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    <title><![CDATA[Hindi News - News in Hindi - Latest News in Hindi | Prabhasakshi]]></title>
    <description><![CDATA[Latest News in Hindi, Breaking Hindi News, Hindi News Headlines, ताज़ा ख़बरें, Prabhasakshi.com पर]]></description>
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      <title><![CDATA[ Trump-Netanyahu के बीच क्यों हुआ झगड़ा, ईरान को कैसे इससे मिल गया बड़ा मौका?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/why-did-the-fight-between-trump-netanyahu-happen-how-did-iran-get-a-big-opportunity-from-this]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>ईरान को घुटनों पर लाने के लिए जिस अमेरिका और इजराइल ने कंधे से कंधा मिलाकर बम बरसाए थे, आज वही दोनों महाशक्तियां आपस में भिड़ गई हैं। वजह कोई जमीन का टुकड़ा नहीं, बल्कि वही 'ईरान' है जिस पर दोनों मिलकर फतह पाना चाहते थे। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के बीच 19 मई की रात हुई एक सीक्रेट फोन कॉल ने दोनों देशों के रिश्तों में छिपे तनाव को दुनिया के सामने ला दिया है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह बातचीत इतनी तीखी थी कि इसके बाद नेतन्याहू गुस्से से तमतमा उठे थे। अमेरिकी मीडिया आउटलेट्स सीएनएन और एग्जिओस ने खुफिया सूत्रों के हवाले से इस महा-तनाव की इनसाइड स्टोरी पब्लिश की है। सूत्रों के मुताबिक, करीब एक घंटे चली इस मुश्किल कॉल के बाद नेतन्याहू का पारा सातवें आसमान पर था। अमेरिकी अधिकारियों ने तंज कसते हुए कहा कि कॉल के बाद बीबी (नेतन्याहू) के बालों में आग लग गई थी। नेतन्याहू चाहते हैं कि ईरान के सैन्य ठिकानों और इंफ्रास्ट्रक्चर पर दोबारा भीषण हमले किए जाएं ताकि वह संभल न सके। वहीं, ट्रंप ने ऐन वक्त पर हमलों को रोक दिया है। वह कतर, सऊदी अरब और पाकिस्तान जैसे खाड़ी मध्यस्थों द्वारा तैयार 'लेटर ऑफ इंटेंट' को मौका देना चाहते हैं, जिसके तहत 30 दिनों के लिए युद्ध विराम और बातचीत का रास्ता खुल सके। इस तनातनी के बाद डोनाल्ड ट्रंप ने मीडिया के सामने एक ऐसा बयान दे दिया, जिसने इजराइल की संप्रभुता और नेतन्याहू के ईगो पर गहरी चोट की है। ट्रंप ने कैमरे पर बेबाकी से कह दिया बेंजामिन नेतन्याहू वही करेंगे, जो मैं उनसे चाहूंगा। नेतन्याहू का मानना है कि ट्रंप का यह यू-टर्न ईरान को परमाणु हथियार बनाने और मिसाइलें रीग्रुप करने का समय दे रहा है। फिलहाल, इस 'पावर स्ट्रगल' ने यह साफ कर दिया है कि ईरान वॉर के अगले कदम को लेकर वाशिंगटन और तेल अवीव के बीच सबकुछ ठीक नहीं है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/israel-abducted-a-pakistani-from-the-middle-of-the-sea-action-created-a-stir-in-whole-world" target="_blank">पाकिस्तानी को बीच समुंदर से उठा ले गया इजरायल, एक्शन से पूरी दुनिया में हड़कंप!</a></h3><h2>फोन पर ट्रंप और नेतयाहू के बीच क्या-क्या बातें हुई?</h2><div>19 मई 2026 की तारीख वाइट हाउस और यरूशलम फोन लाइन से जुड़े। करीब 1 घंटे तक डोनाल्ड ट्रंप और बेंजामिन नेतन्याहू की बात हुई। एग्जिओस की रिपोर्ट के मुताबिक नेतन्याहू इस कॉल के दौरान परेशान नजर आए। बहुत हद तक इसका कारण है 17 मई का दिन। इस दिन डोनाल्ड ट्रंप ने नेतन्याहू को भरोसा दिलाया था कि अमेरिका मंगलवार यानी 19 मई को ईरान पर नए और घातक हमलों की शुरुआत करेगा। इजराइल इसी की उम्मीद में बैठा था। लेकिन 24 घंटे के भीतर ट्रंप ने यू टर्न ले लिया क्योंकि कतर, सऊदी अरब और यूएई जैसे खाड़ी ने ऐसे हमले ना करने का अनुरोध किया था। ऐसे में नेतयाहू ने कहा कि हमलों को टालना एक बहुत बड़ी गलती है और इससे केवल ईरान को अपनी सैन्य ताकत फिर से संगठित करने का समय मिलेगा। एग्जिओस ने एक अमेरिकी सूत्र के हवाले से दोनों नेताओं के बीच हुई बातचीत की जानकारी छापी है। रिपोर्ट के मुताबिक ट्रंप ने नेतन्याहू से कहा कि मीडिएटर एक लेटर ऑफ इंटेंट पर काम कर रहे हैं जिस पर अमेरिका और ईरान दोनों साइन करेंगे। जिसका मकसद युद्ध को औपचारिक रूप से खत्म करना है। साथ ही इसके जरिए ईरान के एटम प्रोग्राम और स्टेट ऑफ फोरमच को खोलने जैसे मुद्दों पर 30 दिनों की बातचीत शुरू होगी।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/us-iran-peace-agreement-drafted-after-tense-talks-major-announcement-expected-within-hours" target="_blank">US-Iran Ceasefire | तनावपूर्ण बातचीत के बाद अमेरिका-ईरान शांति समझौते का मसौदा तैयार, कुछ ही घंटों में हो सकती है बड़ी घोषणा</a></h3><h2>ईरान को लेकर दोनों की राय बिल्कुल अलग</h2><div>दो इजराइली सूत्रों के हवाले से लिखा गया है कि दोनों नेता ईरान को लेकर आगे के प्लान पर एकमत नहीं हैं। सोर्सेस का कहना है कि वाशिंगटन में इजराइल के राजदूत ने अमेरिकी सांसदों को जानकारी दी थी कि नेतन्या इस बातचीत को लेकर चिंतित थे। हालांकि दूतावास के एक प्रवक्ता ने एक्सियोस को इस बात से इंकार किया और कहा राजदूत निजी बातचीत पर कोई टिप्पणी नहीं करते हैं। दरअसल अमेरिका और इजराइल ने ईरान पर दोबारा हमला करने का प्लान बनाया था। इस बार होने वाले ऑपरेशन को नया नाम दिया गया था। सीएनएन की रिपोर्ट के मुताबिक दोनों देश ईरान के खिलाफ ऑपरेशन स्लेज़ हैमर शुरू करने वाले थे। इसी प्लानिंग की वजह से नेतयाओं को लग रहा था कि वह अपना एकमेव लक्ष्य हासिल कर लेंगे। यानी ईरान को पूरी तरह से तबाह कर देंगे। लेकिन कहानी में ट्विस्ट ना आए तो किरदार का नाम ट्रंप का आएगा। ट्रंप ने ऐन वक्त पर ऑपरेशन स्लेज़ हैमर को टाल दिया। ट्रंप ने 18 मई को सोशल मीडिया पर लिखा कि वो ईरान पर 1 घंटे में ही हमला कर सकते हैं। लेकिन वो ऐसा नहीं करेंगे और डिप्लोमेसी के लिए वक्त देंगे। बस यह ट्विस्ट नेऊ के लिए टेंशन बन गया। क्योंकि जिन ट्रंप के बारे में कहा जाता था कि ईरान पर हुए हमले में इजराइल ने जैसा चाहा अमेरिका ने वैसा ही बिहेव किया।</div><h2>ईरान ने कहा, अमेरिकी प्रस्ताव की हो रही समीक्षा</h2><div>ट्रंप ने कहा है कि ईरान के साथ बातचीत अंतिम चरण में है, जबकि तेहरान ने पाकिस्तान के जरिए मिले नए अमेरिकी प्रस्ताव की समीक्षा शुरू कर दी है। ईरान ने अपनी शर्तों में विदेशों में फसी संपत्तियों की रिहाई और ईरानी बंदरगाहों पर अमेरिकी नाकेबंदी खत्म करने की मांग दोहराई है।</div><h2>दूसरे देश को यूरेनियम नहीं देंगे</h2><div>ईरान के सुप्रीम लीडर मुज्तबा खामेनेई ने निर्देश दिया है कि देश का हथियार-ग्रेड समृद्ध यूरेनियम किसी भी हालत में विदेश नहीं भेजा जाएगा। दो वरिष्ठ ईरानी सूत्रों के हवाले से यह दावा सामने आया है। इस रुख से अमेरिका-ईरान के बीच चल - रही शांति वार्ता में नया पेंच फंस सकता है। इसकी वजह अमेरिका-इजराइल की प्रमुख मांगों में ईरान के यूरेनियम को दूसरे देश में भेजना शामिल है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/israel-abducted-a-pakistani-from-the-middle-of-the-sea-action-created-a-stir-in-whole-world" target="_blank">पाकिस्तानी को बीच समुंदर से उठा ले गया इजरायल, एक्शन से पूरी दुनिया में हड़कंप!</a></h3><h2>ईरान तेजी से बढ़ा रहा ड्रोन प्रोडक्शन</h2><div>अमेरिकी खुफिया आकलन के मुताबिक ईरान सैन्य क्षमता तेजी से खड़ी कर रहा है। युद्धविराम के दौरान उसने ड्रोन प्रोडक्शन भी शुरू कर दिया है। - अनुमान है कि वह 6 महीने में ड्रोन हमले की - क्षमता बहाल कर लेगा। रिपोर्ट में कहा गया है कि -ईरान नष्ट हुई मिसाइल साइट्स, लॉन्चर्स व हथियार उत्पादन क्षमता को भी जल्द तैयार कर लेगा। अमेरिका ने अपना रवैया बदल दिया है। नेतन्याहू के गुस्से की एक बड़ी वजह यह भी थी कि इजराइली खुफिया एजेंसी मोसाद और सैन्य अधिकारियों का मानना है कि ईरान युद्ध के दौरान बंद किए गए अपने मिसाइल ठिकानों को फिर से सक्रिय कर चुका है। इजराइल का मानना है कि इस वक्त ईरान पर हमला ना करना उसे परमाणु बम बनाने की खुली छूट देने जैसा है। उधर ट्रंप और नेतन्या की बातचीत को लेकर मचे बवाल के बीच ईरान का भी जवाब आ गया। ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजिशकियन ने एक्स पर लिखा ईरान ने हमेशा अपने वादे को निभाया है। युद्ध को टालने की हर संभव कोशिश की है। हमारी ओर से रास्ते खुले हैं लेकिन दबाव डालकर ईरान को सरेंडर के लिए मजबूर करना सिर्फ एक भ्रम है। ईरान के रेवोल्यूशनरी गार्ड्स आईआरजीसी ने और भी सख्त चेतावनी दी है। उन्होंने कहा अगर अमेरिका ने फिर से हमला किया तो वे खाड़ी देशों के तेल की आपूर्ति को सालों के लिए काट देंगे। धमकी यह भी दी कि अगला हमला किसी क्षेत्रीय संघर्ष तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि यह पूरी दुनिया में फैल जाएगा। तो ट्रंप बातचीत की राह पर हैं। उनके पार्टनर नेतन्या इस बात से निराश हैं। इन दोनों के बीच टेंशन का यह कोई पहला मौका नहीं है। याद कीजिए जंग के दौरान ईरान के साउथ पार्ट्स गैस क्षेत्र पर एक बड़ा हमला हुआ। रिपोर्ट्स आई कि यह हमला इजराइल ने किया। ट्रंप इस हमले की वजह से इजराइल पर भड़क गए तब ट्रंप ने कहा था कि इजराइल ने अकेले कारवाई की है और वाशिंगटन को इस बारे में पहले से कुछ नहीं पता था। ट्रंप ने यह भी कहा था हमने ईरान के साउथ पार्ट्स गैस क्षेत्र इजराइल के हमले का विरोध किया और बेंजामिन नेतन्या से सीधे तौर पर ऐसा ना करने का आग्रह किया था। इसके अलावा ट्रंप ने चेतावनी भी दी थी कि हम ऐसे कामों के लिए मना करते हैं वो नहीं मानते और हमें काम पसंद नहीं आता तो हम आगे काम नहीं करते हैं।</div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 22 May 2026 14:16:15 +0530</pubDate>
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      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[कॉकरोच जनता पार्टी किसने बना ली? महुआ-कीर्ति आजाद समेत 5 लाख लोग जुड़े! मैनिफेस्टो तो होश उड़ा देगा ]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/who-formed-the-cockroach-janata-party-five-lakh-people-including-mahua-and-kirti-azad]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>जब व्यवस्था की सफाई करने के बजाय सिस्टम खुद सड़ने लगता है, तब अंधेरी रातों में, सुनसान राहों पर एक 'मसीहा' निकलता है। जिसे लोग शहंशाह नहीं, बल्कि 'कॉकरोच' कहते हैं! यह एक ऐसा सर्वव्यापी मसीहा है जो कहीं भी प्रकट हो सकता है। आपके चमचमाते किचन में, भारतीय रेल के डिब्बों में, या फिर सरकारी दफ्तर के उस सीलन भरे कमरे में जहां धूल खाती फाइलें सदियों से सो रही हैं। अब आप सोच रहे होंगे कि अचानक इस महान जीव का जिक्र क्यों? तो जनाब, राजनीति के गलियारे से एक ब्रेकिंग न्यूज़ आई। देश की राजनीति में इस वक्त एक ऐसी पार्टी की एंट्री हुई है जिसने बिना चुनाव लड़े, बिना रैलियां निकाले और बिना पोस्टर्स लगाए सोशल मीडिया पर तहलका मचा दिया है। नाम है कॉकरोच जनता पार्टी यानी कि सीजेपी। सीजेपी का नाम इस समय इंटरनेट पर टॉक ऑफ द टाउन बना हुआ है। सुनने में यह किसी मीम या मजाक जैसा आपको लग सकता है लेकिन इंटरनेट पर इसकी लोकप्रियता अब मजाक से आगे निकलती दिखाई दे रही है। दावा यह किया जा रहा है कि लॉन्च होने के महज कुछ दिनों के भीतर इस पार्टी से हजारों लोग जुड़ चुके हैं। सबसे दिलचस्प बात यह है कि इसके सदस्य खुद को सेकुलर, सोशलिस्ट, डेमोक्रेटिक और लेजी बताते हैं और यही लाइन अब सोशल मीडिया पर वायरल हो गई है। कोई इसे युवाओं की हताशा का नया प्रतीक बता रहा है तो कोई इसे मौजूदा राजनीति पर सबसे बड़ा व्यंग मान रहा है। लेकिन सवाल सबसे बड़ा यहां पर यह है कि क्या कॉकरोच जनता पार्टी सिर्फ इंटरनेट का मजाक है या फिर सिस्टम से नाराज युवाओं की नई डिजिटल आवाज। दरअसल इस पूरी कहानी की शुरुआत एक विवादित टिप्पणी से हुई जिसमें बेरोजगार युवाओं और एक्टिविस्ट को लेकर कॉकरोच शब्द का इस्तेमाल किए जाने पर सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई। पार्टी के नाम कॉकरोच जनता पार्टी को लेकर भी चर्चा है। माना यह जा रहा है कि यह नाम हाल ही में भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की कथित टिप्पणी पर आधारित है। जिसमें उन्होंने यह कहा था कि कुछ युवा कॉकरोच जैसे होते हैं जिन्हें रोजगार नहीं मिलता और वह सोशल मीडिया, मीडिया या आरटीआई एक्टिविस्ट बनकर सिस्टम पर हमला करने लगते हैं। हालांकि बाद में सीजीआई ने सफाई भी दी थी और कहा था कि उनके बयान को गलत तरीके से पेश किया गया है। जिस दिन सीजीआई सूर्यकांत ने कॉकरोच वाली टिप्पणी की उसी दिन यानी 16 मई को अभिजीत डिपके ने सोशल मीडिया एक्स पर लोगों से कॉकरोच जनता पार्टी में रजिस्टर करने की अपील की। साफ कर दें कि इस पार्टी का मकसद चुनाव लड़ना नहीं है। यह व्यंग करने वाला एक पॉलिटिकल आउटफिट है। पार्टी में शामिल होने की दिलचस्प शर्तें बताएं। उससे पहले बता दें कि कॉकरोच वाली जो टिप्पणी सीजीआई सूर्यकांत ने की थी, उस पर बाद में उन्होंने साफ किया कि उनकी मौखिक टिप्पणी फर्जी डिग्रियों का इस्तेमाल करके कानून और मीडिया जैसे पेशों में एंट्री करने वाले लोगों के लिए थी ना कि बेरोजगार युवाओं के लिए। अब सवाल यह उठता है कि आखिर कौन सी 'जनता' इस अनूठी पार्टी की रीढ़ बन रही है और इस पार्टी का वीआईपी मेंबर बनने के लिए क्या योग्यताएं चाहिए? चलिए आज इसी का एमआईआर स्कैन करते हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/cji-advice-in-navi-mumbai-airport-case-protest-peacefully" target="_blank">Navi Mumbai Airport केस में CJI की नसीहत- Peaceful Protest करें, पर सड़क पर समस्या न बनें'</a></h3><h2>क्या थी सीजेआई की कॉकरोच वाली टिप्पणी</h2><div>भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत ने शुक्रवार को कीड़ों और परजीवियों का उदाहरण देते हुए कहा कि बेरोजगार युवा सोशल मीडिया और सूचना के अधिकार (आरटीआई) का इस्तेमाल करके हर किसी पर हमला करते हैं। ये टिप्पणियां तब आईं जब मुख्य न्यायाधीश कांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ एक ऐसे वकील को फटकार लगा रही थी जो वरिष्ठ अधिवक्ता का पदनाम मांग रहा था। समाचार एजेंसी एएनआई के अनुसार, पीठ ने याचिकाकर्ता का प्रतिनिधित्व करने वाले वकील संजय दुबे&nbsp; से कहा कि पूरी दुनिया वरिष्ठ अधिवक्ता बनने के योग्य हो सकती है, लेकिन कम से कम आप तो इसके हकदार नहीं हैं। मुख्य न्यायाधीश ने याचिकाकर्ता के वकील द्वारा फेसबुक पर इस्तेमाल की गई भाषा का भी उल्लेख किया। तभी मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने समाज के बारे में बात की। उन्होंने कहा कि समाज में पहले से ही ऐसे परजीवी मौजूद हैं जो व्यवस्था पर हमला करते हैं और आप उनके साथ हाथ मिलाना चाहते हैं। उन्होंने आगे कहा कि ऐसे कई युवा हैं, जो तिलचट्टों की तरह हैं, जिन्हें न तो रोजगार मिलता है और न ही पेशे में कोई स्थान। उनमें से कुछ मीडिया में चले जाते हैं, कुछ सोशल मीडिया कार्यकर्ता बन जाते हैं, कुछ आरटीआई कार्यकर्ता और अन्य कार्यकर्ता बन जाते हैं, और वे हर किसी पर हमला करना शुरू कर देते हैं।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/cji-surya-kant--statement-people-attack-system-by-posing-as-social-media-rti-activists" target="_blank">बेरोजगार युवा कॉकरोच की तरह...CJI सूर्यकांत का अजीबोगरीब बयान, कहा- सोशल मीडिया और RTI एक्टिविस्ट बनकर सिस्टम पर हमला करते हैं</a></h3><h2>बाद में अपने बयान पर दी सफाई&nbsp;</h2><div>भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने शनिवार को अपने विवादास्पद "तिलचट्टे" वाले बयान पर स्पष्टीकरण जारी करते हुए कहा कि मीडिया के एक वर्ग ने उनके मौखिक कथनों को गलत तरीके से प्रस्तुत किया और उन्हें देश के युवाओं की आलोचना के रूप में पेश किया। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने अपने स्पष्टीकरण में कहा kf मुझे यह पढ़कर बहुत दुख हुआ कि मीडिया के एक वर्ग ने कल एक तुच्छ मामले की सुनवाई के दौरान मेरे मौखिक कथनों को गलत तरीके से उद्धृत किया है। मैंने विशेष रूप से उन लोगों की आलोचना की थी जिन्होंने फर्जी और फर्जी डिग्रियों की मदद से वकालत जैसे पेशे में प्रवेश किया है। ऐसे ही लोग मीडिया, सोशल मीडिया और अन्य प्रतिष्ठित पेशों में भी घुसपैठ कर चुके हैं, इसलिए वे परजीवी की तरह हैं। यह कहना पूरी तरह निराधार है कि मैंने हमारे देश के युवाओं की आलोचना की है।</div><h2>कॉकरोच जनता पार्टी में शामिल होने की 'खास' योग्यताएं</h2><div>आप चाहे जितने भी घोटालों, विवादों या जनता के गुस्से की मार झेलें, आपका बाल भी बांका नहीं होना चाहिए। जैसे कॉकरोच परमाणु हमले में भी बच सकता है, वैसे ही आपको हर राजनीतिक संकट में 'अमर' रहना होगा। इस पार्टी का सबसे बड़ा और मजबूत आधार है देश की बेरोजगार सेना। अगर आपके पास करने को कोई काम नहीं है और आप दिन भर क्या करें, क्या न करें के चक्रव्यूह में फंसे हैं, तो आप इस पार्टी के मेंबर बनने के लिए सबसे उपयुक्त हो। इसके अलावा यदि आपकी सुबह सूरज की रोशनी से नहीं, बल्कि रील स्क्रॉल करने से होती है। अगर आपकी उंगलियां बिना वजह हर दो सेकंड में स्क्रीन अनलॉक कर देती हैं, तो बधाई हो! आप पार्टी के आईटी सेल के लिए बिल्कुल परफेक्ट हैं। दुनिया में दुख बहुत है, लेकिन उस दुख को, उस गुस्से को बिना गाली-गलौज के, एकदम 'प्रोफेशनल' तरीके से, कीबोर्ड पर टाइप करके निकालने की कला जिसमें है, वो इस पार्टी का सबसे कीमती हीरा है। सरकार से लेकर समाज तक, बिना किसी लॉजिक के, लेकिन पूरे स्वैग और व्याकरण के साथ भड़ास निकालने की क्षमता रखने वाले युवाओं का यहाँ रेड कारपेट स्वागत है। पार्टी का मूल मंत्र डले रहो! जब तक बहुत ज्यादा जरूरी न हो, अपनी जगह से न हिलना। कॉकरोच भी तब तक एक कोने में चुपचाप पड़ा रहता है जब तक कि उस पर झाड़ू न तन जाए। अगर आप भी आलस के उस शिखर पर हैं जहाँ पानी का ग्लास उठाने के लिए भी आपको मोटिवेशनल स्पीच की जरूरत पड़ती है, तो आप इस पार्टी के सबसे वफादार और अनुशासित कार्यकर्ता हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/after-uproar-over-his-cockroach-comment-cji-surya-kant-clarified-media-misrepresented-his-statement" target="_blank">'Cockroach' कमेंट पर बवाल के बाद CJI Surya Kant की सफाई, Media ने मेरी बात को गलत पेश किया</a></h3><h2>किसने बनाई सीजेपी</h2><div>कॉकरोच जनता पार्टी बनाने वाले अभिजीत अमेरिका की बोस्टन यूनिवर्सिटी में पब्लिक रिलेशन की मास्टर डिग्री कर रहे हैं। वह 2020 से 2023 तक आम आदमी पार्टी की सोशल मीडिया टीम में भी वालंटियर रह चुके हैं। द हिंदू अखबार से बात करते हुए अभिजीत ने कहा कि कॉकरोच जनता पार्टी माननीय मुख्य न्यायाधीश के उस बयान के खिलाफ युवाओं की असहमति है जिसमें उन्होंने युवाओं को कॉकरोच और परजीवी करार दिया था। भारत जैसे लोकतंत्र में इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता। जहां संविधान और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संरक्षक माने जाने वाले सुप्रीम कोर्ट के सीजेआई युवाओं की आलोचना कर उनका अपमान करते हैं। वो आगे कहते हैं कि अगर युवाओं को अपनी आवाज पहुंचाने के लिए कॉकरोच बनना पड़े तो हम इस पहचान को अपनाते हैं। इसीलिए हमने अपना नाम रखा है कॉकरोच जनता पार्टी। हमने आपको पहले ही बताया कि एक सिटेरिकल पॉलिटिकल पार्टी है।&nbsp;</div><h2>क्या है पार्टी का मिशन</h2><div>पार्टी के मिशन और विज़न को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी ने वेबसाइट पर लिखा है कि हम यहां ना तो एक और पीएम केयर्स योजना शुरू करने आए हैं ना ही टैक्स पेयर की सैलरी पर दाबोस में छुट्टियां मनाने आए हैं। ना ही भ्रष्टाचार को रणनीतिक खर्च के तौर पर रिब्रांड करने आए हैं। हम यहां पूछने आए हैं जोर से बार-बार लिखित रूप में कि पैसा गया कहां? पार्टी की टैगलाइन है आलसी और बेरोजगारों की आवाज। पार्टी का दावा है कि वो उन लोगों को रिप्रेजेंट करती है सिस्टम जिनको गिनना भूल गया है। पार्टी एक बड़ा जिद्दी झुंड है जिसका कोई स्पॉन्सर नहीं है। बस हैं तो सिर्फ पांच चीजें जो सरकार में आने पर लागू की जाएंगी। मेनिफेस्टो में किए गए पांच वादे भी दिलचस्प हैं। वादा नंबर एक अगर सीजेपी यानी कॉकरोच जनता पार्टी सरकार में आती है तो रिटायरमेंट के बाद किसी भी सीजीआई को राज्यसभा जाने का रिवॉर्ड नहीं मिलेगा। वादा नंबर दो अगर कोई वैध वोट डिलीट किया जाएगा तो चाहे उस राज्य में जहां सीजेपी की सरकार हो या विपक्ष की सीईसी को यूएपीए के तहत गिरफ्तार किया जाएगा क्योंकि किसी के वोटिंग का अधिकार छीनना आतंकवाद से कम नहीं। वादा नंबर तीन महिलाओं के लिए 50% आरक्षण होगा। 33% नहीं और इसके लिए सांसदों की संख्या भी नहीं बढ़ाई जाएगी। कैबिनेट में भी महिलाओं के लिए 50% आरक्षण होगा। वादा नंबर चार, बड़ी कॉर्पोरेट कंपनियों के टीवी चैनलों के लाइसेंस रद्द किए जाएंगे और उनके एंकर्स के बैंक अकाउंट्स की जांच होगी। वादा नंबर पांच, अगर कोई विधायक या सांसद दूसरी पार्टी में पाला बदल कर जाता है तो उसके चुनाव लड़ने पर पाबंदी लगाई जाएगी और उसे अगले 20 साल तक किसी भी पब्लिक ऑफिस में कोई पद नहीं दिया जाएगा। कॉकरोच जनता पार्टी बनने के दो दिन बाद 18 मई को अभिजीत ने दावा किया कि पार्टी से 500 लोग जुड़ चुके हैं। अभिजीत का कहना है कि उनकी पार्टी एक धर्मनिरपेक्ष, समाजवादी, लोकतांत्रिक और जाति विरोधी संगठन है। हमारी विचारधारा गांधी, अंबेडकर और नेहरू से प्रेरित है। अभिजीत का कहना है कि हम देश से यह वास्तविकता स्वीकार करने का आग्रह कर रहे हैं कि आज के युवा सिस्टम से अपना भरोसा खो रहे हैं क्योंकि ये अब उनकी सेवा नहीं कर रहा है।&nbsp; उनकी बातें नहीं सुन रहा है। उन्हें देख भी नहीं रहा है और व्यवस्था जितनी देर तक इस बात को नजरअंदाज करती रहेगी निराशा उतनी ही बढ़ती जाएगी। अभिजीत के मुताबिक कॉकरोच बताता है कि वह हालात के हिसाब से खुद को ढाल लेता है कि देश के लोकतांत्रिक संगठनों के कामकाज को लेकर बढ़ रही फ्रस्ट्रेशन का लक्षण है।</div><h2>महुआ मोइत्रा और कीर्ति आजाद ने मेंबरशिप की इच्छा जताई</h2><div>मामले में राजनीतिक तड़का तब लगा जब तृणमूल कांग्रेस सांसद महुआ मोइत्रा और कीर्ति आजाद ने भी मजाकिया अंदाज में इस पार्टी में शामिल होने की इच्छा जताई। महुआ मोहत्रा ने सोशल मीडिया पर पोस्ट कर लिखा कि वह एंटी नेशनल पार्टी की कार्ड होल्डर सदस्य होने के साथ सीजेपी में भी शामिल होना चाहती हैं। जवाब में पार्टी ने लिखा लोकतंत्र को आप जैसे फाइटर की जरूरत है। महुआ मोहित्रा आपका स्वागत है। वहीं कीर्ति आजाद ने पूछा कि पार्टी जाइन करने की योग्यता क्या है? तो सीजेपी ने जवाब दिया 1983 वर्ल्ड कप जीतना काफी है। इन पोस्ट के बाद सोशल मीडिया पर मीम्स और मजाक की बाढ़ आ गई है। लेकिन इसी बीच पार्टी ने कुछ गंभीर मुद्दे भी उठाने शुरू कर दिए। सीजेपी ने नीट और सीबीएसई जैसी परीक्षाओं में गड़बड़ियों के खिलाफ आवाज उठाई। वहीं सीबीएसई रिचेकिंग फीस खत्म करने की मांग की और छात्रों से बोर्ड की गलती का फैसला वसूलने को भ्रष्टाचार बताया है। यानी व्यंग के बीच पार्टी शिक्षा, बेरोजगारी और सिस्टम की जवाबदेही जैसे मुद्दों को भी हवा देने लग गई है। सबसे ज्यादा चर्चा अब सीजेपी के घोषणापत्र की हो रही है।&nbsp;</div><h2>पार्टी के घोषणापत्र की क्यों इतनी चर्चा</h2><div>पार्टी ने पांच सूत्रिय एजेंडा जारी किया है। इसमें रिटायरमेंट के बाद जजेस को राज्यसभा सीट ना देने, संसद और कैबिनेट में महिलाओं को 50% आरक्षण देने, मीडिया की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने और दल बदलने वाले नेताओं पर 20 साल का चुनावी प्रतिबंध लगाने जैसी मांगे शामिल कर दी है। यहां तक कि पार्टी ने कहा है कि अगर किसी वैध वोटर का नाम वोटर लिस्ट से हटाया जाता है तो चुनाव आयोग के अधिकारियों पर सख्त कार्यवाही होनी चाहिए।&nbsp;</div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 20 May 2026 14:01:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/who-formed-the-cockroach-janata-party-five-lakh-people-including-mahua-and-kirti-azad</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[दोस्त रूस से तेल खरीदते थे, खरीदते रहेंगे, भारत का ये रूप देख अमेरिका को भी बोलना पड़ा- 30 दिन की राहत और ले लो]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/friends-used-to-buy-oil-from-russia-and-will-continue-to-do-so-seeing-this-form-of-india]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारत और रूस के बीच होने वाले कच्चे तेल कारोबार का क्या होगा? क्या अमेरिका अपनी प्रतिबंध से छूट जारी रखेगा? क्या भारत उस छूट के आधार पर रूस से तेल खरीदेगा? इस सवाल के जवाब में जो जवाब भारत के पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय में संयुक्त सचिव सुजाता शर्मा ने जो जवाब दिया है वो वाकई में भारत की तरफ से एक बड़ा बयान है क्योंकि उन्होंने यह साफ कर दिया है कि हालात कैसे भी हो कोई वेबर हो या ना हो भारत अपना तेल रूस से खरीदता रहेगा। उन्होंने साफ तौर पर कहा है कि भारत का रुख पूरी तरह से अडिग है कि भारत अपनी आयात रणनीति पूरी तरह से सुसंगत रखता है और अपनी जरूरत के हिसाब से तेल खरीद करता है। ऐसे में रूस पर अमेरिकी छूट के संबंध में उन्होंने यह जोर दिया कि पहले भी रूस से खरीदारी जारी थी और छूट से पहले भी छूट के दौरान भी और अब भी यह खरीद जारी रहेगी।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/trump-chair-told-which-country-will-be-attacked-next-india-preparations-begin" target="_blank">Trump की कुर्सी ने बताया किस देश पर होगा अगला हमला, भारत की तैयारी शुरू!</a></h3><h2>रूस से तेल खरीद</h2><div>दरअसल लगातार यह सवाल उठ रहे थे कि भारत क्या रूस से तेल खरीदना बंद कर देगा क्योंकि अमेरिकी वेवर की मियाद खत्म हो रही थी। ऐसे में पहले रूस की तरफ से यह कहा गया था कि वह भारत को कच्चे तेल की सप्लाई कम नहीं होने देगा। भारत को जितना कच्चा तेल चाहिए रूस उतना सप्लाई करने के लिए तैयार था। ऐसे में भारत की तरफ से यह स्टेटमेंट का आना साफ तौर पर यह बताता है कि अब अमेरिका तेल के मामले में कोई प्रतिबंध लगाए या ना लगाए। भारत रूस से अपनी तेल खरीद की नीति तब तक जारी रखेगा जब तक उसकी जरूरतें वहां से पूरी हो रही हैं और जनता के हित को ध्यान में रखकर जिस तरीके से तेल खरीद की जाती है जिससे तेल की कीमतें स्थिर होती रहे। वह भारत की प्राथमिकता में रहेगा। इस बीच अमेरिका ने रूसी तेल खरीदने के लिए प्रतिबंधों में दी गई छूट को बढ़ाने का फैसला किया है। अमेरिका की यह समय सीमा शनिवार को खत्म हो गई थी। रॉयटर्स के मुताबिक यह फैसला कई देशों की ओर से रूसी तेल खरीदने के लिए और समय मांगने के बाद लिया गया है। सूत्रों ने बताया है कि अमेरिका इस छूट को 30 दिनों के लिए और बढ़ाएगा। गौरतलब है कि रूसी कच्चे तेल का एक प्रमुख खरीदार भारत ने इससे पहले कहा था कि वह अमेरिकी छूट के बावजूद मॉस्को से कच्चा तेल खरीद रहा है और व्यावसायिक व्यवहार्यता और ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए इसका आयात जारी रखेगा। हालांकि, इस छूट से भारतीय रिफाइनरियों के लिए रूसी तेल का भारी आयात जारी रखना आसान हो गया है। रूसी तेल की खरीद पर अमेरिका की ओर से दी गई छूट की अवधि खत्म होने पर क्या किया जाएगा, इस सवाल पर सुजाता ने कहा कि 'छूट की अवधि से पहले भी रूसी तेल खरीदा जा रहा था, उस दौरान भी खरीदा जा रहा था और अब भी खरीदा जा रहा है, क्योंकि यह कंपनियों के कमर्शल फैसले से जुड़ी बात है।' हालांकि उन्होंने यह भी साफ किया कि 'देश में कच्चे तेल की कोई तंगी नहीं है। इसकी सप्लाई का पूरा इंतजाम किया गया है। छूट मिले या न मिले, कोई फर्क नहीं पड़ेगा।</div><h2>LPG पर OMC की अंडर-रिकवरी 750 करोड़ रुपये</h2><div>ऑयल मार्केटिंग कंपनियों को देश में पेट्रोल-डीजल और LPG की बिक्री पर हो रहा रहा नुकसान कीमतें बढ़ाए जाने के बाद नीचे आया है, लेकिन अब भी यह काफी ऊंचे स्तर पर है। पेट्रोलियम एंड नैचरल गैस मिनिस्ट्री में जॉइंट सेक्रेटरी सुजाता शर्मा ने&nbsp; कहा कि पेट्रोल-डीजल और LPG पर OMC की रोजाना की अंडर-रिकवरी 750 करोड़ रुपये है। शर्मा ने यह भी कहा कि रूसी तेल खरीदने पर अमेरिकी छूट रहे या न रहे, भारत के लिए कच्चे तेल की सप्लाई पर कोई आंच नहीं आएगी। पेट्रोल-डीजल के दाम 3-3 रुपये प्रति लीटर बढ़ाए जाने से पहले पिछले हफ्ते तेल और गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने कहा था कि OMC को 1000 करोड़ रुपये रोजाना की अंडर-रिकवरी का सामना करना पड़ रहा है। क्या सरकारी तेल कंपनियों के नुकसान की सरकार भरपाई करेगी, इस पर सुजाता ने कहा कि कंपनियों को राहत पैकेज देने का फिलहाल कोई प्लान नहीं है। उन्होंने आने वाले दिनों में पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ाए जा सकने के बारे में कहा, 'इस बारे में कोई अनुमान नहीं लगा सकते।' इंडस्ट्री सूत्रों के मुताबिक, दाम बढ़ाए जाने के बाद भी OMC को पेट्रोल पर करीब 11 रुपये/लीटर और डीजल पर 39 रुपये/लीटर की अंडर रिकवरी है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/iran-and-russia-enter-cuba-usa-surrounded-by-300-drones-raising-concerns-for-trump-administration" target="_blank">Cuba में Iran-Russia की एंट्री! 300 Drones से घिरा America, Trump प्रशासन की बढ़ी चिंता</a></h3><h2>अमेरिकी ट्रेजरी विभाग ने क्या कहा</h2><div>अमेरिकी ट्रेजरी विभाग ने यह कदम वैश्विक कच्चे तेल के बाजार में स्थिरता लाने और सबसे कमजोर देशों को ऊर्जा संकट से बचाने के लिए उठाया है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट करते हुए बेसेंट ने लिखा कि अमेरिकी ट्रेजरी विभाग एक अस्थायी 30 दिनों का सामान्य लाइसेंस जारी कर रहा है ताकि सबसे कमजोर देशों को समुद्र में फंसे हुए रूसी तेल तक अस्थायी रूप से पहुंचने की क्षमता मिल सके। यह विस्तार उन्हें अतिरिक्त लचीलापन (फ्लेक्सिबिलिटी) देगा, और हम इन देशों की जरूरत के हिसाब से उन्हें विशेष लाइसेंस देने के लिए मिलकर काम करेंगे। यह सामान्य लाइसेंस भौतिक कच्चे तेल के बाजार को स्थिर करने में मदद करेगा और यह सुनिश्चित करेगा कि तेल सबसे अधिक ऊर्जा-संवेदनशील&nbsp; देशों तक पहुंचे। इससे चीन की रियायती तेल का भंडारण करने की क्षमता कम हो जाएगी और मौजूदा आपूर्ति को सबसे जरूरतमंद देशों तक पहुंचाने में भी मदद मिलेगी।&nbsp;</div><h2>अमेरिका ने क्यों उठाया ये कदम</h2><div>अमेरिकी वित्त विभाग के विदेशी संपत्ति नियंत्रण कार्यालय (OFAC) द्वारा 17 अप्रैल को जारी एक सामान्य लाइसेंस के अनुसार, प्रतिबंधित जहाजों सहित टैंकरों पर लदे रूसी तेल और पेट्रोलियम उत्पादों को 17 अप्रैल को पूर्वी समयानुसार 12:01 बजे (भारतीय समयानुसार सुबह 9:31 बजे) या उससे पहले अधिकांश देशों द्वारा 16 मई तक खरीदा और प्राप्त किया जा सकता था। OFAC द्वारा संशोधित सामान्य लाइसेंस के माध्यम से इस छूट को अब 17 जून तक बढ़ा दिया गया है। अप्रैल में भी यह छूट समाप्त हो गई थी, लेकिन अमेरिका ने कुछ दिनों बाद इसे बढ़ा दिया था, वह भी पहले यह घोषणा करने के बाद कि इसका नवीनीकरण नहीं किया जाएगा। मार्च में जारी की गई प्रारंभिक छूट 11 अप्रैल को समाप्त हो गई थी, लेकिन बाद में 17 अप्रैल को इसका नवीनीकरण किया गया था। उद्योग विशेषज्ञों के अनुसार, मई के मध्य तक छूट बढ़ाने का निर्णय संभवतः रूसी कच्चे तेल खरीदने वाले देशों के दबाव के बाद लिया गया था ताकि होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने के कारण खाड़ी देशों में तेल की कमी की आंशिक भरपाई की जा सके। इस बार भी यही स्थिति हो सकती है। विशेषज्ञों का मानना ​​है कि डोनाल्ड ट्रम्प प्रशासन इस तरह की छूटों को अंतरराष्ट्रीय तेल की कीमतों में लगातार हो रही बढ़ोतरी और इसके परिणामस्वरूप अमेरिका में घरेलू ईंधन की कीमतों में होने वाली वृद्धि को रोकने के प्रयासों का हिस्सा मानता है, खासकर इस साल के अंत में होने वाले मध्यावधि चुनावों को देखते हुए। लेकिन इस छूट की अमेरिका के विभिन्न वर्गों द्वारा आलोचना की गई है। आलोचकों का तर्क है कि इससे मॉस्को को भारी लाभ हो रहा है, जिसका उपयोग वह यूक्रेन में अपने युद्ध प्रयासों को वित्त पोषित करने के लिए करेगा। पश्चिम एशिया में अमेरिका ईरान के साथ चल रहे संघर्ष के दौरान ईरान से तेल और ईंधन की खरीद पर दी गई इसी तरह की छूट के खिलाफ भी इसी तरह के तर्क दिए गए थे। वाशिंगटन ने रूसी छूट को दो बार बढ़ाया है, लेकिन उसने ईरानी छूट का नवीनीकरण नहीं किया है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/tehran-big-bet-for-peace-in-the-middle-east-sending-a-14-point-roadmap-through-pakistan" target="_blank">Middle East में शांति के लिए Tehran का बड़ा दांव, Pakistan के जरिए भेजा 14-Point Roadmap</a></h3><h2>भारत ऊर्जा जरूरतों के लिए रूसी तेल खरीदता रहा है</h2><div>हाल के महीनों में भारत के कच्चे तेल के आयात का लगभग 2.5 से 2.7 मिलियन बैरल प्रति दिन (bpd) जो देश के कुल तेल आयात का लगभग आधा हिस्सा है। होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरा है; जबकि इसका दीर्घकालिक औसत लगभग 40% रहा है। पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) युद्ध के कारण इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग से जहाजों की आवाजाही नाममात्र रह गई है, जिससे इस आपूर्ति का अधिकांश हिस्सा प्रभावी रूप से बंद हो गया है। मॉस्को से अधिक तेल आयात ने इराक और कुवैत जैसे देशों से होने वाले पश्चिम एशियाई तेल के नुकसान की आंशिक रूप से भरपाई की है। रूस नई दिल्ली के लिए कच्चे तेल का सबसे बड़ा स्रोत है। फरवरी में, भारतीय रिफाइनरियों ने 1 मिलियन bpd से कुछ अधिक रूसी कच्चे तेल का आयात किया था, जो कि 2025 के 2 मिलियन bpd से अधिक के उच्च स्तर (पीक) का लगभग आधा था। मात्रा में इस भारी गिरावट के बावजूद, फरवरी में रूस भारत का सबसे बड़ा कच्चा तेल आपूर्तिकर्ता बना रहा, जो उसके कुल तेल आयात के लगभग पांचवें हिस्से (20%) के बराबर था। इसके बाद, कमोडिटी मार्केट एनालिटिक्स फर्म 'केपलर' के टैंकर डेटा के अनुसार, पश्चिम एशिया में भीषण युद्ध और प्रतिबंधों में छूट (मिलने के कारण, मार्च में रूस से तेल आयात लगभग दोगुना होकर 2 मिलियन bpd हो गया। यह उस महीने के लिए भारत के कुल तेल आयात का लगभग 45% था, जबकि दूसरी ओर पश्चिम एशिया से होने वाला आयात धराशायी हो गया। अप्रैल में रूसी कच्चे तेल का आयात घटकर 1.6 मिलियन bpd रह गया, जिसका मुख्य कारण नयारा एनर्जी रिफाइनरी का मेंटेनेंस (रखरखाव) के लिए बंद होना था, जो रूसी कच्चे तेल की बड़ी उपभोक्ता है। मई में अब तक रूसी कच्चे तेल का आयात फिर से लगभग 2 मिलियन bpd पर पहुँच गया है।</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 19 May 2026 14:11:00 +0530</pubDate>
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      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
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      <title><![CDATA[यूरोप की कट्टरपंथी लहर ने ब्रिटेन में दस्तक देते हुए कैसे राजनीति में मचा दिया भूचाल, PM स्टार्मर की चली जाएगी कुर्सी?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/how-has-the-radical-wave-from-europe-knocked-on-britain-door-and-caused-an-earthquake-in-politics]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>ब्रिटेन की राजनीति में इस समय बड़ा भूचाल देखने को मिल रहा है। प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर को लेकर इस्तीफे की अटकलें और तेज हो गई है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक लेबर पार्टी के अंदर बढ़ते दबाव और खराब राजनीतिक माहौल के कारण स्टार्मर अपनी कुर्सी छोड़ सकते हैं। बताया जा रहा है कि वह सम्मानजनक तरीके से पद छोड़ने की रणनीति बना रहे हैं। इस बीच लेबर पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व स्वास्थ्य सचिव वैस स्ट्रिंग के बयान ने ब्रिटिश राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। वैस ने खुलकर कहा है कि ब्रेग्जिट यानी यूरोपियन संघ से अलग होना ब्रिटेन की बहुत बड़ी गलती थी। उन्होंने कहा कि आने वाले समय में ब्रिटेन को दोबारा यूरोपियन संघ के करीब जाना होगा। उनके मुताबिक ब्रिटेन का भविष्य यूरोप से जुड़ा हुआ है और एक दिन ऐसा भी आ सकता है जब ब्रिटेन फिर से यूरोपियन संघ में शामिल हो जाए। स्ट्रिंग के इस बयान के बाद लेबर पार्टी के अंदर सत्ता संघर्ष की चर्चा तेज होगी। माना जा रहा है कि अगर स्टारमर इस्तीफा देते हैं तो वैस खुद पार्टी नेतृत्व की दौड़ में उतर सकते हैं। वहीं स्टार्मर की मुश्किलें हाल ही में सामने आई। जेफरी एपस्टिन विवाद के बाद और बढ़ गई। रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि लेबर पार्टी से जुड़े कुछ नेताओं के एब्सस्टीन से संबंध की जानकारी पहले से ही मौजूद थी। हालांकि इस मामले में कोई आधिकारिक आरोप साबित नहीं हुआ है। लेकिन विपक्ष लगातार सरकार और पार्टी पर सवाल उठा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर लेबर पार्टी में नेतृत्व परिवर्तन होता है और यूरोप समर्थक नेता मजबूत होते हैं तो ब्रिटेन और यूरोपियन संघ के रिश्तों में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। 12 मई को कैबिनेट मीटिंग के दौरान स्टार्मर रिजाइन करने से मना कर दिया है। इसके बाद स्टार्मर सरकार के एक जूनियर मंत्री ने इस्तीफा दे दिया। कुछ सहयोगी भी पहले ही सरकार छोड़ चुके हैं। अब 80 से ज्यादा लेबर सांसद खुलकर यह मांग कर चुके हैं कि कीर स्टार्मर अपने इस्तीफे की तारीख तय करें ताकि पार्टी व्यवस्थित तरीके से अपना नया नेता चुन सके। ऐसे में पहला बड़ा सवाल तो यही है कि 2 साल पहले ही इतनी बड़ी बहुमत के साथ जीतकर 10 डाउनिंग स्ट्रीट पहुंचे स्टारमर पर अब कुर्सी छिनने का खतरा क्यों मंडरा रहा है?</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/uk-health-minister-wes-streeting-has-dealt-a-major-blow-to-pm-starmer" target="_blank">अब आपके नेतृत्व पर भरोसा नहीं, UK Health Minister Wes Streeting ने PM Starmer को दिया बड़ा झटका</a></h3><h2>लोकल इलेक्शन है बड़ी वजह</h2><div>ब्रिटेन में हाल ही में हुए लोकल चुनाव में लेबर पार्टी को करारी शिकस्त मिली है। पार्टी ने स्थानीय परिषदों में 1400 से ज्यादा सीटें गवा दी। वेल्स में भी दशकों बाद उसे बड़ी हार मिली। वहीं रिफॉर्म यूके पार्टी ने कई जगह जीत दर्ज की। जबकि उसे कुल वोटों का 30% से भी कम हिस्सा मिला था। नतीजे आने के बाद स्टारमर ने 11 मई को एक भाषण भी दिया। बिना टाई और जैकेट के सफेद शर्ट पहनकर मंच पर आए स्टारमर ने इमोशनल अंदाज में अपनी गलतियों पर अफसोस जताया। हार की जिम्मेदारी लेते हुए उन्होंने लेबर पार्टी के मूल्यों को दोहराया। स्टारमर और उनके समर्थकों ने दलील दी कि अगर लीडरशिप बदला गया तो देश में राजनीतिक अराजकता फैल सकती है। उन्होंने याद दिलाया कि 204 में लेबर पार्टी की जीत से पहले कंजर्वेटिव पार्टी में लगातार प्रधानमंत्री बदलते रहे थे। लेकिन उनकी इस स्पीच का पार्टी सांसदों पर कोई असर नहीं दिखा। कई सांसदों का मानना है कि जनता के बीच स्टारमर की गिरती लोकप्रियता की वजह से लेबर पार्टी को ऐतिहासिक हार झेलनी पड़ी। पार्टी नगर परिषदों की सीटें हार गई। स्कॉटलैंड और वेल्स की संसदों में भी खराब प्रदर्शन हुआ।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/russia-intercepts-two-ukrainian-drones-no-casualties-reported" target="_blank">रूस ने यूक्रेन के 2 ड्रोन को रोका, कोई हताहत नहीं हुआ</a></h3><h2>9 साल के भीतर स्टार्मर ने पूरा किया पीएम का सफर</h2><div>14 साल बाद 2024 में लेबर पार्टी को इंग्लैंड के चुनाव में ऐतिहासिक जीत दिलाई थी। कीर ने सांसद बनने के मात्र 9 साल के भीतर प्रधानमंत्री पद तक का सफर पूरा किया। ब्रिटेन के 50 साल के इतिहास में पहले व्यक्ति थे जो 60 की उम्र के बाद पीएम बने। स्टार्मर खुद को नास्तिक कहते हैं, लेकिन पत्नी की यहूदी मान्यताओं का पूरा सम्मान करते हैं।&nbsp; ब्रिटेन को 'क्लीन एनर्जी सुपरपावर' बनाने का लक्ष्य रखा है। 'ग्रेट ब्रिटिश एनर्जी' कंपनी बनाएंगे। कीर कहते हैं फुटबॉल के मैदान पर वे न 'सर' होते हैं न ही नेता। वे आम इंसान बन जाते हैं। यूनिवर्सिटी लाइफ में दक्षिण फ्रांस के फ्रेंच रिवेरा इलाके में आइसक्रीम बेचकर पैसा कमाने का सोचा। पुलिस ने आइसक्रीम जब्त की कर ली। पब्लिक प्रॉसिक्यूशन के डायरेक्टर पद के दौरान वे नियमों और डिटेल को लेकर इतने सख्त थे कि साथियों ने उन्हें मि. रूल्स नाम दे दिया था।</div><h2>जेफरी एपस्टीन की बातचीत का मामला क्या है?</h2><div>स्टार्मर की घटती पॉपुलैरिटी ये जो है इसकी वजह सिर्फ लोकल इलेक्शंस नहीं है। पिछले कई महीनों से स्टार्मर की स्थिति कमजोर होती जा रही है। वे खराब अर्थव्यवस्था, अवैध प्रवास को लेकर जनता की नाराजगी झेल रहे हैं। अमेरिका में ब्रिटेन के राजदूत रहे पीटर मैडलसन की नियुक्ति भी विवाद बन गई थी। पिछले सितंबर ब्रिटिश मीडिया ने मेंडिलसन और जेफरी एपस्टीन की बातचीत के कई ईमेल्स शेयर किए थे। जिसके बाद उन्हें पद से हटाना पड़ा था। इसके बाद मेंडलसन पर आरोप लगे कि उन्होंने 2006 2007 के वैश्विक आर्थिक संकट के दौरान एपस्टीन के साथ वित्तीय बाजारों से जुड़ी सेंसिटिव जानकारी साझा की थी। कीर स्टारमर पर आरोप लगा कि उन्होंने वार्निंग्स को नजरअंदाज किया और एपस्टीन से मेंडलसन के रिश्तों की जानकारी होने के बावजूद उन्हें राजदूत बना दिया। बवाल के बाद स्टार्मर ने सार्वजनिक तौर पर माफी भी मांगी थी। उन्होंने कहा कि उन्हें यह नहीं पता था कि मेंडलसन और एपस्टीन इतने करीब थे। इन सब घटनाओं की वजह से स्टार्मर की लोकप्रियता पश्चिमी देशों के नेताओं में सबसे नीचे मानी जा रही है।</div><h2>यूरोप में कट्टरपंथी बढ़त</h2><div>इमिग्रेशन ने कट्टरपंथी पार्टियों को यूरोप में मुख्यधारा में ला दिया है। जर्मनी में एएफडी 2021 की 83 सीटों से 2025 में 152 पर पहुंची। फ्रांस में नेशनल रैली 2022 की 89 सीटों से 2024 में 142 सीटों तक पहुंची। इटली में जॉर्जिया मेलोनी की ब्रदर्स ऑफ इटली 2018 की 32 सीटों से 2022 में 119 सीटों तक पहुंची और सत्ता में आ गई।</div><h2>स्थायी निवास खत्म और 'ब्रिटिश वर्कर फर्स्ट'</h2><div>निगेल फराज की रिफॉर्म यूके राजनीति का मुख्य मुद्दा इमिग्रेशन है। पार्टी गैर-कानूनी माइग्रेंट्स को सीधे डिपोर्ट करने बात करती है। यूरोपियन कन्वेंशन ऑन ह्यूमन राइट्स छोड़ने और ह्यूमन राइट्स एक्ट खत्म करने का वादा है। फराज ब्रिटेन में स्थायी निवास अधिकार खत्म कर 5 साल का रिन्यूएबल वीजा चाहते हैं; ऊंची सैलरी और वेलफेयर बैन भी शर्त होगी।&nbsp;</div><h2>ब्रिटेन में 18.6 लाख भारतीय</h2><div>आंकड़े के मुताबिक ब्रिटेन में 18.64 लाख भारतीय हैं इसलिए रिफॉर्म यूके इमिग्रेशन सख्ती का असर छात्रों, वर्कर्स और परिवारों तक जाएगा। स्किल्ड वर्कर वीसा की फीस 1.84 से 2.12 लाख रुपए है। हेल्थ सरचार्ज 1.18 लाख रु. सालाना है। यानी 5 साल में हेल्थ सरचार्ज ही करीब 5.90 लाख रु. होगा। कुल मिलाकर हर रिन्यूअल पर प्रति व्यक्ति 8.02 लाख रु. खर्च हो सकता है।&nbsp;</div><h2>ये 4 लेबर नेता स्टार्मर को दे रहे चुनौती</h2><div><b>वेस स्ट्रीटिंगः</b> 43 वर्षीय पूर्व स्वास्थ्य मंत्री कैबिनेट छोड़कर सीधे नेतृत्व चुनौती देने वाले पहले बड़े लेबर नेता। आरोप- स्टारमर में 'विजन और दिशा' नहीं। स्थानीय चुनावों की हार को वे जनता की चेतावनी बता रहे हैं। ईयू से जुड़ने की वकालात।</div><div><b>एंडी बर्नहमः </b>ग्रेटर मैनचेस्टर मेयर और पूर्व हेल्थ मंत्री। उपचुनाव जीतकर संसद लौटना चाहते हैं। जीतने पर नेतृत्व चुनौती दे सकते हैं। मुद्दा लेबर कामकाजी वर्ग से कट गई। महंग जरूरी सेवाएं और स्टारमर मॉडल की कमजोरी बता रहे हैं।</div><div><b>जोश साइमंसः</b> मेकरफील्ड से सांसद 32 साल के साइमंस अपनी सीट एंडी बर्नहम के लिए छोड़ने को तैयार। वे बर्नहम की संसद वापसी का रास्ता बना रहे हैं। दावा- स्टारमर नेतृत्व में लेबर स्थानीय चुनावों में कमजोर हुई और नया चेहरा चाहिए।</div><div><b>लिसा नंदीः </b>भारतीय मूल की लिसा नेंडी मौजूदा सरकार में संस्कृति मंत्री हैं। मौजूदा हालात में उनका समर्थन भी स्टारमर विरोधी बर्नहम खेमे को है। लिसा 2020 में लेबर पार्टी के नेतृत्व पद के लिए चुनाव में अंतिम 3 उम्मीदवारों में से एक थीं।</div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 18 May 2026 13:31:29 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/how-has-the-radical-wave-from-europe-knocked-on-britain-door-and-caused-an-earthquake-in-politics</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[राहुल गांधी के राइट हैंड से कैसे छिनी केरल CM की कुर्सी? क्या प्रियंका की एंट्री ने पलट दी पूरी बाजी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/how-did-rahul-gandhi-right-hand-man-snatch-the-kerala-cm-chair]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>10 दिन और कई दौर की लंबी बातचीत के बाद आखिरकार केरलम के नए सीएम के नाम पर मुहर लग गई है। वीडी सतीशन सूबे के 13वें मुख्यमंत्री होंगे। यह ऐलान 13 मई को हो जाना था लेकिन 14 मई को हुआ। 5 साल अब सतीश त्रिवेंद्रम की कुर्सी पर बैठने वाले हैं। अब कांग्रेस के भीतर इस टॉप पोस्ट के लिए दो और बड़े नामों की ज्यादा चर्चा थी। एक नाम की तो खूब थी। कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल और केरल विधानसभा के पहले नेता प्रतिपक्ष रह चुके पहले मतलब पूर्व में रमेश रामकृष्णन चेन्नईथला कांग्रेस के सामने यह एक बहुत बड़ी चुनौती बन गई थी क्योंकि केसी वेणुगोपाल के बारे में कहा जाता है कि राहुल गांधी हर वक्त उनसे फोन पर टच में रहते हैं। किसी सूबे में मुख्यमंत्री चुनना हो, एलओपी चुनना हो, प्रदेश अध्यक्ष चुनना हो या पार्टी की कोई दूसरी बड़ी योजना हो, सबसे अहम सलाहकार की भूमिका केसी वेणुगोपाल के पास ही है। वही राहुल को एडवाइस करते हैं। फिर कुछ स्टैंडिंग रमेश चनेथला की भी थी। 4 मई को केरल विधानसभा के चुनाव के नतीजों में यूडीएफ यानी यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट एलडीएफ यानी कि लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट पर भारी पड़ा। पिनराई विजयन की सरकार चली गई। यूडीए ने 10 सालों बाद सत्ता में वापसी करते हुए 140 में से 102 सीटें जीत ली। अब कांग्रेस नीत गठबंधन चुनाव तो जीत गया था लेकिन फिर सीएम कौन होगा? तीन नाम थे। 10 दिन ड्रामा चला। फिर 3 मिनट में कहानी खत्म। वेणुगोपाल को शायद इसका अंदाजा नहीं था। सवाल है कि वेणुगोपाल की तपस्या में कोई कमी रह गई या फिर राहुल को उनकी अतिरिक्त या फिर यूं कह लें कि अपनी मर्जी की तपस्या पसंद नहीं आई। वेणुगोपाल सीएम नहीं बने तो क्या उनका बतौर संगठन महासचिव वाला जो रुतबा था या है अब वह पहले जैसा रह पाएगा? राहुल ने इस फैसले से क्या कर्नाटक, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे किचकिच से खुद को और पार्टी को बचा लिया है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/kerala-will-become-south-india-number-one-state-under-leadership-of-vd-satheesan-ak-antony-said" target="_blank">AK Antony का बड़ा बयान, VD सतीशान के नेतृत्व में Kerala बनेगा South India का नंबर-1 राज्य</a></h3><h2>केरल की राजनीति और कांग्रेस का दौर</h2><div>इस कहानी की शुरुआत 20 की 21 की निराशाओं से होती है। पूरे देश में कांग्रेस पार्टी बुरी तरह चुनाव हारी थी। लेकिन एक प्रदेश था जहां पर अब भी उसकी सांसे दुरुस्त चल रही थी। यह प्रदेश था केरल का प्रदेश जहां पर 2014 में 12 सीटें जीती थी और उसके बाद भी प्रदर्शन खराब नहीं रहा था 2019 में। ऐसे में पार्टी को लग रहा था कि परंपराओं का पालन होगा। 2021 में लेफ्ट के नेतृत्व वाली सरकार हट जाएगी और यूडीएफ यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट सत्ता में आ जाएगी। सबसे ज्यादा इस बात का इंतजार कर रहे थे। कांग्रेस के विधायक पूर्व गृह मंत्री रमेश चेनीथला जो 5 वर्ष तक पिनराई विजय सरकार के मुकाबले नेता प्रतिपक्ष थे। पर ऐसा हुआ नहीं। कांग्रेस बुरी तरह लगातार दूसरा विधानसभा चुनाव हार गई। अब 5 बरस का और इंतजार था। इस बीच 2024 में लोकसभा चुनाव हुए और यूडीएफ केरल की 20 में से 18 सीटें जीत कर आई। यह विजयन के लिए एक बड़ा झटका था। 2025 में लोकल बॉडी के इलेक्शन हुए तो यहां भी कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ ने बड़ी जीत हासिल की। इस जीत के बाद तीन नेता थे जो केरल के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर एक तक नजर लगाए हुए थे। पहले रमेश चेनीथला 28 वर्ष की उम्र में मंत्री बन गए। चार बार सांसद रहे। छात्र राजनीति के जरिए कांग्रेस में मजबूत हुए। यूथ कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी रहे। कई सरकारों में मंत्री ओमन चांडी की सरकार में गृह मंत्री भी। उन्हें लग रहा था 71 की उम्र में वरिष्ठता का मेरा दावा सबसे ज्यादा मजबूत होगा। पार्टी ने उनकी वरिष्ठता को ध्यान में रखते हुए 2026 के विधानसभा चुनाव में उन्हें कैंपेन कमेटी का मुखिया भी बनाया था। दूसरे दावेदार थे आलाकमान के प्रिय केसी वेणुगोपाल। 28 वर्ष की उम्र में कासरगोर से 1991 में पहली बार लोकसभा का चुनाव लड़ते रहे। उन दिनों वह केरल के कद्दावर नेता और मुख्यमंत्री के करुणाकरण के खेमे में माने जाते थे। 1996 से उन्होंने विधानसभा चुनाव लड़ना शुरू किया 2006 तक यानी लगातार तीन विधानसभा चुनाव में जीत हासिल की। ओमान चांडी की सरकार में कुछ वक्त तक मंत्री भी रहे।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/vd-satheesan-will-be-the-new-chief-minister-of-keralam-congress-high-command-has-taken-the-decision" target="_blank">आखिरकार लग गई मुहर! VD Satheesan होंगे Keralam के नए CM, Congress हाईकमान ने लिया फैसला</a></h3><h2>कैसे चमकी केसी वेणुगोपाल की किस्मत</h2><div>केसी वेणुगोपाल के बारे में कहा जाता है कि उन्हें अपने राजनीतिक आका चुनने और उनके हिसाब से पाला बदलने में महारत हासिल है। कभी करुणाकरण के खास हुआ करते थे। फिर करुणाकरण का सूर्य अस्त हुआ। एक के एंटनी मजबूत हुए तो केसी वेणुगोपाल ने रमेश च्नीथला का हाथ थाम लिया। चेन्नथला उन दिनों केरल की कांग्रेस में तीसरे मोर्चे की अगुवाई किया करते थे। चेन्नथला का यह चेला जब दिल्ली पहुंचा तो धीमे से गांधी परिवार में अपनी मजबूती बनाई और इसकी पटकथा लिखी गई 2009 के लोकसभा चुनाव में जब वह लोकसभा चुनाव जीतकर आए। 2014 में पार्टी के केरल से 12 सांसद थे। कांग्रेस अपने सबसे कमजोर स्तर पर थी। ऐसे में केरल के सांसदों को तरजीह देना आलाकमान के लिए लाजमी था और तब केसी वेणुगोपाल को पहली बार एक बड़ी जिम्मेदारी मिली पार्टी में चीफ व्हिप की। हालांकि उससे पहले यूपीए दो के दौरान भी वह कुछ वक्त के लिए राज्य मंत्री रहे थे। यहां से केसी वेणुगोपाल पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के करीब आना शुरू हो गए और इस पर आखिरी बड़ी मोहर लगी जब 2019 के उत्तरार्ध में अशोक गहलोत की जगह उन्हें पार्टी का संगठन महासचिव बनाया गया। यह कांग्रेस की कांग्रेस की दृष्टि से एक बड़ा पद था। उसके बाद केसी वेणुगोपाल राज्यसभा के रास्ते राजस्थान से दिल्ली पहुंचे। राज्यसभा के सांसद हो गए। लेकिन केसी को लग रहा था कि जब तक वो लोकसभा में राहुल गांधी के बगल वाली सीट पर नहीं होंगे तब तक उनका राजनीतिक कद और बड़ा नहीं होगा। ऐसे में उन्होंने 2 बरस का अंतराल रहने के बावजूद दो बरस अभी बाकी थे। उनकी राज्यसभा की सांसदी में वो पद छोड़ दिया और अल्पुजा से एक बार फिर से लोकसभा का चुनाव लड़े और जीते। इस चक्कर में कांग्रेस को राज्यसभा की एक सीट का नुकसान भी हुआ क्योंकि 2023 के उत्तरार्ध में राजस्थान में विधानसभा का अंकगणित नए चुनाव के बाद बदल चुका था। गहलोत चुनाव हार चुके थे। भजन लाल शर्मा के नेतृत्व में सरकार बन चुकी थी। ऐसे में जब वहां राज्यसभा के उपचुनाव हुए केसी की खाली की हुई सीट पर तो वहां से भाजपा जीती। यह थे दावेदार नंबर दो जो बहुत मुतमई थे क्योंकि पार्टी में उनकी चल रही थी। केरल में जब सनी जोसेफ को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया तो वह केसी वेणुगोपाल के आदमी कहे गए। विधायकों के टिकट वितरण में भी सबसे ज्यादा उनकी चली।</div><h2>हाई कमान के पास क्या थे बड़े सवाल</h2><div>मुख्यमंत्री चयन को लेकर कांग्रेस नेतृत्व के सामने कई राजनीतिक और संगठनात्मक समीकरण थे। पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और राहुल गांधी की शुरुआती बैठकों के बाद भी सहमति नहीं बन सकी थी। इस बीच पार्टी के भीतर भी यह संदेश जाने लगा था कि पिछले पांच वर्षों में विपक्ष के नेता के तौर पर उन्होंने कांग्रेस को नई ऊर्जा दी। कांग्रेस नेतृत्व ने पूर्व प्रदेश अध्यक्षों और वरिष्ठ नेताओं से भी राय ली। कई नेताओं ने आगाह किया कि अगर सतीशन की दावेदारी नजरअंदाज की गई तो जनता में गलत संदेश जाएगा, क्योंकि 2021 की हार के बाद उन्होंने पार्टी को जमीन पर फिर खड़ा किया।</div><h2>प्रियंका गांधी की एंट्री</h2><div>प्रियंका वायनाड से सांसद हैं। केरल पर कोई भी फैसला बिना उनकी सहमति के कैसे होता? गांधी फैमिली की राय वैसे इस तरह के मामलों में अलग नहीं होती है। आपस में बैठकर विमर्श के बाद फिर पब्लिक का फीडबैक लिया जाता है।&nbsp; एक दावा तो ये भी किया जा रहा है कि अगले साल यानी 2027 के अक्टूबर में कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर मल्लिकार्जुन खड़गे का कार्यकाल समाप्त हो रहा है। ऐसे में हो सकता है कि राहुल जितना केसी को पसंद करते हैं, जितने उनके करीबी हैं और कहा जाता है कि वेणुगोपाल ने राहुल को आईने में उतार लिया है। तो हो सकता है कि राष्ट्रीय अध्यक्ष पर भी उनकी नजर हो अगर यह ना मिले तो वह सही नहीं।</div><h2>टॉक टू वेणू वाला पावर अब भी क्या रहेगा कायम</h2><div>राहुल गांधी के जो आज के जो फेवरेट लोग हैं जिन पर वो ट्रस्ट करते हैं जो पार्टी के भीतर हैं वो दो ही लोग हैं। पहले हैं अजय माकन जिनके पास पार्टी के संसाधनों की चाबी है और दूसरे हैं वेणुगोपाल जिनको उन्होंने पार्टी सौंप रखी है। राहुल गांधी को हो सकता है कि यह चुनने में भी बड़ी मुश्किल आए कि वेणुगोपाल की जगह कौन लेगा। पिछले कुछ सालों में एक चीज जरूर हुई है कि वेणुगोपाल इतने शक्तिशाली हो गए हैं&nbsp; कि उन्होंने राहुल गांधी के दफ्तर को जरूर उनकी पावर को जरूर कंट्रोल किया है जो पहले एब्सोल्यूट पावर एंजॉय राहुल गांधी का ऑफिस करता था वो अब पूरी नहीं कर पाता है क्योंकि एक ही बात वो बार-बार कहते हैं जब भी कोई विषय आता है कि टॉक टू वेणू। तो ये जो टॉक टू वेणू है ये अपने आप में एक बहुत महत्वपूर्ण लाइन है कि आपको अपने दफ्तर के लोगों को भी आप ऐसे कह देते हो तो उसने उसने राहुल गांधी के दफ्तर की पावर्स को बहुत नीचे लेकर आया और राहुल&nbsp; ने अब्सोल्यूट पावर&nbsp; वेणु गोपाल को दी। लेकिन आज उस उसी का खामियाजा भी शायद वेणु गोपाल को भुगतना पड़ रहा होगा। बहरहाल, कहा जा रहा है कि राहुल ने फैसला इस बात पर नहीं लिया कि कौन उनके ज्यादा करीब है, बल्कि इस आधार पर लिया गया कि पार्टी के हित में क्या है। वेणु गोपाल की सेट की हुई गोटी में वो खुद ही गच्चा खा गए। अब यहां से कहा जा सकता है कि राहुल और ज्यादा मैच्योर राजनेता बनकर उभर रहे हैं।&nbsp;</div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 15 May 2026 15:52:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/how-did-rahul-gandhi-right-hand-man-snatch-the-kerala-cm-chair</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[वर्षों तक भारत पर लगाया दांव, अब चीन के धुन पर नाचने पर अचानक क्यों मजबूर हुआ अमेरिका, ट्रंप के डबलगेम ने कैसे बढ़ाई दिल्ली की टेंशन?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/trump-who-has-been-betting-on-india-for-years-is-now-suddenly-forced-to-dance-to-chinas-tun]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>21 फरवरी 1972 का दिन अमेरिका के राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन और चीन के संस्थापक माओ से तुंग बीजिंग में हाथ मिलाते, मुस्कुराते नजर आए थे। अमेरिका से पहली बार कोई राष्ट्रपति चीन पहुंचा था और चीन से दोस्ती का हाथ बढ़ाने का ही मकसद था। चीन ने भी निक्सन का खूब स्वागत किया और पहली बार चीन और अमेरिका में फिर से दोस्ती हुई। ये एक बड़ा उदाहरण था और दुनिया को ये सबक मिला की अंतरराष्ट्रीय राजनीति में स्थाई दोस्त नहीं होता, स्थाई दुश्मन नहीं होता। अमेरिका और चीन दशकों तक एक दूसरे के खिलाफ खड़े रहे थे। कोरिया वॉर में दोनों अप्रत्यक्ष रूप से आमने-सामने भी आए थे। अमेरिका ताइवान को असली चीन मानता था और चीन की कम्युनिस्ट सरकार को अपने लिए खतरा बताता था। लेकिन हर बीतते साल के साथ ये साफ होता गया कि असली चीन तो वही है जहां माओ का राज था और इस चीन की अमेरिका को बहुत जरूरत थी। दरअसल, उसे सोवियत संघ से मुकाबला करना था और इसी मकसद के लिए निक्सन 1972 में बीजिंग गए थे। चीन भी ये जानता था कि सोवियत संघ ये दोस्ती कहां तक निभाएगा। सोवियत ने पहले न्यूक्लियर बम बनाने का चीन को वादा किया था। लेकिन बीच में ही चीन को छोड़ दिया। फिर चीन को अकेले ही बम बनाना पड़ा। चीन और अमेरिका दोनों देश अपने पुराने मतभेंदो को कुछ समय के लिए पीछे छोड़ दोस्ती का हाथ बढ़ाते हैं। इस मुलाकात ने आने वाले दशकों में दुनिया की दिशा और दशा इसी गुंजाइश के चलते तय की। लेकिन उस वक्त शायदकिसी ने नहीं सोचा कि अमेरिका और चीन आने वाले सालों में केवल पार्टनर नहीं बनेंगे बल्कि एक दूसरे की अर्थव्यवस्था में इतने घुस जाएंगे कि दोनों चाहकर भी एक दूसरे से अलग नहीं हो पाएंगे। आज 50 साल बाद इतिहास फिर उसी मोड़ पर खड़ा है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार लड़ाई साम्यवाद और पूंजीवाद की नहीं बल्कि दुनिया की अर्थव्यवस्था और टेक्नोलॉजी पर नियंत्रण की है। सितंबर 2016 में बराक ओबामा चीन गए थे और अब मई 2026 में ट्रंप आए हैं।&nbsp;</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/diplomatic-significance-of-the-meeting-between-trump-and-jinping-is-crucial-for-rest-of-the-world" target="_blank">डोनाल्ड ट्रंप और शी जिनफिंग की मुलाकात के कूटनीतिक मायने शेष दुनिया के लिए अहम</a></h3><h2>बीजिंग पहुंचे ही जिनपिंग का गुणगान करने लगे ट्रंप&nbsp;</h2><p>दोनों देशों के शीर्ष नेताओं- डोनाल्ड ट्रंप और शी जिनपिंग ने एक-दूसरे से अच्छे रिश्ते पर जोर दिया है और जमकर एक-दूसरे की तारीफ की है। डोनाल्ड ट्रंप ने अपने शुरुआती संबोधन में शी जिनपिंग को महान नेता बताया है। वहीं चीनी राष्ट्रपति ने दोस्ती पर जोर देते हुए दोनों देशों में सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया है। बीजिंग की फ्लाइट में बैठने से पहले पत्रकारों से बात करते हुए डोनाल्ड ट्रंप ने कहा था कि दोस्त जिनपिंग से मिलूंगा तो ईरान पर लंबी बातचीत करूंगा। ऐसी ख्वाहिश जाहिर करने से कुछ घंटे पहले ट्रंप ने ही कहा था कि ईरान पर चीन से कोई खैरात नहीं चाहिए, हम कई मुद्दों पर बात करेंगे। लेकिन उनमें ईरान नहीं होगा। ईरान की बात ही क्या करनी। वो तो तो हमारे कंट्रोल में है और नेस्तोनाबूद है। जो ईरान ट्रंप के बयानों में नेस्तोनाबूद है वो अमेरिकी खुफिया एजेंसियों की फाइलों नें चुपचाप अपनी ताकत समेट रहा है। तहखानों में मिसाइलें फिर से तैनात हो रही हैं। लॉन्चर्स अपनी जगह पर लौट आए हैं। खबर है कि डीलमेकर-पीसमेकर दो दिन पहले फिर से बड़े हमले का मन बना रहे थे। फिर बीजिंग के लिए निकल लिए। इतना लंबा नैरेशन देने के पीछे का मकसद ये है कि ट्रंप क्या कह रहे हैं और क्या नहीं इन सब से जंग के भविष्य का पता नहीं चलता। फिर भी दुनिया शांति के सपने देख रही है। जैसे मानो दो सुपरपावर मिल रहे है तो गैस, पेट्रोल और डीजल तो सस्ते हो ही जाएंगे। भले ही वो दोनों सुपरपावर बंद कमरों में अपने मतलब की चीज खरीदने-बेचने के सौदे निपटा रहे हो। आज इन्हीं अनिश्चितताओं का एमआरआई स्कैन करेंगे। ये भी बताएंगे कि इस मुलाकात का भारत अमेरिका के रिश्तों पर क्या असर पड़ेगा।&nbsp;</p><h2>‘5 बी’ और ‘3 टी’</h2><p>अमेरिका का पूरा ध्यान अंग्रेजी के 'B' अक्षर से शुरू होने वाले पांच मोर्चों पर टिका है: बोइंग विमान, बीफ, बीन्स यानी सोयाबीन, बोर्ड ऑफ ट्रेड (व्यापार बोर्ड) और बोर्ड ऑफ इन्वेस्टमेंट (निवेश बोर्ड)। अमेरिका की मंशा बिल्कुल साफ है। वह सेमीकंडक्टर और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी संवेदनशील और अहम तकनीकों को विवादों से बचाकर रखना चाहता है, जबकि बाकी सामान्य व्यापार को पटरी पर लाना चाहता है। अमेरिकी प्रशासन का मानना है कि चीन के मौजूदा आर्थिक ढांचे से निपटने के लिए पुराने नियम अब नाकाफी हैं, इसलिए वे अब सीधे और बराबरी के सौदों पर ज्यादा जोर दे रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ, चीन का सारा जोर 'T' अक्षर वाले तीन मुख्य मुद्दों पर है: ताइवान,टैरिफ यानी आयात शुल्क और टेक्नोलॉजी। चीन की कोशिश है कि अमेरिका द्वारा उस पर लगाए गए तकनीकी और निवेश प्रतिबंधों में ढील दी जाए और दोनों देशों के बीच व्यापारिक तनातनी पर लंबे समय के लिए विराम लगे। दरअसल, अमेरिका की सख्त पाबंदियों ने चीन को तकनीकी रूप से आत्मनिर्भर बनने की राह पर तेजी से धकेल दिया है। इस वक्त चीन की आर्थिक रफ्तार भी कुछ धीमी पड़ी है, जिससे वहां की सरकार पर बाहरी व्यापार को सुधारने का भारी दबाव है। ऐसे में, दुनिया भर में बदलते हालातों के बीच चीन की यह भी कोशिश है कि उसकी इलेक्ट्रिक कारों और स्वच्छ ऊर्जा से जुड़े अन्य उत्पादों के लिए वैश्विक बाजारों के दरवाज़े पूरी तरह से खुल जाएं।</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/pakistan-commits-another-major-crime-at-the-same-place-where-india-brahmos-missile-had-fallen" target="_blank">जहां गिरी थी भारत की ब्रह्मोस, वहां पाकिस्तान ने फिर किया बड़ा कांड</a></h3><h2>एआई, सेमीकंडक्टर और नया बैटलग्राउंड</h2><p>यदि कभी व्यापार और शुल्क अमेरिका-चीन प्रतिद्वंद्विता की पहचान थे, तो अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता और उन्नत सेमीकंडक्टर रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के मुख्य युद्धक्षेत्र बन गए हैं। शिखर सम्मेलन में तेजी से शक्तिशाली हो रहे अत्याधुनिक कृत्रिम बुद्धिमत्ता प्रणालियों से उत्पन्न जोखिमों पर पहली बार गंभीर उच्च-स्तरीय चर्चा भी हो सकती है। यह उन कुछ क्षेत्रों में से एक है जहां वाशिंगटन और बीजिंग बढ़ते अविश्वास के बावजूद सीमित सहयोग की आवश्यकता को समझते हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस संबंधों में एक और बड़ी दरार बनकर उभरी है। एंथ्रोपिक के "क्लाउड मिथोस प्रीव्यू" एक हाइटेक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस प्रणाली जो सॉफ्टवेयर कमजोरियों की स्वायत्त रूप से पहचान करने और जटिल साइबर ऑपरेशन करने में सक्षम है। इसके जारी होने से तेजी से शक्तिशाली हो रहे कृत्रिम बुद्धिमत्ता एजेंटों से उत्पन्न जोखिमों को लेकर वैश्विक चिंताएं बढ़ गई हैं। हालांकि दोनों पक्षों ने एआई की सुरक्षा और दुरुपयोग पर संवाद स्थापित करने में सीमित तत्परता दिखाई है, फिर भी गहरा अविश्वास सहयोग पर हावी है। यह अविश्वास चीन के हालिया फैसले में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है, जिसमें उसने चीनी मूल की एआई स्टार्टअप कंपनी मैनस के मेटा द्वारा 2 अरब डॉलर के अधिग्रहण को रोक दिया, जो बीजिंग के अग्रणी एआई प्रतिभा और बौद्धिक संपदा को अपने रणनीतिक पारिस्थितिकी तंत्र के भीतर बनाए रखने के दृढ़ संकल्प का संकेत देता है। इस प्रकरण ने इस बात पर ज़ोर दिया कि तकनीकी प्रतिस्पर्धा अब हार्डवेयर तक पहुंच से हटकर प्रतिभा, डेटा और नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र पर नियंत्रण की ओर बढ़ रही है। इन घटनाक्रमों से दोनों पक्षों के बीच शत्रुतापूर्ण धारणाएं और भी प्रबल होने की संभावना है, जिससे अंतर्निहित "कबीले का प्रभाव" और भी स्पष्ट हो जाएगा।</p><h2>दोनों को एक दूसरे की जरूरत</h2><p>अपने पहले कार्यकाल में ही उन्होंने चीन से होने वाले आयात पर टैरिफ की घोषणा की थी। दूसरे टर्म में वह इस लड़ाई को और आगे ले गए और 125% तक टैरिफ जड़ दिया। हालांकि रेयर अर्थ मिनरल्स पर चीनी नियंत्रण की वजह से आखिरकार ट्रंप को समझौता करना पड़ा था।&nbsp; टैरिफ वॉर भले थम गई हो, पर अमेरिका और चीन के बीच की होड़ कायम है। दोनों एक-दूसरे पर दबाव बनाने की कोशिश करते हैं, पर इतना नहीं जिससे बात ज्यादा बिगड़े। ईरान युद्ध के दौरान भी यह देखने को मिला है। ईरान की मदद के आरोप में अमेरिका ने कुछ चीनी कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई की, जबकि चीन ने वॉशिंगटन की नीतियों का विरोध किया, पर सब नियंत्रण में। इसकी वजह है आपसी निर्भरता और जरूरत। चीन के लिए अमेरिका आज भी सबसे बड़ा बाजार है। हालांकि इस साल चीनी निर्यात में करीब 10% की कमी आई है। चीन की निर्यात आधारित अर्थव्यवस्था के लिए यह झटका है। खाड़ी देशों में भी उसका निर्यात घटा है। तेहरान का सबसे बड़ा तेल खरीदार होने के नाते भी उसकी परेशानी बढ़ रही है। वह चाहता है कि युद्ध जल्दी थमे। दूसरी ओर, ट्रंप को ईरान पर समर्थन और निवेश के लिए चीन चाहिए। इसीलिए वह अपने साथ कई बड़े उद्यमियों को लेकर पहुंचे हैं।</p><h2>भारत के लिए संतुलन की चुनौती</h2><p>भारत हाल के वर्षों में अमेरिका भारत का अहम रणनीतिक साझेदार बनकर उभरा है। दूसरी ओर चीन भारत का अहम पड़ोसी देश है, जिसके साथ सीमा विवाद के बाद रिश्ते व्यवहारिक समझ पर वापस लौट रहे हैं। ऐसे में दोनों देशों के आपसी संबंध और इस दौरे के निष्कर्ष भी भारत पर असर डालेगा। अमेरिका और चीन के रिश्ते एक लंबे वक्त तक असहजता के दायरे में रहे, जिसके जियोपॉलिटिकल प्रभाव से भारत भी अछूता नहीं रहा है। बीजिंग में चल रही बातचीत का तुरंत नतीजा चाहे जो हो। भारत के कूटनीतिक और विदेश नीति के विशेषज्ञ इन घटनाक्रमों पर पैनी नज़र है। अमेरिका और चीन के बीच लंबे समय तक चलने वाली इस गहरी खींचतान से, पहले से ही उलझी और बंटी हुई वैश्विक व्यवस्था पर दबाव और ज्यादा बढ़ जाएगा। जैसे-जैसे दुनिया भर के व्यापार, तकनीक और कूटनीतिक रिश्ते दो अलग-अलग खेमों में बंटते जा रहे हैं, भारत की 'मल्टी-अलाइनमेंट' (यानी किसी एक गुट में न बंधकर, सभी देशों के साथ संतुलन बनाकर चलने की) नीति की असली परीक्षा होगी। आने वाले समय में भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि वह किसी एक महाशक्ति या शक्तिशाली गुट पर पूरी तरह निर्भर हुए बिना, अपनी रणनीतिक आज़ादी को कैसे बरकरार रखता है। साथ ही, उसे अपने राष्ट्रीय हितों और अलग-अलग मुद्दों के हिसाब से अन्य देशों के साथ मिलकर चलने का यह नाजुक संतुलन भी साधे रखना होगा।</p><h2>ट्रंप के धोखे से बढ़ेगी दिल्ली की टेंशन?</h2><p>अमेरिका ने हलिया वर्षों में चीन को अपने सबसे प्रमुख प्रतिद्वंद्वी की तरह देखा है और भारत को बीजिंग को संतुलित करने के लिए आगे बढ़ाने की कोशिश की है लेकिन अब से स्थिति बदल सकती है। यह स्थिति भारत के लिए एक इम्तिहान की तरह हो सकती है। बीते दो दशको से अमेरिका ने भारत को इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव के मुकाबले के लिए एक संतुलन बनाने वाले देश के तौर पर देखा है। हालांकि मौजूदा ट्रंप प्रशासन का रवैया बीजिंग के पक्ष में और भारत को नुकसान पहुंचाने जैसा है। ऐसे में अमेरिका-चीन शिखर सम्मेलन की खासतौर से नई दिल्ली के लिए अहमियत है। भारत की चिंता होगी कि चीन को अमेरिका एशिया में केंद्रीय रणनीतिक चुनौती के बजाय वार्ताकार साझेदार के तौर पर देख सकता है। भारत नहीं चाहेगा कि अमेरिका क्षेत्र में उसकी रणनीतिक अहमियत को नजरअंदाज करे।</p><p>&nbsp;</p>]]></description>
      <pubDate>Thu, 14 May 2026 14:16:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/trump-who-has-been-betting-on-india-for-years-is-now-suddenly-forced-to-dance-to-chinas-tun</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[जेल में प्रिटिंग, आर्मी कैंप में प्रश्नपत्र तैयार, करेंसी से ज्यादा सिक्योरिटी, NEET पेपर लीक के बीच चीन मॉडल की क्यों हो रही इतनी चर्चा]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/why-is-the-china-model-being-discussed-so-extensively-amidst-the-neet-paper-leak-controversy]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>अभी 3 मई की रात को करीब 23 लाख बच्चों ने महीनों बाद पहली बार सुकून की सांस ली थी। किसी ने मां से कहा कि मम्मी पेपर अच्छा हो गया। किसी ने पापा से कहा कि शायद सरकारी नौकरी मिल जाएगी। मेडिकल कॉलेज मिल जाएगा। उन लाखों बच्चों को लग रहा था कि उनकी जिंदगी जो है वह बदलने वाली है। लेकिन कुछ ही दिनों बाद ये खबर आती है जिसने उनकी दुनिया को हिला कर दिया है। पेपर लीक की शिकायतों के बाद नीट एग्ज़ाम रद्द हो गया है। 3 मई को ऑलरेडी कंडक्ट हो चुका एग्ज़ाम अब फिर से होगा। ऐसे में सवाल है कि आखिर कब तक इस देश में लाखों बच्चों से कहा जाएगा कि बच्चे तुम ना फिर से तैयारी कर लो। एग्जाम जो है वो कैंसिल हो गया। आखिर कब तक इस देश में बच्चे पेपर लीक, करप्शन और सिस्टम की नाकामियों का बोझ उठाते रहेंगे? एक बच्चा है जिसकी दुनिया स्कूल, कोचिंग, टेस्ट सीरीज और चार दीवारी के एक छोटे से कमरे तक सिमट चुकी थी। जिसने महीनों से सालों से अपने दोस्तों से दूरियां बनाई थी। वो त्यौहार पर अपने घर नहीं गया। उसने मोबाइल फोन छोड़ दिया। उसने क्रिकेट खेलना छोड़ दिया। आईपीएल देखना छोड़ दिया। दोस्तों के साथ मौज मस्ती, बाहर घूमना फिरना छोड़ दिया। क्योंकि उसे यह बताया गया था उसके टीचर्स, उसके पेरेंट्स के थ्रू कि बच्चे मेहनत कर लो जिंदगी बदल जाएगी। लेकिन अचानक सिस्टम एक दिन कहता है कि एग्जाम कैंसिल हो चुका है। उसी पल उन लाखों बच्चों को ऐसा लगता है जैसे उनकी मेहनत नहीं उनके भरोसे को खत्म कर दिया गया हो। उनकी जिंदगी उन्हें करियर से खिलवाड़ कर दिया गया हो।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/pakistan-paid-off-its-1971-debt-by-hiding-iranian-planes" target="_blank">ईरानी विमानों को अपने यहाँ छिपा कर पाकिस्तान ने उतार दिया 1971 का कर्ज</a></h3><h2>तब और अब में क्या चदल गया?</h2><div>2024 में लीक स्थानीय (पटना और गोधरा) था, जबकि 2026 में डिजिटल प्रसार के कारण यह राष्ट्रव्यापी हो गया।</div><div>तब बचाव की नीति थी, 2026 में जीरो टॉलरेंस के तहत तुरंत फैसला।</div><div>अब सार्वजनिक परीक्षा अधिनियम लागू है। इसमें सजा जुर्माना ज्यादा है।&nbsp;</div><div>दूसरे देशों में कैसे कानून हैं?</div><div>चीनः नकल या पेपर लीक पर 7 साल तक वेल। इसे 'देशद्रोह जैस्स मानते हैं।&nbsp;</div><div>बांगलादेश, द. कोरिया पेपर लीक पर 10 साल तक की बेल और आजीवन ब्लैकलिस्ट करने का सख्त नियम।&nbsp;</div><div>अल्जीरियाः परीक्षा के दौरान देशव्यापी इंटरनेट शटडाउन व जेल का प्रावधान।</div><h2>अभ्यर्थियों पर क्या असर होगा?</h2><div>दोबारा परीक्षा की अनिश्चितता, तैयारी की लय टूटना बड़ा मनोवैज्ञानिक बोइा।&nbsp; परीक्षा और काउंसलिंग उत्लने से पूरा शैक्षणिक सत्र पिछड़ जाता है, जिससे</div><div>मेडिकल शिक्षा का समय बढ़ जाता है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/netanyahu-makes-a-big-revelation-on-pakistan-by-taking-the-name-of-india" target="_blank">ऐसा खेल खेल रहा...भारत का नाम लेकर नेतन्याहू का पाकिस्तान पर बहुत बड़ा खुलासा</a></h3><h2>आरोपियों के लिए क्या सजा?</h2><div>नीट 2024 के बाद बने 'सार्वजनिक परीक्षा अधिनियम 2024 में सख्ती</div><div>संगठित पेपर लीक के लिए 5-10 वर्ष की जेल। न्यूनतम 1 करोड़ रु. जुर्माना। परीक्षा कराने वाली एजेंसी से पूरी लागत वसूलेंगे। 4 साल बैन भी संभव। ऐसे केस में दोषसिद्दिध की दर कम है।</div><h2>परीक्षा में कितना खर्च आता है?</h2><div>23 लाख बच्चों को परीक्षा पर लगभग 400-500 करोड़ रु. खर्च आ सकता है। इसमें प्रश्नपत्रों को छपाई, सुरक्षित परिवहन, परीक्षा केंद्रों का किराया और स्टाफ का मानदेय शामिल है। छात्रों से दोचारा फीस नहीं ली जाएगी। मतलब है कि इसका पूरा खर्च एजेंसी उठाद्गी।</div><h2>ये सुझाव पहले मान लिए जाते तो शायद ऐसी नौबत नहीं आती</h2><div>करीब 24 लाख स्टूडेंट्स का फ्यूचर अब दांव पर है। लेकिन कुछ ऐसे काम हैं जो अगर पहले हो गए होते अगर वो सुझाव मान लिए जाते तो शायद यह नौबत ना आती। बात यह है कि साल 2024 में गवर्नमेंट ऑफ इंडिया की ओर से पार्लियामेंट्री स्टैंडिंग कमिटी ऑन एजुकेशन वुमेन चिल्ड्रन यूथ एंड स्पोर्ट्स बनाई गई थी। जिसके चेयर पर्सन थे कांग्रेस नेता और मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह। इस कमेटी ने पेपर लीक्स रोकने के लिए कुछ सुझाव दिए थे। पहला सुझाव था प्राइवेट वेंडर्स पर डिपेंडेंसी कम करना। पैनल ने इस बात पर फोकस किया था कि पेपर हैंडलिंग, एग्जाम, लॉजिस्टिक्स, टेक्निकल सपोर्ट्स के लिए गवर्नमेंट इंस्टीटशंस प्राइवेट वेंडर्स का सपोर्ट लेते हैं। यह पूरे एग्जाम सिस्टम को वनरेबल बनाता है। अगर कोई प्राइवेट वेंडर गड़बड़ी करता है तो उसे हमेशा के लिए ब्लैक लिस्ट किया जाना चाहिए। दूसरा सुझाव था फंड का बेहतर इस्तेमाल। पैनल ने एक जरूरी सवाल उठाया था कि जब एग्जाम सिस्टम के लिए करोड़ों रुपए का फंड एलोकेट किया जाता है तो उस फंड का इस्तेमाल एग्जाम सिक्योरिटी के लिए क्यों नहीं होता? इस दिशा में फंड का ज्यादा से ज्यादा और बेहतर से बेहतर इस्तेमाल होना चाहिए। तीसरा सुझाव था एग्जाम सेंटर का चुनाव। कमेटी ने ऑनलाइन एग्जामिनेशन पर संदेश जताया। सुझाव दिया कि अगर कंप्यूटर बेस्ड एग्जाम हो तो सिर्फ और सिर्फ गवर्नमेंट सेंटर्स पर हो। मतलब पेन पेपर सिस्टम पर जोर दिया गया था। चौथा सुझाव था एनटीए को यूपीएससी पैटर्न समझना चाहिए। नेशनल टेस्टिंग एजेंसी यानी कि एनटीए जो नीट एग्जाम कंडक्ट कराती है उसे यूपीएससी एग्जाम पैटर्न को समझना चाहिए। कमेटी का यह भी मानना है कि यूपीएससी का एग्जाम पैटर्न कंपैरेटिवली फेयर और ट्रांसपेरेंट होता है। सुझाव सुनने में तो बहुत अच्छे हैं, लेकिन फिर मन में सवाल आता है कि इन्हें अब तक लागू क्यों नहीं किया गया?</div><div><b>स्ट्रक्चरल प्रॉब्लम: </b>करीब 22 से 24 लाख स्टूडेंट्स नीट अपीयर करते हैं। ऐसे में गवर्नमेंट एजेंसीज के लिए बहुत मुश्किल हो जाता है कि वो बिना प्राइवेट वेंडर्स की सहायता के इंफ्रास्ट्रक्चर हैंडल करें।</div><div><b>पेन पेपर मोड वर्सेस कंप्यूटर बेस्ड एग्जाम</b> एक तरफ दिग्विजय सिंह की कमेटी इस बात पर जोर देती है कि बेटर ट्रांसपेरेंसी के लिए पेन पेपर मोड ही एग्जाम के लिए ठीक है। वहीं दूसरी तरफ सरकार की ओर से अपॉइंटंटेड के राधाकृष्णन कमिटी जिसमें बायोमेट्रिक वेरिफिकेशन, जीपीएस ट्रैकिंग, एआई मॉनिटरिंग जैसी सुविधाओं वाले एग्जाम्स पर जोर देती है। इन सजेशन को गवर्नमेंट अभी इवैल्यूएट कर रही है। अंडर कंसीडरेशन है। मतलब इंप्लीमेंट नहीं हो पाए हैं। हो जाते तो शायद पेपर लीक नहीं होता।</div><h2>एनटीए प्रमुख बोले- हम जिम्मेदारी लेते हैं...&nbsp;</h2><div>दोबारा परीक्षा कराने की प्रक्रिया 7-10 दिन में शुरू हो जाएगी एनटीए के महानिदेशक अभिषेक सिंह ने कहा, 'जो कुछ भी हुआ हम उसकी जिम्मेदारी लेते हैं, यह गलत था। दोबारा परीक्षा की तारीख के लिए मैं अपनी टीम के साथ बैठक करूंगा। अगले कुछ दिनों में पूरा परीक्षा शेड्‌यूल और तारीखें घोषित कर दी जएंगी। हमारी कोशिश होगी कि कम से कम समय में परीक्षा हो जाए ताकि शैक्षणिक कैलेंडर और प्रवेश प्रक्रिया बाधित</div><h2>इतने बड़े नेशनल एग्जाम्स बार-बार विवादों में क्यों&nbsp;</h2><div>&nbsp;पिछले कई सालों में एनटीए बार-बार अलग-अलग कंट्रोवर्सीज को लेकर सवालों घेरे में है। 2019 में जब एनटीए ने पहली बार नीट एग्जाम कराया तब आंसर की को लेकर विवाद हुआ। 2020 में जेईई मेंस में विवाद हुआ। उसी साल नीट यूजी में मध्य प्रदेश की एक छात्रा को सिर्फ छह नंबर दिए गए। लेकिन बाद में ओएमआर मिलान से उसके करीब 590 मार्क्स निकले। अब सोचिए कि एक सिस्टम की गलती ने बच्ची से उसका भविष्य नहीं बल्कि जिंदगी तक छीन ली थी। इसके बाद 2022 में जेईई मेंस के दौरान टेक्निकल ग्लिचेस की शिकायतें आई। 2024 में नीट कंट्रोवर्सी ने पूरे देश को हिलाया। 67 स्टूडेंट्स के फुल मार्क्स, ग्रेस मार्क्स के विवाद और पेपर लीक के आरोपों ने लाखों बच्चों के भरोसों को अंदर तोड़ दिया। सुप्रीम कोर्ट ने तक यह मान लिया कि पेपर लीक हुआ था। लेकिन पूरे एग्जाम में सिस्टमैटिक ब्रीच साबित नहीं होने के चलते तब उस बार री एग्जाम नहीं कराया गया। और 2026 में जब आया तो फिर वही डर, फिर वही गुस्सा, फिर वही सवाल, फिर वही कहानी।&nbsp;</div><h2>चीन में कैसे होती है लीक प्रूफ परीक्षा</h2><div>चीन की सरकारी टीवी सीसीटीवी ने बताया कि परीक्षा से 3 महीने पहले सेकेंडरी स्कूलों और विश्वविद्यालयों से कुछ सीनियर टीचर्स को टेस्ट पेपर्स डिजाइन करने के लिए चुना जाता है। इन बाद इन शिक्षकों को बीजिंग के दूर-दराज और सुनसान इलाकों जैसे मिलिट्री कैंपों या जेलों में भेजा जाता है, ताकि एग्जाम के सवाल बनाने से पहले उन्हें गोपनीयता बनाए रखने की ट्रेनिंग दी जा सके। साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार टेस्ट पेपर शिक्षा मंत्रालय और नेशनल एडमिनिस्ट्रेशन ऑफ़ स्टेट सीक्रेट्स प्रोटेक्शन दोनों के अधिकार में जेलों में प्रिंट किए जाते हैं। हर प्रिंट वर्कशॉप में कैमरे और गार्ड जैसे 24 घंटे सुरक्षा के कई तरीके होते हैं। टेस्ट पेपर की प्रिंटिंग के बाद इसे हथियारबंद गार्ड पूरे देश में ले जाते हैं। इनकी सुरक्षा बैकों और कैश ले जाने वाली आर्मर्ड गाड़ियों से भी ज़्यादा होती है। द गार्जियन की रिपोर्ट के चीन की बड़ी टेक कंपनियां सरकार के आदेश पर कॉम्पिटिटिव यूनिवर्सिटी एंट्रेंस एग्जाम के दौरान चीटिंग रोकने के लिए कई एप के AI फंक्शन बंद कर दिए हैं।</div><div>बहरहाल, पेपर लीक या एग्जाम कैंसिल होने की जब खबर आती है तो सरकार को यह समझना चाहिए। सिर्फ एक परीक्षा नहीं टूटती है। लाखों बच्चों का सिस्टम से भरोसा टूट जाता है।&nbsp; चंद लोगों की लापरवाही, चंद लोगों करप्शन और 23 लाख बच्चों की जिंदगी जो है उसे मजाक बनाकर रख दिया गया है।&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 13 May 2026 15:03:22 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/why-is-the-china-model-being-discussed-so-extensively-amidst-the-neet-paper-leak-controversy</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[अनकहा लॉकडाउन? कितना बड़ा है आने वाला संकट, इससे निकलने का क्या है फॉर्मूला, आंकड़ों से समझें पूरा जियोपॉलिटिकल अर्थशास्त्र]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/an-unspoken-lockdown-how-big-is-the-impending-crisis-geopolitical-economy-through-data]]></guid>
      <description><![CDATA[<div><b>देश हमे देता है सबकुछ</b></div><div><b>हम भी तो कुछ देना सीखें।&nbsp;</b></div><div>बचपन की किताबों में ये कविता हम सबने कभी न कभी पढ़ी ही होगी। लेकिन हम देश को क्या दे सकते हैं। जवाब है-बहुत कुछ।&nbsp;<span style="font-size: 1rem;">सरकार की हमेशा यही दिली ख्वाहिश रहती है कि जनता छप्पर फाड़कर कमाए और दोनों हाथों से लुटाए, क्योंकि जब पैसा बाज़ार में घूमता है, तभी अर्थव्यवस्था का पहिया तेज़ी से भागता है, नई नौकरियां पैदा होती हैं और जेब में तनख्वाह आने से इंसान को पैसों से खरीदी जाने वाली सारी खुशियां मिल जाती हैं। नतीजा यह होता है कि आम आदमी का मूड एकदम चकाचक रहता है और वह सरकार से फालतू की शिकायतें करना बंद कर देता है। इसीलिए आपके शौक या बेतहाशा खर्चों को देखकर सरकार मन ही मन गदगद होकर सोचती है कि वाह, क्या शानदार आदमी है! मसलन, आपने शौक-शौक में किचन में भी एक टीवी लगवा लिया, तो सरकार खुश हो जाती है कि उसे इस पर टैक्स मिल गया, फिल गुड वाली फीलिंग आएगी। या फिर आप बिना किसी वजह के बस यूं ही गोवा ट्रिप पर निकल गए, गाड़ी में पेट्रोल भरवाया, रास्ते भर टोल टैक्स दिया और सरकार की बैठे-बिठाए कमाई करा दी, तो सरकार मन ही मन आपको सैल्यूट मारते हुए यही कहती है , ओय! तुस्सी कमाल कर दित्ता। अरे, इसने तो बिना बात ही बीवी को इतना महंगा गिफ्ट दे दिया! एनिवर्सरी तो अप्रैल में थी, पर खर्चा मई में ही कर डाला! सरकार फिर गदगद मुझे मेरा टैक्स मिल गया, सब चंगा! पूरी हाइपोथेटिकल थ्योरी का मजमून ये है कि अगर सरकार के सीने में कोई दिल धड़कता होगा, तो उसमें दिन-रात बस यही सब चलता रहता है। लेकिन ज़रा सोचिए, अगर आपके खर्चों पर तालियां पीटने वाली यही सरकार अचानक आपसे कहने लगे कि भाइयों-बहनों पेट्रोल बचाओ, सोना-वोना मत खरीदो, गोवा जाना है तो कारपूल करके जाओ, साल भर विदेश घूमने का प्लान तो भूल ही जाओ और हड़तालें कम करो ताकि तांबे की फैक्ट्री चालू हो सके। तो आपको तुरंत समझ जाना चाहिए कि स्थिति वाकई बेहद गंभीर है। इसका सीधा सा मतलब है कि सरकार को किसी ऐसे भयंकर आर्थिक तूफान की आहट सुनाई दे रही है, जो सीधे आपकी जेब, आपकी नौकरी और देश की पूरी अर्थव्यवस्था को हिलाकर रख सकता है। यही वजह है कि प्रधानमंत्री ने यूं ही नहीं, बल्कि किसी खास इशारे के तहत मार्च में संसद में दिए अपने बयान और अब हैदराबाद की रैली में अचानक 'कोविड-19' का ज़िक्र किया है।&nbsp;</span></div><h2>कितना बड़ा है आने वाला संकट?<span style="font-size: 1rem;">&nbsp;</span></h2><div><span style="font-size: 1rem;">ईरान पर ट्रंप और नेतन्याहू की चढ़ाई से पूरी दुनिया परेशान है। भारत जैसे देश जो तमाम दावों के बावजूद आज भी आयात पर निर्भर हैं क्रिटिकल सेक्टर्स में उनके लिए परेशानी बड़ी तो है लेकिन कितनी बड़ी अब मालूम चल रहा है।&nbsp;</span>इस तरह की अपील जैसी प्रधानमंत्री मोदी ने की है इतिहास में और भी मौकों पर की गई। जैसे द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटेन और अमेरिका में लोगों को राशन कार्ड दिए गए थे। पेट्रोल, चीनी, रबर जैसी चीजों पर कंट्रोल था। उन्हें न खरीदने की ताकीद की गई थी। कार फैक्ट्री स्टैंक बनाती थी।&nbsp;&nbsp;1973 में फिर ऑयल क्राइसिस आया। उस समय कई देशों ने कार फ्री डे तक लागू किया क्योंकि तेल बहुत महंगा हो गया था। भारत में भी 1991 के आर्थिक संकट के दौरान सरकार का पूरा फोकस डॉलर बचाने और जरूरी आयात ही करने पर आ गया था। दुनिया के अधिकतर देश ईरान पर हुए हमले के नतीजे भुगत रहे हैं। कई जगह फाइव डे व्हीकल रोटेशन आया है। ऑड इवन लागू हुआ है।&nbsp;10 मई को प्रधानमंत्री ने भाषण दिया है और एक ही दिन में इसका असर दिख गया। 11 मई को स्टॉक मार्केट धड़ाम हो गया क्योंकि आशंका दोहरी है। महंगाई बढ़ने का डर भी है और साथ में मंदी का भी।&nbsp;जिस संकट में हम प्रवेश करने वाले हैं बाकी की दुनिया तो प्रवेश कर चुकी है। हमारा देश जिस संकट में प्रवेश करने वाला है उससे निकलने के दो फार्मूले हैं। एक ऊर्जा को बचाइए यानी आपके सामने जो भी एनर्जी है। ऊर्जा मतलब आपका आपकी बिजली को आपको बचानी है। आपको पेट्रोल बचाना है। डीजल बचाना है। यह ऊर्जा आपको बचानी है। दूसरा अपने देश की विदेशी मुद्रा को आपको बचाना है। विदेशी मुद्रा कम से कम खर्च करनी है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/jewellers-launch-new-scheme-attractive-schemes-for-buying-new-jewellery-in-exchange-of-old-gold" target="_blank">Gold नहीं खरीदने की मोदी की अपील के बाद ज्वैलर्स लाये नई योजना, पुराने सोने के बदले नये गहने खरीदने पर आकर्षक स्कीमें</a></h3><h2>किन-किन चीजों की खरीद पर सबसे ज्यादा पैसा खर्च होता है</h2><div>इसमें सबसे ऊपर नाम है कच्चे तेल का। भारत अपनी जरूरत का लगभग 90% कच्चा तेल दूसरे देशों से खरीदता है। 90% वर्ष 2024 में तेल के इंपोर्ट पर लगभग 12 लाख करोड़ खर्च हुए थे। ईरान युद्ध के बाद जिस तरह से कच्चे तेल के दाम बढ़े हैं, उससे आने वाले दिनों में तेल के इंपोर्ट पर भारत का खर्च और भी ज्यादा बढ़ सकता है। हमारे ऊपर बहुत बड़ा बोझ यह पड़ने वाला है। कच्चे तेल के बाद भारत को विदेशों से सोना खरीदने पर भी ज्यादा पैसा खर्च करना पड़ता है। वर्ष 2024 में हमने विदेशों से 5.5 लाख करोड़ का सोना खरीदा जिसकी पेमेंट डॉलर्स में की थी और जैसे-जैसे डॉलर की कीमत बढ़ रही है सोना खरीदना और महंगा हो रहा है। जबकि पिछले साल यह जो खर्च है जो हमने सोना खरीदने पर किया था यह बढ़कर हो गया था 6.8 लाख करोड़ हमारे देश ने खरीदा।&nbsp;</div><h2>विदेशों से सोना खरीदने के मामले में भारत दुनिया में पांचवें नंबर पर</h2><div>भारत विदेशों से हर रोज यानी एक दिन में सोना खरीदने पर ₹1800 करोड़ खर्च करता है। एक दिन में हर दिन ₹1860 करोड़ का सोना खरीद लेते हैं और हर घंटे ₹78 करोड़ का सोना भारत खरीदता है। विदेशों से सोना खरीदने के मामले में भारत पूरी दुनिया में पांचवें नंबर पर है। इसीलिए प्रधानमंत्री मोदी ने कहा है कि एक साल तक आप बिल्कुल सोना मत खरीदिए। सोना हमें बाहर विदेशों से खरीदना पड़ता है। पेमेंट डॉलर में देनी पड़ती है। और इस समय हम ऐसी स्थिति में नहीं है। हर वर्ष बड़ी संख्या में हमारे देश के लोग छुट्टियों में विदेश घूमने जाते हैं। विदेशी सामान की खरीददारी करते हैं और उस पर बहुत पैसा खर्च करते हैं। लेकिन यह सारा पैसा असल में विदेशी कंपनियों की जेब में जाता है। दूसरे देशों की अर्थव्यवस्था में जाता है। वर्ष 2023 में भारत के लोगों ने ₹7,20,000 करोड़ रुपया विदेशों में जाकर खर्च किया। पिछले साल लगभग 3.5 करोड़ भारत के लोग विदेश यात्रा पर गए। अगर आप मेड इन इंडिया सामान खरीदेंगे वह अपने देश में ही रहेगा। केमिकल फर्टिलाइज़र्स के मामले में भी भारत इंपोर्ट पर निर्भर है। पिछले वर्ष भारत ने ₹1.5 लाख करोड़ के केमिकल फर्टिलाइजर विदेशों से खरीदे।&nbsp;<span style="font-size: 1rem;">&nbsp;</span></div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/sharad-pawar-advice-to-pm-modi-on-west-asia-crisis-call-an-all-party-meeting-immediately" target="_blank">West Asia संकट पर Sharad Pawar की PM Modi को सलाह, तुरंत बुलाएं सर्वदलीय बैठक</a></h3><h2>पीएम मोदी की अपील से कैसे विदशी मुद्रा बचेगी और महंगी घटेगी</h2><div>भारत को तेल और सोना चाहिए और ये दोनों चीजें हमें विदेशों से खरीदना होगा।</div><div>तेल और सोना खरीदने के लिए डॉलर में पेमेंट करना होगा और डॉलर जितना महंगा होगा, उतना ही हमारा नुकसान होगा।</div><div>इससे रुपए में गिरावट आएगी क्योंकि जो भी डॉलर हम खरीदते हैं वो रुपया देकर खरीदते हैं।</div><div>रुपया कमजोर होगा तो तेल और दूसरे सामानों को विदेशों से खरीदना और महंगा होगा।</div><div>महंगाई बढ़ेगी और भारत का व्यापार घाटा बढ़ेगा व हमारी अर्थव्यवस्था पर दबाव आएगा।<span style="font-size: 1rem;">&nbsp;</span></div><h2><span style="font-size: 1rem;"><b>भारत ने कच्चा तेल और सोना खरीदना कम किया तो क्या होगा?</b></span></h2><div>इससे विदेशों को हमें कम पेमेंट करनी पड़ेगी। इससे डॉलर की मांग कम हो जाएगी। यानी डॉलर खरीदने के लिए हमें कम रुपया खर्च करना पड़ेगा। इससे रुपए में मजबूती आएगी। रुपया मजबूत होने के पांच फायदे आपको होंगे। पहला विदेशों से सामान खरीदने का हमारा बिल कम हो जाएगा। तेल खरीदने पर हमारा खर्चा कम हो जाएगा। हमारे अपने देश में महंगाई इसकी वजह से कम होगी।&nbsp; विदेशी मुद्रा की हमारी बचत होगी और हमारे देश का व्यापार घाटा भी कम होगा। ईरान युद्ध के बाद से पूरी दुनिया के बड़े-बड़े विकसित देशों में तेल के दाम बढ़ चुके हैं। बस अभी हमारे देश में ही नहीं बढ़े। भारत अकेला ऐसा देश है जहां तेल संकट के बावजूद अभी तक तेल के दाम नहीं बढ़े।</div><h2>आत्मनिर्भर भारत का मंत्र संकट टलने के बाद भी जारी रहे</h2><div>अगर होर्मुज में रुकावट है तो जापान की अर्थव्यवस्था पर भी सीधा असर है। जापान भी कई महीनों का तेल पहले से जमा रखता है ताकि अचानक आपूर्ति रुकने पर देश ठप ना हो जाए। उसने अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और दूसरे मित्र देशों से अतिरिक्त गैस और ईंधन खरीदने की कोशिश की ताकि पश्चिम एशिया पर निर्भरता थोड़ी कम की जा सके। लेकिन इसमें सबसे गौर करने वाली बात यह थी कि जापान की अर्थव्यवस्था पहले ही ऑयल और गैस की निर्भरता से अपने को आगे ले जा चुकी है। वहां लोग पहले से ही मेट्रो का खूब इस्तेमाल करते हैं। स्पेशली अर्बन एरियाज में बिजली का उपयोग ज्यादा होता है। साउथ कोरिया और जापान दोनों देश बिजली से चलने वाले उपकरण जो इलेक्ट्रॉनिक्स हैं उस गेम में बहुत आगे हैं। दूसरे देशों को सेमीकंडक्टर के उपकरण देते हैं। इलेक्ट्रॉनिक पुर्जे देते हैं। मशीनें देते हैं। चिप बनाने वाली मशीनें देते हैं। सेंसर बैटरीज बेचते हैं। टोयटो जैसी गाड़ियां जापान में बन रही हैं। सैमसंग जैसा फोन साउथ कोरिया में बन रहा है। अरबों डॉलर का यह सालाना एक्सपोर्ट करते हैं। एक्चुअल एक्सपोर्ट इसलिए इनका फॉरेन रिजर्व भी लबा-लब भरा रहता है। इसलिए उनके देश में लोगों को खामियाजा उस तरह से नहीं भुगतना पड़ता। भारत को अगर ऐसी समस्याओं से बचना है। बेहतर तैयार होना है तो सफलता के दावों से पहले सफल होना होगा। संप्रभु होना होगा और ताकत सिर्फ गोली बंदूक वाली नहीं होती है। जब आप खुद आत्मनिर्भर और मजबूत होते हैं तब आपकी इज्जत होती है और तब आपको खुद कुछ नहीं कहना पड़ता। जैसे अमेरिका के राष्ट्रपति अगर आप ट्रंप को छोड़ दें तो कभी वह खुद नहीं कहते कि दुनिया का सबसे ताकतवर मुल्क है अमेरिका। क्योंकि कहने की बात नहीं है। यह वो बात है जो दुनिया जानती है। शी जिनपिंग को एक कहना नहीं पड़ता है कि चीन दुनिया की फैक्ट्री। लोग जानते हैं, मानते हैं, थर-थर कांपते हैं कि कहीं रेयर अर्थ मेटल्स की सप्लाई ना रुक जाए। जरूरी है कि सरकार जिस आग्रह के साथ अभी आत्मनिर्भर भारत की बात कर रही है, यह संकट टलने के बाद भी करती रहे।</div><div><span style="font-size: 1rem;">&nbsp;</span></div><div>&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 12 May 2026 14:38:45 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/an-unspoken-lockdown-how-big-is-the-impending-crisis-geopolitical-economy-through-data</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[नॉर्थ ईस्ट का चाणक्य या सियासत का शाहरुख खान...नरसिम्हा राव की वो सलाह और कैसे  इस शख्स ने असम को BJP के लिए गुजरात बना दिया]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/chanakya-of-the-northeast-or-the-shah-rukh-khan-of-politics]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>90 के दशक का दौरा और गुवाहाटी का कॉटन कॉलेज। वकालत पढ़ रहे 22 साल के लड़के से उसकी दोस्त ने पूछा कि मैं अपनी मां से तुम्हारे बारे में क्या बताऊं? उस छात्र नेता ने जवाब दिया, अपनी मां से कहना, मैं एक दिन असम का मुख्यमंत्री बनूंगा। मुख्यमंत्री बनना उस लड़के की महत्वाकांक्षा थी और इसे खुलकर जाहिर करने की उसे भारी कीमत भी चुकानी पड़ी। इसी लड़के की जो छात्र राजनीति के दौर से ही चुनाव मैनेज करने का एक्सपर्ट था। जिसे तीन-तीन मुख्यंत्रियों का सीधा संरक्षण प्राप्त था और हर कोई उसके रणनीतिक कौशल का मुरीद था जो 15 साल तक राज्य की सत्ता में नंबर दो रहा और जब नंबर एक बनने की बारी आई तो मुख्यमंत्री ने अपना बेटा आगे कर दिया। जब उस नेता ने गुवाहाटी से लेकर दिल्ली तक विधायकों की परेड करा दी और बताया कि यह सरकार उसने बनाई है तो पार्टी में शीश पर बैठे नंबर दो की हैसियत रखने वाले नेता ने वीटो लगा दिया और कहा तो क्या इंतजार पार्टी बदलने पर भी खत्म नहीं हुआ। अगले 5 साल फिर से नंबर दो की ही कुर्सी रही। लेकिन जब वो आया तो अपनी ही नहीं अगल-बगल की छह सात राज्यों की राजनीति बदल कर रख दी। उस पर सांप्रदायिक राजनीति के आरोप हैं। भ्रष्टाचार के भी आरोप हैं। आरोप एक नेता की हत्या और प्रतिबंधित संगठन उल्फा के लिए वसूली के भी लगे लेकिन कभी साबित नहीं हो पाए। पश्चिम बंगाल में पहली बार शुभेंदु अधिकारी के रूप में बीजेपी को अपना डेब्यू मुख्यमंत्री मिल गया। ममता बनर्जी को पिछले चुनाव में नंदीग्राम से शिकस्त देने वाले अधिकारी ने इस बार टीएमसी सुप्रीमो के गढ़ भबानीपुर में जाकर उन्हें हराया और जायंट किलर का तमगा पाया। लेकिन इसके साथ ही एक और राज्य में बीजेपी ने वो करिश्मा कर दिखाया जिसे पूरा करना सालों पहले तक बहुत मुश्किल लगता था।&nbsp; जिस नॉर्थ ईस्ट में कभी बीजेपी का झंडा ढूंढना मुश्किल था, आज वहां भगवा लहर दिख रही है। ये मोदी लहर नहीं क्योंकि यह कहना इस कहानी को फिर छोटा करना होगा। यह कहानी है हेमंता विश्व शर्मा की जिन्हें आप नॉर्थ ईस्ट का चाणक्य भी कह सकते हैं।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/himanta-biswa-sarma-to-rule-assam-again-will-take-oath-as-cm-on-may-12-pm-modi-will-attend" target="_blank">Assam में फिर Himanta Biswa Sarma का राज, 12 मई को लेंगे CM पद की शपथ, PM Modi होंगे शामिल</a></h3><h2>नॉर्थ ईस्ट के चाणक्य</h2><div>वो चाणक्य जिसे कभी कांग्रेस नजरअंदाज किया। उनके शब्दों में कहें तो अपमानित किया और जिसके बदले में हेमंता ने नॉर्थ ईस्ट में कांग्रेस का नामोनिशान मिटा दिया। यह कहानी सिर्फ एक नेता की सफलता की नहीं बल्कि आधुनिक राजनीति के सबसे बड़े बदले की कहानी है। यहीं से सवाल है कि क्या एक कद्दावर नेता का मान किसी एक राजनीतिक पार्टी किस्मत चमका और किसी की खत्म कर सकता है। 2026 के नतीजे तो यही कहते हैं। 2026 में असम में एनडीए ने 100 प्लस सीटें जीती। अगर सबसे कम सीटों के हारने का मार्जिन निकाला जाए तो जो जीत बंगाल में बीजेपी को मिली, केरल में कांग्रेस को मिली, तमिलनाडु में विजय को मिली उन सब में सबसे बड़ी जीत असम की है। 100 प्लस सीटें बीजेपी गठबंधन जीतता है। अकेले 82 बीजेपी जीतती है। असम में बीजेपी की यह प्रचंड हैट्रिक केवल एक चुनावी जीत नहीं है बल्कि उस तिरस्कार का भी अंतिम न्याय है जिसने कांग्रेस के अभेद किले को खंडाहर में तब्दील कर दिया। क्योंकि हेमंता कभी कांग्रेस के सच्चे सिपाही थे। लेकिन आज वो बता रहे हैं कि वह दिल्ली के आदेश पर चलने वाले मोहरे नहीं है बल्कि गुवाहाटी की गलियों से दिल्ली का सफर तय करने वाले हैं। आज नॉर्थ ईस्ट के इस चाणक्य की कहानी जब हम आपको सुनाएंगे तो यह कहानी उस साम्राज्य के पतन की दास्तान होगी जिसने अपने ही सबसे घातक सिपाही को कम आकने की ऐतिहासिक भूल की। शतरंज के बसद भी खुद बिछाई और साबित किया कि सियासत में जब स्वाभिमान को चोट लगती है तो सीधे सत्ता नहीं इतिहास बदलता है।</div><h2>आजादी के बाद से ही घुसपैठ और अवैध प्रवास से जूझता असम</h2><div>असम पूर्वोत्तर में भारत का सबसे बड़ा राज्य आजादी के बाद से ही घुसपैठ और अवैध प्रवास से जूझ रहा है। बंटवारे के वक्त पूर्वी पाकिस्तान से लाखों बंगाली शरणार्थी असम में घुसे। यह शरणार्थी चाय बागान, जंगल, बंजर जमीन पर बसते गए और स्थाई होते गए और इससे स्थानीय असमिया लोगों को अपनी भाषा, रोजगार, जमीन पर कब्जे का खतरा महसूस हुआ। 1960 में एसएमीस को राजकीय भाषा बनाने का कानून बना तो बंगाली इलाकों में बवाल शुरू हो गया। दंगे हुए। यहीं से असम के नौजवानों के मन में एक सवाल उठा। क्या असम के लोग अपने ही राज्य में अल्पसंख्यक हो जाएंगे? फिर आया 1971 बांग्लादेश बना। फिर से लाखों की संख्या में शरणार्थी असम आ गए। युद्ध खत्म हुआ पर ज्यादातर लोग वापस नहीं गए। अचानक से कई जिलों में बांग्ला भाषियों की संख्या बढ़ गई। 1979 में मंगलदोई लोकसभा सीट पर उपचुनाव हुए। वोटर लिस्ट आई तो बवाल शुरू हो गया। करीब 45,000 से ज्यादा अवैध प्रवासियों के नाम वोटर लिस्ट में दर्ज थे। यहीं से बाियों को असम से निकालने के लिए आंदोलन की शुरुआत हुई। नारा था जोकर जति तेकर मत जिसकी जमीन उसी का वोट और दूसरा नारा लगा विदेशी खेदा यानी विदेशियों को भगाओ। ऑल असम स्टूडेंट यूनियन यानी आसू और अखिल असमगढ़ संग्राम परिषद यानी एएजीएसपी के नेतृत्व में शुरू हुआ यह आंदोलन शुरुआत में अहिंसक था। बाद में यह हिंसक हो गया। आंदोलन का नेतृत्व प्रफुल कुमार महंत और भृगु फुकन जैसे छात्र नेता कर रहे थे। इन्हें पूरे असम के अलग-अलग कॉलेजों के छात्र संघों का समर्थन था। यह वो लड़के थे जो अभी कॉलेज में पढ़ रहे थे। लेकिन रातोंरात पूरे असम के हीरो बन गए। 1979 से 1985 छ साल तक असम में अस्थिरता रही। बंद धरना प्रदर्शन से लेकर रेल रोको आंदोलन और तेल कुओं पर हमले तक हुए। पुलिस की गोलियों से लगभग 850 से ज्यादा छात्र नेताओं की जान गई। फरवरी 1983 में हुए नीली और खराबारी नरसंहारों में 2000 से ज्यादा लोग मारे गए। जिसके बाद 1985 में असम अकॉर्ड हुआ। 15 अगस्त 1985 को राजीव गांधी ने भृगुफन और प्रफुल महंत और विराज शर्मा जैसे छात्र नेताओं के साथ समझौते पर हस्ताक्षर किए। आंदोलन रुका। आसू के नेताओं ने असम गण परिषद नाम से पार्टी बनाई और चुनावी राजनीति में उतर गए। 1985 में हुए चुनावों में एजीपी ने 67 सीटें जीतकर कमाल कर दिया। छात्रों ने सत्ता पर कब्जा कर लिया। कॉटन कॉलेज के छात्र नेता रहे प्रफुल महंत असम के सबसे युवा मुख्यमंत्री बने और भृगुफन गृह मंत्री। यह वो दौर था जब असम की राजनीति पूरी तरह से छात्र नेताओं के हाथ में थी। और 70 के दशक से ही कॉटन कॉलेज स्टूडेंट यूनियन की आंसू यूनिट को सबसे ताकतवर और प्रतिष्ठित यूनिट माना जाता था। कॉटन कॉलेज पूर्वोत्तर का सबसे पुराना हायर एजुकेशन इंस्टट्यूट। गुवाहाटी शहर के बीचों-बीच बसे इस पुराने से कैंपस को बाहर से देखो तो लगता है जैसे ब्रिटिश काल में बने किसी किले का अवशेष हो। लेकिन अंदर घुसो तो पेड़ों की छांव, लाल ईंटों की इमारतें और एक हवा है जो किताबों और राजनीति की खुशबू से भरी है। कॉटन कॉलेज का असम की राजनीति में कितना दखल है? इस बात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अब तक असम के जो 15 मुख्यमंत्री हुए हैं उनमें से सात इसी कॉलेज के छात्र रहे हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/congress-brainstorms-after-assam-election-defeat-gaurav-gogoi-says-high-command-take-a-decision" target="_blank">Assam Election में हार के बाद Congress में मंथन, Gaurav Gogoi ने कहा- अब High Command लेगा फैसला</a></h3><h2>नरसिम्हा राव की सलाह मान हेमंता ने पलट दी बाजी</h2><div>19 साल का यह खास मेहमान चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहा था। हॉस्टल के गलियारों से लेकर चाय की दुकानों तक की चर्चाओं का हिस्सा हुआ करता था। एक तेजतर्रार लड़का जो दबंग था और भाषण देने में फायर ब्रांड था। चुनाव से पहले अक्सर डीएस कॉलेज के रूम नंबर 20 में वह रुकता था ताकि हॉस्टल के इन मेट्स को अपने साथ जोड़कर रख सके। यह लड़का क्लास खत्म होने के बाद घर लौटने की बजाय हॉस्टल में रहने वाले छात्रों के साथ घूमना शुरू कर देता था क्योंकि उसे पता था कि अगर कॉलेज की राजनीति में अपना बेस मजबूत करना है तो सबसे पहले हॉस्टल में रहने वाले स्टूडेंट्स के बीच अपनी पैठ मजबूत करनी होगी। जल्द ही डीएस हॉस्टल का कमरा नंबर 20 छात्र संघ चुनाव के हाई वोल्टेज वॉर रूम में तब्दील हो गया क्योंकि खास मेहमान छात्र संघ के सबसे प्रभावशाली पद महासचिव के लिए अपनी दावेदारी पेश कर रहा था। यह दावेदारी राज्य में सबसे ताकतवर संगठन माने जाने वाले आंसू से थी। कॉटन कॉलेज का महासचिव बनना पूरे राज्य में छात्र नेतृत्व और बाद में मुख्यधारा की राजनीति के लिए सबसे बड़ा लॉन्चपैड माना जाता था और इस चुनाव को जीतने के लिए यह महत्वाकांक्षी खास मेहमान कोई कसर नहीं छोड़ना चाहता था। वह जब भी भाषण देता तो हॉल के हर कोने में अपने लोगों को बिठाता ताकि तालियों और नारों की गूंज हर कोने से आए। हॉस्टल में हेमंता दा के नाम से लोकप्रिय यह युवा अब कॉटन कॉलेज छात्र संघ का महासचिव था। पूरा नाम हेमंता विश्व शर्मा। 1994 में हेमंता को छात्र और युवा कल्याण सलाहकार समिति का सदस्य बनाया गया। 1996 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने उन्हें भृगुफ फूंकन के मुकाबले जालक कुबारी सीट से उतार दिया। हेमंता पहला चुनाव हार गए, लेकिन यह पहली और आखिरी हार थी। चुनाव में हार के बाद हेमंता प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव से मिलने गए। नरसिम्हा राव ने उन्हें एक सलाह दी। हारे हुए उम्मीदवार को अपना क्षेत्र कभी नहीं छोड़ना चाहिए। हेमंता ने इसे पूरी गंभीरता से लिया। हारने के बावजूद जालकुबारी विधानसभा में सक्रिय रहे। 2001 में कांग्रेस ने उन्हें फिर से गुवाहाटी की जालकुबारी सीट से टिकट दिया। इस बार हेमंता ने अपने गुरु और दिग्गज नेता भृगुफ फुकन को हराकर उलटफेर कर दिया। इस तरह वो पहली बार विधानसभा पहुंचे और जालकुबारी सीट उनका स्थाई ठिकाना बन गई। 2001 से 2021 तक वह लगातार पांच बार जालक कुबारी सीट से विधायक चुने जा चुके हैं और मार्जिन लगातार बढ़ता ही जा रहा है। पहला चुनाव 10,000 वोटों से जीतने वाले हेमंता 2021 में 1,000 वोटों से जीते।</div><h2>2026 के नतीजे क्या कहानी कहते हैं</h2><div>दरअसल, 2026 के नतीजों से क्योंकि असम विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजे केवल आंकड़ों के खेल नहीं है। यह हेमंता की उस कार्यशैली की जीत है जिसने विपक्ष को पूरी तरह अप्रसंगिक बना दिया। बीजेपी और उनके सहयोगी ने असम की 126 में से 101 सीटें जीती। लगातार तीसरी बार सत्ता। अपने दम पर बीजेपी 82 सीटें हासिल कर रही। डाटा कहता है कि कांग्रेस का वोट शेयर उन इलाकों में भी गिरा जहां पर उनके मजबूत गढ़ थे। हेमंता की जीत का सबसे बड़ा आधार अपर असम और लोअर असम के वो इलाके जहां डेमोग्राफिक बदलाव की वजह से स्थानीय लोगों में डर था। उन्होंने खुद को उस डर का एकमात्र ठोस समाधान बनाकर पेश किया। यह जीत इसलिए बड़ी है क्योंकि हेमंता ने इसे केवल हिंदुत्व के मुद्दे पर नहीं बल्कि काम की राजनीति पर लड़ा और खुलकर कहा कि मुझे मुसलमानों का वोट नहीं चाहिए। उनके कई इंटरव्यूज वायरल हुए जहां पूछा गया कि मोदी जी हिंदू मुसलमान नहीं करते तो वो कहते हैं हम तो करते हैं। 2026 के नतीजों ने साबित किया कि असम की जनता पुराने सुस्त शासन की जगह एक ऐसी सरकार चाहती है जो बेबाक है, बिंदास है। स्पष्ट है। जैसा भी है। रिकॉर्ड कहते हैं कि असम के ग्रामीण इलाकों में बीजेपी की पैठ पहले से मजबूत हुई। महिलाओं ने बढ़-चढ़कर हेमंता के पक्ष में वोट दिया और इसी वजह से बीजेपी की हैट्रिक हुई। अब असम की राजनीति में कांग्रेस के लिए वापसी का रास्ता लगभग बंद है क्योंकि हेमंता ने उनके पूरे स्ट्रक्चर को ही ध्वस्त कर दिया और एक ऐसा किला तैयार किया है जिसे अगले कुछ सालों में तो भेजना बड़ा मुश्किल है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/conspiracy-to-terrorize-and-create-widows-hundreds-of-white-sarees-in-tmc-office" target="_blank">आतंक और ‘विधवा’ बनाने की साजिश, TMC दफ्तर में सैंकड़ो सफेद साड़ी, सच्चाई जान हिल जाएगा पूरा देश!</a></h3><h2>पिद्दी कुत्ता और हेमंता के स्वाभिमान की कहानी</h2><div>राहुल गांधी और उनके कुत्ते पिद्दी से जुड़ा वो चर्चित किस्सा जो अक्सर सुर्खियों में रहा। वो एक किस्सा था लेकिन असली कहानी उस जिद्दी सोच की है जिसने हेमंता को फॉलोअर्स से हटाकर किंग मेकर बना दिया।&nbsp; नॉर्थ ईस्ट में आज चारों तरफ भगवा ही भगवा फैला दिया। दुनिया अक्सर यह मानती है कि हेमंता ने केवल सत्ता की चाहत में पाला बदला। उन पर कुछ मुकदमे चल रहे थे। सारी बातें लेकिन एक बड़ी हकीकत उस मुलाकात में छिपी है जिसने भारतीय राजनीति का रुख बदला। यह मुलाकात जिसके बारे में हेमंता ने खुद बताया। 2015 की मुलाकात जो दिल्ली में राहुल गांधी के साथ हुई जो स्वाभिमान की चोट का बड़ा कारण बनी। हेमंता ने कई बार साझिक तौर पर बताया कि जब वह असम की समस्याओं को लेकर पार्टी की गिरती साख को लेकर चर्चा करने दिल्ली पहुंचे तब राहुल गांधी अपने पालतू कुत्ते पिद्दी को बिस्किट खिलाने में व्यस्त थे। अब आलोचक इसे व्यक्तिगत नाराजगी या एक छोटी सी घटना बताते हैं। लेकिन गहराई से देखें तो यह कांग्रेस की उस हाई कमांड संस्कृति का प्रतीक है। जहां जमीन के बड़े नेताओं की तुलना में दरबारी वफादारी को ज्यादा अहमियत दी जाती है। हेमंता ने शायद समझा कि जिस पार्टी में राज्य के मुद्दों से ज्यादा प्राथमिकता एक पालतू जानवर को दी जाए वहां रुकना उनके वजूद के खिलाफ होगा और यह घटना कांग्रेस के लिए घातक साबित हुई क्योंकि हेमंता ने सिर्फ पार्टी नहीं छोड़ी बल्कि उत्तर पूर्व से कांग्रेस का नामोनिशान मिटा दिया। यह उस पिद्दी के बदले जिद्दी सोच की शुरुआत थी जिसने फॉलोअ को पूरे पूर्वोत्तर किंग मेकर बनाया और आज 2026 के नतीजे उस तिरस्कार का अंतिम न्याय बनकर सामने खड़े हैं।&nbsp;</div><h2>कैसे लाचित बोरफुकन की विरासत को 21वीं सदी का हथियार बनाया गया</h2><div>बता दें कि लाचित वही महानायक थे जिन्होंने मुगलों को सराय घाट की लड़ाई में शिकस्त दी थी। असम की रक्षा की थी। हेमंता ने खुद को इसी सांस्कृतिक रक्षक की भूमिका में बड़ी सफाई से ढाला। लाचित की विरासत को राजनीतिक हथियार बनाने में हेमंता ऐसे सफल रहे क्योंकि सांस्कृतिक गौरव को विकास के एजेंडे के साथ बड़ी कुशलता से जोड़ा। अनधिकृत घुसपैठ और तेजी से बदलते डेमोग्राफिक बदलावों को रोकने के लिए जो कड़े फैसले लिए उसने लाचित की रक्षात्मक विरासत के साथ जोड़ दिया। विपक्ष ने जब बार-बार हेमंता पर सांप्रदायिक होने का आरोप लगाया तो हेमंता ने उसे बहुत ही चतुराई से असमिया अस्मिता की रक्षा बताकर पलट दिया। उनका साफ कहना रहा कि असम की डेमोग्राफी को बदलने के लिए किसी भी कोशिश को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा क्योंकि यह केवल जमीन का मुद्दा नहीं बल्कि जड़ों और पहचान की सुरक्षा का सवाल है।</div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 11 May 2026 14:36:35 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/chanakya-of-the-northeast-or-the-shah-rukh-khan-of-politics</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[RSS के सबसे बड़े दुश्मन का कैसे हुआ End? आजाद भारत के इतिहास से एक रंग के मिटने की कहानी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/story-of-the-disappearance-of-a-single-color-from-independent-indias-history]]></guid>
      <description><![CDATA[<div><span style="font-size: 1rem;">5 अप्रैल 1957 की वह सुबह भारतीय राजनीति के लिए एक ऐसा मोड़ थी, जिसने दुनिया के दो सबसे शक्तिशाली देशों अमेरिका और सोवियत संघ को एक साथ चौंका दिया था। एक ब्राह्मण जमींदार परिवार का दुबला-पतला शख्स, इलम कुलम मनक्कलम शंकरन नंबूदरीपाद केरल के मुख्यमंत्री पद की शपथ ले रहा था। यह कोई साधारण शपथ नहीं थी। यह दुनिया की पहली ऐसी चुनी हुई कम्युनिस्ट सरकार थी जिसने बंदूक के दम पर नहीं, बल्कि लोकतंत्र के रास्ते सत्ता हासिल की थी। ईएमएस सरकार ने गद्दी संभालते ही जमींदारी प्रथा की जड़ों पर प्रहार किया और शिक्षा व्यवस्था को निजी चंगुल से छुड़ाने की कोशिश की। लेकिन क्रांति का यह रास्ता इतना आसान भी कहा रहने वाला था। जमीन सुधार और एजुकेशन बिल ने चर्च से लेकर नायर सर्विस सोसाइटी और कांग्रेस तक, सभी को एक पिच पर लाकर खड़ा कर दिया। सड़कों पर खून बहा, पुलिस की गोलियां चलीं और देखते ही देखते शांत केरल 'विमुक्ति समरम' (मुक्ति संघर्ष) की आग में जल उठा। जब हालात का जायजा लेने खुद प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू त्रिवेंद्रम पहुंचे, तो उन्होंने ईएमएस से एक तीखा सवाल पूछ डाला। पंडित नेहरू ने पूछा कि इतने कम वक्त में आपने इतने दुश्मन कैसे बना लिए? नेहरू हिचकिचा रहे थे, लेकिन तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष इंदिरा गांधी का इरादा साफ था। नतीजा यह हुआ कि 31 जुलाई 1959 को आर्टिकल 356 का वह पहला बड़ा प्रहार हुआ, जिसने महज 28 महीने पुरानी एक चुनी हुई सरकार का गला घोंट दिया। यह कहानी सिर्फ एक सरकार के गिरने की नहीं, बल्कि भारतीय संविधान के पहले बड़े दुरुपयोग और वैचारिक युद्ध की भी है। लेकिन केरल से सरकार की बर्खास्तगी के बाद कम्युनिस्ट मूवमेंट की कहानी खत्म नहीं हुई। लेकिन इस घटना के 69 साल बाद अब ये सवाल पूछा जाने लगा है कि क्या लाल झंडा अब केवल हमारे देश के इतिहास से किताबों और पुरानी तस्वीरों में सिमट कर रह जाएगा? दरअसल, केरल के 2026 के चुनावी नतीजों ने पूरे देश को चौंका दिया है और इस सवाल को पहले से कहीं ज्यादा धार देती है कि क्या लाल सलाम का पैकअप हो चुका है?&nbsp; यह गिरावट उनके पतन की तरफ एक बड़ी कड़ी है क्योंकि कहानी अब सिर्फ केरल की नहीं है। इसके धागे बंगाल और त्रिपुरा तक जाते हैं। जहां पर कभी इनका राज अटूट माना जा रहा था। 34 सालों तक यह बंगाल में रहे। लेकिन आज वहां नेस्तोनाबूद हो चुके हैं। एक आखिरी लड़ाई केरल की बची थी। वहां भी कहानी खत्म हो गई है। सोशल मीडिया पर लाल सलाम केवल एक हैशटग बनकर रह गया है। जबकि कभी यह इंकलाब की आवाज हुआ करता था। </span></div><div><span style="font-size: 1rem;">1967 के बाद पहली बार&nbsp;</span><span style="font-size: 1rem;">कोई भी राज्य कम्युनिस्ट शासन नहीं</span></div><div><span style="font-size: 1rem;">2026 के नतीजों के साथ भारत में पहली बार 1967 के बाद कोई भी राज्य कम्युनिस्ट शासन से पूरी तरह मुक्त हो गया। एक भी राज्य में देश में अब लाल सलाम नहीं है। तीन राज्य जहां यह मजबूत थे, बंगाल, त्रिपुरा, केरल वहां भी शून्य पर पहुंच गए।&nbsp; इसीलिए यह सिर्फ हार नहीं बल्कि आज पूरी विचारधारा के अस्तित्व की लड़ाई है। यह सवाल है कि क्या भारत में लाल सलाम की विचारधारा को देश ने खारिज कर दिया? क्योंकि फर्क अब सिर्फ सीटों का नहीं है। फर्क पकड़ का है। वही पकड़ जो कभी इनकी सबसे बड़ी ताकत थी। एक दौर था जब मजदूर से लेकर किसान और आम आदमी की आवाज बनने का दावा इनकी पहचान हुआ करता था। लेकिन आज इनकी जमीन खिसक गई है। सवाल कि क्या वक्त के साथ ये अपने आप को बदल नहीं पाए या फिर जमीन से जुड़ी राजनीति अब जमीन में ही खो चुकी है। बंगाल में गिरावट है। त्रिपुरा में सफाया है। केरल में झटका लगा है। इसीलिए सवाल है कि यह संयोग है या संकेत? क्या यह अंत की शुरुआत है या कोई वापसी की गुंजाइश बाकी है? आज का एमआरआई इसी पर करेंगे कि कैसे एक समय की सबसे बड़ी ताकत आज इस मोड़ पर आकर खड़ी हो गई है। केरल के पतन बंगाल के सबक, भ्रष्टाचार के दाग, आर्थिक नाकामी और कैडर के गहरे संकट की बात करेंगे जिसने लाल झंडे को आज इतिहास के चौराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है।&nbsp; यह कहानी सिर्फ केरल की नहीं है। यह भारत में सत्ता के नक्शे से एक रंग के मिटने की कहानी है। लाल रंग उस रंग की जो आजाद भारत में हुए पहले आम चुनाव में मुख्य विपक्षी पार्टी का रंग था।</span></div><h2>बंगाल में वाम का उदय</h2><div>आज से करीब 100 साल पहले 1925 में देश में दो वैचारिक संगठन बने। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी आरएसएस और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया यानी कि सीपीआई। यह तथ्य भी हमें ताज्जुब से भर देता है कि आरएसएस की विचारधारा पर चलने वाली पार्टी बीजेपी आज देश के 17 राज्यों में सरकार में है। साथ ही लगातार तीन लोकसभा चुनाव जीतकर केंद्र में भी सरकार में है। वहीं कम्युनिस्ट दलों की केवल एक राज्य केरल में सरकार बची है। आखिर ऐसा क्यों हुआ? यह जानने के लिए हमें इतिहास के कुछ पुराने पन्ने पलटने होंगे। प्रदेश में कभी 34 सालों तक इनका राज था।&nbsp; यहीं से इसकी शुरुआत करेंगे क्योंकि एक वक्त था जब बंगाल में ज्योति बसु का राज पत्थर की लकीर बनाता था। 34 साल का वह शासन था। सरकार की चाबी हमेशा इनके पास थी। कैडर का अनुशासन ऐसा था कि विपक्ष के लिए वहां पैर रखना मुश्किल था। 1964 में सीपीआई दो हिस्सों में टूट गई। बंगाल साल 1977 इमरजेंसी हट चुकी थी। केंद्र में जनता पार्टी की मोरारजी देसाई सरकार बनी। बंगाल में भी असेंबली चुनाव हुए। सीपीआईएम की अगुवाई में लेफ्ट फ्रंट बना। 14 जून 1977 के चुनाव में 294 में से 200 सीट से ज्यादा सीटें लेफ्ट फ्रंट को मिली। कांग्रेस को सिर्फ 20। 21 जून 1977 को 63 साल के एक कम्युनिस्ट नेता ने मुख्यमंत्री की शपथ ली। नाम ज्योति बसु। बसु एक रईस घराने से आते थे। खुद बसु ने लंदन में बैरिस्ट्री पढ़ी थी। लेकिन इंडिया लौटकर रेल मजदूरों के बीच काम करने लगे। 23 साल 1977 से 2000 तक अकेले बसु ने पांच विधानसभा चुनाव जीते। उनके बाद बुद्धदेव भट्टाचार्य ने दो जीते। कुल मिलाकर लेफ्ट फ्रंट ने बंगाल में सात लगातार चुनाव जीते। 34 साल लगातार सत्ता। यह दुनिया की सबसे लंबे वक्त तक चलने वाली चुनाव से बनी कम्युनिस्ट सरकार थी। बसु की सरकार ने ऑपरेशन बर्गा चलाया। बटाईदार किसानों के नाम सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज किए गए ताकि जमींदार उन्हें मनमानी से ना निकाल सकें। बंगाल पहला राज्य था जहां पंचायतों के सीधे चुनाव हुए जून 1978 में। इस मॉडल ने गरीब किसानों, दलितों, खेत मजदूरों के बीच कांग्रेस का जो वोट था वो लेफ्ट फ्रंट की तरफ मोड़ दिया। लेकिन सीपीआईएम कैडर इतना ताकतवर हो गया कि जिले में कोई भी काम बिना पार्टी की मंजूरी के नहीं होता था। नौकरी, ट्रांसफर, राशन सब कुछ। लोग तंग आ गए और फिर आया सिंघूर और नंदीग्राम। 2006 में बुद्धदेव भट्टाचार्य की सरकार ने टाटा मोटर्स के लिए सिंघूर में और एक केमिकल हब के लिए नंदीग्राम में किसानों की जमीन लेने की कोशिश की। नंदीग्राम में मार्च 2007 में पुलिस फायरिंग में 14 लोग मारे गए। इसी आंदोलन से एक नेता राष्ट्रीय स्तर पर उभरी ममता बनर्जी। 2011 के विधानसभा चुनाव में ममता की तृणमूल कांग्रेस ने 184 सीटें जीती। लेफ्ट फ्रंट 62 पर सिमट गया। 34 साल पुराना लाल किला ढह गया।&nbsp;</div><h2>25 साल तक त्रिपुरा पर किया राज</h2><div>बंगाल से वाम की विदाई के बाद भी एक राज्य अब भी बचा था त्रिपुरा। त्रिपुरा में सीपीआईएम ने पहली बार 1978 में सरकार बनाई थी। फिर 1993 से 2018 तक लगातार 25 साल। सीपीआईएम के नेतृत्व वाले लेफ्ट फ्रंट का राज रहा। मानिक सरकार 1998 से 2018 तक मुख्यमंत्री रहे। 20 साल मुख्यमंत्री रहने के बावजूद उनके नाम पर अपना घर नहीं था। 3 मार्च 2018 नतीजे आए। बीजेपी को 36 सीटें, सीपीआईएम को 16, विप्ल कुमार देव मुख्यमंत्री बने। इसके दो दिन बाद 5 मार्च को त्रिपुरा के बेलोनिया में लेनिन की एक बड़ी मूर्ति बुलडोजर से गिरा दी गई। यह एक प्रतीक था एक युग के अंत का। 2018 के बाद सीपीआईएम के पास सिर्फ केरल बचा था।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/we-have-not-lost-we-have-been-defeated-mamata-banerjee-called-the-ec" target="_blank">हम हारे नहीं, जबरदस्ती हराया गया, ममता ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में EC को बताया मुख्य विलेन, कहा- INDIA गठबंधन के सदस्य एक साथ</a></h3><div>केरल में भी सत्ता हर 5 साल में बदलती रही है। 1980 के बाद से लगभग हर बार एक बार एलडीएफ, एक बार यूडीएफ। 2016 में पिनरई विजयन ने इस पैटर्न को तोड़ा। 2021 में दोबारा जीते। ये पहली बार था कि केरल में किसी मुख्यमंत्री ने लगातार दो बार वापसी की हो। लेकिन तीसरी बार वापसी मुश्किल थी। 2026 के चुनाव के पहले से ही एलडीएफ पर कई आरोप थे। गोल्ड स्मगलिंग केस, एसएफआई से जुड़े विवाद, बेरोजगारी और कांग्रेस नीत यूडीएफ अब बेहतर तरीके से एकजुट है। राहुल गांधी खुद वायनाड से सांसद थे और शायद इसलिए जो नतीजे आए वह कह रहे हैं कि केरल भी फिसल गया। इसी के साथ पूरे देश में लेफ्ट की एक सरकार भी नहीं बची है। लेफ्ट का पतन सिर्फ चुनावी हार नहीं है। यह एक विचारधारा का पीछे हटना है। एक जमाना था जब बंगाल का हर बच्चा होते ही जानता था कि लाल झंडा क्या है। जेएनयू से लेकर जाधवपुर तक कैंपस लाल थे। 2026 आते-आते बंगाल त्रिपुरा में इनकी स्थिति और कमजोर हो गई। हालांकि जमीन सुधार जैसे कामों में इनका ऐतिहासिक योगदान रहा है और इसने लाखों गरीबों को छत पहचान दी है। लेकिन सिंघूर और नंदीग्राम जैसे मामलों के बाद सब बदल गया। वहां विकास और किसान हितों के बीच संतुलन बिठाने में ये पार्टी असफल रही और फिर जनता ने महसूस किया कि जो पार्टी उनकी लड़ रही थी उनके खिलाफ खड़ी हो गई। आज इन राज्यों में इनका पक्का वोटर दूसरी पार्टियों की तरफ चला गया क्योंकि इन्हें वहां सुरक्षा और विकास की नई उम्मीदें नजर आ रही।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/suvendu-adhikari-reaches-bjp-office-in-kolkata" target="_blank">शुभेंदु अधिकारी कोलकाता में भाजपा कार्यालय पहुंचे, भाबानीपुर और नंदीग्राम दोनों सीटों से दर्ज की है जीत</a></h3><h2>भ्रष्टाचार के आरोपों ने केरल सरकार की जड़े हिला दी</h2><div>त्रिपुरा में भी भाजपा की जीत ने साबित किया कि केवल पुराने कार्यकर्ताओं के दम पर आप सालों तक राज नहीं कर सकते। अगर आपके पास युवा कार्यकर्ता नहीं है, नया विज़न नहीं है तो फिर धीरे-धीरे आपसे लोग मुंह मोड़ लेंगे और यही इनके साथ हुआ। लेकिन अब केरल में जो हार हुई वह सिर्फ चुनाव की हार नहीं है। यह उस भरोसे की हार है जो दशकों से बना हुआ था और वही भरोसा आज इनके अस्तित्व पर सवाल खड़ा कर रहा है। केरल के 2026 के चुनाव के नतीजों ने सभी को हिला दिया। पिनराई विजयन की छवि पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों ने सरकार की जड़े हिला दी। केरल की सबसे बड़ी समस्या आज उसकी आर्थिक हालत में छिपी है क्योंकि राज्य का कर्ज जो है वह 4 लाख करोड़ के पार जा चुका है। सरकार अपनी कमाई का करीब 20% हिस्सा केवल पुराने कर्ज का ब्याज चुकाने में खर्च कर रही है। केरल में पढ़ाई और सेहत की सुविधाएं तो अच्छी रही लेकिन वहां नौजवानों के लिए नई नौकरियां पैदा नहीं हो पाई और युवा आज भी खाड़ी देशों में नौकरी करने को मजबूर है क्योंकि उसके अपने राज्य में नए काम और नए निवेश के मौके नहीं। केरल मुफ्त सुविधाएं देने और कल्याणकारी योजनाओं का मॉडल अब वहां की अर्थव्यवस्था पर भारी पड़ने लगा और इसी के चलते घाटा काबू से बाहर। महिलाओं और युवाओं में जो नाराजगी दिखी उसकी बड़ी वजह सबरीमाला का विवाद और वहां की उच्च शिक्षा में प्राइवेट सेक्टरी कमी दिखाई पड़ी। रही सही कसर भ्रष्टाचार ने पूरी कर दी।&nbsp;</div><h2>पिनरई विजयन पर आरएसएस कार्यकर्ता की हत्या का आरोप क्यों लगा था?&nbsp;</h2><div>साल 1970 का था। केरल में विधानसभा चुनाव हुए। पिनरई विजयन को भी कन्नूर की कुतुपरम सीट से सीपीएम ने टिकट दिया। विजयन पहली बार महज 26 साल की उम्र में विधायक बने। इन्हीं दिनों विजयन का नाम पहली बार एक पॉलिटिकल मर्डर से जुड़ा। इसी समय आरएसएस के एक कार्यकर्ता की हत्या में विजयन का नाम आया। साल 1967 में कम्युनिस्ट पार्टियों के दोबारा सत्ता में आने के बाद केरल की राजनीति बदलने लगी। आए दिन वहां सीपीएम और आरएसएस के कार्यकर्ताओं के बीच हिंसा की खबरें आने लगी। इसी हिंसा में वर्टिकल रामकृष्णन नाम से आरएसएस कार्यकर्ता की हत्या हो गई। रामकृष्णन पर कुल्हाड़ी से वार किया गया था। इसी हत्या में सीपीएम के कई नेताओं का नाम आया। इन नेताओं में पिनरई विजयन का नाम भी शामिल था। हालांकि अदालत में विजयन पर आरोप तय नहीं हो पाया और विजयन बरी हो गए।&nbsp;<span style="font-size: 1rem;">&nbsp;</span></div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/who-will-be-the-congress-cm-in-kerala-ajay-maken-said-we-will-look-at-the-wishes-of-the-mlas" target="_blank">Keralam में कौन होगा Congress का CM? अजय माकन बोले- विधायकों की इच्छा देखेंगे</a></h3><h2>लेफ्ट के कैडर में 50 साल से ऊपर लोगों का दबदबा</h2><div>लेफ्ट की सबसे बड़ी ताकत उसका अनुशासित कैडर यानी कार्यकर्ता रहे। लेकिन आज वही कार्यकर्ता कमजोरी है। पार्टी के भीतर आंतरिक लोकतंत्र लगभग खत्म है। परिवारवाद की झलक दिख रही है। जिसने समर्पित कार्यकर्ताओं के मनोबल को तोड़ा। जमीन पर काम करने वाला कार्यकर्ता अब युवा नहीं रहा। वो बूढ़ा हो गया और आज के इंटरनेट और सोशल मीडिया वाली पीढ़ी से कोई जुड़ाव नहीं। आंकड़े कहते हैं कि लेफ्ट के कैडर में 50 साल से ऊपर लोगों का दबदबा बढ़ा है। जबकि 18 से 25 सालों की युवाओं का मोह भंग हुआ। आज भी 1970 के दशक के घिसे फूटे नारे दोहराए जा रहे हैं।</div><div><br></div><div><span style="font-size: 1rem;">&nbsp;</span></div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 08 May 2026 14:32:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/story-of-the-disappearance-of-a-single-color-from-independent-indias-history</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[हिंदू अस्मिता की बातें, विवेकानंद सा पहनावा, बंगाल के 'योगी' को CM बनाएगी BJP?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/talks-about-hindu-identity-dressing-like-vivekananda-will-bjp-make-bengal-yogi-the-cm]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>राजनीति में सबसे बड़ा झटका क्या होता है? जब नाम हार जाता है और नैरेटिव टूट जाता है। पश्चिम बंगाल में इस बार यही हुआ है। वो बंगाल जहां ममता बनर्जी सत्ता की परिभाषा थी। जहां ममता से विरोध करना जोखिम भरा था। जहां ममता की इजाजत के बगैर पत्ता तक नहीं हिल रहा था। सत्ता सरकार का ऐसा रुतबा था कि हर गली, हर बूथ, हर फैसले पर कंट्रोल ममता का था। आज उस जमीन पर ममता बनर्जी के साथ खेला है। वो जमीन भगवा मय हो गई है। राम मंदिर, हिंदुत्व और कल्चरल नेशनलिज्म यानी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद। इन तीन विषयों को भाजपा ने देश के हर राज्य में धुरी की तरह इस्तेमाल किया है। सफलता भी मिली है। इसी धुरी के इर्द-गिर्द भाजपा बंगाल में भी घूमी जीती भी। लेकिन यह जीत 5 सालों की यात्रा में पहला कदम है और भाजपा तो इस सोच के साथ बंगाल में दाखिल हुई है कि अब टिकना है। तो ऐसे में भाजपा के सामने चुनौती यह है कि सूबे का मुखिया ऐसे किसी शख्स को बनाया जाए जो इस जीत को पक्का भी कर सके और दोहरा भी सके। कुछ-कुछ वैसा जैसे योगी आदित्यनाथ ने किया या हेमंता विश्वा शर्मा ने। संयासी का भगवा वस्त्र, हिंदू अस्मिता की बातें, मुस्लिम तुष्टीकरण के खिलाफ सीधी आवाज और राजनीति में कदम रखकर हिंदुओं की रक्षा का वादा। जब हम भारतीय राजनीति में भगवा और सत्ता के मिलन की बातें करते हैं तो सबसे पहला नाम उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का आता है। कारण सीधा सा है कि एक संयासी और मठ के प्रमुख से लेकर देश के सबसे बड़े सूबे के मुख्यमंत्री तक का सफर तय करके भारतीय राजनीति में हिंदुत्व की एक नई परिभाषा लिखी।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/the-defeat-of-ruthlessness-the-attack-on-appeasement-and-the-wind-of-development-in-bengal" target="_blank">बंगाल में निर्ममता की हार, तुष्टिकरण पर प्रहार और विकास की बयार</a></h3><h2>विवेकानंद का पहनावा याद आ जाएगा</h2><div>बंगाल में भाजपा बिना चेहरे के चुनाव में उतरी। इस सवाल में उलझी नहीं कि ममता का विकल्प कौन होगा। लेकिन अब उसे अपने 100 से ज्यादा विधायक एक नाम के पीछे इकट्ठा करने हैं। क्या उसके पास कोई ऐसा नेता है? एक नाम आगे किया जा रहा है। उत्पल ब्रह्मचारू पगड़ी से लेकर धोती तक सब कुछ भगवा बिल्कुल योगी आदित्यनाथ की तरह। बयान भी वैसे ही मुखर। लेकिन सब कुछ योगी जैसा ही नहीं। उत्पल ब्रह्मचारू ने अपने पहनावे में बारीक काम किया है। वह धोती कुर्ता पहनने के बाद शॉलनुमा एक भगवा कपड़ा भी ओढ़ते हैं। जिसे देखकर कहीं ना कहीं आपको विवेकानंद का पहनावा याद आ सकता है। यही कारण है कि इन्हें पश्चिम बंगाल में लोग उत्पल महाराज कहकर बुलाते हैं। फिर जब से इन्होंने भगवा वेशभूषा पर भाजपा का गमछा उड़ा है, तब से यह बंगाल के योगी आदित्यनाथ भी कहे जा रहे हैं। क्या उत्पल को मौका मिल सकता है? आज इसी का एमआरआई स्कैन करेंगे। मगर ध्यान रहे कि उत्पल महाराज की जीत यूं ही नहीं आई। इसके पीछे उत्पल महाराज की वह जड़ है जिसकी गहराई को भाजपा आलाकमान ने बहुत पहले भांप लिया था। दरअसल उत्पल महाराज की पहचान नेता से पहले एक सन्यासी के तौर पर है जो लंबे वक्त तक भारत सेवाश्रम संघ के हिस्सा रहे। उत्पल महाराज साल 2000 में आधिकारिक तौर पर भारत सेवाश्रम संघ से जुड़े थे। बाद में कालियागंज और कुन्नौर में स्थापित संघ के शाखा के प्रमुख भी रहे।&nbsp;</div><h2>भारत सेवाश्रम संघ का एक बड़ा नेटवर्क</h2><div>बंगाल में भारत सेवाश्रम संघ का प्रमुख होने भर से आपके साथ लाखों लोग जुड़ जाते हैं। जिसका कारण इस संघ का दावा और बंगाल में गहरा प्रभाव है। 1917 में इसकी स्थापना स्वामी प्रणवानंद महाराज ने की थी। तब से यह सामाजिक सेवा के काम करता आ रहा है। जैसे इनके बहुत से कार्यकर्ता की भूमिका बाढ़ और कोविड-19 के वक्त में लोगों को राहत पहुंचाने में रही है। इसके अलावा इस संघ का मुख्य उद्देश्य हिंदू धर्म का प्रचार प्रसार है। यह संगठन अस्पताल, स्कूल और आदिवासी कल्याण केंद्र भी चलाता है। 1920 के दशक से ही इस संघ ने बंगाल के ग्रामीण इलाकों खासकर दलितों और पिछड़ी जातियों के बीच जाकर उन्हें हिंदू समाज की मुख्यधारा से जोड़ने का काम किया है। आज पूरे भारत में इसके आश्रमों और केंद्रों का एक बड़ा नेटवर्क है। यह कुंभ मेला और अमरनाथ यात्रा जैसे बड़े आयोजनों में भी लाखों तीर्थ यात्रियों की सेवा करते हैं। कहने का अर्थ यह है कि बंगाल में इस संघ को मानने वाले लाखों करोड़ों लोग हैं। जाहिर है संघ से जुड़े संतों की भी अच्छी फॉलोइंग होगी। यही कारण है कि भाजपा ने उत्पल महाराज को चुना और नतीजा जीत में तब्दील हुआ। अब सवाल वही कि जब बंगाल में भाजपा का हिंदुत्ववादी चेहरा काम तो कर गया लेकिन क्या इनके अंदर योगी आदित्यनाथ वाली क्वालिटी है? तो इस सवाल का जवाब उत्पल महाराज के बयानों और भाजपा की रणनीति में मिलता है। उत्पल महाराज का साफ मानना है कि राज्य में तुष्टीरण की राजनीति के कारण हिंदुओं को अपने धार्मिक त्यौहार जैसे रथ यात्रा और रामनवमी मनाने के लिए भी पुलिस से विशेष अनुमति लेनी पड़ती है। एक आध्यात्मिक संगठन में रहकर वे हिंदुओं की इन समस्याओं को पूरी तरह से हल नहीं कर पा रहे थे। इसलिए उन्होंने राजनीति का रास्ता चुना। जाहिर है उत्पल महाराज हिंदू अस्मिता और हिंदू एकीकरण की बात करते हैं जो सीधे तौर पर भाजपा की विचारधारा से मेल खाती है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/dharmendra-pradhan-scathing-attack-on-west-bengal-said-mamata-banerjee-is-insulting-the-mandate" target="_blank">West Bengal पर धर्मेंद्र प्रधान का तीखा प्रहार, कहा- Mamata Banerjee जनादेश का अपमान कर रहीं</a></h3><h2>संघ ने किया किनारा</h2><div>उत्पल महाराज ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि उन्होंने संघ के अधिकारियों को चुनाव लड़ने के अपने निर्णय के बारे में सूचित कर दिया था, लेकिन जब वे सहमत नहीं हुए, तो उन्होंने अपनी उम्मीदवारी की घोषणा के एक दिन बाद, 17 मार्च को अपना इस्तीफा सौंप दिया, जिसे स्वीकार कर लिया गया। भारत सेवाश्रम संघ पूरी तरह से गैर-राजनीतिक, सामाजिक सेवा और धार्मिक संगठन है। संघ के महासचिव स्वामी विश्वत्मानंद ने पत्र में लिखा किसी भी परिस्थिति में संघ का कोई संन्यासी, ब्रह्मचारी या आश्रम निवासी किसी भी राजनीतिक गतिविधि में शामिल नहीं हो सकता। उन्होंने आगे कहा कि यदि कोई व्यक्ति किसी राजनीतिक दल के प्रभाव या प्रलोभन में आ जाता है, तो उसका धार्मिक जीवन पूरी तरह नष्ट हो जाता है। यह उसे त्याग के गौरव से विमुख कर देता है और सांसारिक सुखों की लत में डुबो देता है… जबकि हमें संसार के कल्याण के लिए काम करना चाहिए, सांसारिक ऐश्वर्य की ओर लौटने के लिए अपनी अंतरात्मा और वैराग्य का त्याग करना कभी भी उचित नहीं है।</div><h2>बताया क्यों लिया संयासी बनने का फैसला</h2><div>दक्षिण दिनाजपुर जिले के बलुरघाट में जन्मे उत्पल महाराज ने बताया कि वे 2000 में इस संगठन में शामिल हुए और चार साल बाद स्थानीय कॉलेज से इतिहास में स्नातक की डिग्री पूरी की। उन्होंने कहा कि मैं बचपन से ही संन्यासी जीवन से बहुत प्रभावित था, क्योंकि मैंने आश्रम के छात्रावास में रहकर पढ़ाई की। तभी मैंने संन्यासी बनने का फैसला किया था। 1917 में स्थापित यह संघ राजनीति से दूर रहता है और परोपकारी कार्यों तथा आपदा राहत कार्यों में संलग्न रहता है, साथ ही यह देश भर में हिंदू मिलन मंदिरों का एक नेटवर्क भी संचालित करता है। उत्पल महाराज का दावा है कि इनका उद्देश्य हिंदुओं को एकजुट करना है। हिंदुओं की सेवा करते हुए मैंने महसूस किया कि राजनीति के कारण यह समुदाय खतरे में है। एक विशेष समुदाय को खुश करने की कोशिशों के कारण हिंदू पीड़ित हैं। आजकल रथ यात्रा या राम नवमी के अवसर पर पूजा-अर्चना करने के लिए भी हिंदुओं को पुलिस की विशेष अनुमति लेनी पड़ती है। हिंदुओं की समस्याओं का समाधान किसी आध्यात्मिक संगठन के माध्यम से नहीं किया जा सकता। तृणमूल कांग्रेस के पूर्व नेता हुमायूं कबीर और वरिष्ठ टीएमसी नेता फिरहाद हकीम की टिप्पणियों का जिक्र करते हुए उत्पल महाराज ने कहा कि मंदिरों में प्रार्थना करने का समय समाप्त हो गया है। उन्होंने कहा कि भले ही संघ ने उन्हें निष्कासित कर दिया हो, लेकिन वे इसे हमेशा अपने दिल और दिमाग में रखेंगे और संगठन के संन्यासियों के साथ संपर्क में रहेंगे। उन्होंने कहा कि मैं कालियागंज में रहता हूँ और इस इलाके की हर गली से वाकिफ हूँ। मैं यहाँ के लोगों को जानता हूँ और उनकी भावनाओं को समझता हूँ। वे कह रहे हैं कि उन्होंने कभी सोचा भी नहीं था कि मैं उम्मीदवार बनूँगा। एक भिक्षु होने के नाते मेरा अपने परिवार से कोई संपर्क नहीं है, लेकिन मैं एक भिक्षु के रूप में ही अपना जीवन व्यतीत करता रहूँगा।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/the-defeat-of-ruthlessness-the-attack-on-appeasement-and-the-wind-of-development-in-bengal" target="_blank">बंगाल में निर्ममता की हार, तुष्टिकरण पर प्रहार और विकास की बयार</a></h3><div>खैर योगी आदित्यनाथ की तरह वेशभूषा और विवेकानंद की तरह दिखने की कोशिश भाजपा कमान को कितना रिझाएगी यह तो वक्त बताएगा। लेकिन उत्पल बाबा के बयानों और उनके समर्थकों का बल भाजपा की विचारधारा से मेल खाने के बावजूद उन्हें अभी मुखिया बनने के लिए मेहनत करनी पड़ सकती है। क्योंकि भारत सेवा श्रम संघ द्वारा उन्हें बाहर निकाला जाना भी एक बड़ी चुनौती है क्योंकि संघ ने साफ कर दिया है कि वे किसी भी राजनीतिक दल का समर्थन नहीं करते। ऐसे में उत्पल महाराज को विधायक से ज्यादा अपनी पहचान बनाने के लिए सड़क पर उतरना ही होगा।&nbsp;</div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 06 May 2026 13:06:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/talks-about-hindu-identity-dressing-like-vivekananda-will-bjp-make-bengal-yogi-the-cm</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[तमिलनाडु में धोनी से ज्यादा पॉपुलर हो गए PK? बिहारी बाबू ने कैसे उसी फिनिशर अंदाज में पूरा किया अपना वादा]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/has-pk-become-more-popular-than-dhoni-in-tamil-nadu]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>धोनी इज मोर पॉपुलर इन तमिलनाडु देन प्रशांत किशोर। नेक्स्ट ईयर व्हेन आई कंट्रिब्यूट एंड आई हेल्प यू विन देन आई विल बी टेकिंग ओवर धोनी इन इन पॉपुलैरिटी। प्रशांत किशोर का ओवर कॉन्फिडेंस वाला दावा जो आज तमिलनाडु का सच बन चुका है। यह भविष्यवाणी जो कल तक हवाबाजी लग रही थी। आज करोड़ों लोगों के जनादेश के जरिए थलापति को विजय बना चुकी है। सत्ता के सिंहासन की तरफ बढ़ा रही है और दशकों से तमिलनाडु की राजनीति के चाणक्य माने जाने वाले एमके स्टालिन को अपने ही घर में हरा चुकी है। क्या यह सिर्फ एक हार है या फिर द्रविडियन राजनीति के उस विशाल बरगद का गिरना जिसकी जड़े बहुत गहरी है और जयललिता के जाने के बाद उसे लेकर एक धारणा थी कि अब तो कोई इसे हिला नहीं सकता, हटा नहीं सकता। लेकिन वो हिली है तमिलनाडु की सड़कों पर विजय का उत्सव है। डीएमके के दफ्तरों में सन्नाटा है और यहीं से सवाल है कि क्या ये सिर्फ एक सुपरस्टार एक करिश्मे की जीत है या रणनीतिकार के ठंडे नपे तुले दिमाग का असर। क्या ये डीएमके की हार एंटी इनकंबेंसी है सालों के अहंकार की वजह है। जनता से दूरी की वजह या फिर विजय के वह लोक लुभावने वादे कि हम बिजली फ्री में देंगे, गाड़ी फ्री में देंगे, सोना फ्री में देंगे, पढ़ाई फ्री में देंगे, यह भी फ्री देंगे, वो भी फ्री देंगे, सब दे देंगे। बस वोट दे दो। कई सवाल हैं जो तमिलनाडु की जीत को लेकर आज सोशल मीडिया पर उठ रहे हैं और सबसे बड़ा सवाल जो उठ रहा है वो बिहारी अस्मिता को लेकर है क्योंकि प्रशांत किशोर ने बिहारियों के अपमान का बदला लिया है। स्टालिन की बिसात को उल्टा है। क्या धोनी की तरह उनका जो ये फिनिशर अंदाज है यह उनके करियर में एक नया ट्विस्ट लाएगा? बिहार में उनके रिवाइवल की वजह बनेगा? तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के नतीजे सिर्फ एक चुनावी परिणाम नहीं है बल्कि दक्षिण भारत की राजनीति में आए भूकंप की तरह है जिसने देश को हिलाया है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/vijay-impersonator-the-man-who-turned-the-election-around" target="_blank">विजय का बहरूपिया, जिसने पलटा चुनाव, स्टालिन को हराने वाले शख्स की कहानी</a></h3><h2>बिहारी बाबू ने अपना धोनी वाला पूरा किया</h2><div>कहानी की शुरुआत होती है 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव से। देश के सबसे बड़े पॉलिटिकल स्ट्रेटजिस्ट कहे जाने वाले प्रशांत किशोर पहली बार दूसरों के लिए चुनाव रणनीति बनाने के बजाय खुद अपनी पार्टी जन स्वराज बनाते हैं। चुनावी मैदान में उतरते हैं। लेकिन नतीजा क्या रहा? नील बटे सन्नाटा। उनकी पार्टी एक भी सीट नहीं जीत पाई। जो पीके दूसरों को मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री बनाने का दावा करते हैं। उनका अपने ही घर में सूपड़ा साफ हो गया। सियासी पंडितों ने मान लिया कि किंग मेकर का जादू अब हमेशा के लिए खत्म हो चुका है। लेकिन आज 2026 में जब तमिलनाडु में एक्टर थलपति विजय की पार्टी टीवी ने ऐतिहासिक जीत दर्ज कर ली है तो सोशल मीडिया पर विजय से ज्यादा पीके का एक पुराना वीडियो आग की तरह फैल रहा है। यह वायरल रील फरवरी 2025 के एक इवेंट की है। तब पीके अभी-अभी विजय के साथ जुड़े ही थे। वीडियो में पीके एकदम मजाकिया लेकिन बेहद कॉन्फिडेंट लहजे में कहते दिख रहे हैं मुझे तमिलनाडु में सबसे पॉपुलर बिहारी बनना है तो मुझे धोनी के साथ कंपटीशन करना होगा जो चेन्नई सुपर किंग्स को आईपीएल जीताते हैं। हम आपके नेता के नेतृत्व में टीवीके को जीत दिलाएंगे। अब जब विजय की पार्टी ने इतना बेहतरीन प्रदर्शन किया तो पब्लिक उसी रील को शेयर करके लिख रही है कि बिहारी बाबू ने अपना धोनी वाला वादा पूरा कर दिया।&nbsp;</div><h2>फिल्मों की ब्लॉकबस्टर ओपनिंग वोट में कैसे तब्दील</h2><div>प्रशांत किशोर और थलपति विजय का यह गठबंधन कोई रातोंरात हुआ चमत्कार नहीं था। तमिलनाडु की राजनीति दशकों से डीएमके और एआईए डीएमके की मजबूत बाइनरी में कैद रही है। इस द्रविड़ियन किले को सिर्फ फिल्मी स्टारडम से नहीं भेजा जा सकता था। रजनीकांत और कमल हसन जैसे दिग्गज इसका उदाहरण रहे हैं। विजय यह बात बहुत अच्छी तरह जानते थे कि सिर्फ फिल्मों की ब्लॉकबस्टर ओपनिंग के वोट में तब्दील करने के लिए उन्हें एक ऐसे माइंड की जरूरत है जो जमीन का गणित समझता हो और यहीं से शुरू हुआ पीके और थलपति का मिशन। 2025 में फरवरी के शुरुआती दिनों में इन दोनों की पहली मुलाकात हुई। राजनीति में कोई भी मुलाकात बेवजह नहीं होती। लेकिन मीडिया की नजरों से इसे बचाने के लिए शुरुआत में इसे महज एक शिष्टाचार भेंट बता दिया गया। पीके बहुत अच्छे से जानते थे कि अगर शुरुआत में ही यह मैसेज चला गया कि एक नॉर्थ इंडियन रणनीतिकार विजय की पार्टी चला रहा है तो तमिलनाडु की जनता जो अपनी भाषाई और क्षेत्रीय अस्मिता को लेकर बेहद संवेदनशील है इसे खारिज कर देगी। इसलिए जब कुछ ही हफ्तों बाद फरवरी के अंत में एक बड़े कार्यक्रम के दौरान पीके और विजय पहली बार एक ही मंच पर सार्वजनिक रूप से खड़े हुए तो पीके ने माइक पकड़ते ही सबसे पहले इसी नैरेटिव को सेट किया। पीके ने कहा मैं यहां अपने भाई अपने दोस्त विजय को कोई चुनाव जिताने के लिए या मदद करने नहीं आया हूं। विजय को किसी मदद की जरूरत है ही नहीं। मैं यहां आया हूं क्योंकि वह तमिलनाडु के लिए नई उम्मीद है। यह महज एक बयान नहीं था। एक मास्टर स्ट्रोक था। पीके ने एक ही लाइन में विजय के ईगो को भी पुचकारा। उनके समर्थकों को यह मैसेज भी दे दिया कि उनका हीरो किसी बाहरी पर मोहताज नहीं है और साथ ही खुद को एक गाइड की सुरक्षित भूमिका में सेट कर लिया। यह पीके का वो ठेट स्टाइल है जिसमें वो क्रेडिट बैक सीट पर रखते हैं और और कैंडिडेट को फ्रंट सीट पर बिठाते हैं। इस पूरी जीत का एनालिसिस तब तक अधूरा है जब तक हम प्रशांत किशोर के उस भारी-भरकम पॉलिटिकल रिज्यूम को नहीं समझ लेते जिसने भारतीय राजनीति के पिछले एक दशक को आकार दिया है। पीके कोई साधारण चुनाव प्रचारक नहीं है। वह चुनाव को एक कॉर्पोरेट प्रोजेक्ट की तरह हैंडल करते हैं।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/vijay-has-achieved-what-rajinikanth-and-kamal-haasan-failed-to-achieve" target="_blank">रजनीकांत और कमल हासन जो नहीं कर पाए, विजय ने कर दिखाया, जानें तमिलनाडु में कैसे रच दिया इतिहास</a></h3><h2>आधुनिक चाणक्य</h2><div>बिहार राजनीति, कूटनीति और अर्थशास्‍त्र के पंडित माने जाने वाले चाणक्‍य की धरती है, जिसने चंद्रगुप्‍त मौर्य को पाटलिपुत्र पर राज करने के तरीकों और राजनीति के रहस्‍यों से रूबरू करवाया था। लेकिन वर्तमान में मगध के एक आधुनिक चाणक्य जिसने बचपन में चाय बेचने वाले नरेंद्र मोदी की चुनावी रणनीति की कमान को संभालते हुए लोकसभा चुनाव 2014 में उनका प्याला वोटों से भर दिया, फिर नीतीश कुमार को 'बिहार में बहार हो नीतेशे कुमार हो' के नारे के साथ फिर से राज्य के सर्वोच्च कुर्सी पर काबिज किया और अमरिंदर सिंह को पंजाब का कैप्टन बना दिया। साल 1977 में प्रशांत किशोर का जन्म बिहार के बक्सर जिले में हुआ था। उनकी मां उत्तर प्रदेश के बलिया जिले की हैं वहीं पिता बिहार सरकार में डॉक्टर हैं। उनकी पत्नी का नाम जाह्नवी दास है। जो असम के गुवाहाटी की एक डॉक्टर हैं। राजनीतिक करियर की बात करें तो 2014 में मोदी सरकार को सत्ता में लाने की वजह से वह चर्चा में आए थे। उन्हें एक बेहतरीन चुनावी रणनीतिकार के तौर पर जाना जाता है। हमेशा से वह पर्दे के पीछे रहकर अपनी चुनावी रणनीति को अंजाम देते आए हैं। इसी वजह से उन्हें सबसे ज्यादा भरोसेमंद माना जाता रहा है। चुनावी रणनीतिकार माने जाने वाले प्रशांत किशोर का मैजिक आंध्र प्रदेश के विधानसभा और लोकसभा चुनाव में देखने को मिला जब राष्ट्रीय चाणक्य की भूमिका निभाने के ख्वाब संजोये चंद्रबाबू नायडू को निराशा हाथ लगी और जगन मोहन रेड्डी की वाईएसआर कांग्रेस ने आंध्र प्रदेश की 22 लोकसभा सीटें जीतीं और विधानसभा में 175 में से 150 सीटों पर कब्जा जमाया। अपने कॅरियर की शुरुआत यूनिसेफ में नौकरी से करने वाले किशोर ने वहां ब्रांडिंग का जिम्मा संभाला। गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के चर्चित आयोजन ‘वाइब्रेंट गुजरात’ की ब्रांडिंग का ज़िम्मा संभालते हुए प्रशांत ने इसे सफलता की ऊंचाइयों तक पहुंचाया। इसी दौरान उनकी जान-पहचान नरेंद्र मोदी से हुई और प्रशांत किशोर ने टीम मोदी के लिए काम करना शुरू किया लेकिन पीके की मज़बूत पहचान बनी 2014 के चुनाव से जिसमें उनके प्रचार-प्रसार के पेशेवर तरीकों ने नरेन्द्र मोदी की जीत को काफी हद तक आसान बना दिया। ‘चाय पर चर्चा’ और ‘थ्री-डी नरेंद्र मोदी’ के पीछे प्रशांत का ही दिमाग था।&nbsp;</div><h2>अमरिंदर सिंह से लेकर स्टालिन तक</h2><div>2017 में पंजाब में कांग्रेस के लिए कैप्टन अमरिंदर सिंह का कैप्टन द नवा पंजाब कैंपेन हो। 2019 में आंध्र प्रदेश में जगन मोहन रेड्डी के लिए पद यात्रा का डिजाइन हो या 2020 में अरविंद केजरीवाल के लिए लगे रहो केजरीवाल का नारा हो। पीके ने हर राज्य हर नेता और हर हालात के हिसाब से एक नई राजनीतिक चाबी घड़ी। सबसे बड़ी परीक्षा 2021 में बंगाल में हुई जब बीजेपी ने ममता बनर्जी को हराने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी। तब पीके ने ही बंगाल निजेर में कई चाय यानी बंगाल अपनी बेटी को ही चाहता है का वो इमोशनल नैरेटिव गढ़ा था जिसने प्लास्टर चढ़े पैर वाली ममता बनर्जी को एक ऐसी सिंपैथी और ताकत दी कि बीजेपी का किला वहीं रह गया। पीके की राजनीति की सबसे बड़ी ताकत उनका डाटा कलेक्शन हर बूथ की माइक्रो मैनेजमेंट और वोटर के दिमाग में पल रहे एंटी इनकंबेंसी को एक सधे हुए स्लोगन में बदल देने की कला है। विजय की टीवी के साथ मिलकर दर्ज की गई 2026 की इस ताजा जीत में सबसे दिलचस्प और हैरान करने वाला पहलू कुछ और ही है। राजनीति में अक्सर कहा जाता है कि आपको अपने दुश्मनों से ज्यादा अपने उन दोस्तों से डरना चाहिए जो आपके सारे राज जानते हो। पीके ने इस बार उसी सत्ता को जड़ से उखाड़ फेंका जिसे उन्होंने खुद 5 साल पहले अपने हाथों से स्थापित किया था। याद कीजिए 2021 के तमिलनाडु विधानसभा चुनाव तब डीएमके 10 सालों से सत्ता से बाहर थी। एमके स्टालिन के सामने एआईए डीएमके को हराने की चुनौती थी। तब स्टालिन ने प्रशांत किशोर और उनकी टीम आईपैक को हायर किया था। पीके ने ही तब डीएमके के लिए ओंद्री नाइवोम वा यानी आईए एकजुट होकर जबरदस्त कैंपेन चलाया था।</div><h2>अब कैसे पलट दी बाजी</h2><div>पीके ने डीएमके के ब्लॉक और बूथ लेवल के स्ट्रक्चर को एक मशीन की तरह सेट किया और स्टालिन को मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाया था। अब 5 साल बाद 2026 के अखाड़े में कहानी पूरी तरह पलट गई। पीके अब विजय के साथ खड़े थे और उनका निशाना थी वही डीएमके। वेडीएमके के हर कमजोर बूथ संगठन की हर खामी स्टालिन की कैबिनेट के खिलाफ सुलग रहे सत्ता विरोधी गुस्से और द्रविड़ राजनीति के उस लूप होल को बखूबी जानते थे जहां से एक नया युवा नेता की एंट्री करवाई जा रही थी। उन्होंने डीएमके के उस अभेद किले को उसी के ब्लूप्रिंट का इस्तेमाल करके ढहा दिया। तमिलनाडु में मिली यह जीत विजय से भी कहीं ज्यादा प्रशांत किशोर के लिए एक जीवनदान है। इस जीत को समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे लौटकर 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव के पन्ने को पलटना होगा। दूसरों को राजा बनाने वाले पीके के मन में भी खुद सत्ता संभालने की महत्वाकांक्षा जागी थी। उन्होंने जन स्वराज नाम से अपनी राजनीतिक पार्टी बनाई। बिहार की राजनीति में बुरी तरह फ्लॉप हो गए। इस करारी हार के बाद राजनीतिक पंडितों ने उनके करियर का मर्सिया पढ़ने में देर नहीं लगाई। कहा जाने लगा कि पीके का गुब्बारा फूट गया।&nbsp; चुनाव लड़ना मुश्किल। हार से जूझ रहे पीके ने आखिरकार तय किया कि वह वापस उसी काम पर लौटेंगे, जिसमें उनका कोई सानी नहीं है। धोनी की ही तरह पीके ने भी जड़ दिया है।&nbsp;</div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 05 May 2026 14:05:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/has-pk-become-more-popular-than-dhoni-in-tamil-nadu</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[5'M' के जरिए प्लान-A हुआ मुकम्मल, अब प्लान-B में बंगाल में BJP कौन से 5 बड़े काम करने वाली है?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/plan-a-has-been-completed-5m-now-what-are-the-5-major-tasks-of-bjp-in-bengal-in-plan-b]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>बंगाल के इस चुनावी महासमर की असली दास्तान महज़ हार-जीत के आंकड़ों में नहीं, बल्कि 'M फैक्टर' के इर्द-गिर्द बुनी गई। राजनीति अब केवल ध्रुवीकरण या विकास के वादों के पुराने चश्मे से नहीं देखी जा रही। आइए डिकोड करते हैं कि आखिर ये 5 'M' कैसे तय कर रहे हैं बंगाल की सियासत की नई दिशा और दशा। बंगाल की सियासत में एक बड़े युग का बदलाव हुआ है। पूरे 15 साल तक सत्ता के शिखर पर काबिज रही टीएमसी सरकार को बेदखल कर बीजेपी ने एक नया इतिहास रच दिया है। इस महाविजय के पीछे सिर्फ चुनावी हवा का रुख नहीं, बल्कि एक बेहद सधी हुई बिसात थी। पार्टी ने जीत का ब्लूप्रिंट बहुत पहले ही तैयार कर लिया था। सत्ता के शिखर तक पहुंचने का उनका 'प्लान-A' तो अब मुकम्मल हो चुका है, लेकिन असली काम अब शुरू होता है। अब नजरें बीजेपी के 'प्लान-B' पर टिकी हैं। यानी वह रोडमैप, जिसके जरिए बंगाल की खोई हुई अस्मिता, सांस्कृतिक साख और औद्योगिक पहचान को दोबारा वापस लाने का खाका खींचा गया है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/why-did-the-west-bengal-election-results-create-a-stir-in-bangladesh-media" target="_blank">भविष्य संकट में है...पश्चिम बंगाल चुनाव के नतीजों से बांग्लादेश के मीडिया में क्यों मची खलबली?</a></h3><h2>'M' फैक्टर ने कैसे बंगाल का भविष्य तय किया</h2><h2>मुस्लिम फैक्टर&nbsp;</h2><div>पश्चिम बंगाल की राजनीति में 30% मुस्लिम आबादी वह 'M' फैक्टर है, जो किसी भी दल को सत्ता के शिखर पर पहुंचा सकता है। पारंपरिक तौर पर यह टीएमसी का पक्का वोट बैंक रहा है। लेकिन इस चुनाव में टीएमसी के इस वोट बैंक पर दोहरी मार पड़ी। पहला झटका हुमायूं कबीर ने दिया, जिन्होंने अपनी नई आम जनता उन्नयन पार्टी (AJUP) के जरिए मुस्लिम वोटों में बड़ी सेंध लगाई। रही-सही कसर बीजेपी की आक्रामक ध्रुवीकरण की राजनीति ने पूरी कर दी, जिसने इस 'M' फैक्टर के इर्द-गिर्द एकदम नए और चौंकाने वाले सियासी समीकरण गढ़ दिए।</div><h2>महिला वोटर्स&nbsp;</h2><div>बंगाल की सियासत में इस बार महिलाओं ने ही 'किंगमेकर' की कमान संभाल ली है। टीएमसी के लिए 'लक्ष्मी भंडार' जैसी योजनाएं महिलाओं को लुभाने का सबसे बड़ा ट्रंप कार्ड रहीं। लेकिन बीजेपी ने भी इस मोर्चे पर कड़ी घेराबंदी की। मोदी सरकार की कल्याणकारी योजनाओं के अलावा, बीजेपी का सीधा वार महिला सुरक्षा के मुद्दे पर था। संदेशखाली की घटना हो या आरजी कर का खौफनाक कांड—बीजेपी ने इन्हें महिला सम्मान का ज्वलंत मुद्दा बनाकर ममता सरकार के खिलाफ एक मजबूत नैरेटिव सेट कर दिया। इसी आधी आबादी को अपने पाले में करने की इस होड़ ने बंगाल के पूरे चुनावी समीकरण को बदलकर रख दिया है।</div><h2>माइग्रेंट&nbsp;</h2><div>इस बार बंगाल चुनाव में हार-जीत की एक बड़ी चाबी उन लाखों प्रवासी मज़दूरों के हाथ में भी रही, जो अक्सर चुनाव के दिन अपने घरों से दूर रहते हैं। रोज़गार के अभाव में पलायन कर चुके इन युवाओं और उनके परिवारों ने इस बार वोट डालने के लिए जिस तरह बंगाल का रुख किया, उसने सारे समीकरण बदल दिए। इसका असर इतना व्यापक था कि दिल्ली-एनसीआर और ख़ासकर नोएडा की रिहायशी सोसाइटियों में बंगाली कामगारों के छुट्टी पर जाने से कामकाज ठप पड़ गया। मज़दूरों की यह वापसी चुनाव में एक बड़ा नैरेटिव बन गई। वोट की इस अहमियत को समझते हुए बीजेपी ने इन प्रवासियों को 'सोनार बांग्ला' का विज़न दिखाकर राज्य में ही रोज़गार देने का वादा किया। इसके विपरीत, ममता सरकार ने आक्रामक रुख अपनाते हुए मज़दूरों की इस स्थिति के लिए सीधे तौर पर मोदी सरकार की नीतियों और वित्तीय असहयोग को ज़िम्मेदार ठहराया।</div><h2>मतुआ</h2><div>उत्तर 24 परगना और उसके सीमावर्ती इलाकों में सत्ता का रास्ता सीधे मतुआ समुदाय के दरवाज़े से होकर गुज़रता है। नागरिकता कानून (CAA) की मांग इस समुदाय की सबसे बड़ी धुरी है, जिसके इर्द-गिर्द बीजेपी की पूरी राजनीति घूमती है। इस बार भी बीजेपी का पूरा ज़ोर सीएए के ज़रिए अपने इस पारंपरिक और निर्णायक वोट बैंक को एकजुट रखने पर रहा। लेकिन टीएमसी ने इस बार पूरी बिसात बदल दी। सीएए के राष्ट्रीय मुद्दे को कमज़ोर करने के लिए टीएमसी ने बहुत सधी हुई चाल चली और 'लोकल मुद्दों' के साथ-साथ ज़मीनी स्तर पर जनता के भरोसे को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया। इसी स्थानीय रणनीति ने मतुआ बहुल इलाकों की चुनावी लड़ाई को बेहद दिलचस्प बना दिया है।</div><h2>मोदी फैक्टर</h2><div>बंगाल फतह के लिए बीजेपी का सबसे बड़ा हथियार 'मोदी फैक्टर' ही साबित हुआ। पीएम मोदी की रैलियों का आक्रामक रुख, केंद्रीय योजनाओं का रिपोर्ट कार्ड और राष्ट्रीय विमर्श ने पूरी पार्टी को नए जोश से भर दिया। मोदी की व्यापक स्वीकार्यता ने नए वोटर्स को बड़ी तादाद में पार्टी से जोड़ा। ज़मीन पर जनता से सीधे कनेक्ट होने की पीएम की इस कला का एक यादगार पल झाड़ग्राम में सामने आया। जब अपने मेगा रोडशो के बीच पीएम मोदी एक आम बंगाली की तरह सड़क किनारे 'झालमुड़ी' का लुत्फ़ उठाते दिखे, तो इस दृश्य ने साबित कर दिया कि चुनाव जीतने के लिए महज़ वादे नहीं, बल्कि जनता के साथ ज़मीनी और सांस्कृतिक जुड़ाव भी उतना ही ज़रूरी है।</div><h2>बंगाल के लिए बीजेपी का प्लान B</h2><div>रोजगार, निवेश और 'सोनार बांग्ला'</div><div>बंगाल की चुनावी बिसात पर इस बार सिर्फ नारों की गूंज नहीं है, बल्कि एक ठोस आर्थिक रोडमैप पेश करने की होड़ है। बीजेपी ने राज्य की जर्जर हो चुकी औद्योगिक साख को फिर से खड़ा करने के लिए कई अहम दांव चले हैं:</div><div>जूट उद्योग का 'पुनर्जागरण'</div><div>बंगाल की पहचान और कभी रोजगार का सबसे बड़ा इंजन रहा जूट उद्योग, बीजेपी के मुख्य एजेंडे में है। दशकों से जंग खा रही और बंद पड़ी जूट मिलों के ताले खोलने का वादा किया गया है। योजना महज इन्हें चालू करने की नहीं है, बल्कि तकनीकी मदद और पूंजी के जरिए इन्हें 'हाईटेक' बनाने की है, ताकि युवाओं के लिए फिर से बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा हो सके।</div><div><b>2. युवाओं को 'जॉब क्रिएटर' बनाने की पहल</b></div><div>लघु और मध्यम उद्योगों (MSME) में नई जान फूंकने के लिए राज्य में एक विशेष निगम बनाने की तैयारी है। इसके तहत 'लोकल मैन्युफैक्चरिंग' को बढ़ावा देने और युवाओं को उद्यमी बनाने के लिए 10 लाख रुपये तक की आर्थिक मदद (जिसमें ग्रांट और ब्याज-मुक्त लोन शामिल है) का प्रस्ताव रखा गया है।</div><div><b>3. 'ग्रेटर कोलकाता' और वर्ल्ड-क्लास इंफ्रास्ट्रक्चर</b></div><div>पार्टी के 'सोनार बांग्ला' विजन का सबसे बड़ा हिस्सा है। कोलकाता और उसके आसपास के उपनगरों को मिलाकर एक 'ग्लोबल इंडस्ट्रियल हब' तैयार करना। इसके लिए लॉजिस्टिक खर्च को कम करने और निर्यात को रफ्तार देने पर फोकस है। हल्दिया पोर्ट का आधुनिकीकरण, नए डीप-सी पोर्ट का निर्माण और बेहतरीन रेल-सड़क नेटवर्क बिछाना इस रणनीति का मुख्य हिस्सा है।</div><div><b>4. सिंगूर का नया अध्याय: विशेष औद्योगिक जोन</b></div><div>उद्योग के नाम पर सियासत का केंद्र रहे सिंगूर जैसे इलाकों की तस्वीर बदलने के लिए 'डेडिकेटेड इंडस्ट्रियल पार्क' बनाने का वादा है। इन पार्कों का खाका इस तरह तैयार किया गया है कि एक हिस्सा भारी उद्योगों के लिए और दूसरा हिस्सा MSME के लिए आरक्षित रहे, ताकि दोनों एक-दूसरे के पूरक बन सकें।</div><div><b>5. पलायन रोकना&nbsp;</b></div><div>पिछले 15 सालों में राज्य से उद्योगों के पलायन को रोकने के लिए बीजेपी ने लाल फीताशाही को खत्म कर निवेशकों के लिए 'रेड कार्पेट' बिछाने का भरोसा दिया है। 'सिंगल विंडो क्लीयरेंस', पारदर्शी प्रशासन और स्थिर नीतियों के जरिए प्राइवेट सेक्टर का खोया हुआ विश्वास वापस लाने की योजना है। इसके अलावा, राज्य को भविष्य की अर्थव्यवस्था के लिए तैयार करने के वास्ते आईटी (आईटी) और सेमीकंडक्टर जैसे आधुनिक सेक्टर्स पर भी खास दांव खेला गया है।</div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 04 May 2026 19:16:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/plan-a-has-been-completed-5m-now-what-are-the-5-major-tasks-of-bjp-in-bengal-in-plan-b</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[10 रुपए का नोट...क्या इस कथित स्कैम की वजह से चुनाव हार जाएंगी ममता बनर्जी? बंगाल में कैसे BJP ने खेला कर दिया]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/will-mamata-banerjee-lose-the-election-because-of-this-alleged-scam]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>पश्चिम बंगाल में मतदान संपन्न हो चुके हैं। अब इंतजार है तो सिर्फ 4 मई का जब नतीजे आएंगे और क्लियर हो जाएगा कि सत्ता में ममता बनर्जी की वापसी होगी या फिर इस बार पश्चिम बंगाल में कमल खिलेगा। लेकिन उससे पहले जो एग्जिट पोल सामने आए हैं, वह कहीं ना कहीं ममता बनर्जी की जमीन हिला रहे हैं। तमाम टीएमसी नेताओं की धड़कनें बढ़ा रहे हैं। और कुछ नेता तो क्या कह रहे हैं टीएमसी के? टीएमसी के नेता कह रहे हैं कि बीजेपी हर बार इस तरीके का माहौल बनाती है और उसका माहौल उल्टा ही साबित होता है। इस बार जो बंगाल में 200 पार का यह लोग बातें कर रहे हैं। इस बार वो बातें हवा-हवाई ही साबित होंगी क्योंकि 4 मई को जो नतीजे आएंगे वो टीएमसी के पक्ष में आएंगे। हालांकि बीजेपी वाले जो हैं वो ये कह रहे हैं कि इस बार ममता बनर्जी के साथ खेला होगा। इस बार बंगाल परिवर्तन चाहता है और इस बार बंगाल में परिवर्तन होगा। देखिए इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ जब बंगाल में बिना किसी हिंसा के बिना किसी मौत के चुनाव संपन्न हुए। क्योंकि हर बार आप देखते थे चुनाव होते थे। जगह-जगह आगजनी की खबरें, हिंसा की खबरें, बूथ लूटने की खबरें सामने आती थी। कई लोगों की मौत तक की खबरें सामने आती थी। लेकिन इस बार जहां बवाल करने की कोशिश की वहां केंद्रीय बलों ने अच्छे से हिसाब किताब कर दिया और उसका नतीजा क्या हुआ? ऐतिहासिक जो मतदान प्रतिशत सामने आया वह रहा है। पिछले चुनाव में 92 से ऊपर रहा और इस बार 91 से ज्यादा मतदान प्रतिशत रहा है। अब&nbsp; एग्जिट पोल का भी जिक्र कर लेते हैं क्योंकि इस बार जो चुनाव के बाद बंगाल के एग्जिट पोल आ रहे हैं वो कहीं ना कहीं बीजेपी की आंधी में ममता बनर्जी को उड़ा रहे हैं। पोल ऑफ एग्जिट पोल्स की जिसमें टीएमसी को 147 सीटें दिखाई गई हैं। जबकि बीजेपी टक्कर देती यहां नजर आ रही है। 137 सीटें बीजेपी को दिखाई गई हैं। वहीं कांग्रेस की बात कर लें तो कांग्रेस सिर्फ दो पर सिमटती नजर आ रही है। चाणक्य का सर्वे भी ममता बनर्जी की धड़कनें बढ़ा रहा है। इस बार चाणक्य के सर्वे में टीएमसी को 130 से 140 सीटें दिखाई गई हैं। बीजेपी को 150 से 160 सीटें दिखाई गई हैं। अगर ये एग्जिट पोल सही साबित हो जाता है 4 तारीख का ये जो एग्जिट पोल है अगर यह 4 तारीख को नतीजों में बदल जाता है तो वाकई में इस बार बंगाल में परिवर्तन होगा कमल खिलेगा ममता की कुर्सी हिल सकती है। राजनीतिक जानकारों की मानें तो बंगाल में इस बार अगर कोई बड़ा उलटफेर हुआ तो उसके पीछे कोयला घोटाला भी एक बड़ी वजह होगा। दरअसल, यही वो घोटाला था जिसकी पहली एफआईआर तो दर्ज हुई कुछ चुनिंदा लोगों पर। लेकिन 6 साल बाद वो जांच पहुंची एक ऐसी कंपनी के दरवाजे तक जो पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी की चुनावी रणनीतिकार है। बात कर रहे हैं पॉलिटिकल कंसलटेंसी फर्म आईपैक की जिसके कर्ताधर्ता कभी खुद प्रशांत किशोर हुआ करते थे। जिसे चलाने वाला एक शख्स फिलहाल जेल में है और बाकी दो भी खुद को बचाने की जुगत में लगे हुए हैं&nbsp; जिन पर जांच एजेंसियों का शिकंजा लगातार कसता जा रहा है। राजनीतिक जानकारों की मानें तो अगर इस बार बंगाल में कोई बड़ा उलटफेर हुआ तो इसकी एक वजह यह कोयला घोटाला भी होगा जिसके चलते आईपैक चारों तरफ से घिरी हुई है। ममता बनर्जी के लिए आईपैक की क्या अहमियत है? इसका अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि जब आईपेक के दफ्तर पर ईडी का छापा पड़ा तो पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खुद आईपैक के दफ्तर पहुंच गई थी।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/after-60-years-a-major-announcement-from-this-country" target="_blank">60 साल बाद इस देश का बड़ा ऐलान, रातों-रात बदली भारत की किस्मत!</a></h3><h2>650 करोड़ के घोटाले को फिल्मी तरीके से दिया गया अंजाम</h2><div>27 नवंबर 2020 की&nbsp;<span style="font-size: 1rem;">तारीख थी और</span><span style="font-size: 1rem;">&nbsp;शाम के करीब 7:00 बज रहे थे। उस वक्त देश की जांच एजेंसी सीबीआई अपने कोलकाता ऑफिस में एक एफआईआर दर्ज कर रही थी। यह एफआईआर थी पश्चिम बंगाल की कोयला कंपनी से जुड़े एक खनन घोटाले को लेकर। शुरुआत में इस एफआईआर में उस कोयला कंपनी के एंप्लाइज, कुछ सुरक्षा अधिकारियों और सीआरपीएफ से लेकर रेलवे से जुड़े लोगों को आरोपी बनाया गया था। तब यह मामला एक नॉर्मल घोटाले जैसा लग रहा था। लेकिन यह मामला गंभीर तब हुआ जब इसमें इनफोर्समेंट डायरेट की भी एंट्री हो गई और उसके बाद जो खुलासा हुआ उसने दिल्ली से लेकर कोलकाता तक सबको चौंका दिया। क्योंकि सीबीआई और ईडी ने यह दावा किया कि यह घोटाला कोई 10 20 करोड़ का नहीं था। यह घोटाला था पूरे ₹650 करोड़ का। इस घोटाले को पूरे फिल्मी तरीके से अंजाम दिया गया था और उगाही का एक ऐसा खुफिया नेटवर्क बनाया गया था जिसमें 10 से ₹20 के नोटों का इस्तेमाल एक कोडेड मैसेज की तरह किया जाता था और अवैध रूप से खुदाई किए गए कोयले को ऐसी कंपनियों के नाम पर भेजा जाता था जिनका कोई रिकॉर्ड ही नहीं था| इस पूरे घोटाले में इकट्ठा किए गए पैसे को गुंडा टैक्स कहा गया जिसके पीछे मास्टरमाइंड था अनूप मांझी उर्फ लाला।&nbsp; जांच एजेंसियों ने इल्जाम लगाए कि इसी घोटाले के पैसे से इस पॉलिटिकल कंसलटेंसी फर्म को उसकी फीस अदा की गई और पैसा इसी एजेंसी के जरिए ब्लैक से व्हाइट किया गया।&nbsp;</span></div><h2>केंद्रीय जांच एजेंसियों के रडार पर ममता सरकार</h2><div>प्रशांत किशोर के अलग होने के बाद से 'आई-पैक' (I-PAC) की पूरी कमान प्रतीक जैन, ऋषिराज सिंह और विनेश चंदेल के हाथों में है। आईआईटी बॉम्बे के पूर्व छात्र और मल्टीनेशनल कंपनी 'डेलॉयट' में एनालिस्ट रहे प्रतीक जैन 2015 में आई-पैक के को-फाउंडर बने थे। पीके के जाने के बाद उन्होंने ही मीडिया की नजरों से दूर रहकर ममता बनर्जी की पार्टी व सरकार के प्रबंधन की पूरी जिम्मेदारी संभाली। इस बीच, ममता सरकार के तीसरे कार्यकाल में शिक्षक भर्ती, मवेशी तस्करी और कोयला घोटाले जैसे भ्रष्टाचार के कई बड़े मामले उजागर हुए, जिससे पूरी सरकार केंद्रीय जांच एजेंसियों के रडार पर आ गई। जांच की यह आंच आई-पैक तक भी पहुंच गई है, क्योंकि एजेंसियों को गहरा शक है कि तृणमूल कांग्रेस के चुनावी अभियानों का प्रबंधन करने के लिए आई-पैक को जो भारी-भरकम रकम दी गई थी, वह वास्तव में कोयला घोटाले से कमाया गया अवैध धन ही है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/now-waiting-for-the-results-after-voting-in-bengal-mamta-tough-test-bjp-hopeful-of-success" target="_blank">West Bengal Elections 2026: पश्चिम बंगाल में मतदान के बाद अब नतीजों का इंतजार, ममता बनर्जी की कड़ी परीक्षा, भाजपा को सफलता की उम्मीद</a></h3><h2>लाला पैड का फर्जी चालान सिस्टम</h2><div>इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, अनूप मांझी (उर्फ लाला) ने अवैध कोयला तस्करी का एक बड़ा नेटवर्क चलाने के लिए 'लाला पैड' नामक फर्जी चालान सिस्टम तैयार किया था। अवैध कोयले से भरे ट्रकों को चेक पोस्ट से सुरक्षित निकालने के लिए ₹10 या ₹20 के नोट का इस्तेमाल 'पासवर्ड' की तरह होता था। नोट का सीरियल नंबर और ट्रक की फोटो व्हाट्सएप के जरिए भ्रष्ट अधिकारियों तक पहुंचाई जाती थी, जिससे ट्रक बिना जांच के पास हो जाते थे। जांच एजेंसियों (ED) के मुताबिक, बंगाल की कुछ कंपनियों को अवैध कोयला बेचकर करीब ₹650 करोड़ की नकदी जुटाई गई। इस काले धन को हवाला ऑपरेटरों के जरिए सफेद धन (White Money) में बदला गया और फिर कथित तौर पर आई-पैक (I-PAC) के माध्यम से इसका इस्तेमाल चुनावी प्रबंधन में किया गया।</div><h2>ईडी की कार्रवाई</h2><div>इसी मामले की जांच और पैसों के लेन-देन (मनी ट्रेल) का पता लगाने के लिए ईडी (प्रवर्तन निदेशालय) ने 8 जनवरी 2026 को कोलकाता के साल्ट लेक स्थित आई-पैक के दफ्तर पर छापेमारी की थी। ममता बनर्जी का सीधा दखल नहीं हुआ। ममता बनर्जी के दखल के साथ ही यह मामला कानूनी के साथ-साथ राजनीतिक रंग भी लेने लगा। जिसने भाजपा और टीएमसी को आमने-सामने लाकर खड़ा कर दिया।</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 30 Apr 2026 14:11:58 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/will-mamata-banerjee-lose-the-election-because-of-this-alleged-scam</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Doval-MBZ की हुई मीटिंग, ठीक 2 दिन बाद UAE ने लिया ऑयल मार्केट को हिलाने वाला फैसला, भारत के लिए सस्ते तेल का रास्ता कैसे खुल रहा है?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/doval-mbz-meeting-took-place-just-two-days-later-uae-took-a-decision-that-shook-the-oil-market]]></guid>
      <description><![CDATA[<div><div>दुबई से खबर आई है जो पूरे ग्लोबल एनर्जी मार्केट को हिला सकती है। यूनाइटेड अरब अमीरात ने ऐलान किया है कि वो ओपक छोड़ रहा है और सिर्फ ओपक नहीं ओपक प्लस भी छोड़ रहा है। यह कोई मामूली खबर नहीं है। यूईई 1967 से यानी 1976 से ओपक का मेंबर है। यानी लगभग 60 साल से वह दुनिया का सातवां सबसे बड़ा तेल प्रोड्यूसर है। ओपक के अंदर सऊदी अरब इराक के बाद तीसरा सबसे बड़ा प्रोड्यूसर माना जाता है यूएई। माना क्या जाता है? है यह सबसे बड़ा प्रोड्यूसर तीसरा। ऐसा देश अगर इस ग्रुप को छोड़ रहा है तो यह एक ऐसी दरार है जो सालों तक भरी नहीं जा सकेगी। यूएई के इस फैसले के बाद इंटरनेशनल ऑयल ट्रेड का क्या होगा? वो एक अलग सवाल है। लेकिन इस फैसले के पीछे कहानी सिर्फ तेल की नहीं है। इसमें ईरान के साथ चल रही जंग है, अमेरिका का दबाव है और साथ ही सऊदी अरब और यूएई के बीच की पुरानी खटास का भी योगदान है। लेकिन इन सब के बीच एक दिलचस्प बात ये है कि दो दिन पहले एनएसए अजीत डोभाल यूएई के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायेद अल नहयान से मिलकर आए थे। इसके साथ&nbsp; काफी चर्चा हो रही है। क्योंकि चर्चा भारत की यूएई के साथ एनर्जी सिक्योरिटी पर हुई थी। तो डेफिनेटली अगर यूएई इतना बड़ा फैसला लेने वाला होगा तो इस पर भी चर्चा हुई होगी और भारत की तरफ से भी कुछ ना कुछ तो जरूर इस पर कहा गया होगा।&nbsp;</div><h2>अजीत डोभाल पहुंचे थे यूएई</h2><div>विशेषज्ञों का मानना है कि यूएई के इस फैसले का असर भारत पर अच्छा पड़ने वाला है। भारत के यूएई के बेहतरीन संबंध हैं। इस फैसले से पहले ही भारत ने बड़ी रणनीतिक पहल करते हुए अपने हाल ही में विदेश मंत्री एस जयशंकर और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल को यूएई के दौरे पर भेजा था। यूएई से बातचीत में रणनीतिक संबंधों को बढ़ाए जाने के साथ-साथ एनर्जी सिक्योरिटी पर भी सार्थक चर्चा हुई थी। यूएई के इंडस्ट्री और एडवांस्ड टेक्नोलॉजी मंत्री सुल्तान अहमद अल जबेर भी एक प्रतिनिधिमंडल के साथ इस साल की शुरुआत में दिल्ली के दौरे पर आए थे। उस वक्त उन्होंने यह ऐलान किया था-ग्लोबल एनर्जी की मांग के मामले में 'भारत अब निर्णायक मुखिया' है। भारत के एनएसए अजीत डोभाल ने हाल ही में अबुधाबी में थे। उन्होंने यूएई के एनर्जी मिनिस्टर और राष्ट्रपति से मुलाकात की थी। भारतीय विदेश मंत्रालय के अनुसार, डोभाल ने यूएई के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायेद अल नहयान से मुलाकात की थी। इस दौरान भारत और यूएई के बीच व्यापक रणनीतिक भागीदारी को और गहरा करने और क्षेत्रीय हालात व साझा हितों के मुद्दों पर भी चर्चा की गई। दोनों नेताओं ने व्यापक रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करने के उपायों, इलाके के हालात और आपसी लाभ के दूसरे मुद्दों पर चर्चा की थी।</div></div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/why-is-the-uae-leaving-opec-should-india-be-happy" target="_blank">UAE OPEC Exit Impact India: यूएई क्यों हो रहा OPEC से बाहर, क्‍या हमें खुश होना चाह‍िए?</a></h3><h2>ओपैक क्या है</h2><div>ऑर्गेनाइजेशन ऑफ द पेट्रोलियम एक्सपोर्टिंग कंट्रीज। हिंदी में कहें तो तेल निर्यात करने वाले देशों का संगठन या समूह। इसकी जो शुरुआत थी वो हुई थी 1960 में बगदाद में जब पांच देशों ने मिलकर इसे बनाया था। ईरान, इराक, कुवैत, सऊदी अरब और वेनेजुएला इसमें शामिल थे। इन देशों का मकसद एक था तेल की कीमतें कैसे तय हो, कितना तेल निकाला जाए, कितना प्रोड्यूस किया जाए, यह फैसला अमेरिका और यूरोप की बड़ी कंपनियों के हाथ से वापस लेकर खुद करना। यूएई 1967 यानी 1976 में इसमें शामिल हुआ। आज ओपेक में 12 देश हैं और दुनिया का करीब 38% तेल यही ग्रुप प्रोड्यूस करता है।&nbsp;</div><h2>ओपक प्लस क्या है?</h2><div>2016 के आसपास ओपेक ने रूस जैसे कुछ बड़े गैर ओपेक तेल उत्पादक देशों के साथ एक एक्सटेंडेड अलायंस बनाया था। इसी को कहा जाता है ओपेक प्लस। यह ग्रुप मिलकर तय करता है कि दुनिया में कितना तेल बेचा जाएगा ताकि कीमतें ना बहुत ज्यादा गिरे और ना बहुत ज्यादा चढ़े। यूएई ने अब इन देशों से नाता तोड़ने का फैसला कर लिया है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/uae-has-announced-its-withdrawal-from-the-oil-producing-groups-opec-and-opec" target="_blank">Iran-Israel War के बीच OPEC को UAE का बड़ा झटका, तेल संगठन से बाहर होने का ऐलान किया</a></h3><div><b>1. तेल कीमतों पर क्या असर?</b></div><div>ओपेक एक 'कार्टल' है जो सप्लाई घटाकर कीमतें ऊंची रखता है। ट्रम्प लंबे समय से ओपेक की आलोचना करते रहे हैं। उनका आरोप है कि यह संगठन तेल की कीमतों को जानबूझकर बढ़ाकर पूरी दुनिया को लूट रहा है। यूएई के बाहर आने से बाजार में सप्लाई बढ़ेगी, जिससे तेल की कीमतें $5 से $10 प्रति बैरल गिर सकती हैं।</div><div><b>2. भारत को कितना फायदा?</b></div><div>भारत सालाना करीब 140 अरब डॉलर का तेल खरीदता है। तेल की कीमत में $1 की कमी से भारत का आयात बिल करीब 10,000 करोड़ कम हो जाता है। यूएई के कदम से भारत सालाना 50,000 से 1 लाख करोड़ बचा सकता है। अगर यूएई ओपेक के कोटा सिस्टम से बाहर होकर तेल उत्पादन को बढ़ाता है, तो इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में कमी आ सकती है। इससे भारत में पेट्रोल और डीजल सस्ता हो सकता है।</div><div><b>3. तेल कंपनियों को क्या लाभ?</b></div><div>जब रिफाइनरियों को कच्चा तेल सस्ता मिलेगा, तो सरकार व तेल कंपनियों के पास कीमतों में कटौती करने की गुंजाइश बढ़ेगी।</div><div><b>4. क्या यूएई डिस्काउंट देगा?</b></div><div>ओपेक से बाहर होने के बाद यूएई मर्जी का मालिक है। वह भारत जैसे 'रणनीतिक साझेदार' को लुभाने के लिए खास डिस्काउंट या लचीली भुगतान शर्तें दे सकता है।</div><div><b>5. होर्मुज बाधित हो तो क्या ? </b></div><div>होर्मुज मार्ग बाधित हो, तो अबू धाबी क्रूड ऑयल पाइपलाइन' अबू धाबी के रेगिस्तान से होते हुए सीधे फुजैरा बंदरगाह तक जाती है। फुजैरा ओमान की खाड़ी के तट पर है। यहां से तेल के टैंकर निकलते ही सीधे अरब सागर में प्रवेश करते हैं। जहाज को होर्मुज पार करने की जरूरत नहीं। फुजैरा से भारत के पश्चिमी तट के बंदरगाहों की दूरी बहुत कम है, जिसे तय करने में टैंकरों को औसतन 3-4 दिन ही लगते हैं।</div><div><b>6. भारत का कोटा सुरक्षित है? </b></div><div>ओपेक में रहते हुए यूएई को अपना उत्पादन कम करना पड़ता था। अब यह बंदिश खत्म हो जाएगी।</div><div><b>7. सऊदी अरब और रूस पर हमारी निर्भरता का क्या होगा?</b></div><div>अभी भारत रूस और सऊदी पर बहुत ज्यादा निर्भर है। यूएई से सप्लाई बढ़ने पर भारत के पास विकल्प बढ़ जाएंगे और वह किसी एक देश के दबाव में नहीं रहेगा।</div><div><b>8. ऐसा पहले क्यों नहीं किया?&nbsp;</b></div><div>पहले तेल बाजार अस्थिर था। ओपेक के साथ रहने से 'सुरक्षा कवच' मिलता था कि कीमतें बहुत ज्यादा नहीं गिरेंगी। अकेले बाहर निकलने पर 'प्राइस वार' का खतरा था। तब यूएई और सऊदी के रिश्ते गहरे थे। सऊदी के नेतृत्व वाले संगठन को छोड़ना दुश्मनी मोल लेने जैसा था।</div><div><b>9. अब क्या बदल गया?&nbsp;</b></div><div>पिछले 2-3 सालों से ओपेक की बैठकों में यूएई और सऊदी में तीखी बहस हो रही थी। यूएई लगातार अपना कोटा बढ़ाने की मांग कर रहा था, जिसे सऊदी अरब खारिज कर देता था। यूएई को ये भी लगा कि जब उस पर हमले हुए या सप्लाई रूट (होर्मुज) में संकट आया, तो ओपेक और खाड़ी के अन्य देशों ने उसका वैसा साथ नहीं दिया जैसा देना चाहिए था। उसे लगा कि संगठन केवल तेल की राजनीति कर रहा है, सुरक्षा पर गंभीरता नहीं।</div><div><b>10.यूएई और सऊदी अरब में मतभेद</b></div><div>ओपेक पर सऊदी अरब का वर्चस्व है। सऊदी अरब ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए ओपेक देशों से उत्पादन कम करने की नीति को मंजूरी दिला दी। इसके अलावा दोनों देशों में यमन और सूडान में सैन्य टकराव और क्षेत्रीय नेतृत्व को लेकर होड़ है। जनवरी 2026 की शुरुआत में, सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन ने यमन के हद्रा मौत प्रांत में यूएई समर्थित सदन ट्रांजिशनल काउंसिल के ठिकानों पर हवाई हमले किए थे। तब सऊदी अरब ने यूएई पर यमन में अलगाववादी समूहों को हथियारों की आपूर्ति करने और अपने देश को अस्थिर करने का आरोप लगाया था।</div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 29 Apr 2026 13:31:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/doval-mbz-meeting-took-place-just-two-days-later-uae-took-a-decision-that-shook-the-oil-market</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
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      <title><![CDATA[नेता VS जज पहली बार ऐसी लड़ाई, आखिर कोर्ट में ऐसा क्या हुआ? केजरीवाल ने सत्यग्रह का ऐलान कर सबको चौंका दिया!]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/kejriwal-stunned-everyone-by-declaring-a-satyagraha-against-the-judge]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>क्या किसी केस में आरोपी यह कह सकता है कि जज बदलो वरना पेशी के लिए नहीं आऊंगा। जज से यह कह दे कि आप केस से हट जाइए वरना ना मैं पेश होऊंगा ना मेरी तरफ से कोई वकील आएगा। अब तक शायद आपने ऐसा कोई केस देखा सुना नहीं हो। लेकिन दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने साफ कह दिया है कि दिल्ली हाईकोर्ट की जज जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा अगर आबकारी नीति केस से नहीं हटी तो ना ही वह पेश होंगे और ना ही उनके वकील। सवाल है कि क्या हमारी न्याय व्यवस्था इस बात की इजाजत देती है कि कोई वादी हाई कोर्ट के जज के खिलाफ मोर्चा खोल दे। इस तरह पेश होने से ही मना कर दे। और क्या केजरीवाल के पहले किसी और ने ऐसा किया है या केजरीवाल ही कोई नज़र पेश करने जा रहे हैं। पूरे मामले को सिलसिलेवार ढंग से समझते हैं।&nbsp;</div><h2>दिल्ली की एक्साइज पॉलिसी&nbsp;</h2><div>&nbsp;एक्साइज का मतलब है शराब बेचने का सरकारी नियम। साल 2021 में दिल्ली की केजरीवाल सरकार एक नई एक्साइज पॉलिसी लेकर आई थी। बाद में इस पॉलिसी पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे। तत्कालीन उपराज्यपाल विनय कुमार सक्सेना ने सीबीआई जांच के आदेश दिए। सीबीआई मतलब केंद्रीय जांच ब्यूरो। साथ ही ईडी यानी प्रवर्तन निदेशालय ने भी मनी लॉन्ड्रिंग का अलग केस दर्ज किया। इसी मामले में मनीष सिसोदिया लगभग 500 दिन जेल में रहे। केजरीवाल खुद 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान गिरफ्तार हुए और 156 दिन जेल में बिताने के बाद सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिली। फिर आया 27 फरवरी 2026 का दिन। दिल्ली के राउस एवन्यू ट्रायल कोर्ट में एक बड़ा फैसला सुनाया। इस फैसले में अदालत ने केजरीवाल, मनीष सिसोदिया के कविता समेत कुल 23 आरोपियों को डिस्चार्ज कर दिया। डिस्चार्ज का मतलब इन पर मुकदमा चलाने लायक सबूत है ही नहीं। इसलिए केस यहीं खत्म। ट्रायल कोर्ट ने अपने आर्डर में सीबीआई की जांच पर सख्त टिप्पणी की और जांच अधिकारी के खिलाफ विभागीय कार्यवाही की सिफारिश तक कर दी। लेकिन कहानी यहां खत्म नहीं हुई। सीबीआई ने इस डिस्चार्ज ऑर्डर को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी। यह केस जिस जज की बेंच में आया वही हैं जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा। 9 मार्च 2026 को इस मामले की पहली सुनवाई हुई। केजरीवाल और बाकी आरोपियों का कहना है कि इस सुनवाई में सिर्फ सीबीआई मौजूद थी। उनके वकीलों को बुलाया ही नहीं गया और उसी सुनवाई में जस्टिस शर्मा ने प्रथम दृष्ट्या यह पाया कि ट्रायल कोर्ट का आर्डर गलत है। साथ ही जांच अधिकारी के खिलाफ विभागीय कार्यवाही पर रोक लगा दी। ईडी की कारवाई भी टालने को कहा। केजरीवाल का तर्क यह है कि जिस ऑर्डर को बनाने में ट्रायल कोर्ट ने हजारों पन्नों के दस्तावेज पढ़े उसे केवल 5 मिनट की एक तरफा सुनवाई में गलत कैसे कहा जा सकता है? इसके बाद केजरीवाल और पांच और आरोपियों मनीष सिसोदिया, विजय नायर, राजेश जोशी, अरुण रामचंद्रन, पिल्लई और दुर्गेश पाठक ने एक अर्जी दाखिल की। मांग थी कि जस्टिस शर्मा खुद को इस केस से अलग कर लें। इसे कानूनी भाषा में रिकुज़ल कहते हैं। केजरीवाल पक्ष ने तीन मुख्य तर्क रखे। पहला जज के बच्चे केंद्र सरकार के पैनल वकील हैं और इसी केस में सरकार की तरफ से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता पेश हो रहे हैं। दूसरा जस्टिस शर्मा 2022 से 2025 के बीच चार बार अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद के कार्यक्रम में शामिल हुए हैं। यह संगठन आरएसएस से जुड़ा हुआ माना जाता है। तीसरा 9 मार्च के ऑर्डर की भाषा में लगता है कि अदालत ने पहले ही मन बना लिया है। 20 अप्रैल 2026 को जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा का फैसला आया। 115 पेज का यह ऑर्डर रिकुज़ल की मांग को खारिज करता है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/bengal-politics-heats-up-arvind-kejriwal-attacks-bjp" target="_blank">Bengal Politics में उबाल, Arvind Kejriwal का BJP पर हमला- 90 लाख वोट कटने का बदला लेगी जनता</a></h3><h2>केजरीवाल ने अपने लेटर में क्या लिखा</h2><div>दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने 27 अप्रैल को दिल्ली हाईकोर्ट की जज जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा के सामने पेश होने से ही मना कर दिया। जस्टिस स्वर्णकांता को चिट्ठी लिख के कह दिया कि अगर केस की सुनवाई आप करेंगी यानी वह करेंगी तो ना तो केजरीवाल खुद आएंगे ना ही उनकी ओर से कोई वकील आएगा। यह वही एक्साइज पॉलिसी वाला केस है जिसमें 27 फरवरी को अरविंद केजरीवाल को ट्रायल कोर्ट ने बरी कर दिया था। सीबीआई ने हाई कोर्ट में अपील की। मामला जस्टिस स्वर्णकांता की बेंच में पहुंचा। अब केजरीवाल कह रहे हैं कि जस्टिस स्वर्णकांता मामले की सुनवाई करेंगी तो वह कोर्ट नहीं जाएंगे, पेश भी नहीं होंगे। चार पेज के लेटर में केजरीवाल ने 25 पॉइंट्स लिखे हैं। कहा कि वह महात्मा गांधी के सत्याग्रह सिद्धांत का पालन कर रहे हैं। लेटर के दो खास पॉइंट्स आपको बताते हैं जो केजरीवाल के जस्टिस स्वर्णकांता पर आरोप हैं। चिट्ठी का पॉइंट नंबर छह केजरीवाल कहते हैं कि जब मैंने पहले भी केस में जज बदलने की मांग की थी तब भी यह चिंताएं बताई थी। पहला जस्टिस स्वर्णकांता आरएसएस के लीगल संगठन अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद से सार्वजनिक रूप से जुड़ी रही हैं। आरएसएस मौजूदा सरकार की विचारधारा से जुड़ा माना जाता है। राजनीतिक रूप से हम केंद्र की सरकार के विरोधी हैं और विचारधारा के स्तर पर मैं और मेरी पार्टी आरएसएस की सोच से सहमत नहीं है। ऐसे में जब जज साहिबा उनके कार्यक्रमों में बार-बार जाती रही हैं तो मुझे कैसे भरोसा हो कि इस अदालत से मुझे न्याय मिलेगा। पॉइंट नंबर सेवन में केजरीवाल जस्टिस स्वर्णकांता के बच्चों का मुद्दा उठाते हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/will-the-aam-aadmi-party-face-questions" target="_blank">सवालों का सामना करेगी आम आदमी पार्टी?</a></h3><h2>न्याय दिखना चाहिए</h2><div>केजरीवाल ने कहा कि मैं जस्टिस शर्मा का सम्मान करता हूं लेकिन न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि होते हुए दिखना भी चाहिए। ऐसी दुविधा के मौके पर बापू ने हमे सत्याग्रह का रास्ता दिखाया है। केजरीवाल ने कहा कि अगर भविष्य में भी कभी जज स्वर्णकाता के सामने मेरा कोई दूसरा केस आता है जिसमे मेरे विरोध में बीजेपी, केंद्र सरकार या तुषार मेहता नहीं है तो मै उनके समक्ष जरूर पेश होऊगा। आप नेताओ ने केजरीवाल के इस कदम को साहसी कदम बताया। सासद संजय सिंह ने कहा कि आरएसएस के कार्यक्रम में जज स्वर्णकाता शर्मा का कहना कि जब यहां आती हूं, मेरा प्रमोशन हो जाता है, तो उनसे न्याय की उम्मीद क्या की जाए? आप दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष सौरभ भारद्वाज ने कहा कि अरविंद केजरीवाल का यह बेहद साहसी फैसला है, जो व्यवस्था को मजबूत करने में सहायक होगा। आप के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल के दिल्ली शराब नीति मामले में अदालत की कार्यवाही का बहिष्कार करने के अभूतपूर्व फैसले के बाद, देश की न्यायिक प्रणाली की पवित्रता विवादों के घेरे में आ गई है। हाल के एक फैसले को चुनौती देने के लिए सामान्य कानूनी रास्तों का पालन करने के बजाय, केजरीवाल ने जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा को एक निजी पत्र लिखा है, जिसमें उन्होंने स्पष्ट रूप से व्यक्तिगत रूप से या अपने कानूनी वकील के माध्यम से पेश होने से इनकार कर दिया है।&nbsp;</div><h2>हिट एंड रन स्टाइल वाली राजनीति फिर से शुरू</h2><div>अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के खिलाफ मोर्चा खोला। खोला था। आपको याद होगा उनकी सिर्फ सरकार ही नहीं गई। केजरीवाल ने उन्हें नई दिल्ली सीट से हराया भी। नितिन गडकरी पर केजरीवाल ने भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगा दिए थे। दिल्ली में बीजेपी के अध्यक्ष थे सतीश उपाध्याय। उनके खिलाफ केजरीवाल ने भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे। इसे एक तरह से केजरीवाल स्टाइल ऑफ पॉलिटिक्स कहा जाने लगा था जिसमें अंधाधुंध आरोपों की फायरिंग होती थी कि बड़े लोगों से लोहा लो। लेकिन बीते कुछ समय से केजरीवाल इस स्टाइल से थोड़ा परहेज करते नजर आ रहे थे या इसका टैक्टिकल उपयोग करते नजर आ रहे थे। लेकिन लोग कह रहे हैं कि जस्टिस स्वर्णकांता पर सीधे सवाल उठाकर केजरीवाल ने अपने पुराने दिन याद दिला दिए हैं जब वो दिल्ली चुनावों से पहले प्रचार करते हुए कुछ पर्चे दिखाया करते थे।&nbsp;</div><h2>क्या संविधान के खिलाफ सत्याग्रह?</h2><div>इसका राजनीतिक प्रभाव भी उतना ही गहरा है। एकानूनी दिग्गज केजरीवाल की इस रणनीति को एक खतरनाक मिसाल बता रहे हैं।&nbsp; केजरीवाल पर अपनी पसंद का जज चुनने का प्रयास करने का आरोप लगाया। भले ही कोई वादी मुकदमा जीतता हो या हारता हो, किसी भी निराशाजनक आदेश के लिए एकमात्र वैध उपाय उच्च अदालत में औपचारिक चुनौती देना ही है। अदालत शक्तिहीन नहीं है, वह जमानती वारंट के माध्यम से मौजूदगी अनिवार्य कर सकती है, या बहिष्कार के बावजूद मामले की सुनवाई जारी रखने के लिए 'एमिकस क्यूरी' नियुक्त कर सकती है। यह विवाद केजरीवाल द्वारा मौजूदा बेंच पर व्यक्त किए गए अविश्वास से उपजा है। हालांकि, बार काउंसिल के नियम आम तौर पर यह अनिवार्य करते हैं कि वकील उन अदालतों में पेश न हों जहां जज के साथ उनके व्यक्तिगत संबंध हों।&nbsp;</div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 28 Apr 2026 13:18:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/kejriwal-stunned-everyone-by-declaring-a-satyagraha-against-the-judge</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[वो 'गुप्त' शक्ति जिसके आगे नतमस्तक मोदी-शाह, जिसने बंगाल में तैयार की बीजेपी की जीत की ज़मीन?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/secret-force-before-which-modi-and-shah-bow-down-bjp-victory-in-bengal]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>साल 2010 की बात है&nbsp; बंगाल में सीपीएम के शासन का अंतिम दौर चल रहा था और बिमान बोस उस वक्त बहुत बड़े कम्युनिस्ट नेता थे। उनसे एक बार बंगाल में आरएसएस के बारे में पूछा गया। उन्होंने तब कहा कि कोलकाता की इस सड़क को देख लो। इस सड़क पे आरएसएस का एक झंडा नहीं लगेगा। तुम पूरे बंगाल की बात कर रहे हो। 2006 से पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सिर्फ 500 शाखाएं चलती थी। 2011 में 830 हुई जब ममता बनर्जी आई लेकिन अचानक ममता बनर्जी के आते ही आरएसएसएस की शाखाओं में अप्रत्याशित वृद्धि हुई 2024 तक 4540 यानी 500 शाखा से 4540 तक पहुंची है 2024 तक और 2026 के अंत आते-आते 8000 से अधिक शाखाएं। तो जरा सोचिए कि पिछले चंद सालों में बंगाल में किस गति से बढ़ी है आरएसएस और नंबर जो बढ़े हैं शाखाओं की संख्या जो बढ़ी है वो किस गति से बढ़ी है। यही वो साइलेंट फोर्स है जो लोगों को एक से दो से चार लोगों को जोड़ते जोड़ते बंगाल में बीजेपी के पूरे संगठन को खड़ा किया है। नरेंद्र मोदी का भाषण है जिसमें उन्होंने कहा था कि नेता वो असली नेता है ही नहीं जो सुबह की चाय अपने घर में पिए। नेता वो है जो सुबह की चाय किसी दूसरे के घर में पिए। यानी आप हर दिन कहीं ना कहीं किसी घर में बैठे रहते हो। उस घर के परिवार से आपका वास्ता होता है। पहली बार भगाएगा। दूसरी बार बात करेगा। तीसरी बार कुर्सी देगा और तब करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान रसियारी आवत जात के सिल पर पड़त निशान यह होता है संगठन का काम दुनिया में सबसे मुश्किल लोगों को संगठित करना है जिसने यह कर लिया वही अंत में किला फतह करेगा संघ शक्ति कलयुगे यही है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/kuwait-and-israel-open-airspace-flights-to-resume-soon" target="_blank">West Asia से भारतीयों के लिए बड़ी राहत, Kuwait और Israel ने खोला Airspace, जल्द शुरू होंगी उड़ानें</a></h3><h2>पश्चिम बंगाल से RSS का ऐतिहासिक जुड़ाव</h2><div>पश्चिम बंगाल से संघ का पुराना नाता रहा है। यहां 1937 से ही संघ की गतिविधियों का संचालन हो रहा है। राज्य में संघ के पूर्व क्षेत्र के प्रचार प्रमुख जिश्नु बसु के अनुसार, द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान कुछ समय के लिए संघ की गतिविधियां रोकी गईं थीं और उसके बाद दोबारा शुरू कर दी गईं थीं। संघ के दिग्गज नेताओं गुरु गोलवलकर, मोरोपंत पिंगले, विट्ठल राव पतकी, दत्तोपंत ठेंगडे, एकनाथ रानाडे, बाला साहेब देवरस के साथ ही वर्तमान संघ प्रमुख मोहन भागवत का भी पश्चिम बंगाल एक प्रमुख केंद्र रहा है। पश्चिम बंगाल में संघ वैसे तो लगातार अपनी गतिविधियां मजबूत करता आया है। हालांकि पिछले कुछ वर्षों में इसकी गतिविधियों में अभूतपूर्व विस्तार हुआ है।</div><h2>बंगाल में ऐसा कोई ज़िला नहीं है जहाँ RSS के कार्यकर्ता सक्रिय न हों</h2><div>आकलन के अनुसार, पश्चिम बंगाल में ऐसा कोई ज़िला नहीं है जहाँ RSS के कार्यकर्ता सक्रिय न हों, और स्थानीय स्तर पर लोगों तक पहुँच बनाना ही इस प्रयास की रीढ़ है। आंतरिक तौर पर, यह विश्वास है कि भारतीय जनता पार्टी 2021 में जीती गई 77 सीटों की संख्या में सुधार करेगी; मौजूदा अभियान को राज्य में अब तक किया गया सबसे व्यापक संगठनात्मक प्रयास बताया जा रहा है। संघ के भीतर भी ध्यान अगले बड़े चुनावी पड़ाव, यानी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों पर केंद्रित है। ये चुनाव 2027 की शुरुआत में होने हैं, क्योंकि मौजूदा विधानसभा का कार्यकाल मार्च 2027 में समाप्त हो रहा है। इस समय-सीमा को राज्य की चुनावी राजनीति से कहीं ज़्यादा महत्वपूर्ण माना जा रहा है।&nbsp; केंद्र और संगठन के बीच के समीकरण की बात करें तो, संगठनात्मक सूत्रों ने दोनों के बीच उच्च स्तर के तालमेल का ज़िक्र किया है। उनके अनुसार, दोनों के बीच ऐसा कोई टकराव नहीं है जिसका असर शासन-प्रशासन या राजनीतिक दिशा पर पड़ सकता हो। यह तालमेल इस बात से भी ज़ाहिर होता है कि संघ के तंत्र के भीतर सरकार के कामकाज को किस तरह से प्रस्तुत किया जा रहा है। संघ के पदाधिकारियों ने मई 2014 में नरेंद्र मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद से लगातार जारी रक्षा तैयारियों की ओर इशारा किया। उन्होंने कहा कि 'ऑपरेशन सिंदूर' की सफलता, और साथ ही पाकिस्तान स्थित आतंकी ठिकानों पर पहले की गई सीमा-पार की जवाबी कार्रवाइयाँ। ये सभी पिछले एक दशक में हमारी सैन्य क्षमताओं को मज़बूत किए जाने के ही परिणाम हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/will-passengers-luggage-be-charged-at-the-india-nepal-border-ministry-clarified-the-situation" target="_blank">India-Nepal Border | भारत-नेपाल सीमा पर यात्रियों के सामान पर लगेगा शुल्क? विदेश मंत्रालय ने स्थिति की स्पष्ट</a></h3><h2>हर तीसरे महीने में संघ प्रमुख का एक दौरा</h2><div>2021 में विधानसभा चुनाव हुए। ममता बनर्जी को प्रचंड बहुमत मिली। भारतीय जनता पार्टी की सीटें चार से बढ़कर 77 हो गई। जब अचानक इतनी सीटें बढ़ी तो हर किसी का ध्यान ध्यान गया। देश की मीडिया कह रही थी कि बीजेपी बुरी तरह हारी थी। लेकिन भारतीय जनता पार्टी और संघ के लोग कह रहे थे कि हम 4 से 77 पहुंचे हैं। यह अचानक नहीं हुआ। उसके बाद 21 के विधानसभा चुनाव के बाद ठीक 1 साल बाद मोहन भागवत कोलकाता आते हैं और बंगाल का दौरा उनका शुरू होता है और इस चुनाव की घोषणा के एक डेढ़ महीने पहले तक उनके 13 दौरे हो चुके हैं। 13 दौरे हर तीसरे महीने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख लगभग कोलकाता में मौजूद होते थे। मतलब बंगाल के किसी भी हिस्से में मौजूद होते थे। कोलकाता नहीं। और फिर शुरू हुआ संगठन का काम। यह पिछले 4 साल की जो मेहनत है गांव-गांव में, गलियों में वह आज दिख रहा है। 2021 में करीब 1000 ऐसी बूथें थी, बूथ थे जहां पर बीजेपी को पोलिंग एजेंट नहीं मिला था। इस बार चुनाव की घोषणा के 3 महीने पहले तक हर बूथ पर कम से कम दो बैठकें हो चुकी थी।&nbsp;</div><h2>संघ के नजरिए से बंगाल को एक मॉडल स्टेट बनाने की मुहिम</h2><div>राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने राजनीति से नहीं अपने सामाजिक कार्यों से पहचान बनाई है। लोगों में गुडविल पैदा किया है। कुछ जो मुद्दे इन्होंने बताया है कि हर बूथ पे बूथ लेवल पर स्वयंसेवक का डिप्लॉयमेंट जरूर होना चाहिए। हिंदू के वोट हैं वह ऐसे कंसोलिडेट नहीं करेंगे नारे लगाने से नहीं करेंगे। एक भाव जगाना होगा तो उस दिशा में मेहनत किया गया। 4 साल तक 26 तक जब चुनाव की ये घोषणा हुई थी उससे पहले तक बंगाल को एक मॉडल स्टेट संघ के नजरिए से बनाने की कोशिश की गई जिसमें श्याम प्रसाद मुखर्जी का बार-बार जिक्र हो जिसमें विवेकानंद का जिक्र हो, रामकृष्ण परमहंस का जिक्र हो, वहां से चुने गए महापुरुष और उसके उसके बारे में नैरेटिव पूरे देश में बनाया गया कि यह हैं असली महापुरुष। हर समाज के प्रबुद्ध लोगों से संपर्क कर उन्हें जोड़ा गया सामाजिक कार्य में क्योंकि शायद उनमें से बहुत सारे सीधे राजनीति में आने से परहेज करते हैं। यह बारीक काम हुआ है। आज चर्चा भले ही भीड़ की हो रही हो, रैलियों की हो रही हो, लेकिन एक खामोश शक्ति है जो लगभग हर तीसरे घर में घुसकर हर तीसरा हिंदू के घर में घुसकर वो प्रेरित कर रही है कि बंगाल बदलाव मांगता है। बंगाल आमार सुनार बंगला बनना चाहिए। बंगाल की यश कृति जो पहले थी वह दोबारा वापस आनी चाहिए। पलायन रुकना चाहिए।</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 27 Apr 2026 17:05:12 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/secret-force-before-which-modi-and-shah-bow-down-bjp-victory-in-bengal</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[किस देवता के नाम पर बना है हॉर्मुज? हवा के 'जिन्न' से बचने के लिए महिलाएं मूंछों जैसा पहनती नकाब]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/after-which-hindu-deity-is-hormuz-named]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>स्टेट ऑफ होर्मुज वो समुद्री इलाका जिसकी वजह से दुनिया आज तीसरे विश्व युद्ध के मुहाने पर खड़ी है। सबसे पहले बात करते हैं स्टेट ऑफ हॉर्मोस की चौहद्दी की। यह दुनिया के सबसे अहम समुद्री रास्तों में से एक है। जहां से वैश्विक तेल सप्लाई का बड़ा हिस्सा गुजरता है। यह स्टेट ईरान और ओमान के बीच मौजूद है। आज के समय में इसकी अहमियत इतनी ज्यादा है कि इसे दुनिया की ऑयल लाइफ लाइन कहा जाता है। अब बात करते हैं प्राचीन काल की। प्राचीन काल में होर्मुज फारस की खाड़ी तक पहुंच को कंट्रोल करने वाला एक अहम समुद्री व्यापार केंद्र था। यह भारत, चीन और मिडिल ईस्ट के बीच माल के आदानप्रदान के बीच एक संपर्क सूत्र का काम करता था। मूल रूप से यह 10वीं शताब्दी में मीनाब के पास मौजूद एक मुख्य भूमि बंदरगाह था। लेकिन आक्रमणकारियों से बचने के लिए लगभग 1300 में इसे रणनीतिक जारून द्वीप यानी होर्मुज&nbsp;द्वीप में बदल दिया गया और यह एक मशहूर व्यापारिक केंद्र बन गया।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/did-trump-sever-one-of-mojtaba-khamenei-legs" target="_blank">Trump ने काट दी मोजतबा खामनेई की एक टांग? न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट में चौंकाने वाला खुलासा</a></h3><h2>होर्मुज नाम की उत्पत्ति कैसे हुई</h2><div>माना जाता है कि होर्मुज नाम की उत्पत्ति फारसी देवता अहूरा माजदा और स्थानीय बोली के व्याख्यांश खुरमोग यानी खजूर वाली जमीन से लिया गया है जो इसकी फारसी जड़ों को दर्शाता है। अहूरा मजदा पारसी धर्म के सर्वोच्च देवता, सृष्टिकर्ता और ज्ञान के प्रतीक हैं। जिन्हें बुद्धिमान देवता कहा जाता है। ऐतिहासिक रूप से अहूरा मजदा को वैदिक देवता वरुण से जोड़ा जाता है। जो ब्रह्मांडीय नियम का पालन करता है। अवस्था भाषा में अहूरा का अर्थ होता है स्वामी। जो संस्कृत के शब्द असुर के समान है। अब आते हैं मध्यकाल में। फारस की खाड़ी किंगडम ऑफ होर्मुज नाम का एक शक्तिशाली व्यापारिक राज्य हुआ करता था। यह राज्य 13वीं से 17वीं सदी के बीच बेहद समृद्ध था और एशिया, अफ्रीका और यूरोप के बीच व्यापार का एक बड़ा केंद्र बन चुका था। यहीं से शुरू होता है भारत और होर्मुज का कनेक्शन। उस समय भारत के पश्चिमी तट खासकर गुजरात, कोंकण और मालाबार क्षेत्र दुनिया के बड़े व्यापारिक केंद्र थे। भारतीय व्यापारी मसाले, रेशम, कपड़े और कीमती पत्थर लेकर हॉर्मू जाते थे। बदले में वहां से घोड़े, मोती और दूसरे कीमती सामान भारत लाया करते थे।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/who-is-setting-fire-to-oil-refineries-across-six-countries-including-india" target="_blank">भारत समेत 6 देशों के तेल रिफाइनरी में कौन लगा रहा है आग...साजिश किसकी?</a></h3><h2>शैतानी हवाएं और महिलाओँ का नकाब</h2><div>होर्मुज में रहने वाले लोगों की जिंदगी और उनके जीने का अनूठा अंदाज कौतूहल पैदा करता है। खनिजों से भरपूर यहां की रेत लाल, गुलाबी, नारंगी जैसे चमकते हैं। जमीन जितनी विविधरंगी और मनमोहक है, उतने ही आकर्षक लोग, संस्कृति और पारंपरिक विश्वास-आस्था है। ईरानी फोटोग्राफर होदा अफशार ने यहां की संस्कृति और आस्था-मान्यताओं को बखूबी बताया है। कुछ को अंधविश्वास मान सकते हैं, लेकिन यही उनका जीवन है। यह हवा की बुरी आत्माओं से बचने का जतन है। दरअसल, मान्यता है कि कुछ हवाएं शैतानी या जिन्न वाली होती हैं, जबकि कुछ भली। 'जार' नाम की हवा के बारे में कहा जाता है कि वह शरीर में घुस सकती है। बेचैनी या बीमारी दे सकती है। ये नकाब 'जार' को धोखा देने के लिए पहना जाता है। मकसद यह कि महिला, पुरुष जैसी दिखे। मान्यता के मुताबिक महिलाएं 'जार' के प्रति ज्यादा असुरक्षित होती हैं।</div><h2>कुछ लोग पेड़ों पर ही रहते हैं</h2><div>केश्म और होर्मुज के कुछ लोग पेड़ों पर ही रहते हैं, क्योंकि ऐसी मान्यता है कि कुछ तरह के पेड़ों के नीचे सोने से शैतानी आत्मा पकड़ लेगी। यानी हवा की शक्ति व्यक्ति पर हावी हो सकती है। अफशार ने अपनी किताब 'स्पीक द विंड' में केश्म और होमुंज की अनूठी मान्यताओं और आस्थाओं के बारे में बताया है। अफशार बताती हैं कि कई निवासी अफ्रीकी मूल के हैं। पर यह पहचान अक्सर छिपाई जाती है या नकारी जाती है। वजह-लंबे समय की सामाजिक श्रेणियां हैं। जर्मनी के बर्लिन में रह रहीं अफशार बताती हैं कि अब टुकड़ों में वहां की खबरें मिलती हैं। भारी सैन्य मौजूदगी। बमबारी। वह बताती हैं कि एक रिश्तेदार ने बमों के असर को ऐसे बयान किया, 'यह भूकंप की तरह शरीर के आर-पार गुजरने जैसा लगता है। बमों-बारूदों से बचने की दुआएं करते हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/ship-bound-for-india-seized-action-against-iran-intensifies" target="_blank">भारत आने वाले जहाज पर कब्जा, ईरान पर एक्शन तेज!</a></h3><h2>पुर्तगाल ने होर्मुज पर किया कब्जा</h2><div>भारत और होर्मुज के बीच गहरा व्यापारिक रिश्ता था। लेकिन यह रिश्ता केवल व्यापार तक ही सीमित था। शासन या राजनीतिक नियंत्रण तक नहीं। फिर आया 16वीं सदी का कालखंड जब पुर्तगाल ने होर्मुज पर कब्जा कर लिया। तब भारत में उसका मुख्य केंद्र गोवा हुआ करता था। क्योंकि गोवा भी पुर्तगाल के नियंत्रण में था और हॉर्मूस भी। उस समय हॉर्मूस पर गोवा में मौजूद पोर्तुगीज़ इंडिया रूल कर रहा था। इतिहास के इसी चैप्टर की वजह से हॉर्मूस को भारत का हिस्सा होने का दावा किया गया। लेकिन हकीकत तो यह है कि दोनों ही क्षेत्र एक विदेशी शक्ति पुर्तगाल के अधीन थे। डायरेक्ट भारत के नहीं। बाद में ईरानी सल्तनत सफविद अंपायर ने पुर्तगालियों को हराकर होर्मुज पर कंट्रोल कर लिया। शाह अब्बास प्रथम की अगुवाई में और अंग्रेज ईस्ट इंडिया कंपनी की सहायता से सफाविद साम्राज्य ने पुर्तगालियों से हॉर्मोस पर अपनी फतेह हासिल कर ली। अप्रैल 1622 को फारस की खाड़ी में एक सदी से ज्यादा समय तक चले पुर्तगाली नियंत्रण को समाप्त कर दिया गया और अंतिम समर्पण भी पूरी कर दी गई। इसके बाद यह क्षेत्र फारस यानी आज के ईरान के प्रभाव में आ गया। तो साथियों साफ है कि इतिहास में होर्मुज पर कई ताकतों का प्रभाव रहा लेकिन भारत का सीधा शासन कभी नहीं रहा। हां यह जरूर है कि इस धरती से होर्मुज पर रूल जरूर किया गया।&nbsp;</div><div>पिछले 100 सालों से ज्यादा समय से यह एक स्वतंत्र व्यापारिक जलमार्ग के तौर पर मौजूद है। इस समय जब अमेरिका और इजराइल की ईरान के साथ सीधी जंग चल रही है तो ऐसे में स्टेट ऑफ हॉर्मोस की अहमियत और भी ज्यादा बढ़ जाती है। ईरान इस पर अपना एकाधिकार करना चाहता है। वहीं अमेरिका की ओर से भी नाकेबंदी की बात कही जा रही है। यह सिर्फ एक जलमार्ग नहीं बल्कि वैश्विक राजनीति, अर्थव्यवस्था और ऊर्जा सुरक्षा का केंद्र बन चुका है। भारत भी अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए इस रास्ते पर काफी ज्यादा निर्भर है। इसलिए इसकी अस्थिरता भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। साथियों यह था स्टेट ऑफ हार्मोस का इतिहास। बाकी इसका भविष्य इसका मुस्तकबिल ही तय करेगा।</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 24 Apr 2026 14:23:43 +0530</pubDate>
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      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[कोल्ड ड्रिंक से केला तक No Entry, भारत से सामान लाने से अब नेपाल की बालेन शाह सरकार को क्या परेशानी?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/what-trouble-does-bringing-goods-from-india-now-pose-for-nepal-balen-shah-government]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>एक मां अपने बच्चों के लिए चिप्स का एक पैकेट लेकर बॉर्डर क्रॉस कर रही है। भारत से नेपाल जा रही है और बॉर्डर पर खड़े आर्म्ड पुलिस फोर्स के जवान उसे रोक लेते हैं। कहते हैं यह पैकेट ₹100 से ऊपर का है। कस्टम ड्यूटी लगेगी। वो महिला पूछती है बच्चों के लिए चिप्स का पैकेट भी अब स्मगलिंग है। यह सीन किसी फिल्म का नहीं है। यह एक रियल वीडियो है जो नेपाल के नेपालगंज बॉर्डर से आया है और पूरे सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है और इस एक वीडियो ने एक ऐसे रूल पर स्पॉट लाइट डाल दी है जिसने नेपाल के बॉर्डर एरियाज में रहने वाले लाखों लोगों की जिंदगी मुश्किल कर दी है। तो आज इस पूरे मामले का एमआरआई स्कैन करते हैं। नेपाल और भारत के बीच रोटी और बेटी का संबंध है। दोनों मुल्क के नेताओं को अगर भारत-नेपाल संबंध पर दो शब्द बोलना पड़े तो, भाषण ही इसी मुहावरे से शुरु होता है। लेकिन रोटी-बेटी के इस मुहावरे पर धीरे-धीरे ग्रहण लगता जा रहा है और भारत-नेपाल दोस्ती में दरार पड़ती नजर आ रही है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/nepal-home-minister-sudan-gurung-resigns" target="_blank">Nepal के Home Minister Sudan Gurung का इस्तीफा, बोले- मेरे लिए पद से बड़ी है नैतिकता</a></h3><h2>भारत से 100&nbsp; रुपए से ज्यादा के सामान पर कस्टम ड्यूटी</h2><div>नेपाल गवर्नमेंट ने एक डायरेक्टिव जारी किया है जिसके तहत अगर कोई नेपाली नागरिक भारत से 100 नेपाली रुपए से ज्यादा का सामान लेकर नेपाल में एंटर करता है तो उसे कस्टम ड्यूटी देनी होगी। अब 100 नेपाली रुपए का मतलब समझिए। इंडियन करेंसी में यह करीब 62 से ₹63 बनते हैं। मतलब आप इंडिया से ₹63 का सामान भी लेकर गए तो आपको बॉर्डर पर रुक कर ड्यूटी भरनी पड़ेगी। अब यह रूल नया नहीं है। नेपाल के कस्टम एक्ट में यह प्रोविजन पहले से था। लेकिन सालों से इसे कोई सीरियसली इंप्लीमेंट नहीं करता था। बॉर्डर एरियाज में लोग इंडिया से छोटा-मोटा सामान लाते थे। दवाइयां, कपड़े, राशन, सब्जी और कोई उन्हें नहीं रोकता था। लेकिन अब नेपाल की नई गवर्नमेंट ने इसे स्ट्रिक्टली इनफोर्स करने का फैसला किया है और इनफोर्समेंट भी ऐसा कि बॉर्डर पर माहौल ही बदल गया है। नेपाल की आर्म्ड पुलिस फोर्स यानी कि एपीएफ के जवान अब बॉर्डर पॉइंट्स पर लाउडस्कर लगाकर अनाउंसमेंट कर रहे हैं। यह ₹100 से ऊपर का कोई भी सामान डिक्लेअ करना होगा। झापा से लेकर कंचनपुर तक, पूर्व से पश्चिम तक हर कस्टम पॉइंट पर क्रैकडाउन चल रहा है। लोगों के बैग खोले जा रहे हैं। साइकिल पर आने वाले लोगों का सामान चेक हो रहा है। लंबी-लंबी लाइनें लग रही हैं। कस्टम डिपार्टमेंट, रेवेन्यू इन्वेस्टिगेशन डिपार्टमेंट, डिस्ट्रिक्ट एडमिनिस्ट्रेशन, नेपाल पुलिस और एपीएफ की जॉइंट मॉनिटरी टीमें बनाई गई हैं।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/nepal-turns-against-its-own-pm-over-india" target="_blank">भारत के लिए अपने PM पर टूट पड़ा नेपाल! बालेन शाह के खिलाफ लोगों का गुस्सा बढ़ता ही जा रहा</a></h3><h2>झोले और थैलियां चेक कर रहे कस्टम अधिकारी</h2><div>नेपाल के कस्टम अधिकारी और बॉर्डर पर तैनात पुलिसकर्मी इस पार से उस पार जाने वाले लोगों के झोले और थैलियां चेक कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर इन तस्वीरों के साथ अब यह चर्चा हो रही है और कहा जा रहा है कि केला से कोल्ड ड्रिंक तक अपना भारत से नेपाल ले जाने की इजाजत नहीं है। तस्वीरों में ऐसा ही कुछ दिखाई दे रहा है। भारत नेपाल बॉर्डर पर तैनात नेपाली पुलिस के जवान सख्ती से चेकिंग में जुटे हैं और उन्हें जो चीज भी रोकनी होती है उसे निकाल दे रहे हैं। दरअसल ये सब कुछ हो रहा है नेपाल सरकार की नई बालन शाह सरकार के आदेश पर जिसके तहत नई नीति&nbsp; सीमा शुल्क के मुताबिक अब 100 नेपाली रुपए से अधिक मूल्य के सामान पर 5% से लेकर 80% तक शुल्क सख्ती से वसूला जाएगा।&nbsp;</div><h2>थोड़ा बैकग्राउंड समझना जरूरी है</h2><div>भारत और नेपाल के बीच करीब 10715 किमी लंबी ओपन बॉर्डर है। 1950 की शांति और मैत्री संधि के तहत दोनों देशों के नागरिक बिना पासपोर्ट और वीजा के एक दूसरे के देश में आ जा सकते हैं। इस रिश्ते को रोटी बेटी का रिश्ता कहा जाता है। मतलब खाने और शादियों के जरिए दोनों देशों के लोग इतने गहराई से जुड़े हुए हैं कि बॉर्डर सिर्फ नक्शे पर है। जमीन पर नहीं है। नेपाल पांच भारतीय राज्यों से बॉर्डर शेयर करता है। उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और सिक्किम। अब इस ओपन बॉर्डर की वजह से नेपाल के बॉर्डर एरियाज के लोग दशकों से इंडिया के बाजारों पर डिपेंडेंट रहे हैं। खासकर मधेश प्रदेश के आठ जिलों में जो सीधे इंडिया की सीमा से लगते हैं। वहां के लोग इंडिया से दवाइयां, कपड़े, साड़ी, धोती, बिस्किट, सीमेंट, मसाले, सब्जी, दूध सब कुछ खरीद रहे हैं।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/samrat-choudhary-government-faces-first-acid-test-in-bihar-nda-big-floor-test-on-april-24" target="_blank">Bihar में Samrat Choudhary सरकार की पहली अग्निपरीक्षा, 24 April को NDA का बड़ा Floor Test</a></h3><h2>भारत-नेपाल सीमा व्यापार पर असर!</h2><div>इसका सीधा असर सीमावर्ती भारतीय बाजारों और नेपाली उपभोक्ताओं पर पड़ा है। जिससे दोनों ओर छोटे व्यापारियों और आम लोगों की मुश्किलें बढ़ गई हैं। उत्तर प्रदेश और बिहार के नेपाल सीमा से सटे जिलों में अब इस नई नीति का असर साफ दिखाई दे रहा है। नेपाल द्वारा सख्ती बढ़ाए जाने के बाद भारत से नेपाल जाने वाले रोजमर्रा के सम्मान जैसे दाल, चीनी, रिफाइंड, तेल, कपड़े आदि की कीमत से 15 से 20% तक की बढ़ोतरी हो गई है। जबकि बिक्री 15 से 25% तक घट गई है। यूपी का सिद्धार्थ नगर, महाराजगंज, कुशीनगर, सनौली जैसे इलाकों में दुकानों की बिक्री 15 से 25% तक घट गई है। वहीं बिहार के बघार, रक्कसोल और जयनगर जैसे बाजारों में यह गिरावट 50% तक पहुंच गई है। इन बाजारों का बड़ा हिस्सा नेपाली ग्राहकों पर निर्भर है। ऐसे में छोटे दुकानदारों के लिए स्थिति बेहद चुनौतीपूर्ण बन गई है। नेपाल के कई इलाके खासकर वीरगंज और आसपास के क्षेत्रों में इस फैसले के खिलाफ विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए हैं। स्थानीय लोगों और संगठनों का कहना है कि नेपाल भारत के बीच सदियों पुराना रोटी बेटी का रिश्ता रहा है। जिसमें सीमाओं के बावजूद लोगों का आना-जाना और व्यापार सहज रहा है। लोगों का आरोप है कि अब कोल्ड ड्रिंक, चिप्स और बिस्किट जैसे छोटे सामानों को ले जाने पर भी नेपाली सशस्त्र पुलिस द्वारा वसूली या जब्ती की जा रही है। जिससे आम नागरिकों को परेशानी हो रही है।&nbsp; विशेषज्ञों का मानना है कि यदि नेपाल सरकार ने इस नीति में कोई नरमी नहीं दिखाई तो इसका असर लंबे समय तक बना रहता है। इससे ना केवल सीमावृत्ति व्यापार प्रभावित होगा बल्कि दोनों देशों के पारंपरिक, सामाजिक और आर्थिक संबंधों पर भी असर पड़ सकता है। नेपाल इंडिया ओपन बॉर्डर इंटरेक्शन ग्रुप ने भी गवर्नमेंट से मांग की है कि घरेलू इस्तेमाल के सामान पर जीरो कस्टम ड्यूटी हो।</div><h2>इस रूल में कोई लॉजिक है?&nbsp;</h2><div>&nbsp;स्मगलिंग रोकना जरूरी है। रेवेन्यू बचाना भी जरूरी है। लेकिन ₹100 की लिमिट जो इंडियन करेंसी में मात्र ₹63 भी नहीं बनते। नेपाल के प्रो कॉमर्स सेक्रेटरी पुरुषोत्तम ओझा कहते हैं कि लीगली तो गवर्नमेंट के पास ये अधिकार है। लेकिन सवाल यह है कि इतनी कम लिमिट कारगर होगी या नहीं? अगर लोगों को बॉर्डर पार जाकर काफी पैसा बचता है तो वह रास्ता निकालते रहेंगे। सिर्फ इनफोर्समेंट से समस्या हल नहीं होगी। उनका सुझाव है कि गवर्नमेंट को अपने डोमेस्टिक मार्केट्स को कंपेटिव बनाना चाहिए। इंफ्रास्ट्रक्चर सुधारना चाहिए और जरूरी सामान पर टारगेटेड सब्सिडी देनी चाहिए।&nbsp; अब वापस उस मां के पास चलते हैं जिसके हाथ से चिप्स का पैकेट छीना गया। वो अब भी पूछ रही है कि बच्चों के लिए चिप्स लाना भी अब गुनाह है और यह सवाल सिर्फ उस एक मां का नहीं है। यह सवाल नेपाल के बॉर्डर एरियाज में रहने वाले लाखों लोगों का है। दशकों से, पीढ़ियों से और अब एक रूल ने यह सब कुछ बदल दिया। देखना है कि बालन शाह की गवर्नमेंट बढ़ते दबाव में इस पॉलिसी पर दोबारा विचार करती है या नहीं।</div><h2>भारत पर कितना निर्भर है नेपाल&nbsp;</h2><div>भारत से पेट्रोलियम उत्पाद, चावल दवाइयों का आयात</div><div>विदेशी निवेश में भारत की 30% से ज्यादा हिस्सेदारी&nbsp;</div><div>भारत की बैंकिंग, बीमा, शिक्षा, पर्यटन से जुड़ी 150 कंपनियां नेपाल में&nbsp;</div><div>भारत में 20 से 25 लाख नेपाली नागरिक</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 23 Apr 2026 09:37:43 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/what-trouble-does-bringing-goods-from-india-now-pose-for-nepal-balen-shah-government</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[क्यों अचानक ईरान के इशारों पर नाचने लगे ट्रंप? फोन के टॉक टाइम खत्म होने से पहले रिचार्ज सरीखा सीजफायर बढ़ाने की असली वजह 'TACO' है!]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/trump-suddenly-start-dancing-to-iran-real-story-behind-the-ceasefire-extension]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ चल रहे युद्ध विराम यानी सीज फायर को बढ़ाने का ऐलान किया है। इससे पहले सीज फायर की जो समय सीमा दी गई थी वो आज यानी 22 अप्रैल को खत्म हो रही थी। उससे पहले ट्रंप ने सीज फायर बढ़ाने की जानकारी सार्वजनिक कर दी। एकदम वैसे जैसे फोन का टॉक टाइम खत्म होने से पहले ठीक पहले रिचार्ज करा लिया जाता है। यह टैक्टिकल सीज फायर एक्सटेंशन ट्रंप ने किसके कहने पर किया है यह भी बताते हैं। भारत के पड़ोस में एक देश है पाकिस्तान जिसे आतंकवाद का सबसे बड़ा एक्सपोर्टर माना जाता है। फिल वक्त वही पाकिस्तान पीस मैसेंजर ऑफ द ईयर बना हुआ है। ट्रंप का कहना है कि इसी पाकिस्तान के आर्मी चीफ वसीम मुनीर और प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के अनुरोध पर उन्होंने सीजफायर आगे बढ़ाने का फैसला किया है। लेकिन क्या सच में ऐसा है या फिर ईरान ने अपनी शर्तों पर ट्रंप को यू टर्न लेने पर मजबूर कर दिया है। आज हम पूरे मामले का एमआरआई स्कैन करेंगे। ट्रुथ सोशल पर जारी बयान में ट्रंप ने कहा है कि ईरान की सरकार बुरी तरह बिखरी हुई है। यह कोई नई बात नहीं है। पाकिस्तान के फील्ड मार्शल असीम मुनीर और प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के कहने पर हमने ईरान पर हमला फिलहाल टाल दिया है। जब तक ईरान के नेता एकमख होकर कोई ठोस प्रस्ताव नहीं लाते तब तक हमारा ब्लॉकेट जारी रहेगा। सेना पूरी तरह तैयार है। हम सीज फायर को आगे बढ़ा रहे हैं। सीज फायर को बढ़ा रहे हैं। यानी सीज फायर बढ़ाने के बावजूद ट्रंप ने ईरान पर दबाव कम नहीं किया है। उन्होंने अमेरिकी सेना को साफ आदेश दिए हैं कि ईरान के खिलाफ चल रही नाकेबंदी को जारी रखा जाए। लेकिन यहां पर एक बात गौर करने वाली सामने आती है जो ट्रंप पहले मैक्सिमम प्रेशर की नीति चला&nbsp;<span style="font-size: 1rem;">रहे थे। हालांकि ट्रंप के इस नए दांव को शांति की पहल तो बिल्कुल भी नहीं कहा जा सकता। देखिए सीज फायर बढ़ाया है लेकिन ब्लॉकेट जारी है। मतलब ईरान पर आर्थिक दबाव और सैन्य तैयारियां दोनों बरकरार हैं। शांति की असली पहल में दोनों तरफ से कुछ रियायतें दी जाती हैं। यहां सिर्फ हमला टाला गया है। ट्रंप ने अपने बयान में ईरान की सरकार को सीरियसली फ्रैक्चरर्ड यानी गंभीर रूप से विभाजित या बिखरी हुई भी बताया है। जानकार इसे रणनीतिक दबाव का हिस्सा बता रहे हैं।&nbsp;</span></div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/iran-strength-remains-intact-america-weapons-are-reduced-is-this-why-trump-extended-the-ceasefire" target="_blank">ईरान की ताकत बरकरार, अमेरिका के घटे हथियार! क्या इसी वजह से ट्रंप ने बढ़ाया युद्धविराम?</a></h3><h2>सीज़फ़ायर की समयसीमा बढ़ने के साथ ही आरोप-प्रत्यारोप भी बढ़े</h2><div>दो क्षेत्रीय अधिकारियों ने मंगलवार को एसोसिएटेड प्रेस को बताया कि अमेरिका और ईरान ने संकेत दिया है कि वे बातचीत का एक नया दौर आयोजित करेंगे। पाकिस्तान के नेतृत्व वाले मध्यस्थों को इस बात की पुष्टि मिली कि शीर्ष वार्ताकार - वैंस और ईरान की संसद के स्पीकर मोहम्मद बाघर ग़ालिबफ़ अपनी-अपनी टीमों का नेतृत्व करेंगे। लेकिन मंगलवार देर रात, ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि बातचीत में शामिल होने के बारे में कोई अंतिम निर्णय"नहीं लिया गया है। प्रवक्ता इस्माइल बघाएई ने सरकारी टीवी को बताया कि निर्णय न ले पाने का कारण अमेरिकियों की ओर से मिले विरोधाभासी संदेश और अस्वीकार्य कार्य थे, विशेष रूप से ईरान की अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी। इस बीच, वैंस ने पाकिस्तान की अपनी यात्रा रद्द कर दी, जबकि पाकिस्तानी नेता बातचीत को बचाने की कोशिश में तेज़ी से जुट गए। 0000 GMT की समय सीमा नज़दीक आते ही, ट्रंप ने घोषणा की कि संघर्ष विराम को अनिश्चित काल के लिए बढ़ा दिया जाएगा। ट्रंप ने कहा कि उन्होंने यह कदम पाकिस्तान के अनुरोध पर उठाया है और इस मामले में किसी निर्णय पर न पहुँच पाने के लिए उन्होंने ईरान के गंभीर रूप से बिखरे हुए नेतृत्व को दोषी ठहराया। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान ने उनसे तब तक इंतज़ार करने को कहा था, जब तक कि ईरान के नेता "कोई एकमत प्रस्ताव लेकर नहीं आ जाते।" फिर भी, उन्होंने कहा कि अमेरिका की नाकेबंदी जारी रहेगी। भले ही पाकिस्तान किसी बैठक का इंतज़ाम कर ले, फिर भी स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ के भविष्य, ईरान के परमाणु कार्यक्रम और नाकेबंदी को लेकर गंभीर चुनौतियाँ बनी हुई हैं। इस सप्ताहांत ईरान ने स्ट्रेट में जहाज़ों को निशाना बनाया। अमेरिका ने भी एक ईरानी जहाज़ पर हमला किया और उस पर कब्ज़ा कर लिया, जिसने स्ट्रेट में अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी से बचकर निकलने की कोशिश की थी - जिससे यह संकेत मिलता है कि स्थिति अभी भी अस्थिर बनी हुई है। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास रांची ने भी नौसैनिक घेराबंदी को एक्ट ऑफ वॉर करार दिया है। यानी ट्रंप अपनी डील मेकर इमेज बचाने की कोशिश में लगे हैं। नया नवेला शांतिदूत पाकिस्तान दुनिया के नक्शे में अपनी अहमियत बढ़ा रहा है और ईरान है कि हार मानने को तैयार नहीं है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/muslim-mp-who-abused-india-was-unceremoniously-thrown-out-of-parliament" target="_blank">भारत को गाली देने वाली मुस्लिम MP को संसद से ऐसे उठाकर फेंका, चौंक गए सभी</a></h3><h2>कमजोर शांति समझौते के टूटने का खतरा</h2><div>अमेरिका और इस्राइल ने 28 फरवरी को जंग शुरू की थी। छह हफ्ते तक चली इस लड़ाई ने तेल की कीमतें बढ़ा दीं और पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को हिला कर रख दिया। ईरान, इस्राइल और अमेरिका के बीच मौजूदा युद्धविराम (शांति समझौता) 8 अप्रैल को लागू हुआ था। इससे पहले ट्रंप ने कई बार डेडलाइन (अल्टीमेटम) दी थी और एक बार तो उन्होंने ईरान की "सभ्यता" को ही खत्म करने की धमकी दे डाली थी। पिछले शुक्रवार को इस्राइल और लेबनान में ईरान के समर्थन वाले लड़ाकू गुट 'हिजबुल्लाह' के बीच भी युद्धविराम लागू हो गया। मोटे तौर पर देखा जाए तो अभी तक ये दोनों ही समझौते टिके हुए हैं। इससे पहले, 11 अप्रैल को पाकिस्तान में ईरान और अमेरिका के बीच बातचीत का एक दौर चला था, जो अगले दिन सुबह-सुबह तक चला। 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद अमेरिका और ईरान के बीच यह सबसे बड़े लेवल की बातचीत थी। इसमें जेडी वेंस ने हिस्सा लिया था, लेकिन यह बातचीत बिना किसी समझौते या नतीजे के ही खत्म हो गई थी। इस वीकेंड से ही इस्लामाबाद के अधिकारियों ने वैसी ही तैयारियां फिर से शुरू कर दी हैं, जैसी पहली बातचीत के समय की गई थीं। इससे यह इशारा मिलता है कि जल्द ही दोनों देशों के बीच बातचीत का एक और दौर होने वाला है।</div><h2>नाज़ुक संघर्ष-विराम में दरार पड़ने का खतरा</h2><div>अमेरिका और इज़राइल ने 28 फरवरी को युद्ध शुरू किया, जो छह हफ़्ते तक चला। इस युद्ध के कारण तेल की कीमतें बढ़ गईं और वैश्विक अर्थव्यवस्था हिल गई। ईरान, इज़राइल और अमेरिका के बीच मौजूदा संघर्ष-विराम 8 अप्रैल को शुरू हुआ। इससे पहले ट्रंप ने कई समय-सीमाएं तय की थीं, जिनसे एक समय तो ईरान की "सभ्यता" पर ही खतरा मंडराने लगा था। पिछले शुक्रवार को, इज़राइल और लेबनान में मौजूद ईरान-समर्थित हिज़्बुल्लाह आतंकवादी समूह के बीच भी एक संघर्ष-विराम लागू हुआ। ये दोनों संघर्ष-विराम मोटे तौर पर कायम रहे हैं। ईरान और अमेरिका के बीच बातचीत का एक पिछला दौर पाकिस्तान में 11 अप्रैल से शुरू होकर अगले दिन तड़के तक चला। वेंस ने 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद से अमेरिका और ईरान के बीच हुई अब तक की सबसे उच्च-स्तरीय बातचीत में हिस्सा लिया, जो बिना किसी समझौते के ही खत्म हो गई। इस सप्ताहांत से इस्लामाबाद के अधिकारियों ने वैसी ही तैयारियां की हैं जैसी पहले दौर की बातचीत के दौरान की गई थीं। इससे यह संकेत मिलता है कि बातचीत का एक और दौर जल्द ही शुरू होने वाला है।</div><h2>होर्मुज जलडमरूमध्य लगभग बंद है</h2><div>होरमुज़ जलडमरूमध्य, जो फ़ारसी खाड़ी का एक संकरा मुहाना है और जिससे दुनिया की 20% प्राकृतिक गैस और तेल गुज़रता है, जलमार्ग में ईरानी हमलों के कारण लगभग बंद पड़ा है। इसमें शनिवार को हुए कुछ हमले भी शामिल हैं। इस बात का भी डर है कि ईरान ने जलडमरूमध्य के उस हिस्से में बारूदी सुरंगें बिछा दी हैं, जिसका इस्तेमाल शांति काल में जहाज़ों के गुज़रने के लिए किया जाता था। युद्ध शुरू होने के बाद से, ख़बरों के मुताबिक, ईरान जहाज़ों को वहाँ से गुज़रने की अनुमति देने के बदले प्रति जहाज़ 20 लाख डॉलर तक की रक़म वसूल रहा है। जलडमरूमध्य को फिर से खोलना बातचीत का एक अहम मुद्दा बना हुआ है और वॉशिंगटन के ख़िलाफ़ तेहरान का सबसे मज़बूत दाँव है; ख़ास तौर पर ऐसे समय में, जब दुनिया भर के देशों ने ऊर्जा की राशनिंग शुरू कर दी है और जेट ईंधन की कमी की चेतावनी दे रहे हैं। इस बीच, संयुक्त राज्य अमेरिका ने ईरानी बंदरगाहों से आने वाले जहाज़ों को रोकना शुरू कर दिया है। अमेरिकी नौसेना ने इस सप्ताहांत एक ईरानी कंटेनर जहाज़ पर हमला किया, जिसने अमेरिकी नाकेबंदी को तोड़कर आगे बढ़ने की कोशिश की थी; इस दौरान अमेरिकी मरीन हेलीकॉप्टरों से रस्सी के सहारे उस जहाज़ पर उतरे थे। ईरान ने इस घटना की निंदा करते हुए इसे "समुद्री डकैती" और अंतरराष्ट्रीय क़ानून का उल्लंघन बताया है।</div><h2>ईरान का परमाणु भंडार देश के भीतर ही मौजूद है</h2><div>ईरान का सारा अत्यधिक संवर्धित यूरेनियम देश के भीतर ही मौजूद है; संभवतः यह उन संवर्धन स्थलों के मलबे के नीचे दबा हुआ है, जिन पर पिछले जून में चले 12-दिवसीय युद्ध के दौरान अमेरिका ने बमबारी की थी। तब से ईरान ने यूरेनियम का संवर्धन नहीं किया है, लेकिन उसका यह दावा बरक़रार है कि उसे शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए ऐसा करने का अधिकार है, और वह परमाणु हथियार बनाने की कोशिश करने के आरोप से इनकार करता है। ट्रंप ने, इज़रायल के साथ मिलकर, ईरान से अपने परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह से समाप्त करने और अपने परमाणु भंडार को त्याग देने की माँग की है। ईरान ने युद्ध को समाप्त करने के लिए पेश किए गए अपने 10-सूत्रीय प्रस्ताव में इस माँग को ख़ारिज कर दिया था।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/india-and-russia-shatter-all-friendship-records-moscow-doubles-oil-supplies" target="_blank">भारत-रूस ने तोड़ डाले दोस्ती के सारे रिकॉर्ड, मॉस्को ने डबल की तेल की सप्लाई</a></h3><h2>ट्रंप पर टाको होने का आरोप लग रहा</h2><div>ट्रम्प ने एक तरफफ़ा घोषणा की थी कि इस्लामाबाद में दूसरे दौर की शांति वार्ता होगी। पाकिस्तान के आर्मी चीफ ने तेहरान फोन घुमाकर एड़ी चोटी का जोर लगा दिया, लेकिन ईरान नहीं पहुंचा। ईरान की मांग साफ थी जब तक होर्मुज की नाकेबंदी नहीं हटती बातचीत नहीं होगी। नतीजा ईरान अपनी बात पर अड़ा रहा और ट्रंप को एक तरफ़ा सीज फायर का ऐलान करना पड़ा। सअमेरिका के अंदर एक बार फिर ट्रंप पर टाको होने का आरोप लग रहा है। टाको यानी ट्रंप ऑलवेज चिकन साउथ। वो नेता जो अंत में आकर घुटने टेक देता है। ट्रंप ने बार-बार धमकी दी थी कि अगर वार्ता नहीं हुई तो ईरान के नागरिक ढांचों को बम से उड़ा देंगे। लेकिन आखिर में ट्रंप फिर पीछे हट गए। सबूत नंबर तीन शर्तों का टूटना और ईरान का दबदबा। ईरान ने पहले ही सीज फायर की शर्तें तोड़ दी थी। ट्रंप ने कहा था कि ईरान होमूस का रास्ता खोलेगा। ईरान ने शुरू में ऐसा किया भी लेकिन जब अमेरिका ने अपनी ओर से रास्ता नहीं खोला तो ईरान ने भी दोबारा हरमूस बंद कर दिया। हैरानी की बात देखिए ईरान शर्तों को नहीं मान रहा। फिर भी ट्रंप दूसरे सीज फायर का ऐलान कर रहे हैं। इससे साफ है कि अपर हैंड किसका है। जिस वक्त अमेरिका इस्लामाबाद में ईरान का इंतजार कर रहा था उसी वक्त तेहरान की सड़कों पर गदर बैलेस्टिक मिसाइल का प्रदूषण हो रहा था। बीबीसी रिपोर्ट के मुताबिक तेहरान के मुख्य चौराहे पर हजारों लोग अमेरिकी मुर्दाबाद का नारा लगा रहे थे और अपनी सेना से इजराइल पर हमले की मांग कर रहे थे। यह ईरान का अमेरिका को सीधा जवाब था। ट्रंप के ऐलान के बाद ईरान की प्रतिक्रिया देखिए। वहां कोई नरमी नहीं है। ईरानी संसद के सदस्य महमूद नबवियान ने इसे बेमतलब और नुकसानदायक बताया। वहीं स्पीकर के सलाहकार ने तो यहां तक कह दिया हारने वाले शर्त तय नहीं कर सकते। ट्रंप कह रहे हैं कि जब तक ईरान एकीकृत प्रस्ताव नहीं लाता हमले रुके रहेंगे। लेकिन हकीकत यह है कि ईरान झुकने को तैयार नहीं है।</div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 22 Apr 2026 12:19:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/trump-suddenly-start-dancing-to-iran-real-story-behind-the-ceasefire-extension</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[दो भाई, दोनों तबाही...क्या है भारत-रूस का RELOS समझौता? चीन-पाक और US की हेकड़ी निकली]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/what-is-the-india-russia-relos-agreement-china-pakistan]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>दो भाई और दोनों तबाही। चीन, पाकिस्तान और यूएस की हेकड़ी निकाल दी। एक पैक्ट, एक समझौता जो हुआ है भारत और रूस के बीच। भारत और रूस के बीच बढ़ते द्विपक्षीय संबंधों और गहराते डिफेंस कोऑपरेशन को दर्शाते हुए एक अहम समझौता औपचारिक रूप से लागू कर दिया गया है। भारत और रशिया के बीच द रेलॉस एग्रीमेंट हुआ है। इस फैक्ट के तहत दोनों देश एक दूसरे की टेरिटरी में अधिकतम 3000 मिलिट्री पर्सनल तैनात कर सकेंगे। सिर्फ सैनिक ही नहीं इस एग्रीमेंट के तहत शिप्स और एयरक्राफ्ट को भी एक दूसरे के क्षेत्र में तैनात करने की अनुमति दे दी गई है। यह समझौता रेसिप्रोकल एक्सचेंज ऑफ लॉजिस्टिक्स एग्रीमेंट यानी रेलोस से जुड़ा हुआ है। जिसमें जॉइंट मिलिट्री एक्सरसाइजज़, ट्रेनिंग और ह्यूमैनिटेरियन मिशनंस जैसे पहलू भी शामिल हैं। हाल ही में भारत दौरे से पहले रूसी राष्ट्रपति व्लादमीर पुतिन ने इस इंटर गवर्नमेंटल एग्रीमेंट को रटिफाई करने वाले कानून पर हस्ताक्षर कर दिए थे। इस एग्रीमेंट का मकसद भारत और रूस के बीच मिलिट्री डिप्लॉयमेंट, पोर्ट्स पर वॉरशिप्स की डॉकिंग और मिलिट्री एयरक्राफ्ट के लिए एयर स्पेस और एयर फील्ड इंफ्रास्ट्रक्चर के इस्तेमाल के लिए एक क्लियर फ्रेमवर्क तैयार करना है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/ukraine-major-announcement-following-india-russia-military-deal" target="_blank">3000 सैनिक,5 युद्धपोत,10 विमान...भारत-रूस की मिलिट्री डील के बाद यूक्रेन का बड़ा ऐलान</a></h3><h2>क्या है यह रेलॉस एग्रीमेंट?</h2><div>द इंडियन रशियन रेसिप्रोकल एक्सचेंज ऑफ लॉजिस्टिक्स सपोर्ट एग्रीमेंट। इस एग्रीमेंट के तहत जरूरत पड़ने पर भारतीय सेना रशिया के कुछ चुनिंदा सैन्य ठिकानों का इस्तेमाल कर पाएगी। ठीक वैसे ही रशिया भी जरूरत पड़ी तो भारत के कुछ सैन्य ठिकानों का इस्तेमाल करेगा। यह समझौता कुछ कुछ-कुछ वैसा ही है जैसे अमेरिका मित्र देशों के सैन्य ठिकानों को अपने मिशन के लिए इस्तेमाल करता है। ठीक वैसे ही भारत और रशिया समय आने पर इसी तरह से एक दूसरे की जमीन का इस्तेमाल करेंगे अगर युद्ध में जरूरत पड़ती। जब दुनिया की दूसरी और चौथी सबसे ताकतवर सेनाएं एक साथ मिलकर खड़ी होंगी तो दुनिया की कोई भी ताकत उन्हें रोक नहीं पाएगी। रूस और भारत ने अपनी दोस्ती को एक कदम आगे ले जाते हुए एक ऐसी रणनीतिक साझेदारी की है जिसे देखकर दुनिया की कई महाशक्तियों के माथे पर सिकन नजर आने लगी है। भारत और रूस ने एक ऐसा समझौता किया जिससे दोनों देश एक दूसरे के सैन्य ठिकानों का इस्तेमाल कर पाएंगे और इससे भारतीय सेना की पहुंच आर्कटिक क्षेत्र तक और रूस की पहुंच हिंद महासागर तक हो जाएगी। इन दोनों ताकतवर देशों ने पल-पल बदल रही वैश्विक परिस्थितियों और जंग के माहौल के बीच यह समझौता अमल में लाकर दुश्मनों को परेशान कर दिया है। भारत और रूस के बीच द रेलॉस एग्रीमेंट हुआ है। इसके तहत भारत और रूस एक दूसरे के सैन्य ठिकानों पर अस्थाई बेस बना सकेंगे।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/russia-deploys-troops-and-warships-to-india-us-stunned-by-massive-preparations" target="_blank">Russia ने भारत में उतारे सैनिक और वॉरशिप! बड़ी तैयारी से चौंका US, दुश्मनों में खलबली</a></h3><h2>अमेरिका ने कई देशों में बनाए अपने सैन्य ठिकाने</h2><div>ईरान युद्ध में हमने देखा कि हवाई हमलों के लिए अमेरिका ने यूरोपीय देशों में बने अपने सैन्य ठिकानों की मदद ली। अमेरिका से सीधे ईरान पर हमले करना खर्चीला है और समय भी काफी लगता है। इसी वजह से अमेरिका ने मिडिल ईस्ट के अपने ऑपरेशंस के लिए यूरोपीय देशों और मिडिल ईस्ट के भी कई देशों में अपने सैन्य ठिकाने बनाए हैं। इनमें कुछ स्थाई है और कुछ अस्थाई। ठीक वैसे ही अब से भारत और रूस एक दूसरे के सैनिक ठिकानों का इस्तेमाल कर पाएंगे। भारत के लिए रिलोस एग्रीमेंट रणनीतिक रूप से काफी फायदेमंद है। इससे भारतीय सेना की पहुंच आर्थिक क्षेत्र तक हो जाएगी। दुनिया की लगभग सभी महाशक्तियां जैसे अमेरिका, रूस और चाइना इस क्षेत्र में अपनी मौजूदगी बढ़ा रहे हैं। अभी तक भारत और रूस एक दूसरे के किन सैन्य ठिकानों का इस्तेमाल करेंगे इसके बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई है। लेकिन एक्सपर्ट्स के मुताबिक इस समझौते के बाद भारतीय सेना रूस के एक बड़े पोर्ट मुरबंस और नॉर्दन प्लीट के मुख्यालय सिविरो म्स पर अपनी तैनाती कर सकता है। अगर ऐसा हुआ, तो इससे भारतीय नौसेना की वैश्विक मौजूदगी बढ़ेगी और दूरदराज के सैन्य ऑपरेशन आसान हो जाएंगे। युद्ध की स्थिति में युद्धपोतों को बार-बार भारत वापस नहीं आना पड़ेगा। इसके अलावा चाइना के पास ब्लादी बोस्टोक पर भी भारतीय सैनिक तैनात किए जा सकते हैं। इसके अलावा कामचटका पर भी भारतीय सेना की रणनीतिक मौजूदगी हो सकती है। यह भी महत्वपूर्ण ठिकाना होगा। इसके अलावा रूस भी भारतीय सैन्य ठिकानों पर अपनी मौजूदगी से हिंद महासागर क्षेत्र में भारत के साथ मिलकर दबदबा बढ़ा सकता है।&nbsp;</div><h2>5 वर्षों तक के लिए किया गया समझौता</h2><div>इस पूरे क्षेत्र पर दोनों देशों की मौजूदगी से अमेरिका और चाइना जैसे देशों को काउंटर करने में मदद मिलेगी। यह समझौता एक बार में 5 वर्षों तक के लिए किया गया है और इसके बाद दोनों देश इसे अगले 5 वर्षों तक के लिए बढ़ा सकते हैं। हालांकि भारत ने अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस, सिंगापुर, जापान और दक्षिण कोरिया से भी लॉजिस्टिकल सपोर्ट से जुड़े समझौते किए हैं। लेकिन इन सभी देशों के साथ रूस जैसा समझौता नहीं है। इन समझौतों के तहत भारतीय सेना को इन देशों की तरफ से लॉजिस्टिक सपोर्ट तो मिलेगा लेकिन इसमें सैनिकों की तैनाती की बात नहीं है। जबकि रेलॉस एग्रीमेंट के तहत भारतीय सेना रूस में भी सैनिक रख सकती है। पिछले साल आई सिपली की रिपोर्ट के मुताबिक भारत दुनिया में हथियारों का दूसरा सबसे बड़ा खरीदार है और रूस भारत के लिए हथियारों का सबसे बड़ा सप्लायर है।</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 21 Apr 2026 14:12:23 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/what-is-the-india-russia-relos-agreement-china-pakistan</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[होर्मुज की उथल-पुथल के बीच अचानक मोदी से मिले कोरियाई राष्ट्रपति, चीन की उल्टी गिनती शुरू?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/amidst-the-turmoil-in-the-strait-of-hormuz-south-korean-president-meets-modi]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>चीन ने भारत के खिलाफ अग्रेसिव रुख लेते हुए भारत के अरुणाचल प्रदेश के कुछ एरियाज के नाम बदल दिए थे। उसके बाद भारत ने एक डिप्लोमेसी अपनाई थी जिसके तहत भारत ने भी चीन के कुछ एरियाज के नाम बदले थे। अमेरिका के नजदीक जैसे-जैसे भारत जाने लगा तो चीन से दूरियां हमारी बढ़ना लाजमी है। अब भारत ने चीन के अगेंस्ट एक ऐसा कदम लिया है जो कि डिप्लोमेटिकली उसे वर्ल्ड ऑर्डर में चीन से बहुत आगे रख देगा। भारत ने अपनी एक्ट ईस्ट पॉलिसी लुक ईस्ट पॉलिसी से आगे जाते हुए दक्षिण कोरिया के साथ अपने रिलेशंस को अच्छे करने के लिए दक्षिण कोरियाई राष्ट्रपति को भारत में इनवाइट किया। वो 19 से लेकर 21 तारीख तक तीन दिन की राष्ट्रीय विजिट पर भारत में आए हैं।&nbsp; भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की साउथ कोरिया के राष्ट्रपति ली जे म्युंग के साथ बेहद अहम बैठक हुई। लगभग एक दशक तक, नई दिल्ली (भारत) और सियोल (दक्षिण कोरिया) के बीच विशेष रणनीतिक साझेदारी ज़मीनी हकीकत से ज़्यादा कागज़ों पर ही नज़र आई। हालांकि दोनों देशों के बीच व्यापार जारी रहा, लेकिन 2018 में दक्षिण कोरिया के पूर्व राष्ट्रपति मून जे-इन की यात्रा के दौरान जो राजनीतिक उत्साह दिखा था, वह धीरे-धीरे फीका पड़ गया। भारत और दक्षिण कोरिया के रिश्ते कभी टूटे नहीं थे, लेकिन दोनों देशों की अपनी-अपनी तात्कालिक रणनीतिक मजबूरियों के कारण ये अक्सर पीछे छूट गए। दक्षिण कोरिया मुख्य रूप से उत्तर कोरिया के मुद्दों, अमेरिका के साथ अपने गठबंधन को संभालने और चीन पर अपनी भारी आर्थिक निर्भरता में उलझा रहा। इसके अलावा, वहाँ की बदलती घरेलू राजनीति और राष्ट्रपति के लिए केवल एक कार्यकाल वाले सिस्टम ने लंबी अवधि की रणनीतियों को बनाए रखना मुश्किल कर दिया। वहीं दूसरी ओर, भारत हिमालयी सीमा पर चीन के साथ तनाव को संभालने, पाकिस्तान से जुड़ी सुरक्षा चिंताओं और अन्य बड़ी महाशक्तियों के साथ अपने कूटनीतिक एजेंडे में व्यस्त था।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/south-korean-president-lees-visit-to-india" target="_blank">South Korea के राष्ट्रपति Lee का भारत दौरा, PM Modi संग AI-Semiconductor पर होगी मेगा डील!</a></h3><h2>आर्थिक और रणनीतिक साझेदारी को मज़बूत करने पर ज़ोर</h2><div>नई दिल्ली स्थित हैदराबाद हाउस में दोनों देशों के शीर्ष नेताओं के बीच एक अहम द्विपक्षीय बैठक हुई। इस बातचीत के दौरान मुख्य फोकस वैश्विक स्तर पर मची उथल-पुथल—खासकर ईरान और इज़राइल-अमेरिका के बीच चल रहे संघर्ष—पर ही रहा। दोनों नेताओं ने इस बात पर गहराई से विचार-विमर्श किया कि युद्ध और तनाव के इस मौजूदा दौर में भारत और दक्षिण कोरिया अपने आर्थिक और रणनीतिक रिश्तों को और अधिक मज़बूत कैसे बना सकते हैं। बैठक के बाद, पर्यावरण संरक्षण और प्रकृति के प्रति अपनी संवेदनशीलता का संदेश देते हुए दोनों नेताओं ने मिलकर एक पौधा भी लगाया। प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) के आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल से भी इस महत्वपूर्ण मुलाकात की झलकियां साझा की गई हैं। इस मौके पर प्रधानमंत्री मोदी ने दोनों देशों के ऐतिहासिक संबंधों का ज़िक्र करते हुए कहा कि भारत और दक्षिण कोरिया के बीच हज़ारों सालों पुराना सांस्कृतिक जुड़ाव है। उन्होंने याद दिलाया कि 2000 साल पहले अयोध्या की राजकुमारी सूरीरत्ना और कोरियाई राजा किम-सुरो के बीच हुआ विवाह हमारी साझा और गौरवशाली विरासत का प्रतीक है। पीएम मोदी ने यह भी कहा कि आधुनिक दौर में भी यह जुड़ाव कायम है—जहाँ एक तरफ भारत में 'के-पॉप' (K-Pop) और 'के-ड्रामा' (K-Drama) की दीवानगी तेज़ी से बढ़ रही है, वहीं दूसरी ओर दक्षिण कोरिया के लोग भी भारतीय सिनेमा और संस्कृति को खूब पसंद कर रहे हैं।</div><h2>50 अरब का सपना: CEPA को अपग्रेड करना</h2><div>दोनों देशों के आपसी रिश्तों में सबसे बड़ी रुकावटों में से एक व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता (सीईपीए) रहा है। 2009 में साइन किया गया और 2010 में लागू हुआ यह समझौता अब काफी पुराना माना जाता है। भारत अक्सर दक्षिण कोरिया के साथ बढ़ते व्यापार घाटे को लेकर अपनी चिंता ज़ाहिर करता रहा है। दोनों देशों ने 2030 तक आपसी व्यापार को $50 अरब तक पहुँचाने का एक बड़ा लक्ष्य तय किया है। क्या यह दौरा इस लक्ष्य को पाने के लिए ज़रूरी 'ऑक्सीजन' दे पाएगा? अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का मानना ​​है कि इसके लिए राजनीतिक दबाव तो ज़रूरी है, लेकिन उसके बाद बारीकी से काम को अंजाम देना भी उतना ही ज़रूरी है। यह दौरा राजनीतिक दबाव तो दे सकता है, लेकिन सिर्फ़ अपने दम पर नहीं। ऊँचे स्तर के दौरे इसलिए मायने रखते हैं, क्योंकि वे निवेशकों की अनिश्चितता को कम करते हैं। सरकारी अधिकारियों की गंभीरता का संकेत देते हैं और इंडस्ट्री को सिर्फ़ बातचीत से आगे बढ़कर काम को अंजाम देने के लिए बढ़ावा देते हैं। अगर दोनों नेता इस दौरे का इस्तेमाल सीईपीए से जुड़ी रुकावटों को दूर करने, समय-सीमा तय करने और कुछ खास क्षेत्रों की पहचान करने के लिए करते हैं, तो 2030 तक $50 अरब का लक्ष्य ज़्यादा भरोसेमंद हो जाता है। लेकिन असली परीक्षा यह मुख्य लक्ष्य नहीं है; असली परीक्षा यह है कि क्या दोनों पक्ष अपने व्यापारिक संबंधों को ज़्यादा संतुलित, व्यापक और कुछ चुनिंदा निर्मित वस्तुओं पर कम निर्भर बना पाते हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/trump-2-0-busan-freeze-policy-make-america-china-friendly-again" target="_blank">Trump 2.0 की बुसान फ्रीज पॉलिसी, जो बनाएगी मेक अमेरिका 'चाइना-फ्रेंडली' अगेन</a></h3><h2>2026 में अब क्या बदल गया है?</h2><div>हालाँकि, 2018 की तुलना में 2026 के हालात पूरी तरह से अलग हैं। महामारी के बाद की दुनिया और अर्थव्यवस्थाओं द्वारा जोखिम कम करने की नीतियों ने दक्षिण कोरिया को दोबारा सोचने पर मजबूर कर दिया है। एशिया अब केवल विकास की उम्मीदों पर नहीं चल रहा है। अब यह सप्लाई-चेन (आपूर्ति श्रृंखला) की असुरक्षा, समुद्री विवादों, तकनीकी होड़ और उत्पादन के लिए केवल चीन पर निर्भर न रहने के दबाव से तय हो रहा है। इसके अलावा भारत अपने बड़े बाज़ार, मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने, डिजिटल विस्तार और 'ग्लोबल साउथ' (विकासशील देशों) में अपने कूटनीतिक प्रभाव के कारण इन नई रणनीतियों के बिल्कुल केंद्र में आ गया है। वहीं दक्षिण कोरिया का मौजूदा नेतृत्व भी अब अमेरिका और चीन के बाज़ारों पर अपनी पुरानी निर्भरता से आगे देख रहा है। यही कारण है कि दक्षिण कोरियाई राष्ट्रपति ली की यह ताज़ा यात्रा अब केवल प्रतीकात्मक (दिखावे की) नहीं, बल्कि एक बहुत ही महत्वपूर्ण रणनीतिक कदम मानी जा रही है।</div><div>ग्लोबल साउथ' (विकासशील देशों) तक पहुँचने के लिए एक 'पुल' के रूप में भारत</div><div>राष्ट्रपति ली के नेतृत्व में दक्षिण कोरिया दुनिया में अपनी एक नई और बड़ी पहचान बनाने की रणनीति पर तेज़ी से काम कर रहा है। इसका एक बहुत अहम हिस्सा ग्लोबल साउथ के साथ जुड़ना है। 2023 में भारत की G20 अध्यक्षता के बाद से, 'ग्लोबल साउथ' शब्द एक तरह से भारत के मज़बूत नेतृत्व की पहचान बन चुका है। दक्षिण कोरिया के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार वी सुंग-राक ने हाल ही में बताया था कि उनकी इस रणनीति को आगे बढ़ाने में भारत की यात्रा एक मुख्य स्तंभ है।</div><div>दक्षिण कोरिया को 'ग्लोबल साउथ' के लिए भारत की ज़रूरत क्यों है?</div><div>विकासशील देशों के बीच अपनी कूटनीति बढ़ाने में भारत, दक्षिण कोरिया की बहुत मदद कर सकता है। भारत की विकासशील दुनिया में जो गहरी पकड़, सम्मान और राजनीतिक वैधता है, वह दक्षिण कोरिया के पास अभी उस स्तर पर नहीं है। भारत को अब केवल एक एशियाई ताकत के तौर पर नहीं देखा जाता। भारत एक ऐसा देश बन गया है जो अफ्रीका, हिंद महासागर के देशों, दक्षिण-पूर्व एशिया और लैटिन अमेरिका (दक्षिण अमेरिका) के देशों के साथ सीधे जुड़ सकता है। भारत इन देशों के साथ विकास, उनकी क्षमता बढ़ाने और आज़ाद रणनीतिक सोच के मुद्दों पर उनकी ही भाषा में बात कर सकता है। दक्षिण कोरिया अब तक मुख्य रूप से अपने पुराने गठबंधनों और केवल अमीर देशों के बाज़ारों तक ही सीमित रहा है। अब जब वह अपनी कूटनीतिक और व्यापारिक पहुँच को दुनिया के अन्य हिस्सों में बढ़ाना चाहता है, तो भारत उसके लिए एक बेहद मूल्यवान और ज़रूरी साथी बन जाता है।</div><div>To read <a href="https://www.prabhasakshi.com/mri">Breaking Political News in Hindi</a>, visit Prabhasakshi.</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 20 Apr 2026 16:00:34 +0530</pubDate>
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      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[बिंदी Ban, हिजाब Allowed, Lenskart के वायरल डॉक्यूमेंट पर क्या विवाद चल रहा है?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/what-is-the-controversy-surrounding-lenskart-viral-document]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>अभी टाटा&nbsp; कंसलटेंसी सर्विज यानी टीसीएस से जुड़ा विवाद पूरी तरह थमा भी नहीं था कि एक और बड़ी कंपनी को लेकर कंट्रोवर्सी सामने आने लगी है। इस बार मामला सिर्फ एक कंपनी तक सीमित नहीं है बल्कि उस सवाल का है जो हम सबके वर्क प्लेस से सीधे जुड़ा है। मामला है ड्रेस कोड पॉलिसी का। क्या एक कंपनी यह तय कर सकती है कि आप अपनी रिलीजियस आइडेंटिटी कैसे दिखाएं? या अपनी रिलीजियस आइडेंटिटी को दिखाना जरूरी है भी? क्या ऑफिस में आपकी धार्मिक पहचान और उससे जुड़े पर्सनल बिलीफ आपकी अपनी चॉइस होगी या कंपनी की पॉलिसी उसे तय करेगी? तमाम विवाद चश्मे बनाने वाली पॉपुलर कंपनी लेंस कार्ड से जुड़ा है। क्या है लेंस कार्ड से जुड़ी कंट्रोवर्सी और क्यों हो रही है इसकी इतनी चर्चा?</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/mri/trump-holy-war-why-did-the-pope-clash-with-us-president-over-iran" target="_blank">Trump का 'धर्मयुद्ध', ईरान के लिए US प्रेसिडेंट से क्यों भिड़ गए पोप</a></h3><div>दरअसल, लेंस कार्ड की 27 पन्नों की गाइड बुक में तमाम ऐसे नियम है जिन्हें लेकर कंट्रोवर्सी हो रही है। वैसे लेंस कार्ड के सीईओ पीयूष बंसल ने इन नियमों को पुराना बताया है। लेकिन ट्रोल्स का कहना है कि गाइडलाइन पुरानी हो या फिर नई हो है तो आपकी ही। पहले जानेंगे कि किन नियमों को लेकर विवाद है और फिर जानेंगे कि पीयूष बंसल का क्या कहना है।</div><h2>लेंसकार्ट स्टाफ यूनिफार्म एंड ग्रूमिंग गाइड पर एक्स यूजर ने उठाए सवाल</h2><div>शुरुआत एक एक्स पोस्ट से हुई। 15 अप्रैल को शेफाली वैद नाम की एक्स यूजर ने लेंस कार्ड को टैग करते हुए कुछ फोटो शेयर की। इन तस्वीरों को लेंस कार्ट स्टाफ यूनिफार्म एंड ग्रूमिंग गाइड का हिस्सा बताया जा रहा है। तस्वीर में दिखाए गए नियम के हिसाब से कंपनी की वर्कर्स एक पर्टिकुलर लेंथ का हिजाब पहन सकती हैं। लेकिन किसी भी कलर की बिंदी, स्टोन या फिर कलावा नहीं पहन सकती। सिंदूर को लेकर भी नियम बताया गया कि इसे मिनिमम लगाना है और इस तरह से लगाना है कि माथे पर नहीं आए। इस तरह के और भी कई सारे नियमों का जिक्र किया गया। इस फोटो को शेयर करते हुए यूजर ने लिखा मैं नियमों को कंफर्म कर रही हूं। पीयूष बंसल अपने वर्कर्स को यही बताते हैं कि हिजाब ओके है लेकिन बिंदी तिलक क्या कलावा ओके नहीं है। यह ऐसी कंपनी है जो हिंदू बहुल देश भारत में है। जिसके अधिकतर वर्कर्स और कस्टमर हिंदू हैं। आप इस पर क्या कहेंगे?</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/mri/why-did-employees-protest-turn-violent-in-noida" target="_blank">Noida में क्यों हिंसक हुआ कर्मचारियों का प्रोटेस्ट, आंदोलन या साज़िश?</a></h3><h2>डॉक्यूमेंट में क्या-क्या है?</h2><div>वायरल डॉक्यूमेंट में कई तरह के ड्रेस कोड निर्देश दिए गए थे। इसमें कहा गया था कि अगर कोई कर्मचारी पगड़ी पहनता है तो उसका रंग काला होना चाहिए। इसी तरह हिजाब पहनने की अनुमति थी लेकिन उसके लिए भी काले रंग की शर्त रखी गई थी। साथ ही यह भी कहा गया था कि हिजाब का कवरेज सीमित हो। वहीं स्टोर में बुर्का पहनने की अनुमति नहीं दी गई थी। विज़िबल टैटू से बचने की सलाह दी गई थी ताकि किसी की धार्मिक भावनाएं आहत ना हो। इसके अलावा मेहंदी लगाने पर भी रोक थी और अगर किसी खास मौके पर लगानी हो तो पहले से अनुमति लेनी होगी और वह भी सीमित समय के लिए। सबसे ज्यादा विवादित हिस्सा वो था जिसमें धार्मिक प्रतीकों को लेकर निर्देश दिए गए थे। जैसे कि तिलक, बिंदी या किसी भी तरह का धार्मिक स्टीकर पहनने की अनुमति नहीं थी।</div><h2>हिंदू संस्कृति और परंपराओं को किया जा रहा टारगेट?</h2><div>यह नियम लेंस कार्ट स्टाइल गाइड के पेज नंबर 11 में लिखा है। इस फोटो को शेयर करते हुए एक और यूजर ने लिखा, क्या सच में यह हिंदू बहुसंख्यक या सेकुलर देश है? हिंदुओं के साथ भेदभाव किया जाता है और अल्पसंख्यक मुसलमानों को वर्क प्लेस में अपनी धार्मिक पहचान का पालन करने की इजाजत दी जाती है। लेंस कार्ट यह रवैया हिंदू संस्कृति और परंपराओं को टारगेट कर रहा है। ऐसे ही और सारे कमेंट्स आए तो पीयूष बंसल ने जवाब भी दिया।</div><h2>लेंसकार्ट के सीईओ ने क्या कहा</h2><div>पीयूष ने लिखा कि हर साल नियमों में बदलाव होता है। हमारी कंपनी में अलग-अलग धर्म के हजारों लोग काम करते हैं। कोई डिस्क्रिमिनेशन नहीं होता। इसके आगे पीयूष ने जो लिखा हम शब्दशा बता देते हैं। पीयूष ने लिखा, मैंने देखा है कि लेंस कार्ड का गलत पॉलिसी डॉक्यूमेंट वायरल हो रहा है। मैं बताना चाहता हूं कि यह डॉक्यूमेंट हमारे वर्तमान दिशा निर्देशों को नहीं दिखाता। हमारी पॉलिसी में धार्मिक अभिव्यक्ति पर कोई रोक नहीं है। इसमें बिंदी और तिलक भी शामिल है। हम नियमित रूप से अपने दिशा निर्देशों को रिव्यू करते रहते हैं। हमारी ग्रूमिंग पॉलिसी समय के साथ विकसित हुई है और इसके पुराने नियम आज हमारी पहचान को सही ढंग से नहीं दिखाते हैं। आपको जो कंफ्यूजन हुआ उसके लिए हम माफी चाहते हैं। एक कंपनी के रूप में हम लगातार सीखते और आगे बढ़ते हैं। हमारी भाषा या नीतियों में खामियों को दूर किया गया है और आगे भी किया जाता रहेगा। भारत में हमारे हजारों कर्मचारी जो हमारे स्टोर्स में अपने धर्म और संस्कृति को गर्व से दिखाते हैं। यही लेंस कार्ड है। लेंस कार्ड भारत में बना था भारतीयों द्वारा और भारतीयों के लिए। हमारे लोगों की हर परंपरा हमारी कंपनी की पहचान का हिस्सा है। मैं कभी भी इसे खतरे में नहीं पड़ने दूंगा।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/mri/place-from-where-india-was-conquered-do-you-know-story-of-strait-of-hormuz" target="_blank">जहां से हुआ था भारत पर कब्जा, ट्रेड रूट बंद करना था कारण, Strait of Hormuz की ये कहानी क्या आपको पता है?</a></h3><h2>डॉक्यूमेंट नया हो या पुराना इसे स्वीकारा क्यों गया?</h2><div>यूजर ने पीयूष के जवाब पर क्रॉस क्वेश्चन किया। लिखा कि सॉरी, इस सफाई का कोई मतलब नहीं है। ये डॉक्यूमेंट फरवरी 2026 का है। अगर ये नियम आज की गाइडलाइन को नहीं दिखाते तो प्लीज नए वाले शेयर कर दीजिए। भले ही यह पुराना डॉक्यूमेंट हो तो उस समय भी इसे क्यों स्वीकार किया जाता था। हिजाब और पगड़ी की इजाजत थी लेकिन बिंदी, सिंदूर और कलावा की नहीं। इसके पीछे क्या लॉजिक था? अपने वकील से कहिए इस तरह का कमजोर स्पष्टीकरण तैयार करने के बजाय बेहतर तरीके से काम करें। इसके बाद इस खबर को रिकॉर्ड किए जाने तक पीयूष का कोई जवाब सामने नहीं आया।</div><div>हिंदी में <a href="https://www.prabhasakshi.com/mri">समाचार विश्लेषण</a> के लिए यहाँ क्लिक करें</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 17 Apr 2026 13:30:29 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/what-is-the-controversy-surrounding-lenskart-viral-document</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[Trump का 'धर्मयुद्ध', ईरान के लिए US प्रेसिडेंट से क्यों भिड़ गए पोप]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/trump-holy-war-why-did-the-pope-clash-with-us-president-over-iran]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>ईरान के साथ जारी तनाव के बीच डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन इस जंग को एक 'धर्म युद्ध' की तरह पेश कर रहा है, जिसमें ट्रम्प को एक मसीहा के रूप में दिखाया जा रहा है। अमेरिकी सेना के अंदर से ऐसी खबरें आ रही हैं कि कमांडर्स सैनिकों को युद्ध के लिए तैयार करने हेतु बाइबल और 'दुनिया के अंत' जैसी धार्मिक बातों का सहारा ले रहे हैं। जहाँ एक तरफ व्हाइट हाउस में पास्टर्स ट्रंप की शक्ति के लिए प्रार्थना कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ कैथोलिक धर्मगुरु पोप लियो ने इस युद्ध को नेताओं का अहंकार बताकर इसकी कड़ी निंदा की है। इस वैचारिक मतभेद के कारण ट्रंप और पोप के बीच जुबानी जंग भी तेज हो गई है, जिससे यह पूरा संघर्ष अब राजनीति से हटकर धर्म के केंद्र पर आ टिका है। यह स्थिति दिखाती है कि कैसे आधुनिक युद्ध को धार्मिक कट्टरता और 'आर्मागडन' जैसी प्राचीन मान्यताओं से जोड़ा जा रहा है। डोनाल्ड ट्रंप की वो ट्रुथ सोशल वाली पोस्ट जिसमें उन्होंने खुद को एक मसीहा की तरह दिखाया।&nbsp; प्रेयर्स में कहा गया हम आपकी यानी ईश्वर की कृपा और हमारे सैनिकों की सुरक्षा के लिए प्रार्थना करते हैं और हमारी सशस्त्र सेनाओं में सेवा दे रहे हमारे सारे पुरुषों और महिलाओं के लिए भी हे परमपिता ईश्वर हम प्रार्थना करते हैं कि आप हमारे राष्ट्रपति ट्रम्प को वो ताकत देते रहे जिसकी उन्हें जरूरत है ताकि वो हमारे महान राष्ट्र का नेतृत्व कर सकें। ओवल ऑफिस से शायद ही पहले किसी युद्ध के बीच इस तरह का वीडियो पब्लिक डोमेन में आया हो। जैसा ट्रंप के लिए प्रार्थना का वीडियो ईरान से जंग के बीच आया।&nbsp;</div><h2>मुस्लिम मुल्क के खिलाफ जंग में अलग नैरेटिव गढ़ने की कोशिश&nbsp;</h2><div>द गार्डियन की रिपोर्ट में लिखा है अमेरिकी सेना के सैन्य कमांडर्स ईरान वॉर में शामिल होने को सही ठहराने के लिए सैनिकों के सामने बाइबल के एंड टाइम्स यानी दुनिया के अंत से जुड़ी कट्टर ईसाई बयानबाजी का इस्तेमाल कर रहे हैं। एक निगरानी संस्था के पास आई शिकायतों में यह आरोप कमांडर्स पर लगाया गया है। संगठन का नाम मिलिट्री रिलीजियस फ्रीडम फाउंडेशन यानी एमआरएफएफ है। एमआरएफएफ का कहना है कि उसे यूएस आर्म्ड फोर्सेस के अलग-अलग हिस्सों से 200 से ज्यादा शिकायतें मिली हैं। जिनमें मरींस, एयर फोर्स और स्पेस फोर्स के सदस्य भी शामिल हैं। इसमें यूएस मिलिट्री के एक नॉन कमिश्ंड ऑफिसर यानी एनसीओ के हवाले से बड़ा आरोप लगाया गया। एनसीओ ने अपनी शिकायत में बताया हमसे कहा गया है कि प्रेसिडेंट ट्रंप को जीसस ने ईरान में सिग्नल फायर जलाने के लिए चुना है ताकि आर्मागडन हो और धरती पर उनकी यानी ईसा मसीह की वापसी हो। इसके अलावा जब धार्मिक प्रभाव को लेकर अमेरिकी रक्षा मंत्रालय से सवाल किया जाता है तो सोर्सेज और समर्थक जवाब देते हैं। जंग में तो हमेशा से ही धर्म और आस्था के जरिए फौजियों का हौसला बढ़ाया जाता रहा है। इसी तरह धार्मिक कट्टरपंथी के आरोप अमेरिकी रक्षा मंत्रालय के अगवा यूएस डिफेंस सेक्रेटरी पीट हेग्ज़ेथ पर भी लगते रहे हैं। रिलीजियस एक्सट्रीमिज्म के स्कॉलर मैथ्यू डी टेलर ने इस बारे में कहा पीट हेगथ की लीडरशिप में अमेरिका जानबूझकर एक मुस्लिम मुल्क के खिलाफ जंग में जा रहा है। ये उसी तरह की सिचुएशन है जिसके बारे में मेरे जैसे लोग इलेक्शन और पीठ के अपॉइंटमेंट से पहले से ही वार्म करते आ रहे हैं। इससे पहले रक्षा मंत्री पीट हेक्सेथ ये भी कह चुके हैं कि यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ अमेरिका एक क्रिश्चियन देश है और वही हमारा देश आज भी फॉलो करता है। इसके अलावा एक और शब्द पर गौर कीजिए। आर्मागडन जिसका जिक्र यूएस के नॉन कमिश्नंड ऑफिसर ने अपनी शिकायत में किया था। यह शब्द ईसाई धार्मिक ग्रंथ बाइबल से आता है। बाइबल में आर्मागडन का मतलब उस आखिरी जंग से है जो बुराई और अच्छाई के बीच होगी। अब इसी शब्द का इस्तेमाल अमेरिका में ईरान के खिलाफ जंग के लिए किया जा रहा है।</div><h2>धर्म युद्ध की तरह ईरान वॉर को दिखाने की कोशिश</h2><div>अमेरिकन अथॉरिटीज या तो इसे एक धर्म युद्ध की तरह खुद देख रही है या फिर दिखाने की कोशिश कर रही हैं। लेकिन अगर कैथोलिक क्रिश्चियन के सबसे बड़े धर्मगुरु पोप लियो की बातों पर गौर करें तो वो साफ-साफ इस युद्ध के खिलाफ हैं। यही वजह है कि डॉनल्ड ट्रंप और उनका प्रशासन खुले शब्दों में पोप लियो के खिलाफ बोल रहा है। इस तकरार की शुरुआत पहले ही हो चुकी थी लेकिन 11 अप्रैल को ये एक बड़े स्तर पर पहुंच गई। तब पोप लियो ने एकदम कड़े शब्दों में कहा कि ईरान के खिलाफ अमेरिका और इजराइल की जंग सर्वशक्तिमान होने के भ्रम की वजह से बढ़ाई जा रही है। ट्रंप की ओर इशारा था शायद और उन्होंने इस सोच की निंदा की। साथ ही पोप लियो ने अमेरिकी नेताओं से जंग रोकने और शांति के लिए बातचीत का रास्ता अपनाने की मांग की।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/putin-will-come-to-india-for-the-brics-summit-modi-will-go-to-russia" target="_blank">BRICS Summit के लिए Putin आएंगे India, Modi जाएँगे Russia, दोनों पक्के दोस्त मिलकर बदलेंगे वैश्विक समीकरण!</a></h3><h2>हथियार नहीं इंसाफ और करुणा से ही आएगी शांति</h2><div>पोप लियो XIV ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट करते हुए कहा कि दुनिया को युद्ध और हिंसा की सोच से बाहर निकलना होगा। उन्होंने जोर देकर कहा कि आज दुनिया को जो संदेश सुनने की जरूरत है”, वह शांति और संवाद का है। कैमरून की यात्रा पर रवाना लियो ने पोप के विशेष विमान में संवाददाताओं से बातचीत में यह टिप्पणी की। हालांकि, उन्होंने न तो ट्रंप के हालिया सोशल मीडिया पोस्ट का जिक्र किया और न ही अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के इस सुझाव का कि पोप को धर्मशास्त्र के बारे में बोलते समय “सावधानी बरतनी चाहिए।” लियो ने सवालों के जवाब देने से भी परहेज किया। इसके बजाय उन्होंने अल्जीरिया की अपनी यात्रा और हिप्पो के संत ऑगस्टीन की शिक्षाओं के बारे में बात की, जो उनके आध्यात्मिक प्रेरणास्रोत थे। हालांकि, लियो ने कुछ ऐसी टिप्पणियां भी कीं, जिनसे संकेत मिलता है कि उन्होंने ईरान युद्ध को लेकर शांति की अपनी अपील को लेकर ट्रंप प्रशासन की ओर से की गई आलोचनाओं को नजरअंदाज नहीं किया है। ट्रंप ने पिछले कुछ दिनों में पोप पर लगातार तीखे हमले किए हैं। उन्होंने लियो पर अपराध के खिलाफ कमजोर रुख अपनाने और वामपंथियों के प्रभाव में होने का आरोप लगाया है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/multi-million-dollar-us-drone-destroyed-in-the-strait-of-hormuz" target="_blank">जिसे बताया लापता, उसे ईरान ने ठोका, होर्मुज में करोड़ों का US ड्रोन स्वाहा</a></h3><h2>ट्रंप ने पोप के रुख को बताया वास्तविकता से दूर</h2><div>डोनाल्ड ट्रंप ने पोप के इस रुख पर कड़ी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने दावा किया कि ईरान ने हाल के महीनों में हजारों निहत्थे प्रदर्शनकारियों को मार दिया है और ऐसे देश को परमाणु हथियार हासिल करने देना पूरी तरह अस्वीकार्य है। ल ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रूथ सोशल पर पोप की टिप्पणी की आलोचना करते हुए कहा कि पोप का रुख वास्तविकता से दूर है। ट्रंप ने पहले भी पोप की आलोचना करते हुए उन्हें कमजोर बताया था और माफी मांगने से साफ इनकार कर दिया था। उन्होंने कहा कि वे पोप की राय से सहमत नहीं हैं और अपनी नीतियों पर कायम रहेंगे।</div><div>&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 16 Apr 2026 17:40:55 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/trump-holy-war-why-did-the-pope-clash-with-us-president-over-iran</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[Noida में क्यों हिंसक हुआ कर्मचारियों का प्रोटेस्ट, आंदोलन या साज़िश?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/why-did-employees-protest-turn-violent-in-noida]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>पिछले तीन-चार दिन से हम देख रहे हैं कि श्रमिक हड़ताल कर रही हैं। प्रोटेस्ट कर रही हैं। उनकी मांग है कि उनका वेतन बढ़ाया जाए। उनकी मांग है कि ओवरटाइ का उनको पैसा दिया जाए। उनकी मांग है कि उनको वीकली ऑफ दिया जाए और सम्मानित तरीके से उनको काम करने दिया जाए। उनका शोषण ना हो। उनकी सुरक्षा का ध्यान रखा जाए। 13 अप्रैल को सुबह-सुबह यानी अगर आज सुबह का मैं जिक्र करूं तो देखते ही देखते नोएडा के अलग-अलग क्षेत्रों में ये जो साइलेंट प्रोटेस्ट चल रहा था, यह अचानक से उग्र हो गया। कितना उग्र हो गया? गाड़ियां जला दी गई। जो तस्वीरें सामने आई है उसको देखने के बाद अंदाजा लगाया जा सकता है। जोर-जोर से नारे लगाए जा रहे हैं। यह प्रदर्शन देखते ही देखते उग्र हो गया। जो लोग अपने ऑफिसों के लिए निकले थे वो अपने ऑफिस नहीं जा पाए। पुलिस बल वहां पर तैनात कर दिया गया और स्थिति को कुछ ऐसा दिखाने की कोशिश की गई कि सब कुछ आउट ऑफ कंट्रोल है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/after-noida-now-it-delhi-turn-imd-issues-yellow-alert-increased-risk-of-heavy-rain-thunderstorms" target="_blank">Noida के बाद अब Delhi की बारी? IMD का Yellow Alert, तेज आंधी-पानी का बढ़ा खतरा</a></h3><h2>कर्मचारियों की जो प्रमुख मांगे हैं&nbsp;</h2><div>प्रदर्शनकारी लंबे समय से वेतन वृद्धि और कामकाज की जो परिस्थितियां है उसमें सुधार करने की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि महंगाई के दौर में मौजूदा वेतन पर्याप्त नहीं है जिससे उनका जीवन यापन प्रभावित हो रहा है। कर्मचारियों की जो प्रमुख मांगे हैं उसमें मिनिमम जो सैलरी है वह 13,000 से बढ़ाकर 20,000 करने को कहा गया है। साथ ही साथ ओवरटाइ का पेमेंट किया जाए और छुट्टियों के लिए अलग से प्रोविजन को शामिल किया जाए। यह उनकी प्रमुख मांगे हैं। व स्थिति बिगड़ने पर पुलिस और प्रशासन जो है वह हरकत में आया। मौके पर भारी पुलिस बल को तैनात कर दिया गया है और प्रदर्शनकारियों को शांत करने की कोशिश की गई। हालांकि जब भीड़ काबू से बाहर होती नजर आई तो पुलिस ने हल्का बल प्रयोग करके भीड़ को तितर-बितर किया। इस दौरान आंसू गैस के गोले का भी इस्तेमाल किया गया। कई स्थानों पर हालात धीरे-धीरे अब सामान्य होने लगे हैं। लेकिन तनाव अब भी बना हुआ है। एक दिन पहले जिला प्रशासन, पुलिस और प्राधिकरण के अधिकारियों ने कर्मचारियों के जो प्रतिनिधि हैं उनके साथ एक मीटिंग की थी। इस मीटिंग में उनकी मांगों पर विचार करने और समाधान निकालने का आश्वासन दिया गया था। इसके बावजूद भी कर्मचारियों का गुस्सा शांत नहीं हुआ और आंदोलन ने उग्र रूप ले लिया। फिलहाल प्रशासन स्थिति पर नजर बनाए हुए है और लोगों से शांति बनाए रखने की अपील की जा रही है। अधिकारी का कहना है कि किसी भी प्रकार की हिंसा बर्दाश्त नहीं की जाएगी और दोषियों के खिलाफ सख्त कारवाई की जाएगी।</div><h2>प्रशासन ने की शांति की अपील</h2><div>इससे पहले 12 अप्रैल को गौतम बुद्ध नगर की डीएम मेधा रूपम ने नोएडा प्राधिकरण में एक मीटिंग ली थी जिसमें प्रमुख सचिव श्रम और यूपी के जो लेबर कमिश्नर हैं वह भी इसमें वर्चुअली शामिल हुए थे। इस मीटिंग में जो कर्मचारी हैं उनके हितों की सुरक्षा, ओवरटाइ का दुगना भुगतान, बोनस, वीकली ऑफ और वर्क बेस, सेफ्टी और सिक्योरिटी को लेकर बातचीत की गई थी। इसके बाद कर्मचारियों से अपील करते हुए डीएम मेधा रूपम ने एक वीडियो भी पोस्ट किया था। आपको सुनवाते हैं। सभी श्रमिक भाई बहनों से यह मेरी अपील है कि आप सब शांति पूर्वक अपने अपने कार्यस्थल पर जाएं और कार्य करें। साथ में आपसे यह भी अपील है कि जिले का सौहार्द बनाए रखें व कानून व्यवस्था भी बनाए रखें। इसके साथ-साथ आपसे यह भी अपील है कि किसी भी प्रकार की अफवाहों से प्रभावित नहीं हो। हालांकि प्रशासन के आश्वासन के बाद भी नोएडा में कर्मचारियों की मांगे अब भी बरकरार हैं। अभी भी कोई समाधान नहीं निकला है। जिसकी वजह से सोमवार को यह जो प्रोटेस्ट है वो हिंसक हो गया और आगजनी जगह-जगह की गई है। इससे पहले हरियाणा के गुरुग्राम में भी आधा दर्जन से ज्यादा कंपनियों के जो कर्मचारी हैं प्राइवेट कंपनी उनके कर्मचारियों ने अपनी मांगों को लेकर हड़ताल की थी। बाद में हरियाणा सरकार की तरफ से मिनिमम वेतन या जो कि मिनिमम वेजेस होते हैं उनकी दरों में करीब 35% का इजाफा करने की बात कही गई थी जो कि 1 अप्रैल से एप्लीकेबल होगा। इसके तहत अनस्किल्ड वर्कर का वेतन ₹11,275 से बढ़ाकर ₹15,220 किया गया। सेमी स्किल्ड वर्कर का वेतन ₹12,430 से बढ़ाकर ₹16,780, स्किल्ड वर्कर का वेतन ₹13,704 से बढ़ाकर ₹18,500 और हाईली स्किल्ड वर्कर का वेतन ₹14,389 से बढ़ाकर ₹19,425 करने की बात कही। यही मांग नोएडा में भी जो कर्मचारी हैं, वह कर रहे हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/cm-yogi-said-on-the-violent-protests-in-noida" target="_blank">Prabhasakshi NewsRoom: Noida में उग्र प्रदर्शन पर बोले CM Yogi, 'श्रमिकों को उनका अधिकार मिलना चाहिए मगर अराजकता बर्दाश्त नहीं होगी'</a></h3><h2>श्रमिकों का वेतन को लेकर योगी का ऐलान</h2><div>औद्योगिक इकाइयों में कार्यरत श्रमिकों को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने समय पर और सम्मानजनक पैसे देने के निर्देश दिए हैं। शनिवार देर शाम आयोजित उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक में मुख्यमंत्री ने प्रदेश के कुछ औद्योगिक क्षेत्रों में श्रमिकों के बीच उभर रहे असंतोष और हालिया प्रदर्शनों का संज्ञान लिया। उन्होंने निर्देश दिए कि सभी औद्योगिक विकास प्राधिकरण अगले 24 घंटे के भीतर औद्योगिक संगठनों, उद्योग प्रतिनिधियों और इकाई प्रबंधन से सीधा संवाद स्थापित करें और समस्याओं का समाधान संवाद के माध्यम से प्राथमिकता पर सुनिश्चित करें। साथ ही उन्होंने सुरक्षा, सम्मान और अधिकारों को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए सभी जनपदों में श्रम कानूनों का पालन सुनिश्चित कराने के निर्देश दिए । उन्होंने स्पष्ट कहा कि प्रत्येक श्रमिक को सुरक्षित, सम्मानजनक और मानवीय कार्य वातावरणमिलना चाहिए। उनके अधिकारों से किसी भी प्रकार का समझौता स्वीकार्य नहीं होगा। कार्यस्थल पर सुरक्षित वातावरण, स्वच्छ पेयजल, शौचालय, विश्रामगृह, स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराना प्रत्येक औद्योगिक इकाई की अनिवार्य जिम्मेदारी है।&nbsp; योगी जी ने यहां तक कहा है कि भाई सारे कंपनियों के प्रतिनिधियों के साथ बैठक की थी और ये कहा था कि आप अपने यहां वर्क आवर कम कीजिए। लेबर लॉस का पालन कीजिए। यह सब हुआ है। उसके बाद ये प्रोटेस्ट शुरू हुआ।&nbsp;<span style="font-size: 1rem;">&nbsp;</span></div><h2>नोएडा आंदोलन पर क्या बोले अखिलेश</h2><div>समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने मेरठ के सेंट्रल मार्केट में हो रही तोड़फोड़ के साथ आंदोलन और नोएडा में श्रमिकों की हिंसा को लेकर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और सरकार पर बड़ा हमला बोला है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार सिर्फ पूंजीपतियों का पोषण कर रही है और श्रमिकों, छोटे व्यापारियों का शोषण कर रही है। अखिलेश यादव ने कहा कि भाजपा का 'भ्रष्टाचार का पेट सुरसा के मुंह जैसा है' और जो व्यापारी आज भाजपा के साथ खड़े हैं, वे भी जल्द ही इनकी गलत नीतियों का शिकार बनेंगे। अखिलेश यादव ने 1857 की क्रांति का जिक्र करते हुए कहा कि मेरठ एक बार फिर इतिहास दोहराएगा। कहा कि 1857 के बाद अब मेरठ से एक और स्वतंत्रता आंदोलन जन्मेगा, जो आज के साम्राज्यवादी सत्ताधारी गिरोह के खिलाफ होगा। सपा प्रमुख ने आरोप लगाया कि भाजपा ने पहले काले कानूनों से खेती-किसानी खत्म करने की कोशिश की और अब मल्टीनेशनल कंपनियों के इशारे पर भारत का परंपरागत व्यापार खत्म कर रही है ताकि अर्थव्यवस्था पर चंद खरबपतियों का कब्जा हो जाए।&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 13 Apr 2026 15:23:52 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/why-did-employees-protest-turn-violent-in-noida</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[जहां से हुआ था भारत पर कब्जा, ट्रेड रूट बंद करना था कारण, Strait of Hormuz की ये कहानी क्या आपको पता है?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/place-from-where-india-was-conquered-do-you-know-story-of-strait-of-hormuz]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>ईरान अब स्टेट ऑफ हॉर्मोस के मैनेजमेंट को नए स्तर पर ले जाएगा। ईरान के पूर्व सुप्रीम लीडर आयतुल्ला अली खामिनई की मौत के बाद देश में 40 दिनों का शोक था। 9 अप्रैल को 40 दिन पूरे हुए और इसी दिन नए सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई का मैसेज टीवी पर ब्रॉडकास्ट हुआ। उन्होंने यह साफ किया है कि स्टेट ऑफ हॉर्मोस का मैनेजमेंट अब नई तरह से होगा और यह बदलाव खुद ईरान करेगा। मुस्तफा खामेनई के इस मैसेज से पहले भी ईरान इस बात का संकेत दे चुका है कि स्टेट ऑफ हॉर्मोस अब पहले जैसा नहीं होगा। नए स्टेटमेंट से यह और भी क्लियर हो चुका है कि ईरान अब कंट्रोल के साथ-साथ उसका मैनेजमेंट भी बहुत मजबूत करने वाला है। इसकी तैयारी में है। यह भी आशंका जताई जा रही है कि ईरान स्टेट ऑफ हॉर्मोस को लेकर और कड़े प्रतिबंध जारी कर सकता है। मोजतबा ने ईरान की जनता से एकजुट रहने और ऐसे मीडिया आउटलेट से दूर रहने की सलाह दी है जो अमेरिका या इजराइल को सपोर्ट करते दिखे। उन्होंने कहा, भले ही 40 दिनों का शोक पूरा हो गया है, लेकिन दुश्मन से बदला लेने का जज्बा खत्म नहीं होना चाहिए। ईरान जंग नहीं चाहता, लेकिन वह अपने अधिकारों को नहीं छोड़ेगा। ईरान अपने मरहूम सुप्रीम लीडर अली खामिनई और अपने शहीदों का बदला लेने के लिए पक्का इरादा रखता है। ईरान अभी भी अपने साउथ के पड़ोसियों से एक सही रिएक्शन का इंतजार कर रहा है ताकि वह अपना भाईचारा दिखा सके।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/pakistan-is-beaten-between-america-and-iran" target="_blank">America Iran के बीच पिटा पाकिस्तान, अब इजरायल करेगा हमला</a></h3><h2>केप ऑफ गुड होप को पार करके भारत के तट पर पहुंचा जहाज</h2><div>साल 1498 वास्कोडि गामा अपने जहाजों के साथ भारत के तट पर पहुंचे। कालीकट जो आज केरल में कोजीकोट है। यह पहली बार था कि कोई यूरोपियन समुद्री रास्ते से भारत पहुंचा था। अफ्रीका केप ऑफ गुड होप को पार करते हुए उस जमाने में भारत से आने वाले मसाले यूरोप में सोने जितने कीमती थे। काली मिर्च, लौंग, दालचीनी, जायफल यह सब चीजें भारत से अरब व्यापारियों के जरिए जमीनी रास्ते से पहले फारस की खाड़ी या लाल सागर तक जाती थी। फिर वहां से मिस्र और इटली के वेनिस शहर तक। वेनिस के व्यापारी इन मसालों को पूरे यूरोप में बेचते थे। इस पूरी सप्लाई चेन में अरब व्यापारी और वेनिस के सौदागर बिचोलिए थे और यह बिचोलिए इतना मुनाफा कमाते थे कि जब तक मसाले यूरोप पहुंचते उनकी कीमत कई गुना बढ़ चुकी होती थी। वास्कोडिगामा की यात्रा ने पुर्तगाल की राजधानी लिसबन को एक आईडिया दिया। लिसबन को यह समझ आ गया कि अगर वह समुद्री रास्ते पर कंट्रोल कर ले तो बिचौलियों को काटकर सीधे मसालों का व्यापार किया जा सकता है। और इसके लिए उसे जमीन पर राज करने की जरूरत भी नहीं है। बस समुद्र के कुछ अहम ठिकानों पर कब्ज़ा चाहिए था।&nbsp;</div><h2>तीनों जगह समुद्री रास्तों पर कंट्रोल</h2><div>पुर्तगाल के राजा मैनुअल ने 1505 में एक प्लान बनाया और इस प्लान में तीन जगहें थी। पहला अदन जो लाल सागर के मुहाने पर है ताकि मिस्र और अलेक्जेंड्रिया जाने वाले व्यापार को रोका जा सके। दूसरा था होर्मुज जो फारस की खाड़ी के मुहाने पर है ताकि बैरूद और फारस जाने वाला रास्ता बंद हो और तीसरा मलक्का जो आज के मलेशिया में है ताकि चीन के साथ होने वाले व्यापार पर कंट्रोल हो सके। तीनों जगह समुद्री रास्तों के चोक पॉइंट थी। मतलब ऐसे तंग रास्ते जहां से होकर गुजरे बिना कोई जहाज आगे नहीं जा सकता। इन तीनों पर कब्जा करो तो हिंद महासागर का पूरा व्यापार तुम्हारे हाथ में। और इन तीनों में सबसे अहम था होर्मुज। होर्मुज एक छोटा सा टापू है फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी के बीच। आज यह ईरान का हिस्सा है। लेकिन उस जमाने में यह एक अलग छोटी सी सल्तनत थी जिसका अपना राजा था। यह राजा सफाविद ईरान के शाह इस्माइल को टैक्स देता था। हॉर्मूस उस वक्त दुनिया के सबसे अमीर व्यापारिक ठिकानों में से एक था और एक फारसी कहावत थी कि अगर दुनिया एक अंगूठी है तो होर्मुज उसमें जड़ा हीरा है और इसकी वजह भी थी कि यहां से बहुत सारी चीजें गुजरती थी। भारत से आने वाले मसाले, कपड़े, इंडोनेशिया से आने वाली लौंग और जायफल, फारस से जाने वाला रेशम, बहरीन से आने वाली मोती और सबसे जरूरी अरब और फारस से भारत जाने वाले युद्ध के घोड़े। यह घोड़े वाला हिस्सा बहुत अहम है क्योंकि इसका संबंध सीधे भारत से है। उस जमाने में भारत के दक्कन में कई सल्तनतें थी। बहमनी सल्तनत जो बाद में पांच छोटी सल्तनतों में बंट गई और विजयनगर साम्राज्य इन सबको लड़ाई के लिए अच्छी नस्ल के घोड़े चाहिए थे। भारत में जो देसी नस्ल के घोड़े मिलते थे, वह दक्कन की भीषण गर्मी में भारी भक्तबंद सिपाही को लेकर ज्यादा देर तक नहीं दौड़ सकते थे। अरबी और फारसी घोड़े इस काम के लिए कहीं बेहतर थे। तो भारत के राजा भारी कीमत देकर अरब और फारस से घोड़े मंगाते थे। पुर्तगाली व्यापारी नूनीस ने लिखा है कि 16वीं सदी के पहले हिस्से में विजयनगर का राजा हर साल होर्मुज के रास्ते से करीब 13,000 घोड़े इंपोर्ट करता था।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/russia-makes-a-strong-offer-to-india-ready-to-give-a-huge-discount-on-lng" target="_blank">भारत को रूस ने दिया तगड़ा ऑफर, LNG पर बंपर छूट देने को तैयार !</a></h3><h2>पुर्तगालियों ने हॉर्मूज पर करीब 107 साल राज किया</h2><div>पुर्तगालियों ने हॉर्मूज पर सीधा राज नहीं किया। लोकल राजा अपनी जगह बना रहा लेकिन असली कंट्रोल पुर्तगालियों के पास था। राजा को टैक्स देना होता था। शुरू में सालाना सोने के सिक्के दिए जाते थे। बाद में पुर्तगालियों ने पूरी कस्टम ड्यूटी ही अपने हाथ में ले ली और सबसे अहम चीज थी कार्तताज़ सिस्टम। कार्तताज़ एक तरह का लाइसेंस था या यूं कहें कि समुद्री पासपोर्ट। हिंद महासागर में कोई भी जहाज चलाना हो तो उसे पुर्तगालियों से यह कारतताज़ लेना पड़ता था। । पुर्तगालियों ने हॉर्मूस पर करीब 107 साल राज किया। लेकिन धीरे-धीरे उनकी पकड़ कमजोर होती गई। एक तरफ ऑटोमन साम्राज्य ने&nbsp; में हॉर्मूस पर हमला किया। हालांकि वह हमला नाकाम रहा। दूसरी तरफ सफाविद ईरान के शाह अब्बास जो 1588 से 1629 तक सत्ता में रहे उन्होंने पुर्तगालियों से बहुत नाराजगी रखी। 1615 में बंदर आवास जो हॉर्मूस के सामने सामुद्रिक तट पर था वो भी ले लिया गया। लेकिन हॉर्मूस लेने के लिए शाह अब्बास को नेवी चाहिए थी और सफावेद ईरान के पास मजबूत नेवी नहीं थी। यही एंट्री होती है ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की। अंग्रेज उस वक्त फारस के रेशम के व्यापार में दिलचस्पी रखते थे।</div><h2>भारत की सैन्य ताकत की सप्लाई लाइन</h2><div>होर्मुज सिर्फ मसालों का रास्ता नहीं था। यह भारत की सैन्य ताकत की सप्लाई लाइन भी थी। जो भी हॉर्मोंस को कंट्रोल करेगा वो भारत जाने वाले घोड़ों को भी कंट्रोल कर सकता था। मसालों को भी, रेशम को भी और सोना चांदी के फ्लो को भी। पुर्तगालियों ने यह बात बहुत अच्छे से समझ ली थी और साल 1507 जुलाई का महीना आया। अफोंसो द अल्बुकरर्क नाम का एक पुर्तगाली जनरल छह जहाजों और 500 सिपाहियों के साथ हॉर्मूस की तरफ निकला। अल्बुकरर्क एक तजुर्बेकार फौजी था जिसने अपनी जिंदगी के 10 साल उत्तरी अफ्रीका में मुस्लिमों के खिलाफ लड़ते हुए बिताए थे। होर्मुज पहुंचने से पहले उसने ओमान के तट पर कई शहरों को लूटा। कुरयात, मस्कट, सुहार सब पर हमला किया। कुछ ने हार मान ली, कुछ ने लड़ाई की, लेकिन नतीजा एक ही रहा। सितंबर 1507 में अल्बुकरर्क हॉर्मूस पहुंचा। गोवा को लेकर अल्बूकर्क ने पुर्तगालियों का मुख्यालय बनाया जिसे अस्तादो द इंडिया कहा गया यानी पुर्तगाली भारत की राजधानी। 1511 में उसने मलक्का पर कब्जा किया जो दक्षिण पूर्व एशिया का सबसे बड़ा व्यापारिक बंदरगाह था। 500 साल पहले पुर्तगालियों ने हॉर्मूस इसलिए लिया क्योंकि भारत का व्यापार यहीं से गुजरता था। आज भी भारत अपने तेल का बड़ा हिस्सा फारस की खाड़ी से इंपोर्ट करता है। हॉर्मोस बंद होने का मतलब है भारत की एनर्जी सप्लाई पर सीधा असर।&nbsp;</div><h2>होर्मुज पर ईरान का नया प्लान क्या है?</h2><div>शुरुआत में तो यह जंग ईरान के लिए सर्वाइवल की लड़ाई थी। लेकिन अब ईरान इसे एक बड़े मौके की तरह देख रहा है। यही वजह है कि ईरान अब स्टेट ऑफ हॉर्मोस पर अपना दबदबा बढ़ाकर इसका फायदा उठाना चाहता है। इस हफ्ते पाकिस्तान में ईरान और अमेरिका के बीच बातचीत होने वाली है। लेकिन दोनों देशों के बीच भरोसे की भारी कमी है। ईरान का मानना है कि पहले ही दिन इजराइल ने शर्तों को तोड़ दिया। अमेरिका अब यह कह रहा है कि ईरान यूरेनियम इनरचमेंट नहीं कर सकता। जबकि ईरान के प्रपोजल में ऐसा कुछ भी नहीं था। 10 अप्रैल को दोनों पक्ष पाकिस्तान में होंगे। परमानेंट सीज फायर और डील पर बात होगी। वाइट हाउस ने यह कंफर्म कर दिया है कि अमेरिका की तरफ से वाइस प्रेसिडेंट जेडी वंस मिडिल ईस्ट में अमेरिका के राजदूत स्टीवट कॉफ और ट्रंप के दामाद जेरिट कुशनर होंगे। ईरान की तरफ से संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बागेर कालबा का नाम सामने आ रहा है। इस मीटिंग को पाकिस्तान होस्ट कर रहा है। पाकिस्तान के मीडिएटर होने पर भी कई वजह गिनाई जा रही हैं। जैसे वो ईरान के साथ 900 कि.मी. सीमा शेयर करता है। ईरान के बाद दुनिया भर में सबसे ज्यादा शिया मुस्लिम जो है वो पाकिस्तान में रहते हैं। पाकिस्तान में अमेरिका का कोई मिलिट्री बेस नहीं है जो ईरान के लिए ट्रेडिबल स्पेस बताया जा रहा है।&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 10 Apr 2026 13:40:53 +0530</pubDate>
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      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[अमेरिका के लिए ईरान से अहम ये छोटा देश, शांतिवार्ता छोड़ जहां प्रचार करने पहुंचे वेंस, इस चुनाव पर रूस-EU दोनों की नजर]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/small-nation-holds-greater-significance-for-the-us-than-iran]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>अमेरिका के उपराष्ट्रपति जे डी वांस हंगरी पहुंचे हैं, जहां जल्द ही बड़ा चुनाव होने वाला है। वे वहां के प्रधानमंत्री विक्टर ऑर्बान का समर्थन करने गए हैं। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उनकी टीम चाहते हैं कि ऑर्बान चुनाव क्योंकि वे उनकी सोच, राष्ट्रवाद, सख्त इमीग्रेशन&nbsp; और पारंपरिक मूल्यों के करीब है। विक्टर ऑर्बान, ने 2010 से सत्ता में है और मजबूत नेता माने जाते है। पीटर माज्यार, जो पहले ऑर्बान के करीबी थे, पर अब उनके खिलाफ खड़े हैं। मैग्यार के मुद्दे पर जनका का समर्थन जुटा रहे हैं। हंगरी का चुनाव न केवल उस देश के लिए, बल्कि पूरे यूरोप और वैश्विक राजनीति के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। प्रधानमंत्री विक्टर ओर्बान की नीतियों के कारण हंगरी का यूरोपीय संघ (EU) के साथ अक्सर टकराव रहता है। उन पर लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने का आरोप है, जिसकी वजह से EU ने हंगरी की अरबों डॉलर की फंडिंग रोक दी है। यदि चुनाव के बाद वहां सत्ता परिवर्तन होता है, तो हंगरी और यूरोप के संबंधों में नई गर्माहट आ सकती है और रुकी हुई आर्थिक मदद मिलने का रास्ता साफ हो सकता है, जिससे पूरे यूरोप की एकता मजबूत होगी।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/mri/amidst-us-iran-conflict-will-china-now-rule-the-world-with-a-5-star-strategy" target="_blank">कभी कुछ न करके भी देखो...अमेरिका-ईरान युद्ध के बीच 5 Star स्ट्रैटर्जी से अब चीन दुनिया पर राज करेगा?</a></h3><h2>नाटो और ईयू दोनों का सदस्य है हंगरी</h2><div>रूस-यूक्रेन युद्ध के नजरिए से भी यह चुनाव काफी अहमियत रखता है। हंगरी, जो कि नाटो और ईयू दोनों का सदस्य है, ओर्बान के नेतृत्व में रूस के प्रति थोड़ा नरम रुख अपनाता रहा है। उन्होंने कई बार यूक्रेन को दी जाने वाली सैन्य मदद और रूस पर लगाए जाने वाले प्रतिबंधों में अड़ंगा डाला है। ऐसे में चुनाव का परिणाम यह तय करेगा कि भविष्य में यूक्रेन को मिलने वाली यूरोपीय मदद कितनी आसान होगी। अगर नई सरकार आती है, तो हंगरी का झुकाव पूरी तरह पश्चिम की ओर हो सकता है, जो रूस के लिए एक कूटनीतिक झटका होगा।</div><h2>ट्रंप क्यों चाहते है ऑर्वान जीतें?</h2><div>टूप और उनकी टीम मानती है कि ऑर्बान ने एक ऐसा मॉडल बनाया है जिसमें मजबूत नेता, कम इमिग्रेशन और 'नेशनलिस्ट' सोच होती है। वे चाहते हैं कि यूरोप मे ऐसे ही और नेता आएँ। इसलिए अमेरिका (ट्रंप के प्रभाव वाला पक्ष) ऑर्बान को जिताना चाहता है।</div><h2>ऑर्वाच की जीत में रूस</h2><div>रूस भी चाहता है कि ऑर्बान सत्ता में रहे, क्योंकि वे रूस के खिलाफ कड़े कदम (जैसे पाबंदिया) रोकते रहे है। यूक्रेन को मिलने वाली मदद में अड़चन डालते है। रूस के लिए ऑर्बान यूरोप के अंदर एक मजबूत साथी है। वैश्विक स्तर पर हंगरी की राजनीति अब अमेरिका और रूस जैसी बड़ी शक्तियों के बीच शक्ति संतुलन का केंद्र बन गई है। एक तरफ जहां रूस और चीन हंगरी के जरिए यूरोप में अपना प्रभाव बनाए रखना चाहते हैं, वहीं अमेरिका और उसके सहयोगी चाहते हैं कि हंगरी पूरी तरह से लोकतांत्रिक मूल्यों और पश्चिमी गठबंधन का साथ दे। सरल शब्दों में कहें तो, इस चुनाव का नतीजा केवल हंगरी की किस्मत नहीं बदलेगा, बल्कि यह भी तय करेगा कि यूरोप की सुरक्षा और कूटनीति में रूस का हस्तक्षेप कितना कम या ज्यादा होगा।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/mri/china-preparing-to-enter-india-close-friend-country-suddenly-closed-airspace-for-big-plan" target="_blank">ट्रंप ने दिया मौका, भारत के गहरे दोस्त देश में घुसने की तैयारी में चीन, अपना Airspace अचानक इस बड़े प्लान के लिए किया बंद?</a></h3><h2>यूक्रेन और यूरोप क्या चाहते है?</h2><div>यूक्रेन चाहता है कि ऑर्बान हारे, क्योकि वे उसके खिलाफ बोलते रहे है। यूरोपियन यूनियन (EU) भी उनसे परेशान है, क्योंकि ऑर्बान कई फैसलों में रुकावट डालते है। अगर माज्यार जीतते है, तो ईयू और यूक्रेन को राहत मिलेगी।</div><h2>चुनाव में तनाव क्यों है?</h2><div>जासूसी और लीक के आरोप लग रहे है गैस पाइपलाइन के पास विस्फोट जैसी घटनाएं हुई है सरकार और विपक्ष एक-दूसरे पर साजिश के आरोप लगा रहे है। ऑर्बान ने 16 साल में सिस्टम को अपने हिसाब से मजबूत किया है और वे कभी नहीं हारे। अगर वे हारते है और सत्ता छोड़ने से मना करते है, तो बड़ा राजनीतिक संकट हो सकता है। इसलिए यह चुनाव अमेरिका, रूस, यूक्रेन के लिए भी अहम है।</div><div>बहरहाल, चुनाव का नतीजा यह तय करेगा कि हंगरी अपनी लोकतांत्रिक संस्थाओं को सुधारकर EU के साथ तालमेल बिठाएगा या अपनी अलग राह पर चलते हुए गठबंधन में दरार पैदा करेगा। यदि नई सरकार आती है, तो रूस पर प्रतिबंध लगाने और यूक्रेन को सैन्य सहायता देने के यूरोपीय फैसलों में आने वाली बाधाएं खत्म हो सकती हैं। विक्टर ओर्बान के सत्ता में बने रहने से रूस को यूरोप के भीतर एक भरोसेमंद सहयोगी मिलता रहेगा, जबकि सत्ता परिवर्तन मास्को के कूटनीतिक प्रभाव को कमजोर कर देगा। हंगरी का चुनाव यह निर्धारित करेगा कि पश्चिमी सैन्य गठबंधन (NATO) में एकता बनी रहेगी या हंगरी के "रूस-हितैषी" रुख के कारण अमेरिका को अपनी सुरक्षा रणनीति बदलनी पड़ेगी। सत्ता में बदलाव से हंगरी को EU से मिलने वाली अरबों यूरो की रुकी हुई फंडिंग मिल सकती है, जिससे न केवल हंगरी की अर्थव्यवस्था संभलेगी बल्कि पूरे यूरोप की आर्थिक एकजुटता भी बढ़ेगी।</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 09 Apr 2026 13:06:22 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/small-nation-holds-greater-significance-for-the-us-than-iran</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
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      <title><![CDATA[कभी कुछ न करके भी देखो...अमेरिका-ईरान युद्ध के बीच 5 Star स्ट्रैटर्जी से अब चीन दुनिया पर राज करेगा?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/amidst-us-iran-conflict-will-china-now-rule-the-world-with-a-5-star-strategy]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप&nbsp; ने जो डेडलाइन दी थी वो तो गुजर चुकी है। जिस हमले को लेकर उन्होंने दावा किया था वो हमला भी नहीं हुआ। बैकफुट पर वो आ गए हैं और सब की नजरें इस वक्त उन देशों पर टिकी हुई हैं जो देश युद्ध में इनवॉल्व हैं। अमेरिका का क्या रुख होगा? डॉनल्ड ट्रंप अब कौन सा फैसला लेंगे। हर कोई इसी पर नजर गड़ाए हुए हैं। बहरहाल जब डेडलाइन क्रॉस होनी थी आज सुबह 5:30 बजे तक उससे पहले एक बड़ी खबर आई और वो ये कि ईरान के ऑयल अब खारक आइलैंड पर हमला किया गया है। गल्फ कंट्रीज में इस वक्त बवाल मचा हुआ है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को धमकी दी थी कि अगर उसने डील नहीं की और होर्मुज समुद्री मार्ग नहीं खोला तो ईरान पर इतने हमले करेंगे कि वह पाषाण युग में चला जाएगा। लेकिन कुछ ही घंटे बाद अचानक से सीजफायर का ऐलान हो जाता है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/iran-finally-agreed-only-after-china-intervened" target="_blank">China ने मनाया तब जाकर माना ईरान, पाकिस्तान नहीं जिनपिंग के दखल से हुआ सीजफायर</a></h3><h2>कभी कुछ न करके भी देखो</h2><div>आज आपको 2019 में चर्चित हुए एक ऐड की याद दिलाते हैं। इस विज्ञापन में दिखाया गया है कि युवक कैडबरी 5स्टार चॉकलेट बार का आनंद ले रहा है, तभी महिला उससे अपनी छड़ी उठाने के लिए कहती है जो उससे गलती से गिर गई थी, जिस पर वह हां कह देता है लेकिन कुछ नहीं करता। फिर बुजुर्ग महिला छड़ी उठाने के लिए उठती है। ठीक उसी क्षण, एक विशाल पियानो उस बेंच पर गिरता है जहाँ वह कुछ देर पहले बैठी थी। इसके बाद वह युवक को धन्यवाद देती है कि उसने कुछ नहीं किया, क्योंकि इसी वजह से उसकी जान बच गई। विज्ञापन चॉकलेट उत्पाद की नई टैगलाइन के साथ समाप्त होता है- कभी कुछ न करके भी देखो&nbsp; और 5 स्टार खाओ। कुछ मत करो। ऐसा ही कुछ नजारा इन दिनों एक देश और उसके राष्ट्रपति के साथ मैच कर रहा है। न उस देश ने अपनी फौज उतारी, न कोई बमबारी की और न ही कोई बड़ा बयान देकर फालतू का हो हल्ला मचाया। दुनिया ईरान के मामले में उलझी रही, लेकिन चीन ने चालाकी से किनारे होकर ईरान से सस्ते दाम पर तेल खरीदना जारी रखा। सच तो यह है कि अगर कोई एक देश है जिसने खुद को इस लड़ाई-झगड़े से पूरी तरह दूर रखा है, तो वो चीन ही है। चीन की इसी चुपचाप बैठकर तमाशा देखो वाली नीति की आजकल पूरी दुनिया में चर्चा हो रही है। मशहूर मैगजीन द इकोनॉमिस्ट ने तो इसे अपने कवर पेज पर छापा है। उन्होंने चीन की इस चाल को एक पुरानी कहावत के जरिए समझाया है: जब आपका दुश्मन खुद अपनी बर्बादी का रास्ता चुन रहा हो या गलती कर रहा हो, तो उसे टोककर उसकी गलती सुधारने की कोशिश कभी मत करो। चीन बस वही कर रहा है। दूसरों को उलझते देख रहा है और खुद चुपचाप अपना फायदा निकाल रहा है।</div><h2>जिनपिंग ने खुलकर कुछ नहीं बोला</h2><div>जब मिडिल ईस्ट में अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच जंग तेज हुई, तो सबको लगा था कि दुनिया की बड़ी ताकतें भी इसमें कूदेंगी। लेकिन चीन ने खुद को इससे बिल्कुल दूर रखा। उसकी प्रतिक्रिया बहुत ठंडी रही; यहाँ तक कि राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने इस लड़ाई पर सार्वजनिक रूप से एक शब्द भी नहीं कहा। वह बस चुपचाप बैठकर तमाशा देखते रहे। अमेरिका को लगा था कि वह ईरान की सरकार बदल देगा और उसके परमाणु प्रोग्राम को रोक देगा, लेकिन उल्टा वह खुद एक कभी न खत्म होने वाली जंग में फंस गया। नतीजा क्या निकला? अमेरिका पर युद्ध का भारी कर्ज चढ़ गया, खाड़ी देशों के साथ उसके रिश्तों में खटास आ गई और अपने ही साथी (नाटो) देशों के साथ अनबन शुरू हो गई। चीन के लिए इससे बेहतर स्थिति और क्या हो सकती थी!&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/germans-were-speaking-english-putin-snapped-at-them" target="_blank">अंग्रेजी बोल रहे थे जर्मनी के लोग, पुतिन ने हड़काया, क्यों चौंक गया भारत!</a></h3><h2>चीन पर 'द इकोनॉमिस्ट' का कवर</h2><div>इस बात को 'द इकोनॉमिस्ट' के कवर पर बहुत ही शानदार ढंग से दिखाया गया है। इसकी हेडलाइन असल में एक ऐसा कथन है, जिसका श्रेय आमतौर पर फ्रांसीसी सम्राट नेपोलियन बोनापार्ट को दिया जाता है। सैन्य संदर्भ में, इसका मूल अर्थ यह है कि जब आपका विरोधी कोई गलती कर रहा हो या कोई भारी पड़ने वाला कदम उठा रहा हो, तो ऐसे में बीच में दखल देने के बजाय, चुपचाप उसे देखते रहना ही ज़्यादा समझदारी होती है। कवर इमेज भी प्रतीकात्मक है। इसमें चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग एकदम साफ़ दिखाई दे रहे हैं, जबकि डोनाल्ड ट्रंप की इमेज धुंधली है। यह इस बढ़ती हुई वैश्विक सोच को दिखाता है कि एक अस्थिर दुनिया में बीजिंग को फ़ायदा हो सकता है, जबकि वॉशिंगटन मध्य-पूर्व की उथल-पुथल में उलझा हुआ है। जब ट्रंप ने यह टकराव शुरू किया था, तब उनके मन में यह बात नहीं थी। अमेरिका के राष्ट्रपति का मानना ​​है कि तेल के बहाव को कंट्रोल करने से दुनिया के मंच पर ताक़त मिलती है। वेनेज़ुएला में राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को पकड़ने और देश के विशाल कच्चे तेल के भंडार पर कब्ज़ा करने के लिए उनका साहसी ऑपरेशन इस बात के काफ़ी संकेत देता है। ईरान के ऊर्जा बहाव को अमेरिका के कंट्रोल में लाना उनकी लिस्ट में अगला काम था। ट्रंप इसका इस्तेमाल चीन के साथ सौदेबाज़ी के लिए एक हथियार के तौर पर कर सकते थे, जो ईरानी कच्चे तेल का सबसे बड़ा खरीदार है। दोनों नेताओं के बीच अगले महीने बीजिंग में एक मुलाक़ात तय है। लेकिन ईरान ज़्यादा मज़बूत साबित हुआ। उसने होर्मुज़ जलडमरूमध्य को बंद करके अपना सबसे बड़ा तुरुप का पत्ता खेल दिया है; यह एक ऐसा अहम जलमार्ग है जिससे दुनिया का पाँचवाँ हिस्सा तेल और गैस गुज़रता है। इस तरह, ईरान ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को बंधक बना लिया है।</div><h2>ऑयल क्राइसिस से बीजिंग ने खुद को कैसे बचाया&nbsp;</h2><div>अगर हॉर्मुज जलडमरूमध्य बंद भी हो जाए, तो चीन को उससे खास फर्क नहीं पड़ेगा। ईरान का खास दोस्त होने के नाते चीन को पिछले कुछ हफ्तों में 'शैडो फ्लीट्स' (पुरानी और बिना बीमा वाली जहाजों की फौज) के जरिए लाखों बैरल ईरानी तेल मिला है। यही नहीं, चीन ने समझदारी दिखाते हुए आठ अलग-अलग देशों से तेल खरीदना शुरू कर दिया है, जिसका उसे अब बड़ा फायदा मिल रहा है। असल में, बीजिंग सालों से ऐसे ही बुरे वक्त की तैयारी कर रहा था। उसने तेल का बड़ा भंडार जमा कर लिया है, अपने देश में उत्पादन बढ़ा दिया है और साथ ही रिन्यूएबल एनर्जी (सौर और पवन ऊर्जा) में भी भारी निवेश किया है। चीन के इस बढ़ते तेल भंडार के पीछे 'टीपॉट' रिफाइनरियों का बड़ा हाथ है। ये छोटी और निजी रिफाइनरियां हैं, जिनका इस्तेमाल चीन अमेरिकी पाबंदियों से बचने के लिए ईरान और रूस से सस्ता कच्चा तेल मंगाने के लिए करता है। ये रिफाइनरियां सरकारी कंपनियों से अलग, स्वतंत्र रूप से काम करती हैं। मिडिल ईस्ट में चल रही जंग के बीच, इन्हीं छोटी रिफाइनरियों ने चीन की अर्थव्यवस्था को डगमगाने नहीं दिया। इसके अलावा, चीन की अर्थव्यवस्था दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और वहाँ बिकने वाली नई कारों में से आधी इलेक्ट्रिक गाड़ियाँ (EVs) हैं। इस वजह से चीन को पेट्रोल-डीजल की उतनी किल्लत महसूस नहीं हो रही है और उसके फ्यूल पंपों पर कोई दबाव नहीं पड़ा है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/china-takes-major-action-amidst-the-war-entire-world-is-stunned" target="_blank">युद्ध के बीच चीन का बड़ा एक्शन! पूरी दुनिया हैरान!</a></h3><h2>चीन का मौन रिएक्शन</h2><div>इस तरह, इस उथल-पुथल से खुद को अलग रखकर, चीन ने खुद को एक स्थिर विकल्प के तौर पर पेश किया है। वह एक लंबी चाल चल रहा है। उसने इस संघर्ष में अमेरिका या इज़रायल को सीधे तौर पर हमलावर भी नहीं बताया है। चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने पिछले महीने कहा था, ताकत से ही सही साबित नहीं होता। विशेषज्ञों के मुताबिक, इसके पीछे की सोच यह है कि भू-राजनीतिक तनावों से ऐसे अवसर पैदा होने दिए जाएं, जिनका इस्तेमाल चीन बाद में अपनी स्थिति को मज़बूत करने के लिए कर सके। शायद इसी स्थिर छवि की वजह से पाकिस्तान जो अमेरिका और ईरान के बीच एक अप्रत्याशित मध्यस्थ के तौर पर उभरा है—अपने 'हर मौसम के दोस्त' चीन का समर्थन पाने के लिए तुरंत उसके पास पहुँचा। इससे चीन को शांतिदूत की भूमिका निभाने का एक मौका मिल गया। हालाँकि, शेखी बघारने वाले बयानों के बजाय, चीन ने युद्धविराम और 'स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़' को फिर से खोलने के लिए पाँच-सूत्रीय योजना जारी की। बीजिंग ने न तो वॉशिंगटन का सामना किया और न ही उसकी आलोचना की। उसने एक व्यावहारिक अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी बने रहना चुना। तब से, चीन ने अपनी कूटनीति को और तेज़ कर दिया है, जिससे अमेरिका को काफ़ी नागवारी गुज़री है। एक लंबा युद्ध चीन के लिए भी फ़ायदेमंद नहीं है। तेल संकट के कारण अस्थिर हुई वैश्विक अर्थव्यवस्था, दुनिया भर में चीन की सामान बेचने की क्षमता पर गंभीर चोट पहुँचाएगी।</div><h2>चीन अब दुनिया पर राज करेगा?</h2><div>सबसे बड़ी बात तो यह है कि इस लड़ाई ने अमेरिका का ध्यान ईस्ट एशिया (चीन के पड़ोस) से भटका दिया है। अगर ईरान का संकट इसी तरह चलता रहा, तो अमेरिका को अगले कई सालों तक खाड़ी देशों की 'आग बुझाने' में ही अपनी ताकत लगानी पड़ेगी। इसका सीधा मतलब यह है कि अमेरिका 'इंडो-पैसिफिक' इलाके (जहाँ चीन अपनी ताकत बढ़ाना चाहता है) पर उतना ध्यान नहीं दे पाएगा। साथ ही, हॉर्मुज जलडमरूमध्य का भविष्य क्या होगा, यह कोई नहीं जानता। ऐसे में जो देश अपनी ऊर्जा सुरक्षा को लेकर डरे हुए हैं, वे मजबूरी में चीन की 'ग्रीन टेक्नोलॉजी' (सोलर और इलेक्ट्रिक तकनीक) की ओर खिंचे चले आएंगे। चीन के लिए ईरान के झगड़े में पड़ने से कहीं ज्यादा जरूरी यह है कि भविष्य की दुनिया पर उसका कब्जा हो। बीजिंग, अमेरिका के इस अंधाधुंध सैन्य हमले का इस्तेमाल भारत और ब्राजील जैसे 'ग्लोबल साउथ' के देशों को एक कड़ा संदेश देने के लिए भी कर सकता है। वह दुनिया को यह दिखाना चाहता है कि वाशिंगटन (अमेरिका) सिर्फ अपनी दादागिरी चलाना जानता है और दूसरों के मामलों में दखल देकर तबाही मचाता है।</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 08 Apr 2026 13:42:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/amidst-us-iran-conflict-will-china-now-rule-the-world-with-a-5-star-strategy</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[ट्रंप ने दिया मौका, भारत के गहरे दोस्त देश में घुसने की तैयारी में चीन, अपना Airspace अचानक इस बड़े प्लान के लिए किया बंद?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/china-preparing-to-enter-india-close-friend-country-suddenly-closed-airspace-for-big-plan]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>दुनिया अभी ईरान, इजराइल और अमेरिका के जंग की गवाह बनी हुई है। इस युद्ध को एक महीना से ज्यादा बीत चुका है। लेकिन कहीं से राहत की कोई अच्छी खबर नहीं आ रही। इस बीच चीन ने चौंकाते हुए बिना कोई वजह बताए 40 दिनों के लिए समुद्र के ऊपर के हवाई क्षेत्र के एक बड़े हिस्से को बंद कर दिया है। अब सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि क्या चीन ने मिडिल ईस्ट का फायदा उठाकर ताइवान को घेरने की तैयारी कर ली है? ताइवान पर कब्जा करने की तैयारी कर ली है। क्योंकि बता दें कि अचानक 40 दिनों के लिए चाइना ने अपना एयर स्पेस बंद करने का ऐलान किया है। ताइवान के पास युद्धपोत देखे गए हैं और बिना किसी ऐलान के यह सैन्य हलचल हो रही है। क्या यह सिर्फ एक अभ्यास है या फिर किसी बड़े एक्शन की तैयारी। सबसे बड़ा अलार्म जो है वो यह है कि चीन ने समुद्र के ऊपर एक बड़े हिस्से का एयर स्पेस लगभग 40 दिनों के लिए बंद करने का ऐलान कर दिया है और यह कोई सामान्य बात नहीं है। आमतौर पर बता दें कि एक से 3 दिन के छोटे अभ्यास होते हैं। लेकिन 40 दिन ये सीधे-सीधे इशारा करता है बड़े पैमाने पर सैन्य अभ्यास या फिर नई मिसाइल या फिर वॉर टेक्नोलॉजी टेस्ट का और यह नोटम जो है यानी कि नोटिस टू एयर मिशनंस के जरिए जारी किया गया है जो पायलट्स को खतरे की चेतावनी देता है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/did-china-steal-iran-uranium-right-under-the-noses-of-the-us-and-israel" target="_blank">दम है तो बीजिंग आकर ले जाओ! अमेरिका-इजरायल की नाक के नीचे से चीन उठा ले गया ईरान का यूरेनियम?</a></h3><h2>40 दिनों के लिए अपना एयर स्पेस बंद किया</h2><div>रिपोर्ट्स के मुताबिक ईरान युद्ध के बीच चीन ने 27 मार्च से 6 मई तक 40 दिनों के लिए अपना एयर स्पेस बंद किया है। यह इलाका ताइवान से भी बड़ा है और शंघाई के उत्तर दक्षिण में फैला हुआ है। सवाल उठ रहे हैं कि क्या चीन का यह कदम ताइवान पर कब्जे की चीन की कोई कोशिश तो नहीं है? एक अमेरिकी अखबार की रिपोर्ट के मुताबिक चीन का यह कदम असामान्य लग रहा है। आमतौर पर एयर शो या छोटे अभ्यासों के लिए एक से तीन दिन के लिए एयर स्पेस को ब्लॉक रखा जाता है। लेकिन 40 दिन तक के लिए ऐसा करना किसी बड़े पैमाने पर युद्धाभ्यास या नई मिसाइल तकनीक के परीक्षण की ओर भी इशारा करता है। वहीं मीडिया रिपोर्ट्स यह भी बता रहे हैं कि ताइवान के राष्ट्रीय रक्षा मंत्रालय ने भी कुछ ऐसी हरकतें देखी हैं जिससे चीन पर अविश्वास बढ़ गया है।</div><h2>अमेरिका के लिए आई नई मुश्किल</h2><div>रिपोर्ट्स के मुताबिक ताइवान के रक्षा मंत्रालय को स्थानीय समय अनुसार सोमवार सुबह 6:00 बजे तक अपने क्षेत्रीय जल के आसपास चीन के तीन फाइटर जेट्स, छह नौसैनिक जहाजों और दो सरकारी जहाजों के आने की जानकारी भी मिली। हालांकि बीजिंग ने इस इलाके में किसी भी तरह के योद्धाभ्यास के ऐलान का जिक्र नहीं किया है। जिससे अनिश्चितता और बढ़ गई है। वहीं इसे अमेरिका के लिए एक नई मुश्किल भी माना जा रहा है। चीन का एयर स्पेस बंद होने से जासूसी विमान और मिलिट्री फ्लाइट्स प्रभावित हो सकते हैं। यह सब तब हो रहा है जब अमेरिका ईरान से भीड़ों में लगा हुआ है। चीन के इस कदम से अमेरिकी सेना को अब एशिया में भी नई चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। जितना अनिश्चित</div><div>डॉनल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका हो चुका है, उससे कई गुना ज्यादा अनिश्चित चीन पहले से है। शी चिनफिंग ने इस संशय को और बढ़ाया है। फिर भी बहुत कुछ ईरान युद्ध के परिणामों पर निर्भर करेगा। और ईरान में क्या होगा, अभी कुछ कहना मुश्किल है, पर इतना साफ है कि इस युद्ध ने अमेरिका को पश्चिम एशिया में इस कदर फंसा दिया है, जिससे हिंद महासागर अशांत है और इंडो-पैसिफिक में एक वैक्यूम बनता दिख रहा है। स्वाभाविक है कि चीन इसका लाभ उठाने की कोशिश करेगा।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/balochs-declare-that-if-they-become-independent-they-will-give-india-three-amazing-things" target="_blank">बलोचों का ऐलान, अगर हुए आजाद तो भारत को देंगे 3 जबरदस्त चीजें !</a></h3><h2>ताइवान को अपना हिस्सा मानता है चीन</h2><div>ताइवान को अपना हिस्सा मानता है। जबकि ताइवान खुद को अलग देश की तरह चलाता है। और यह विवाद बता दें चाइना और ताइवान का यह नया नहीं है। 1949 यानी कि 1949 से दोनों के रास्ते अलग हुए। लेकिन चीन का लक्ष्य कभी नहीं बदला। रीयनिफिकेशन यानी ताइवान को अपने साथ जोड़ना। रिपोर्ट्स यह कहती है कि चीन 2027 तक इस मिशन को पूरा करना चाहता है। और अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या चीन युद्ध की तैयारी कर रहा है? संकेत काफी खतरनाक है। एयर स्पेस को ब्लॉक कर देना, नेवी की तैनाती एयरफोर्स एक्टिव बिना घोषणा के मूवमेंट्स हुई जा रही है। एक्सपर्ट्स यह मानते हैं कि यह जॉइंट ऑपरेशन ड्रिल हो सकती है। जहां एयर, नेवी और मिसाइल फोर्स एक साथ काम कर रहे हो। यानी असल युद्ध से पहले की रिहर्सल। सबसे बड़ी बात जो है वो इसकी टाइमिंग है। जब दुनिया का ध्यान मिडिल ईस्ट पर है। अमेरिका ईरान में उलझा हुआ है और तभी चीन ने यह कदम उठाया है। यानी डिस्ट्रैक्शन का फायदा चाइना यहां पर उठाना चाहता है। और अब चुपचाप पोजीशन मजबूत करना भी उसका लक्ष्य है। तो क्या चीन सच में ताइवान को घेरने की तैयारी में है या यह सिर्फ दबाव बनाने की एक रणनीति चाइना ने अपनाई है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/china-nuclear-agenda-has-increased-tension-amid-the-war" target="_blank">जंग के बीच चीन के न्यूक्लियर एजेंडे ने बढ़ाई टेंशन, मची दुनिया में खलबली!</a></h3><h2>ताइवान के अंदरूनी मतभेद का फायदा उठाने की कोशिश</h2><div>राजनीतिक विभाजन ताइवान में भी है, जिसका फायदा चीन उठा सकता है। ताइवान में सत्तारूढ़ डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी को चीन अलगाववादी मानता है, जबकि विपक्षी कुओमिंतांग के साथ बेहतर संबंधों की चाह रखता है। हालांकि माओ त्से तुंग की सारी लड़ाई कुओमिंतांग से थी। समय दुश्मन और दोस्त की मनोदशा बदल देता है। अगर चुनाव में कुओमिंतांग सत्ता पाती है तो तनाव कम हो सकता है, लेकिन यदि डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी जीतती है तो जोखिम बढ़ेगा। 2027 में अमेरिका और ताइवान में चुनाव होंगे, जबकि चिनफिंग अपने चौथे कार्यकाल के अंत की ओर खिसक रहे होंगे। 79 वर्ष की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते वह ताइवान मुद्दे पर निर्णायक कदम उठाने के लिए अधीर हो सकते हैं। हां, यह प्रश्न तब भी प्रासंगिक हो सकता है कि क्या चीन के पास ताइवान पर सफल आक्रमण करने की क्षमता है? चीन में भी सब कुछ अच्छा नहीं है। हाल ही में उन 5 शीर्ष जनरलों को हटा दिया गया, जो 2022 में ही नियुक्त किए थे।&nbsp;</div><div>बहरहाल, एक अमेरिकी पत्रिका में प्रकाशित एक रिपोर्ट में कहा गया है कि ताइवान को अपनी लोकतांत्रिक व्यवस्था की रक्षा के लिए चीन के बढ़ते खतरे के बीच सेल्फ डिटरेंस यानी आत्मनिरोधक क्षमता विकसित करनी होगी। रिपोर्ट में कहा गया है कि यह रणनीति सैन्य आक्रामकता बढ़ाने की नहींबल्कि संभावित हमले की लागत इतनी बढ़ाने की है कि चीन कम्युनिस्ट पार्टी के लिए ताइवान पर हमला करना बेहद महंगा और जोखिम भरा हो जाए। देखना होगा कि चीन ने जो अपना एयर स्पेस बंद किया है वो किस मकसद से किया है और जल्द ही चीन के इस कदम का खुलासा भी हो जाएगा।&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 07 Apr 2026 13:23:45 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/china-preparing-to-enter-india-close-friend-country-suddenly-closed-airspace-for-big-plan</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[कोरिया से वियतनाम, अफगानिस्तान से ईरान...किसी मोड़ पे हारा, किसी मोड़ पे जीत गया, अमेरिका के युद्धनीति  वाले इतिहास का एक और दौड़ बीत गया?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/from-korea-to-vietnam-from-afghanistan-to-iran-us-war-history]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>दुनिया का रहनुमा, लोकतंत्र का प्रहरी, आतंकवाद का दुश्मन और खुद को सुपरपॉवर मुल्क मानने वाले देश के लुट-पिट कर लौटने की दास्तां है। कोरिया के पहाड़ों से लेकर वियतनाम के जंगलों और मध्य पूर्व के तपते रेगिस्तानों तक, अमेरिकी सेना की भूमिका हमेशा चर्चा और विवाद का केंद्र रही है। अक्सर यह बहस छिड़ती है कि इन लड़ाइयों का असली मकसद लोकतंत्र की रक्षा था या फिर अपने भू-राजनीतिक दबदबे को बनाए रखना। अमेरिका का इतिहास सैन्य हस्तक्षेपों और रणनीतिक संघर्षों की एक लंबी गाथा रहा है। दुनिया भर के तमाम युद्धों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराना अमेरिका की विदेश नीति का एक अभिन्न हिस्सा बन चुका है। अमेरिका का दूसरे देशो में दखलअंदाज और भूमिका को लेकर सवाल अमेरिका के भीतर और बाहर, दोनों जगह भी उठते रहे है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/kashmiris-donations-worth-crores-will-not-go-to-iran" target="_blank">सोना, जेवर और बर्तन...ईरान नहीं जाएगा कश्मीरियों का करोड़ों का चंदा, हिल गई दुनिया !</a></h3><h2>कोरिया युद्ध में मारे गए 33,000 से ज्यादा यूएस सोल्जर्स</h2><div>25 जून नॉर्थ कोरिया पीपल जमी यानी बक 75000 सोल्जर्स 38 पैरेलल को क्रॉस करके साउथ कोरिया पर आक्रमण कर देते हैं और यही से कोल्ड वॉर की पहली मिलिट्री तस्सेल की शुरुआत होती है है इसकी इंटेंसिटी को देखकर ऐसा लगता है की मानो इसको तीसरे विश्व युद्ध में तब्दील होने से कोई नहीं रोक पाएगा। यहां एक तरफ था नॉर्थ कोरिया जिसको यूएसएसआर का सपोर्ट हासिल था तो दूसरी तरफ साउथ कोरिया जिसको उस सपोर्ट कर रहा था। कोल्ड वॉर एशिया में कोरियन पेनिनसुला के बीच से होकर गुजारा रहा था। सोवियत संघ चाहता था की कम्युनिज्म नॉर्थ कोरिया से आगे बढ़कर जापान साउथ ईस्ट एशिया और बाकी पूरे एशिया में फैल जाए। लेकिन अमेरिका को ये किसी भी कीमत पर मंजूर नहीं था। अमेरिका और यूएसएसआर की इसी जद्दोजहदका नतीजा हमें सबसे पहले कोरियन वॉर के रूप में देखने को मिला। अगस्त 1945 में अमेरिका ने जापान के हिरोशिमा और नागासाकी पर एटॉमिक बॉन्ब गिरा दिए और जापान इस न्यूक्लियर हमले से पुरी तरह टूट गया। इसी के साथ वर्ल्ड वॉर 2 में जापान ने सरेंडर कर दिया और ये वॉर खत्म हो गई। जापान को कोरियर समेत अपनी सभी कॉलोनी को छोड़ना पड़ा। अब कोरिया जापान के चंगुल से तो आजाद हो गया, लेकिन उसके लिए तो असली युद्ध अब शुरू होने जा रहा था। असल में जैसे ही जापान ने कोरिया में सरेंडर किया वैसे ही सोवियत संघ ने नॉर्थ की तरफ से और अमेरिका ने साउथ की तरफ से आकर इसको कैप्चर कर लिया। इन दोनों ने अपनी सहमति से इस पेनिनसुला को 38 पैरेलल के अगेंस्ट दो हिस्सों में बांट दिया। नार्थ वाला हिस्सा सोवियत और साउथ वाला अमेरिका के पास चला गया। यह केवल 5 सालों के लिए एक टेंपरेरी अरेंजमेंट किया गया कमीशन के हाथों में सौंप दिया गया 1943 में हुई गए कॉन्फ्रेंस में ही यह तय कर लिया गया था की 5 साल बाद कोरिया को आजाद कर दिया जाएगा।1948 में नॉर्थ कोरिया यानी डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कोरिया और साउथ कोरिया यानी रिपब्लिक ऑफ कोरिया के नाम से दो अलग-अलग नेशंस में डिवाइड हो गए नॉर्थ कोरिया में कम्युनिज्म की सपोर्टर किम एल्सन और साउथ कोरिया में केपीटलाइज्म की सपोर्टर सिंह मैन रे प्रेसिडेंट बने। इन दोनों ही लीडर्स को अमेरिका और सोवियत संघ के द्वारा जानबूझकर चुना गया था और दोनों ने ही इन लीडर्स को अपने अपने रीजंस में हीरो की तरफ प्रमोट किया। धीरे-धीरे अमेरिकन और सोवियत ट्रूप्स को यहां से विद्रोह कर लिया गया। लेकिन यह स्ट्रगल अभी भी खत्म नहीं हुआ था। अमेरिका ने दक्षिण कोरिया की मदद के लिए सेना भी भेजी। माना जाता है कि करीब 17,89,000 अमेरिकी सैनिको ने इसमें हिस्सा लिया। एक आकड़े के मुताबिक 33,000 से ज्यादा अमेरिकी सैनिक मारे गए।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/how-did-the-american-pilot-survive-for-24-hours-in-iran" target="_blank">7000 फीट की ऊंची पहाड़ी...अमेरिकी पायलट ईरान में 24 घंटे कैसे जिंदा रहा?</a></h3><h2>वियतनाम संग 20 सालों तक चली जंग, 2 हजार टन बम गिराए&nbsp;&nbsp;</h2><div>1955 में उत्तरी वियतनाम ने जब दक्षिणी भाग पर सैन्य जमावड़ा शुरू किया तो अमेरिका ने कम्युनिज्म के फैलने से रोकने के लिहाजे से सैन्य कार्रवाई छेड़ दी। 1967 तक वियतनाम में अमेरिकी फौजियों की संख्या 5 लाख को पार कर गई। लेकिन 1969 आते-आते घरेलू दबाव की वजह से अमेरिकी ने वियतनाम से बाहर निकलने का मन बना लिया। 20 सालों की जंग के दौरान कई बार संधि पर समझौते हुए और सब बेकार हो गए। 1972 में अमेरिका और उत्तरी वियतनाम के बीच एक बार फिर बातचीत हुई और वो भी बेनतीजा रही। अमेरिकी सैनिकों पर बमबारी के बाद उसने भी अपने बी -52 विमान को मैदान में उतार दिया था। अमेरिका के 200 बी-52 विमानों ने 12 दिनों के भीतर उत्तरी वियतनाम पर 2 हजार टन बम गिराए थे। इसे अमेरिकी वायु सेना का अब तक का सबसे भीषण और चौंकाने वाला हमला माना जाता है, जिसे ऑपरेशन लाइनरबैकर-II का नाम दिया गया था। जनवरी 1973 में पेरिस में अमेरिका, उत्तरी वियतनाम और दक्षिण वियतनाम व वियतकॉन्ग के बीच एक शांति समझौता हुआ। इसी समझौते की आड़ में अमेरिकी वियतनाम से अपनी सेना हटाना चाहता था। इसके बाद वियतनाम में भी वही हुआ जैसा कि एक साल पहले अफगानिस्तान में देखने को मिला। अमेरिकी फौज के पूरी तरह से निकलने से पहले ही 29 मार्च 1973 को उत्तरी वियतनाम ने दक्षिणी वियतनाम पर हमला बोल दिया। दो साल बाद 1975 में 30 अप्रैल को कम्युनिस्ट वियतनाम की फौज साइगॉन में घुस गई और वहां बचे अमेरिकियों को आनन-फानन में भागना पड़ा।&nbsp;&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/america-blew-up-its-own-mc-130j-aircraft-the-enemy-had-fun" target="_blank">America ने उड़ा दिए अपने ही MC-130J एयरक्रॉफ्ट, दुश्मन ने लिए मजे</a></h3><h2>इराक युद्ध एक 'रणनीतिक भूल'&nbsp;</h2><div>1990 और 2003 के इराक युद्ध अमेरिकी विदेश नीति के दो सबसे अलग और विवादास्पद अध्याय हैं। जहाँ पहला युद्ध अंतरराष्ट्रीय सहमति पर आधारित था, वहीं दूसरा युद्ध 'अधूरे तथ्यों' और 'अति-महत्वाकांक्षा' की भेंट चढ़ गया। 1990 के खाड़ी युद्ध में सद्दाम हुसैन के कुवैत पर कब्जे के बाद, इराक पीछे नहीं हटा और अमेरिका ने ऑपरेशन डेजर्ट स्टॉर्म शुरू किया। इसका खर्च अरब देशों ने भी उठाया। लेकिन साल 2003 में जॉर्ज बुश प्रशासन ने 2003 में इराक पर अटैक किया। कहा गया कि सद्दाम के पास सामूहिक विनाश के हथियार है और उसके अल कायदा से भी रिश्ते बताए गए। हालाकि ऐसा कुछ भी नहीं निकला। एक बार अमेरिकी प्रशासन आलोचना का शिकार हुआ। इराक में पैदा हुए सत्ता के शून्य&nbsp; का फायदा उठाकर कट्टरपंथी ताकतें मजबूत हुईं। जानकारों का मानना है कि आईएसआईएस (इस्लामिक स्टेट) की जड़ें इसी युद्ध के बाद फैली अराजकता में थीं। इस युद्ध ने न केवल इराक को बर्बाद किया, बल्कि पूरे मध्य पूर्व में ईरान के प्रभाव को बढ़ा दिया, जिसे अमेरिका अपना सबसे बड़ा प्रतिद्वंदी मानता है।</div><h2>अफगानिस्तान से लुट-पिट कर पहली फुर्सत में रुकसत</h2><div>दो दशकों तक अफगानिस्तान में सैन्य अभियान छेड़ने वाले अमेरिका ने साल 2021 में वहां के हालात से पल्ला झाड़ लिया। अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की हड़बड़ी में हुई वापसी के बाद पैदा हुए हालात ने लोगों को 1975 के वियतनाम युद्ध की याद दिला दी है। पूर्वी एशिया के इस देश में अमेरिका कम्युनिज्म के खात्मे के दाखिल तो हुआ लेकिन परिस्थिति ऐसी बनी कि उसे उल्टे पांव भागना पड़ा। 29 फरवरी 2020 को दुनिया की एक बड़ी ताकत, दुनिया के दरोगा की हैसियत रखने वाला अमेरिका ने दुनिया के एक छोटे से भूभाग में तालिबान के आगे घुटने टेक दिए। अमेरिका और तालिबान के बीच शांति समझौते पर मुहर लग गई। समझौते के बाद अमेरिका का लक्ष्य होगा कि वो चौदह महीने के अंदर अगानिस्तान से सभी बलों को वापस बुला ले। 14 अप्रैल को अमेरिका सेना की वापसी का ऐलान किया गया था। उसके बाद अब 15 अगस्त को यानी 124 दिनों में तालिबान ने अफगान सरकार को घुटनों पर ला दिया। तालिबान ने ही फिर काबुल की सत्ता पर कब्जा कर लिया। माना जाता है कि इस युद्ध में $2.313 ट्रिलियन डॉलर खर्च हुए और 243,000 लोगों की जान गई। इसके अलावा अमेरिका ने खुद को सोमालिया, यमन और लीबिया जैसे युद्धों के बीच भी खुद को पाया। राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने प्रचार के दौरान कहा था कि वो अंतहीन युद्धों के खिलाफ है। लेकिन अब लगता है कि उनकी अगुआई में अमेरिका ऐसे ही एक युद्ध में फिर उलझ गया है, जहा से निकासी का रास्ता भी नहीं दिख रहा।</div><div>बहलहाल, जहाँ 'खाड़ी युद्ध' ने उसकी सैन्य शक्ति का लोहा मनवाया, वहीं वियतनाम और अफगानिस्तान जैसे संघर्षों ने यह साबित कर दिया कि केवल आधुनिक हथियारों के दम पर किसी देश की विचारधारा या जमीनी हकीकत को नहीं बदला जा सकता। अंततः, ये युद्ध न केवल अमेरिका की अर्थव्यवस्था पर बोझ बने, बल्कि दुनिया भर में उसकी नैतिक साख पर भी एक बड़ा सवालिया निशान छोड़ गए हैं। आज भी यह सवाल बरकरार है कि क्या अमेरिका दुनिया का 'चौकीदार' बनने की कोशिश में खुद को और दुनिया को और अधिक संकट में डाल रहा है?</div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 06 Apr 2026 13:09:47 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/from-korea-to-vietnam-from-afghanistan-to-iran-us-war-history</link>
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