर केवल स्पेस सेक्टर में आ गए हैं। 500 मिलियन से ऊपर की फंडिंग प्राप्त कर चुके हैं। इतना पैसा इनके अंदर निवेश हो चुका है। इतना तेजी से मतलब 2014 में एक कंपनी तो 2026 में 400 नई कंपनियां स्टार्टअप के अंदर आ गई और निवेश 600 मिलियन का तो खुद हमारे विज्ञान मंत्री ने बोला कि इतना तो इन्वेस्टमेंट लेकर आ गए। तेजी से प्राइवेट सेक्टर इन हुआ।&nbsp;</div><h2>देरी, बढ़ती समय-सीमा और कम जवाबदेही</h2><div>इसरो से यह इस्तीफ़े ऐसे समय में भी हो रहे हैं जब संगठन मिशनों को पूरा करने में एक असामान्य मंदी से जूझ रहा है। गगनयान G1 टेस्ट फ्लाइट, SSLV-L1, GSLV-F17 और निजी क्षेत्र (इंडस्ट्री) द्वारा निर्मित PSLV-N1 जैसे कई बड़े और महत्वपूर्ण मिशन अपनी घोषित समय-सीमा से आगे बढ़ चुके हैं। इस साल की शुरुआत में PSLV को लगे दो झटकों ने लॉन्च गतिविधियों में और अधिक देरी कर दी है, और अंतरिक्ष एजेंसी ने अभी तक विफलता की कोई विस्तृत रिपोर्ट (असेसमेंट) सार्वजनिक नहीं की है। संगठन के कुछ हिस्सों में इस बात पर भी चर्चा बढ़ रही है कि निर्णय लेने की प्रक्रिया लगातार केंद्रित (सेंट्रलाइज्ड) होती जा रही है। कई मौजूदा और पूर्व अधिकारियों ने निजी बातचीत में कहा है कि तकनीकी और प्रशासनिक स्तर के बड़े फ़ैसले अब चेयरमैन के ऑफ़िस तक ही सीमित हो गए हैं, जिससे मंज़ूरी मिलने में देरी हो रही है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/man-who-issued-bomb-threat-to-isro-arrested-from-ghaziabad" target="_blank">ISRO को Bomb Threat देने वाला Ghaziabad से गिरफ्तार, पुलिस जांच में हुआ बड़ा खुलासा</a></h3><h2>अचानक ब्रेन ड्रेन होना शुरू हुआ</h2><div>प्राइवेट सेक्टर से फंडिंग आ गई। प्राइवेट सेक्टर की कंपनियां आ गई। इनको काम करने वाले वैज्ञानिक कहां से लाओगे? काम करने वाले वैज्ञानिकों के लिए आवश्यकता अचानक आ पड़ी। 5 साल में वैज्ञानिक तैयार नहीं होता। वैज्ञानिक सालों की मेहनत से निकलता है। काफ़ी सारी रिसर्च करता है। बहुत सा समय खपाता है। तब जाकर वैज्ञानिक बनता है। ऐसे में अचानक वैज्ञानिकों के लिए ऑप्शंस ओपन हो गए। 400 कंपनियां सामने। अब तक जॉब देने के लिए इसरो खड़ा था। अब 400 कंपनियां एक साथ सामने आई। क्या ऑप्शंस हुए? इन्होंने कहा छोड़ो इसरो इन्हें ज्वाइन करते हैं। अचानक ब्रेन ड्रेन होना शुरू हुआ। 100 से अधिक वैज्ञानिक अचानक छोड़ निकल गए इन दिनों इनमें से अधिकांश ने जाकर इन प्राइवेट कंपनीज को ज्वाइन कर लिया।&nbsp; इतना तेजी से निकले कि इन वैज्ञानिकों ने कईयों ने तो कई अहम प्रोजेक्ट छोड़ दिए। यानी कि चंद्रयान 3 तक का जो लीडरशिप था वो तक छोड़ दिया।&nbsp;</div><h2>रोज़गार मॉडल में बदलाव की ज़रूरत</h2><div>नाम न बताने की शर्त पर वरिष्ठ अधिकारियों ने यह भी कहा कि स्पेस एजेंसी को नासा (NASA) और यूरोपियन स्पेस एजेंसी जैसी पश्चिमी स्पेस एजेंसियों के रोज़गार मॉडल पर गौर करना चाहिए, जो ज़्यादातर प्रोजेक्ट-आधारित होते हैं। नासा के वर्कफ़ोर्स स्ट्रक्चर में स्थायी सरकारी कर्मचारी, कॉन्ट्रैक्टर और खास प्रोजेक्ट के लिए रखे गए लोग शामिल होते हैं। इससे एजेंसी को ज़रूरी संस्थागत विशेषज्ञता बनाए रखते हुए लचीलापन मिलता है। कई स्पेस पॉलिसी एक्सपर्ट्स का मानना ​​है कि इसरो (ISRO) को इस हाइब्रिड मॉडल को अपनाकर फ़ायदा हो सकता है।</div><h2>ISRO इन चीज़ों पर फोकस कर सकता है</h2><div>मिशन डिज़ाइन और सिस्टम इंजीनियरिंग।</div><div>इंसानों को अंतरिक्ष में भेजना और डीप-स्पेस एक्सप्लोरेशन।</div><div>एडवांस्ड R&amp;D, जैसे कि दोबारा इस्तेमाल होने वाले रॉकेट और न्यूक्लियर प्रोपल्शन।</div><h2>इसरो इस समस्या को सुलझाने के लिए तेजी से कदम उठा रहा है</h2><div>अंतरिक्ष विभाग के 14 जुलाई के ज्ञापन में इस बात पर चिंता व्यक्त की गई है कि इन इस्तीफों से राष्ट्रीय महत्व के कार्यक्रमों पर असर पड़ रहा है। गगनयान और अन्य प्रमुख मिशनों से जुड़े वैज्ञानिकों को अब सामान्य मंजूरी के जरिए इस्तीफा देने की अनुमति नहीं होगी; इसके बजाय, प्रत्येक इस्तीफे को अब अंतरिक्ष विभाग से मंजूरी लेनी होगी। हालांकि इस्तीफों की संख्या इसरो के 14,600 से अधिक कर्मचारियों में से एक छोटा सा हिस्सा है, लेकिन इसका प्रभाव कहीं अधिक है क्योंकि जाने वाले कई लोगों के पास चंद्रयान-3, स्पैडेक्स और गगनयान जैसे मिशनों के माध्यम से अर्जित वर्षों का विशेष अनुभव है। इस तरह के ज्ञान की भरपाई केवल नए स्नातकों की भर्ती से नहीं की जा सकती। टैलेंट का यह बदलाव भारत के स्पेस सेक्टर में हो रहे बड़े बदलाव को भी दिखाता है। दशकों तक, महत्वाकांक्षी एयरोस्पेस इंजीनियरों के लिए ISRO ही लगभग एकमात्र ठिकाना था। आज, यह एक बहुत बड़े इकोसिस्टम का मुख्य केंद्र बन गया है, जहाँ प्राइवेट कंपनियाँ अच्छे वेतन, तेज़ी से तरक्की और स्पेस टेक्नोलॉजी की अगली पीढ़ी को आकार देने के मौके के साथ करियर के दूसरे विकल्प भी देती हैं। इसरो के लिए चुनौती अब सिर्फ़ देश के सबसे होनहार लोगों को आकर्षित करना ही नहीं, बल्कि उन्हें अपने साथ बनाए रखना भी है।</div><h2>क्यों हो सकती है चिंता की बात</h2><div>फर्ज कीजिए कि अगर दुश्मन देश किसी भारत की प्राइवेट कंपनी में फंडिंग करवा दे और उनसे कहे कि सारे के सारे वैज्ञानिकों को तोड़ के इधर ले आओ। मुंह मांगा पैसा दे दो। आपका तो पूरा अंतरिक्ष प्रोग्राम रखा रह जाएगा। आज 400 कंपनी हैं और उनको फंडिंग के दम पर सारा काम हो रहा है। फंडिंग के नाम पर वो तमाम प्रकार के लोगों को तोड़ रही हैं।आज इसरो में एक आम वैज्ञानिक की तनख्वाह ₹5 लाख एक बार बड़ी चर्चा बनी थी। देश के जो मतलब इसरो के चीफ साइंटिस्ट हैं उनकी तनख्खा ढाई लाख थी और हमारे देश के अंदर हम जैसी जो छोटी कंपनियां काम कर रही हैं उनके पास ही लाख लाख रुपए के कई कर्मचारी होते हैं।&nbsp;</div><h2>अर्ली रिटारमेंट के खिलाफ सरकार का ऑर्डर</h2><div>14 जुलाई को निकाले गए ऑर्डर में कहा गया कि गगनयान जैसे मिशन पर काम कर रहे ग्रुप ए के साइंटिस्ट&nbsp; के इस्तीफे अब आसानी से मंजूर नहीं होंगे ऐसे मामलों में अब फैसला डिपार्टमेंट ऑफ स्पेस ही करेगा।&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 17 Jul 2026 14:23:44 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/120-resignations-government-swings-into-immediate-action-why-is-there-an-exodus-at-isro</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[रूस-भारत की परमाणु साझेदारी में सेंध? क्यों कुडनकुलम फिर से सुर्खियों में है]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/a-dent-in-the-russia-india-nuclear-partnership-why-kudankulam-is-back-in-the-headlines]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारत के सबसे बड़े न्यूक्लियर पावर प्लांट कुडनकुलम का नाम एक बार फिर चर्चा में है और इस बार वजह कोई तकनीकी खराबी नहीं बल्कि एक कथित डाटा ब्रिज जिसने देश के एक बड़े इंफ्रा की साइबर सुरक्षा को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। दरअसल दावा है कि डाक पेप पर करीब 858,000 फाइलें अपलोड की गई हैं। जिसमें से लगभग 19,000 फाइलें कुडनकुलम न्यूक्लियर पावर प्लांट से जुड़ी बताई जा रही हैं। ऐसे में लोगों के मन में कई तरह के सवाल आ रहे हैं कि क्या भारत का न्यूक्लियर पावर प्लांट हैक हो गया है या फिर रिएक्टर का डाटा लीक हुआ है या मामला कुछ और है। यह मामला सीधे एनपीसीआईएल यानी न्यूक्लियर पावर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया के सर्वर से डाटा चोरी का नहीं है। दरअसल कुडनकुलम न्यूक्लियर पावर प्लांट के यूनिट थ्री और यूनिट 4 के कुछ इंफ्रा का ईपीसी कॉन्ट्रैक्ट साल 2018 में Reliance infra को दिया गया था। इसी कंपनी के डाटा में सेंध लगने का दावा सामने आया है। खुद Reliance ने स्वीकार किया कि उसके डाटा में आंशिक यानी कि पार्शियल ब्रीच हुआ है और इसकी जानकारी सरकार को दे दी गई है। रिपोर्ट्स के मुताबिक Reliance का डाटा भारतीय डाटा सेंटर कंपनी यो के सर्वर पर होस्ट था। योटा का कहना है कि 29 मई को उसे सर्वर पर संदिग्ध गतिविधियां दिखी थी और संभावित रैंसमवेयर को उसी समय रोक दिया गया था। लेकिन जून के आखिर में Reliance ने उसे बताया कि बाहरी हमलावर डाटा चोरी का दावा कर रहे हैं। इसके बाद पूरे मामले की जांच शुरू हुई। इस पूरे मामले के पीछे जिस समूह का नाम सामने आया है, उसका नाम वर्ल्ड लीग्स है। यह एक कुख्यात रसमवेयर गिरोह है। इसका तरीका आमतौर पर यह होता है कि पहले किसी कंपनी का डाटा चुराया जाता है। फिरौती मांगी जाती है और अगर पैसे नहीं मिलते तो चोरी किया गया डाटा डाक पर सार्वजनिक कर दिया जाता है। इससे पहले यह गिरोह Tata समूह समेत कई बड़ी कंपनियों को निशाना बना चुका है। अब सवाल कि आखिरकार लीक क्या हुआ है? रर्स की रिपोर्ट के मुताबिक डाक वेब पर मौजूद दस्तावेजों में कथित तौर पर यूनिट थ्री और यूनिट फोर से जुड़े वेंटिलेशन और कूलिंग सिस्टम के ब्लूप्रिंट सप्लाई की सूची, मीटिंग रिकॉर्ड, जॉइंट इंस्पेक्शन रिपोर्ट, उपकरणों की समीक्षा और बीमा से जुड़े दस्तावेज शामिल हैं। हालांकि रॉयर्स ने साफ कहा कि वह इन दस्तावेजों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं करता।&nbsp;</div><h2>19,000 फाइलें और 14.3 GB डेटा ऑनलाइन लीक</h2><div>एक रैनसमवेयर और जबरन वसूली (extortion) करने वाले समूह 'वर्ल्ड लीक्स' (World Leaks) द्वारा कथित तौर पर इस डेटा लीक को अंजाम दिया गया है, जिसने अपने डार्क वेब प्लेटफॉर्म पर चोरी की गई फाइलों का एक बड़ा जखीरा प्रकाशित किया है। साइबर सुरक्षा शोधकर्ताओं (researchers) ने कहा कि इस समूह ने लगभग 19,000 फाइलों का एक संग्रह जारी किया है, जिसका कुल आकार (डेटा) करीब 14.3 GB है। इन फाइलों में केकेएनपीपी (KKNPP - कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा संयंत्र) से जुड़े संदर्भ मिले हैं।</div><div>रिपोर्ट के मुताबिक, लीक हुए दस्तावेज 2016 से लेकर 2025 के मध्य तक की अवधि के हैं और ये इस परियोजना के निर्माण (construction) और संचालन (operations) के विभिन्न पहलुओं के बारे में विस्तृत जानकारी प्रदान करते हैं।</div><div><b>कथित तौर पर इन फाइलों में निम्नलिखित जानकारियां शामिल हैं:</b></div><div>कूलिंग (शीतलन) और वेंटिलेशन (हवादार) प्रणालियों से जुड़े इंजीनियरिंग चित्र (Drawings)</div><div>एक कॉमन कंट्रोल रूम (सामान्य नियंत्रण कक्ष) के लेआउट प्लान</div><div>भारतीय और रूसी इंजीनियरों के बीच बैठकों के मिनट्स (विवरण) और संयुक्त निरीक्षण रिपोर्ट</div><div>वेंडर (विक्रेता) के विवरण, उपकरण प्रस्ताव और आपूर्तिकर्ताओं (suppliers) की जानकारी</div><div>आंतरिक बीमा दस्तावेज, जिसमें निर्माणाधीन इकाइयों के लिए कथित तौर पर $112 मिलियन (11.2 करोड़ डॉलर) की संयुक्त आतंकवाद क्षतिपूर्ति नीति (joint terror indemnity policy) भी शामिल है।</div><h2>न्यूक्लियर सेफ्टी सिस्टम पर कोई असर नहीं पड़ा</h2><div>भारत के न्यूक्लियर इंफ्रास्ट्रक्चर पर संभावित खतरे की चिंताओं के बीच, एनपीसीआईएल ने एक बयान जारी कर स्पष्ट किया कि लीक हुए दस्तावेज़ रिएक्टर सेफ्टी सिस्टम से जुड़े नहीं थे। कंपनी ने कहा कि यह जानकारी केवल कुडनकुलम यूनिट 3 और 4 के लिए 'बैलेंस ऑफ़ प्लांट' (BoP) कॉमन सर्विस सुविधाओं से संबंधित थी, जिनका निर्माण अभी चल रहा है। एनपीसीआईएल ने कहा ये सुविधाएं पारंपरिक किस्म की हैं और आमतौर पर थर्मल पावर प्लांट के साथ-साथ अन्य प्रोसेस इंडस्ट्रीज़ में भी पाई जाती हैं। इनका न्यूक्लियर सेफ्टी या न्यूक्लियर सिक्योरिटी सिस्टम से कोई संबंध नहीं है। अधिकारियों ने बताया कि इस तरह के इंफ्रास्ट्रक्चर में बाहरी वेंटिलेशन सिस्टम, पानी की आपूर्ति नेटवर्क और अन्य सहायक सेवाएं जैसी सुविधाएं शामिल होती हैं, जिनके डिज़ाइन अक्सर बड़े निर्माण प्रोजेक्ट्स के दौरान सिविलियन कॉन्ट्रैक्टर्स के साथ साझा किए जाते हैं। अधिकारियों ने बताया कि रूसी डिज़ाइन वाले VVER-1000 प्रेशराइज़्ड वॉटर रिएक्टर समेत मुख्य रिएक्टर सिस्टम कॉन्ट्रैक्टर नेटवर्क से अलग रखे गए हैं।</div><h2>कुडनकुलम को पहले भी साइबर खतरों का सामना करना पड़ा है?</h2><div>ताज़ा घटना कुडनकुलम प्लांट के सामने आई पहली साइबर सुरक्षा चुनौती नहीं है। 2019 में प्लांट में Dtrack मैलवेयर के ज़रिए साइबर घुसपैठ की बात सामने आई थी। साइबर सुरक्षा कंपनियों ने इसे उत्तर कोरिया के सरकारी समर्थन वाले 'लाज़रस ग्रुप' से जोड़ा था। यह मैलवेयर प्लांट के लोकल नेटवर्क से जुड़े एक एडमिनिस्ट्रेटिव कंप्यूटर पर पाया गया था। जांचकर्ताओं के अनुसार, यह सिस्टम की जानकारी, की-स्ट्रोक और नेटवर्क की डिटेल्स इकट्ठा करने में सक्षम था। उस समय, NPCIL ने शुरुआत में घुसपैठ की खबरों से इनकार किया था, लेकिन बाद में पुष्टि की कि एक एडमिनिस्ट्रेटिव सिस्टम प्रभावित हुआ था। कंपनी का कहना था कि रिएक्टर कंट्रोल सिस्टम अलग-अलग, आइसोलेटेड नेटवर्क से सुरक्षित थे जो इंटरनेट से जुड़े नहीं थे।&nbsp;</div><div>साइबर सुरक्षा के लिए थर्ड-पार्टी कॉन्ट्रैक्टर बने बड़ी चुनौती&nbsp;</div><div>हाल ही में हुई सुरक्षा चूक ने रिएक्टर कंट्रोल रूम के बाहर साइबर सुरक्षा जोखिमों को लेकर फिर से सवाल खड़े कर दिए हैं। हालांकि भारत का परमाणु ऊर्जा विभाग परमाणु गतिविधियों के लिए कड़े सुरक्षा उपाय करता है, लेकिन बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में अक्सर कई प्राइवेट कंपनियां, कॉन्ट्रैक्टर और क्लाउड सर्विस प्रोवाइडर शामिल होते हैं। साइबर सिक्योरिटी एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगर पूरी सप्लाई चेन में सिक्योरिटी स्टैंडर्ड्स एक जैसे मज़बूत नहीं हैं, तो ये बाहरी लिंक कमज़ोर कड़ी बन सकते हैं।</div><div>इंडियन कंप्यूटर इमरजेंसी रिस्पॉन्स टीम (CERT-In) और न्यूक्लियर सिक्योरिटी एक्सपर्ट्स अब इस बात की जांच कर रहे हैं कि हमलावरों ने कॉन्ट्रैक्टर के सिस्टम तक कैसे पहुँच बनाई और डेटा कैसे निकाला। इस जांच का मकसद सिक्योरिटी में कमियों का पता लगाना और भारत के स्ट्रैटेजिक इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े थर्ड-पार्टी नेटवर्क की सुरक्षा को मज़बूत करना होगा।</div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 16 Jul 2026 13:57:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/a-dent-in-the-russia-india-nuclear-partnership-why-kudankulam-is-back-in-the-headlines</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Iran के राष्ट्रपति को ही जासूस बना लिया? मोसाद का अब तक का सबसे बड़ा गेम, IRGC के उड़े होश, फिर क्या हुआ]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/iranian-president-into-a-spy-mossad-biggest-operation]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>कोई खुफिया एजेंसी कितनी दुस्साहसी हो सकती है? दुश्मन देश में जासूस भेज देगी। ऑपरेशन कर देगी, राज चुरा लेगी। इससे ज्यादा कुछ आपके दिमाग में आ रहा है क्या? लेकिन दुनिया में एक एजेंसी है जो हर बार ऐसा कुछ करती है कि गेम एक नए लेवल पर चला जाता है। हम मोसाद की बात कर रहे हैं। वही मोसाद जो पेजर में बम छुपा देती है और महीनों बाद उसे डेटोनेट करती है। अगले ही दिन वायरलेस सेट में धमाका करती है, उसका भी किसी को अंदेशा नहीं होता। लेकिन क्या आप ये कल्पना कर सकते हैं कि किसी देश का पूर्व राष्ट्रपति अपने ही दुश्मन देश का एजेंट बन जाए। ये कहानी ईरान के पूर्व राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद की है। अमेरिका के एक बहुत बड़े अखबरा द न्यूयॉर्क टाइम्स ने ये दावा किया है कि अहमदीनेजाद को इजरायल ने अपने जासूस की तरह इस्तेमाल किया। महमूद अहमदीनेजाद 2005 से 2013 तक ईरान के राष्ट्रपति थे। उस दौरान वो ईरान के सबसे कट्टर नेताओं में गिने जाते थे। जब वो राष्ट्रपति थे तो अक्सर इजरायल के खिलाफ बड़े बड़े बयान दिया करते थे। इजरायल को अपना सबसे बड़ा दुश्मन बताते थे। उन्हीं के शासनकाल में ईरान ने अपना यूरेनियम प्रोग्राम शुरू किया था। जिसके बाद दुनिया के कई देशों को शक हुआ कि ईरान परमाणु हथियार बनाने की कोशिश कर रहा है। उस समय ऐसा लगता था कि उन्हें इजरायल से सबसे ज्यादा नफरत है। लेकिन ईरान के पूर्व राष्ट्रपति अहमदीनेजाद को लेकर अब सबसे बड़ा ट्विस्ट आया है कि वही राष्ट्रपति पद से हटने के बाद से इजरायल की खुफिया एजेंसी मोसाद के लिए काम कर रहे थे। यानी वो मोसाद के एजेंट बन गए थे।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/mri/modi-swings-into-action-immediately-upon-returning-from-abroad-what-is-set-to-happen-in-bjp-2-days" target="_blank">विदेश से लौटते ही मोदी का एक्शन! 2 दिन बाद बीजेपी में क्या होने वाला है?</a></h3><h2>कैसे शुरू हुई पूरी कहानी</h2><div>26 सितंबर 2016 ईरान के सुप्रीम लीडर आया अली खामनेई को तेहरान की एक इस्लामिक सेमिनरी से आमंत्रण आया। उस कार्यक्रम में उन्हें सेमिनरी के छात्रों को संबोधित करना था। कार्यक्रम में खामनेई जाते हैं। धर्म की बात करते हैं। साथ में उस समय ईरान की राजनीति के सबसे विवादित शख्स पर भी टिप्पणी करते हैं। कहते हैं कि अहमदीनेजाद मुझसे मिलने आए थे। मैंने उनसे अगला राष्ट्रपति चुनाव न लड़ने की सलाह उनको दी है। अपील की है। अगर वह चुनाव लड़ते हैं तो यह देश को दो हिस्सों में बांट सकता है। जिससे अंत में देश का ही नुकसान होगा। ठीक 7 महीने बाद 20 अप्रैल 2017 को ईरान के फॉर्मर प्रेसिडेंट महमूद अहमदीनेजाद&nbsp; राष्ट्रपति चुनाव का पर्चा भर देते हैं। बड़ी खबर यहां यह नहीं थी कि अहमदीनेजाद ने फिर से चुनाव लड़ने का फैसला किया। बल्कि बड़ी खबर यह थी कि उन्होंने रहबर मुहज्जम इंकलाब इस्लामी यानी ईरान की इस्लामिक क्रांति के सुप्रीम लीडर की अवहेलना की। सार्वजनिक रूप से खामनेई के मना करने के बाद भी अहमदीनेजाद ने पर्चा भरा। लेकिन गार्डियन काउंसिल ने उनकी उम्मीदवारी को खारिज कर दिया। ईरान में राष्ट्रपति का चुनाव लड़ने के लिए गार्डियन काउंसिल का अप्रूवल मिलना जरूरी होता है। इसके लिए 12 मेंबर्स की सहमति आपको चाहिए होती है जो गार्डियन काउंसिल में बैठते हैं। छह सिविल लॉयर्स होते हैं जिनको पार्लियामेंट चुनती है वहां की और छह इस्लामिक धर्म गुरु होते हैं जिन्हें सीधे सुप्रीम लीडर चुनते हैं।&nbsp;</div><h2>खामनेई से नाराजगी</h2><div>अहमदीनेजाद 2005 से 2013 यानी दो टर्म्स के लिए ईरान के राष्ट्रपति रह चुके हैं। चार-चार साल का वहां कार्यकाल होता है। ईरानी सिस्टम में एक शख्स दो टर्म्स तक राष्ट्रपति रह सकता है। इसके बाद उसे न्यूनतम एक साल का गैप देना होता है। लगातार तीन नहीं लड़ सकते। 2017 में जब अहमदीनेजाद पर्चा भरते हैं तो कानूनी रूप से सही थे। अगर उनकी उम्मीदवारी को मंजूरी मिलती तो उनका सामना सर्विंग प्रेसिडेंट हसन रूहानी से होता। अब रूहानी जो थे अलोकप्रिय नहीं थे। रिजीम की ही पसंद के थे। लेकिन रूहानी और अहमदन एजाद के बीच अगर पॉपुलैरिटी कॉन्टेस्ट होता तो कौन जीतता ईरान में हर कोई जानता था। इसके बाद अहमदीनेजाद 2021 में चुनाव लड़ने की कोशिश करते हैं। जब रईसी जीतते थे। खामनेई की अनुमति उन्हें नहीं मिली। रईसी की असल में मृत्यु हो जाती है तो 2025 में फिर चुनाव होते हैं। तो एक बार फिर अहमदीनेजाद&nbsp; पर्चा भरना चाहते हैं। लेकिन रहबर साथ नहीं देते। यहां तक आते-आते अहमदन इजाज समझ जाते हैं कि खामनेई अपने जीते जी उन्हें प्रेसिडेंट बनने नहीं देंगे और अब अगर उन्हें सत्ता हासिल करनी है तो कोई दूसरा तरीका अपनाना होगा।&nbsp;</div><h2>मोसाद का अब तक का सबसे बड़ा ऑपरेशन</h2><div>मोसाद के इस ऑपरेशन की शुरुआत साल 2022 के आसपास हुई। मोसाद को लग रहा था कि अहमदीनेजाद ईरानी सत्ता से नाराज है और दोबारा देश की कमान संभालना चाहते हैं। फर्स्ट पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक इजराइली अधिकारियों का मानना था कि अहमदीनेजाद की ईरान के कामकाजी और कम कमाई वाले लोगों के बीच अब भी पकड़ है। ऊपर से वह ईरान के पुराने पॉलिटिकल स्ट्रक्चर का जाना माना चेहरा भी थे। ऐसे में अगर ईरान की मौजूदा सत्ता गिरती तो उन्हें नए नेता के तौर पर सामने लाया जा सकता था। यह अपने आप में एक बहुत हैरान करने वाली एक योजना थी। जिस नेता ने खुद के राष्ट्रपति रहते हुए इजराइल को कभी मुंह नहीं लगाया, उसी नेता को इजराइल अपना एजेंट बनाने की कोशिश कर रही है। लेकिन मोसाद का मकसद सिर्फ खुफिया जानकारी हासिल करना नहीं था। क्योंकि खुफिया जानकारी के लिए मोसाद इतना बड़ा रिस्क नहीं लेता। उसका असली मकसद ईरान की गद्दी पर अहमदीनेजाद को बैठाना था। अब मोसाद के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी कि अहमदीनेजाद से बात कैसे हो और उसके लिए मुनासिब जगह क्या होगी? इसके लिए हंगरी की राजधानी बुडापेस्ट को चुना गया। न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक साल 2024 की शुरुआत में हंगरी सरकार के एक आला अधिकारी ने लुडोविका यूनिवर्सिटी ऑफ पब्लिक सर्विस के रेक्टर गिरगली डेली से संपर्क किया। उनसे क्लाइमेट चेंज पर एक कॉन्फ्रेंस करने और उसमें अहमदीनेजाद को बुलाने के लिए कहा गया। लेकिन यह कॉन्फ्रेंस केवल एक दिखावा था। असली मकसद था अहमदीनेजाद और इजराइली खुफिया अधिकारियों के बीच सीक्रेट मीटिंग करवाना। यरूशलम पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक मोसाद के तत्कालीन चीफ डेविड बर्निया खुद अहमदीनेजाद से मिलने बुडापेस्ट पहुंचे। दावा है कि अहमदीनेजाद&nbsp; के स्पोक्सपर्सन और करीबी इलाय अली अकबर जवनफेकर को इजराइल की ओर से कई अंडर दी टेबल पेमेंट्स भी किए गए। इजराइली अफसरों ने अहमदीनेजाद की ट्रिप्स और स्टे का खर्च तक उठाया। इसके बाद उनके खेमे और मोसाद के अफसरों के बीच और भी कई मुलाकातें हुई।&nbsp;</div><h2>पुरानी कट्टर छवि बदलने की कोशिश</h2><div>कुछ मीडिया रिपोर्ट में ये भी दावा किया गया है कि अहमदीनेजाद ने पिछले कुछ सालों में अपनी पुरानी कट्टर छवि को बदलने की भी कोशिश की। उन्होंने अंग्रेजी सीखी, अपने पहनावे और पब्लिक इमेज में बदलाव किया। यहां तक कि ईरानी सत्ता की पॉलिसीज को क्रिटिसाइज करना भी शुरू किया। इजराइली खुफिया अधिकारियों को कथित तौर पर यह लग रहा था कि इस इमेज के साथ अहमदीनेजाद को आगे चलकर ईरान के एक नए लीडर के तौर पर पेश किया जा सकता है। लेकिन इस कहानी में सबसे ड्रामेटिक फेस फरवरी 2026 में आया। यरूशलम पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक अहमदीनेजाद के घर के प्रेमाइसेस पर इजराइली हवाई हमला हुआ। इसमें उनके सुरक्षाकर्मियों और बख्तरबंद गाड़ी को निशाना बनाया गया। इसके बाद मोसाद के एजेंट कथित तौर पर अहमदीनेजाद को वहां से निकालकर तेहरान के एक सीक्रेट लोकेशन पर ले गए। लेकिन इसके बाद सब कुछ उतना स्मूथ नहीं रहा जैसा पहले था। दावा है कि अहमदीनेजाद इस पूरी कार्यवाही और युद्ध से नाराज हो गए थे। वे कुछ समय बाद उस सीक्रेट लोकेशन से बाहर निकल गए। न्यूयॉर्क टाइम्स ने चार सीनियर ईरानी अफसरों के हवाले से दावा किया गया कि इसके बाद ईरानी आलाकमान को अहमदीनेजाद के इजराइल से नजदीकियों की भनक लग गई थी। जिसके बाद आईआरजीसी की इंटेलिजेंस ब्रांच ने उन्हें हिरासत में लेकर नजरबंद कर दिया।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/mri/what-is-the-connection-between-the-city-where-khamenei-was-buried-and-koh-i-noor" target="_blank">ख़ामेनेई को जिस शहर में दफनाया गया, उसका 'कोहिनूर' से है क्या कनेक्शन?</a></h3><h2>आईआरजीसी ने फिर क्या किया?</h2><div>13 जुलाई को अमेरिकी अखबार न्यूयॉर्क टाइम्स की एक इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्ट में दावा किया गया है कि खामनेई के साथ विवाद के बाद अहमदीनेजाद अपने विश्वास पात्रों और सलाहकारों से विदेशी मदद के जरिए सत्ता हासिल करने पर बात करते थे। यह बात अखबार को अहमदीनेजाद के ही एक करीबी सहयोगी ने बताई है। अखबार ने एक डिटेल रिपोर्ट छापी जिसका टाइटल है इनसाइड इजराइल सीक्रेट ऑपरेशन टू कल्टीवेट अहमदीनेजाद। इसे मार्क मज़िटी, जुलनी बांस, फरनास फसीही और रन बर्गमन ने मिलकर लिखा है। इसमें दावा किया गया है कि 28 फरवरी को जब अमेरिका और इजराइल ने मिलकर ईरान पर हमला किया तो उनका लक्ष्य केवल इस्लामिक रिजीम को खत्म करना नहीं था। एक ऐसे व्यक्ति को सत्ता भी सौंपना चाहते थे जो ईरान को अंदर से अच्छी तरह जानता हो। यह व्यक्ति ईरान के पूर्व राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद थे। वही अहमदीनेजाद जिन्हें सबसे कट्टर राष्ट्रपतियों में से एक माना जाता है ईरान के जितने हुए इस्लामिक क्रांति के बाद मोसाद ने बाकायदा इसके लिए प्लान बनाया था। कई ऑपरेशंस तैयार हुए थे। हमले के पहले मोसाद के मुखिया और दूसरे अधिकारी अहमदीनेजाद से विदेश में कई बार मिले भी और इस प्लान की पूरी जानकारी सीआईए को भी दी जा रही पर अंततः प्लान फेल हो गया। अखबार का दावा है कि अब इस प्लान के बारे में आईआरजीसी को पता चल चुका है। अखबार की रिपोर्ट से नहीं उससे काफी पहले। इसलिए अहमदीनेजाद ईरान में किसी जगह नजरबंद रखे गए हैं। हालांकि अहमदीनेजाद की तरफ से इस दावे को पूरी तरह से खारिज कर दिया गया है। गाजा मीडिया पैलेस्टाइन क्रॉनिकल की रिपोर्ट के मुताबिक अहमदीनेजाद के दफ्तर ने मोसाद से संपर्क उन्हें भर्ती करने की कोशिश और उनकी नजरबंदी से जुड़े दावों को पूरी तरह मनगढ़ंत बताया है।&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 15 Jul 2026 13:46:44 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/iranian-president-into-a-spy-mossad-biggest-operation</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[ब्राजील-अमेरिका-थाइलैंड ने जिस Ethanol से किया कमाल, भारत में उस पर क्यों मचा बवाल? जटिल सवालों का सरल जवाब 10 लाइन में समझें]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/ethanol-worked-wonders-in-brazil-us-thailand-sparked-controversy-in-india-all-answers-in-10-lines]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>90 के दशक का दौर, पैदाइश बिहार की, जहां नए-नए जुगाड़ और देसी तिकड़म से हर नामुमकिन काम को मुमकिन बना दिया जाता था। यह वह दौर था जब अभाव ही आविष्कार की असली जननी हुआ करती थी। उस ज़माने में जब पेट्रोल के दाम बढ़ने लगते या उसकी किल्लत होती, तो लोग गैरेज में अपनी पुरानी याज़्दी, राजदूत या बुलेट खड़ी नहीं करते थे, बल्कि उसमें किरोसीन (मिट्टी का तेल) डालकर सड़कों पर धुआं उड़ाते निकल पड़ते थे। हालांकि इंजन खटखटाने लगता था और गाड़ी से सफेद धुएं का गुबार निकलता था, लेकिन गाड़ी चल पड़ती थी। इसी तिकड़मी माहौल में अक्सर यह कौतूहल और चर्चा भी गर्म रहती थी कि अगर महुआ की दारू से इंसान झूम सकता है, तो भला उससे मोटरसाइकिल कैसे चल सकती है? लोग हंसी-मजाक या गंभीर चौपालों में यह कयास लगाते थे कि जिस तरह स्पिरिट या किरोसीन से गाड़ियां रेंग सकती हैं, क्या पता आने वाले वक्त में यह महुआ की शराब भी गाड़ियों का ईंधन बन जाए! अपने देश में 2026 में कुछ वैसा ही हो रहा है। एक तरफ सोशल मीडिया पर वीडियो की बाढ़ है और हर कोई एक बोतल लिए हुए है और कह रहा है कि यह देखिए यह ऊपर रहा पेट्रोल और यह नीचे रहा इथेनॉल। नितिन गडकरी ने तो इथेनॉल इस्तेमाल करके सारी गाड़ियों का बांटाधार कर दिया। बहुत सारे यूजर्स नितिन गडकरी को भला-बुरा कह रहे हैं और कह रहे हैं कि एथनॉल डालकहमारी 12 लाख, 13 लाख, 14 लाख की गाड़ी को बर्बाद कर दिया। लोग वीडियो बना रहे हैं। कुछ लोग सवाल कर रहे हैं कि क्या एथनॉल मिश्रित पेट्रोल से गाड़ियां खराब हो रही हैं। क्या एथनॉल की वजह से गाड़ियों के इंजन फेल हो रहे हैं। क्या एथनॉल से गाड़ियों में जंग लग रही है। पार्ट-पुर्जे बेकार हो रहे हैं। क्या एथनॉल की वजह से गाड़ियों का माइलेज कम हो रहा है। आज तमाम सवालों का एमआरआई स्कैन करेंगे।&nbsp;</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/mri/small-weapon-has-ended-the-dragon-game-in-the-south-china-sea" target="_blank">एक छोटे से अस्त्र से South China Sea में ड्रैगन का गेम हुआ ओवर, भारत का नेकलेन ऑफ डॉयमंड उड़ाएगा होश!</a></h3><h2>1. सोशल मीडिया पर ई-20 पेट्रोल को लेकर क्या दावे किए जा रहे हैं?</h2><p>कुछ लोगों ने तो यहां तक दावा किया कि पेट्रोल में चींटी लग रही है। उन लोगों ने सोचा होगा कि गन्ने से इथेनॉल बनता है तो चींटी यहां भी लग सकती है। इन्हें कौन समझाए कि एथनॉल को पहले डिस्टलरी प्लांट में लिया जाता है। वहां फर्मेंट होता है, मिक्स होता है। उसमें चींटी नहीं लग सकती। ठीक उसी तरह जैसे दारू भले ही अंगूर के रस से बनती हो या जौ से बनती हो पर दारू में कभी चींटी लगते सुना है? तो जिस तरह दारू में चींटी नहीं लगती उसी तरह पेट्रोल में मिलाए गए एथनॉल में भी चींटी नहीं लगती। यह भ्रामक है। इसके अलावा बहुत सारे लोग वो पानी वाला बोतल ले घूम रहे हैं। ये कह रहे हैं कि ऊपर पेट्रोल है नीचे इथेनॉल है। तो जो बेसिक भी साइंस का स्टूडेंट है वो जानता है कि एथनॉल घुलनशील है। वो अलग-अलग नहीं हो सकता। जैसे दूध में हम कितना भी पानी मिला दें तो पानी अलग और दूध अलग बोतल में आप नहीं दिखा सकते उसी तरह इथेनॉल अलग और पेट्रोल अलग नहीं दिखा सकते तो यह खबर भी भ्रामक है।&nbsp;</p><h2>2. ब्राजील ने 50 साल पहले क्यों और कैसे बदला पूरा फ्यूल सिस्टम</h2><p>&nbsp;आज से करीब 50 साल पहले तक ब्राजील भी बाकी देशों की तरह ही पेट्रोल पर ही चलता था। लेकिन उसके पास अपनी जरूरत के हिसाब से पर्याप्त तेल मौजूद नहीं था। यही वजह थी कि वह भी अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से ही आयात करता था। लेकिन फिर आया साल 1973 जब दुनिया में तेल की किल्लत शुरू हुई। मिडिल ईस्ट में युद्ध छिड़ गया और ऑयल एक्सपोर्ट करने वाले देशों ने सप्लाई घटा दी और देखते ही देखते क्रूड ऑयल की कीमतों में कई गुना तक बढ़ोतरी हो गई। इसका सीधा असर ब्राजील की अर्थव्यवस्था पर पड़ने लगा। सरकार का इंपोर्ट बिल तेजी से बढ़ने लगा। इसी बीच ब्राजील को समझ आ गया कि अगर वह विदेशों के तेल पर ही निर्भर रहेगा तो भविष्य का हर संकट उसकी अर्थव्यवस्था को हिला सकता है। वहीं से ब्राजील की सबसे बड़ी एनर्जी रिवॉल्यूशन की शुरुआत हुई। साल 1975 में ब्राजील सरकार ने एक पूरा प्रोग्राम ल्च किया जिसका मकसद था पेट्रोल का विकल्प तैयार करना और इसके लिए सरकार ने इथेनॉल को चुना। दरअसल साल 1975 में भी इथेनॉल कोई नया फ्यूल नहीं था। इसका इस्तेमाल पहली बार 19वीं सदी में किया गया था। जब इंटरनल कंबस्शन इंजंस पर इसका प्रयोग किया गया। तब इथेनॉल को पहली बार फ्यूल के तौर पर देखा गया और तब से ही इसकी गाड़ियों का इस्तेमाल करने का भी प्रयास शुरू हो गया था। यहां तक कि हेनरी फोर्ड की पहली मॉडल टी कार भी पेट्रोल के साथ-साथ इथेनॉल पर भी चल सकती थी। लेकिन उस समय दुनिया में सस्ता क्रूड ऑयल आसानी से मिल जाता था। जिसकी वजह से ज्यादातर देशों ने पेट्रोल को अपना मुख्य फ्यूल बना लिया। लेकिन 1973 के दौरान जब ऑयल क्राइसिस के बाद ब्राजील ने इस पुराने विकल्प को एक बार फिर दोबारा से देखा क्योंकि इथेनॉल शुगरकेन यानी कि गन्ने से बनता है और तब ब्राजील के पास भरपूर मात्रा में गन्ना भी मौजूद था। सरकार ने सोचा तो फिर विदेशों से ऑयल मंगवाने की बजाय क्यों ना अपने ही खेतों से फ्यूल तैयार किया जाए और यहीं से पूरी कहानी बदल गई। सरकार ने किसानों को गन्ने उगाने के लिए सब्सिडी देना भी शुरू कर दिया। नई ईथेनॉल फैक्ट्रीज भी लगाई गई और कार कंपनियों को ऐसे इंजन बनाने के लिए खासकर की बढ़ावा दिया गया जो इथेनॉल पर चल सके। इतना ही नहीं सरकार ने इथेनॉल को देश भर में पहुंचाने के लिए स्टोरेज और सप्लाई नेटवर्क पर भी काफी काम किया और फ्यूल स्टेशन पर भी इसकी उपलब्धता बढ़ाने की तैयारी शुरू कर दी गई। यानी कि ब्राजील सिर्फ नया फ्यूल बनाने पर ही नहीं जुटा था बल्कि उसे तैयार करने, देश भर में पहुंचाने और गाड़ियों तक उपलब्ध कराने का भी पूरा इकोसिस्टम वह खड़ा कर रहा था।&nbsp; साल 2003 और यहीं से ब्राजील के इथनॉल प्रोग्राम को उसकी सबसे बड़ी ताकत मिल गई। क्योंकि इसी साल ब्राजील में पहली बार फ्लेक्स फ्यूल कार लॉन्च हुई। दरअसल इससे पहले लोग ऐसी गाड़ियां खरीद रहे थे जो सिर्फ इथेनॉल पर ही चलती थी। ऐसे में जब इथेनॉल की कमी हुई तो उनके पास कोई दूसरा विकल्प बचा ही नहीं और उनकी गाड़ी खड़ी हो गई।&nbsp;</p><h2>3. सरकार का क्या कहना है</h2><p>10 जुलाई को नरेंद्र मोदी सरकार ने एफएक्यू में यही दलीलें दी है। साफ कहा ई20 पेट्रोल ही अब स्टैंडर्ड है क्योंकि यह ज्यादा साफ है। कम प्रदूषण फैलाता है। इसकी ऑक्टेन रेटिंग ज्यादा है। एंटीनॉक प्रॉपर्टी बेहतर है। बेहतर पिकअप और एक्सीलरेशन देता है। इंजन बढ़िया तरीके से चलता है।&nbsp;</p><h2>4.&nbsp; अमेरिका में ई15</h2><p>अमेरिका में सबसे आम ईंधन E10 है। इसी के साथ कई राज्यों में इसके अनुकूल गाड़ियों के लिए E15 भी मौजूद है। फ्लेक्स फ्यूल गाड़ियां E85 का भी इस्तेमाल कर सकती हैं। जर्मनी, फ्रांस और फिनलैंड जैसे कई यूरोपीय देश बड़े पैमाने पर E10 पेट्रोल का इस्तेमाल करते हैं। इसी के साथ पुरानी गाड़ियों के लिए E5 भी उपलब्ध है। चीन ने वायु प्रदूषण से निपटने, ईंधन सुरक्षा को बेहतर करने और साफ-सुथरे ट्रांसपोर्ट को बढ़ावा देने के लिए कई प्रांतों और बड़े शहरों में E10 पेट्रोल को शुरू किया है।</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/mri/how-did-america-gain-independence-250-years-ago" target="_blank">250 साल पहले कैसे आजाद हुआ अमेरिका,  बिखरी हुई कंगाल कॉलोनी के दुनिया की सबसे बड़ी ताकत को हराने की कहानी</a></h3><h2>5. दुनिया के इन देशों में भी बिकता है एथेनॉल वाला पेट्रोल</h2><table class="table table-bordered"><tbody><tr><td>&nbsp;<b>देश</b></td><td><b>&nbsp;ब्लीडिंग %</b></td><td><b>कब से शुरुआत हुई&nbsp;</b></td><td><b>&nbsp;मुख्य स्रोत</b></td></tr><tr><td>ब्राजील</td><td>&nbsp;E27.5 से E30&nbsp;</td><td>&nbsp;1931 में 5% अनिवार्य किया। आधुनिक अभियान 1975 (Pro-Álcool कार्यक्रम) से शुरू हुआ।</td><td>&nbsp;गन्ना</td></tr><tr><td>अमेरिका</td><td>&nbsp;E10 (मानक) और E15</td><td>&nbsp;1970 के दशक के अंत से (गैसोहोल के रूप में) और 2005 के ऊर्जा नीति अधिनियम के बाद अनिवार्य हुआ।</td><td>&nbsp;मक्का</td></tr><tr><td>भारत</td><td>E20</td><td>&nbsp;2001-2003 में पायलट प्रोजेक्ट। 2014 में 1.5% था, जो अप्रैल 2025 तक पूरी तरह 20% तक पहुँच गया।</td><td>&nbsp;गन्ना, मक्का और अनाज</td></tr><tr><td>पराग्वे</td><td>E30</td><td>&nbsp;2000 के दशक के मध्य से धीरे-धीरे प्रतिशत बढ़ाते हुए अब 30% पर है।</td><td>&nbsp;गन्ना और अनाज</td></tr><tr><td>कनाडा</td><td>&nbsp;E10</td><td>&nbsp;2010 से संघीय स्तर पर 5% अनिवार्य था, जो अब स्वच्छ ईंधन नियमों के तहत बढ़ रहा है।</td><td>&nbsp;मक्का, गेंहू</td></tr><tr><td>यूरोपीय संघ</td><td>&nbsp;E5 से E10 (फ्रांस, जर्मनी में अधिक)</td><td>&nbsp;2009 के 'रिन्यूएबल एनर्जी डायरेक्टिव' के बाद से यूरोपीय देशों में तेजी आई।</td><td>&nbsp;चुकंदर, अनाज</td></tr><tr><td>&nbsp;चीन</td><td>&nbsp;E10</td><td>&nbsp;2002 में पायलट प्रोजेक्ट शुरू हुआ, 2017 से राष्ट्रव्यापी विस्तार की नीति बनी।</td><td>&nbsp;मक्का और पुराना अनाज</td></tr><tr><td>&nbsp;थाइलैंड</td><td>&nbsp;E20 मुख्य ईंधन</td><td>&nbsp;2005-2008 के दौरान व्यावसायिक रूप से बड़े पैमाने पर रोलआउट किया गया।</td><td>गन्ना और कसावा</td></tr></tbody></table><h2>6. मनमोहन सिंह की सरकार के दौरान भी एथनॉल वाला पेट्रोल</h2><p>देश में E5 2003 से पहली बार लागू की गई। E5 मतलब होता है कि पेट्रोल में 5% एथनॉल मिलाना। तो 2005 से पेट्रोल में एथनॉल मिलाया जा रहा है। 2004 में आई मनमोहन सिंह की सरकार ने भी इसे जारी रखा और E10 कर दिया। फिर अब गडकरी&nbsp; आए तो E20 कर दिया नहीं।</p><h2>7. एथनॉल ब्लेंडिंग की इतनी जल्दी क्यों है?</h2><p>सरकार इसके लिए इतनी जल्दी में इसलिए है क्योंकि भारत इस समय एक ट्रांजिशन फेज से गुजर रहा है। भारत अपनी जरूरत का 85% से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और भू-राजनीतिक तनाव (जैसे हाल के वर्षों में मध्य पूर्व के संकट) भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर भारी दबाव डालते हैं। एथनॉल तुरंत राहत देने वाला एकमात्र विकल्प है। इसके लिए देश को 10-15 साल इंतजार नहीं करना है। मौजूदा गाड़ियों में ही 20% तक एथनॉल बिना किसी बड़े इंजन बदलाव के इस्तेमाल किया जा सकता है।</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/mri/what-is-the-connection-between-the-city-where-khamenei-was-buried-and-koh-i-noor" target="_blank">ख़ामेनेई को जिस शहर में दफनाया गया, उसका 'कोहिनूर' से है क्या कनेक्शन?</a></h3><h2>8. ईवी (EV) बनाम भारत का कोल-बेस्ड पावर ग्रिड</h2><p>इलेक्ट्रिक वाहन (ईवी को पूरी तरह क्लीन कहना अभी भारत के संदर्भ में एक भ्रम है, जैसा कि आपने बिल्कुल सही पकड़ा। भारत में आज भी लगभग 60-65% बिजली का उत्पादन कोयले को जलाकर होता है। अगर कोई व्यक्ति ईवी चला रहा है, तो उसकी गाड़ी की टेलपाइप से धुआं नहीं निकल रहा, लेकिन उस गाड़ी को चार्ज करने के लिए जो बिजली आ रही है, वह थर्मल पावर प्लांट में कोयला जलाकर ही बन रही है। यानी प्रदूषण सिर्फ शहर से हटकर पावर प्लांट वाले इलाके में शिफ्ट हो रहा है। इसलिए जब तक हमारा पावर ग्रिड पूरी तरह सोलर या विंड एनर्जी पर शिफ्ट नहीं होता, तब तक ईवी पूरी तरह ग्रीन नहीं है।</p><h2>9. EV का कुल कार्बन फुटप्रिंट</h2><p>इलेक्ट्रिक वाहन (EV) का कुल कार्बन फुटप्रिंट समझने के लिए सिर्फ यह देखना पर्याप्त नहीं है कि गाड़ी चलाते समय धुआं निकलता है या नहीं, बल्कि उसके पूरे जीवन चक्र को देखना होता है। ईवी का सबसे बड़ा शुरुआती कार्बन उत्सर्जन उसकी बैटरी बनाने की प्रक्रिया से आता है, क्योंकि लिथियम, निकेल, कोबाल्ट जैसी धातुओं के खनन, प्रोसेसिंग और बैटरी निर्माण में काफी ऊर्जा खर्च होती है। इसके अलावा वाहन निर्माण और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के उत्पादन से भी उत्सर्जन जुड़ा होता है। हालांकि, पेट्रोल-डीजल वाहनों की तुलना में EV को चलाने के दौरान टेलपाइप से कोई CO₂ या जहरीली गैस नहीं निकलती, जिससे लंबे समय में इसका कुल उत्सर्जन कम हो सकता है। भारत जैसे देश में ईवी का कार्बन फुटप्रिंट काफी हद तक इस बात पर निर्भर करता है कि उसे चार्ज करने वाली बिजली किस स्रोत से आ रही है। क्योंकि भारत की बिजली व्यवस्था अभी भी काफी हद तक कोयले पर आधारित है, इसलिए ईवी पूरी तरह शून्य-उत्सर्जन वाहन नहीं कहा जा सकता। यहां प्रदूषण सड़क से हटकर बिजली उत्पादन केंद्रों तक पहुंच जाता है। लेकिन जैसे-जैसे भारत सोलर, विंड और अन्य नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों की हिस्सेदारी बढ़ाएगा, ईवी का कार्बन फुटप्रिंट भी लगातार कम होता जाएगा। साथ ही बैटरी रीसाइक्लिंग और स्वच्छ बैटरी निर्माण तकनीक विकसित होने से ईवी भविष्य में और ज्यादा पर्यावरण-अनुकूल बन सकते हैं। इसलिए ईवी को पूरी तरह ग्रीन नहीं बल्कि पेट्रोल-डीजल वाहनों की तुलना में कम उत्सर्जन वाला विकल्प कहना ज्यादा सही होगा।</p><h2>10. पूरी तरह एथनॉल पर शिफ्ट क्यों नहीं हो सकते?</h2><p>एथनॉल एक सप्लीमेंट है, रिप्लेसमेंट नहीं। हम 100% एथनॉल पर इसलिए शिफ्ट नहीं हो सकते क्योंकि अगर देश की सारी गाड़ियों को 100% एथनॉल से चलाना हो, तो हमें इतनी खेती करनी पड़ेगी कि खाने की फसलों (गेहूं, धान) के लिए जमीन ही नहीं बचेगी। यह 'फूड बनाम फ्यूल'का एक खतरनाक संकट खड़ा कर देगा। सामान्य पेट्रोल इंजन 100% एथनॉल नहीं झेल सकते। उसके लिए फ्लेक्स-फ्यूल इंजन की जरूरत होगी, जिसमें समय लगेगा।</p>]]></description>
      <pubDate>Tue, 14 Jul 2026 15:43:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/ethanol-worked-wonders-in-brazil-us-thailand-sparked-controversy-in-india-all-answers-in-10-lines</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[ख़ामेनेई को जिस शहर में दफनाया गया, उसका 'कोहिनूर' से है क्या कनेक्शन?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/what-is-the-connection-between-the-city-where-khamenei-was-buried-and-koh-i-noor]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>28 फरवरी के बाद से राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप कभी शांति दूत बन जाते हैं। कभी दुनिया के सबसे बड़े सेनापति, लेकिन ईरान के मामले में चिट भी मेरी और पट भी मेरी का इरादा रखने वाले ट्रंप की एक न चली। अमेरिका ने ईरान के साथ युद्ध विराम खत्म करके दोबारा हमले की शुरुआत ऐसे समय में की, जब ईरान अयातुल्लाह अली खामनेई को सुपर्द-ए-खाक करने के लिए एक विश्वस्तर का बड़ा आयोजन शुरू कर चुका था। अमेरिकी अखबरा गार्डियन की खबर के अनुसार 6 दिनों के आयोजन में अली खामनेई के तकरीबन 3 करोड़ समर्थकों के शामिल होने की बात सामने आई है। अली खामनेई का पार्थिव शरीर इराक के नजफ हवाई अड्डे से मशहद तक लाया गया।&nbsp;ईरान के दिवंगत सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई को उत्तर-पूर्वी शहर मशहद में सुपुर्द-ए-खाक (दफ़न) किया गया। यह दफ़न एक हफ़्ते से चल रही उस ऐतिहासिक और लंबी शवयात्रा का अंतिम पड़ाव थी, जो ईरान और इराक के सबसे मुकद्दस (पवित्र) धार्मिक केंद्रों तेहरान, कोम, नजफ और कर्बला की गलियों से गुज़रती हुई... आज अपने आखिरी ठिकाने मशहद पहुंची है।&nbsp;</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/amid-the-iran-conflict-president-trump-made-a-post-that-sparked-a-stir" target="_blank">ईरान युद्ध के बीच राष्ट्रपति ट्रंप ने किया ऐसा पोस्ट, मची खलबली!</a></h3><h2>क्या है मशहद का इतिहास</h2><p>ईरान का सबसे पवित्र और दूसरा सबसे बड़ा शहर खामनेई का जन्म भी इसी शहर में हुआ था। मशहद देश के उत्तरपूर्वी कोने में&nbsp; पड़ता है। यह तेहरान से करीब 900 किमी दूर है और खुरासान रजवी प्रांत की राजधानी है। यह अफगानिस्तान और तुर्कमेनिस्तान की सीमाओं के काफी करीब है। इसी वजह से सदियों से यह मध्य एशिया और ईरान के बीच सांस्कृतिक यात्रा और संस्कृति का एक बड़ा केंद्र रहा है। मशहद की आबादी करीब 30 लाख है। लेकिन यहां भीड़ काफी ज्यादा रहती है क्योंकि पर्यटक और तीर्थ यात्री बड़ी संख्या में आते हैं। हर साल दुनिया भर से इतने पर्यटक और तीर्थ यात्री मशहद आते हैं कि कई मौकों पर बाहर से आने वालों की संख्या यहां की मूल आबादी से भी ज्यादा हो जाती है। मशहद का मतलब होता है शहादत की जगह यानी जहां कोई शहीद हुआ हो। शियाओं के आठवें इमाम इमाम रजा यहीं शहीद हुए थे। मशहद पहले सनाबाद नाम की एक बस्ती के रूप में जाना जाता था। इमाम रजा के दफन होने के बाद इसका नाम पड़ा मशद रज़वी जो आगे चलकर सिर्फ मशहद रह गया। इमाम रजा का पूरा नाम अली इब्न मूसा अल रजा था। उनका जन्म 765 ईवी में मदीना में हुआ था। नवीं सदी की शुरुआत में अब्बासी खलीफा अल मामून ने उन्हें उत्तराधिकारी घोषित किया और मदीना से खुरासान बुलाया। लेकिन कुछ समय बाद 818 ईसवी में तूस के पास उनकी मृत्यु हो गई। शिया परंपरा का मानना है कि उन्हें जहर देकर शहीद किया गया था। जबकि कुछ ऐतिहासिक स्रोत इसे स्वाभाविक मृत्यु भी बताते हैं। इसी कारण इस स्थान को मशहद यानी शहादत की जगह कहा जाने लगा। बाद में यहीं उनकी मजार बनी और उसके चारों ओर धीरे-धीरे आज का मशहद शहर विकसित हुआ।</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/mojtaba-15000-missiles-deployed-who-is-the-next-target" target="_blank">मोजतबा की 15 हजार मिसाइलें तैनात! अगला टारगेट कौन?</a></h3><h2>ईरान का सबसे मुकद्दस मुकाम</h2><p>मशहद... जो ईरान में शिया मुसलमानों के सबसे पवित्र धार्मिक स्थल, 'इमाम रज़ा दरगाह' का घर है। यह वही पावन दरगाह है जहाँ शिया इस्लाम के आठवें इमाम, इमाम रज़ा का मक़बरा है जो ईरान की सरज़मीं पर दफ़न होने वाले इकलौते शिया इमाम हैं।&nbsp;<span style="font-size: 1rem;">ऐसे में इसी पाक दरगाह के साए में अयातुल्ला खामेनेई को सुपुर्द-ए-खाक किया जाना... न सिर्फ बेहद गहरा धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि उनके पूरे जीवन और उनकी विरासत को हमेशा-हमेशा के लिए शिया इस्लाम के इस सबसे पवित्र मुकाम से जोड़ देता है।</span></p><h2>ईरान के बड़े नेताओं के लिए दफ़नाने की जगह</h2><p>इमाम रज़ा श्राइन ईरान की कई जानी-मानी हस्तियों के लिए भी अंतिम विश्राम स्थल बन गया है। 2024 में हेलीकॉप्टर दुर्घटना में मौत के बाद पूर्व राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी को वहीं दफ़नाया गया था। इस श्राइन में खामेनेई को दफ़नाए जाने से इस्लामिक रिपब्लिक के नेताओं के लिए एक प्रतीकात्मक रूप से महत्वपूर्ण विश्राम स्थल के तौर पर इसकी अहमियत और बढ़ जाती है।</p><h2>दफ़नाने में चार महीने से ज़्यादा की देरी क्यों हुई?</h2><p>इस्लाम में आम तौर पर शव को जल्द से जल्द, अक्सर 24 घंटे के भीतर दफ़ना दिया जाता है। इसलिए खामेनेई के अंतिम संस्कार में हुई देरी बहुत असामान्य थी। ईरानी अधिकारियों का कहना है कि उनकी हत्या के बाद देश की सुरक्षा स्थिति को देखते हुए अंतिम संस्कार को टाल दिया गया था। खामेनेई की मौत का कारण बने हमले उस समय हुए जब ईरान, अमेरिका और इज़राइल के बीच ज़बरदस्त सैन्य टकराव चल रहा था। अधिकारियों का तर्क था कि हमले के तुरंत बाद बड़े पैमाने पर सार्वजनिक अंतिम संस्कार करने से सुरक्षा का गंभीर ख़तरा पैदा हो सकता था, क्योंकि लाखों शोक मनाने वाले लोग और हमलों की चपेट में आ सकते थे। साथ ही, अधिकारियों को देश के भीतर अशांति का भी सामना करना पड़ रहा था; जहाँ एक तरफ़ उनके समर्थक शोक मना रहे थे, वहीं सरकार-विरोधी समूह उनकी मौत का जश्न मना रहे थे, जिससे सुरक्षा से जुड़ी और चुनौतियाँ पैदा हो गई थीं। जून में एक नाज़ुक युद्धविराम समझौता होने के बाद ही ईरानी अधिकारियों ने देश भर में अंतिम संस्कार के कार्यक्रम आयोजित किए।&nbsp;</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/bahrain-kuwait-and-jordan-the-middle-east-goes-up-in-smoke" target="_blank">भाड़ में गया सीजफायर, धुआं-धुआं हुआ मिडिल ईस्ट, ईरान ने पैट्रियट सिस्टम और ड्रोन बेड़े को उड़ाया</a></h3><h2>खामेनेई का शव कहाँ रखा गया था?</h2><p>इतनी लंबी देरी की वजह से यह अटकलें भी लगने लगीं कि खामेनेई का शव कहाँ रखा गया था। ईरान के सरकारी मीडिया के अनुसार, चार महीने की इस पूरी अवधि के दौरान उनके शव को सुरक्षित और तापमान-नियंत्रित मेडिकल रेफ्रिजरेशन सुविधा में रखा गया था। केमिकल एम्बामिंग (रसायनों से शव को सुरक्षित रखने की प्रक्रिया) के विपरीत, जिसे आमतौर पर इस्लामी परंपराओं में सही नहीं माना जाता, रेफ्रिजरेशन से शव में कोई बदलाव किए बिना उसे सुरक्षित रखा जा सकता है। जानकारों का कहना है कि शिया इस्लामी कानून युद्ध या राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरे जैसी असाधारण स्थितियों में शव को दफनाने में देरी करने और उसे कोल्ड स्टोरेज में रखने की इजाज़त देता है। इससे ईरानी अधिकारियों को धार्मिक नियमों का पालन करते हुए खामेनेई के शव को सुरक्षित रखने में मदद मिली।&nbsp;</p><h2>ईरान और इराक में अंतिम संस्कार का जुलूस</h2><p>खामेनेई के अंतिम संस्कार की रस्में सात दिनों तक चलीं और आज मशहद में दफ़नाए जाने से पहले कई शहरों से गुज़रीं।</p><h2>इस रास्ते में ये जगहें शामिल थीं:</h2><p>तेहरान, जहाँ मुख्य राजकीय अंतिम संस्कार शुरू हुआ</p><p>कोम, जो शिया धार्मिक शिक्षा का ईरान का प्रमुख केंद्र है</p><p>इराक में नजफ़ और कर्बला, जो शिया इस्लाम के दो सबसे पवित्र शहर हैं</p><p>मशहद, जहाँ इमाम रज़ा दरगाह में खामेनेई को दफ़नाया गया।</p><p>मशहद में दफ़नाए जाने के साथ ही, खामेनेई के हफ़्ते भर चलने वाले अंतिम संस्कार की रस्में पूरी हो गई।</p><h2>कोहिनूर को लूटने वाले ने मशहद को बनाई अपनी राजधानी</h2><p>18वीं सदी में ईरान के बादशाह नादिर शाह जिसे ईरान का नेपोलियन भी कहा जाता था। उसने मशहद को अपनी राजधानी बनाया। नादिर शाह वही बादशाह है जिसने 1739 में दिल्ली पर हमला किया था और कोहिनूर हीरा लूट कर अपने साथ ले गया था। 1747 में नादिर शाह की हत्या के बाद यह हीरा अफगान सेनापति अहमद शाह दुरानी को मिल गया। इसके बाद यह शाह शुजा दुरानी के पास पहुंचा। जिन्होंने सैन्य सहायता और राजनीतिक शरण के बदले कोहिनूर महाराजा रणजीत सिंह को दे दिया था। उनकी मौत के बाद लाहौर की संधि के तहत नाबालिग महाराजा दिलीप सिंह से कोहिनूर ईस्ट इंडिया कंपनी को सौंप दिया गया। जहां से यह क्वीन विक्टोरिया के पास पहुंचा और तब से अब तक यह ब्रिटिश शाही खजाने का हिस्सा है।</p><p>&nbsp;</p>]]></description>
      <pubDate>Mon, 13 Jul 2026 14:18:32 +0530</pubDate>
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      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[विदेश से लौटते ही मोदी का एक्शन! 2 दिन बाद बीजेपी में क्या होने वाला है?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/modi-swings-into-action-immediately-upon-returning-from-abroad-what-is-set-to-happen-in-bjp-2-days]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>इस वक्त सबसे ज्यादा चर्चा अगर किसी चीज की हो रही है तो वो है केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव के दफ्तर में हुए बड़े प्रशासनिक बदलाव की। पहले निजी सचिव अमर सिंह को हटाया गया। फिर आयुष शरण और शैलेश कुमार सिंह को भी उनके पदों से मुक्त कर दिया गया। ऐसे में सवाल यही है कि ऐसा क्या हुआ कि इतने बड़े स्तर पर एक साथ कार्रवाई करनी पड़ी। सरकार की तरफ से अभी तक इन अधिकारियों को हटाने की कोई आधिकारिक वजह नहीं बताई गई है। आदेश जारी हुए,&nbsp; अधिकारी हटाए गए लेकिन कारण सार्वजनिक नहीं किया गया। यही बात इस पूरे घटनाक्रम को सामान्य ट्रांसफर से अलग बनाती है। राजनीतिक गलियारों में कई तरह की चर्चाएं चल रही हैं। कहा जा रहा है कि मोदी सरकार अपने तीसरे कार्यकाल में मंत्रालयों और मंत्रियों के दफ्तर की कार्यप्रणाली की गहन समीक्षा कर रही है। जिन अधिकारियों के कामकाज को लेकर सवाल है, या जिनकी कार्यशैली सरकार की अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतर रही है उन पर एक्शन हो सकता है। हालांकि इन दावों की आधिकारिक पुष्टि तो नहीं है। लेकिन लगातार हो रहे बदलावों ने इन अटकलों को जरूर हवा दे दिया है। चर्चा ये भी है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विदेश दौरे से लौटने के बाद सरकार कुछ और बड़े प्रशासनिक और राजनीतिक फैसले ले सकती है।&nbsp;</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/jairam-ramesh-jibe-environment-ministry-has-become-a-ministry-of-sermons-governance-has-failed" target="_blank">Jairam Ramesh का तंज: पर्यावरण मंत्रालय बना प्रवचन मंत्रालय, governance फेल</a></h3><h2>भूपेंद्र यादव के स्टॉफ को क्यों हटाया गया?</h2><p>विस्पर्स इन द कॉरिडोर वेबसाइट की रिपोर्ट के अनुसार&nbsp; भूपेंद्र यादव को पता ही नहीं था कि उनके स्टॉफ को हटाया जा रहा है। उन्हें तब पता चला जब सचिवालय में चिट्ठी टाइप होने चली गई। अगर विस्पर्स इन द कॉरिडोर की खबर सच है तो ये अपने आप में एक ऐतिहासिक मामला है कि मंत्री ऑफिस में भी नहीं बताया गया। शैलेंद्र यादव को लेकर इंडियन एक्सप्रेस ने दावा किया है कि वो बहुत पुराने वक्त से भूपेंद्र यादव के साथ थे। आरएसएस के जमाने से वो जुड़े थे। एक महीना राजनीति में बहुत लंबा वक्त होता है। भूपेंद्र यादव लुटियंस दिल्ली के जिस बंगले में रहते हैं वो बंगला नंबर 9 है। इस बंगले में आज से करीब एक महीने पहले की बात है तृणमूल कांग्रेस के सारे बागी सांसद इसी बंगले में बैठे थे। उस वक्त ये चर्चा चल रही थी कि 20 की संख्या कैसे पूरी होगी। लेकिन उस बंगले से आई तस्वीर में कहीं भी भूपेंद्र यादव नजर नहीं आ रहे थे। कहा ये भी गया कि भूपेंद्र यादव लाइमलाइट में नहीं आना चाहते थे और इसलिए उन्होंने सांसदों की तस्वीरें खिंचवाई और बीजेपी का आंकड़ा 300 के पार कर दिया। एक व्यक्ति जो बीजेपी को बंगाल जिताकर आया हो। जो टीएमसी को तोड़ रहा हो। उसके सारे के सारे स्टॉफ को पीएमओ के आदेश पर हटा दिया गया। दावे के अनुसार भूपेंद्र यादव को बाद में दी जा रही है।&nbsp;</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/three-officials-including-bhupender-yadav-ps-removed-is-this-a-sign-of-a-cabinet-reshuffle" target="_blank">Bhupender Yadav के PS समेत 3 अधिकारी हटाए गए, क्या Cabinet Reshuffle की आहट है?</a></h3><h2>क्या भूपेंद्र यादव का हो सकता है इस्तीफा?</h2><p>भूपेंद्र यादव एक पॉवरफुल मंत्री हैं और बीजेपी के नंबर 2 के नेता के बहुत करीबी माने जाते हैं। संगठन के अंदर बहुत अच्छी पकड़ है। राजनीतिक हलकों में दबी जुबान से ये भी कहा जा रहा है कि भूपेंद्र यादव का इस्तीफा भी हो सकता है। पीएम मोदी 12 जुलाई को अपने विदेश दौरे से लौट रहे हैं। ऑस्ट्रेलिया में पीएम मोदी ने साफ कहा कि हम एक गोल रखते हैं और उसके पूरा होते ही दूसरा बड़ा गोल रखते हैं। पीएम मोदी एक टारगेट ओरिएंटेंड लीडर हैं। वो टारगेट सेट करते हैं और उस टारगेट पर फिट नहीं बैठने पर 'पूरे घर को बदल डालो' वाली नीति अपनाते हैं। 12 जुलाई को एक बैठक होने वाली है। उसके बाद बड़े बड़े फैसले हो सकते हैं।&nbsp;</p><h2>राजनाथ सिंह और गडकरी को नई जिम्मेदारी?</h2><p>सूत्रों के हवाले से तो ये भी दावा किया जा रहा है कि राजनाथ सिंह को आगामी राष्ट्रपति के कार्यकाल समाप्त होने के बाद ये जिम्मेदारी दी जा सकती हैं। वहीं नितिन गडकरी के गवर्नर बनाए जाने की भी चर्चा है। इसके अलावा भी कैबिनेट में बड़े बदलाव हो सकते हैं। कैबिनेट में बदलाव तो एक हफ्ते पहले ही हो जाना था। लेकिन एनडीए की सहयोगी दलों को भी मंत्रिमंडल में जगह दिया जाना है और उसके लिए नेगोसिएशन का दौर चल रहा था। कौन सा विभाग किसके पास जाए इसको लेकर ये उस वक्त छोड़ा लंबा खिंच गया।&nbsp;</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/bhupender-yadav-four-key-aides-removed-environment-ministry-political-row" target="_blank">Prabhasakshi NewsRoom: केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव के 4 करीबी सहयोगियों को अचानक पद से हटाया गया, विपक्ष ने पूछा- क्या गड़बड़ी हुई थी?</a></h3><h2>पीएम का राजस्थान दौरा और...&nbsp;</h2><p>प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने&nbsp; बीते सप्ताह पचपदरा में देश की सबसे आधुनिक और पहली ग्रीन फील्ड रिफाइनरी का उद्घाटन किया। इस प्लांट का उद्घाटन पहले ही करना था। लेकिन जब प्रधानमंत्री का कार्यक्रम बना तो वहां मालूम चला कि आग लग गई। सूत्रों के हवाले से बताया जाता है कि उस वक्त दो प्रशासनिक अधिकारयों के हटाए जाने को कहा गया था। लेकिन उस वक्त भी राजनस्थान की राजनीति को दिल्ली से चलाने वाले एक बड़े नेता ने मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया। हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है। लेकिन इसके बाद पेड़ लगाने का कार्यक्रम रखा गया। सूत्रों के अनुसार पीएमओ की तरफ से कहा गया था कि वहां पर दो पेड़ की बातचीत चल रही थी और उस पेड़ में पीपल नहीं लगना था तो जो पेड़ लगाना था वो खेजड़ी का लगाना था। लेकिन हुआ इसका उल्टा।</p><h2>राजस्थान का वृक्षारोपण विवाद</h2><p>पौधारोपण के बाद प्रधानमंत्री के आधिकारिक एक्स हैंडल से तस्वीरें साझा करते हुए लिखा गया कि पर्यावरण संरक्षण हम सभी की जिम्मेदारी है और उन्हें पचपदरा में 'खेजड़ी' का पौधा लगाने का सौभाग्य मिला है। इस पोस्ट के सामने आते ही आरएलपी सांसद हनुमान बेनीवाल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा को टैग करते हुए एक्स पर एक पोस्ट लिखी। बेनीवाल ने तंज कसते हुए सवाल किया मैं प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी से पूछना चाहता हूं कि आज आप राजस्थान के पचपदरा आए, वृक्षारोपण भी किया, क्या आपकी सरकार ने खेजड़ी की नई किस्म का आविष्कार किया है या फिर राजस्थान के मुख्यमंत्री श्री भजनलाल जी ने पीपल को खेजड़ी बताकर आपसे पौधारोपण करवा दिया ? हनुमान बेनीवाल की ओर से सोशल मीडिया पर यह दावा किए जाने के बाद कि लगाया गया पौधा खेजड़ी नहीं बल्कि पीपल का है, इंटरनेट पर यह मुद्दा तेजी से वायरल हो गया। इसके कुछ समय बाद ही प्रधानमंत्री के सोशल मीडिया हैंडल से उस संबंधित पोस्ट और तस्वीरों को हटा दिया गया।&nbsp;</p><h2>क्या राजस्थान में भी होगा कोई बड़ा बदलाव?&nbsp;</h2><p>फिर यह पूछा गया कि जब खेजरी तय हुआ तो किसने बदला? कहा जाता है न कि जब वक्त उल्टा चलता है तो यही हो जाता है कि फिर एक के बाद एक गलतियां जो है वो सामने आने लगती है। प्लांट के अंदर पिछली बार भी बवाल मचा था। आग लगने की वजह से तो यही पूछा गया कि भाई फिर अब यह किसकी जिम्मेदारी है? फिर पेड़ वाला विवाद तो राजस्थान में भी कुछ बदलाव अगर देखने को मिल जाएं तो आश्चर्य नहीं होगा।&nbsp;</p><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 10 Jul 2026 14:34:57 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/modi-swings-into-action-immediately-upon-returning-from-abroad-what-is-set-to-happen-in-bjp-2-days</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Trump के टॉरगेट पर लॉरेंस बिश्ननोई! क्या है अमेरिका का Operation Hardball]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/lawrence-bishnoi-in-trump-crosshairs-what-is-america-operation-hardball]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>जस्टिन ट्रूडो एक दिन अपनी संसद में खड़े होकर क्रेडिबल एलिगेशन समझा रहे थे। कनाडा में एक आतंकी की हत्या के पीछे भारत का हाथ बता रहे थे।&nbsp;लेकिन 7 जुलाई को कनाडा के सीबीसी पर एक पत्रकार ने पुलिस की डेपुटी कमिश्नर लीसा मोलैंड से एक सवाल पूछा कि पूर्व प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने तो यह आरोप लगाया था कि हरदीप सिंह निजर की हत्या में भारत सरकार शामिल थी उसके एजेंट क्या आपकी इस जांच में इस आरोप को लेकर कोई सबूत मिला है? इस सवाल पर डिप्टी कमिश्नर पहले कुछ सेकंड्स के लिए चुप रहे। लेकिन बाद में उन्होंने साफ कहा कि जांच ऑर्गेनाइज्ड क्राइम पर फोकस्ड है और अब तक जांच में ऐसा कुछ भी सामने नहीं आया जो भारत सरकार या भारतीय अधिकारियों को इस हत्या से जोड़ता हो। जिसके बाद साफ है कि ट्रूडो का क्रेडिबल एलिगेशन औंधे मुंह गिरा।&nbsp;<span style="font-size: 1rem;">कनाडा पुलिस ने यह खुलासा तब किया है जब कुछ ही घंटों पहले कनाडा के साथ-साथ यूएस में भी लॉरेंस बिश्नोई से जुड़े 50 ठिकानों पर रेड पड़ी। दो दर्जन लोगों को गिरफ्तार किया गया। इसके बाद जस्टिस डिपार्टमेंट ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की। इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में निज्जर हत्या से जुड़े खुलासे हुए। जिसमें आरोपी के तौर पर गैंगस्टर लॉरेंस बिश्नोई और गोल्डी बराड का नाम आया। हालांकि अमेरिका ने भी निज्जर हत्याकांड में भारत सरकार की किसी भूमिका का आरोप नहीं लगाया है। कैलिफोर्निया से लेकर कनाडा तक बिश्नोई गैंग पर पड़ी रेड में क्या-क्या सामने आया? लॉरेंस गोल्डी बराड का गैंग कैसे ऑपरेट करता है। कैसे भय को हथियार बनाया जाता है। ऐसे आरोप भी हैं जो भ्रष्ट अफसरों के कान खड़े कर सकते हैं।&nbsp; जांच में पंजाब के एक एसएओ का नाम क्यों आ रहा है? और क्या जिस लॉरेंस को भारत में एक ही जेल से दूसरी जेल ले जाना संभव नहीं है, एक कानून के तहत वो प्रोविजन किया गया है। उस लॉरेंस बिश्नोई को भारत अमेरिका के हवाले करेगा? तमाम मुद्दों का एमआरआई स्कैन करेंगे।</span></p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/major-crackdown-on-indian-gangsters-in-the-us-canada-and-europe" target="_blank">अमेरिका-कनाडा और यूरोप में भारतीय गैंगस्टर्स पर बड़ा एक्शन, हत्या, जबरन वसूली और ड्रग्स से जुड़े आरोपों में चार्जशीट दाखिल</a></h3><p><div>ईरान के साथ युद्ध विराम तोड़कर अमेरिका ने दुनिया में आर्थिक अस्थिरता की वापसी करा दी है। दूसरी तरफ अमेरिका की जांच एजेंसी ने अपनी कार्रवाई का रुख उस गैंग की तरफ कर दिया है जिसकी दहशत भारत, अमेरिका और कनाडा समेत दुनिया के कई देशों में है। अमेरिका ने संगठित अपराध के खिलाफ एक अभियान शुरू किया है। इस अभियान को ऑपरेशन हार्ड वॉल नाम दिया गया है। अभियान के तहत गैंगस्टर लॉरेंस बिश्ननोई के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया गया है। लॉरेस के साथ ही एक और गैंगस्टर गोल्डी बरार के खिलाफ भी मुकदमा दर्ज हुआ है। एफबीआई ने लॉरेंस और गोल्डी को खालिस्तानी आतंकी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या का दोषी माना है।&nbsp;</div><h2>कैसे शुरू हुआ पूरा मामला</h2><div>हरदीप सिंह निजर कनाडा के ब्रिटिश कोलंबिया में सरे शहर में रहता था। साल 1997 में पंजाब से कनाडा चला गया। शुरुआत में वहां प्लमर के तौर पर काम करता था। बाद में उसने कनाडा में शादी भी की। साल 2020 से वह सरे में एक गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी का अध्यक्ष था। इसी साल हिंदुस्तान ने उसे आतंकवादी घोषित किया। निजर को खालिस्तान टाइगर फोर्स का हेड बताया जाता था। साल 2023 में कनाडा के हिसरे में गुरुद्वारे की पार्किंग में दो नकाबपोश हमलावरों ने उसे गोली मारकर उसकी हत्या कर दी। इसके बाद जब कनाडा की सरकार ने इस हत्या की जांच करनी शुरू की। ट्रूडो ने इल्जाम लगाया कि इस हत्या के पीछे हिंदुस्तान है। इसके बाद यह भी सामने आया कि कनाडा अमेरिका के साथ मिलकर इस मामले की जांच कर रहा है क्योंकि फाइव आईएस का अलायंस है। दोनों के बीच में इंटेलिजेंस शेयरिंग होती है। इसी वजह से दोनों देशों ने मिलकर खुफिया जानकारी पर काम के एक दूसरे को शेयर किया।&nbsp; 7 8 जुलाई जिसकी हम बात कर रहे हैं। आज का जो क्रैकडाउन यूएस में हुआ है। इसी मामले से जुड़ा हुआ था। अमेरिकी एजेंसियों ने इसे ऑपरेशन हार्ड बॉल कहा। 50 से ज्यादा जगहों पर छापेमारी हुई। यूएस, कनाडा और यूरोप के पुलिस ने मिलकर 24 लोगों को अरेस्ट किया। इनमें से 11 कैलिफोर्निया में पकड़े गए। इसलिए कैलिफोर्निया का नाम भी आ रहा है। ये सारे लोग हिंदुस्तान से जुड़े तीन बड़े इंटरनेशनल क्राइम सिंडिकेट से जुड़े बताए जा रहे हैं। गिरफ्तारी 24 की हुई है। लेकिन कुल आरोपी 37 हैं। अमेरिका के जस्टिस डिपार्टमेंट ने जो इंडकमेंट यानी आरोप पत्र जारी किया है उसके मुताबिक इनमें से दो आरोपी हिंदुस्तान की जेलों में रहते हुए अपना इंटरनेशनल क्राइम नेटवर्क चला रहे हैं।&nbsp;</div></p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/canada-admits-there-is-no-link-between-the-indian-government-and-nijjar-killing" target="_blank">ट्रूडो के जाते ही बदले ओटावा के सुर, कनाडा ने माना- निज्जर की हत्या में भारत सरकार का कोई लिंक नहीं</a></h3><p><h2>दस्तावेज़ों में अंडरवर्ल्ड नेटवर्क का पूरा ब्लूप्रिंट</h2><div>अमेरिकी जांच एजेंसियों के मुताबिक लॉरेंस बिश्नोई-गोल्डी बराड़ नेटवर्क का ब्लूप्रिंट तैयार है। दावा है कि कभी छात्र राजनीति से पहचान बनाने वाला लॉरेंस बिश्नोई जेल में रहते हुए भी तस्करी से पहुंचाए गए मोबाइल फोन और इंटरनेट के जरिए अपने अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क को संचालित करता रहा। अमेरिका, कनाडा और यूरोप तक फैले इस नेटवर्क को संभालने के लिए अलग-अलग क्षेत्रों में भरोसेमंद सहयोगी तैनात किए गए थे। FBI के मुताबिक लॉस एंजेलिस एरिया में लाखों डॉलर की रंगदारी मांगी गई। एक मामले में 50 लाख डॉलर तक की मांग का आरोप है। जांच में जग्गू भगवानपुरिया नेटवर्क का भी उल्लेख है, जिसके कथित तौर पर दुनिया भर में 1,000 से अधिक सदस्य और सहयोगी हैं।</div><h2>FBI ने गोल्डी बराड़ की सूचना पर रखा 50,000 डॉलर</h2><div>का इनामः FBI ने गोल्डी बराड़ की सूचना देने वाले को 50,000 डॉलर का इनाम देने का ऐलान किया है। FBI ने अपील की है कि अगर किसी के पास गोल्डी बराड़ के बारे में जानकारी हो तो वे FBI की हेल्पलाइन 1-SOO-CALL-FBI पर संपर्क करें या FBI की वेबसाइट के माध्यम से सूचना साझा करें। एफबी आई के मुताबिक गोल्डी बराड़ कथित तौर पर लॉरेंस बिश्नोई के क्राइम सिंडिकेट ग्रुप का उत्तर अमेरिका में प्रमुख ऑपरेटर है। FBI के मुताबिक, गोल्डी बराड़ कैलिफोर्निया समेत अमेरिका और कनाडा में कई गंभीर आपराधिक गतिविधियों में शामिल रहा है। उसके खिलाफ गिरफ्तारी वॉरंट जारी है।</div><h2>बंदूक से ज्यादा डर को ब्रांड बनाया</h2><div>कनाडा, अमेरिका और यूरोप में भारतीय मूल के कारोबारियों व प्रवासियों से रंगदारी वसूली-हिंसा बढ़ने पर अमेरिकी एजेंसियों ने जांच शुरू की। 'ऑपरेशन हार्डबॉल' में सैकड़ों अधिकारी जांच में जुटे। भारत से जुड़े 3 संगठित अपराध नेटवर्क लॉरेंस बिश्नोई, जग्गू भगवानपुरिया और रविंदर सिंह ढांडा के गिरोहों का इसमें जिक्र है। 37 लोग आरोपी हैं। 24 आरोपी गिरफ्तार हुए। 11 कैलिफोर्निया में, एक इंडियाना, एक जॉर्जिया, 3 कनाडा और एक स्पेन में पकड़े गए। 7 पहले से हिरासत में थे। चार्जशीट के अनुसार, भारतीय जेलों से संचालित गिरोह विदेशों में मौजूद नेटवर्क के जरिए ड्रग्स तस्करी, रंगदारी, हथियार सप्लाई और टारगेटेड किलिंग करते हैं। हर वारदात के बाद सोशल मीडिया पर जिम्मेदारी लेकर लोगों में डर पैदा किया जाता, ताकि अगला शिकार बिना विरोध रंगदारी दे दे। दस्तावेज के अनुसार इसी डर के सहारे ये भारत से लेकर अमेरिका और कनाडा तक नेटवर्क फैलाते गए। गरीब व नाबालिग युवा भर्ती किए जाते हैं।</div><h2>पंजाब के एसएचओ ने मांगी 4 लाख डॉलर की रंगदारी</h2><div>अटॉनों कार्यालय के शीर्ष अभियोजक बिल एस्सायली ने कहा कि पंजाब का एक एसएचओ अमेरिका में बसे परिवार से 4 लाख डॉलर रंगदारी मांगने में शामिल था। भारत में रह रहे रिश्तेदारों पर हत्या के झूठे केस की धमकी दी गई थी।' इसके बाद होशियारपुर के एसएसपी ने टांडा थाने के एसएचओ गुरिंदरजीत सिंह नागरा को लाइन हाजिर कर आरोपों की जांच के आदेश दिए।</div><h2>क्या अमेरिका मांगेगा लॉरेंस का प्रत्यर्पण?</h2><div>ऑपरेशन हार्ड बॉल के बाद सबसे बड़ा सवाल अब लॉरेंस बिश्नोई को लेकर खड़ा हो गया है। क्या उसका प्रत्यर्पण होगा। कनाडा के एक सीनियर पुलिस अधिकारी ने बयान दिया है कि अमेरिका, निज्जर हत्याकांड और अन्य मामलों में मुकदमे के लिए भारत से लॉरेंस बिश्नोई के प्रत्यर्पण की मांग कर सकता है। फिलहाल लॉरेंस बिश्नोई भारत की जेल में बंद है।</div><div>&nbsp;</div></p>]]></description>
      <pubDate>Thu, 09 Jul 2026 14:38:19 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/lawrence-bishnoi-in-trump-crosshairs-what-is-america-operation-hardball</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[29 करोड़ मुस्लिमों के बीच शिव धाम, दीवारों पर रामायण की कहानी, इंडोनेशिया के 1170 साल पुराने परमब्रह्म मंदिर का जानें इतिहास]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/history-of-1170-year-old-parambrahma-temple--symbol-of-india-indonesia-civilisational-heritage]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>दुनिया का सबसे बड़ा मुस्लिम आबादी वाला देश। लेकिन वहां पर मौजूद है भगवान शिव का ऐसा भव्य मंदिर जिसे देखकर दुनिया दंग रह जाती है। यह सिर्फ पत्थरों से बनी इमारत नहीं है बल्कि हजार साल पुरानी उस सांस्कृतिक यात्रा की गवाही है जिसने भारत और इंडोनेशिया को आज भी एक अदृश्य धागे में बांधे रखा है। इंडोनेशिया के जावा द्वीप पर स्थित ब्रह्मानन शिव मंदिर इन दिनों काफी चर्चाओं में है। वजह है कि भारत का इस विश्व धरोहर मंदिर के संरक्षण और जीर्णोद्धार में सहयोग का फैसला करीब 10वीं शताब्दी में बना ब्रह्मानंद मंदिर दक्षिण पूर्व एशिया का सबसे बड़ा हिंदू मंदिर परिसर माना जाता है। इसकी ऊंचाई शिखर शैली भारतीय मंदिर वास्तुकला की याद दिलाती है। समय, भूकंप और प्राकृतिक आपदाओं ने इस धरोहर को कई बार नुकसान भी पहुंचाया है। लेकिन हर बार इसे फिर सवारने की कोशिश की हुई है। यह मंदिर यूनेस्को विश्व धरोहर है और दक्षिण पूर्व एशिया की सबसे भव्य हिंदू वास्तुकला का नमूना माना जाता है। भारत और इंडोनेशिया के बीच 2025 में हुए समझौते के तहत अब इस मंदिर के जीर्णोद्धार में भारत एएसआई की विशेषज्ञता देगा। तमाम सारी बातों के बीच मूल पत्थरों को जोड़कर पुनर्निर्माण की इस तकनीक को इस्तेमाल होगा। ब्रह्मानंद मंदिर का जीर्णोद्धार दोनों देशों के बीच 2000 साल पुरानी दोस्ती को और ज्यादा मजबूत करेगा।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/pm-modi-arrives-at-prambanan-indonesia-largest-hindu-temple" target="_blank">शिव, विष्णु, ब्रह्मा...इंडोनेशिया के सबसे बड़े हिंदू मंदिर प्रम्बानन पहुंचे PM मोदी, बोले- हमेशा शिव से जुड़ने का सौभाग्य मिला</a></h3><h2>भगवा कुर्ता, माथे पर त्रिपुंड और दिल में भक्ति की भावना लिए पहुंचे पीएम मोदी</h2><div>पीएम मोदी बुधवार को इंडोनेशिया के योग्याकार्ता स्थित देश के सबसे बड़े हिंदू मंदिर प्रम्बानन पहुंचे। भगवा कुर्ता, माथे पर त्रिपुंड और पारंपरिक अंदाज में मंदिर परिसर में प्रवेश करते प्रधानमंत्री मोदी की तस्वीरें चर्चा का विषय बन गईं। उन्होंने अपने कंधे पर अलग तरह का स्टॉल भी डाल रखा था। उनके साथ इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो भी मौजूद रहे। दोनों ने मंदिर के संरक्षण-जीर्णोद्धार परियोजना का उद्घाटन किया। पीएम ने मंदिर में दर्शन भी किए। उन्होंने मंदिर परिसर में अपने संबोधन में कहा कि मुझे किसी न किसी रूप में हमेशा भगवान शिव से जुड़ने का मौका मिला है। सोमनाथ, काशी विश्वनाथ, केदारनाथ धाम और उज्जैन के महाकाल मंदिर के बाद प्रम्बानन मंदिर के विकास का मौका मिलना मेरा सौभाग्य है।</div><h2>कंबोडिया के अंकोर वार्ड से की जाती तुलना</h2><div>आपको बता दें कि मूल रूप से यहां पर 240 से ज्यादा मंदिर थे। समय के साथ भूकंप और ज्वालामुखी विस्फोटों ने इसे कई बार नुकसान पहुंचाया लेकिन जो बचा है वह आज भी भव्यता के साथ खड़ा हुआ है। इसकी तुलना इसकी तुलना अक्सर कंबोडिया के अंकोर वार्ड से की जाती है। लेकिन ब्रह्मानंद पूरी तरह से हिंदू आस्था से जुड़ा हुआ है। कंबोडिया का मंदिर भी वो बड़ा विशाल है। बड़ा चर्चाओं में है। कहा जाता है कि हजारों की संख्या में जो वहां पर शिव के मूर्तियां हैं, शिवलिंग हैं, वो रावण ने बनाई थी। उसकी चर्चा फिर कभी लेकिन फिलहाल यह इंडोनेशिया के मंदिर हैं। एक नहीं 10,000 मंदिर यहां पर हैं।&nbsp; इन 10,000 मंदिरों का भारतीय संस्कृति से गहरा नाता है। इंडोनेशिया नौसेना का आधिकारिक आदर्श वाक्य ज्वेल जयामहे संस्कृत में वहीं राष्ट्रीय नारा है भिन्नका तंगुल ईका जापानी ग्रंथ काकाबिन समसेतु में किया गया है जिसमें संस्कृत के कई शब्द हैं इंडोनेशिया के&nbsp; नोट पर भगवान गणेश की तस्वीर भी छपी हुई है जहां पर गणेश का ज्ञान और शिक्षा का प्रतीक माना माना जाता है। जकार्ता के बीचों-बीच 85 फीट ऊंची अर्जुन और श्री कृष्ण के रथ की प्रतिमा भी लगी हुई है जो शहर के सबसे प्रसिद्ध स्मारकों में से एक है। दुनिया का सबसे बड़ा मुस्लिम देश होने के बावजूद इंडोनेशिया में आज भी रामायण का मंचन होता है। इसे देखने के लिए हर साल यहां पर लाखों पर्यटक पहुंचते हैं। इंडोनेशिया की राष्ट्रीय एयरलाइन गरुड़ इंडोनेशिया का नाम भी गरुड़ के नाम पर रखा गया है। जिसका उल्लेख भारतीय शास्त्रों में, भारतीय वेदों में और भारतीय ग्रंथों में है।&nbsp;&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/no-mere-thrashing-but-a-direct-chinese-style-remedy-modi-makes-a-splash-in-indonesia" target="_blank">कुटाई नहीं सीधे चीन की दवाई, इंडोनेशिया में मोदी का तहलका</a></h3><h2>ब्रह्मानंद मंदिर खास क्यों है?&nbsp;</h2><div>अगर कोई आपसे पूछे कि दक्षिण पूर्व एशिया का सबसे विशाल हिंदू मंदिर कौन सा है? तो जवाब होगा ब्रह्मानंद मंदिर। लेकिन इसकी पहचान सिर्फ इसके आकार से नहीं बल्कि उस अद्भुत कला और इतिहास से है जिसने इसे विश्व धरोहर बना दिया है। करीब 1100 साल पहले जावा की धरती पर ऐसा मंदिर परिसर बनाया गया जिसने भारतीय स्थापत्य कला को स्थानीय परंपराओं के साथ जोड़ा और एक नई पहचान दी। मंदिर का सबसे ऊंचा शिखर भगवान शिव को अर्पित है। समर्पित है और इसकी ऊंचाई लगभग 47 मीटर मानी जाती है। दूर से देखने पर लगता है कि मानो पत्थर का कोई पर्वत आसमान को छू रहा हो। ब्रह्मानंद परिसर में कुल सैकड़ों छोटे-छोटे बहुत सारे मंदिर हैं। इनके प्रमुख तीन मंदिर हैं। भगवान शिव का मंदिर, भगवान विष्णु का मंदिर, भगवान ब्रह्मा का मंदिर यह समर्पित मंदिर हैं। इनके सामने नंदी भी हैं, गरुड़ भी हैं और हंस के मंदिर भी बने हुए हैं। मंदिर की दीवारों पर रामायण और कृष्ण कथा की नक्काशी भारतीय संस्कृति के गहरे रिश्ते और प्रभाव को दिखाती है।&nbsp;</div><h2>सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी वाले देश में 10,000 हिंदू मंदिर</h2><div>पूरे इंडोनेशिया में 10,000 हिंदू देवी देवताओं के मंदिर हैं। दुनिया का सबसे बड़ा मुस्लिम आबादी का देश और उस देश में 10,000 हिंदू मंदिर मानते हैं ना भारतीय संस्कृति को। अब जरा इसकी तमाम जो खासियत हैं उनका जिक्र कर लेते हैं। असल में ब्रह्मानंद मंदिर उसकी जो परिसर है त्रिमूर्ति की पूजा का प्रमुख केंद्र माना जाता है। मुख्य और सबसे बड़ा मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। इसके दाई ओर भगवान विष्णु और बाई ओर ब्रह्मा हैं। मुख्य मंदिरों के सामने देवी देवताओं के वाहन भी बने हुए हैं। जिसमें शिव के वाहन नंदी बैल का मंदिर सबसे प्रमुख है। मंदिर की जो लंबी गैलरियों की दीवारों पर रामायण और भागवत पुराण की कथाएं लिखी हुई हैं। नक्काशी के तौर पर उकेरी गई हैं जो देखने वालों को प्राचीन काल में ली जाती हैं। और यह मंदिर सिर्फ पूजा स्थल नहीं है बल्कि हिंदू पुराणों का जीवंत संग्रहालय भी बना हुआ है।</div><h2>जावा का प्राचीन हिंदू चमत्कार</h2><div>प्रम्बानन मंदिर कॉम्प्लेक्स इंडोनेशिया का सबसे बड़ा हिंदू मंदिर कॉम्प्लेक्स है और कंबोडिया के अंकोरवाट के बाद दक्षिण-पूर्व एशिया का दूसरा सबसे बड़ा कॉम्प्लेक्स है। योग्याकार्ता के पास जावा द्वीप पर स्थित, यह विशाल कॉम्प्लेक्स मूल रूप से लगभग 40 हेक्टेयर में फैले करीब 240 मंदिरों से बना था। आज, यह इंडोनेशिया के सबसे खास सांस्कृतिक स्थलों में से एक है और इस क्षेत्र की समृद्ध हिंदू विरासत की एक बड़ी निशानी है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/india-to-make-history-by-laying-railway-tracks-in-chabahar-us-china-pakistan" target="_blank">चाबहार में पटरी बिछाकर भारत रचेगा इतिहास! अमेरिका-चीन-पाकिस्तान को झटका</a></h3><h2>मताराम साम्राज्य में शुरुआत</h2><div>प्रम्बानन को 9वीं सदी ईस्वी में हिंदू मताराम साम्राज्य के दौरान बनाया गया था। माना जाता है कि इसका निर्माण राजा राकाई पिकाटन ने शुरू किया था और उनके उत्तराधिकारी लोकापाला ने इसे पूरा किया था। इतिहासकारों का मानना ​​है कि इस मंदिर का निर्माण साम्राज्य द्वारा शैव हिंदू धर्म को अपनाने के प्रतीक के तौर पर और प्रतिद्वंद्वी शैलेंद्र राजवंश द्वारा बनाए गए पहले के बौद्ध बोरोबुदुर मंदिर के जवाब में किया गया था।</div><h2>वास्तुकला का बेहतरीन नमूना</h2><div>इस कॉम्प्लेक्स का मुख्य हिस्सा तीन ऊँचे मंदिरों से बना है, जो हिंदू त्रिमूर्ति भगवान शिव, भगवान विष्णु और भगवान ब्रह्मा—को समर्पित हैं। लगभग 47 मीटर ऊँचा शिव मंदिर यहाँ की सबसे बड़ी और प्रमुख इमारत है। ज्वालामुखी के पत्थरों से बने इन मंदिरों में ऊँचे शिखर, बारीकी से की गई नक्काशी, सजावटी प्रवेश-द्वार और एक जैसा लेआउट है, जो क्लासिकल हिंदू वास्तुकला की बेहतरीन परंपराओं को दिखाते हैं।</div><h2>हिंदू सभ्यता का प्रतीक</h2><div>प्रम्बानन भारतीय उपमहाद्वीप के बाहर हिंदू वास्तुकला के सबसे बेहतरीन बचे हुए उदाहरणों में से एक है। इसकी दीवारों पर रामायण और अन्य हिंदू महाकाव्यों के दृश्यों की बारीक नक्काशी की गई है। ये नक्काशी उस गहरे सांस्कृतिक और धार्मिक प्रभाव को दर्शाती है जो कभी व्यापार, ज्ञान और समुद्री संपर्कों के ज़रिए दक्षिण-पूर्व एशिया पर भारत का था।</div><h2>खंडहर से जीणोर्धार तक</h2><div>10वीं सदी में इस मंदिर परिसर को छोड़ दिया गया था, शायद माउंट मेरापी में ज्वालामुखी फटने और जावा में राजनीतिक सत्ता बदलने की वजह से। सदियों तक आए ज़बरदस्त भूकंपों ने कई ढांचों को खंडहर में बदल दिया। 19वीं सदी में डच औपनिवेशिक प्रशासन के तहत बहाली की कोशिशें शुरू हुईं, जबकि 1913 और 1953 के बीच बड़े पैमाने पर पुरातत्व संबंधी पुनर्निर्माण से कई मुख्य मंदिरों को उनकी पुरानी शान वापस मिली।</div><h2>यूनेस्को विश्व धरोहर का दर्जा</h2><div>इसकी असाधारण सांस्कृतिक और ऐतिहासिक अहमियत को देखते हुए, यूनेस्को ने 1991 में प्रम्बानन को विश्व धरोहर स्थल का दर्जा दिया। आज, यह इंडोनेशिया के सबसे ज़्यादा देखे जाने वाले स्मारकों में से एक है और पास के बोरोबुदुर मंदिर के साथ मिलकर, देश के हिंदू और बौद्ध अतीत की एक अनोखी झलक पेश करता है।</div><h2>साझा विरासत को संरक्षित करने में भारत की भूमिका</h2><div>भारत के सहयोग से चलाया जा रहा यह संरक्षण और बहाली प्रोजेक्ट, दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया में साझा सभ्यतागत विरासत को बचाने की नई दिल्ली की कोशिशों में एक और अहम पड़ाव है। यह पहल भारत की 'एक्ट ईस्ट पॉलिसी' और सांस्कृतिक कूटनीति के अनुरूप है; यह एशिया के सबसे महत्वपूर्ण हिंदू स्मारकों में से एक की सुरक्षा करते हुए इंडोनेशिया के साथ ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और लोगों के बीच संबंधों को मजबूत करती है।</div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 08 Jul 2026 13:09:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/history-of-1170-year-old-parambrahma-temple--symbol-of-india-indonesia-civilisational-heritage</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[एक छोटे से अस्त्र से South China Sea में ड्रैगन का गेम हुआ ओवर, भारत का नेकलेन ऑफ डॉयमंड उड़ाएगा होश!]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/small-weapon-has-ended-the-dragon-game-in-the-south-china-sea]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>इतिहास गवाह है कि दुश्मन की घेराबंदी वहीं करनी चाहिए जहां उसे सबसे ज्यादा दर्द हो और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जकार्ता की धरती से चीन की दुखती रथ पर हाथ रख दिया। जब दुनिया की नजरें पीएम मोदी और राष्ट्रपति प्रोवोबो की मुलाकात पर थी तब बंद कमरे में एक ऐसी डील फाइलन हो रही थी जिसने बीजिंग के रक्षा एक्सपर्टों के पसीने छुड़ा दिए।&nbsp; इंडोनेशिया ने अब भारत की उस अस्त्र मिसाइल को खरीदने का फैसला किया है जिसने ऑपरेशन सिंदूर में अपनी मारक क्षमता का लोहा पाकिस्तान में घुसकर मनवाया। जकार्ता में मंगलवार को जो कुछ हुआ वो सिर्फ दो देशों की मुलाकात नहीं थी बल्कि एक नए डिफेंस सुपर पावर का उदय था। पीएम मोदी और राष्ट्रपति प्रोबोबो के बीच हुई द्विपक्षीय बैठक में कई अहम समझौते हुए। लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा अस्त्र एयर टू एयर मिसाइल की हो रही है। भारत ने ना केवल इंडोनेशिया को ब्रह्मोस दी बल्कि अब अपनी सबसे आधुनिक अस्त्र मिसाइल भी सौंप दी है। इसका मतलब साफ है कि भारत ने इंडोनेशिया के जरिए चीन की घेराबंदी पूरी कर ली है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/pm-modi-major-statement-in-indonesia-cooperation-in-the-indian-ocean-will-heighten-china-anxiety" target="_blank">Indonesia में PM Modi का बड़ा बयान, Indian Ocean में सहयोग से बढ़ेगी China की टेंशन!</a></h3><h2>अस्त्र मिसाइल क्या बला है</h2><div>अस्त्र एक ऐसी मिसाइल है जो दुश्मन के विमान को तबतबाह कर देती है जब वो पायलट की आंखों को दिखाई भी नहीं देता है। 100 किलोमीटर से ज्यादा की रेंज और सुपरसोनिक रफ्तार इसे दुनिया की सबसे घातक मिसाइलों की श्रेणी में खड़ा करता है। इस मिसाइल की सबसे बड़ी खासियत इसका युद्ध का अनुभव यानी कि बैटल प्रोवेन होता है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान के अंदर घुसकर अपनी जिस ताकत का प्रदर्शन किया उसमें इन मिसाइलों की भूमिका ने दुनिया भर को चौंका दिया। इंडोनेशिया अच्छे से जानता है कि अगर उसे चीन के आधुनिक सुखोई और जे सीरीज के विमानों का मुकाबला करना है तो उसे भारत के अस्त्र की जरूरत पड़ेगी और इसीलिए अब यह एमओयू साइन हो गया।&nbsp;</div><h2>भारत और इंडोनेशिया मिलकर सबांग पोर्ट का विकास करेंगे</h2><div>दोनों नेताओं ने सबांग पोर्ट को मिलकर विकसित करने के लिए एक समझौते पर भी हस्ताक्षर किए। यह पोर्ट इंडोनेशिया के सुमात्रा द्वीप के उत्तरी सिरे पर स्थित है, जहाँ से मलक्का जलडमरूमध्य (Strait of Malacca) दिखाई देता है और यह भारत के आने वाले ग्रेट निकोबार ट्रांस-शिपमेंट पोर्ट प्रोजेक्ट से लगभग 160 किलोमीटर दूर है। चूंकि सबांग पोर्ट मलक्का जलडमरूमध्य के पास स्थित होगा, इसलिए भारत के लिए मलक्का जलडमरूमध्य तक पहुँचना आसान हो जाएगा। जो लोग नहीं जानते, उन्हें बता दें कि मलक्का जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री मार्गों में से एक है, जहाँ से वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति का एक बड़ा हिस्सा गुजरता है। दरअसल, यह संकरा मार्ग विश्व के व्यापार का एक बड़ा हिस्सा संभालता है, जो वैश्विक व्यापार मात्रा का 25-35 प्रतिशत है, और चीन अपनी ऊर्जा आपूर्ति का लगभग 80 प्रतिशत इसी पर निर्भर करता है। इससे भारत को हिंद महासागर में पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) नौसेना की गतिविधियों पर बेहतर निगरानी रखने की क्षमता भी मिलेगी, जहां वह अपनी ताकत का प्रदर्शन कर रही है। 'द डिप्लोमैट' की एक रिपोर्ट के अनुसार, सबांग पोर्ट भारतीय नौसेना को पूर्वी हिंद महासागर और मलक्का जलडमरूमध्य में ऑपरेशन जारी रखने के लिए एक अच्छी जगह पर स्थित लॉजिस्टिक्स और री-सप्लाई नोड देगा। खास तौर पर, सबांग का पोर्ट मानवीय आपात स्थितियों में मदद करने, आपदा राहत पहुंचाने और समुद्री लुटेरों के खिलाफ गश्त करने की भारतीय नौसेना की क्षमता को बढ़ा सकता है। रक्षा विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि सबांग भारत को समुद्र में बेहतर पहुंच प्रदान करता है। इसके अलावा, यह गहरे पानी वाला पोर्ट पनडुब्बियों सहित सभी तरह के नौसैनिक जहाजों को संभालने में सक्षम है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/pm-modi-receives-indonesias-highest-honor-sabang-port-and-defense-deal-heighten-china-anxiety" target="_blank">PM Modi को इंडोनेशिया का सर्वोच्च सम्मान, Sabang Port और Defence Deal से चीन की बढ़ी टेंशन!</a></h3><h2>मिनरल्स पर ज़ोर</h2><div>मोदी और प्राबोवो की बातचीत का एक अहम नतीजा मिनरल्स के क्षेत्र में सहयोग के लिए हुआ MoU था। भारत ने इंडोनेशिया में स्टील, निकेल और रेयर-अर्थ परमानेंट मैग्नेट बनाने की सुविधाओं में निवेश करने के लिए समझौता किया है, क्योंकि नई दिल्ली सप्लाई चेन में विविधता लाना चाहती है। भारत की निकेल में खास दिलचस्पी है, जो EV बैटरी और इलेक्ट्रिक वाहनों का एक अहम हिस्सा है। यह भारत के लिए बहुत ज़रूरी है क्योंकि वह साफ़ ऊर्जा वाली तकनीकों की ओर बढ़ना चाहता है। अभी, भारत अपने फेरोनिकेल का 80 प्रतिशत से ज़्यादा हिस्सा इंडोनेशिया से आयात करता है, जो स्टील बनाने के लिए बहुत ज़रूरी है। इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी की 'ग्लोबल मिनरल्स आउटलुक 2024' रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया के रिफाइंड निकेल में इंडोनेशिया और चीन की हिस्सेदारी 65 प्रतिशत थी, और अकेले इंडोनेशिया की हिस्सेदारी 2040 तक 44 प्रतिशत होने का अनुमान है।&nbsp;</div><h2>भारत इंडोनेशिया को कस्टमाइज़्ड EVM सप्लाई करेगा</h2><div>दोनों देशों ने चुनाव में सहयोग के लिए एक MoU पर भी साइन किए हैं। इस समझौते के तहत, नई दिल्ली जकार्ता को कस्टमाइज़्ड इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनें (EVM) उपलब्ध कराएगी। पीएम मोदी ने कहा कि लोकतांत्रिक मूल्य और विविधता में एकता भारत और इंडोनेशिया, दोनों की साझा ताकत रही है। हम दोनों देशों के चुनाव आयोगों के बीच MoU के ज़रिए अपने लोकतांत्रिक सहयोग को और मज़बूत करने के लिए तैयार हैं। उन्होंने आगे कहा कि यह समझौता चुनाव टेक्नोलॉजी, क्षमता निर्माण, मानव संसाधन विकास और बेहतरीन तौर-तरीकों के आदान-प्रदान में सहयोग को बढ़ाएगा। खबरों के मुताबिक, भारत जिन EVM को तैयार करेगा, उन्हें जकार्ता 2029 के आम चुनावों में इस्तेमाल करेगा। दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा लोकतंत्र अभी भी पेपर बैलेट का इस्तेमाल करके चुनाव कराता है।</div><h2>भारत का नेकलेस ऑफ डायमंड्स</h2><div>इंडोनेशिया भौगोलिक रूप से उस जगह बैठा है जहां से चीन का व्यापारिक और सैन्य रास्ता गुजरता है। अगर इंडोनेशिया के फाइटर जेट्स भारत की अस्त्र मिसाइल से लैस हो जाते हैं तो चीन की वायु सेना के लिए इस इलाके में घुसपैठ करना सुसाइड मिशन यानी आत्मघाती जैसा होगा। ब्रह्मोस के बाद अब बात अस्त्र की करें तो भारत ने पहले ब्रह्मोस देकर इंडोनेशिया की नौसेना को मजबूत किया, एमओयू साइन किया और अब अस्त्र देकर उसकी वायुसेना को अजय बना दिया है। यह पीएम मोदी का वो डबल अटैक है जिसने चीन के स्ट्रिंग ऑफ पल्स के जवाब में भारत का नेकलेस ऑफ डायमंड्स तैयार कर लिया है।&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 07 Jul 2026 16:46:51 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/small-weapon-has-ended-the-dragon-game-in-the-south-china-sea</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
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      <title><![CDATA[US turns 250: सब बराबर हैं लिखने वाले के पास खुद थे सैकड़ों गुलाम! जानिए क्या है Declaration of Independence का विवाद]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/us-turns-250-controversy-surrounding-the-declaration-of-independence]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>अगर आप हॉलीवुड फिल्में देखते हैं, तो आपको लगेगा कि अमेरिका का आज़ादी का घोषणापत्र कोई ऐतिहासिक दस्तावेज़ नहीं, बल्कि चोरी करने का कोई बहुत बड़ा 'खजाना' है! साल 2004 की मशहूर फिल्म नेशनल ट्रेज़र में जब हीरो निकोलस केज कहता है कि मैं इस दस्तावेज़ को चुराने वाला हूँ तो लोग रोमांच से भर गए थे। फिल्म में दिखाया गया कि इस कागज़ के पीछे छिपे हुए नक्शे, खुफिया कोड और गायब होने वाली स्याही का राज़ छुपा है। इस फिल्म ने हमारे दिमाग में इस दस्तावेज़ को किसी जादुई खजाने जैसा सेट कर दिया। लेकिन फिल्मों की दुनिया काल्पनिक होती है और हकीकत कुछ और। इस हफ्ते 4 जुलाई 2026 को अमेरिका अपनी आज़ादी के 250 साल पूरे कर रहा है। और सच बात तो ये है कि इस दस्तावेज़ के बनने की असली कहानी, हॉलीवुड के किसी भी फिल्मी ड्रामे से सौ गुना ज़्यादा दिलचस्प और रोमांचक है। वॉशिंगटन डीसी में नेशनल आर्काइव्ज़ में रखे चर्मपत्र के पिछले हिस्से पर खजाने का कोई नक्शा नहीं है। लेकिन इसके सामने के हिस्से पर कुछ ऐसे विचार लिखे हैं, जिन्होंने आधुनिक लोकतंत्र के लिए आर्किटेक्चरल ब्लूप्रिंट और अमेरिका की सबसे लंबे समय से चल रही सांस्कृतिक लड़ाई के मुख्य केंद्र, दोनों का काम किया है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/i-have-a-strong-friend-like-india-netanyahu-dismisses-jd-vance-claim-of-having-only-one-ally" target="_blank">सुनो मेरे पास भारत जैसा मजबूत दोस्त, नेतन्याहू ने जेडी वेंस के एकमात्र सहयोगी वाले दावे को नकारा</a></h3><h2>डिक्लेरेशन ऑफ इंडिपेंडेंस क्या है?</h2><div>यह समझने के लिए कि आज़ादी की घोषणा पर इतना विवाद क्यों है, सबसे पहले 1776 से जुड़ी कहानियों और धारणाओं को अलग करके इसे व्यावहारिक और कठोर राजनीतिक नज़रिए से देखना होगा। 1776 की गर्मियों तक, तेरह कॉलोनियों (बस्तियों) और ग्रेट ब्रिटेन के बीच एक साल से ज़्यादा समय से हथियारों वाला खूनी संघर्ष चल रहा था। लेक्सिंगटन, कॉनकॉर्ड और बंकर हिल की लड़ाइयाँ पहले ही हो चुकी थीं, और जॉर्ज वॉशिंगटन की कॉन्टिनेंटल आर्मी सैन्य अभियानों में सक्रिय रूप से लगी हुई थी। फिर भी, युद्ध का औपचारिक राजनीतिक मकसद साफ़ नहीं था। फिलाडेल्फिया की भीषण गर्मी में मिल रही 'सेकंड कॉन्टिनेंटल कांग्रेस' के कई सदस्य अभी भी ब्रिटेन के राजा जॉर्ज तृतीय के साथ सुलह की उम्मीद लगाए हुए थे। लंबे समय तक चले युद्ध की हकीकत सामने आने पर यह अनिश्चितता खत्म हो गई। कॉलोनियों को विदेशी मदद की सख्त ज़रूरत थी। खासकर फ्रांस और स्पेन से सैन्य और आर्थिक मदद की।&nbsp; हालाँकि, कैथोलिक निरंकुश राजतंत्र किसी औपनिवेशिक विद्रोह को आर्थिक मदद देने में बहुत हिचकिचाते थे, अगर वह विद्रोह ब्रिटिश साम्राज्य के भीतर टैक्स नीति को लेकर केवल एक घरेलू झगड़ा भर होता। अंतरराष्ट्रीय गठबंधन बनाने के लिए, उपनिवेशों को खुद को एक संप्रभु और अलग भू-राजनीतिक इकाई घोषित करना पड़ा। उन्हें कानूनी तौर पर साम्राज्य के बंधनों को तोड़ना ज़रूरी था। हालांकि, कैथोलिक निरंकुश राजशाही वाले देश किसी औपनिवेशिक विद्रोह को फ़ंड देने में बहुत हिचकिचाते थे, अगर वह विद्रोह सिर्फ़ ब्रिटिश साम्राज्य के भीतर टैक्स पॉलिसी को लेकर कोई घरेलू झगड़ा होता। अंतरराष्ट्रीय गठबंधन बनाने के लिए, कॉलोनियों को खुद को एक संप्रभु और अलग भू-राजनीतिक इकाई घोषित करना था। उन्हें कानूनी तौर पर साम्राज्य के बंधनों को तोड़ना था।</div><div>जून 1776 में कॉन्टिनेंटल कांग्रेस ने अलग होने के औपचारिक बयान का मसौदा तैयार करने के लिए पाँच लोगों की एक समिति नियुक्त की। इस समिति में मैसाचुसेट्स के जॉन एडम्स, पेंसिल्वेनिया के बेंजामिन फ्रैंकलिन, वर्जीनिया के थॉमस जेफरसन, न्यूयॉर्क के रॉबर्ट आर. लिविंगस्टन और कनेक्टिकट के रोजर शेरमन जैसे बड़े राजनीतिक नेता शामिल थे। असल में मसौदा लिखने का काम उनमें से सबसे कम उम्र के व्यक्ति को सौंपा गया: वर्जीनिया के 33 वर्षीय वकील और बागान मालिक, थॉमस जेफरसन। फिलाडेल्फिया में एक राजमिस्त्री के घर की दूसरी मंज़िल पर किराए के कमरे में काम करते हुए, जेफरसन ने लगभग सत्रह दिनों में यह मसौदा तैयार किया। उन्होंने जो लिखा, वह कोई कामकाज का संविधान या कानूनी कानून नहीं था, बल्कि एक शानदार घोषणापत्र था।&nbsp;</div><h2>5 आसान हिस्सों में बांट कर डिक्लेरेशन ऑफ इंडिपेंडेंस को समझें</h2><div><b>1. एंट्रो: </b>इसमें कहा गया है कि जब कोई सरकार जनता पर जुल्म करने लगे, तो कुदरत और भगवान के नियमों के अनुसार उस गुलाम देश की जनता को आज़ाद होने का पूरा हक है।</div><div><b>2. प्रीएंबल: </b>यह इस दस्तावेज़ का सबसे मशहूर हिस्सा है। इसमें साफ़ कहा गया है कि सभी इंसान बराबर हैं और उन्हें जीने व आज़ाद रहने का हक है। सरकार का काम जनता की सेवा करना है, और सरकार तभी तक चलनी चाहिए जब तक जनता चाहे।</div><div><b>3. राजा जॉर्ज पर आरोप: </b>इसमें ब्रिटेन के राजा जॉर्ज तृतीय के खिलाफ 27 बड़ी शिकायतें लिखी गई हैं। जैसे— जनता की मर्जी के बिना उन पर भारी टैक्स लगाना, जबरन अमेरिकी लोगों के घरों में ब्रिटिश सैनिकों को ठहराना और यहाँ की पंचायतों/विधानसभाओं को भंग कर देना।</div><div><b>4. ब्रिटिश जनता से नाराजगी:</b> इसमें अमेरिकी लोगों ने दुख जताया है कि जब उन्होंने ब्रिटेन की आम जनता (जिन्हें वे अपना भाई मानते थे) से मदद और न्याय की गुहार लगाई, तो वहाँ के लोगों ने भी उनकी एक न सुनी।</div><div><b>5. आखिरी फैसला:</b> यह अंतिम और कानूनी घोषणा है, जिसमें साफ कह दिया गया कि अब से अमेरिका के सभी राज्य पूरी तरह से आज़ाद और स्वतंत्र हैं। आखिर में आंदोलन के सभी नेताओं ने देश के लिए अपनी जान, दौलत और सम्मान की बाजी लगाने की कसम खाई।</div><div>2 जुलाई, 1776 को कॉन्टिनेंटल कांग्रेस ने सर्वसम्मति से आज़ादी के प्रस्ताव को मंज़ूरी दी। दो दिन बाद, 4 जुलाई यानी वो तारीख़ जिसे अब अमेरिकी स्वतंत्रता दिवस के तौर पर मनाते हैं। इसी दिन घोषणापत्र का अंतिम, संशोधित रूप औपचारिक रूप से अपनाया गया।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/iran-anger-on-display-at-khamenei-funeral-trump-effigy-hanged" target="_blank">Khamenei के जनाजे में दिखा Iran का गुस्सा,  Trump का पुतला फंदे से लटकाया, गूंजे 'मौत' के नारे</a></h3><h2>घोषणा-पत्र के पीछे की सोच क्या कहती है</h2><div>जेफ़रसन ने उस कॉन्सेप्ट्स को ईजाद नहीं किया जो इस घोषणा-पत्र का आधार हैं। सालों बाद उन्होंने खुद माना कि उनका मकसद कोई नया सिद्धांत या भावना पेश करना नहीं था। इसके बजाय, वे अमेरिकी सोच को ज़ाहिर करना चाहते थे। इस दस्तावेज़ की दार्शनिक बनावट यूरोपीय एनलाइटनमेंट (ज्ञानोदय) में गहराई से रची-बसी है, खासकर अंग्रेज़ दार्शनिक जॉन लॉक के राजनीतिक सिद्धांतों में। अपनी किताब टू ट्रीटीज़ ऑफ़ गवर्नमेंट (1689) में लॉक ने तर्क दिया कि सभी इंसानों को जीवन, स्वतंत्रता और संपत्ति के प्राकृतिक अधिकार मिले हुए हैं, और सरकार एक सामाजिक समझौते के तौर पर सिर्फ़ इन अधिकारों की रक्षा के लिए बनी है। अगर कोई शासक इस समझौते को तोड़ता है, तो नागरिकों को उस सरकार को हटाने का नैतिक अधिकार और असल में एक कर्तव्य भी होता है। जेफ़रसन ने लॉक के तीन अधिकारों वाले सिद्धांत को अपने ढंग से अपनाया और लिखा कि सभी इंसानों को उनके रचयिता ने कुछ ऐसे अधिकार दिए हैं जिन्हें उनसे छीना नहीं जा सकता; इनमें जीवन, स्वतंत्रता और खुशी की तलाश शामिल हैं। कई दशकों से, राजनीतिक वैज्ञानिकों और इतिहासकारों के बीच इस बात पर बहस होती रही है कि जेफ़रसन ने 'संपत्ति' की जगह 'खुशी की तलाश' (pursuit of happiness) को क्यों चुना। 18वीं सदी के क्लासिकल रिपब्लिकनिज़्म के संदर्भ में खुशी का मतलब सिर्फ़ भोग-विलास या व्यक्तिगत उपभोक्ता संतुष्टि नहीं था। बल्कि, इसका संबंध अरस्तू के 'यूडेमोनिया' के विचार से था यानी समाज की तरक्की के लिए ज़रूरी सार्वजनिक गुण, नैतिक ईमानदारी और नागरिक भागीदारी। सुख की खोज के इर्द-गिर्द अमेरिकी प्रयोग को परिभाषित करके, संस्थापकों ने नए राष्ट्र के अस्तित्व को उसकी जनता के नागरिक सद्गुणों से जोड़ दिया। फिर भी, इस उच्च दर्शन के साथ क्रूर भू-राजनीतिक यथार्थवाद भी जुड़ा हुआ था। जॉर्ज तृतीय के विरुद्ध 27 शिकायतें यूरोप की अदालतों के समक्ष एक कानूनी दलील के रूप में प्रस्तुत की गईं, जिससे यह साबित हो सके कि अमेरिकी स्थिर, तर्कसंगत कर्ता थे जो एक न्यायसंगत, कानूनी अलगाव में संलग्न थे।&nbsp;</div><h2>आज़ादी के नारे और गुलामी की कड़वी सच्चाई</h2><div>अमेरिका का 'स्वतंत्रता घोषणापत्र' भले ही दुनिया भर में मानवाधिकारों और समानता का सबसे बड़ा प्रतीक माना जाता है, लेकिन आज भी अमेरिकी समाज में यह एक गहरे विवाद और दोहरेपन का विषय बना हुआ है। दरअसल, इस दस्तावेज़ को लिखने वाले थॉमस जेफरसन ने जब अपनी कलम से यह ऐतिहासिक लाइन लिखी कि "सभी इंसान बराबर पैदा हुए हैं," तब वे खुद सैकड़ों अश्वेत गुलामों के मालिक थे, जिनसे जबरन मजदूरी कराकर वे अपनी ऐशो-आराम की जिंदगी चला रहे थे। इतना ही नहीं, इस घोषणापत्र पर हस्ताक्षर करने वाले 56 प्रमुख अमेरिकी नेताओं में से करीब एक-तिहाई लोग खुद गुलाम-मालिक थे, जिनमें जॉर्ज वाशिंगटन जैसे बड़े नाम भी शामिल थे। अमेरिकी नेताओं के इसी दोहरे चरित्र पर उस दौर में भी तीखा तंज कसते हुए ब्रिटिश लेखक सैम्युअल जॉनसन ने कहा था कि यह कितनी अजीब बात है कि आज़ादी की सबसे तेज आवाजें उन लोगों के मुंह से आ रही हैं, जो खुद दूसरों को गुलाम बनाकर उन पर कोड़े बरसाते हैं। यही वजह है कि इतिहासकार इसे आज भी अमेरिका का एक "मूल पाप" मानते हैं, जहाँ आज़ादी के खूबसूरत शब्दों और उस समय के समाज के कड़वे सच के बीच एक ऐसी गहरी खाई थी जिसे कभी भरा नहीं जा सका। उपनिवेशों और बाद में प्रारंभिक संयुक्त राज्य अमेरिका में दास प्रथा विरोधी आंदोलनकारियों ने तुरंत इस पाठ का इस्तेमाल एक हथियार के रूप में किया, जिसमें व्यवस्थागत घोर पाखंड को उजागर किया गया था। इस दस्तावेज़ में ऐसे अंश भी हैं जो आधुनिक पाठकों को बेहद परेशान करने वाले लगते हैं। किंग जॉर्ज तृतीय के ख़िलाफ़ शिकायतों की सूची में, 27वें और आख़िरी आरोप में राजा पर हमारे बीच घरेलू विद्रोह भड़काने और सीमावर्ती इलाकों में रहने वाले लोगों पर "निर्दयी इंडियन बर्बर लोगों" को लाने की कोशिश करने का आरोप लगाया गया है; इन बर्बर लोगों के युद्ध का तरीका यह था कि वे बिना किसी भेदभाव के हर उम्र, लिंग और स्थिति के लोगों का विनाश करते थे। इस अनुच्छेद ने स्पष्ट रूप से स्वदेशी विरोधी नस्लवाद को संयुक्त राज्य अमेरिका के मूलभूत ग्रंथों में शामिल कर दिया। इसने मूल अमेरिकी लोगों को औपनिवेशिक अतिक्रमण के विरुद्ध अपनी पैतृक भूमि की रक्षा करने वाले संप्रभु लोगों के रूप में नहीं, बल्कि शाही अत्याचार के अमानवीय एजेंटों के रूप में चित्रित किया।</div><div>आज़ादी के हथियार के तौर पर 'डिक्लेरेशन' का इस्तेमाल कैसे हुआ</div><div>कमियों और इसे बनाने वालों के दोहरे रवैये के बावजूद, 'डिक्लेरेशन ऑफ़ इंडिपेंडेंस' (आज़ादी की घोषणा) में एक खतरनाक और तेज़ी से फैलने वाली ताकत थी। एक बार जब "सभी इंसान बराबर पैदा हुए हैं" वाली बात दुनिया के सामने आई, तो इसे लिखने वाले अमीर गोरे लोग इसे और ज़्यादा कंट्रोल नहीं कर सके। अगले 250 सालों में हाशिए पर रहने वाले समुदायों ने लगातार इस 'डिक्लेरेशन' का सहारा लिया है। उन्होंने इसे एक ज़बरदस्त तर्क के तौर पर इस्तेमाल किया है ताकि देश को उन आदर्शों पर चलने के लिए मजबूर किया जा सके जो उसने खुद तय किए थे।</div><div><b>महिलाओं के वोट के अधिकार का आंदोलन (1848)</b></div><div>जब 1848 में सेनेका फॉल्स, न्यूयॉर्क में शुरुआती नारीवादी महिला अधिकारों के पहले सम्मेलन के लिए इकट्ठा हुईं, तो उन्होंने 'आज़ादी के घोषणापत्र' (Declaration of Independence) को खारिज नहीं किया। इसके बजाय, आयोजकों एलिज़ाबेथ कैडी स्टैंटन और ल्यूक्रेटिया मॉट ने इसे बहुत अच्छे ढंग से फिर से लिखा। उनके 'भावनाओं के घोषणापत्र' में जानबूझकर जेफरसन के शब्दों को दोहराया गया और कहा गया, हम इन सच्चाइयों को स्वतः स्पष्ट मानते हैं: कि सभी पुरुष और महिलाएं समान रूप से बनाए गए हैं। उन्होंने पितृसत्ता के खिलाफ 16 शिकायतें गिनाईं और वोट के अधिकार की मांग करने के लिए 1776 के दस्तावेज़ के ढांचे का इस्तेमाल किया।</div><div><b>अब्राहम लिंकन और गृह युद्ध (1863)</b></div><div>1850 के दशक से पहले, अमेरिकी संविधान जो 'थ्री-फिफ्थ्स कॉम्प्रोमाइज़' जैसे तरीकों से गुलामी की रक्षा और उसे कानूनी मान्यता देता था। अमेरिकी कानून का सर्वोच्च निर्णायक माना जाता था। लेकिन राष्ट्रपति बनने के दौरान और अमेरिकी गृह युद्ध की भारी उथल-पुथल के बीच, अब्राहम लिंकन ने अपनी बात कहने के तरीके में एक बड़ा और अहम बदलाव किया। लिंकन ने तर्क दिया कि 'आज़ादी का घोषणापत्र', न कि संविधान, संयुक्त राज्य अमेरिका का असली आधारभूत दस्तावेज़ था। उन्होंने संविधान को एक अस्थायी, अपूर्ण व्यवस्था के रूप में और घोषणापत्र को एक शाश्वत नैतिक मार्गदर्शक (नॉर्थ स्टार) के रूप में पेश किया। 1863 में अपने ऐतिहासिक 'गेटीसबर्ग भाषण' में लिंकन ने 1776 को याद करते हुए शुरुआत की। "अस्सी-सात साल पहले हमारे पूर्वजों ने इस महाद्वीप पर एक नया राष्ट्र बनाया, जो आज़ादी की भावना पर आधारित था और इस सिद्धांत के लिए समर्पित था कि सभी इंसान समान रूप से बनाए गए हैं।</div><div><b>नागरिक अधिकार आंदोलन (1963)</b></div><div>लिंकन के सौ साल बाद, 'मार्च ऑन वाशिंगटन' के दौरान लिंकन मेमोरियल की सीढ़ियों पर, डॉ. मार्टिन लूथर किंग जूनियर लाखों नागरिक अधिकार प्रदर्शनकारियों के सामने खड़े हुए।</div><h2>इस घोषणापत्र पर आज भी विवाद क्यों है?</h2><div>जब अमेरिका अपनी आज़ादी के 250 साल पूरे करने वाला है, तब यह दस्तावेज़ ज़बरदस्त वैचारिक लड़ाई के केंद्र में आ गया है। अब बहसें सिर्फ़ इस बात पर नहीं हैं कि 1776 में फिलाडेल्फिया में क्या हुआ था, बल्कि इस बात पर हैं कि इतिहास किस तरह आधुनिक कानून, शिक्षा और राष्ट्रीय पहचान को आकार देता है।</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 06 Jul 2026 13:48:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/us-turns-250-controversy-surrounding-the-declaration-of-independence</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[250 साल पहले कैसे आजाद हुआ अमेरिका,  बिखरी हुई कंगाल कॉलोनी के दुनिया की सबसे बड़ी ताकत को हराने की कहानी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/how-did-america-gain-independence-250-years-ago]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>जब भी हम बात करते हैं कि दुनिया में सबसे ताकतवर देश कौन सा है। तो बिना किसी किंतु-परंतु के एक ही नाम अमेरिका का याद आता है। अब आपमें से कुछ लोग ये भी बोल सकते हैं कि रूस और चीन भी तो ताकतवर देश हैं। लेकिन ये देश कंपटीशन की उस लाइन में हैं, जिसे अमेरिका बहुत पहले पार कर चुका है। दुनिया की सबसे बड़ी इकोनॉमी अमेरिका की है। इसकी जीडीपी 20 ट्रिलियन से भी ज्यादा है। दुनिया की सबसे बड़ी आर्मी अमेरिका के पास है। दुनिया की सबसे बड़ी बड़ी कंपनियां फिर चाहे एप्पल हो या फिर माइक्रोसॉफ्ट सभी अमेरिकी की है। इन सभी चीजों की लिस्ट इतनी लंबी है कि आपको यकीन हो जाएगा की अमेरिका ही इस दुनिया का सबसे पावरफुल देश है।&nbsp;अमेरिकन वॉर ऑफ इंडिपेंडेंस की शुरुआत कैसे हुई? इस बगावत का हिंदुस्तान से क्या कनेक्शन था? अमेरिका का संविधान कैसे बना? कैसे तय हुआ कि 13 कॉलोनी मिलकर एक नया देश बनाएंगी? अमेरिका की&nbsp; आजादी को 4 जुलाई 2026 को 250 साल पूरे हो रहे हैं। इस मौके पर एमआरआई का दो एपिसोड्स की सीरिज लेकर आ रहे हैं। जिसमें आपको मालूम चलेगा कि अमेरिकी क्रांति और वहां की आजादी का जो आईडिया है उसकी पूरी यात्रा कैसे हुई। उनमें क्या-क्या पड़ाव थे।&nbsp;</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/salman-showed-his-true-clout-regarding-iran-leaving-trump-entire-administration-rattled" target="_blank">ईरान के लिए सलमान ने दिखाया अपना असली रौब, ट्रंप की पूरी सरकार बौखला उठी</a></h3><p>अगर आप इतिहास को देखें तो दुनिया की ताकत हर टाइम पीरियड में अलग अलग देशों यहां तक की महाद्वीपों के पास रही है। प्राचीन काल को देखें तो चीन, रोम और भारत तीन साम्राज्य दुनिया के सबसे ताकतवर हिस्से हुआ करते थे। 1800 तक दुनिया की पूरी इकोनॉमी भारत और चीन के ईर्द गिर्द घूमती थी। यहां से बड़े पैमाने पर सामान को यूरोप इंपोर्ट किया जाता था। लेकिन इसके बाद जब मॉर्डन वर्ल्ड की शुरुआत हुई। यूरोप में इंडस्ट्रलाइजेशन आया तो यूरोप ने इन सब बड़ी ताकतों को अपने कब्जे में कर लिया। फिर चाहे वो हिंदुस्तान, चीन या फिर ऑटोमन सुल्तानों के कब्जे में रहा मीडिल ईस्ट ही क्यों न हो। लेकिन सेकेंड वर्ल्ड वॉर खत्म होते होते न भारत न चीन न इंग्लैंड न फ्रांस सभी ताकतों को पीछे छोड़ अमेरिका दुनिया का सबसे ताकवर देश बन गया।&nbsp;</p><h2>अमेरिका की खोज से लेकर 13 ब्रिटिश कॉलोनियों की स्थापना का इतिहास</h2><p>1453 में कतन दुनिया पर तुर्कों ने कब्जा कर लिया था जिससे यूरोप से ईस्टर्न कंट्रीज के ट्रेड रूट्स बंद हो गए थे जिसके बाद यूरोप के सेलर्स ने नए सी रूट्स ढूंढने शुरू कर दिए जिससे कि ईस्टर्न कंट्रीज के साथ यूरोप का ट्रेड किया जा सके भारत के लिए नए सी रूट की खोज में निकलस स्पीन का नाविक कोलंबस भटककर अटलांटिक ओशन को पार करता हुआ 1492 में एक बिल्कुल नई दुनिया में पहुंच गया। कोलंबस ने इस नए कॉन्टिनेंट को भारत समझकर यहां के नेटिव लोगों को रेड इंडियन कहा। इसके बाद 1499 में इटालियन ट्रेवलर अमर्जी यो वेस्पो की इस कॉन्टिनेंट पर पहुंचा जिसके नाम पर ही यहां का नाम अमेरिका पड़ा। यह कॉन्टिनेंट मिनरल रिसोर्सेस से भरा पड़ा था और यहां की जमीन भी बेहद ही फर्टाइल थी, जिसके कारण यूरोप के देश में इसे अपनी कॉलोनी बनाने को लेकर होड़ मची हुई थी। सबसे पहले स्पेन के लोगों ने अमेरिका के नेटिव लोगों को गुलाम बनाकर फार्मिंग करनी चाही। लेकिन वहां के लोकल्स ने इसे स्वीकार नहीं किया। इसलिए अफ्रीका के लोगों को अमेरिका लाया गया और उन्हें गुलाम बनाकर उनसे खेती करवाई गई। इस तरह स्पेन ने अमरिका के कुछ जगहों पर अपनी कॉलोनी बना ली। फिर आया साल 1588 का जब स्पेन की नेवी और इंग्लैंड की नेवी के बीच भयानक युद्ध होता है और इंग्लैंड की नेवी को जीत मिलती है तो अब इंग्लैंड को अमेरिका में अपनी कॉलोनी बनाने का मौका मिल गया। नॉर्थ अमेरिका में इंग्लैंड ने अपनी पहली कॉलोनी जेम्स फस्ट के समय में 1600 साथ में बनाई जिसका नाम जेम्स टाउन रखा गया। फिर चार्ल्स फर्स्ट के समय कॉलोनी बनाने के काम तेजी में आया। 1630 में प्यूटन लोगों का एक ग्रुप नॉर्थ अमेरिका के बोस्टन में जाकर बस जाता है जिसके बाद धीरे-धीरे यूरोपियन भारी संख्या में अमेरिका में जाकर बस गए। 1607 से 1722 ईसवी आते-आते अमेरिका में ब्रिटिशर्स ने अपनी 13 कॉलोनी बना दी। कॉलोनी उस समय प्रॉपर्टी कमाने का एक बड़ा माध्यम था और यही कारण था कि यूरोपियन लगातार अमेरिका में जाकर बसने लगे। इसके साथ ही यूरोप में रिलीजन को लेकर हार्ड पॉलिसी थी। जिसके कारण भी यूरोपियन अमेरिका में आकर बसने लगे।</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/global-uproar-donald-trump-has-sparked-another-conflict-this-time-he-has-targeted-china" target="_blank">दुनिया भर में मचा हड़कंप! Donald Trump ने छेड़ा एक और संघर्ष! इस बार निशान China पर साधा, महायुद्ध का ख़तरा मंडराया</a></h3><h2>इंग्लैंड की ज़रूरतें और अमेरिका का महत्व</h2><p>इंग्लैंड में इंडस्ट्रियल इजेशन की शुरुआत हो चुकी थी इसलिए वहां पर रॉ मटेरियल की बहुत जरूरत थी ऐसे में अमेरिका रॉ मटेरियल उपलब्ध कराने के लिए सबसे सही जगह थी जहां रिसोर्स की कमी नहीं थी। इसके साथ ही इंग्लैंड को अपने तैयार प्रोडक्ट को बेचने के लिए एक बड़ी मार्केट की भी जरूरत थी और ऐसे में अमेरिका में मजदूरों और किसानों की भी जरूरत थी उस समय इंग्लैंड में एक पॉलिसी के चलते वहां के कई किसान लैंडलेस हो गए क्रिमिनल्स और भिखारियों की संख्या इंग्लैंड में बढ़ती चली गई थी फाइनेंशियल प्रॉब्लम से परेशान ऐसे ही लोगों को ब्रिटिश कंपनी अपने खर्च पर अमेरिका ले जाती थी और उनसे मजदूरी करवाती थी इस तरह अमेरिक कॉलोनी में ब्रिटेन जर्मनी फ्रांस अफ्रीका के साथ-साथ वहां के नेटिव लोगों का ग्रुप बसा हुआ था इस तरह यहां पर एक मिक्स्ड कल्चर सोसाइटी का जन्म हुआ सभी के डिफरेंट कल्चर होने के बाद भी कॉमन प्रॉब्लम होने के चलते यहां के लोगों में काफी यूनिटी थी यही कारण है कि यहां के लोगों में डेमोक्रेटिक आइडिया का भी डेवलपमेंट होने लगा इसी बीच अमेरिका में कॉलोनी को लेकर इंग्लैंड और अन्य देश के बीच कई लड़ाइयां भी हुई 1649 से 1658 तक इंग्लैंड और हॉलैंड के बीच तीन वॉर हुए इस वॉर में हॉलैंड को हार मिली जिसके चलते इंग्लैंड को न्यू एमस्टरडम मिला जिसका नाम बाद में न्यूयॉर्क रखा गया इसके बाद इंग्लैंड और फ्रांस के बीच कॉलोनी को लेकर टसल शुरू हुआ जिसमें 1713 में फ्रांस युद्ध हार गया जी हां दोस्तों जिसके चलते एग्रीमेंट के अकॉर्डिंग फ्रांस को स्टॉ केसिया नॉर्थ अमेरिका में हडसन की खाड़ी और न्यू फाउंडलैंड जैसी कॉलोनी से अपना कब्जा छोड़ना पड़ा लेकिन इसके बाद इंग्लैंड और फ्रांस के बीच कुछ कॉलोनी को लेकर लगातार टसल जारी रहा जिसके बाद अमेरिका की हिस्ट्री का सबसे फेमस वॉर शुरू हुआ जिसे ये सेवन इयर्स वॉर के नाम से जाना जाता है यह 1756 से 1763 तक लगातार जारी रहा इस वॉर में फ्रांस की हार हुई जिसके बाद पैरिस एग्रीमेंट के अकॉर्डिंग सेंट लॉरेंस नदी के ईस्ट का मिसिसिप्पी का पूरा एरिया इंग्लैंड को देना पड़ा तो इस तरह अमेरिका में ब्रिटेन की 13 कॉलोनियां बन चुकी थी।</p><h2>तीन पार्ट में बंटी अमेरिकी कॉलोनी&nbsp;</h2><p>अमेरिक कॉलोनी को तीन पार्ट में डिवाइड किया जा सकता है नॉर्थ पार्ट में मैसाचुसेट्स न्यू हैम शयर और रोड्स आइलैंड यह पहाड़ी और बर्फी एरिया थे जो खेती के लायक नहीं थे। इंग्लैंड को यहां से मछली और लकड़ी प्राप्त होती थी मिड पार्ट में न्यूयॉर्क न्यू जर्सी मैरीलैंड जैसी कॉलोनी थी जहां से शराब और चीनी जैसी इंडस्ट्री चलती थी। साउथ पार्ट में नॉर्थ कोलिन साउथ कोलिन जॉर्जिया वर्जीनिया थे यहां का क्लाइमेट गर्म है इसलिए यहां मेनली ग्रीन शुगर केन तंबाकू कपास और बागानी फसलों का प्रोडक्शन होता था। इंग्लैंड इन कॉलोनी को सिर्फ अपने फायदे के लिए इस्तेमाल कर रहा था दोस्तों जी हां इन कॉलोनी से कच्चा माल लेकर इंग्लैंड अपने यहां पर इंडस्ट्रीज में भेजता और फिर वहां प्रोडक्शन कर यहां अधिक दामों में बेच देता था जिसके कारण यहां के लोगों में गुस्सा लगातार बढ़ता जा रहा था यहां पर असल रूल अटलांटिक महासागर के पार से ब्रिटिश राज और अंग्रेजी पार्लियामेंट के द्वारा होता था हालांकि हर कॉलोनी में गवर्नर को एडवाइस देने के लिए एक इलेक्टेड असेंबली होती थी लेकिन फिर भी कॉलोनी के लिए कानून बनाने का अधिकार ब्रिटिश पार्लियामेंट को ही था कॉलोनी में एडमिनिस्ट्रेशन के हाई पोजीशंस पर इंग्लैंड से अधिकारी भेजे जाते थे इंग्लैंड की सरकारों का यह भरोसा था कि कॉलोनी के लोग हायर एडमिनिस्ट्रेशन पोजीशन के लिए क्वालिफाइड नहीं है।</p><h2>अमेरिकी फ्रीडम मूवमेंट और 19 अप्रैल 1775 का कनेक्शन</h2><p>अमेरिका के फ्रीडम मूवमेंट की शुरुआत 19 अप्रैल 1775 को लेक्सिंगटन के वॉर से हुआ बोस्टन के नजदीक लेक्सिंगटन में मैसाचुसेट्स ने बस्टन के गवर्नर द्वारा भेजी गई सेना पर आक्रमण कर दिया इसमें हार-जीत का निर्णय नहीं हो सका इसके बाद कॉलोनी ने फिलाडेल्फिया में 1776 में फिर से दूसरी कॉन्टिनेंटल कांग्रेस बुलाई जिसमें स्टेट्स को मिलाकर यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ अमेरिका नाम दिया गया इसके बाद 4 जुलाई 1776 को सभी राज्यों के रिप्रेजेंटेटिव ने मिलकर अपने आप को ब्रिटेन से आजाद घोषित कर लिया आजादी घोषणा के साथ ही कॉन्फ्रेंस ने मिलकर वाशिंगटन को अपना सेनापति नियुक्त किया और सभी ने मिलकर लड़ने के संकल्प लिया ब्रिटेन ने इस रिवोल्यूशन को कुचलने के लिए 45000 सैनिक भेजे थे दोस्तों 1776 के आखिरी छ महीनों में ब्रिटेन की फौज ने न्यूयॉर्क से कैनेडा तक विद्रोहियों की धज्जियां उड़ा दी जनरल विलियम हाव की लीडरशिप में वाशिंगटन की फौज को न्यूयॉर्क से लावेयर नदी तक खदेड़ दिया गया लेकिन फिर इसी के बाद अमेरिकन की जीत का सिलसिला शुरू होता है वाशिंगटन ने साल खत्म होते होते एक बड़ी जीत हासिल कर ली नए साल में ब्रिटिश हमला फिर से शुरू हुआ तब तक अमेरिकियों को अंग्रेजों के दुश्मन फ्रांस से हथियार और पैसा मिलना शुरू हो गया था।&nbsp; फरवरी 1778 में फ्रांस ने अमेरिक आजादी को मान्यता दे दी और यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ अमेरिका की आर्मी से ट्रीटी कर ली।&nbsp;</p>]]></description>
      <pubDate>Fri, 03 Jul 2026 16:14:13 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/how-did-america-gain-independence-250-years-ago</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Bangladesh से बजा चाइनीज अलार्म भारत के लिए कितना बड़ा खतरा? अब 'मुनरो डॉक्ट्रिन' लागू करने का टाइम आ गया]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/chinese-alarm-sounding-from-bangladesh-time-come-to-implement-monroe-doctrine]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>बचपन में कछुए और खरगोश की रेस वाली कहानी तो हम सबने सुनी है? रफ्तार के घमंड में चूर खरगोश पेड़ की छांव में सोता रह गया और कछुआ धीरे-धीरे बाजी मार ले गया। आज दक्षिण एशिया के समंदर में भारत और चीन के बीच ठीक यही कहानी दोहराई जा रही है, और इसका सबसे ताजा व खतरनाक गवाह बांग्लादेश का मोंगला पोर्ट बना है। कहानी की शुरुआत में बाजी भारत के हाथ में थी। नई दिल्ली ने बीजिंग को सीधी शिकस्त देकर इस रणनीतिक पोर्ट के अपग्रेडेशन का प्रोजेक्ट अपने नाम किया था। लगा कि रेस जीत ली गई है, लेकिन कछुए की चाल चल रहे चीन ने हार नहीं मानी, वो चुपचाप अपनी गोटियां फिट करता रहा। देखते ही देखते 10 साल बीत गए! ढाका बीजिंग से हाथ मिला चुका था और जो डील भारत की मुट्ठी में थी, वह चीन की झोली में जा गिरी थी। तो बांग्लादेश का मोंगला पोर्ट हाथ से जाना भारत के लिए कितना बड़ा झटका है? क्या चीन एक और छोर से भारत को घेरने की कोशिश कर रहा है। अब भारत क्या कर सकता है? इन तमाम सवालों का एमआरआई स्कैन करेंगे।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/china-inching-closer-to-the-chicken-neck-via-the-teesta-issue" target="_blank">तीस्ता के बहाने चिकन नेक के करीब बढ़ रहा चीन? भारत ने जताई चिंता तो ड्रैगन का आया ये जवाब</a></h3><h2>मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग के तहत बंदरगाहों के इस्तेमाल की इजाजत</h2><div>भारत के पूर्वोत्तर राज्यों के लिए मोंगला पोर्ट एक लाइफ लाइन की तरह है। समुद्र से कटे होने की वजह से इन राज्यों तक सामान पहुंचाना हमेशा एक चुनौती रही है। मोंगला पोर्ट के जरिए सामान समुद्री रास्ते से पहुंचाया जा सकता है। इससे भारत के 22 किमी चौड़े चिकन नेक पर भी निर्भरता कम होगी। ट्रांसपोर्टेशन कॉस्ट घटेगी और देश के बाक़ी हिस्सों से पूर्वोत्तर भारत का आर्थिक संपर्क बेहतर हो जाता। 2009 से 2024 तक 15 साल बांग्लादेश पर आवामी लीग के नेता शेख हसीना का शासन रहा। इन 15 सालों में शेख हसीना को भारत का सबसे भरोसेमंद पड़ोसी नेता माना जाता था। दोनों देशों के बीच व्यापार बढ़ा। इस दौर में कनेक्टिविटी समझौते हुए और बांग्लादेश ने भारत को अपने पूर्वोत्तर राज्यों तक पहुंचने के लिए अपनी जमीन इस्तेमाल करने की इजाजत भी दी। बदले पर भारत ने भी शेख हसीना सरकार का खुलकर साथ दिया, निवेश किया। कोरोना जैसे कठिन समय में मदद पहुंचाई और कूटनीतिक समर्थन भी दिया। इसी माहौल में 2015 में भारत और बांग्लादेश के बीच एक अहम एमओयू पर दस्तखत हुए। मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग इस समझौते के तहत बांग्लादेश ने अपने दो बड़े बंदरगाह चटगांव और मोंगला का इस्तेमाल भारत को अपने पूर्वोत्तर राज्यों तक सामान पहुंचाने के लिए करने की इजाजत दी।&nbsp;</div><h2>मोंगला पोर्ट के पास 110 एकड़ जमीन भी भारत को दी गई</h2><div>दोनों देशों के बीच कनेक्टिविटी बढ़ाने की दिशा में इसे एक बड़ी सफलता माना गया। इसी योजना के तहत मोंगला पोर्ट के पास 110 एकड़ जमीन भी भारत को दी गई ताकि वहां एक स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन बनाया जा सके। प्लान था कि भारत वहां फैक्ट्रियां लगाएगा, गोदाम बनाएगा और एक इंडस्ट्रियल हब तैयार करेगा। इससे भारतीय कंपनियों को फायदा होता। बांग्लादेश में रोजगार पैदा होता और दोनों देशों के आर्थिक रिश्ते और मजबूत होते। साथ ही उस इलाके में भारत की मौजूदगी भी बढ़ाता। जहां चीन भी अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रहा था। 2018 में भारत ने इस प्रोजेक्ट के लिए हीरानं ग्रुप को डेवलपर चुना। बाद में उसकी सहयोगी कंपनी एविटा कंस्ट्रक्शंस प्राइवेट लिमिटेड ने मार्च 2022 में बांग्लादेश इकोनॉमिक जोन अथॉरिटी बेजा के साथ एक नया समझौता भी किया। डील पर डील होती रही, योजनाएं बनती रही लेकिन काम कभी शुरू भी नहीं हुआ। 2 साल की तय समय सीमा भी निकल गई लेकिन जमीन पर एक फावड़ा तक नहीं चला। फिर आया 204 जुलाई और अगस्त में बांग्लादेश में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन शुरू हो गए। शुरुआत सरकारी नौकरियों में आरक्षण के खिलाफ छात्र आंदोलन से हुई। उस समय सरकार नौकरियों का करीब 1/3 हिस्सा 1971 के मुक्ति संग्राम के सेनानियों के परिवारों के लिए आरक्षित कर रही थी। प्रदर्शनकारियों&nbsp; का आरोप था कि इस व्यवस्था का इस्तेमाल शेख हसीना अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत करने के लिए कर रही हैं। लेकिन देखते ही देखते बात बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और लंबे समय से चले आ रहे सत्तावादी शासन से नाराज हजारों युवा सड़कों पर उतर आए। आखिरकार 5 अगस्त 2024 को शेख हसीना ने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दिया और बांग्लादेश छोड़कर भारत आ गई। तब से लेकर अब तक भारत में ही वह रह रही हैं। इसके बाद नोबेल शांति पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस के लीडरशिप में अंतरिम सरकार बांग्लादेश में बनी। यहीं से भारत और बांग्लादेश के रिश्तों में बड़ा मोड़ आया।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/bangladesh-awards-teesta-project-to-china-major-threat-to-the-chicken-neck" target="_blank">बांग्लादेश ने चीन को दिया तीस्ता प्रोजेक्ट, चिकन नेक पर बड़ा खतरा!</a></h3><h2>देरी की कीमत</h2><div>पिछले 15 साल में जो भरोसा और साझेदारी बनी थी उसमें दरार पड़नी शुरू हो गई। दोनों देशों के बीच सीमा पर तनाव बढ़ा। व्यापार को लेकर जवाबी कदम उठाए गए एक दूसरे पर और नेताओं के बयान भी पहले से ज्यादा तल्ख हो गए। इसी दौरान बांग्लादेश ने पाकिस्तान के साथ भी अपने रिश्ते तेजी से बढ़ाने शुरू कर दिए। 1971 के बाद पहली बार ढाका और इस्लामाबाद के बीच सीधी कारगो शिपिंग सेवा और डायरेक्ट फ्लाइट्स का ऐलान किया गया। इन सारी डेवलपमेंट्स पर चीन की पैनी नजर थी। इस बीच मार्च 2025 में मोहम्मद यूनुस बीजिंग पहुंचे। बस तभी चीन ने अपना तुरुब का इक्का चला। उसने दो बड़े ऐलान किए। पहला मूंगला पोर्ट को एडवांस बनाने के लिए $40 करोड़ देने का वादा। दूसरा एक नए चीनी इंडस्ट्रियल इकोनॉमिक ज़ोन के लिए $35 करोड़ के निवेश का ऐलान। यानी चीन सिर्फ दिलचस्पी नहीं दिखा रहा था। बल्कि बड़े पैमाने पर निवेश करने के लिए तैयार था।&nbsp;</div><h2>समुद्र में बढ़त</h2><div>चीन इससे पहले बांग्लादेश के चटगांव नौसैनिक बंदरगाह के निकट पेकुआ पनडुब्बी अड्डा बनाने का काम भी कर रहा है। इससे बांग्लादेश की नौसेना भी पूरी तरह चीन की मुट्ठी में होगी। इसी बहाने बांग्लादेश के समुद्र तटों पर, जो भारत के समुद्री इलाके में ही हैं, चीन ने अपनी पनडुब्बियों और युद्धपोतों को भी तैनात करने की सुविधा हासिल कर ली है। सीमाओं के पास चीन अपने खुफिया एजेंटों व सैनिकों को तैनात कर सकता है। CPEC की तरह ही चीन ने बांग्लादेश से चीन-म्यांमार-बांग्लादेश आर्थिक गलियारा (CMEC) में शामिल होने को कहा है। पाकिस्तान के ग्वादर, बांग्लादेश के चटगांव और श्रीलंका के हम्बनटोटा बंदरगाह को चीन म्यांमार से होकर गुजरने वाला प्रस्तावित राजमार्ग बना लेगा तो उसके लिए यह सामरिक तौर पर उपयोगी होगा। भारत के चारों ओर 'मोतियों का हार' डाल कर सामरिक दबाव बढ़ाने की जिस रणनीति पर काम चीन ने इस सदी में शुरू किया था, वह लागू होता दिख रहा है।</div><h2>नई दिल्ली को&nbsp; 'मुनरो डॉक्ट्रिन' की सख्त जरूरत</h2><div>इतिहास उन देशों के प्रति कभी उदार नहीं रहा जो रणनीतिक सुस्ती या अत्यधिक संकोच को 'गंभीर संयम' समझने की भूल कर बैठते हैं, और भारत आज बिल्कुल इसी संवेदनशील मोड़ पर खड़ा है। जहाँ नई दिल्ली अब भी पड़ोसियों के साथ पुरानी सद्भावना और सहयोग की भाषा बोल रही है, वहीं चीन चुपचाप केवल ताक़त और कड़े आर्थिक प्रभाव की भाषा में बात कर रहा है। क्योंकि महाशक्तियां अपना दबदबा रातों-रात नहीं, बल्कि एक-एक कर दी गई ढील, रणनीतिक चूक और गलतफहमियों की किस्तों में खोती हैं। अब बांग्लादेश को ही देख लीजिए। संप्रभुता के अधिकार का हवाला देकर उसने एक बार फिर चीन का हाथ थाम लिया है और भले ही कागज़ पर ढाका को अपने आर्थिक साझीदार चुनने का पूरा हक हो, लेकिन भू-राजनीति कभी किसी शून्य में काम नहीं करती जहाँ आपके फैसलों से पड़ोसी की सुरक्षा ही खतरे में पड़ जाए। अगर भारत ने अब भी अपनी इस रणनीतिक संतुष्टि को छोड़कर अपने पड़ोस में एक ऐसी स्पष्ट 'लक्ष्मण रेखा' नहीं खींची जिसे पार करने की कोई जुर्रत न कर सके, तो वह दिन दूर नहीं जब भारत खुद को चारों तरफ से रणनीतिक रूप से घिरा हुआ पाएगा। सुरक्षा की 'लक्ष्मण रेखा' खींचना कोई भारत की खोजी हुई कूटनीति नहीं है, बल्कि यह भू-राजनीति का सबसे पुराना और बुनियादी नियम है! महाशक्तियां अपने पड़ोस में किसी दुश्मन की आहट तक बर्दाश्त नहीं करतीं। अमेरिका ने अपने पड़ोस में रूस या चीन की नौसैनिक मौजूदगी को कभी पनपने नहीं दिया। याद कीजिए वेनेजुएला के निकोलस मादुरो का क्या हश्र हुआ था? रूस ने यूक्रेन के साथ ठीक यही किया, भले ही मॉस्को से इससे बेहतर तरीके की उम्मीद थी। और खुद चीन? ताइवान या दक्षिण चीन सागर में मामूली सी सैन्य हलचल पर भी बीजिंग युद्ध की धमकी देने लगता है। तो फिर बड़ा सवाल यह है कि आखिर दुनिया में सिर्फ भारत ही क्यों यह नाटक करता रहे कि उसके ठीक पड़ोस में खड़ा हो रहा दुश्मन का खतरनाक रणनीतिक ढांचा, कोई सैन्य चक्रव्यूह नहीं बल्कि सिर्फ एक 'साधारण व्यापारिक निवेश' है? जब दुनिया का हर ताकतवर मुल्क अपने आंगन की सुरक्षा के लिए आंखें लाल कर सकता है, तो यही वजह है कि आज नई दिल्ली को अपनी खुद की 'मुनरो डॉक्ट्रिन' यानी भारत की अपनी 'लक्ष्मण रेखा' खींचने की सख्त जरूरत है। जब साल 1823 में अमेरिकी राष्ट्रपति जेम्स मुनरो ने यह ऐलान किया था कि कोई भी बाहरी ताकत पश्चिमी गोलार्ध&nbsp; में दखल नहीं देगी, तब अमेरिका कोई वैश्विक महाशक्ति नहीं था। उसके पास कोई बहुत बड़ी सैन्य ताकत नहीं थी। लेकिन इसके बावजूद उन्होंने एक कड़क लक्ष्मण रेखा खींचने का हौसला दिखाया—कि अमेरिका का पड़ोस किसी भी दुश्मन महाशक्ति की रणनीतिक घुसपैठ के लिए खुला नहीं है।</div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 01 Jul 2026 14:28:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/chinese-alarm-sounding-from-bangladesh-time-come-to-implement-monroe-doctrine</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[किडनैप कर किया गैंगरेप, सिगरेट से दागा और सड़क पर फेंक दी क्षत-विक्षत लाश, कश्मीरी पंडित सरला भट्ट की कहानी, 36 साल बाद यासीन पर चार्जशीट फाइल]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/story-of-kashmiri-pandit-sarla-bhat-chargesheet-filed-against-yasin-after-36-years]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>14 अप्रैल 1990 श्रीनगर का शेर कश्मीर इंस्टट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेस सरला भट्ट नाम की एक 25 साल की नर्स अपना काम खत्म करके हॉस्टल के कमरे में आराम कर रही होती है। तभी अचानक जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के हथियारबंद आतंकी उनके कमरे में घुसते हैं। बंदूक की नोक पर सरला को अगवा करते हैं। लगातार चार दिनों तक इस कश्मीरी पंडित नर्स का सामूहिक बलात्कार किया जाता है। उसे तरह-तरह की यातनाएं दी जाती हैं। फिर पांचवें दिन 18 अप्रैल को उसकी लाश श्रीनगर के डाउनटाउन में फेंक दी जाती है। खून से रिसता हुआ शरीर और शरीर में गोलियों के निशान और कई अंग कटे हुए होते हैं जो उसके साथ हुई क्रूरता की गवाही दे रहे थे। लाश के साथ एक हाथ से लिखा हुआ नोट भी पड़ा हुआ था जिसमें जेकेएलएफ के दहशतगर्दों ने सरला भट्ट को पुलिस का मुखबिर बताया था। उसकी हत्या करने की बात कबूली थी। 36 साल तक सरला का परिवार न्यायिक इंतजार में था। 2017 और 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने दो बार घाटी में कश्मीरी पंडितों के साथ हुए अत्याचार की दोबारा जांच की याचिका को खारिज कर दिया। लेकिन 12 अगस्त 2025 को स्टेट इन्वेस्टिगेशन एजेंसी ने इस केस को फिर से खोला और अब यह खबर आई है कि एजेंसी ने यह केस सुलझा लिया है। कट टू 29 जून 2026 यानी करीब 36 साल बाद जम्मू कश्मीर लिस की स्टेट इन्वेस्टिगेशन एजेंसी ने 29 जून को एक संदेश के साथ&nbsp; प्रेस नोट जारी किया। ना कोई आतंकी अपराध भुलाया जाएगा ना कोई अपराधी कानून की पकड़ से बच पाएगा। जम्मू कश्मीर पु बताया कि एजेंसी ने करीब 36 साल पुराने सरला भट्ट अपहरण और हत्याकांड मामले में श्रीनगर की टाडा कोर्ट में 737 पन्नों की चार्जशीट दाखिल की है। इसमें अलगाववादी संगठन जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट यानी जेकेएलएफ के लीडर यासीन मलिक समेत पांच लोगों के नाम है। यासीन मलिक फिलहाल तिहाड़ जेल में बंद है और उम्र कैद की सजा काट रहा है। चार्ज शीट के मुताबिक सरला भट्ट को अगवा किया गया, टॉर्चर किया गया था और फिर उनकी हत्या कर दी गई थी। केस के पांच आरोपियों में से तीन की मौत हो चुकी है। जबकि एक आरोपी अभी फरार है। पुलिस जांच ये कर रही है कि हत्या यासीन मलिक के कहने पर की गई थी या फिर नहीं। आज हम सरला भट्ट केस की कहानी जानेंगे। कौन थी सरला भट्ट? 36 साल पहले किस तरह जेकेएलएफ के आतंकियों ने उनका अपहरण कर उनकी हत्या कर दी थी और इस मामले में यासिन मलिक का नाम कैसे जुड़ा।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/yasin-malik-charge-sheet-filed-against-jklf-chief-in-36-year-old-sarla-bhat-rape-murder-case" target="_blank">Yasin Malik पर कसा शिकंजा: 36 साल पुराने Sarla Bhat रेप-मर्डर केस में JKLF चीफ पर चार्जशीट</a></h3><h2>1990 की वो खौफनाक दास्तान जिसे भुलाया नहीं जा सकता</h2><div>साल 1990 का दौर घाटी में रहने वाले अल्पसंख्यक कश्मीरी पंडितों के लिए किसी बुरे सपने से कम नहीं था। इसी खौफनाक दौर की एक बेहद दर्दनाक और रूह कंपा देने वाली कहानी है सरला भट्ट की। अनंतनाग की रहने वाली 27 वर्षीय सरला भट्ट पेशे से एक नर्स थीं, जो श्रीनगर के सौरा स्थित 'शेर-ए-कश्मीर इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज' (SKIMS) में अपनी सेवाएं दे रही थीं। लेकिन कश्मीरी पंडित होने के कारण वे उस दौर में पनपे चरमपंथ की क्रूर शिकार बनीं।</div><h2>अपहरण और पांच दिनों का मानसिक व शारीरिक टॉर्चर</h2><div>यह खौफनाक सिलसिला 14 अप्रैल 1990 को शुरू हुआ। सरला भट्ट SKIMS के 'हब्बा खातून हॉस्टल' में थीं, जब हथियारबंद आतंकी बंदूक की नोक पर उनका अपहरण कर ले गए। अगले पांच दिनों तक उनका कोई सुराग नहीं मिला। विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स और ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार, इन पांच दिनों के दौरान आतंकियों ने उन्हें बंधक बनाकर रखा, उनके साथ सामूहिक बलात्कार किया और उन्हें अमानवीय यातनाएं दीं।&nbsp;</div><h2>सड़क पर मिला क्षत-विक्षत शव</h2><div>अपहरण के पांच दिन बाद, 19 अप्रैल 1990 को सरला भट्ट का बेहद क्षत-विक्षत और क्षत-विक्षत शव सड़क पर फेंका हुआ मिला। दरिंदगी की हद यह थी कि उनके शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर दिए गए थे। उनके बेजान जिस्म के पास आतंकियों ने एक नोट भी छोड़ा था, जिसमें अपनी इस बर्बरता को सही ठहराने के लिए सरला को पुलिस का 'मुखबिर' बताया गया था।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/pakistani-intruder-caught-in-poonch-loc-operation-sheruwali-rajouri" target="_blank">LoC पर Pakistani घुसपैठिया दबोचा गया, सुरक्षा बलों की सतर्कता से नाकाम हो गयी साजिश</a></h3><h2>कानूनी जांच और विसंगतियां</h2><div>इस जघन्य हत्याकांड को लेकर निगीन पुलिस स्टेशन में एफआईआर संख्या 56/1990 दर्ज की गई थी। हालांकि, राष्ट्रीय दैनिक 'द हिंदू' की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इस आधिकारिक दस्तावेज में उनके साथ हुई यौन हिंसा (रेप) का कोई उल्लेख नहीं किया गया था, जो उस दौर की प्रशासनिक और कानूनी व्यवस्था की कमियों को उजागर करता है। इस पूरे मामले में प्रतिबंधित संगठन जेकेएलएफ (JKLF) के तत्कालीन नेता पीर नूरुल हक शाह उर्फ 'एयर मार्शल' का नाम मुख्य आरोपी के रूप में सामने आया था।</div><h2>सरला भट्ट की हत्या क्यों की गई?</h2><div>SKIMS श्रीनगर के सौरा इलाके में स्थित था, जिसे कश्मीरी में 'सोवुर' भी कहा जाता है। उस समय यह इलाका जेकेएलएफ और उसके समर्थकों का गढ़ माना जाता था। सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में घायल हुए जेकेएलएफ के सदस्यों को इलाज के लिए अक्सर इसी अस्पताल में लाया जाता था। भट्ट का उनसे अक्सर सामना होता था। जांच से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, इन सदस्यों को शक होने लगा था कि SKIMS में काम करने वाली एक कश्मीरी पंडित नर्स, घायलों के बारे में जानकारी पुलिस या खुफिया एजेंसियों तक पहुंचा सकती है। भट्ट को कई बार धमकियां भी दी गईं, लेकिन उन्होंने नौकरी नहीं छोड़ी। 8 अप्रैल 1990 को, खुफिया जानकारी के आधार पर जम्मू कश्मीर पुलिस ने नरवारा में छापेमारी की और जेकेएलएफ के बड़े सदस्यों को पकड़ने की कोशिश की। उस समय वहाँ मौजूद मलिक ने पुलिस को देख लिया, लेकिन वह घायल होने के बावजूद भागने में कामयाब रहा। जांच से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, चार्जशीट में कहा गया है कि मलिक ने यह नतीजा निकाला था कि शायद किसी कश्मीरी पंडित नर्स ने पुलिस को खबर दी थी। हालांकि, इस नतीजे का कोई सबूत नहीं था। इसके बजाय, एसआईए की चार्जशीट में साफ़ तौर पर कहा गया है कि भट पर मुखबिर होने का आरोप पूरी तरह से झूठा था और इसे एक पहले से सोची-समझी हत्या को अंजाम देने का बहाना बनाने के लिए गढ़ा गया था। 18 अप्रैल 1990 की सुबह, भट को उनके अस्पताल के पास से बंदूक की नोक पर अगवा कर लिया गया था। अगले दिन जब उनका शव मेडिकल इंस्टिट्यूट के पास के इलाके मल्लाबाग से मिला, तो उनके शरीर पर कई गोलियों के निशान थे। उनके शव के पास हाथ से लिखा एक नोट मिला, जिसमें उन पर पुलिस मुखबिर होने का आरोप लगाया गया था। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, कई कश्मीरी पंडित संगठनों ने आरोप लगाया कि हत्या से पहले भट को "यातना दी गई और उनके साथ बलात्कार किया गया"; हालांकि, पुलिस रिपोर्ट में सिर्फ़ हत्या का ज़िक्र था। उनकी बेरहमी से हत्या के बाद, जम्मू कश्मीर पुलिस ने श्रीनगर के नगीन पुलिस स्टेशन में अज्ञात उग्रवादियों के खिलाफ़ मामला (FIR नंबर 56/1990 के तहत) दर्ज किया। जांच में बहुत कम प्रगति हुई और 1990 के दशक की शुरुआत में पुलिस द्वारा दर्ज की गई कई FIR को आखिरकार 'अनट्रेस्ड' (बिना किसी सुराग के) मानकर बंद कर दिया गया।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/india-gives-a-strong-retort-to-china-and-pakistan-at-the-un-meeting" target="_blank">UN की बैठक में China-Pakistan को भारत का करारा जवाब, कहा- Kashmir हमारा आंतरिक मामला है</a></h3><h2>SIA ने भट की हत्या की जांच कब दोबारा शुरू की?</h2><div>जम्मू कश्मीर डीजीपी के आदेश पर मार्च 2024 में यह केस एसआईए जम्मू कश्मीर को सौंप दिया गया था। पिछले साल अगस्त में एसआईए ने भट की हत्या की जांच फिर से शुरू की। एजेंसी ने श्रीनगर में कई जगहों पर छापेमारी की, जिसमें मलिक और पूर्व कमांडर जावेद अहमद मीर के घर के अलावा जेकेएलएफ के छह अन्य संदिग्ध सदस्य भी शामिल थे।&nbsp;</div><h2>चार्जशीट में क्या आरोप लगाए गए हैं?</h2><div>चार्जशीट में मलिक के साथ चाल्कू का भी ज़िक्र है, जिसकी पहचान उस व्यक्ति के तौर पर हुई है जिसने गोली चलाई थी। जैसा कि पहले बताया गया है, बाकी तीन लोग शेख, सोफी और टपलू मारे जा चुके हैं। मलिक अभी टेरर फंडिंग के एक अलग मामले में न्यायिक हिरासत में है। वह उम्रकैद की सज़ा काट रहा है। माना जाता है कि चाल्कू पीओके भाग गया है। अधिकारियों ने उसके ख़िलाफ़ उद्घोषणा की कार्यवाही शुरू कर दी है। जम्मू कश्मीर पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया: जांच से पता चला कि सुश्री सरला भट को आखिरी बार 18 अप्रैल 1990 को दोपहर करीब 2:30 बजे SKIMS में जीवित देखा गया था और उसके बाद JKLF के आतंकवादियों ने उनका अपहरण कर लिया था। चश्मदीदों और सुरक्षित गवाहों ने लगातार कहा है कि उन्हें बुचपोरा क्रॉसिंग के पास आरोपी के साथ देखा गया था, जिसके बाद उन्हें इलाहीबाग-लाल बाज़ार इलाके की ओर ले जाया गया, जहाँ उनके साथ बेरहमी से मारपीट की गई, उन्हें घसीटा गया, प्रताड़ित किया गया और आखिरकार 18 अप्रैल 1990 की शाम को ऑटोमैटिक राइफल से गोली मारकर उनकी हत्या कर दी गई। इन आरोपों में रणबीर दंड संहिता (RPC) के तहत अपहरण, गलत तरीके से रोकना, हत्या, आपराधिक साजिश और सबूत नष्ट करना, साथ ही TADA और आर्म्स एक्ट के संबंधित प्रावधान शामिल हैं। एक सीनियर पुलिस अधिकारी ने मीडिया को बताया कि SIA की जांच से यह पक्के तौर पर साबित होता है कि 18 अप्रैल 1990 को JKLF के आतंकवादियों ने संगठन के कमांड स्ट्रक्चर के तहत रची गई आपराधिक साजिश के तहत सुश्री सरला भट का अपहरण किया, उन्हें प्रताड़ित किया और उनकी हत्या कर दी। चश्मदीदों के बयान, मेडिकल और बैलिस्टिक जांच के नतीजे, आतंकी हमले की जिम्मेदारी लेने वाला नोट, इलेक्ट्रॉनिक सबूत, गवाहों के बयान और आसपास की परिस्थितियां मिलकर सबूतों की एक ऐसी ठोस और पुख्ता कड़ी बनाती हैं जो यह साबित करती है कि यह हत्या कोई अलग-थलग घटना नहीं थी, बल्कि कश्मीरी पंडित समुदाय के खिलाफ JKLF के सुनियोजित और लक्षित हिंसा अभियान का हिस्सा थी। इस अभियान का मकसद दहशत फैलाना और कश्मीरी पंडितों को कश्मीर घाटी से जबरन पलायन के लिए मजबूर करना था।</div><h2>चार्जशीट दाखिल करने में 35 साल क्यों लगे?</h2><div>एसआईए के अनुसार, सालों तक उग्रवादी समूहों के लगातार डर और धमकियों की वजह से गवाह सामने आने से हिचकिचाते रहे। मार्च 2024 में मामला SIA को सौंपे जाने के बाद, जांचकर्ताओं ने पूरे मामले को फिर से खोला, पुराने रिकॉर्ड की दोबारा जांच की और नए बयान तथा फोरेंसिक, बैलिस्टिक, मेडिकल और इलेक्ट्रॉनिक सबूत इकट्ठा किए। एजेंसी ने कहा कि उसने दशकों में जमा किए गए सुरक्षित गवाहों के बयानों, स्वतंत्र चश्मदीदों के बयानों, दस्तावेज़ी रिकॉर्ड और वैज्ञानिक सबूतों के आधार पर घटनाओं के पूरे क्रम को फिर से तैयार किया।</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 30 Jun 2026 14:06:03 +0530</pubDate>
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      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[1 लाइन ने बिगाड़ दिया पूरा खेल, क्या है MoU का आर्टिकल-5? जिस पर फिर से भिड़ गए अमेरिका-ईरान]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/what-is-article-5-of-the-mou-over-which-the-us-and-iran-have-clashed-again]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>अमेरिका और ईरान के बीच बारूद का धुआं अभी छंटा भी नहीं था कि दोनों देश एक नए 'चक्रव्यूह' में फंस गए हैं। दुश्मनी की आग ठंडी करने के लिए जो समझौता हुआ था, अब वही समझौता दोनों के बीच नई जंग की वजह बन गया है। पिछले वीकेंड पर दोनों देशों ने एक-दूसरे पर इतने ताबड़तोड़ पलटवार किए कि महज़ 11 दिन पुराना शांति समझौता वेंटिलेटर पर आ गया था। दुनिया तीसरे विश्व युद्ध की आशंका से कांप रही थी। लेकिन आखिरी कगार पर पहुंचकर दोनों ने अपनी 'सैन्य गतिविधियों' को रोका और अब मंगलवार को कतर की राजधानी दोहा में दोनों महाशक्तियां फिर से मेज पर आमने-सामने बैठने जा रही हैं। इस आपातकालीन युद्धविराम ने दुनिया के सिर से महायुद्ध का तात्कालिक खतरा तो टाल दिया है, लेकिन सुलगता हुआ असली सवाल आज भी वहीं खड़ा है। समुद्र के सबसे बड़े सुल्तान का ताज किसके सिर सजेगा?</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/amidst-intense-bombardment-an-indian-ship-unleashed-a-massive-blast" target="_blank">भीषण बमबारी के बीच भारत के जहाज ने किया तगड़ा धमाका, देखती रह गई दुनिया!</a></h3><h2>आर्टिकल 5 विवाद का मुख्य कारण कैसे बना?</h2><div>समझौता ज्ञापन का आर्टिकल 5 ईरान के खिलाफ अमेरिका-इजरायल युद्ध के कारण महीनों से बाधित समुद्री व्यापार को फिर से शुरू करने पर केंद्रित है। इस क्लॉज (धारा) के तहत ईरान के लिए यह अनिवार्य किया गया है कि वह वाणिज्यिक जहाजों की सुरक्षित आवाजाही की सुविधा दे और उन सभी सैन्य व तकनीकी बाधाओं को हटाए जो सामान्य शिपिंग को रोक रही हैं। ईरान केवल 60 दिनों के लिए फारस की खाड़ी से ओमान की खाड़ी और इसके विपरीत (आने-जाने वाले) वाणिज्यिक जहाजों के सुरक्षित मार्ग के लिए बिना किसी शुल्क के अपने सर्वोत्तम प्रयासों का उपयोग करके व्यवस्था करेगा। इस समझौते के तहत तेहरान को 30 दिनों के भीतर सैन्य बाधाओं को हटाने, बारूदी सुरंगों को साफ करने और अंतर्राष्ट्रीय कानून व तटीय राज्यों के अधिकारों के अनुरूप हॉर्मुज जलडमरूमध्य के भविष्य के प्रबंधन को तय करने के लिए ओमान और अन्य खाड़ी देशों के साथ मिलकर काम करने की आवश्यकता है। हालांकि दोनों पक्ष जलमार्ग को फिर से खोलने पर सहमत हो गए हैं, लेकिन ऐसा लगता है कि इस संक्रमण काल&nbsp; के दौरान शिपिंग को कैसे संभाला जाए, इसे लेकर दोनों अलग-अलग निष्कर्षों पर पहुंचे हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/trump-issues-a-direct-warning-to-iran-stating-that-any-escalation-of-conflict-will-lead-to-war" target="_blank">Donald Trump की ईरान को सीधी चेतावनी, कहा- संघर्ष बढ़ा तो होंगे गंभीर परिणाम, US Army का एक्शन जारी</a></h3><h2>ईरान का रुख और संप्रभुता का दावा</h2><div>भले ही अंतरिम समझौते में वाणिज्यिक यातायात को फिर से शुरू करने की बात कही गई है, लेकिन ईरान का कहना है कि इस जलडमरूमध्य से होने वाला नेविगेशन (आवाजाही) अभी भी उसके अधिकार क्षेत्र में है। रविवार को बगदाद की यात्रा के दौरान ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा कि समझौता स्पष्ट रूप से तेहरान की भूमिका को स्वीकार करता है। हॉर्मुज जलडमरूमध्य अगले 30 दिनों तक ईरान की पूरी निगरानी और प्रबंधन में रहेगा, और सभी बाधाएं हटने के बाद, इस जलमार्ग की पूरी क्षमता बहाल कर दी जाएगी। हम इसी पर काम कर रहे हैं। उन्होंने आगे जोड़ा कि यह जिम्मेदारी पूरी तरह से इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान की है। इस मामले में कोई दूसरा पक्ष या देश शामिल नहीं है। समझौता ज्ञापन (MoU) के तहत यह पूरी तरह से स्पष्ट है, और किसी भी तरह का हस्तक्षेप या एकतरफा कार्रवाई स्थिति को और खराब करेगी और जलडमरूमध्य को फिर से खोलने में देरी का कारण बनेगी।</div><h2>हालिया तनाव कैसे बढ़ा</h2><div>ताज़ा संकट तब शुरू हुआ जब होर्मुज़ जलडमरूमध्य से गुज़रने वाले कमर्शियल जहाज़ों पर हमले हुए। शुक्रवार को सिंगापुर के झंडे वाले 'एवर लवली' (Ever Lovely) जहाज़ पर एक ड्रोन से हमला हुआ, जबकि एक दिन बाद पनामा के झंडे वाले 'किकू' (Kiku) जहाज़ पर हमला किया गया। ईरान ने इनमें से किसी भी घटना की ज़िम्मेदारी नहीं ली। इसके जवाब में अमेरिका ने ईरान की मिसाइल और ड्रोन सुविधाओं, तटीय रडार ठिकानों और अन्य सैन्य बुनियादी ढांचों पर हमले किए। अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने कहा कि ये हमले कमर्शियल शिपिंग के ख़िलाफ़ ईरान की लगातार आक्रामकता के सीधे जवाब में किए गए थे। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी सैन्य कार्रवाई का बचाव करते हुए कहा कि ईरान ने युद्धविराम समझौते का उल्लंघन किया है। ट्रंप ने 'ट्रुथ सोशल'&nbsp; पर लिखा, हो सकता है कि एक समय ऐसा आए जब हम और ज़्यादा समझदारी से काम न ले पाएँ, और हमें उस काम को सैन्य तरीक़े से पूरा करने के लिए मजबूर होना पड़े जिसे हमने बहुत सफलतापूर्वक शुरू किया था। अगर ऐसा हुआ, तो इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ़ ईरान का अस्तित्व ही नहीं रहेगा। ईरान ने इन आरोपों को खारिज कर दिया और कहा कि अमेरिकी हमले अंतरराष्ट्रीय क़ानून और खुद उस मेमोरेंडम (समझौते), दोनों का उल्लंघन थे। बाद में, इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने कुवैत और बहरीन में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाते हुए जवाबी मिसाइलें और ड्रोन दागे।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/iranian-drone-strikes-hit-bahrain-attack-on-tanker-shakes-the-strait-of-hormuz" target="_blank">US-Iran शांति समझौते पर ग्रहण! ईरान ने Bahrain में खोला New Front, बढ़ा संघर्ष</a></h3><h2>एक ही समझौते की अलग-अलग व्याख्याएं</h2><div>हालिया टकराव ने आर्टिकल 5 की अलग-अलग व्याख्याओं को साफ तौर पर उजागर किया है। वॉशिंगटन का कहना है कि समझौता बिना किसी रोक-टोक के कमर्शियल नेविगेशन की गारंटी देता है और उसने ओमान तथा अंतरराष्ट्रीय समुद्री अधिकारियों से जुड़े वैकल्पिक शिपिंग इंतज़ामों का समर्थन किया है। हालांकि, ईरान इस बात से सहमत है कि शिपिंग फिर से शुरू होनी चाहिए, लेकिन सभी जहाजों को तेहरान के साथ तालमेल बनाए रखना होगा क्योंकि समझौते को लागू करने की अवधि के दौरान यह जलडमरूमध्य (स्ट्रेट) ईरानी प्रशासन के नियंत्रण में है। पिछले हफ़्ते यह विवाद तब और गहरा गया जब आईआरजीसी ने जहाजों को ईरानी समुद्री सीमा के भीतर केवल उत्तरी शिपिंग कॉरिडोर का इस्तेमाल करने का निर्देश दिया। समुद्री निगरानी फर्म 'विंडवर्ड AI' के अनुसार, ओमान के समुद्री क्षेत्र से दक्षिणी रास्ते का इस्तेमाल कर रहे चार टैंकरों को वापस लौटने के लिए मजबूर होना पड़ा, जबकि कई अन्य जहाजों ने अपना रास्ता बदल लिया। इसके बाद इस जलडमरूमध्य से होने वाली शिपिंग में कमी आई। बुधवार को जहां रोज़ाना 70 जहाज गुज़रते थे, वहीं शनिवार तक यह संख्या घटकर सिर्फ़ 40 रह गई।</div><h2>दोहा बातचीत से एक नया मौका मिला है</h2><div>मिडिल ईस्ट में लगातार बढ़ते तनाव के बीच अब एक ऐसी खबर सामने आई है जिसने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। जिनेवा में शुरुआती बातचीत के बाद अब अमेरिका और ईरान एक बार फिर आमने-सामने बैठने जा रहे हैं। इस बार बातचीत का मंच होगा क़तर की राजधानी दोहा जहां दोनों देशों के प्रतिनिधि होर्मज स्ट्रेट को लेकर चल रहे सबसे बड़े विवाद का समाधान तलाशने की कोशिश करेंगे। यह वही होर्मज स्ट्रेट है जहां से दुनिया के लगभग पांचवें हिस्से का कच्चा तेल समुद्री रास्ते से गुजरता है। इसलिए यहां पैदा होने वाला कोई भी संकट केवल अमेरिका और ईरान तक सीमित नहीं रहता बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था, तेल की कीमतों और समुद्री व्यापार को प्रभावित करता है। अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार मंगलवार को होने वाली इस बैठक का मुख्य उद्देश्यहाल के दिनों में पैदा हुए तनाव को कम करना और अंतरराष्ट्रीय जहाजों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करना है। दोनों देशों ने फिलहाल सैन्य कारवाही रोकने और बातचीत के जरिए समाधान निकालने पर सहमति जताई है। इसका मतलब यह है कि फिलहाल ना अमेरिका कोई नया हमला करना चाहता है और ना ही ईरान स्थिति को और ज्यादा बिगाड़ना चाहता है। हालांकि यह समझौता अभी बेहद नाजुक दौर में है। युद्ध विराम लागू हुए अभी केवल 11 दिन ही हुए हैं और दोनों देशों के बीच भरोसे का संकट पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने साफ चेतावनी दी है कि यदि ईरान ने समझौते की शर्तों का उल्लंघन किया तो अमेरिका दोबारा सैन्य कारवाई करने से पीछे नहीं हटेगा। ट्रंप ने यहां तक कहा कि जरूरत पड़ी तो अमेरिका काम पूरा करेगा। यहीं ईरान के खिलाफ और कठोर कदम उठाए जाएंगे। इसी बीच विवाद का सबसे बड़ा कारण बना है हॉर्मोस जलडमरू मध्य। वॉलस्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के मुताबिक ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अरागची का दावा है कि शुरुआती शांति समझौते के तहत हॉर्मोंस में यातायात प्रबंधन का विशेष अधिकार ईरान को मिला है। यानी कौन सा जहाज किस मार्ग से गुजरेगा इसमें ईरान की महत्वपूर्ण भूमिका होगी। लेकिन अमेरिका इस दावे को पूरी तरह खारिज कर रहा है।</div><h2>जहाजों से शुल्क वसूलने के संकेत</h2><div>ईरान पहले भी संकेत दे चुका है कि भविष्य में&nbsp; स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों से शुल्क लिया जा सकता है। हालांकि अमेरिका और खाड़ी देशों ने इस प्रस्ताव को पूरी तरह खारिज कर दिया है। ऐसे में&nbsp; स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर दोनों देशों के बीच विवाद अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। समझौते में यह भी कहा गया था कि ईरान अपने पड़ोसी देशों के साथ मिलकर भविष्य की समुद्री प्रबंधन व्यवस्था तैयार करेगा। लेकिन अब यही समझौता दोनों देशों के बीच नई व्याख्या का विषय बन गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि दोहा की बैठक केवल होर्मुज तक सीमित नहीं होगी। इसमें भविष्य की समुद्री सुरक्षा, तेल आपूर्ति, क्षेत्रीय स्थिरता और अमेरिका ईरान संबंधों के अगले चरण पर भी चर्चा हो सकती है। यदि यह वार्ता सफल रहती है तो वैश्विक बाजारों को राहत मिल सकती है और तेल की कीमतों में स्थिरता आने की संभावना बनेगी। लेकिन यदि बातचीत विफल होती है तो मिडिल ईस्ट एक बार फिर बड़े सैन्य टकराव की ओर बढ़ सकता है। यानी फिलहाल दुनिया की निगाहें दोहा पर टिकी हैं। सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि अमेरिका और ईरान क्या फैसला लेते हैं बल्कि यह भी है कि क्या यह बातचीत स्थाई शांति की शुरुआत बनेगी या फिर यह केवल अगले टकराव से पहले का एक छोटा विराम साबित होगी।&nbsp;</div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 29 Jun 2026 14:38:08 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/what-is-article-5-of-the-mou-over-which-the-us-and-iran-have-clashed-again</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[अशोक सिंघल से नजदीकी, इंदिरा ने भेजा जेल, रामलला के पटवारी की अनसुनी कहानी, जिसे देना पड़ा अपने पद से इस्तीफा]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/who-is-champat-rai-who-held-the-reins-of-the-entire-ram-mandir-trust]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>रामचरितमानस में कहा गया है कि होइ है सोई जो राम रचराखा। अयोध्या के जिस राम मंदिर को बनवाने के लिए 550 साल की लड़ाई राम भक्तों ने लड़ी जिसके लिए ना जाने कितने लोग जेल गए, कितनों ने प्राण दे दिए, कितनों की आंखें इंतजार में दुनिया छोड़कर चली गई। कितने मांओं ने अपने बच्चों को न्योछावर कर दिया। जब वो राम मंदिर भव्य बनकर तैयार हुआ तो लगा कि अब राजा राम की भक्ति में कोई कोर कसर नहीं रखी जाएगी। लेकिन क्या हमारे अपने राम भक्तों ने रामलला के मंदिर में लालच को नहीं छोड़ा, करप्शन कर दिया, पैसा लूट लिया भक्तों का। हां आरोप यही लग रहा है कि करोड़ों राम भक्त जो रामलला के दर्शन करने जाते हैं और अपनी औकात के हिसाब से ₹1, ₹100, सोना-चांदी, गहना मंदिर में चढ़ा कर आते हैं। यह आरोप लग रहा है कि उस पैसे में लूट घसोट हुई है। अयोध्या के राम मंदिर दान चोरी मामले की जांच कर रही एसआईटी ने अपनी रिपोर्ट सौंप दी और इसके बाद एक्शन का दौर भी शुरू हुआ। एफआईआर हुई, गिरफ्तारियां शुरू हुई और पूछताछ अभी भी जारी है। इस पूरे विवाद के बीच एक नाम सबसे ज्यादा चर्चा में है। वह हैं चंपत राय। राम जन्मभूमि ट्रस्ट के दो सदस्य चंपत राय और अनिल मिश्रा ने इस्तीफा दे दिया है। एसआईटी की शुरुआती रिपोर्ट में कठोर संस्तुति के बाद यह बड़ा फैसला लिया गया। आखिर कौन है चंपत राय? कैसे एक केमिस्ट्री प्रोफेसर राम मंदिर आंदोलन का सबसे प्रभावशाली चेहरा बन गया और अब जब चढ़ावे की कथित चोरी पर सवाल उठ रहे हैं तो उनके खिलाफ आवाजें क्यों तेज हो रही हैं?</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/major-revelation-regarding-donation-theft-at-ayodhya-ram-mandir" target="_blank">Ayodhya Ram Mandir में दान चोरी का बड़ा खुलासा, CCTV को धोखा देकर Staff ऐसे करता था हेराफेरी</a></h3><h2>कौन हैं चंपत राय</h2><p>चंपत राय का जन्म 1946 में उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले में हुआ था। कम उम्र में ही उनका जुड़ाव राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी आरएसएस से हो गया। उच्च शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने धामपुर के आश्रम डिग्री कॉलेज में केमिस्ट्री के प्रोफेसर के रूप में नौकरी शुरू की। लेकिन उनकी जिंदगी का रास्ता बदलने वाला था। 1975 में&nbsp; इंदिरा गांधी ने देश में इमरजेंसी का ऐलान कर दिया था। विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारी होने लगी। जब देश में विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारी हो रही थी। तब चंपत राय बिजनौर के डिग्री कॉलेज में बच्चों को कैमेस्ट्री पढ़ा रहे थे। तभी अचानक कॉलेज के कॉरिडोर में शोर होने लगा। उन्होंने देखा तो गेट पर कुछ पुलिसकर्मी खड़े थे। फिर पुलिसवाले कॉलेज के प्रिंसिपल के पास चले गए। थोड़ी देर बाद कॉलेज का चपरासी चंपत राय की क्लास में आया और बोला कि आपको प्रिसिंपल बुला रहे हैं। वो प्रिसिंपल के पास पहुंचे तब पुलिस वाले ने चंपत राय से कहा कि वो उन्हें गिरफ्तार करने आए हैं। तो चंपत राय ने कहा कि मैं अभी छात्रों को पढ़ा रहा हूं। आप अभी जाइए मैं अपनी क्लास खत्म करके खुद थाने आ जाऊंगा। चंपत राय सुनने के बाद पुलिसवाले वहां से चले गए। क्लास खत्म होने के बाद चंपत राय थाने पहुंचे जहां पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। वो 18 महीने जेल में रहे। चंपत राय की ये गिरफ्तारी इमरजेंसी के दौरान ही हुई थी। 1980 में जेल से रिहा होने के बाद चंपत राय ने नौकरी से इस्तीफा दिया। वो संघ के प्रचारक बन गए। संघ में उनके काम को देखते हुए तत्कालीन सरसंघचालक रज्जू भैय्या प्रभावित हो गए। उसके बाद उन्होंने राम मंदिर की लड़ाई लड़ने के लिए&nbsp;</p><h2>अशोक सिंघल के 'अदृश्य सारथी'</h2><p>राम जन्मभूमि आंदोलन के इतिहास में चंपत राय का नाम एक ऐसे रणनीतिकार के रूप में दर्ज है, जिन्होंने पर्दे के पीछे रहकर पूरी पटकथा लिखी। राम मंदिर ट्रस्ट के महासचिव बनने से पहले तक आम जनता में उनकी पहचान भले ही सीमित रही हो, लेकिन संघ और आंदोलन के भीतर उनका कद बेहद मजबूत था। चंपत राय की सबसे बड़ी खूबी उनका समावेशी दृष्टिकोण था। उन्होंने राम मंदिर आंदोलन को किसी एक वर्ग विशेष तक सीमित नहीं रहने दिया, बल्कि सवर्ण समाज से आगे ले जाकर समाज के हर तबके तक इसकी पहुंच बनाई। देश भर में चले ऐतिहासिक 'शिला पूजन' और घर-घर से ईंटें जुटाने के अभियान के पीछे चंपत राय का ही दिमाग था। राम काज मिलने के बाद चंपत राय अवध के गांव गांव घूमे। अगर अशोक सिंघल विश्व हिंदू परिषद और आरएसएस का मुखर चेहरा थे, तो चंपत राय इसके मूक शिल्पकार थे, जो हमेशा लो-प्रोफाइल रहकर आंदोलन को धरातल पर आकार दे रहे थे।</p><h2>अवध से आंदोलन की कमान और जनता में जगाया भरोसा</h2><p>अशोक सिंघल के बेहद करीबी रहे एक प्रचारक के मुताबिक, चंपत राय को 1991 में अवध प्रांत के क्षेत्रीय मंत्री की अहम जिम्मेदारी सौंपी गई थी। उस दौर में अयोध्या और आसपास के स्थानीय लोगों में मंदिर को लेकर चल रही लंबी कानूनी लड़ाई की वजह से एक तरह की निराशा घर कर गई थी। चंपत राय ने न सिर्फ इस निराशा को दूर किया, बल्कि स्थानीय समाज को सीधे आंदोलन से जोड़कर उनमें यह विश्वास जगाया कि कानूनी लड़ाई में हिंदू पक्ष की जीत निश्चित है।&nbsp;</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/ram-mandir-donation-row-possibility-of-fir-being-registered-based-on-sit-report" target="_blank">Ayodhya राम मंदिर चंदा विवाद: SIT रिपोर्ट सौंपे जाने के बाद FIR की तैयारी, जल्द हो सकती हैं गिरफ्तारियां</a></h3><h2>क्यों कहा जाने लगा रामलला का पटवारी</h2><p>राम जन्मभूमि से जुड़े तमाम कानूनी दस्तावेज, साक्ष्य और अदालती मुकदमों की बारीकियां चंपत राय की देखरेख में ही थीं। केस के हर पहलू पर उनकी सीधी पकड़ थी। अदालत की सुनवाई के दौरान वकीलों और आंदोलन से जुड़े लोगों के बीच समन्वय को जिम्मेदारी से संभाला। उनकी इसी मेहनत और समर्पण के कारण लोग उन्हें रामलला का पटवारी भी कहने लगे। जब 2019 में सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया और राम मंदिर निर्माण का रास्ता साफ हुआ तब बने श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट में चंपत राय को महासचिव की जिम्मेदारी दी गई। यहीं से उनकी ताकत और प्रभाव दोनों बढ़े। मंदिर निर्माण, ट्रस्ट का प्रशासन, मीडिया से संवाद, व्यवस्थाएं, बड़े फैसलों पर चंपत राय सबसे प्रमुख चेहरे बनते गए। ट्रस्ट में कई बड़े नाम मौजूद थे। लेकिन माना जाता रहा कि वास्तविक संचालन की कमान चंपत राय के हाथ में थी।&nbsp;</p><h2>कैसे शुरू हुआ पूरा मामला</h2><p>मामले की शुरुआत 7 जून को हुई। तब पूर्व मंत्री और सपा नेता पवन पांडेय ने चढ़ावे में 5-7 करोड़ की चोरी का दावा किया। इसके बाद अखिलेश ने भी मुद्दे को उठाया और सरकार व ट्रस्ट की चुप्पी को संदिग्ध बताया। नौ जून को भाजपा नेता डॉ. रजनीश सिंह ने पीएम को पत्र लिखकर सीबीआई जांच की मांग की। इस बीच, मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्र भी आयोध्या पहुंचे लेकिन उन्होंने इस पर कोई बात नहीं की। मंदिर के पूर्व अकाउंट इंचार्ज महिपाल सिंह ने दावा किया कि लंबे समय से गड़बड़ी हो रही थी। उन्होंने शीर्ष प्रबंधन से इसकी शिकायत की। कार्रवाई के बजाय उन्हें पद से हटा दिया गया। दरअसल खुद को पूर्व लेखा प्रभारी बताने वाले महिपाल सिंह ने मीडिया से बातचीत में एक दावा किया है। आरोप लगाया है कि जब वह मंदिर में तैनात थे तब चढ़ावे में आने वाले सोने चांदी के जेवर और बर्तनों का कहीं कोई रिकॉर्ड ही नहीं होता था। यह कहां जमा होते थे इसकी जानकारी सिर्फ चंपत राय और टिन्नू को होती थी। टिन्नू चंपत राय के नजदीकी हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक टिन्नू उर्फ रामशंकर यादव पहले चंपत राय के ड्राइवर अब उनके सहयोगी हैं।</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/aap-mp-sanjay-singh-big-claim-will-hand-over-evidence-of-the-ram-mandir-land-scam-to-the-sit" target="_blank">AAP MP Sanjay Singh का बड़ा दावा: Ram Mandir ज़मीन घोटाले के सबूत SIT को सौंपेंगे</a></h3><h2>ट्रस्ट का गठन कैसे हुआ</h2><p>नवंबर 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या मामले पर अपना ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। इसके बाद केंद्र सरकार को राम मंदिर के निर्माण और उसके प्रबंधन के लिए एक ट्रस्ट बनाने का निर्देश दिया गया। इसी के बाद 5 फरवरी 2020 को केंद्र सरकार ने श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के गठन की घोषणा की। यही ट्रस्ट आज राम मंदिर के निर्माण, उसके रखरखाव, मंदिर में आने वाले दान और पूरे राम जन्मभूमि परिसर के प्रबंधन की जिम्मेदारी संभाल रहा है। ट्रस्ट बनने के कुछ दिनों बाद इसकी पहली बैठक हुई। इसमें महंत नृत्य गोपाल दास को ट्रस्ट का अध्यक्ष चुना गया। जबकि चंपत राय को महासचिव बनाया गया। इसके बाद राम मंदिर निर्माण का काम तेजी से आगे बढ़ने&nbsp; लगा। देश भर के लोगों ने खुलकर दान दिया। किसी ने ₹100 दिए, किसी ने हजारों और लाखों रुपए दिए। बड़े उद्योगपति से लेकर आम श्रद्धालुओं तक लाखों लोगों ने मंदिर निर्माण में योगदान दिया। फिर 22 जनवरी 2024 को रामलला की प्राण प्रतिष्ठा हुई। इसके बाद अयोध्या आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या में जबरदस्त बढ़ोतरी देखने को मिली।</p><h2>राम मंदिर में कितना दान आता है</h2><p>इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट के मुताबिक वित्तीय वर्ष 204-25 में ट्रस्ट को कुल ₹327 करोड़ मिले। यह डाटा राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्टकी सालाना रिपोर्ट में बताया गया है। ₹327 करोड़ में से 153 करोड़ श्रद्धालुओं के दान से आए। जबकि लगभग ₹173 करोड़ बैंक में जमा रकम और निवेश पर मिले ब्याज के थे। सिर्फ दान की बात करें तो मंदिर में रोजाना औसतन करीब 42 लाख का चढ़ावा आता है। यानी हर घंटे लगभग ₹175000 और हर मिनट करीब ₹2900 से भी ज्यादा और जब त्यौहार हो या कोई खास मौका हो, बड़ा मौका हो तो यह आंकड़ा और भी बढ़ जाता है। मंदिर के उद्घाटन वाले दिन ही लगभग 3 करोड़ 17 लाख का दान आया था। इस बात से आप अंदाजा लगा सकते हैं कि यहां कितनी बड़ी मात्रा में दान आता है, नकदी आती है। राम जन्मभूमि परिसर में अलग-अलग जगहों पर करीब 40 दान पेटियां रखी गई हैं। इसके अलावा ऑनलाइन दान की भी व्यवस्था है। दान पेटियों से निकली नगदी को तय प्रोसीजर के तहत एक सुरक्षित और गोपनीय कक्ष में ले जाया जाता है। वहां सीसीटीवी कैमरों की निगरानी में इसकी गिनती होती है। इस काम में ट्रस्ट के प्रतिनिधि और बैंक से जुड़े कर्मचारी शामिल रहते हैं। जानकारी के मुताबिक दान की गिनती की जिम्मेदारी स्टेट बैंक ऑफ इंडिया को दी गई है। बैंक ने इसके लिए एक निजी एजेंसी के कर्मचारियों को भी नियुक्त किया हुआ है। नोट गिनने की मशीनों और सिक्कों की मैनुअल गिनती के जरिए पूरी रकम का हिसाब किया जाता है। कई बार गिनती या नगदी इतनी ज्यादा होती है कि गिनती का काम 24 घंटे तक भी चलता रहता है। गिनती पूरी होने के बाद रकम को सुरक्षा के बीच बैंक में जमा करा दिया जाता है।</p><h2>किन धाराओं में केस हुआ और कितनी सजा का प्रावधान है</h2><table class="table table-bordered"><tbody><tr><td>&nbsp;<b>धारा</b></td><td><b>&nbsp;कब लगती है</b></td><td><b>&nbsp;अधिकतम सजा का प्रावधान</b></td></tr><tr><td>धारा 305 BNS</td><td>&nbsp;सुरक्षित स्थान (जैसे आवासीय घर, पूजा स्थल या वाहन/परिवहन साधन) में चोरी करना।</td><td>&nbsp;सजा: 7 साल तक की जेल और जुर्माना।</td></tr><tr><td>धारा 306 BNS</td><td>&nbsp;कर्मचारी/सेवक द्वारा चोरी।</td><td>&nbsp;7 साल तक की जेल और जुर्माना।</td></tr><tr><td>धारा 316(5) BNS</td><td>गंभीर विश्वासघात (सौंपी गई संपत्ति का गलत इस्तेमाल)।</td><td>&nbsp;उम्रकैद या 10 साल तक की जेल और जुर्माना।</td><td>&nbsp;</td></tr><tr><td>धारा 317(4) BNS</td><td>&nbsp;चोरी की संपत्ति को बार-बार रखना या उसका कारोबार करना।</td><td>&nbsp;उम्रकैद या 10 साल तक की जेल और जुर्माना।</td></tr><tr><td>धारा 317(5) BNS</td><td>&nbsp;चोरी की संपत्ति छिपाने या ठिकाने लगाने में मदद करना।</td><td>&nbsp;3 साल तक की जेल, जुर्माना या दोनों।</td></tr><tr><td>धारा 61 BNS</td><td>&nbsp;आपराधिक साजिश।</td><td>साजिश में शामिल अपराध के अनुसार सजा तय होती है।</td></tr><tr><td>&nbsp;धारा 3(5) BNS</td><td>&nbsp;संयुक्त जिम्मेदारी (कई लोगों द्वारा मिलकर अपराध करना)।</td><td>सभी आरोपियों पर समान रूप से जिम्मेदारी और सजा लागू होती है।</td></tr><tr><td>&nbsp;धारा 13(1)(a), भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम</td><td>किसी सरकारी कर्मचारी (Public Servant) द्वारा पैसों या पद का दुरुपयोग/भ्रष्टाचार करना।</td><td>&nbsp;कम से कम 4 साल और अधिकतम 10 साल की जेल तथा जुर्माना।</td></tr></tbody></table><h2>&nbsp;एसआईटी रिपोर्ट के बाद बड़ा एक्शन</h2><p>राम मंदिर चढ़ावा चोरी मामले में करीब 18 दिनों बाद श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने आखिरकार गुरुवार को एफआईआर दर्ज करा दी। इसमें ट्रस्ट महासचिव चंपत राय के ड्राइवर समेत 8 आरोपी बनाए गए हैं। हालांकि FIR में चंपत राय, डॉ. अनिल मिश्रा समेत अन्य बड़े पदाधिकारियों के नाम नहीं हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर प्रकरण की जांच के लिए ट्रस्ट का गठन हुआ था। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा था कि SIT की निष्पक्ष जांच से 'दूध का दूध और पानी का पानी' होकर रहेगा और दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा। ट्रस्ट के अनुरोध पर सरकार ने जांच के लिए 13 जून को SIT बनाई थी। 23 जून को इसने अपनी शुरुआती रिपोर्ट सरकार को सौंपी। एफआईआर दर्ज होने के तुरंत बाद 3 आरोपी टिन्नू, लवकुश और अनुकल्प को अरेस्ट कर लिया गया है। बाकी 5 आरोपियों को पुलिस ने हिरासत में लिया है।&nbsp;</p><h2>किन 8 आरोपियों पर हुई एफआईआर</h2><p><b>नाम: लवकुश मिश्रा</b></p><p>मंदिर में जिम्मेदारी: चढ़ावे और नकदी की काउंटिंग स्टाफ का सदस्य था।</p><p>आरोप: चढ़ावा चोरी करके करोड़ों की संपत्ति बनाई।</p><p>बरामदगी: घर से ₹12 लाख रुपये बरामद हुए।</p><p><b>नाम: रामशंकर यादव (टिंटू)</b></p><p>मंदिर में जिम्मेदारी: दानपात्रों की देखरेख और उन्हें बेसमेंट तक पहुंचाना।</p><p>आरोप: दानपात्र से करोड़ों रुपये गबन किए।</p><p>आरोप: अयोध्या और आसपास के जिलों में संपत्तियां बनाई।</p><p><b>नाम: अनुकल्प मिश्रा</b></p><p>मंदिर में जिम्मेदारी: गणना कक्ष में रुपयों की गिनती में शामिल रहता था।</p><p>आरोप: मंदिर के गणना कक्ष से रुपये चोरी करके बाथरूम में छिपाता था।</p><p>आरोप: इस तरह लाखों की संपत्ति बनाई।</p><p><b>नाम: सुभाष चंद्र श्रीवास्तव</b></p><p>मंदिर में जिम्मेदारी: कैश काउंटिंग स्टाफ के प्रभारी, स्टाफ को संभालता था।</p><p>आरोप: निगरानी में लापरवाही बरती।</p><p>आरोप: दान में आए रुपयों की चोरी में शामिल रहा।</p><p><b>नाम: करुणेश पांडेय</b></p><p>मंदिर में जिम्मेदारी: दान के रुपये गणना कक्ष तक लेकर आना और उनकी गणना करना।</p><p>आरोप: दान में आए रुपयों की चोरी करता था।</p><p>आरोप: अयोध्या के आसपास संपत्तियां खरीदीं।</p><p><b>नाम: मनीष यादव</b></p><p>मंदिर में जिम्मेदारी: दानपात्रों में आने वाले चढ़ावे की गिनती करना।</p><p>आरोप: मंदिर के चढ़ावे की चोरी।</p><p>बरामदगी: पुलिस ने उसके घर से ₹36 लाख रुपये बरामद किए।</p><p><b>नाम: अविनाश शुक्ला</b></p><p>मंदिर में जिम्मेदारी: दान के रुपये गणना कक्ष तक लेकर आना और उनकी गणना करना।</p><p>आरोप: दान में आए रुपये चोरी करता था।</p><p>आरोप: अयोध्या के आसपास संपत्तियां खरीदीं।</p><p><b>नाम: रामशंकर मिश्रा</b></p><p>मंदिर में जिम्मेदारी: दानपात्रों को गणना कक्ष तक लेकर आना और उनकी निगरानी करना।</p><p>आरोप: अन्य आरोपियों के साथ मिलकर दान में आए रुपयों में हेराफेरी करता था।</p><p><br></p><p>&nbsp;</p>]]></description>
      <pubDate>Fri, 26 Jun 2026 14:26:00 +0530</pubDate>
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      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[डील पक्की... लेकिन एक शर्त पर! आखिर भारत ने अमेरिका के सामने कौन सा 'सुरक्षा कवच' पटक दिया?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/deal-sealed-but-with-condition-what-exactly-is-the-security-shield-that-india-has-placed-before-us]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारत और अमेरिका के बीच में चल रहे ट्रेड टॉक्स में एक बहुत ही बड़ा ट्विस्ट आया है। या फिर यह भी कहना गलत नहीं होगा कि भारत ने अब अमेरिका की तरफ टेबल टर्न कर दिया है। अभी तक भारत अमेरिका के ऊपर यह शर्त लगा रहा था कि हम तब तक डील साइन नहीं करेंगे जब तक अमेरिका भारत को बाकी देशों के मुकाबले में कम टैरिफ ऑफर नहीं करेगा। अब भारत ने उसके साथ में एक और बहुत ही बड़ी डिमांड कर दी है। जिसमें कि भारत के द्वारा सनसेट क्लॉज़ की डिमांड की गई है। यह एक ऐसा नया और बड़ा दांव है, जिसे भारत ने अमेरिका के साथ चल रही इस महा-ट्रेड डील की मेज पर पटक दिया है! तो यह क्लॉज़ कुछ और नहीं, बल्कि भारत के लिए एक मजबूत 'सुरक्षा कवच' है। रिपोर्ट की मानें तो नई दिल्ली का वाशिंगटन से सीधा कहना है कि देखिए बॉस, आपकी आर्थिक नीतियां और फैसले इतनी तेजी से बदलते हैं कि अब हम केवल आपके खोखले वादों और आश्वासनों के भरोसे नहीं बैठ सकते! जिस रफ्तार से पिछले कुछ समय में अमेरिकन पॉलिसीज में बड़े उलटफेर देखने को मिले हैं, उसे देखते हुए इस ट्रेड डील में एक 'सनसेट क्लॉज़' का होना अब बेहद अनिवार्य हो चुका है और इसके बिना भारत इस डील में एक कदम भी आगे नहीं बढ़ाएगा। अब सवाल उठता है कि आखिर क्या है यह सनसेट क्लॉज़? भारत को अचानक इस क्लॉज़ को लाने की प्रेरणा कहाँ से मिली? अगर यह डील में शामिल होता है, तो इससे भारत को क्या-क्या बड़े फायदे होने वाले हैं? इन सभी कूटनीतिक और आर्थिक पहलुओं का आज हम एमआरआई स्कैन करेंगे।&nbsp;</div><h2>क्या है यह सनसेट क्लॉज़?</h2><div>सनसेट क्लॉज़ एक ऐसा प्रावधान है जो कि&nbsp; कई सारे समझौतों में, कई सारे एग्रीमेंट्स में देखने को मिलता है और यह मूलत: इंश्योरेंस मैकेनिज्म यानी सुरक्षा कवच की तरह फ्यूचर पॉलिसी चेंजेस के खिलाफ काम करता है। इसको बहुत ही सरल शब्दों में कहे तो एक तरीके का सुरक्षा कवच होता है। मतलब कि अगर आगे चलकर हालात बदल जाते हैं। दोनों पार्टीज में से कोई एक पार्टी किसी भी तरीके के बदलाव का ऐलान कर देती है, तो दोनों देशों को समझौते की शर्तों पर फिर से बैठकर के रीनेगोशिएट करना पड़ता है। फिर से बैठकर के बातचीत करनी पड़ती है। ऐसा बिल्कुल नहीं होने वाला कि आज भारत और अमेरिका किसी एग्रीमेंट पर साइन कर लें और साल भर बाद अमेरिका उठकर कह दे कि भईया, हम तो अपनी पॉलिसी बदल रहे हैं, लेकिन जो पुरानी डील साइन हुई थी, वो आप चुपचाप वैसे ही मानते रहिए! भारत का बिल्कुल साफ और कड़ा स्टैंड है कि जी नहीं, अब ऐसा नहीं चलेगा! अगर कल को अमेरिका अपनी नीतियां बदलता है, तो उस मनमानी और बड़े नीतिगत झटके से खुद को बचाने के लिए ही भारत इस डील में 'सनसेट क्लॉज़' को जोड़ने पर अड़ा हुआ है। यह क्लॉज़ भारत के लिए वो कानूनी ढाल है, जो अमेरिका को अपनी शर्तों से पीछे हटने पर दोबारा बातचीत की मेज पर आने के लिए मजबूर कर देगी!</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/mossad-was-about-to-kill-munir-but-at-the-last-moment-journalist-makes-a-major-revelation" target="_blank">मुनीर को मारने वाला था मोसाद! पाकिस्तान ने इजरायल को भेजा ऐसा मैसेज कि...</a></h3><h2>रिव्यू मैकेनिज्म पर जोर दे रहा है भारत?</h2><div>भारत द्वारा इस समय व्यापार समझौते में 'रिव्यू मैकेनिज्म' या 'सनसेट क्लॉज' (समीक्षा व समाप्ति शर्त) पर जोर देना, पिछले एक साल के दौरान अमेरिका के भीतर बदली आर्थिक नीतियों और अनिश्चितताओं से सीधा जुड़ा हुआ है। आमतौर पर अंतरराष्ट्रीय व्यापार वार्ताएं बाजार पहुंच, स्थिर टैरिफ दरों और नियमों के भरोसे पर आगे बढ़ती हैं, लेकिन जब कोई देश अपनी नीतियां बार-बार बदलता है, तो ये सारे अनुमान कमजोर पड़ जाते हैं। अमेरिकी बाजार में हाल ही में हुए टैरिफ संशोधनों, कानूनी विवादों और नीतिगत बदलावों को देखते हुए नई दिल्ली अब केवल मौखिक आश्वासनों के भरोसे कोई बड़ा जोखिम नहीं उठाना चाहती। असल चिंता व्यापार समझौते को लेकर नहीं, बल्कि इस बात को लेकर है कि भारत द्वारा बड़े नीतिगत वादे और निवेश कर दिए जाने के बाद अगर वाशिंगटन की परिस्थितियां अचानक बदल गईं, तो क्या होगा। यही वजह है कि भारत एक ऐसा 'सनसेट क्लॉज' चाहता है जो भविष्य में किसी भी बड़े नीतिगत झटके के खिलाफ एक मजबूत सुरक्षा कवच की तरह काम करे और आर्थिक आधार बदलने पर दोनों देशों को नए सिरे से मेज पर बैठने का कानूनी अधिकार दे।</div><h2>अमेरिकी व्यापार नीति में बदलावों ने भारत की चिंताएँ कैसे बढ़ाईं?</h2><div>भारत की सोच पर असर डालने वाली एक अहम घटना 20 फरवरी को हुई। उस दिन, अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने 6-3 से एक फ़ैसला सुनाया, जिसने अमेरिका में टैरिफ़ तय करने के अधिकार से जुड़े कानूनी ढांचे को बदल दिया। इस फ़ैसले में यह निष्कर्ष निकाला गया कि कुछ आपसी द्विपक्षीय टैरिफ़ लगाने के लिए पहले जिस कार्यकारी कानून का इस्तेमाल किया जाता था, वह अधिकृत नहीं था; इस तरह टैरिफ़ तय करने की शक्तियाँ असल में कांग्रेस को वापस मिल गईं। इस फ़ैसले के अहम नतीजे निकले क्योंकि इसने उन धारणाओं को बदल दिया जिन पर पहले व्यापार से जुड़ी बातचीत आधारित थी। फ़ैसले के बाद, टैरिफ़ के एक ऐसे ढांचे की उम्मीद कम निश्चित हो गई जिसके बारे में पहले काफ़ी हद तक अंदाज़ा लगाया जा सकता था। इसके बाद, अमेरिका टैरिफ़ के एक अलग ढांचे की ओर बढ़ गया, जबकि साथ ही वह व्यापार को लागू करने वाले अलग-अलग तरीकों पर भी निर्भर रहा। इनमें सबसे अहम हैं सेक्शन 301 के तहत होने वाली जांच, जो अमेरिकी व्यापार नीति का एक अहम हिस्सा बनी हुई हैं। यूनाइटेड स्टेट्स ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव के ऑफिस ने मार्च में जांच शुरू की, जिसमें मुख्य रूप से स्ट्रक्चरल एक्सेस कैपेसिटी (ज़रूरत से ज़्यादा उत्पादन क्षमता) और मैन्युफैक्चरिंग से जुड़ी चिंताओं पर ध्यान दिया गया। इन जांचों में कई अर्थव्यवस्थाएं शामिल हैं और अगर वॉशिंगटन इस नतीजे पर पहुंचता है कि कुछ विदेशी नीतियां अमेरिकी व्यापार पर बुरा असर डाल रही हैं, तो इसके चलते व्यापार से जुड़े और भी कदम उठाए जा सकते हैं। भारत के लिए इससे अनिश्चितता पैदा होती है। भले ही आज टैरिफ में छूट को लेकर बातचीत हो जाए, लेकिन जांच या नीतिगत फैसलों के कारण भविष्य में होने वाले व्यापारिक कदमों से उन छूटों का व्यापारिक मूल्य बदल सकता है। इन जाँचों से जुड़ी सार्वजनिक सुनवाई 7 जुलाई को होनी है। इससे यह संकेत मिलता है कि ट्रेड एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर होने के बाद भी टैरिफ से जुड़ी स्थिति में बदलाव जारी रह सकता है। 'सनसेट क्लॉज़' अमेरिका को अपने घरेलू ट्रेड कानूनों का इस्तेमाल करने से नहीं रोकेगा। बल्कि, यह भारत को एक औपचारिक मौका देगा कि अगर मूल आर्थिक समझौते में कोई बड़ा बदलाव होता है, तो वह अपनी प्रतिबद्धताओं पर फिर से विचार कर सके।&nbsp;</div><h2>भारत-अमेरिका ड्रेड टॉक में दांव पर क्या लगा है?</h2><div>टैरिफ (सीमा शुल्क) के मोर्चे पर, दोनों देशों के बीच चर्चा का मुख्य फोकस इस बात पर है कि भारतीय निर्यात को प्रभावित करने वाले शुल्कों को कैसे कम किया जाए और इसके साथ ही, भारतीय बाजार में अमेरिकी उत्पादों की पहुंच को कैसे बढ़ाया जाए। अमेरिका विशेष रूप से भारत में अपने कृषि उत्पादों जैसे कि ट्री नट्स (बादाम, अखरोट आदि), ताजे फल, सोयाबीन तेल और पशु चारे (जैसे ज्वार या सोरघम) के लिए बड़े अवसरों और रियायतों की तलाश कर रहा है। दूसरी ओर, भारत अपनी रणनीति पर अड़े रहते हुए अपने उन क्षेत्रों को पूरी तरह सुरक्षित रखने की कोशिश कर रहा है जो आर्थिक और राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील हैं, जिनमें मुख्य रूप से गेहूं, चावल और डेयरी उत्पाद शामिल हैं। बातचीत सिर्फ़ पारंपरिक सामानों के व्यापार तक ही सीमित नहीं है। ऊर्जा और टेक्नोलॉजी भी चर्चा के अहम हिस्से बन गए हैं। वॉशिंगटन अमेरिकी ऊर्जा उत्पादों के निर्यात को बढ़ाना चाहता है और साथ ही भारतीय बाज़ार में एडवांस्ड टेक्नोलॉजी वाले उपकरणों जिनमें डेटा-सेंटर हार्डवेयर और ग्राफ़िक्स प्रोसेसिंग यूनिट्स शामिल हैं। उनके लिए अपनी पहुँच बनाना चाहता है। इसके बदले, भारत से उम्मीद है कि वह इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स, एयरक्राफ्ट के पार्ट्स और फार्मास्यूटिकल्स जैसे प्रोडक्ट्स पर ड्यूटी कम करके अमेरिकी टेक्नोलॉजी सप्लाई चेन में अपनी भागीदारी को और मजबूत करेगा। हालांकि, इन मौकों के साथ कुछ ज़िम्मेदारियां भी जुड़ी हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत पांच साल की अवधि में 500 अरब डॉलर तक के अमेरिकी सामान खरीदने का वादा कर सकता है। ऐसे वादों के लिए लंबी अवधि की योजना और खरीद के तरीकों में बड़े बदलावों की ज़रूरत होगी, जिसमें रूसी कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता को धीरे-धीरे कम करना भी शामिल है। यही एक मुख्य कारण है कि भारत अतिरिक्त सुरक्षा उपायों की मांग कर रहा है।&nbsp;</div><h2>क्या इससे भारतीय इंडस्ट्री को चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है?</h2><div>एक चिंता का विषय अमेरिकी औद्योगिक सामान, एडवांस्ड मशीनरी, इन्फॉर्मेशन और कम्युनिकेशन टेक्नोलॉजी हार्डवेयर और मेडिकल डिवाइस की ज़्यादा पहुंच है। कई लोगों का तर्क है कि अच्छी क्वालिटी वाले इक्विपमेंट तक बेहतर पहुंच से प्रोडक्टिविटी बढ़ सकती है, इंडस्ट्रियल आधुनिकीकरण को बढ़ावा मिल सकता है और कॉम्पिटिटिवनेस बेहतर हो सकती है। हालांकि, उन भारतीय मैन्युफैक्चरर्स पर पड़ने वाले असर को लेकर भी चिंताएं हैं जो अभी सरकार समर्थित इंडस्ट्रियल प्रोग्राम के तहत विस्तार कर रहे हैं। खास तौर पर उन कंपनियों पर ध्यान दिया गया है जिन्हें प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीम से फायदा हो रहा है। इनमें से कई कंपनियां अभी भी प्रोडक्शन बढ़ा रही हैं और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण सेक्टर में क्षमताएं विकसित कर रही हैं। अगर टैरिफ में कटौती के बाद इम्पोर्ट तेज़ी से बढ़ता है, तो पॉलिसी बनाने वाले यह आकलन करना चाह सकते हैं कि क्या घरेलू इंडस्ट्री पर बुरा असर पड़ रहा है। 'सनसेट क्लॉज़' तीन से पांच साल बाद समीक्षा का एक व्यवस्थित मौका दे सकता है, जिससे अधिकारी औद्योगिक विकास, निवेश के तरीकों और मैन्युफैक्चरिंग में प्रतिस्पर्धा-क्षमता पर समझौते के असर का मूल्यांकन कर सकें। अनुमानों पर निर्भर रहने के बजाय, नीति-निर्माता यह तय करने से पहले असल नतीजों की जांच कर सकेंगे कि मौजूदा वादों को बिना किसी बदलाव के जारी रखा जाए या नहीं।&nbsp;</div><h2>क्या इससे भारत को दूसरे देशों पर बढ़त मिलेगी?</h2><div>अब आते हैं सबसे बड़े सवाल पर क्या इस पैंतरे से भारत अपने प्रतिद्वंदी देशों को पछाड़ पाएगा? जवाब है-बिल्कुल! भारत इस ट्रेड डील के जरिए अमेरिकी बाजार में ऐसी 'स्पेशल एंट्री' यानी तरजीही पहुंच&nbsp; चाहता है, जो उसे एशिया की बाकी प्रतिस्पर्धी इकोनॉमीज़ के मुकाबले एक बहुत बड़ा एडवांटेज दे दे। भारत का यह दांव विशेष रूप से टेक्सटाइल (कपड़ा उद्योग), लेदर (चमड़ा), इंजीनियरिंग प्रोडक्ट्स, केमिकल्स और फूड प्रोसेसिंग जैसेक्टर्स के लिए गेम-चेंजर साबित हो सकता है। इसकी वजह यह है कि ये सारे उद्योग बहुत ही कम प्रॉफिट मार्जिन पर काम करते हैं। इसका मतलब ये हुआ कि टैक्स या टैरिफ दरों में होने वाला जरा सा भी अंतर या छोटा सा बदलाव भी यह तय कर देता है कि अमेरिकी बायर्स किस देश को करोड़ों का कॉन्ट्रैक्ट सौंपेंगे। रिपोर्ट्स की मानें तो नई दिल्ली ने अमेरिका के सामने साफ तौर पर ऐसी शर्तें रखी हैं, जो भारतीय एक्सपोर्टर्स को वियतनाम और कई आसियान देशों जैसे क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धियों के मुकाबले कहीं ज्यादा मजबूत स्थिति में खड़ा कर देंगी। दरअसल, भारत की सबसे बड़ी चिंता यही है कि आज जो ट्रेड डील बड़े चाव से साइन की जा रही है, उसकी वैल्यू कल को तब कौड़ियों के भाव हो जाएगी, जब अमेरिका बाद में किसी और देश को इससे भी ज्यादा रियायतें दे देगा। बस, इसी घाटे से बचने के लिए भारत यह पूरी बिसात बिछा रहा है। सामने आ रही खबरों से पता चलता है कि वॉशिंगटन ने चल रही व्यापार प्रक्रियाओं के तहत अलग-अलग विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के लिए टैरिफ की अलग-अलग कैटेगरी पर विचार किया है। खबरों के अनुसार, भारत को कुछ खास फ्रेमवर्क के तहत 12.5 प्रतिशत की प्रस्तावित अतिरिक्त ड्यूटी का सामना करना पड़ सकता है, जबकि इंडोनेशिया और पाकिस्तान जैसे देशों को 10 प्रतिशत वाली कैटेगरी में रखा गया है। भारतीय एक्सपोर्टर्स के लिए, इस तरह के अंतर के महत्वपूर्ण कमर्शियल नतीजे हो सकते हैं।</div><div>कुल मिलाकर देखा जाए तो, यह सनसेट क्लॉज़ कंम्पटीशन को पूरी तरह खत्म नहीं करेगा, लेकिन यह भारत को एक ऐसा 'लीगल बैकअप' और लिखित मौका जरूर दे देगा कि अगर कल को प्रतिद्वंदी देश अमेरिकी बाजार में भारत से भी बेहतर और सस्ती पहुंच हासिल कर लेते हैं, तो भारत इस पूरे एग्रीमेंट को री-ओपन कर सके और अमेरिका से कह सके कि अब शर्तों को दोबारा बदलो!</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 25 Jun 2026 14:06:16 +0530</pubDate>
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      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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