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    <title><![CDATA[Hindi News - News in Hindi - Latest News in Hindi | Prabhasakshi]]></title>
    <description><![CDATA[Latest News in Hindi, Breaking Hindi News, Hindi News Headlines, ताज़ा ख़बरें, Prabhasakshi.com पर]]></description>
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      <title><![CDATA[राम मंदिर के चंदे में घपले की कहानी, क्या सच में चढ़ावे से 'चंपत' हो गए 7 करोड़ रुपए?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/story-of-the-ram-mandir-donation-scam-did-7-crore-really-vanish]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>राम जन्मभूमि भारतीय इतिहास का सबसे पुराना और जटिल मुद्दा है, जिसको लेकर आज भी लोग बात करते हैं तो सेंसेटिव हो जाते हैं। इस एक विवाद की वजह से सिर्फ अयोध्या में ही नहीं बल्कि पूरे भारत में दंगे हुए और इसमें हजराों लोगों की जान गई। ये एक ऐसा केस था, जहां पर भगवान राम खुद अपना केस लड़ते हैं। सुप्रीम कोर्ट के अंदर बकायदा उनकी फाइल बनती है। करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र अयोध्या का राम मंदिर जिसके निर्माण के लिए कई सालों तक कानूनी लड़ाई लड़ी गई। भक्तों की आस, कार्तिक के मास में रामलला का वनवास खत्म हो जाता है। रामलला के नाम जमीन के हक पर सुप्रीम हस्ताक्षर के साथ ही बड़े धूम धाम के साथ इसकी आधारशीला रखी गई और फिर मंदिर बनकर तैयार हो गया। जिसके उद्घाटन को पूरे देश ने एक ऐतिहासिक पल की तरह देखा। लेकिन अब इसी राम मंदिर को लेकर एक ऐसा विवाद सामने आया है जिसने राजनीति से लेकर आम श्रद्धालुओं तक हर किसी का ध्यान अपनी तरफ खींच लिया है। दावा किया जा रहा है कि मंदिर में आने वाले चढ़ाने और दान के हिसाब-किताब में घड़बड़ी हुई है। आरोप लगाए जा रहे हैं कि राम मंदिर में आए चढ़ावे में पांच करोड़ से लेकर 7 करोड़ तक की कथित चोरी हुई है। भाजपा के ही नेता और पार्टी प्रवक्ता रजनीश सिंह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर मामले की सीबीआई या किसी अन्य केंद्रीय एजेंसी से जांच कराने की मांग की है। अब इन दावों को लेकर प्रधानमंत्री कार्यलय यानी पीएमओ ने भी संज्ञान लिया है। वहीं दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी और उसके प्रमुख अखिलेश यादव लगातार इस मुद्दे को उठा रहे हैं। उनका कहना है कि अगर सबकुछ ठीक है तो पूरे मामले की पारदर्शी जांच होनी चाहिए। जबकि राम मंदिर ट्रस्ट इन सभी आरोपों को पूरी तरह बेबुनियाद बता रहा है। तो आखिर क्या है पूरा मामला? क्या वाकई राम मंदिर के चढ़ावे में कोई घोटाला हुआ है?&nbsp; पीएमओ तक पहुंचे इस पूरे विवाद की शुरुआत आखिर हुई कैसे? आज का एमआरआई हम इस पूरे मामले की टाइमलाइन, आरोपों, ट्रस्ट के जवाब और अब तक सामने आए तथ्यों को विस्तार से करेंगे।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/piyush-goyal-hits-back-at-akhilesh-allegations-regarding-ram-mandir-donations" target="_blank">राम मंदिर चंदे को लेकर अखिलेश के आरोपों पर पीयूष गोयल का पलटवार, उन्हें गंभीरता से कोई नहीं लेता</a></h3><h2>मामला कहां से शुरू हुआ... विवाद है क्या</h2><div>मामले की शुरुआत 7 जून को हुई। तब पूर्व मंत्री और सपा नेता पवन पांडेय ने चढ़ावे में 5-7 करोड़ की चोरी का दावा किया। इसके बाद अखिलेश ने भी मुद्दे को उठाया और सरकार व ट्रस्ट की चुप्पी को संदिग्ध बताया। नौ जून को भाजपा नेता डॉ. रजनीश सिंह ने पीएम को पत्र लिखकर सीबीआई जांच की मांग की। इस बीच, मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्र भी आयोध्या पहुंचे लेकिन उन्होंने इस पर कोई बात नहीं की। मंदिर के पूर्व अकाउंट इंचार्ज महिपाल सिंह ने दावा किया कि लंबे समय से गड़बड़ी हो रही थी। उन्होंने शीर्ष प्रबंधन से इसकी शिकायत की। कार्रवाई के बजाय उन्हें पद से हटा दिया गया। दरअसल खुद को पूर्व लेखा प्रभारी बताने वाले महिपाल सिंह ने मीडिया से बातचीत में एक दावा किया है। आरोप लगाया है कि जब वह मंदिर में तैनात थे तब चढ़ावे में आने वाले सोने चांदी के जेवर और बर्तनों का कहीं कोई रिकॉर्ड ही नहीं होता था। यह कहां जमा होते थे इसकी जानकारी सिर्फ चंपत राय और टिन्नू को होती थी। टिन्नू चंपत राय के नजदीकी हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक टिन्नू उर्फ रामशंकर यादव पहले चंपत राय के ड्राइवर अब उनके सहयोगी हैं। महिपाल ने बताया कि श्री राम जन्मभूमि के लिए जब फंड कलेक्शन का काम शुरू हुआ तब मैंने काम संभाला। मेरा काम देखकर ही मुझे अयोध्या बुलाया गया। मैं अयोध्या गया तो 21,000 ऐसी रसीदें जारी होनी थी जो 7 आठ महीने से जारी नहीं हो पा रही थी।&nbsp;</div><h2>पूरे मामले में समाजवादी पार्टी की एंट्री</h2><div>इस मामले ने राजनीतिक रंग पकड़ा समाजवादी पार्टी के दावे के बाद। सपा सरकार में मंत्री रह चुके पवन पांडे ने दावा किया कि राम मंदिर से 5 से 7.5 करोड़ तक की चोरी की गई है। ऐसा उन्होंने आरोप लगाया। सपा प्रमुख और उत्तर प्रदेश के पूर्व सीएम अखिलेश यादव ने भी कहा कि इस मामले पर सरकार की चुप्पी संदिग्ध है और मंदिर ट्रस्ट की तरफ से भी कोई सफाई देने के लिए सामने नहीं आना चाहता। मंदिर ट्रस्ट के महामंत्री चंपत राय ने इस पर सफाई दी। कहा कि समय-समय पर ऑडिट होता रहता है। आजकल यही काम चल भी रहा है। अब तक दान के पैसों में हेराफेरी की कोई बात सामने नहीं आई है। चंपत राय की सफाई के बाद अखिलेश यादव ने सरकार से 11 सवाल पूछे। पूछा कि सीसीटीवी का सबूत सार्वजनिक करके मामले की सच्चाई बताने में आखिर परेशानी क्या है? मामला बढ़ा तो भारतीय जनता पार्टी के नेता डॉ. रजनीश सिंह ने प्रधानमंत्री को लेटर लिखकर सीबीआई जांच की मांग की। 10 जून को पीएमओ ने मंदिर ट्रस्ट से मामले की जांच रिपोर्ट भी मांग ली। शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा, राम मंदिर में शिला पूजन के समय से चोरी जारी है। निर्माण शुरू हुआ तो दो-दो मिनट में प्लॉट की कीमतें करोड़ों बढ़ गई। वहां चंपत राय बैठे हैं... 'चंपत' का मतलब ही होता है 'लेकर भाग जाना।' आपको समझ जाना चाहिए।</div><h2>ट्रस्ट का गठन कैसे हुआ</h2><div>राम मंदिर ट्रस्ट पर लगे आरोपों को समझने से पहले यह जानना जरूरी है कि यह ट्रस्ट बना कैसे था। दरअसल नवंबर 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या मामले पर अपना ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। इसके बाद केंद्र सरकार को राम मंदिर के निर्माण और उसके प्रबंधन के लिए एक ट्रस्ट बनाने का निर्देश दिया गया। इसी के बाद 5 फरवरी 2020 को केंद्र सरकार ने श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के गठन की घोषणा की। यही ट्रस्ट आज राम मंदिर के निर्माण, उसके रखरखाव, मंदिर में आने वाले दान और पूरे राम जन्मभूमि परिसर के प्रबंधन की जिम्मेदारी संभाल रहा है। ट्रस्ट बनने के कुछ दिनों बाद इसकी पहली बैठक हुई। इसमें महंत नृत्य गोपाल दास को ट्रस्ट का अध्यक्ष चुना गया। जबकि चंपत राय को महासचिव बनाया गया। इसके बाद राम मंदिर निर्माण का काम तेजी से आगे बढ़ने&nbsp; लगा। देश भर के लोगों ने खुलकर दान दिया। किसी ने ₹100 दिए, किसी ने हजारों और लाखों रुपए दिए। बड़े उद्योगपति से लेकर आम श्रद्धालुओं तक लाखों लोगों ने मंदिर निर्माण में योगदान दिया। फिर 22 जनवरी 2024 को रामलला की प्राण प्रतिष्ठा हुई। इसके बाद अयोध्या आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या में जबरदस्त बढ़ोतरी देखने को मिली।</div><h2>राम मंदिर में कितना दान आता है&nbsp;</h2><div>इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट के मुताबिक वित्तीय वर्ष 204-25 में ट्रस्ट को कुल ₹327 करोड़ मिले। यह डाटा राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्टकी सालाना रिपोर्ट में बताया गया है। ₹327 करोड़ में से 153 करोड़ श्रद्धालुओं के दान से आए। जबकि लगभग ₹173 करोड़ बैंक में जमा रकम और निवेश पर मिले ब्याज के थे। सिर्फ दान की बात करें तो मंदिर में रोजाना औसतन करीब 42 लाख का चढ़ावा आता है। यानी हर घंटे लगभग ₹175000 और हर मिनट करीब ₹2900 से भी ज्यादा और जब त्यौहार हो या कोई खास मौका हो, बड़ा मौका हो तो यह आंकड़ा और भी बढ़ जाता है। मंदिर के उद्घाटन वाले दिन ही लगभग 3 करोड़ 17 लाख का दान आया था। इस बात से आप अंदाजा लगा सकते हैं कि यहां कितनी बड़ी मात्रा में दान आता है, नकदी आती है। राम जन्मभूमि परिसर में अलग-अलग जगहों पर करीब 40 दान पेटियां रखी गई हैं। इसके अलावा ऑनलाइन दान की भी व्यवस्था है। दान पेटियों से निकली नगदी को तय प्रोसीजर के तहत एक सुरक्षित और गोपनीय कक्ष में ले जाया जाता है। वहां सीसीटीवी कैमरों की निगरानी में इसकी गिनती होती है। इस काम में ट्रस्ट के प्रतिनिधि और बैंक से जुड़े कर्मचारी शामिल रहते हैं। जानकारी के मुताबिक दान की गिनती की जिम्मेदारी स्टेट बैंक ऑफ इंडिया को दी गई है। बैंक ने इसके लिए एक निजी एजेंसी के कर्मचारियों को भी नियुक्त किया हुआ है। नोट गिनने की मशीनों और सिक्कों की मैनुअल गिनती के जरिए पूरी रकम का हिसाब किया जाता है। कई बार गिनती या नगदी इतनी ज्यादा होती है कि गिनती का काम 24 घंटे तक भी चलता रहता है। गिनती पूरी होने के बाद रकम को सुरक्षा के बीच बैंक में जमा करा दिया जाता है।&nbsp;&nbsp;</div><div>ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय ने इन सभी आरोपों को खारिज किया है। इनका कहना है कि मंदिर के चढ़ावे और दान का नियमित ऑडिट होता है। इस प्रक्रिया में ट्रस्ट के प्रतिनिधियों के साथ बैंक के अधिकारी भी शामिल रहते हैं। चंपत राय के मुताबिक दान और चढ़ावे का पूरा रिकॉर्ड रखा जाता है और अब तक हुए हर ऑडिट में ऐसी कोई बात सामने नहीं आई जिससे करोड़ों रुपए की चोरी की पुष्टि होती हो। यानी एक तरफ विपक्ष और कुछ नेताओं द्वारा सवाल उठाए जा रहे हैं तो दूसरी तरफ ट्रस्ट का कहना है कि पूरी व्यवस्था तय नियमों के अनुसार चल रही है और आरोपों का कोई आधार नहीं है। यानी इस समय तक स्थिति यह है कि आरोप लगाए जा चुके हैं। राजनीतिक बयान आ चुके हैं। जांच की मांग उठ चुकी है और अब मामला प्रधानमंत्री कार्यालय तक भी पहुंच चुका है। लेकिन अभी तक किसी भी सरकारी एजेंसी ने सार्वजनिक रूप से यह नहीं कहा कि राम मंदिर के चढ़ावे में चोरी साबित हुई है। फिलहाल राम मंदिर के चढ़ावे के गबन से जुड़ा यह आरोप पीएमओ तक भी पहुंच चुका है।&nbsp;</div><div><br></div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 12 Jun 2026 14:30:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/story-of-the-ram-mandir-donation-scam-did-7-crore-really-vanish</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[दुश्मन को परेशान करने वाला मिशन Z, कैसे इससे बदलेगा चीन-पाकिस्तान बॉर्डर का भूगोल]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/mission-z-operation-that-unsettles-the-adversary]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>जिस जोजिला दर्रे को भारत ने 1948 की जंग के दौरान अपने कंट्रोल में लिया था वहां आज सबसे लंबी सुरंग का एक अहम पड़ाव पार कर दिया गया है। जोजिला टनल के दोनों सिरों को आज जोड़ दिया गया। लगभग 1000 से ज्यादा इंजीनियर और मजदूर बड़े विपरीत हालातों में इस प्रोजेक्ट को पूरा करने में जुटे हैं। सबसे दिलचस्प बात यह है कि जंग से जूझ रहे ईरान का भी एक इंजीनियर भारत के इस अहम प्रोजेक्ट का हिस्सा है। जिसका कहना है कि जॉर्जिला टनल का निर्माण भी किसी जंग से कम नहीं। एक धमाका हुआ और टनल के दोनों छोर एक दूसरे से जुड़ गए। देश के दो अहम सामरिक इलाके आपस में कनेक्ट हो गए। दुनिया के सबसे लंबी सिंगल ट्यूब सुरंग जोजिला टनल ने सबसे मुश्किल पड़ाव पार कर लिया है। विकास और राष्ट्रीय सुरक्षा में एक नए मिल का पत्थर स्थापित हो चुका है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/israel-statement-on-chhatrapati-shivaji-shook-the-world" target="_blank">छत्रपति शिवाजी पर इजरायल का दुनिया हिलाने वाला ऐलान, इस्लामिक देशों की उड़ी नींद!</a></h3><div> कश्मीर और लद्दाख के बीच कनेक्टिविटी में अब खराब मौसम रुकावट नहीं बनेगा। भारत की सेना के लिए, भारत की स्ट्रेटेजिक जो रिक्वायरमेंट्स के लिए यह टनल काफी ही महत्वपूर्ण है। दुनिया में सबसे बड़ा, सबसे ऊंचा और सबसे अच्छा देश के कर्मवीरों का कीर्तिमान रंग ला रहा है और भारत विकास की दौड़ में तेजी से आगे बढ़ता जा रहा है। जोजिला टनल ने कैसे विश्व के मानचित्र पर भारत की विकास की गाथा लिखी है। कश्मीर की खूबसूरत वादियों और लद्दाख की दूरी अब कम होने जा रही है। कारगिल, द्रास और लेह के वह समुदाय जो पीढ़ियों से मौसमी अलगाव को झेलते आए हैं। अब उनके लिए चमत्कार होने जा रहा है। यानी अच्छे दिनों की शुरुआत होने जा रही है। 9 जून का दिन इतिहास की तारीख में दर्ज हो गया है।&nbsp; कुछ ऐसा हुआ जिसने भारतीय इंजीनियरिंग पर गर्व करने का देशवासियों को मौका दिया और विकास की नई गाथा लिख दी गई है। 13.15 कि.मी. लंबी जोजिला टनल दुनिया की सबसे लंबी सिंगल ट्यूब हाई एल्टीट्यूड बाय डायरेक्शनल रोड टनल है जो कश्मीर और लद्दाख को जोड़ने जा रही है। श्रीनगर लेह नेशनल हाईवे भारी बर्फबारी और हिम्स खलन की वजह से सर्दियों के तीन महीनों के लिए पूरी तरह बंद हो जाता है। जिससे लद्दाख का संपर्क देश से कट जाता है। लेकिन इस ऑल वेदर सुरंग के पूरी तरह शुरू हो जाने के बाद कश्मीर घाटी और लद्दाख के बीच साल भर निर्बाध संपर्क हो सकेगा। इसके बनने से सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि ज़ोजिला दर्रे को पार करने में जहां एक से डेढ़ घंटे का समय लगता था वो सफर अब महज 15 मिनट का रह जाएगा।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/this-is-a-changed-iran-find-out-why-it-attacked-israel-first-this-time" target="_blank">ये बदला हुआ ईरान है! जानिए इस बार इजरायल को पहले घुसकर क्यों मारा?</a></h3><div>जोजिला टनल प्रोजेक्ट की शुरुआत 2020 में हुई थी और दोनों तरफ से खुदाई का काम शुरू किया गया था। यानी सोनमर्ग साइड से और मीनामार्ग जो कि कारगिल लद्दाख में पड़ता है और इसी ईस्ट पोर्टल पर हम इस समय मौजूद हैं। यह काफी अहम प्रोजेक्ट था मिनिस्ट्री ऑफ रोड एंड ट्रांसपोर्ट के लिए क्योंकि जम्मू कश्मीर को लद्दाख के साथ जोड़ने के लिए और हर समय हर मौसम में कनेक्टिविटी प्रदान करने के लिए यह एकमात्र जरिया है जो जोजिला टर्नल प्रोजेक्ट है। दुनिया के सबसे दुर्गम इलाके में इस प्रोजेक्ट के लिए 1000 से ज्यादा मजदूरों ने 9 साल तक खुदाई की। इस इलाके का मौसम किसी सजा से कम नहीं। यहां तापमान -20° से -30° तक पहुंच जाता है। इस हाल में यहां मजदूर साल में करीब 100 दिन ही काम कर पाते थे। इसके बावजूद अप्रैल 2026 तक इस प्रोजेक्ट में 1 करोड़ से ज्यादा सुरक्षित मैनार्स दर्ज किए गए जो अपने आप में एक रिकॉर्ड है। खासकर भारत के इतने कठिन इलाके में ऐसा पहली बार हुआ है जो कि देश के लिए गर्व करने का मौका देता है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/business/stock-market-rises-in-early-trade-sensex-surges-350-points" target="_blank">शेयर बाजार में लौटी रौनक! वैश्विक संकेतों और क्रूड में नरमी से सेंसेक्स 350 अंक उछला, निफ्टी 23,200 के पार</a></h3><div> हमने अह पिछले कई वर्षों में देखा कि किस तरह से आम लोगों को सेना को और कई लोगों को आने-जाने में दिक्कत होती थी। क्योंकि जोजिला जो दर है वो विश्व का सबसे ऊंचा मोटरेबल दर है और वो बर्फबारी की वजह से कई महीनों तक बंद रहता था। यानी 6 महीने लगभग जोजिला पास बंद रहता था और उस समय लोगों को काफी दिक्कत आती थी। आप भी इस समय देख सकते हैं कि किस तरह का वातावरण यहां पे है। आज भी पहाड़ी चोटियां जो हैं वो बर्फ से ढकी हुई हैं और उसके साथ-साथ कठिन परिस्थितियों में इस प्रोजेक्ट को एग्जीक्यूट किया गया। अह हजारों की तादाद में इसमें लेबर्स जो है वह इनवॉल्व थे। मिशनरी और हाईएस्ट टेक्नोलॉजी जो है वो इसका इस्तेमाल यहां पर किया गया और खासतौर पर जो ऑस्ट्रेलियन टनलिंग मेथड है उसका प्रयोग करके इस टनल की खुदाई की गई है और इस प्रोजेक्ट को जो है धीरे-धीरे कंप्लीट किया जा रहा है।&nbsp;</div><h2>इससे कितना समय बचेगा?</h2><div>13.15 कि.मी. लंबी मुख्य टनल ऐसी चट्टानों से होकर गुजरती है जिनका स्वरूप 65 से ज्यादा बार बदला। चट्टान और बर्फ से बदलते भूगोल के चलते इंजीनियरों को लगातार अपनी रणनीति में बदलाव लाना पड़ा। इंजीनियरों ने एनएटीएम यानी न्यू ऑस्ट्रियन टनलिंग मेथड का इस्तेमाल किया जिसमें खुदाई और सपोर्ट की रणनीति को शॉर्टक्रेट और रॉक बोल्ट्स के जरिए मौके पर ही बदला गया। यह तरीका हिमालय टनल प्रोजेक्ट्स में लोकप्रिय हो रहा है। लेकिन इतनी ऊंचाई और इतने बड़े पैमाने पर इसका इस्तेमाल पहली बार हुआ है। यकीनन यह राष्ट्र के लिए गर्व करने का विषय है। इस टनल की खासियत यह है कि इसमें अलग से कोई एस्केप टनल नहीं है। इसलिए इंजीनियरों ने वेंटिलेशन और इमरजेंसी निकासी के लिए तीन बड़े वर्टिकल शाफ्ट बनाए हैं। सबसे बड़ा शाफ्ट पश्चिमी छोर पर है और पहाड़ के अंदर 474.3 मीटर गहरा है जो भारत का सबसे गहरा वर्टिकल शाफ्ट है। दूसरा 367.38 मीटर और तीसरा 213.5 मीटर गहरा है। इस टनल को बनाने के दौरान कई बार कुदरत के कहर का सामना करना पड़ा। पांच बड़ी अवलांस की घटनाएं पिछले 5 साल में प्रोजेक्ट साइट पर हुई। हर बार लगा कि प्रोजेक्ट फंस जाएगा लेकिन देश के कर्मवीरों ने हिम्मत नहीं हारी और हर बार उम्मीद की नई किरण जगी और फिर से काम शुरू हुआ।&nbsp;</div><h2>इसकी डेडलाइन कब तक?</h2><div>एक बहुत बड़ा निवेश था जिससे ना सिर्फ जम्मू कश्मीर और लद्दाख की कनेक्टिविटी आपस में बढ़ेगी बल्कि इस प्रोजेक्ट की वजह से सेना को सबसे ज्यादा जो है वो लाभ मिलेगा और स्ट्रेटेजिकली भारतीय सेना किसी भी समय जो है अब मूव कर सकती हैं और बिना किसी जो है दिक्कत के क्योंकि लगातार हमने देखा कि कारगिल युद्ध में जोजिला दर बंद होने की वजह से किस तरह की कठिनाइयों का सामना करना पड़ा लेकिन अब धीरे-धीरे वो तमाम कठिनाइयां दूर होंगी और जो चाइना के साथ लगने वाली सीमा है वो देश के और ज्यादा करीब हो गई है। कई महीने देश से कटे रहने वाला लद्दाख अब महीने देश से जुड़ा रहेगा। 4 से 5 साल की अथक मेहनत के बाद अब लद्दाख और जम्मू कश्मीर के लोगों का सपना साकार होने जा रहा है। देश की सेना के लिए यह बहुत बहुत ही महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके थ्रू वो पूरा इधर-उधर जा सकते हैं। लद्दाख की की तरफ से जा सकते हैं और आपका बालटाल की तरफ से ये टनल जहां से आउट होती है अगर आप लद्दाख से आए तो हमारी कंट्री को सेफ्टी के लिए सिक्योरिटी के लिए हमारी आर्मी हमारी डिफेंस के लिए ये बहुत ही अच्छी बहुत ही एक तरह से वरदान साबित हो रही है और लद्दाख के लोग भी बहुत खुश हैं क्योंकि वो इसके थ्रू बिल्कुल कनेक्ट रह सकते हैं। कश्मीर से अब उनको छ महीने बंद रहने की जरूरत नहीं है। वो 12 महीने तक आवाजावी उनकी रह सकती है। और जहां तक मैं बात करूं इस टनल को बन के आने के लिए इसमें चार से पांच साल हमें लग गए हैं। जोजिला टनल की शुरुआत भारतीय इंजीनियरिंग का नायाब नमूना है। सालों की मेहनत, जान का जोखिम और फिर एक सपने का साकार हो जाना। इस टनल के सपने के साकार हो जाने के पीछे जिन कर्मवीरों की मेहनत और लगन है उन पर राष्ट्र को गर्व है। ऐसे लोग ही भारत की विकास यात्रा को आगे ले जा रहे हैं जिससे भारत विश्व पटल पर नए कीर्तिमान स्थापित कर रहा है। जैसे ही नवंबर दिसंबर में भारी बर्फबारी शुरू होती है, लद्दाख का यह हिस्सा देश से कट जाता है। लद्दाख के लोगों को राशन, दवाई, ईंधन, हवाई जहाज से प्रेजना। सेना के सामान की सप्लाई भी काफी हद तक हवाई मार्ग पर ही निर्भर होती है। लेकिन सुरंग का काम मुकम्मल हो जाने से आम लोगों के साथ-साथ सेना को भी बड़ी राहत मिलेगी।&nbsp;</div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 11 Jun 2026 14:27:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/mission-z-operation-that-unsettles-the-adversary</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[जनता, जमीन, सभ्यता वही, जहां चल रही अभी Modi 'Govern'ment, उस भारत पर कभी नेहरू ने किया Rule]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/india-where-the-modi-government-currently-operates-as-india-over-which-nehru-once-ruled]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>इतिहास की किताबों में आज का दिन एक नए अध्याय के रूप में दर्ज हो गया है। आज नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को पीछे छोड़ दिया है। यह मुकाबला किसी चुनावी रैली या टीवी डिबेट का नहीं था, बल्कि यह उस रिकॉर्ड का है जो किसी भी लोकतंत्र की रीढ़ होता है यानी जनता का अटूट भरोसा और पद पर निरंतरता। आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल के लगातार 4399 दिन पूरे हो गए हैं, और इसी के साथ टूट गया है पंडित नेहरू का सबसे लंबा निरंतर बने रहने का रिकॉर्ड। लेकिन इस महा-रिकॉर्ड के भीतर छिपे दिलचस्प गणित को गौर से देखना होगा। कहने को नेहरू जी कुल 6130 दिन प्रधानमंत्री की कुर्सी पर रहे, लेकिन सच यह है कि उनके शुरुआती 1732 दिन 'इलेक्शन' से नहीं बल्कि 'सिलेक्शन' से तय हुए थे। 15 अगस्त 1947 को माउंटबेटन की सहमति और महात्मा गांधी के निर्देश पर कांग्रेस वर्किंग कमेटी ने उन्हें देश का मुखिया चुना था। असली लोकतंत्र की शुरुआत हुई 1952 के पहले आम चुनाव से, जब 13 मई 1952 को नेहरू जी एक निर्वाचित प्रधानमंत्री बने। उस दिन से लेकर उनके अंतिम समय तक का सफर 4398 दिनों का था। वहीं दूसरी तरफ, नरेंद्र मोदी का एक भी दिन बिना चुनाव के नहीं बीता। 26 मई 2014 से लेकर आज तक, उन्होंने लगातार तीन आम चुनावों में पूर्ण बहुमत और जनता के सीधे जनादेश की अग्निपरीक्षा को पार किया है। यह बदलाव सिर्फ आंकड़ों का नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के बदलते मिजाज का प्रतीक है। पंडित नेहरू और नरेंद्र मोदी दोनों ने एक ही देश को चलाया। दोनों के पास वही जनता थी, वही जमीन थी, वही सभ्यता थी। लेकिन एक ने अपने राजनीतिक फैसलों से भारत को उसकी जड़ों से काटने का सतत प्रयास किया और दूसरे ने उन जड़ों को वापस सींचने का और आज हम उसी फर्क की बात करेंगे।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/india-deployed-12-nuclear-bombs-for-the-first-time-the-revelation-shook-the-world" target="_blank">भारत ने पहली बार तैनात किए 12 परमाणु बम, खुलासे से हिली दुनिया!</a></h3><h2>146 करोड़ लोगों का नेतृत्व 12 साल से</h2><div>146 करोड़ की आबादी, भाषाई-सांस्कृतिक विविधता, विशाल भौगोलिक विस्तार वाले देश में इतने लंबे समय निर्वाचित सरकार का नेतृत्व।</div><div>जब कई देशों में सरकारें बार-बार बदल रही हैं, 12 वर्षों तक नेतृत्व और नीतियों में निरंतरता।</div><div>2014, 19 व 24 में लगातार चुनाव जीतकर मोदी ने सरकार बनाई।&nbsp;</div><div>नेहरू के बाद ऐसा करने वाले पहले पीएम हैं। पहले गैर-कांग्रेसी पीएम, जिन्होंने दो पूर्ण बहुमत कार्यकाल पूरे किए।&nbsp;</div><h2>मोदी राज की 12 बड़ी उपलब्धियां</h2><div>2014: 58 करोड़ से ज्यादा जनधन बैंक खाते खोले गए।</div><div>2015: 51 लाख करोड़ का डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर। 4 लाख करोड़ का लीकेज रुका।</div><div>2016: उज्ज्वला में 11 करोड़</div><div>गरीबों को एलपीजी कनेक्शन। इसी साल उरी हमले के बाद पीओके में सर्जिकल स्ट्राइक।</div><div>2017: एकीकृत कर व्यवस्था की सबसे बड़ी योजना जीएसटी।</div><div>2018: आयुष्मान भारत से 60 करोड़ की स्वास्थ्य सुरक्षा।</div><div>2019: जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा और अनुच्छेद 370 खत्म।</div><div>2020-21: 220 करोड़ से ज्यादा कोविड वैक्सीन डोज।</div><div>2022: हर घर जल मिशन में 16 करोड़ घरों तक जल पहुंचा।</div><div>2023: पहली बार जी-20 की अध्यक्षता और सफल मेजबानी।</div><div>2024: अयोध्या राम मंदिर में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा; भाजपा का प्रमुख वादा पूरा।</div><div>2025: जापान को पछाड़ चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था भारत।</div><div>2025: पहलगाम हमले के बाद पाकिस्तान पर ऑपरेशन सिंदूर के तहत सैन्य कार्रवाई।&nbsp;</div><h2>32 देशों ने किया सम्मानित</h2><div>पीएम मोदी को 32 देशों व अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा सर्वोच्च या नागरिक सम्मान से सम्मानित किया गया है। इनमें मुख्य रूप से फ्रांस, रूस, सऊदी अरब और यूएई का सम्मान शामिल है। मोदी ने अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस, समेत दुनिया के 15 देशों की संसद को संबोधित किया है।</div><h2>सत्ता हासिल करना लक्ष्य नहीं</h2><div>गांधीजी ने कांग्रेस की 15 प्रांतीय समितियों में से 12 द्वारा सरदार पटेल के पक्ष में दिए गए समर्थन को दरकिनार करते हुए नेहरू का समर्थन किया, जबकि बाकी 3 समितियां तटस्थ रहीं। बाद में नेहरू ने भारत के पहले बड़े राजनीतिक वंश की नींव रखी और इंदिरा गांधी को अपना उत्तराधिकारी बनाने की दिशा में काम किया। नरेंद्र मोदी ने बीजेपी के लिए कई चुनाव जिताए, लेकिन स्वयं कोई निर्वाचित पद नहीं मांगा। 51 वर्ष की उम्र में पार्टी के कहने पर उन्होंने गुजरात के मुख्यमंत्री की क जिम्मेदारी संभाली। मोदी को अधिकांश नेताओं से अलग करने वाली बात उनके क उद्देश्य की स्पष्टता है। उनका लक्ष्य कभी केवल सत्ता हासिल करना नहीं रहा। गांधीजी की तरह सेवा और त्याग उनके लिए सिर्फ शब्द नहीं, जीवन का उद्देश्य है। आने वाले दशकों में नरेंद्र मोदी एक प्रतिष्ठित और ऐतिहासिक व्यक्तित्व के रूप में स्थापित होंगे। भविष्य के प्रधानमंत्री, चाहे किसी भी दल के हों, वे नरेंद्र मोदी की कार्यशैली और नेतृत्व से प्रेरणा लेने की कोशिश करेंगे। आने वाले समय में हर प्रधानमंत्री का मूल्यांकन नरेंद्र मोदी द्वारा स्थापित मानकों के आधार पर किया जाएगा।</div><h2>मोदी जिस शासन को चला रहे, उस देश पर नेहरू ने कभी राज किया</h2><div>पीएम मोदी भारत की सरकार चलाते हैं, विरोधी भले ही कहें कि वे बहुत सख्ती से काम करते हैं, लेकिन शायद भारत जैसे देश को चलाने के लिए ऐसी ही सख्ती चाहिए। पर नेहरू ने भारत में सरकार नहीं चलाई, नेहरू ने भारत पर राज किया। राज करने और सरकार चलाने में एक छोटा सा फर्क है। अंग्रेजी शब्द "गवर्न" असल में एक यूनानी शब्द से बना है जिसका मतलब होता है जहाज को रास्ता दिखाना। देश रूपी जहाज को अपनी मनपसंद दिशा में ले जाने के लिए सिर्फ मजबूत इरादा ही काफी नहीं होता। अच्छी तरह सरकार चलाने के लिए नेता को राजनीति की हवा और चुनाव के उतार-चढ़ाव को समझना पड़ता है। एक तानाशाह कभी भी अच्छी सरकार नहीं चला सकता। अमेरिकी अंग्रेजी में जिस "रूलर" शब्द का इस्तेमाल होता है, उसे ही हम भारत में मापने वाला "स्केल" कहते हैं। इसका सीधा सा मतलब यह हुआ कि जो नेता राज करता है, वो समाज को अपनी मर्जी और अपने पैमाने से हांकता है, उसे सीधा करता है। वो खुद समाज के हिसाब से नहीं बदलता, बल्कि पूरे समाज को उसके हिसाब से बदलना पड़ता है। आजादी के वक्त पंडित नेहरू भारी बहुमत के साथ सत्ता के शीर्ष पर बैठे थे और अपनी हुकूमत के दौरान उन्होंने इस प्रचंड बहुमत को बनाए रखा। नतीजा क्या हुआ? जब अखबारों ने उनके खिलाफ लिखना शुरू किया, तो नेहरू जी ने प्रेस पर सेंसरशिप लगाने की ताकत अपने हाथ में ले ली। जब देश के बड़े उद्योगपतियों ने उनकी पंचवर्षीय योजनाओं का विरोध किया, तो उन्होंने खुद को यह पावर दे दी कि वे जब चाहें उन निजी कंपनियों का राष्ट्रीयकरण कर दें, यानी उन्हें सरकारी घोषित कर दें। इसके उलट, मोदी तीन बड़े पॉलिसी लक्ष्यों के साथ सत्ता में आए थे। उन्हें आर्टिकल 370 हटाने में पाँच साल और राम मंदिर बनने में लगभग 10 साल लग गए। भारत में अभी भी यूनिफॉर्म सिविल कोड नहीं है और 2029 से पहले इसके आने की संभावना भी कम है।</div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 10 Jun 2026 14:37:00 +0530</pubDate>
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      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[भारत की न्यूक्लियर डॉक्टरेन में बड़ा बदलाव, SIPRI की रिपोर्ट देख कांप उठेगा पाकिस्तान!]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/india-has-made-a-major-change-in-its-nuclear-doctrine]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>दुनिया में एक बार फिर परमाणु हथियारों की दौड़ तेज होती दिखाई दे रही है। रूस अपने जखीरे को आधुनिक बना रहा है। अमेरिका नई पीढ़ी के परमाणु सिस्टम तैयार कर रहा है। चीन रिकॉर्ड रफ्तार से परमाणु हथियार बढ़ा रहा है और अब भारत को लेकर भी एक बड़ा खुलासा हुआ है। दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित रक्षा शोध संस्थानों में से एक एसआईपीआरआई की नई रिपोर्ट कहती है कि पिछले 1 साल में भारत ने अपने परमाणु हथियारों की क्षमता में बहुत बढ़ोतरी की है। इतना ही नहीं रिपोर्ट के मुताबिक भारत ने इस दौरान पाकिस्तान की तुलना में ज्यादा तेजी से अपनी न्यूक्लियर ताकत बढ़ाई है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल है कि आखिर भारत को इसकी जरूरत ही क्यों पड़ी? क्या इसकी वजह ऑपरेशन सिंदूर है? क्या चीन की बढ़ती ताकत इसके पीछे है और क्या दुनिया की फिर एक नए न्यूक्लियर युग में प्रवेश होना है तो स्वीडन स्थित स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट यानी एसआईपीआरआई ने अपनी वार्षिक रिपोर्ट 2026 जारी की है। रिपोर्ट दुनिया के परमाणु हथियारों, सैन्य खर्च और रणनीतिक ताकत का सबसे विश्वसनीय आकलन मानी जाती है। रिपोर्ट का सबसे अहम निष्कर्ष यह है कि दुनिया में परमाणु हथियारों की संख्या फिर से बढ़ने लगी है। एसआई एक पीआरआई रिपोर्ट 2026 के मुताबिक दुनिया के नौ परमाणु देश अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस, ब्रिटेन, भारत, पाकिस्तान, इजराइल और उत्तर कोरिया यह सभी देश अपने परमाणु शस्त्रगार को आधुनिक बनाने और विस्तार देने में जुटे हुए हैं। लेकिन दक्षिण एशिया में सबसे ज्यादा चर्चा भारत और पाकिस्तान को लेकर हो रही है। दरअसल मई 2026 में हुए ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत ने अपनी रणनीतिक सुरक्षा व्यवस्था की व्यापक समीक्षा शुरू की थी। सीमा पर बढ़ते तनाव, चीन और पाकिस्तान की सैन्य साझेदारी और बदलते युद्ध के स्वरूप को देखते हुए भारत ने अपनी न्यूक्लियर डिटरेंस यानी परमाणु प्रतिरोधक क्षमता को और मजबूत करने पर जोर दिया। भारत ने अपनी ताकत क्यों बढ़ाई है? ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत ने समीक्षा की। दो मोर्चों की चुनौती भारत के सामने थी। चीन और पाकिस्तान का सहयोग। लंबी दूरी की मारक क्षमता पर भारत ने काम किया और विश्वसनीय न्यूक्लियर डिटरेंस पर भारत ने तेजी से काम शुरू करने दिया।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/rebellion-against-pakistan-army-in-pojk-people-take-to-the-streets-area-cut-off-from-the-world" target="_blank">POJK में Pakistan Army के खिलाफ बगावत, सड़कों पर उतरे लोग, दुनिया से कटा इलाका</a></h3><h2>12 न्यूक्लियर वॉर हेड्स मिसाइल्स के ऊपर माउंट कर दिए</h2><div>न्यूक्लियर डिटरेंस का मतलब होता है एक ऐसी ताकत जिसे देखकर दुश्मन हमला करने से पहले 100 बार सोचे। यानी परमाणु हथियारों का उद्देश्य युद्ध लड़ना नहीं होता बल्कि युद्ध को रोकना होता है। और यही वजह है कि दुनिया की सबसे बड़ी ताकतें लगातार अपने परमाणु सिस्टम को अपग्रेड करती रहती&nbsp; हैं। लेकिन एसआईपीआरआई रिपोर्ट में एक और नाम है जो भारत और पाकिस्तान दोनों से कहीं ज्यादा आगे निकल चुका है और वो है चीन। एशिया का न्यूक्लियर समीकरण अगर हम समझें तो यह आपको इस तरह समझना होगा। भारत, पाकिस्तान और चीन जैसे भारत क्षमता में वृद्धि कर रहा है। पाकिस्तान सीमित विस्तार तक है और चीन सबसे तेज विस्तार कर रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक चीन लगातार अपने परमाणु हथियारों की संख्या बढ़ा रहा है। एक्सपर्ट्स का यह मानना है कि चीन सिर्फ संख्या नहीं बढ़ा रहा बल्कि जमीन, समुद्र और हवा तीनों प्लेटफार्म पर अपनी न्यूक्लियर क्षमता को मजबूत कर रहा है। और यही वजह है कि भारत की रणनीतिक योजनाओं में अब सिर्फ पाकिस्तान नहीं है बल्कि चीन भी एक बड़ा फैक्टर बन चुका है। वैसे तो हर साल सिप्री की रिपोर्ट आती है न्यूक्लियर वॉर हेड्स को लेकर कि अमेरिका के पास, रशिया के पास, पाकिस्तान, भारत के पास कितना न्यूक्लियर वॉर हेड्स है। तो यह हर साल आता है। लेकिन इस बार एक बड़ा बदलाव हुआ है। बसे इंपॉर्टेंट खबर है इसमें वो यह है। इंडिया डिप्लॉयज़ एक्टिव न्यूक्लियर वॉर हेड्स ऑन मिसाइल्स। भारत ने पहली बार मतलब जो सिप्री की रिपोर्ट के आधार पर बताया जा रहा है, भारत ने पहली बार 12 न्यूक्लियर वॉर हेड्स मिसाइल्स के ऊपर माउंट कर दिए हैं।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/why-did-8-ips-officers-suddenly-reach-the-pakistan-border-what-is-india-going-to-do" target="_blank">Pakistan Border पर अचानक क्यों पहुंचे 8 IPS अधिकारी, क्या करने वाला है भारत?</a></h3><h2>दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा सैन्य खर्चकर्ता</h2><div>स्टॉकहोम इंस्टीट्यूट (सिपरी) की रिपोर्ट के मुताबिक भारत ने पहली बार 12 परमाणु हथियार मोर्चे पर तैनात किए हैं। वहीं, देश का कुल परमाणु जखीरा बढ़कर 190 तक पहुंच गया है। इसी बीच देश का 2025 में सैन्य खर्च 92.1 अरब डॉलर रहा, जिससे वह दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा सैन्य खर्चकर्ता बना। हथियार आयात में दूसरे स्थान पर रहा। न्यूक्लियर डिटरेंस का मतलब होता है एक ऐसी ताकत जिसे देखकर दुश्मन हमला करने से पहले 100 बार सोचे। यानी परमाणु हथियारों का उद्देश्य युद्ध लड़ना नहीं होता बल्कि युद्ध को रोकना होता है। और यही वजह है कि दुनिया की सबसे बड़ी ताकतें लगातार अपने परमाणु सिस्टम को अपग्रेड करती रहती हैं। लेकिन एसआईपीआरआई रिपोर्ट में एक और नाम है जो भारत और पाकिस्तान दोनों से कहीं ज्यादा आगे निकल चुका है और वो है चीन। एशिया का न्यूक्लियर समीकरण अगर हम समझें तो यह आपको इस तरह समझना होगा। भारत, पाकिस्तान [संगीत] और चीन जैसे भारत क्षमता में वृद्धि कर रहा है। पाकिस्तान सीमित विस्तार तक है और चीन सबसे तेज विस्तार कर रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक चीन लगातार अपने परमाणु हथियारों की संख्या बढ़ा रहा है। एक्सपर्ट्स का यह मानना है कि चीन सिर्फ संख्या नहीं बढ़ा रहा बल्कि जमीन, समुद्र और हवा तीनों प्लेटफार्म पर अपनी न्यूक्लियर क्षमता को मजबूत कर रहा है। और यही वजह है कि भारत की रणनीतिक योजनाओं में अब सिर्फ पाकिस्तान नहीं है बल्कि चीन भी एक बड़ा फैक्टर बन चुका है।&nbsp;</div><div>&nbsp;</div><div><b>&nbsp;2026 में 100 परमाणु हथियार ज्यादा तैनात</b></div><table class="table table-bordered"><tbody><tr><td>&nbsp;<b>देश</b></td><td><p>&nbsp;<b>तैनात</b></p><p><b>2025&nbsp;</b></p></td><td><p>ऑप&nbsp;<b>तैनात</b></p><p><b>2026&nbsp;</b></p></td><td>&nbsp;<b>कुल इन्वेंट्री</b></td></tr><tr><td>&nbsp;यूएस</td><td>&nbsp;1770</td><td>&nbsp;1770</td><td>&nbsp;5042</td></tr><tr><td>&nbsp;रूस</td><td>&nbsp;1718</td><td>&nbsp;1796</td><td>&nbsp;5420</td></tr><tr><td>&nbsp;चीन&nbsp;</td><td>&nbsp;24</td><td>&nbsp;34</td><td>&nbsp;620</td></tr><tr><td>&nbsp;भारत</td><td>&nbsp;-</td><td>&nbsp;12</td><td>&nbsp;190</td></tr><tr><td>&nbsp;पाक</td><td>&nbsp;-</td><td>&nbsp;-</td><td>&nbsp;170</td></tr><tr><td>&nbsp;अन्य</td><td>&nbsp;400</td><td>&nbsp;400</td><td>&nbsp;745</td></tr><tr><td>&nbsp;कुल</td><td>&nbsp;3912</td><td>&nbsp;4012</td><td>&nbsp;12187</td></tr></tbody></table><div>&nbsp;</div><h2>पूरे चीन तक पहुंचने वाली क्षमता पर भारत का जोर</h2><div>सिपरी के अनुसार, भारत लंबी दूरी के हथियारों पर केंद्रित हो रहा है, ताकि पूरे चीन तक मारक पहुंच बन सके। पाकिस्तान के साथ पुरानी प्रतिद्वंद्विता भी योजना का हिस्सा है। वहीं, भारत नए परमाणु डिलीवरी सिस्टम पर भी काम कर रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, ऑपरेशन सिंदूर के दौरान सैन्य संघर्ष में पहली बार साइबर मोर्चा भी खुला।</div><h2>पाकिस्तान के पास 170 परमाणु हथियार</h2><div>रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान के पास करीब 170 पर माणु हथियार है। पाकिस्तान छोटे और सामरिक परमाणु हथियारों पर ज्यादा ध्यान दे रहा है, जबकि भारत लंबी दूरी और सुरक्षित जवाबी हमला करने की क्षमता विकसित कर रहा है। SIPRI ने चेतावनी दी है कि वैश्विक स्तर पर परमाणु हथियारों का खतरा फिर बढ़ रहा है। जनवरी 2026 तक दुनिया में कुल 12,187 परमाणु हथियार थे। इनमें से हजारों तत्काल इस्तेमाल की स्थिति में रखे गए हैं। देशों की बढ़ती परमाणु निर्भरता भविष्य में बड़े संकट और गलत आकलन का कारण बन सकती है।</div><h2>लंबी दूरी की मिसाइलों पर फोकस&nbsp;</h2><div>भारत नई पीढ़ी की तकनीकों पर तेजी से काम कर रहा है। इनमें सबसे अहम है MIRV तकनीक। इसके जरये एक ही बलिस्टिक मिसाइल कई परमाणु वॉरहेड ले जा सकती है और अलग-अलग लक्ष्यों को निशाना बना सकती है।</div><h2>समुद्र में बढ़ी परमाणु ताकत</h2><div>रिपोर्ट में भारत की समुद्री परमाणु क्षमता को भी बेहद अहम बताया गया है। भारत की परमाणु पनडुब्बियां खासकर अरिहंत, इस क्षमता का बड़ा आधार है। भारत एटमी हथियारों से लैस मिसाइलें पनडुब्बियों में तैनात कर रहा है।</div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 09 Jun 2026 13:37:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/india-has-made-a-major-change-in-its-nuclear-doctrine</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[भारत को किस बड़े जंग के लिए तैयार कर रहा रूस? किसी का चैन गया, किसी का गला सूखा]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/what-major-war-is-russia-preparing-india-for]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>वैश्विक हालात इस वक्त किसी चेसबोर्ड की तरह हैं, जहां भारत एक बार फिर से चेकमेट की तरफ है। यहां हर पल नए बदलाव हो रहे हैं, लेकिन भारत हर मोड़ पर खुद को बलवान साबित कर रहा है। एक तरफ ट्रंप भारत को टैरिफ वाली धमकी देते हैं। दूसरी तरफ व्लादिमीर पुतिन हैं जो भारत को सबसे एडवांस फाइटर जेट साथ बनाने का ऑफर दे रहे हैं। भारत अपनी स्वदेशी तकनीक और रक्षा बजट में भारी बदलाव कर रहा है। जिससे चीन और पाकिस्तान का गला अभी से सूख रहा है। दुनियाभर को आंख दिखाने वाले डोनाल्ड ट्रंप भारत के साथ डील करने की बातों को दोहरा रहे हैं। ऐसे में सवाल ये उठता है कि क्या डोनाल्ड ट्रंप का बारूदी पावर अब शिफ्ट हो रहा है। भारत को दी गई धमकी अब ट्रंप को महंगी पड़ने वाली है। क्या ट्रंप को ट्रेलर दिखने लगा है। क्या रूस भारत की दोस्ती अमेरिका को करारा जवाब देने की तैयारी कर रही है। स्ट्रैटजिक ऑटोनॉमी का ये अध्याय दुनिया को बता रहा है कि भारत किसी के दवाब में नहीं आता है। आज का एमआरआई इसी विषय पर करेंगे कि भारत कैसे मजबूत हो रहा है और अमेरिका भारत की तरफ डील को लेकर आंखें उठाकर देख रहा है।</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/china-arrives-to-survey-russian-military-base-shock-to-india" target="_blank">रूसी मिलिट्री बेस का सर्वे करने पहुंचा चीन, भारत को झटका!</a></h3><h2>ब्रह्मोस से लेकर सुखोई एसयू-57 तक&nbsp;</h2><p>भारत और रूस के बीच रक्षा सहयोग की लंबी कहानी में अब एक नया अध्याय जुड़ सकता है।&nbsp;राष्ट्रपति व्लादमीर पुतिन ने भारत को एक लड़ाकू गिफ्ट देने की बात कही है। पुतिन ने एक बयान में कहा है कि वह भारत के साथ मिलकर सुखोई एसयू&nbsp;<span style="font-size: 1rem;">57</span><span style="font-size: 1rem;"> </span><span style="font-size: 1rem;">को डेवलप करना चाहते हैं। एसयू 57 एक फिफ्थ जनरेशन का सेल फाइटर जेट है। प्रेसिडेंट पुतिन ने कहा है कि वो भारत के साथ मिलकर इसको डेवलप करना चाहते हैं। भारत और रूस ने मिलकर फिफ्थ जनरेशन फाइटर जेट प्रोग्राम की बात थी। स्टेल्थ फाइटर जेट होना था उसको डेवलप करने की बात हुई थी। 2017-18 के आसपास कुछ कारणों से बात नहीं बनी। भारत ने खुद को इस प्रोग्राम से अलग कर दिया।&nbsp;</span><span style="font-size: 1rem;">एसयू 57&nbsp;</span><span style="font-size: 1rem;">वही प्रोग्राम का हिस्सा है।</span><span style="font-size: 1rem;">&nbsp;फरवरी 2025 में यह जेट भारत आया था। एरो इंडिया एयर शो में ये जेट आया था और उस समय भी बातें चली थी कि रूस ने कहा है कि हम आपको&nbsp; प्रोडक्शन&nbsp;</span><span style="font-size: 1rem;">देंगे</span><span style="font-size: 1rem;">। जैसे कि Sukhoi सु 30 के मामले में हम देखते हैं कि एक बहुत ही बढ़िया जेट है।&nbsp;</span>&nbsp;भारत रूस में एसयू57 को लेकर पहली बार एरो इंडिया में ऑफर आया। इसके बाद भी कई बार यह खबरें आती रही। रूसी मीडिया आउटलेट से भी, भारतीय मीडिया और फॉरेन मीडिया कई सारे ने इसको रिपोर्ट किया कि रूस बार-बार हमें ऑफर कर रहा है बैक चैनल से, फ्रंट चैनल से और अब जाकर प्रेसिडेंट की तरफ से ऑफर आया है।&nbsp;</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/why-is-xi-jinping-who-usually-avoids-foreign-trips-suddenly-visiting-north-korea" target="_blank">विदेश दौरों से परहेज करने वाले Xi Jinping अचानक North Korea क्यों जा रहे?</a></h3><h2>1996 को हुई थी सुखोई की पहली डील</h2><p>भारत और रूस के बीच पहली सुखोई डील 30 नवंबर 1996 को हुई थी। इस डील की कुल कीमत 1.462 बिलियन अमेरिकी डॉलर यानी उस समय के हिसाब से लगभग 7155 करोड़ थी। शुरू में 50 विमानों की डील हुई थी जिनमें 40 एसयू 30 के और 10 एसयू 30 एमकेआई शामिल था। यह डील रूस के साथ भारत की अब तक की सबसे बड़ी डिफेंस डील थी। शुरू में एसयू 30 के आया लेकिन बाद में भारत ने एसयू30 एमकेआई इंडिया स्पेसिफिक वर्जन की मांग कर दी। 1998 से 2000 के बीच सुखोई की पहली खेप भारत पहुंची। इस डील के बाद भारत ने कई फॉलो ऑन ऑर्डर दिए जिससे कुल संख्या 270 से ज्यादा हो गई। इस डील ने भारत रूस रक्षा संबंधों को नया आयाम दिया। पहले भारत मुख्य रूप से मिग 21 मिग 29 पर निर्भर था। एसयू 30 एमKI ने इंडियन एयरफोर्स को हैवी मल्टी रोल फाइटर कैपेबिलिटी दी। भारत के पास इस वक्त सुखोई के दो वर्जन हैं। पहला एसयू 30 एमKI यह भारत के लिए कस्टमाइज वर्जन है और दुनिया के सबसे कैपेबल ट्विन सीटर फाइटर्स में से एक है। हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड नासिक में इसका लाइसेंस प्रोडक्शन कर रहा है। दूसरा है सुपर Sukoi सुपर 30 यानी SQ30 का अपग्रेडेड वर्जन। इसके अंदर भारतीय विरुपक्षा रडार लगा है। साथ ही बेहतर रडार वार्निंग और डिजिटल सिस्टम लगा है। अपग्रेड करने का मुख्य लक्ष्य इसे 4.5 प्लस जनरेशन स्तर का बनाना और इसका जीवन 20 से 25 साल बढ़ाना था।&nbsp;</p><h2>सुखोई 57 का ऑफर&nbsp; ट्रंप की चिंताओं को बढ़ाने के लिए काफी</h2><p>भारत इस वक्त दुनिया भर में हथियारों के सबसे बड़े खरीदार में से एक है। गौरतलब है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पिछले साल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की व्हाइट हाउस यात्रा के दौरान भारत को F35 की पेशकश की थी। अब पुतिन के नए प्रस्ताव के बाद माना जा रहा है कि रूस इन पुरानी चिंताओं को दूर करने की कोशिश कर रहा है। पुतिन के इस ऑफर के ठीक बाद ट्रंप ने प्रधानमंत्री मोदी के लिए बड़ी बात कही और डोनाल्ड ट्रंप ने यह साफ कर दिया कि वो भारत से डील करने के लिए बेताब है। ट्रंप एक तरफ तो भारत के खिलाफ दबाव की रणनीति अपनाते हैं तो दूसरी तरफ पीएम मोदी की तारीफ कर मामले को बैलेंस करने की भी पूरी कोशिश करते हैं। लेकिन पुतिन भी एक मझे हुए राजनेता हैं और वो किसी भी कीमत पर अपने पुराने साथी भारत के साथ रिश्ते को कमजोर नहीं होने देना चाहते हैं। पुतिन ने अपने संबोधन के दौरान सुखोई डील की बात की। साथ ही भारत को लेकर कई और अहम बातें कही। राष्ट्रपति पुतिन ने कहा भारत एक मजबूत और स्वतंत्र देश है जो अपने राष्ट्रीय हितों के हिसाब से फैसला लेता है। दोनों देशों के रिश्ते दशकों पुराने हैं। कई कोशिशों के बावजूद यह रिश्ता लगातार मजबूत हुआ है। भारत का अपने हितों के मुताबिक दुनिया के अलग-अलग देशों के साथ संबंध विकसित करना स्वाभाविक है। भारतीयों की मेहनत और प्रतिभा के बदौलत भारत दुनिया की सबसे बड़ी और सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हुआ। पुतिन ने भारत की आर्थिक प्रगति का क्रेडिट पीएम मोदी को दिया। अनुमान है कि भारत रूस व्यापार आगे बढ़कर 100 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। व्लादमीर पुतिन की ये बातें और सुखोई 57 का ऑफर डोनाल्ड ट्रंप की चिंताओं को बढ़ाने के लिए काफी है। साथ ही यह बात भारत के दो पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान और चीन की बेचैनी को सातवें आसमान पर ले जाएंगी।</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/what-pakistan-feared-russia-did-the-same-for-india" target="_blank">जिसका पाकिस्तान को डर था, रूस ने भारत के लिए वही कर डाला!</a></h3><h2>टेक्नोलॉजी ट्रांसफर करने को पूरी तरह से तैयार</h2><p>अमेरिका के पास दुनिया का सबसे ताकतवर एयर डोमिनेंस फाइटर जेट लॉक हीड मार्टिन F52 रैप्टर है। सबसे एडवांस्ड मल्टी रोल फाइटर F35 लाइटनिंग टू देने का ऑफर अमेरिका पहले ही भारत को दे चुका है। चीन के पास J20 माइटी ड्रैगन फाइटर जेट है और यह चीन का फिफ्थ जनरेशन स्टिल्थ फाइटर जेट है। यह एशिया पेसिफिक में सबसे ताकतवर माना जाता है। लेकिन अब रूस ने भारत को सुखोई यानी कि एसयू 57 और साथ में उसे बनाने तक का ऑफर दे दिया। यहां तक कि रूस ने कहा कि वो टेक्नोलॉजी ट्रांसफर करने को पूरी तरह से तैयार है। ऐसे में भारत के लिए यह डील काफी फायदेमंद हो सकती है। Sukoi 57 अमेरिका के F22 और F35 का रूसी जवाब माना जाता है। आखिर रूस के इस फिफ्थ जनरेशन फाइटर जेट में क्या खास है कि दुनिया भर के कई मुल्क इसे हासिल करना चाहते हैं। लेकिन रूस इसे बनाने का ऑफर भी भारत को दे रहा है। Sukoi 57 दुनिया के सबसे मेन्यूरेबल फाइटर जेट्स में से एक है। 3D थ्रस्ट इंजन और रिलैक्स्ड स्टेबिलिटी डिजाइन की वजह से यह एक्सट्रीम मूवमेंट्स कर सकता है। जिसकी वजह से क्लोज कॉम्बैट में यह Sukhoi 57 बेहद खतरनाक साबित हो जाता है। इसकी दूसरी सबसे खास बात ये कि सुपर क्रूज क्षमता वाला यह फाइटर जेट ये मैक 1.3 की स्पीड से ट्रैवल कर सकता है। इससे ईंधन की बचत होती है, रेंज बढ़ती है और मिसाइलों का प्रभाव इसमें काफी ज्यादा बढ़ जाता है। मिसाइलों की प्रभावी दूरी इसमें बढ़ जाती है। अधिकतम स्पीड इसकी मैक टू मानी जाती है। Sukoi 57 के अंदर हथियार रखने की भी व्यवस्था है। जिसकी वजह से इसका रडार क्रॉस सेक्शन काफी ज्यादा कम है। यह एक साथ 60 टारगेट्स को ट्रैक कर सकता है और एक बार में उनमें से 16 पर हमले कर सकता है। इसके अंदर एडवांस्ड सेंसर फ्यूज़, साइड लुकिंग रडार्स और इंफ्रारेड सर्च एंड ट्रैक सिस्टम लगे हुए हैं। इसकी ऑटोमेशन टेक्नोलॉजी से पायलट का वर्क लोड काफी ज्यादा कम हो जाता है। यह भारी हथियार ले जाने में सक्षम है। लॉन्ग रेंज एयर टू एयर मिसाइल के साथ क्रूज मिसाइल और हाइपरसोनिक हथियार भी इसके माध्यम से ले जाया जा सकता है। ऐसे में भारत की डील इसके साथ होना और इसका भारत में बनना यह भारत के लिए गौरवान्वित करने वाला क्षण है।&nbsp;</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/india-never-accepts-orders-from-any-foreign-power-putin-stern-reply-to-trump" target="_blank">'भारत कभी किसी विदेशी ताकत के आदेश नहीं मानता', पीएम मोदी पर दबाव बनाना बेकार, ट्रंप को पुतिन का कड़ा जवाब</a></h3><h2>इस ऑफर को कैसे देखा जाना चाहिए?&nbsp;</h2><p>भारत अपना एमका बना रहा है। आज से 40 साल बाद का भारत अलग होगा और हम हमाशे किसी दूसरे देश पर निर्भर नहीं रह सकते। रूस से हमारे बहुत पुराने समझौते हैं तो हमको उसको भी साथ लेकर चलना होता है। रूस ने अधिकतर जंगों में भारत का मतलब यूए यूनाइटेड नेशन से लेकर कई ऐसे फोरम्स में साथ देता है। अब भारत थोड़े से थिंकिंग मोड में है कि रूस के पास जाए या अमेरिका से बात करें या खुद का डेवलप करें। हालांकि खुद के डेवलप में कोई डाउट नहीं है। लेकिन हां रूस और अमेरिका के ऑफर्स के बीच भारत थोड़ा सा पेंच में है। जिओपॉलिटिक्स में आप किसी को नाराज नहीं करना चाहते दोनों में से। दोनों से आपके अमेरिका से प्रेसिडेंट ट्रंप की जो कुछ अभी जो टैरिफ लगा रहे हैं वो उसकी वजह से कुछ संबंध खराब या संबंध में थोड़ी सी मतलब खराबी आई है या उस तरीके से नहीं रहे कि&nbsp; अमेरिका हमारा दुश्मन बन गया है। अब देखना ये है कि भारत अभी यहां पर क्या स्टैंड लेता है?&nbsp;&nbsp;</p>]]></description>
      <pubDate>Mon, 08 Jun 2026 14:18:42 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/what-major-war-is-russia-preparing-india-for</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[जिसने आज तक नहीं जीता कोई चुनाव, तमिलनाडु में विजय से ज्यादा वो चर्चा में क्यों? अन्नामलाई का गेम और शाह का प्लान, पूरी कहानी कुछ और है]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/why-is-someone-who-has-never-won-an-election-more-in-the-news-than-vijay-in-tamil-nadu]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>वो बोलता है तो हिंदुत्व की छवि दिखती है। दहाड़ता है तो विरोधियों के होश उड़ जाते हैं। उसे गुस्सा आता है तो पूछिए ही मत। कोई सिंघम बुलाता है तो कोई साउथ के फायरब्रांड छवि वाला योगी कहता है। इस्तीफा दिया, वर्दी उतारी और राजनीति में ली एंट्री। कांटो भरी राह पर चलते हुए कमल का फूल खिलाने का संकल्प भी लिया। लेकिन फिर क्या हुआ ऐसा कि अन्नमलाई ने पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया और उनका इस्तीफा स्वीकार कर लिया गया। हम बात उस शख्स की कर रहे हैं जिसने आज तक कोई भी चुनाव नहीं जीता है। वो न तो तभी विधायक चुने गए और न ही कभी सांसद बन पाए। इसके बावजूद उन्होंने अपनी आक्रमक राजनीति से सभी को हैरान करके रखा है। हम कुपुस्वामी अन्नामलाई की कर रहे हैं।&nbsp;<span style="font-size: 1rem;">बिना कोई चुनाव जीते कोई नेता का कद इतना बड़ा कैसे हो गया कि बीजेपी उन्हें जाने नहीं देना चाहती थी। वो भी उस राज्य में जहां राजनीति हमेशा फिल्मी सितारों और बड़े पर्दे के ईर्द गिर्द घूमती रही। आखिर अन्नामलाई में ऐसा क्या है जो उन्हें तमिलनाडु की राजनीति में इतना जरूरी चेहरा बनाता है। इसका जवाब जानने के लिए हमें उनकी जड़ों को देखना होगा जहां से उनका सफर शुरू हुआ। वो जमीन जिसने उन्हें एक आम लड़के से लाइफलाइट किरदार बना दिया।&nbsp;</span></div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/annamalai-form-a-new-front-after-rejecting-rajinikanth-offer-saying--you-all-have-to-support-me" target="_blank">BJP पर बोझ नहीं बनना चाहता, अकेले बनाऊंगा अपना रास्ता,  Rajinikanth का ऑफर ठुकराकर Annamalai ने किया  नई पार्टी बनाने का ऐलान</a></h3><h2>कौन हैं अन्नामलाई</h2><div>तमिलनाडु के करूर जिले में एक प्रभावशाली समुदाय है गोंडर। 4 जून 1984 को इसी समुदाय से आने वाले एक किसान कुप्पू स्वामी के घर अन्नामलाई का जन्म हुआ था। आगे चलकर अन्नामलाई ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की। 2007 में कोयंबटूर के पीएचडी इंजीनियरिंग कॉलेज से मैकेनिकल की डिग्री हासिल की और फिर साल 2010 में आईएम लखनऊ से एमबीए की। मंथ सिविल सर्विज की ओर था तो 2011 में यूपीएससी पास कर ली और कर्नाटक कैडर में आईपीएस के तौर पर ज्वाइन किया। इस दौरान उन्हें कई प्रमुख पद मिले। 2013 में कारकला के एएसपी बने, उडुपी और चिकमंगल के एसपी बने। 2019 में रिजाइन करने से पहले बेंगलुरु साउथ के डीएसपी के पद पर तैनात थे। अन्नामलाई की छवि एक ईमानदार सुपर कॉप की बनी। इतने लोकप्रिय रहे कि उडुप्पी से जब बेंगलुरु ट्रांसफर हुआ था तो उडुप्पी की जनता ने विरोध कर दिया था। फियरलेस पुलिसिंग के चलते लोगों ने उन्हें सिंघम नाम दे दिया। लेकिन एक रोज अचानक मई 2019 में अन्नामलाई ने अपनी आईपीएस की नौकरी से रिजाइन दे दिया। इंडियन एक्सप्रेस में छपी अरुण जनार्दन की रिपोर्ट के मुताबिक आईपीएस छोड़ने के कई कारणों में से अन्नामलाई ने अपने फेयरवेल लेटर में दो अहम कारण बताए थे। पहला कारण था कैलाश मानसरोवर की यात्रा। अन्नामलाई के मुताबिक इस यात्रा ने उन्हें उनके जीवन की असली प्राथमिकताओं को बेहतर ढंग से समझने में मदद की और दूसरा कारण था दिसंबर 2018 में स्वाइन फ्लू से हुई सीनियर आईपीएस मधुकर शेट्टी की मौत। अन्नामलाई ने लिखा था कि मधुकर शेट्टी सर की मौत ने एक तरह से मुझे अपने जीवन का पुनर्मूल्यांकन करने के लिए प्रेरित किया। रिजाइन देने के बाद कुछ समय तक अन्नामलाई बिल्कुल गुमनाम रहे। फिर उन्होंने अपनी संस्था वी द लीडर फाउंडेशन के जरिए जन कल्याणकारी काम शुरू कर दिए। खेती किसानी के काम में जुट गए। इस दौरान उन्होंने 8 साल के अपने छोटे आईपीएस करियर को लेकर एक किताब पर भी काम करना शुरू किया। यह किताब उनकी राजनीति में एंट्री के बाद साल 2021 में छपी जिसका नाम था स्टेपिंग बियॉंड खाकी रेवोलशंस ऑफ अ रियल लाइफ सिंघम। अन्नामलाई को आईपीएस की नौकरी छोड़े 2 साल हो चुके थे। छोटे-मोटे सोशल वर्क के काम में एक्टिव अन्नामलाई ने मई 2020 के एक रोज फेसबुक लाइव के जरिए राजनीति में एंट्री का ऐलान कर दिया। शुरुआत में यह साफ नहीं था कि अन्ना मलाई किस और जाएंगे। उस वक्त खबरें थी कि सुपरस्टार रजनीकांत भी राजनीति में एंट्री कर सकते हैं। एक समय में अन्नामलाई ने कहा था कि वह रजनीकांत के ऐलान का इंतजार कर रहे हैं। अगर रजनीकांत कोई पार्टी बनाते हैं तो वह उनके साथ जुड़ने पर विचार करेंगे। लेकिन जब रजनीकांत की ओर से कोई कमिटमेंट नहीं मिला तो 3 महीने के इंतजार के बाद अन्नामलाई ने बीजेपी का दामन थाम लिया। बीजेपी ज्वाइन करने के बाद अन्ना मलाई ने कहा था कि वक्त के साथ मुझे यह एहसास होने लगा था कि देश को सामाजिक के साथ राजनीतिक परिवर्तन की भी जरूरत है। मुझे लगता है कि भाजपा मेरे लिए सबसे ज्यादा सूटेबल है क्योंकि मेरे सिद्धांत उसके साथ मील खाते हैं। बीजेपी योग्यता के आधार पर नेताओं को पोजीशन देती है। वो एक राष्ट्रवादी पार्टी है। इसलिए मैंने भाजपा के साथ जुड़ने का फैसला लिया है। खैर अन्ना मलाई जल्द ही एक फायर ब्रांड नेता बनकर उभरे।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/annamalai-met-nitin-nabin-amit-shah-game-plan-made-in-secret-meetings-in-delhi" target="_blank">Annamalai ने Nitin Nabin और Amit Shah से की मुलाकात, दिल्ली में सीक्रेट मीटिंग्स में बना बड़ा Game Plan!</a></h3><h2>क्यों कहा जाता है सिंघम</h2><div>26 जुलाई 2016 की बात है। कर्नाटक के उड्डपी जिले के पुलिस मुख्यालय के बाहर आम लोग प्रदर्शन कर रहे थे। खूब भीड़ थी। पुलिस मुख्यालय के बाहर प्रदर्शन कोई बहुत बड़ी बात नहीं है। लेकिन लोगों का ये प्रदर्शन वहां के एसपी अन्नामलाई कोप्पास्वामी के समर्थन और उनके तबादले के विरोध में था। लेकिन अगर ऐसा एक बार हुआ होता तो की बड़ी बात नहीं थी। 16 अक्टूबर 2018 को कर्नाटक के चिकमंगलूर जिले के पुलिस मुख्यालय के बाहर भी ऐसा ही प्रदर्शन हुआ। इस बार भी इसी एसपी के समर्थन और तबादले का मुद्दा था। लोगों का कहना था कि ऐसा ईमानदार अफसर मिलना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है। अन्नामलाई को लेकर कहना है कि वो जहां भी जाते हैं लोगों के चहेते बन जाते हैं।</div><h2>यात्रा से तमिलनाडु की राजनीति में अंडर करंट</h2><div>तमिलनाडु बीजेपी के अध्यक्ष के अन्नामलाई की पदयात्रा को पिछले वर्ष जुलाई में जब गृह मंत्री अमित शाह ने रामेश्नरम में हरी झंडी दिखाई थी तो दिल्ली में बैठे कई विश्लेषकों को लगा भी नहीं होगा कि इससे प्रदेश में पिछले सात दशकों से हावी द्रविड़ राजनीति पर कोई प्रभाव पड़ेगा। मीडिया की तरफ से भले ही एनमनएन मक्कल को उतनी कवरेज न मिली हो लेकिन फिर भी इसकी वजह से बीजेपी राज्य की राजनीति में एक ताकत के रूप में मजबूती से उभर कर सामने आई है</div><h2>बीजेपी का अधूरा मिशन साउथ</h2><div>भारत में बीजेपी ने कई ऐसे राज्यों में जीत दर्द की, जिसे कुछ बरस पहले तक असंभव सा माना जाता था। चाहे वो बंगाल, कर्नाटक या फिर केरल तक में बीजेपी ने अपना पॉलिटिकल फुटप्रिंट बढ़ाया। लेकिन एक राज्य ऐसा भी था जहां बीजेपी बार-बार कोशिश करने के बाद भी दीवार से ही टकरा रही थी। तमिलनाडु बीजेपी के लिए केवल एक चुनावी राज्य नहीं अपितु वो किला था जिसे दशकों से कोई तोड़ नहीं पा रहा था। लेकिन फिर तमिलनाडु बीजेपी को एक ऐसा चेहरा मिला, जिसने पहली बार इस पूरे इकोसिस्टम को सीधे चैलेंज किया। तमिलनाडु की राजनीति को समझना कभी इतना दिलचस्प नहीं रहा। पिछले 60 सालों से यहां दो ही पार्टियों का दबदबा रहा है। सत्ता कभी डीएमके के पास तो कभी एआईएडीएमके के हाथों में आ जाती। तीसरे दल के लिए यहां कोई जगह बची ही नहीं। लेकिन साउथ के सुपरस्टार थलापति विजय ने 2026 में इस परंपरा को तोड़ दिया। पहली बार तमिलनाडु बीजेपी डिफेंसिव नहीं लग रही थी। पहली बार बीजेपी कार्यकर्ताओें उत्साह दिख रहा था। पहली बार तमिलनाडु में बीजेपी सिर्फ सोशल मीडिया पार्टी नहीं ग्राउंड पार्टी बन रही थी। तमिलनाडु में बीजेपी सालों से जहां 2-3% वोट शेयर के आसपास फंसी हुई थी। वहीं 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी का वोट शेयर बढ़कर सीधे 11.2 प्रतिशत पहुंच गया। अन्नामलाई के नेतृत्व में लग रहा था कि बीजेपी तमिलनाडु में कुछ बड़ा करने वाली है। बीजेपी सपोटर्स को लगने लगा था कि जिस राज्य को असंभव माना जाता था वहां फाइनली दरवाजा खुल रहा है। सच्चाई ये भी है कि तमिलनाडु में आज तक इतनी पॉपुलैरिटी किसी हिदुत्ववादी नेता को मिली ही नहीं है। लेकिन अचानक विधानसभा चुनाव से ठीक पहले गठबंधन धर्म के लिए बीजेपी ने बड़ा निर्णय लिया और अन्नामलाई को राज्य के प्रदेश अध्यक्ष पद से हटा दिया। उन्हें उम्मीदवार तक नहीं बनाया गया। नतीजा क्या निकला बीजेपी फिर से 2 % वोट शेयर के आसपास सिमट गई। सबसे दिलचस्प बात ये रही कि डीएमके के खिलाफ जो माहौल अन्नामलाई ने बनाया, उसका फायदा जोसफ विजय ले गए। यानी अन्नामलाई ने बैटल फील्ड तैयार किया, माहौल बनाया लेकिन आखिरी बॉल पर छक्का मारकर गेम अपने नाम किसी और ने कर लिया।&nbsp;</div><h2>अमित शाह की हाथों में किताब और मोदी से मीटिंग क्यों टली</h2><div>बीजेपी में वो पार्टी के राष्ट्रीय महामंत्री बीएल संतोष के खास आदमी माने जाते हैं। जब वह दिल्ली आए तो सबसे पहले उनकी मुलाकात बीएल संतोष से हुई। बीएल संतोष ही उनको लेकर बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के पास ले गए। लंबी बैठक हुई और बातें हुई। अन्ना मलाई का पूरी बातें बताई गई। यह फीडबैक केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को भी दिया गया। फिर उनकी मुलाकात अमित शाह से भी होती है। और अमित शाह से जो उनकी मुलाकात हुई है, उस फोटो को गौर से देखिएगा। अमित शाह के बारे में यह कहा जाता है कि जिनसे भी उनकी बनती है यानी जिनसे उनके कंफर्ट जोन होते हैं, अच्छे रिश्ते होते हैं तो वो उनके चेहरे पर दिख जाता है। इस तस्वीर में देखिए मुस्कुराते हुए नजर आते हैं अमित शाह एक किताब हाथ में लिए हुए अन्नामलई के सामने। लोगों को लगा अन्नामलई बीजेपी में ही रुक जाएंगे। बीजेपी भी ऐसा चाहती है और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी आरएसएस भी ऐसा ही चाहता है और अन्नामलाई के दिल के एक कोने में भी अभी भी बीजेपी ही थी। जो खबर है उसके अनुसार अमित शाह से जब मिले अन्नामलाई तो उन्होंने तमिलनाडु के बारे में सारा कुछ बताया कि क्या सिचुएशन है वो क्या करना चाहते हैं वगैरह आप तस्वीरें देखिए तो अन्नामलाई एक कागज दे रहे हैं उनको और वहां पर वो सारा पॉइंट बाय पॉइंट कुछ अमित शाह हंस रहे हैं पढ़ के मुस्कुरा उनके चेहरे पर मुस्कान है अब जब ये पढ़ा अमित शाह ने तो वहां से भेजा बीएल संतोष जी के पास जो कि ऑर्गेनाइजेशन सेक्रेटरी है और वहां से वहीं पे नितिन नवीन को बुलाया गया और फिर बैठक हुई बड़े सौहार्दपूर्ण माहौल में एक सवा घंटे बैठक हुई और उसके बाद इन्होंने अपना इस्तीफा सौंप दिया और हैंडशक हो गया।</div><h2>बीजेपी और अन्नामलाई में क्या खिचड़ी पक गई?</h2><div>अगर वह जिस तरह की राजनीति करते हैं तो अभी नहीं है। तो एक ऐसी पार्टी बनाया जाए जो बीजेपी नहीं हो लेकिन नेशनलिस्ट हो थोड़ा सा हिंदूवादी हो लेकिन वो द्रविड़ियन कल्चर में पड़ा-बड़ा पार्टी हो। उस पार्टी का स्पेस अभी भी खाली था। अब अन्नामलाई वही पार्टी बनाने जा रहे हैं। इन्होंने साफ-साफ कहा है कि तमिलनाडु की संस्कृति में रचा बसा थोड़ा सा नेशनलिस्ट, थोड़ा सा हिंदूवादी, लेकिन नॉर्थ इंडियन हिंदूवादी से थोड़ा सा अलग। नविजय की पार्टी द्रविडियन लेकिन डीएमके से थोड़ी कम और क्रिश्चियन टच के साथ सेकुलर वोटर्स का साथ जबकि अन्नामलाई की पार्टी&nbsp; तमिलनाडु कल्चर एंड हेरिटेज के साथ हिंदू और नेशनलिस्ट। एक वैसे वोटर को टारगेट करने की कोशिश है जो परंपरागत रूप से डीएमके के वोटर थे या कांग्रेस के वोटर थे। लेकिन डीएमके के मुकाबले थोड़ा सा सॉफ्ट है। दूसरा एक ऐसा वोट जो बीजेपी के मुकाबले थोड़ा सा सॉफ्ट है। ये स्पेस फिल करना है तमिलनाडु में और दोनों एक्सट्रीमिस्ट पार्टियों को अंदर थोड़ा सा साइड लाइन करना है। सीधे वाम शासन से बंगाल में बीजेपी का आना बहुत मुश्किल था। उस पूरी प्रक्रिया के लिए जरूरी था कि पहले कम्युनिस्ट हटे तब टीएमसी टाइप की एक पार्टी है जो हो तो सेक्यूलर लेकिन कम्युनिस्टों जितनी नहीं हो और तब फिर एक सामान्य प्रक्रिया के तहत तब बीजेपी आई। तमिलनाडु की जमीन बहुत गर्म है और उस गर्म जमीन पर बीजेपी के पांव नहीं रख सकती। तो थोड़ी सी जमीन ठंडी करने के लिए दो ऐसी पार्टियां बने जो स्थान को भर सके। जयललिता की मौत के बाद एआईएडीएम का हाल किसी से छिपा नहीं है। स्टालिन के राजनीतिक संयास के बाद डीएमके का हाल क्य़ा होगा पता नहीं क्य़ोंकि उदयनिधि से पार्टी कितनी संभल पाएगी इसका पता नहीं।&nbsp; बिहार के उदाहरण से भी इसे समझ सकते हैं। लालू के बाद तुरंत बीजेपी का आना मुश्किल था। लेकिन बीजेपी के आने के लिए जरूरी था कि बीच में&nbsp; नीतीश रहे जो कि लालू की तरह नहीं रहे लेकिन बीजेपी की तरह ना रहे थोड़ा सा मध्यम मार्ग कम्युनिस्ट और बीजेपी के बीच में टीएमसी जैसी रही।&nbsp; पंजाब में भी ऐसा ही कुछ देखने को मिल सकता है। पंजाब में बिल्कुल एक एक्सट्रीम के बाद बिल्कुल एक राइट नहीं आएगा। बीच में एक ऐसी पार्टी चाहिए। एक बार कांग्रेस आ जाए तब बीजेपी के लिए राह आसान हो जाती है।&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 05 Jun 2026 14:40:18 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/why-is-someone-who-has-never-won-an-election-more-in-the-news-than-vijay-in-tamil-nadu</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[22 मई की वो दोपहर, बंग भवन का सन्नाटा... और सिर्फ 13 दिनों में बिखर गई पूरी पार्टी! TMC में दो फाड़ की इनसाइड स्टोरी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/entire-party-disintegrated-the-inside-story-of-the-tmc-split]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>दिल्ली की चिलचिलाती गर्मी में, चाणक्यपुरी इलाके में स्थित 'बंग भवन' के भीतर एक अलग ही सियासी तपिश महसूस की जा रही थी। यह पश्चिम बंगाल सरकार का वही आलीशान ऑफिशियल स्टेट गेस्ट हाउस है, जो दिल्ली आने वाले सूबे के मंत्रियों, अफसरों और रसूखदार नेताओं का ठिकाना बनता है। अभी कुछ ही दिन पहले मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद, शुभेंदु अधिकारी अपने पहले आधिकारिक दिल्ली दौरे पर थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से होने वाली उनकी अहम मुलाकात में अभी कुछ वक्त बाकी था, इसलिए उनका काफिला सीधे बंग भवन आकर रुका। शुभेंदु जैसे ही भीतर दाखिल हुए, वहां का माहौल अचानक भारी हो गया। सामने खड़े थे तृणमूल कांग्रेस के&nbsp; विधायक ऋतब्रत बनर्जी। सियासत के दो अलग-अलग किनारों पर खड़े इन दो दिग्गजों की नजरें जब एक-दूसरे से मिलीं, तो बंग भवन के उस कमरे में सन्नाटा पसर गया। वहां मौजूद सुरक्षाकर्मियों और स्टाफ को भी अंदाजा नहीं था कि बंद दरवाजे के पीछे चल रही इस मुलाकात की स्क्रिप्ट क्या रंग लाने वाली है। यह कोई साधारण शिष्टाचार भेंट नहीं थी। दिखने में यह महज दो नेताओं की औपचारिकता लग रही थी, लेकिन इस एक मुलाकात ने बंगाल से लेकर दिल्ली तक के राजनीतिक गलियारों में वो बारूद बिछा दिया था, जिसका धमाका ठीक 13 दिन बाद होने वाला था। यहीं कुछ ऐसी बात हुई जिसकी कहानी आज हिंदुस्तान के सामने है कि कैसे टीएमसी महीने भर में ही टूट गई वो टीएमसी और वो ममता बनर्जी 15 सालों तक जिनकी बंगाल में सरकार थी। बंगाल के चुनाव के दौरान ममता बनर्जी ने एक दावा किया था कि पहले बंगाल में बीजेपी को हराऊंगी और फिर 2029 में दिल्ली पहुंचकर बीजेपी को भगाऊंगी। लेकिन आज उनके सामने रास्ते बहुत कठिन है। बंगाल में टीएमसी की टूट की कहानी कुछ ना कुछ मिलती है महाराष्ट्र से भी। टीएमसी बीजेपी पर पार्टी तोड़ने का आरोप लगा रही है। बीजेपी कह रही है कि टीएमसी ने सालों साल जो उत्पात मचा रखा था उसके बाद अब पार्टी में बगावत हो रही है।&nbsp;</div><h2>बंगाल का इतिहास क्या कहता है?</h2><div>बंगाल का इतिहास जो कहता है कि यहां जो पार्टी सत्ता से बाहर होती है फिर उसकी वापसी बड़ी मुश्किल होती है। इतिहास पलट कर देखिए। कांग्रेस गई तो फिर पहले जैसी कभी नहीं बन पाई। 34 सालों तक राज करने वाली सीपीएम जब बाहर हुई तो आज तक अपने पैरों पर दोबारा नहीं खड़ी हो पाई। इस बार टीएमसी जो बीजेपी की 208 सीटों के सामने सिर्फ 80 सीटें पाती है। जब ममता बनर्जी खुद अपनी सीट भवानीपुर से हार जाती हैं तो सवाल टीएमसी के भविष्य को लेकर उठ रहा है। ममता बनर्जी जो एक उम्र के दायरे में जा चुकी हैं। क्या वह टीएमसी को बचा पाएंगी? क्या अभिषेक बनर्जी की लीडरशिप में वो करिश्माई नेतृत्व है जो टीएमसी को रोक सकता है? अभी हाल ही में एक वाक्या सामने आया था जब अभिषेक बनर्जी को अंडे पड़ रहे थे। पत्थर मारे जा रहे थे। टीएमसी इसे बीजेपी के साजिश कह रही थी। लेकिन बीजेपी और टीएमसी के विरोधी कह रहे थे कि अभिषेक बनर्जी के कुकर्मों का नतीजा है। जो सालों साल उन्होंने बंगाल में उत्पात मचा रखा था।&nbsp; वो टीएमसी जो 15 सालों बाद सरकार से बाहर होती है। अब जिसके सांसद इस्तीफा दे रहे हैं। विधायक बैठकों से गायब है। बगावत की चर्चाएं तेज हैं। ममता बनर्जी को सड़क पर उतर कर पार्टी की लड़ाई लड़नी पड़ रही है।&nbsp;</div><h2>महाराष्ट्र से क्यों जोड़ा जा रहा</h2><div>महाराष्ट्र में शिवसेना हारती है, शिवसेना टूट जाती है। शरद पवार की एनसीपी टूट जाती है। यानी बीजेपी जहां जीतती है वहां पर विरोधी पार्टियों में बगावत का इतिहास रहा है। टीएमसी ने भी कभी 34 साल पुरानी सीपीएम सरकार को जो सत्ता से उखाड़ा था तो उसको खत्म कर दिया था। अब यही चिंता टीएमसी को सता रही है। चुनाव हारने के बाद टीएमसी के सामने सबसे बड़ी चुनौती आज बीजेपी नहीं है बल्कि अपनी ही पार्टी को संभाल कर रखने की दिखाई पड़ रही है। पिछले कुछ दिनों में जो घटनाएं हुई उसने यह साफ कर दिया कि चुनावी हार का असर सिर्फ विधानसभा की सीटों तक सीमित नहीं है बल्कि पार्टी के भीतर महसूस किया जा रहा है। सबसे बड़ा झटका टीएमसी को तब लगा जब 1998 में टीएमसी बनने के समय से ममता बनर्जी के साथ रही सांसद काकोली घोष ने पार्टी के सभी संगठनात्मक पदों से इस्तीफा दे दिया। अब काकोली का इस्तीफा इसलिए इंपॉर्टेंट माना जा रहा है क्योंकि वह टीएमसी के शुरुआती दौर से ममता बनर्जी के बड़े पुराने और भरोसेमंद चेहरों में रही। इस्तीफों के साथ उन्होंने चुनावी रणनीतिकार संस्था आईपैक की भूमिका पर सवाल उठाए। जिसने पार्टी के भीतर चल रही बहस को नई हवा दी। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि वह पार्टी नहीं छोड़ रही है लेकिन इस्तीफा दिया है। उनके अलावा पूर्व राज्यसभा सांसद शांतनुन हुसैन, प्रवक्ता अरूप चक्रवर्ती, पूर्व विधायक राज चक्रवर्ती ऐसे कई नेता हैं जिन्होंने जिम्मेदारियों से दूरियां बनाई है। इसी दौरान पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता के चयन को लेकर फर्जी हस्ताक्षरों का विवाद भी सामने आया। दो विधायक ऐसे थे जिन्होंने आरोप लगाया कि बिना उनकी इजाजत के उनके हस्ताक्षर दिखा दिए गए। यह मामला इतना बढ़ गया कि ऋत बनर्जी और संदीपन साह को पार्टी से बाहर कर दिया गया और पूरे विवाद की जांच सीआईडी तक पहुंच गई। वहीं दूसरी तरफ ममता बनर्जी ने जो पार्टी की बैठक बुलाई थी उसमें 60 में से कहा जा रहा है करीब 20 विधायक ही पहुंचे और यहां पर भी बहुत सारे सवाल खड़े हो गए।&nbsp;</div><h2>ढलती शाम की तरह डूबके वाम कमबैक कर बीजेपी को देंगे चुनौती?</h2><div>भाजपा के कुछ वर्गों को पश्चिम बंगाल में सीपीआई (एम) के नेतृत्व में कम्युनिस्ट दलों के पुनरुत्थान की चिंता है, लेकिन क्या वामपंथियों में वास्तव में ऐसा करने की क्षमता है? 2011 में टीएमसी द्वारा सत्ता से बेदखल किए जाने और 2019 के बाद भाजपा की ओर भारी संख्या में मतदाताओं के पलायन के बाद, वाम मोर्चा पश्चिम बंगाल में जमीनी स्तर पर अपने पुनरुत्थान के पहले बड़े संकेत दिखा रहा है। सीपीआई (एम) ने डोमकल विधानसभा सीट जीती और फाल्टा पुनर्चुनाव में 40,000 से अधिक वोट प्राप्त किए। यह सक्रिय रूप से अपने कार्यकर्ताओं को मजबूत कर रहा है और कार्यालयों को फिर से खोल रहा है। वाम दल जमीनी स्तर पर काफी सक्रिय हो गया है और सीआईटीयू जैसे संगठनों के माध्यम से रेलवे स्टेशन पर फेरीवालों को हटाने के विरोध प्रदर्शनों का नेतृत्व कर रहा है, जबकि टीएमसी लगभग निष्क्रिय रही है। जमीनी स्तर पर इस गति को बनाए रखना वामपंथ के लिए वास्तविक राजनीतिक प्रासंगिकता हासिल करने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, खासकर तब जब टीएमसी आंतरिक दरारों से जूझ रही है जिससे जन आंदोलनों के लिए लोगों को लामबंद करने की उसकी क्षमता कमजोर हो गई है। हालांकि, इन स्थानीय लाभों को भाजपा के खिलाफ एक विश्वसनीय चुनौती में बदलने के लिए एक व्यापक रणनीतिक बदलाव की आवश्यकता होगी। प्रमुख विपक्षी दल बनने के लिए, वाम को टीएमसी के मतदाता आधार के एक महत्वपूर्ण हिस्से को सफलतापूर्वक अपने पक्ष में करना होगा, जैसा कि भाजपा ने हाल के चुनावों में किया था। भट्टाचार्य ने कहा कि हालांकि वाम-कांग्रेस गठबंधन दक्षिणी पश्चिम बंगाल में अल्पसंख्यक और हिंदू मतदाताओं को विश्वसनीय रूप से अपनी ओर खींच सकता है, वाम मोर्चे को संभावित दलबदलुओं को नाराज करना बंद करना होगा। वाम ने अब तक अपनी अधिकांश ऊर्जा टीएमसी पर हमला करने में लगाई है। अब उसे अपनी ऊर्जा भाजपा पर केंद्रित करनी होगी। वाम को यह उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि टीएमसी समर्थक उन पर हमला करते रहने से दल बदल लेंगे। अंततः, वामपंथ का पुनरुत्थान भगवा खेमे के प्रमुख प्रतिद्वंद्वी के रूप में खुद को स्थापित करने की उसकी क्षमता पर निर्भर करता है। एक व्यापक गठबंधन बनाने के लिए, पार्टी को सभी दलों के आर्थिक और शारीरिक कठिनाइयों का सामना कर रहे लोगों की सक्रिय रूप से रक्षा करनी होगी। वामपंथ का पुनरुत्थान कोई निश्चित बात नहीं है। सीपीआई (एम) और उसके सहयोगियों को टीएमसी के मतदाता आधार के कुछ वर्गों को अपने पक्ष में करना होगा, भाजपा पर सीधा हमला करना होगा और अपने कभी व्यापक रहे राज्यव्यापी संगठन को फिर से मजबूत करना होगा। फिर भी, टीएमसी के पतन के कगार पर होने के कारण, भाजपा के कुछ लोग सीपीआई (एम) के प्रमुख विपक्षी दल के रूप में उभरने और 4 मई के बाद पैदा हुए राजनीतिक शून्य को भरने को लेकर चिंतित हैं।</div><h2>टीएमसी का चैप्टर क्लोज हो गया?</h2><div>किसी भी पार्टी की वापसी चुनाव के दिन नहीं चुनाव हारने के बाद शुरू होती है। टीएमसी की सबसे बड़ी ताकत यह है कि ममता बनर्जी आज भी पश्चिम बंगाल की सबसे बड़ी नेताओं में से एक है। लेकिन सबसे बड़ी चुनौती भी वही है जो हमने कहा 76 साल की वो हो चुकी है। अभिषेक बनर्जी को आगे बढ़ाया जा रहा है। लेकिन क्या अभिषेक बनर्जी की स्वीकारिता वही है जो ममता बनर्जी की है? क्या अभिषेक बनर्जी का संघर्ष वही है? अभिषेक बनर्जी वो प्रिंस की तरह बड़े हुए हैं। और प्रिंस की तरह बड़े होने में डिसएडवांटेजेस भी होते हैं। इसीलिए सवाल है क्या अभिषेक टीएमसी को उस तरह साथ जोड़ पाएंगे जैसा ममता ने जोड़ा था। दूसरी तरफ बीजेपी के लिए रास्ता उतना आसान नहीं जितना दिख रहा है। सरकार बनाना एक बात लेकिन बंगाल जैसे राज्य को लंबे समय तक पकड़े रखना यह दूसरी बात है।&nbsp; 1998 में पार्टी बनने के बाद शायद पहली बार टीएमसी खुद को इतने बड़े राजनीतिक संकट के बीच खड़ी पाती है। एक तरफ चुनावी हार है। दूसरी तरफ नेताओं की नाराजगी, संगठन के भीतर उठ रहे सवाल, बगावत की चर्चा, भविष्य के नेतृत्व को लेकर बढ़ती अनिश्चितता। यही वजह है कि आज चर्चा सिर्फ ममता बनर्जी की नहीं बल्कि पूरी टीएमसी की हो रही है। इस पूरी कहानी में तीन सवाल बड़े हैं। पहला क्या टीएमसी चुनावी हार के बाद भी नेताओं, विधायकों, कार्यकर्ताओं को साथ रख पाएगी? 4 साल पुरानी सीपीएम सरकार को सत्ता से बाहर किया। कई बार अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर लगाए गए अनुमानों को गलत साबित किया। जेपी और मोरारजी देसाई के समय से लड़ती झगड़ती और जीतती हुई आ रही है।&nbsp;</div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 04 Jun 2026 13:54:23 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/entire-party-disintegrated-the-inside-story-of-the-tmc-split</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[ऐतिहासिक ब्यूफोर्ट कासल पर इजरायली झंडा देख ईरान ने ऐसा धमकाया, ट्रंप-नेतन्याहू के बीच गाली-गलौच तक हो गई?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/iran-issued-such-a-threat-that-there-was-even-a-verbal-exchange-between-trump-and-netanyahu]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>2 मई का दिन जब हाथों में ऊनों के सारे वाइल्ड कार्ड को थामे ट्रंप ने अपने ट्रूथ सोशल पर तस्वीर पोस्ट की थी। इस पर लिखा था आई हैव ऑल द कार्डस। तब इसे ईरान जंग से जोड़कर देखा गया था। ट्रंप ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को खोलने के लिए नया-नया एक प्लान बनाया था और उसी की खुशी सोशल मीडिया पर वो बांट रहे थे। अब वो प्रोजेक्ट भी ठंडे बस्ते में जा चुका है और शायद ट्रंप का यह दावा भी। तभी तो ईरान की एक धमकी पर डोनाल्ड ट्रंप अपने पक्के पक्के दोस्त बेंजामिन नेतन्याहू को भी नहीं बख्श रहे हैं। खबर है कि ट्रंप ने नेतन्याहू को फोन मिलाया, जमकर लताड़ लगाई, बात गाली गलौज तक पहुंच गई। लेकिन क्यों? ईरान से ऐसी क्या धमकी थी जिसकी वजह से ट्रंप ने यह कदम उठाया? क्या नेतन्याहू की वजह से ईरान डील अटक जाएगी? आज इन्हीं तमाम मुद्दों का एमआरआई स्कैन करेंगे।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/a-major-revelation-about-pakistani-muslims-in-the-british-parliament" target="_blank">ब्रिटिश संसद में पाकिस्तानी मुस्लिमों पर बड़ा खुलासा, हिल जाएगा भारत!</a></h3><h2>अपने पक्के दोस्त नेतन्याहू पर क्यों भड़क गए ट्रंप?</h2><div>तुम पागल हो। अगर मैं ना होता तो तुम जेल में होते। मैं तुम्हें बचा रहा हूं। अब सब तुमसे और इजराइल से नफरत करें। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने यह बातें इजराइल के पीएम बेंजामिन नेतन्याहू को एक फोन कॉल के दौरान कही। इस फोन कॉल की जानकारी एक्सिस को दो अमेरिकी अधिकारियों ने दी। नेतन्याहू की ओर से लेबनान पर करवाए जा रहे हमले से ट्रंप भड़क गए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक ट्रंप ने नेतन्याहू से कहा कि अगर इजराइल ने लेबनान की राजधानी बेरूत पर हमला किया तो दुनिया में इजराइल और अलग-थलग पड़ जाएगा। ट्रंप ने यह तक कह दिया कि मैंने नेतन्याहू को जेल जाने से बचाने में मदद की। दरअसल, साल 2020 में इजराइली पीएम नेतन्याहू का करप्शन ट्रायल शुरू हुआ था। नेतन्याहू&nbsp; पर यह आरोप थे कि उन्होंने अपनी पावर का गलत इस्तेमाल किया है। उन्होंने कुछ बड़े बिजनेसमैन से महंगे गिफ्ट्स लिए हैं। बॉलीवुड प्रोड्यूसर से भी गिफ्ट्स लिए हैं और बदले में उन्हें फायदा पहुंचाया। साथ ही साथ कुछ मीडिया कंपनीज़ के साथ भी सेटिंग करके अपने पक्ष में खबरें दिखवाने की कोशिश की। नेतन्याहू इजराइल के पहले ऐसे प्रधानमंत्री बने जिन पर पद पर रहते हुए क्रिमिनल केस चला। तब ट्रंप ने इजरायल के राष्ट्रपति को पत्र लिखा था।&nbsp;</div><h2>दोनों नेताओं के सोशल&nbsp; पोस्ट कुछ और ही कहानी कहते नजर आए</h2><div>1 जून को हुई इस फोन कॉल से एक दिन पहले ही ईरान ने यह वार्निंग दे दी थी कि अगर इजराइल लेबनान में अपने ऑपरेशंस जारी रखता है तो वो अमेरिका के साथ चल रही बातचीत छोड़ सकता है और इसीलिए ट्रंप चाहते हैं कि इजराइल बेरूत पर हमले ना करें। कॉल के बाद ट्रंप ने कहा कि ईरान के साथ बातचीत तेजी से जारी है। अपने ट्रूप सोशल पर भी उन्होंने यह पोस्ट किया और रिपोर्ट यह दावा कर रही है कि इस बातचीत में ट्रंप ने पूरी तरह दबाव बना लिया। आखिर में नेतन्याहू को बात माननी ही पड़ी और दूसरी तरफ अमेरिका और ईरान के बीच जो समझौता तैयार हो रहा है उसमें लेबनान में लड़ाई खत्म करने की बात भी शामिल है। हालांकि ट्रंप को यह भी पता था कि हिजबुल्ला इजराइल पर लगातार हमले कर रहा है और इजराइल को अपनी रक्षा का भी हक है। लेकिन ट्रंप को लगा कि नेतन्याहू जरूरत से ज्यादा अपने मिलिट्री ऑपरेशंस को एस्केलेट कर रहे हैं। ट्रुथ सोशल पर डोनल्ड ट्रंप ने लिखा कि मेरी इजराइली प्रधानमंत्री बेंजमिन नेतन्याहू से बहुत बढ़िया बात हुई। अब बेरूत की सड़कों पर इजराइली सैनिक नजर नहीं आएंगे। जो पहले ही जा चुके हैं वह अब लौट रहे हैं। इसी तरह मेरे प्रतिनिधियों ने हिजबुल्ला से भी बातचीत की। वह हमलों को रोकने के लिए तैयार हो गए हैं। इसके बाद बेंजामिन नेतन्याहू ने भी पोस्ट किया और लिखा कि मेरी राष्ट्रपति ट्रंप से बात हुई। भी मैंने उन्हें कह दिया है कि अगर हिजबुल्लाह हमारे शहरों हमारे लोगों पर हमले नहीं रोकेगा तो हम दोबारा बेरूत को निशाना बनाएंगे। हमारी सेना आईडीएफ दक्षिणी लेबनान ने अपना ऑपरेशन प्लान के मुताबिक जारी रखेगी। यानी नेतन्याहू बेरूत में हमला रोकने के लिए तो मान गए लेकिन साउथ लेबनान में इजराइल हमले करता रहेगा। इस पूरे वाक्य से यह तो साफ हो गया है कि ट्रंप के लिए ईरान के साथ डील करना कितना ज्यादा जरूरी है। वो नहीं चाहते कि किसी भी थर्ड फैक्टर की वजह से यह डील अटक जाए। ट्रंप की इच्छा वाजिब भी है। अमेरिका के हालात इस वक्त ट्रंप की राजनीति के लिए सही नहीं है। गैस की कीमतें जंग से पहले 2 से $.5 प्रति गैलन होती हैं जो अब $4.5 को भी पार कर चुकी हैं। मिड टर्म इलेक्शन भी सर पर है और जंग की वजह से ट्रंप अपनी पार्टी के अंदर भी अनपॉपुलर लगातार होते जा रहे हैं। ऐसे में ट्रंप इस वक्त ऐसा कुछ भी नहीं होने देना चाहते जिससे ईरान डील से पीछे हट जाए।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/even-if-iran-surrenders-the-media-will-still-call-it-a-victory-why-did-donald-trump-say-this" target="_blank">Iran आत्मसमर्पण करेगा, तब भी Media उसे जीत बताएगा..., ऐसा क्यों बोले Donald Trump</a></h3><h2>क्या ईरान की धमकी से डरे ट्रम्प, क्यों हुए इतने नाराज</h2><div>ट्रम्प प्रशासन ईरान से शांति समझौते के लिए वार्ता कर रहा है। नेतन्याहू द्वारा बेरूत पर हमले जारी रखने से ट्रम्प की पूरी कूटनीति दांव पर लग गई, जिससे अमेरिकी राष्ट्रपति भड़क गए। नेतन्याहू की सैन्य कार्रवाइयों और नागरिकों की मौतों के कारण दुनिया भर में इजराइल और अमेरिका के खिलाफ नफरत बढ़ रही है। अमेरिकी जनता मिडिल ईस्ट के युद्धों से थक चुकी है। ट्रम्प भी अब अपनी बड़ी प्राथमिकताओं (जैसे चीन नीति और घरेलू अर्थव्यवस्था) पर ध्यान देना चाहते हैं। इस जंग से निकलना चाहते हैं। अगर नेतन्याहू के कारण ईरान और लेबनान में युद्ध और भड़कता है, तो वैश्विक तेल की कीमतें बढ़ेगी और अमेरिका एक अंतहीन जंग में फंस जाएगा, जो ट्रम्प को अपनी घरेलू राजनीति के लिए मंजूर नहीं है।</div><h2>ऐसे बढ़ रहा पुराने दोस्तों के बीच तनाव</h2><div>गाजा युद्ध, ईरान रणनीति और युद्धविराम को लेकर ट्रम्प और नेतन्याहू के बीच दरार बढ़ती गई। 2020 में नेतन्याहू ने अमेरिकी चुनाव के तुरंत बाद जो बाइडेन को बधाई दी थी। इससे नाराज ट्रम्प ने नेतन्याहू के लिए अपशब्द तक कहा था। ट्रम्प ने आरोप लगाया था कि कासिम सुलेमानी पर अमेरिकी हमले के समय नेतन्याहू आखिरी वक्त में पीछे हट गए थे। कहा मैं यह कभी नहीं भूलूंगा। 2023 में हमास हमले के बाद ट्रम्प ने सहानुभूति जताने के बजाय ट्रम्प ने सार्वजनिक रैली में नेतन्याहू की खुफिया विफलता की कड़ी आलोचना की और हिजबुल्लाह को 'स्मार्ट' कह दिया। 2024 में ट्रम्प लगातार दबाव बनाते रहे कि इजरायल गाजा में जंग जल्द खत्म करे, पर नेतन्याहू अपनी घरेलू राजनीति के लिए युद्ध को लंबा खींचते रहे।</div><div>विश्व युद्ध के बाद सबसे ज्यादा महंगाई: ईरान में मई 2026 में महंगाई दर 77.2% पर पहुंच गई, जो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद का सबसे ऊंचा स्तर है। दवाइयों, टैक्सी किराये और संचार जैसी रोजमर्रा की जरूरतों की कीमते एक साल में 113.8% बढ़ गई। ईरानी मुद्रा रियाल की कीमत भी बुरी तरह गिरी है। विशेषज्ञों का कहना है कि बढ़ती महंगाई और आर्थिक संकट के कारण फिर बड़े विरोध-प्रदर्शन भड़क सकते हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/donald-trump-claims-netanyahu-withdrew-his-army-from-the-attack-on-lebanon-at-his-request" target="_blank">Donald Trump का बड़ा दावा, मेरे कहने पर Netanyahu ने Lebanon पर हमले से सेना वापस बुलाई</a></h3><h2>विश्व युद्ध के बाद सबसे ज्यादा महंगाई</h2><div>ईरान में मई 2026 में महंगाई दर 77.2% पर पहुंच गई, जो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद का सबसे ऊंचा स्तर है। दवाइयों, टैक्सी किराये और संचार जैसी रोजमर्रा की जरूरतों की कीमते एक साल में 113.8% बढ़ गई। ईरानी मुद्रा रियाल की कीमत भी बुरी तरह गिरी है। विशेषज्ञों का कहना है कि बढ़ती महंगाई और आर्थिक संकट के कारण फिर बड़े विरोध-प्रदर्शन भड़क सकते हैं।</div><h2>ऐतिहासिक ब्यूफोर्ट कासल पर इजरायल का कब्जा</h2><div>इजराइल और लेबनान के बीच में पहला सीज फायर 17 अप्रैल को हुआ था। 15 मई को इसे 45 दिनों के लिए बढ़ा दिया गया। लेकिन सीजफायर के बावजूद इजराइल लगातार लेबनान पर हमले कर रहा है। उसका तर्क है कि यह हमले हिजबुल्लाह के खिलाफ सेल्फ डिफेंस है। इसलिए यह सीजफायर का उल्लंघन नहीं है। लेबनान की पब्लिक हेल्थ मिनिस्ट्री के मुताबिक 25 मई से 1 जून तक इजराइल के हमलों में करीब 250 लोग मारे गए। तो फिर ईरान ने अब बातचीत बंद करने की धमकी क्यों दी? वजह है इजराइल का 31 मई को लेबनान में इजराइली सेना का ऑपरेशन। इसमें इजराइल ने दक्षिणी लेबनान में ऐतिहासिक ब्यूफोर्ट कासल पर कब्जा कर लिया है। कासल यानी किला समझिए। इजराइली सेना ने एक वीडियो इस बारे में जारी किया जिसमें इस किले पर इजराइयली झंडा लहराता नजर आया। यह किला रणनीतिक तौर पर बहुत अहम है। यह दक्षिणी लेबनान में लितानी नदी की घाटी के ठीक ऊपर एक ऊंची पहाड़ी पर बना है और इजराइल की सरहद से 14.5 कि.मी. दूर है। यहां से पूरे इलाके पर आसानी से नजर रखी जा सकती है। इस किले का इतिहास करीब 900 साल पुराना है। इसे क्रुसेडर्स यानी धर्म युद्ध लड़ने वाले ईसाइयों ने बनवाया था। 44 साल पहले 1982 में इजराइल ने इसी किले पर पहली बार कब्जा जमाया था। तब फिलिस्तीन लिबरेशन ऑर्गेनाइजेशन यानी पीएलओ के लड़ाके इस किले पर काबिज थे। इजराइल ने पूरे 18 साल यानी 1982 से लेकर 2000 तक इस किले में अपनी मिलिट्री पोस्ट बनाए रखी। अब 18 बरसों में हिजबुल्ला और दूसरे चरमपंथी इस किले पर लगातार गोरिल्ला हमले करते रहे। इजराइयली सैनिकों के लिए वहां ड्यूटी करना कभी भी आसान नहीं था। इस किले के नाम पर व्यूफोर्ट नाम की एक मशहूर फिल्म भी बनी थी जिसे ऑस्कर नॉमिनेशन भी मिला था। साल 2000 में जब इजराइल ने लेबनान से अपनी सेना वापस बुलाई तो यह किला भी खाली कर दिया। 26 साल बाद इजराइली झंडा एक बार फिर इस किले पर लहराया गया। इस बात ने हिजबुल्ला और ईरान दोनों को बेचैन कर दिया।</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 03 Jun 2026 14:17:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/iran-issued-such-a-threat-that-there-was-even-a-verbal-exchange-between-trump-and-netanyahu</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[IB की सीक्रेट रिपोर्ट, 20 दिन में 4 बार बॉर्डर Visit, अमित शाह कुछ बड़ा प्लान कर रहे हैं?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/secret-ib-report-4-border-visits-in-20-days-is-amit-shah-planning-something-big]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारत में कितने घुसपैठिए रह रहे हैं। पाकिस्तान, बांग्लादेश, म्यांमार, श्रीलंका से कितने घुसपैठिए भारत में घुस चुके हैं। सरकार ने हाई लेवल कमिटी ऑन डेमोग्राफिक चेंज यानी जनसंख्या में परिवर्तन पे उच्च स्तरीय समिति बनाने का ऐलान कर दिया है और जो नोटिफिकेशन आया है उसमें घुसपैठ यानी इनफिल्ट्रेशन को बार-बार दोहराया गया है। देश की सबसे बड़ी समस्याओं में एक समस्या तमाम राज्यों में चेंज हो रही डेमोग्राफी। वो बात चाहे असम की हो, पश्चिम बंगाल की हो, बात हो बिहार की, उत्तराखंड की, झारखंड की या फिर तमाम और राज्यों की। डेमोग्राफी परिवर्तन बहुत ज्यादा हुआ। ऐसे में बंगाल जीतने के बाद अब एक नई सिरे से प्लानिंग हो रही है। यह प्लानिंग कौन कर रहा है? देश के गृह मंत्री अमित शाह। अगले कुछ दिनों में वो कुछ बहुत बड़े कदम उठाने वाले हैं। एक हफ्ते के अंदर गृह मंत्री अमित शाह बॉर्डर वाले जिलों में तीन चार बार गए हैं।&nbsp; एक बार त्रिपुरा गए। त्रिपुरा, मेघालय, आसाम, बंगाल। फिर वो बीकानेर, जैसलमेर में थे। यानी वेस्ट बाउंड्री से ले ईस्टर्न बाउंड्री तक लगातार यात्राएं कर रहे हैं। अमित शाह ने खुद को किसी प्रोजेक्ट में इतना इनवॉल्व किया है तो लोगों को सीरियस हो जाना चाहिए।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/bangladeshi-infiltrators-are-being-hunted-down-and-chased-away-in-bengal" target="_blank">बांग्लादेशी घुसपैठियों को वापस भागते देखकर मजा आ जायेगा! बंगाल में Bangladeshi Infiltrators को ढूँढ़ ढूँढ़ कर भगाया जा रहा है</a></h3><h2>मोदी का विजन और अमित शाह का सुपरविजन</h2><div>पिछले साल लाल किले से हाई पावर्ड डेमोग्राफिक मिशन की घोषणा की थी और बाद में कैबिनेट ने इस प्रस्ताव को मंजूरी भी दे दी थी। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 11 सितंबर को 2025 से 11 सितंबर को इस प्रस्ताव को अपनी मंजूरी भी दे दी थी। गृह मंत्री अमित शाह ने एक्स पर इस कमेटी के बारे में जानकारी दी। उन्होंने लिखा कि घुसपैठ और इन अन्य कारणों से अननेचुरल डेमोग्राफिक चेंज किसी भी राष्ट्र के वर्तमान व भविष्य के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती है। मुझे बताते हुए हर्ष हो रहा है कि सरकार ने कमेटी का गठन कर लिया है। अमित शाह की पोस्ट का पहला शब्द था घुसपैठ। डेमोग्राफिक बदलाव के पूरे नैरेटिव के पीछे घुसपैठ शब्द बड़ा अहम है। पीआईबी ने प्रेस इनफेशन ब्यूरो ने कमेट को लेकर जो नोटिफिकेशन जारी किया है। पीआईबी के नोटिफिकेशन में लिखा है कि डेमोग्राफिक चेंज हमारी संप्रभुता, राष्ट्रीय सुरक्षा, कानून व्यवस्था और सामाजिक संरचना से जुड़ी गंभीर समस्या है। यह कमेटी अवैध प्रवास यानी घुसपैठ और अन्य असामान्य कारणों से हो रहे डेमोग्राफिक चेंजेस का व्यापक एनालिसिस करेगी और फिर इसका समाधान भी बताएगी।&nbsp;</div><div>क्या-क्या स्टडी करना है और रिपोर्ट में क्या बताएगी उसको आठ पॉइंट्स में बताया गया है। अलग-अलग इलाकों में डेमोग्राफिक चेंज और अवैध घुसपैठ से पैदा हुई समस्याओं की स्टडी डेमोग्राफिक चेंज के पीछे के कारण क्या है? क्या बॉर्डर पार की घुसपैठ है? रोजगार के मौके या दूसरे सामाजिक और पर्यावरण से जुड़े कारण हैं? क्यों कुछ इलाकों में असामान्य तरीके से लोगों की बसावट बढ़ी है? या फिर प्लान करने में यह सब हो गया है। अलग-अलग धर्मों और सामाजिक समुदायों की आबादी में हो रहे बदलावों की स्टडी का फोकस भी उन पॉइंट्स पर है जहां देश की आबादी बढ़ने के सामान्य पैटर्न से अलग पैटर्न दिखाई दे रहा है। अब अवैध प्रवासियों की पहचान हिरासत और उन्हें डिपोर्ट करने यानी वापस भेजने के लिए आसान निष्पक्ष और तय समय वाली व्यवस्था बनाने के सुझाव भी मांगे गए हैं। और सीमा सुरक्षा जनसंख्या नियंत्रण और आइडेंटिफिकेशन को मजबूत करने के लिए नई व्यवस्था कैसे बने इस पर भी काम होगा। अवैध घुसपैठ और उससे पैदा हुए जनसंख्या असंतुलन से निपटने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों के बीच बेहतर तालमेल के लिए सुझाव की बात भी कही गई है। जरूरत पड़ने पे जनसंख्या बदलाव और घुसपैठ से निपटने के लिए अन्य जरूरी सुझाव भी इसमें निहित है। ये सारे बिंदु पीआईबी के नोटिफिकेशन में लिखे हुए हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/kirit-somaiya-says-illegal-sacrifices-are-taking-place-in-societies" target="_blank">Mumbai में Bakrid पर नियमों की अनदेखी? Kirit Somaiya बोले- सोसाइटियों में हो रही अवैध कुर्बानी</a></h3><h2>आईबी की रिपोर्ट में क्या कहा गया</h2><div>गृह मंत्रालय के टेबल पर आईबी की रिपोर्ट आती है। रिपोर्ट में जानकारी दी गई कि जेएनजी आंदोलन के बहाने युवाओं को भड़काने की कोशिश में लगे लोग कौन हैं।&nbsp; रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले कुछ सालों के पिछले 10-20 पत्थरबाजी की घटनाओं के पैटर्न को देखे तो ज्यादातर घुसपैठिए थे। पत्थरबाजी, आगजनी और सड़कों पर तोड़पोड़ की घटनाओं में बांग्लादेशी रोहिंग्याओं की संलिप्ता वाला भी इंसिडेंट जोड़ा गया है। आईबी की रिपोर्ट बताती है कि चाहे वो दिल्ली दंगे हो या नोएडा में हिंसा हो या कहीं भी अगर पत्थरबाजी होती है तो पत्थर फेंकने वालों की जब पहचान की गई तो इसमें बड़े पैमाने पर रोहिंग्या बांग्लादेशी पकड़े गए। ये इंटरनल सिक्योरिटी के लिए बहुत बड़ा खतरा है।&nbsp;</div><h2>ड्रग्स कार्टेल पर अटैक</h2><div>दूसरा गृह मंत्रालय के पास एक और स्पेसिफिक रिपोर्ट है ये कि वेस्टर्न बाउंड्रीज में और ईस्ट में भी खास करके बंगाल में भी जो ड्रग्स का सारा कारोबार चल रहा है वो जो 15 किमी जो बॉर्डर के आसपास का एरिया है वो एक पड़ाव है। जैसे पाकिस्तान से किसी ने फेंका ड्रग्स पंजाब कि बाउंड्री में किसी ने फेंका। उसे कलेक्टर कर 15 किलोमीटर के अंदर और फिर वहां से डिस्ट्रीब्यूट किया जाता है। गृह मंत्रालय ने एक आर्डर पास किया है और उन्होंने कहा है कि किसी भी बॉर्डर के 15 किलोमीटर के अंदर जितने भी अवैध निर्माण है उसको तुरंत तोड़ा जाए। कुल 50 बीएसएफ के बॉर्डर से बीएसएफ जहां तैनात है वहां से 50 किमी तक पूरी पैनी नजर और हाई सिक्योरिटी होनी चाहिए।&nbsp;</div><h2>&nbsp;घुसपैठ को लेकर क्या-क्या बातें सामने आई</h2><div>आजादी के बाद से देखते हैं घुसपैठ को लेकर क्या-क्या बातें सामने आई। अंग्रेजी न्यूज़ वेबसाइट स्क्रॉल ने अपनी एक रिपोर्ट में गृह मंत्रालय के हवाले से लिखा है कि 1948 से 1961 के बीच करीब 31 लाख लोग जिनमें ज्यादातर हिंदू थे पूर्वी पाकिस्तान से भारत आए थे। पूर्वी पाकिस्तान 1971 में बांग्लादेश हो गया। उस समय असम के मुख्यमंत्री बीपी वाली ने बताया था कि जनवरी 1964 से जनवरी 1965 के बीच करीब 1.8 लाख शरणार्थी पूर्वी पाकिस्तान से असम पहुंचे हुए थे। 1997 में तब के गृह मंत्री इंद्रजीत गुप्ता ने तब कहा था कि भारत में करीब 1 करोड़ अवैध प्रवासी रह रहे हैं। यह इस तरह का पहला आधिकारिक बयान माना गया था। इंडिया टुडे मैगजीन ने गृह मंत्रालय के एक सूत्र के हवाले से कुछ आंकड़े छापे थे। तब के आंकड़ों के मुताबिक पश्चिम बंगाल में 54 लाख, असम में 40 लाख, त्रिपुरा में 8 लाख, बिहार में 5 लाख, महाराष्ट्र में 5 लाख, राजस्थान में 5 लाख और दिल्ली में 3 लाख अवैध प्रवासी बताए गए थे। इन सभी को मिलाकर कुल संख्या करीब 1 करोड़ 8,300 के आसपास बैठ रही थी। 2001 में माधव गोडबोले की अध्यक्षता वाली टास्क फोर्स ऑन बॉर्डर मैनेजमेंट की रिपोर्ट में यह आंकड़ा और बढ़ा हुआ दिखता है। उनकी रिपोर्ट के मुताबिक भारत में अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों की संख्या करीब 1.5 करोड़ बताई गई थी। रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि हर महीने लगभग 3 लाख लोग अवैध तरीके से भारत में घुस रहे हैं।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/where-did-the-muslim-infiltrators-flee-india-in-trucks-border-alert" target="_blank"> ट्रकों में भरकर भारत से कहां भागे घुसपैठिए मुस्लिम? बॉर्डर अलर्ट!</a></h3><h2>बंगाल के नए सीएम की डिटेक्ट डिटेन और डिपोर्ट पॉलिसी</h2><div>पश्चिम बंगाल में नई सरकार के आने के बाद मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने डिटेक्ट डिटेन और डिपोर्ट पॉलिसी का ऐलान किया। टारगेट पर अवैध घुसपैठिए बताए गए। नतीजा बंगाल के बॉर्डर्स पर दिख रहा है। शुभेंदु अवैध घुसपैठियों का मुद्दा चुनाव के पहले से उठाते रहे हैं। सिर्फ शुभेंदु नहीं बीजेपी के बड़े नेता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने भी घुसपैठ का मुद्दा अपनी लगभग हर चुनावी रैली में हर सभा में उठाया है। इस चुनाव ही नहीं 2021 के विधानसभा चुनाव के दौरान भी घुसपैठ को लेकर तीखे बयान देखने को मिले थे। सितंबर 2018 में बतौर बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों को दीमक बताया था और कहा था कि उनके नाम वोटर लिस्ट से हटाए जाएंगे। उन्होंने एक रैली में कहा था कि ये लोग गरीबों का हिस्सा खा रहे हैं। हमारी नौकरियां ले रहे हैं। इनके नाम मतदाता सूची से हटाए जाएंगे। पर बीजेपी सिर्फ बांग्लादेशी घुसपैठियों का मुद्दा ही नहीं रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ भी मुखर रही है और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तो इस मुद्दे को एक ऐसी चुनौती के रूप में देखता रहा है जो भारत के सामाजिक और राजनीतिक ढांचे को बदल सकता है। 5 अक्टूबर 2022 को विजय दशमी पर सर संघ संचालक मोहन भागवत ने कहा था कि जनसंख्या असंतुलन की वजह से देशों का बंटवारा हुआ है और इसके पीछे धर्म परिवर्तन एक बड़ा कारण रहा है। उन्होंने कहा कि करीब 50 साल पहले जब जनसंख्या का असंतुलन हुआ था तब हमें उसके गंभीर परिणाम भुगतने पड़े थे। ऐसा सिर्फ हमारे साथ नहीं हुआ। आज के समय में ईस्ट तिमोर, साउथ सूडान और कोसोवो जैसे नए देश बने हैं। इसलिए जब जनसंख्या में असंतुलन होता है तो नए देश बनते हैं। देशों का विभाजन हो जाता है। इससे पहले भी आरएसएस के बड़े नेता जनसंख्या में अपने हिसाब से एक संतुलन की बातें करते आए हैं। पूर्व आरएसएस प्रमुख के सुदर्शन ने 2005 में कहा था कि परिवारों में तीन से कम बच्चे नहीं होने चाहिए।&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 29 May 2026 13:27:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/secret-ib-report-4-border-visits-in-20-days-is-amit-shah-planning-something-big</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[बकरीद पर 'कुर्बानी' से शुरू हुई संकटमोचक की अग्नि परीक्षा, सिद्धारमैया ने जाते-जाते DK को कौन सा चुनौतीपूर्ण टास्क दे दिया?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/what-challenging-task-did-siddaramaiah-give-dk-before-leaving]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>ईद उल अजहा जिसे भारत में आमतौर पर बकरीद के नाम से भी जानते हैं। दुनियाभर के मुसलमानों के सबसे बड़े त्योहारों में से एक है। इस दिन खास नमाज अदा की जाती है और जानवरों की कुर्बानी भी होती है। लेकिन आज बात बकरीद की नहीं बल्कि राजनीति की करेंगे। दरअसल,&nbsp;<span style="font-size: 1rem;">कर्नाटक की सियासत में एक ऐसा अध्याय लिखा जा चुका है, जहाँ भावुकता और भारी राजनीतिक पैंतरेबाज़ी एक साथ देखने को मिली। डीके शिवकुमार कर्नाटक के नए मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं, और सबसे दिलचस्प बात यह रही कि उनके नाम का प्रस्ताव खुद निवर्तमान मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने रखा। इस फैसले के आते ही शिवकुमार के आवास के बाहर मानों कोई किला तैयार होने लगा। बैरिकेड्स लग गए और भारी पुलिस बल तैनात कर दिया गया। यह सब कुछ इडली, वड़ा और चौ-चौ बाथ से सजी एक 'ब्रेकफास्ट मीटिंग' के ठीक बाद हुआ। नाश्ते की मेज से उठते ही माहौल गहरे जज्बात में डूब गया। डीके शिवकुमार की आँखें नम थीं और उन्होंने सिद्धारमैया के पैर छुए और दोनों नेता एक-दूसरे के गले लग गए। संयोग देखिए कि यह सब कुछ बकरीद के आसपास हो रहा है। एक ऐसा त्योहार जो अपनी सबसे प्रिय चीज़ की 'कुर्बानी और समर्पण' के लिए जाना जाता है। ऐसे में राजनीति के गलियारों में यह तीखी बहस छिड़ गई है कि इस मौके पर असल कुर्बानी किसने दी और किसे क्या मिला?&nbsp;&nbsp;</span></p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/bommai-attacks-rahul-gandhi-over-karnataka-crisis-false-tears-over-obcs-now-exposed" target="_blank">Karnataka संकट पर बोम्मई का Rahul Gandhi पर वार, OBC पर झूठे आंसू अब हुए बेनकाब</a></h3><h2>कुर्बानी किसने दी?</h2><p>एक बेहद कद्दावर और जनाधार वाले नेता का खुद अपनी चलती-चलाती कुर्सी को छोड़ देना और खुद अपने हाथों से शिवकुमार के नाम का प्रस्ताव रखना, राजनीति में एक बहुत बड़ी सियासी कुर्बानी है। कांग्रेस आलाकमान के इशारे पर तैयार किए गए इस पूरे दृश्य के जरिए ऑल इज वेल और एकजुटता का संदेश देने की कोशिश की गई है। राजस्थान में अशोक गहलोत और छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल ने जिस तरह कुर्सी के लिए आलाकमान को पसीने ला दिए थे, सिद्धारमैया ने उससे बिल्कुल अलग मिसाल पेश की। उन्होंने आलाकमान के फैसले को सिर-आंखों पर रखते हुए हंसते-हंसते अपनी मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंप दी।</p><h2>राहुल का बदला अंदाज&nbsp;</h2><p>राहुल गांधी के बारे में एक बात बड़ी मशहूर है वो यह है कि वह फैसले नहीं लेते मतलब स्टेटस को बनाए रखते हैं और उनका फैसला ना लेना भी एक तरीके से एक फैसला ही होता है। पर अब वे निर्णय लेने लगे हैं। फैसले का जोखिम जानते हुए भी कि पता नहीं इसके बाद क्या होगा। पार्टी का भला होगा या बुरा होगा। केरल के मुख्यमंत्री के लिए केसी वेणुगोपाल के बदले वीडी सतीशन को तरजीह देना। तमिलनाडु में मुख्यमंत्री विजय की समर्थन देने में भी उनकी अहम भूमिका रही और अब कर्नाटक में डीके शिवकुमार का पक्ष चुनकर कांग्रेस ने इन दिनों अलग तरह की राजनीतिक राह पकड़ी है। एक कहानी कांग्रेस के अंदर और बाहर भी चल पड़ी थी जिसको बीजेपी भी खूब हवा दे रही थी कि राहुल गांधी को राजनीति में बहुत दिलचस्पी नहीं है। वह फैसले नहीं लेते। खासतौर से जब बिहार में लालू यादव की पार्टी राजद और कांग्रेस के बीच सीट शेयरिंग को लेकर बात फंसी तो राहुल गांधी के एक बयान की दबे-छिपे जुबान में खूब चर्चा हुई। दावा किया जाता है कि उन्होंने&nbsp; तेजस्वी यादव को कहा था कि टॉक टू वेणु यानी केसी वेणुगोपाल से बात कर लीजिए सीटों के शेयरिंग से मेरा क्या लेना देना है यानी जब बड़े फैसले की घड़ी होती थी तो राहुल के बारे में ये कहा जाता था कि वो कोई फैसला ही नहीं लेते थे। लेकिन इन दिनों एक नए राहुल गांधी जो ताबड़तोड़ फैसले ले रहे हैं और सही समय पर ले रहे हैं सही समय अभी तो लग रहा है कल क्या होगा कह नहीं सकते पर राहुल ने साबित कर दिया है कि अब वह फैसले लेने वाले एक परिपक्व नेता देता है। इसे आप तीन फैसलों के जरिए समझ सकते हैं। सबसे पहले तमिलनाडु, फिर केरल और अब कर्नाटक तीनों फैसलों पर आने से पहले एक चीज जिस पर आप गौर करेंगे वो राहुल का लोकतांत्रिक तरीके से फैसले लेना।&nbsp;</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/karnataka-politics-live-updates-siddaramaiah-to-resign-dk-shivakumar-next-karnataka-cm" target="_blank">Karnataka Politics Live Updates: 3 बजे सिद्धारमैया का इस्तीफा, डीके शिवकुमार बनेंगे नए मुख्यमंत्री</a></h3><h2>केरल के बाद अब कर्नाटक</h2><p>ताजा मामला कर्नाटक का है। कर्नाटक पर फैसला लेने से पहले राहुल गांधी ने सबसे बात की। उन्होंने सिद्धारमैया और डीके शिव कुमार उन दोनों को दिल्ली बुलाया। उनसे बात करने से पहले उन्होंने संगठन में महामंत्री केसी वेणुगोपाल सेबातचीत की उसके बाद वहां के जो प्रभारी हैं जो राज्यसभा सांसद हैं रणदीप सुरजेवाला उनसे बात की। उसके बाद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे राय मशवरा करने के बाद ये निर्णय लिया। इसमें सबसे खास बात ये है कि उन्होंने कोई आदेश नहीं जारी किया। उन्होंने एक फार्मूला बनाया। केरल में सब जानते थे जो विधायकों की संख्या है मतलब मेजॉरिटी माना यही जाता है कि जो जितने विधायकों का समर्थन जिस नेता के पास होगा वही मुख्यमंत्री बनेगा। लेकिन उन्होंने बीडी सतीशन को मुख्यमंत्री के तौर पर चुना क्योंकि वो जानते थे कि केरल में एक ऐसा मुख्यमंत्री हो जिसको चुना जाए और जिससे किसी तरीके से राहुल गांधी पर आरोप ना लगे। पूरे डेमोक्रेटिक तरीके से उन्होंने रमेश सैनीथल्ला से भी बात की।</p><h2>बीजेपी वाली स्ट्रैटर्जी कांग्रेस ने अपनाई?</h2><p>कर्नाटक में कांग्रेस सत्ता में है और वहां इस वक्त जो हो रहा है, वह उसकी बदली हुई रणनीति का संकेत है। पार्टी अब जिस राजनीतिक मॉडल पर काम कर रही है, उसमें जहां कांग्रेस संगठन मजबूत है, वहां वह सीधा मुकाबला करेगी। लेकिन जहां स्थिति गठबंधन और क्षेत्रीय दलों की मदद लेगी। साथ ही, वह क्षेत्रीय नेतृत्व को भी मजबूत करेगी। कांग्रेस पिछले वर्षो में कई राज्यों में चुनाव हार चुकी है। इससे उसका आत्मविश्वास कमजोर हुआ है। पार्टी की चुनावी रणनीति बेअसर रही है। ऐसे में लगता है कि वह बीजेपी के रास्ते पर चलने जा रही है। बीजेपी देश में विस्तार के लिए कई तरीकों पर काम करती है। मसलन, जहां वह मजबूत है, वहां अकेले सरकार बनाना, कमजोर राज्यों में गठबंधन करना और फिर उस राज्य में पार्टी को मजबूत करके छोटे भाई से बड़े भाई की भूमिका में आना। जहां पार्टी मजबूत नहीं है, वहां विपक्ष के कद्दावर नेता को बीजेपी में शामिल करवाना और फिर उसे आगे करके चुनाव लड़ना। असम, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, बिहार में यही देखा गया और हिमंता बिस्वा सरमा, शुभेदु अधिकारी और सम्राट चौधरी जैसे नेताओं को आगे बढ़ाया गया। फिर बीच-बीच में नेतृत्व को बदलना ताकि हर कार्यकर्ता और नेता को मौका मिल सके और पार्टी को फायदा हो। अब कांग्रेस भी उसी पथ पर चलने की कोशिश कर रही है।&nbsp;</p><h2>कास्ट सर्वे रिपोर्ट की टाइमिंग&nbsp;</h2><p>कर्नाटक में बदलते राजनीतिक घटनाक्रम के ठीक बीच, पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष मधुसूदन नायक ने मुख्यमंत्री सिद्धारमैया को बहुप्रतीक्षित कास्ट सर्वे रिपोर्ट सौंप दी। हालांकि, इस रिपोर्ट की टाइमिंग और इसका बैकग्राउंड बेहद पेचीदा है। यह रिपोर्ट काफी पुरानी है और दो साल पहले भी इसे लेकर राज्य में खासा विवाद हो चुका है। कर्नाटक के दो सबसे प्रभावशाली और राजनीतिक रूप से मजबूत समुदायों वोक्कालिगा और लिंगायत ने इस रिपोर्ट पर ठीक वैसे ही सवाल उठाए हैं, जैसे बिहार की जातिगत गणना को लेकर अदालतों और राजनीतिक गलियारों में कठघरे में खड़ा किया गया था। दोनों ही प्रभावशाली समुदायों के नेताओं का साफ आरोप है कि यह सर्वे पुराना हो चुका है और इसे वैज्ञानिक तरीके से तैयार नहीं किया गया है। खुद वोक्कालिगा समुदाय से आने वाले नए मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के लिए इस विवादित रिपोर्ट को संभालना एक बड़ी चुनौती होगी। हंसते हुए विदा होने वाले सिद्धारमैया ने इस एक फैसले से शिवकुमार के सामने एक बेहद चुनौतीपूर्ण टास्क खड़ा कर दिया है।<span style="font-size: 1rem;">&nbsp;</span></p>]]></description>
      <pubDate>Thu, 28 May 2026 14:16:43 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/what-challenging-task-did-siddaramaiah-give-dk-before-leaving</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
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      <title><![CDATA[Abraham Accords में शामिल हुआ Pakistan तो क्यों बदलना पड़ेगा Passport? आप भी जानिए जवाब]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/if-pakistan-joins-the-abraham-accords-why-will-passports-need-to-be-changed]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>अब्राहम समझौता यह नया चर्चित शब्द बन गया है, क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने पाकिस्तान समेत कई मुस्लिम बहुल देशों से इस समझौते में शामिल होने का आग्रह किया था। फिलहाल, मुस्लिम देशों से अमेरिकी नेता के इस आग्रह का या तो मौन जवाब मिला है या फिर सीधा इनकार। लेकिन अगर पाकिस्तान इसमें शामिल हो जाता है (जो कि उसने अभी तक नहीं किया है), तो उसे अपना पासपोर्ट फिर से डिजाइन करना होगा।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/india-blunt-warning-to-pakistan-at-the-unsc-promoting-cross-border-terrorism" target="_blank">UNSC में भारत की पाकिस्तान को दो-टूक चेतावनी: 'सीमा-पार आतंकवाद को बढ़ावा देने के भुगतने होंगे गंभीर नतीजे'</a></h3><h2>ट्रम्प ने अब्राहम समझौते के बारे में क्या कहा?</h2><div>25 मई को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने पश्चिम एशिया और अन्य मुस्लिम बहुल देशों से ईरान के साथ विकसित हो रहे शांति समझौते के संदर्भ में इज़राइल के साथ सामान्य संबंध स्थापित करने का आह्वान किया। ट्रूथ सोशल पर एक पोस्ट में उन्होंने कहा कि उन्होंने सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कतर, पाकिस्तान, तुर्की, मिस्र, जॉर्डन और बहरीन के नेताओं से बात की है और उनसे अब्राहम समझौते पर हस्ताक्षर करने का आग्रह किया है, जो 2020 में हुए ऐतिहासिक समझौतों का एक समूह है जिसने इजरायल और कई अरब देशों के बीच राजनयिक संबंधों को सामान्य बनाया। अमेरिका द्वारा इस बेहद जटिल पहेली को सुलझाने के लिए किए गए तमाम प्रयासों के बाद, यह अनिवार्य होना चाहिए कि ये सभी देश कम से कम एक साथ अब्राहम समझौते पर हस्ताक्षर करें। जिन देशों की चर्चा हो रही है वे हैं सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (जो पहले से ही सदस्य है), कतर, पाकिस्तान, तुर्की, मिस्र, जॉर्डन और बहरीन। अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा कि अधिकांश देशों को ईरान के साथ इस समझौते को पहले से कहीं अधिक ऐतिहासिक घटना बनाने के लिए तैयार, इच्छुक और सक्षम होना चाहिए, हालांकि कुछ देशों को हस्ताक्षर करने से छूट दी जा सकती है। विशेष रूप से ट्रंप ने कहा कि सऊदी अरब और कतर को तुरंत समझौतों पर हस्ताक्षर करने चाहिए और बाकी सभी को भी उनका अनुसरण करना चाहिए।&nbsp;</div><div>देश के संस्थापक मुहम्मद अली जिन्ना ने तो इज़राइल के निर्माण को अरब जगत के दिल में छुरा घोंपना तक कहा था। तब से यह नीति कायम है। पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार ने हाल ही में कहा हम फिलिस्तीन संघर्ष के दो-राज्य समाधान को स्वीकार किए जाने तक इज़राइल को मान्यता देने के लिए तैयार नहीं हैं। फिलिस्तीन मुद्दे पर हमारी घोषित नीति में कोई बदलाव नहीं आया है। यह सभी के लिए स्पष्ट होना चाहिए कि हमारी सात दशकों पुरानी नीति अपरिवर्तित है। इसके अलावा, अब्राहम समझौते देश में बेहद अलोकप्रिय बने हुए हैं। सितंबर 2020 में जब अब्राहम समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे, तब देश में विरोध प्रदर्शन भी हुए थे।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/india-blunt-warning-to-pakistan-at-the-unsc-promoting-cross-border-terrorism" target="_blank">UNSC में भारत की पाकिस्तान को दो-टूक चेतावनी: 'सीमा-पार आतंकवाद को बढ़ावा देने के भुगतने होंगे गंभीर नतीजे'</a></h3><h2>ट्रम्प के 'अब्राहम अकॉर्ड्स' पर पाकिस्तान का कड़ा रुख</h2><div>अमेरिका और ईरान के बीच जारी भीषण तनाव में मध्यस्थता की कोशिशों में जुटे पाकिस्तान ने डोनाल्ड ट्रम्प के 'अब्राहम अकॉर्ड्स' के प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया है। ट्रम्प प्रशासन लगातार मुस्लिम बहुसंख्यक देशों पर इजरायल के साथ संबंध सामान्य करने और इस समझौते में शामिल होने का दबाव बना रहा है, लेकिन पाकिस्तान ने इस पर बेहद सख्त रुख अपनाया है। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने इस्लामाबाद के इस समझौते में शामिल होने की किसी भी संभावना को साफ तौर पर नकार दिया है। एक स्थानीय टेलीविजन चैनल को दिए इंटरव्यू में ख्वाजा आसिफ ने दो टूक शब्दों में कहा कि व्यक्तिगत रूप से मेरा मानना है कि पाकिस्तान को ऐसे किसी भी समझौते का हिस्सा नहीं बनना चाहिए, जो हमारी मूल विचारधाराओं के खिलाफ जाता हो। फिलहाल हमारी तरफ से इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाया गया है, और न ही किसी ने हमसे इसके लिए संपर्क किया है।&nbsp;</div><h2>क्यों है पाकिस्तान का यह सख्त रुख?</h2><div>पाकिस्तान की इस तीखी प्रतिक्रिया के पीछे उसकी दशकों पुरानी विदेश नीति है। पाकिस्तान, इजरायल को एक संप्रभु देश के रूप में मान्यता नहीं देता है और दोनों देशों के बीच कोई राजनयिक संबंध नहीं हैं। पाकिस्तान हमेशा से 1967 से पहले की सीमाओं के आधार पर एक स्वतंत्र फिलिस्तीनी राज्य के गठन का पुरजोर समर्थन करता आया है, जिसकी राजधानी पूर्वी यरुशलम हो। देश के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना ने इजरायल के गठन को "अरब दुनिया के दिल में घोंपा गया खंजर" करार दिया था, और पाकिस्तान आज भी इसी रुख पर कायम है।</div><h2>सात दशकों की नीति में कोई बदलाव नहीं</h2><div>हाल ही में पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार ने भी देश के इस रुख को दोहराते हुए साफ किया कि जब तक फिलिस्तीन विवाद के समाधान के लिए 'टू-स्टेट सॉल्यूशन' को पूरी तरह स्वीकार नहीं कर लिया जाता, तब तक पाकिस्तान इजरायल को मान्यता देने का सोच भी नहीं सकता। यह बात हर किसी को स्पष्ट होनी चाहिए कि हमारी सात दशक पुरानी नीति में कोई बदलाव नहीं आया है। राजनीतिक बयानों से इतर, अब्राहम अकॉर्ड्स को लेकर पाकिस्तान की जनता में भी भारी आक्रोश है। सितंबर 2020 में जब पहली बार इस समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे, तब पाकिस्तान की सड़कों पर इसके खिलाफ बड़े पैमाने पर हिंसक विरोध प्रदर्शन देखे गए थे। साफ है कि घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय दोनों मोर्चों पर पाकिस्तान के लिए इस समझौते का हिस्सा बनना नामुमकिन नजर आता है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/india-blunt-warning-to-pakistan-at-the-unsc-promoting-cross-border-terrorism" target="_blank">UNSC में भारत की पाकिस्तान को दो-टूक चेतावनी: 'सीमा-पार आतंकवाद को बढ़ावा देने के भुगतने होंगे गंभीर नतीजे'</a></h3><h2>पाकिस्तान ने प्रस्ताव क्यों खारिज किया?</h2><div>पाकिस्तान लगातार इस बात से इनकार करता रहा है कि वह इज़राइल को मान्यता देता है। उसका कहना है कि राजनयिक संबंध तभी स्थापित हो सकते हैं जब 1967 से पहले की सीमाओं पर आधारित एक स्वतंत्र फ़िलिस्तीनी राज्य का गठन हो जाए और पूर्वी यरुशलम उसकी राजधानी हो। 2020 में अब्राहम समझौते पर हस्ताक्षर होने के बाद से यह मुद्दा इस्लामाबाद के लिए और भी संवेदनशील हो गया है। जहां संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन जैसे करीबी खाड़ी सहयोगी इज़राइल के साथ सामान्यीकरण की ओर बढ़ रहे हैं, वहीं पाकिस्तान घरेलू राजनीतिक संवेदनशीलता और फ़िलिस्तीन के प्रति अपने दीर्घकालिक समर्थन के कारण इससे दूर रहा।&nbsp; यह विरोध नया नहीं है। 2020 में, तत्कालीन पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान ने इस समझौते को खारिज कर दिया था। पाकिस्तान को कई तरह के दबावों का भी सामना करना पड़ता है। देश वित्तीय सहायता, धन प्रेषण और सुरक्षा सहयोग के लिए खाड़ी देशों पर बहुत अधिक निर्भर है, जबकि घरेलू धार्मिक समूह इज़राइल को मान्यता देने का कड़ा विरोध करते हैं। 2025 की शुरुआत में पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार ने इस अटकल को खारिज कर दिया था कि इस्लामाबाद इस समझौते में शामिल हो सकता है। डार ने विदेश कार्यालय में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कहा फिलिस्तीन संघर्ष के दो-राज्य समाधान को स्वीकार किए जाने तक हम इजरायल को मान्यता देने के लिए तैयार नहीं हैं। उन्होंने आगे कहा कि समझौतों पर हस्ताक्षर करना पाकिस्तान की उस लंबे समय से चली आ रही मांग को छोड़ने के बराबर होगा जिसमें वह अल-कुद्स अल-शरीफ को राजधानी बनाकर एक फिलिस्तीनी राज्य की मांग कर रहा है।</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 27 May 2026 14:20:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/if-pakistan-joins-the-abraham-accords-why-will-passports-need-to-be-changed</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[आखिर क्या है Abraham Accords का असली मतलब, इस पर साइन करने वाले मुस्लिम देशों को क्या-क्या करना पड़ेगा?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/what-is-the-real-meaning-of-the-abraham-accords]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>ईरान के साथ अभी डील साइन नहीं हुई है और ट्रंप की नजर दूसरी बड़ी डील पर पड़ गई है। ईरान जंग निपटाने के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति मिडिल ईस्ट में एक और बड़ा समझौता करने की कोशिश में लग गए हैं। अब्राहम अकॉर्ड्स 2.0 ट्रंप का टारगेट है कि जंग खत्म होने के बाद खाड़ी देश इजराइल के साथ अब्राहम अकॉर्ड साइन कर ले यानी मोटा-मोटी इजराइल को मान्यता दे दे। इसके लिए लगातार सऊदी अरब, कतर और पाकिस्तान जैसे देशों को शामिल करने की कोशिशें की जा रही हैं। बीते वीकेंड ट्रंप ने खाड़ी देशों से इसी मुद्दे पर चर्चा की। उन्होंने कई खाड़ी नेताओं को फोन किया और कहा कि जिन देशों के इजराइल के साथ डिप्लोमेटिक रिलेशंस नहीं है उन्हें अब्राहम अकॉर्ड्स का हिस्सा बन जाना चाहिए। 23 मई को हुई इस बातचीत में सऊदी अरब, यूएई, कतर, पाकिस्तान, तुर्किए, मिस्र, जॉर्डन और बहरीन जैसे देश शामिल थे। अमेरिकी मीडिया एक्सियस ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि ट्रंप का यह प्रपोजल इतना अचानक आया कि उनकी बात सुनकर फोन पर मौजूद खाड़ी देशों के नेता चुप रह गए। इस पर ट्रंप ने मजाकिया लहजे में यह भी पूछा क्या वो अभी भी कॉल पर मौजूद हैं या नहीं। ट्रंप ने फोन पर यह भी कहा कि इसके बाद वह इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से बात करेंगे और उन्हें उम्मीद है कि अगली कॉल पर खाड़ी देशों के नेताओं के साथ इजरायली प्रधानमंत्री भी जुड़ सकेंगे। रिपोर्ट्स की मानें तो ट्रंप का मेन फोकस सऊदी अरब और इजराइल के रिश्ते सुधारने पर है।&nbsp; इजराइल हमास जंग शुरू होने से पहले तक इसकी संभावना भी बनती दिख रही थी। लेकिन फिर जंग छड़ने के बाद सऊदी ने अपने हाथ पीछे खींच लिए। पिछले साल नवंबर में सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान से मीटिंग के दौरान भी उन्होंने यह मुद्दा उठाया था। जिसकी वजह से दोनों नेताओं में गहमागहमी भी हो गई थी। उधर ईरान युद्ध और यूएई से बढ़ते तनाव के बाद सऊदी अरब अब इजराइल की सरकार को लेकर ज्यादा सख्त हो गया है। सऊदी का कहना है कि इजराइल से रिश्ते सामान्य तभी होंगे जब वो फिलिस्तीन को अलग देश बनाने के लिए पक्का और तय समय वाला प्लान माने। लेकिन इजराइल की सरकार इसके लिए तैयार नहीं है। लेकिन मुश्किलें सिर्फ सऊदी अरब के सामने नहीं है। ट्रंप चाहते हैं कि पाकिस्तान भी इजराइल को देश के तौर पर मान्यता दे दे। फिलिस्तीन का मुद्दा पाकिस्तान की जनता के लिए बेहद सेंसिटिव इशू है। ऐसे में फिलिस्तीन पर कोई साफ रुख लिए बिना इजराइल को आधिकारिक मान्यता देना पाकिस्तान में बारूद के ढेर पर चिंगारी लगाने जैसा हो सकता है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/pakistani-soldiers-were-travelling-in-a-train-when-an-explosion-occurred" target="_blank">ट्रेन में भरकर जा रहे थे पाकिस्तानी सैनिक, तभी हुआ धमाका, उड़े चिथड़े</a></h3><h2>अब्राहम अकॉर्ड क्या है?</h2><div>यह भी जान लेते हैं। यह वह समझौते हैं जिन्हें ट्रंप के पहले कार्यकाल में अमेरिका की मध्यस्था से शुरू किया गया था। इनके तहत इजराइल और कुछ अरब देशों के बीच रिश्ते सामान्य किए गए। 2020 में संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन सबसे पहले इसमें शामिल हुए थे। बाद में सूडान, मोरक्को और हाल में कजाकिस्तान भी जुड़ा। ट्रंप का कहना है कि अमेरिका ने इतना बड़ा डिप्लोमेटिक कोशिश किया है तो कम से कम इन देशों को एक साथ एक्स पर साइन करना चाहिए। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि अगर एक दो देश मना भी कर दें तो भी चलेगा। इसी बीच हालात अब भी बेहद तनाव से भरे हैं। अमेरिका और ईरान के बीच 8 अप्रैल से सीज फायर लागू है। लेकिन जमीन पर तनाव खत्म नहीं हुआ है। ईरान अभी भी हॉर्मोज स्टेट से ज्यादातर जहाजों की आवाजाही रोक रहा है। दूसरी तरफ अमेरिका है। अमेरिका ने ईरान के बंदरगाहों पर नाकेबंदी जैसी सख्ती बढ़ा रखी है। अमेरिका का कहना है कि सीज फायर शुरू होने के बाद भी छोटी-मोटी झड़पें होती रही हैं। ट्रंप पहले भी कह चुके हैं कि ऐसी घटनाओं को वह सीज फायर टूटना नहीं मानते हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक एक हफ्ते पहले अमेरिका बड़े हमले की तैयारी में था।</div><h2>अब्राहम समझौते से जुड़े वर्तमान देशों में शामिल हैं:</h2><div>इज़राइल</div><div>संयुक्त अरब अमीरात</div><div>बहरीन</div><div>मोरक्को</div><div>सूडान</div><div>कजाकिस्तान</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/what-did-trump-say-on-the-phone-just-before-delivering-a-special-message-to-modi" target="_blank">मोदी को खास संदेश देने से ठीक पहले ट्रंप ने फोन पर ऐसा क्या कहा? सऊदी अरब, कतर और पाकिस्तान की हो गई थी बोलती बंद</a></h3><h2>ईरान शांति वार्ता से जुड़ा ट्रंप का नया दांव</h2><div>डोनाल्ड ट्रंप की यह नई कोशिश अमेरिका और ईरान के बीच चल रही बातचीत का हिस्सा है, ताकि इलाके में जारी तनाव और लड़ाई को कम किया जा सके। ट्रंप ने सोशल मीडिया पर लिखा कि ईरान के साथ बातचीत बहुत अच्छी चल रही है! यह समझौता या तो सबके लिए बहुत शानदार होगा, या फिर होगा ही नहीं। उन्होंने यह चेतावनी भी दी कि अगर बात नहीं बनी, तो "फिर से जंग शुरू हो जाएगी, और इस बार की लड़ाई पहले से कहीं ज्यादा बड़ी और भयानक होगी। ट्रंप का मानना है कि ईरान के साथ समझौता होते ही सऊदी अरब और कतर जैसे देशों को तुरंत 'अब्राहम समझौते' (इजराइल के साथ दोस्ती के ऐतिहासिक समझौते) में शामिल हो जाना चाहिए। इसके बाद दूसरे मुस्लिम देशों को भी इससे जुड़ना चाहिए। ट्रंप ने यहाँ तक कहा कि आगे चलकर खुद ईरान भी इसका हिस्सा बन सकता है। उन्होंने कहा कि मैंने जिन बड़े नेताओं से बात की है, वे सब चाहते हैं कि जैसे ही कागजी कार्रवाई पूरी हो, ईरान भी इस समझौते का हिस्सा बने। यह उनके लिए सम्मान की बात होगी। ट्रंप ने बताया कि उन्होंने इस बारे में कई देशों के बड़े नेताओं से बात की है। इनमें सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, यूएई के राष्ट्रपति, कतर के अमीर, पाकिस्तान के आर्मी चीफ असीम मुनीर, तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन, मिस्र के राष्ट्रपति सिसी, जॉर्डन के राजा और बहरीन के राजा शामिल हैं। इसे इस पूरे इलाके के इतिहास का सबसे बड़ा और जरूरी समझौता" बताते हुए ट्रंप ने कहा कि उन्होंने अपनी टीम को इस पर काम शुरू करने और ज्यादा से ज्यादा देशों को इससे जोड़ने के निर्देश दे दिए हैं।</div><h2>पाकिस्तान ने अब्राहम समझौते में शामिल होने से साफ़ मना किया</h2><div>डोनाल्ड ट्रंप ने जिन देशों के नाम लिए थे, उनमें से पाकिस्तान पहला ऐसा देश बन गया है जिसने सार्वजनिक रूप से (सबके सामने) इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया है। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा मुहम्मद आसिफ ने वहां के एक टीवी चैनल 'समा टीवी' से बात करते हुए कहा कि इस्लामाबाद (पाकिस्तान) ऐसे किसी भी समझौते का समर्थन नहीं करेगा, जो इजराइल को लेकर देश की बुनियादी विचारधारा के खिलाफ हो। ख्वाजा आसिफ ने कहा कि निजी तौर पर मुझे नहीं लगता कि हमें किसी ऐसे समझौते में शामिल होना चाहिए जो हमारी बुनियादी विचारधारा के खिलाफ जाता हो। इजराइल के साथ बातचीत पर भरोसा जताने को लेकर सवाल उठाते हुए उन्होंने आगे कहा कि आप उन लोगों के साथ कैसे बैठ सकते हैं जिनकी बात पर एक दिन के लिए भी भरोसा नहीं किया जा सकता? उन्होंने पाकिस्तान की पुरानी नीति को दोहराते हुए कहा, "हमारा रुख बिल्कुल साफ है कि यह हमें किसी भी कीमत पर मंजूर नहीं है। आसिफ ने पाकिस्तान के पासपोर्ट का हवाला देते हुए कहा, "दूसरी बात यह है कि हम दुनिया के इकलौते ऐसे देश हैं, जिसके पासपोर्ट पर इजराइल का नाम तक नहीं लिखा है (यानी वहां के नागरिकों को इजराइल जाने की इजाजत नहीं है)।</div><h2>पाकिस्तान ने प्रस्ताव क्यों खारिज किया?</h2><div>पाकिस्तान लगातार इस बात से इनकार करता रहा है कि वह इज़राइल को मान्यता देता है। उसका कहना है कि राजनयिक संबंध तभी स्थापित हो सकते हैं जब 1967 से पहले की सीमाओं पर आधारित एक स्वतंत्र फ़िलिस्तीनी राज्य का गठन हो जाए और पूर्वी यरुशलम उसकी राजधानी हो। 2020 में अब्राहम समझौते पर हस्ताक्षर होने के बाद से यह मुद्दा इस्लामाबाद के लिए और भी संवेदनशील हो गया है। जहां संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन जैसे करीबी खाड़ी सहयोगी इज़राइल के साथ सामान्यीकरण की ओर बढ़ रहे हैं, वहीं पाकिस्तान घरेलू राजनीतिक संवेदनशीलता और फ़िलिस्तीन के प्रति अपने दीर्घकालिक समर्थन के कारण इससे दूर रहा।&nbsp; यह विरोध नया नहीं है। 2020 में, तत्कालीन पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान ने इस समझौते को खारिज कर दिया था। पाकिस्तान को कई तरह के दबावों का भी सामना करना पड़ता है। देश वित्तीय सहायता, धन प्रेषण और सुरक्षा सहयोग के लिए खाड़ी देशों पर बहुत अधिक निर्भर है, जबकि घरेलू धार्मिक समूह इज़राइल को मान्यता देने का कड़ा विरोध करते हैं। 2025 की शुरुआत में पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार ने इस अटकल को खारिज कर दिया था कि इस्लामाबाद इस समझौते में शामिल हो सकता है। डार ने विदेश कार्यालय में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कहा फिलिस्तीन संघर्ष के दो-राज्य समाधान को स्वीकार किए जाने तक हम इजरायल को मान्यता देने के लिए तैयार नहीं हैं। उन्होंने आगे कहा कि समझौतों पर हस्ताक्षर करना पाकिस्तान की उस लंबे समय से चली आ रही मांग को छोड़ने के बराबर होगा जिसमें वह अल-कुद्स अल-शरीफ को राजधानी बनाकर एक फिलिस्तीनी राज्य की मांग कर रहा है।</div><h2>मध्य पूर्व के नेता अचंभित</h2><div>शनिवार को सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कतर, पाकिस्तान, तुर्की, मिस्र, जॉर्डन और बहरीन के नेताओं के साथ एक कॉन्फ्रेंस कॉल के दौरान ट्रंप ने यह मुद्दा उठाया, जब अमेरिका-ईरान शांति समझौते की संभावना पर चर्चा चल रही थी। क्सियोस द्वारा उद्धृत अमेरिकी अधिकारियों ने कहा कि ट्रंप ने स्पष्ट रूप से कहा कि ईरान के साथ संघर्ष समाप्त होने के बाद, जो देश वर्तमान में इज़राइल को मान्यता नहीं देते हैं, उन्हें अब्राहम समझौते के तहत सामान्यीकरण की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। पोर्ट के अनुसार, इस प्रस्ताव के कारण कॉल के दौरान संक्षिप्त मौन छा गया, विशेष रूप से सऊदी अरब, कतर और पाकिस्तान के नेताओं की ओर से। रिपोर्ट में कहा गया है कि एक अमेरिकी अधिकारी ने बताया कि ट्रंप ने मजाक में पूछा कि क्या वे अभी भी वहां मौजूद हैं। माना जाता है कि सबसे कड़ा विरोध सऊदी अरब की ओर से आ रहा है, जिसने यह बनाए रखा है कि इज़राइल की कोई भी मान्यता फिलिस्तीनी राज्य की स्थापना की दिशा में एक स्पष्ट और अपरिवर्तनीय मार्ग पर निर्भर है।</div><div>गाजा युद्ध, ईरान के साथ तनाव और अरब जगत में व्यापक आक्रोश ने इज़राइल के साथ सामान्यीकरण पर विचार कर रहे देशों के लिए राजनीतिक माहौल को और जटिल बना दिया है।</div><div>ईरान ने भी समझौतों में शामिल होने के किसी भी सुझाव को दृढ़ता से खारिज कर दिया है। ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने इससे पहले कहा था, "ईरान कभी भी ऐसे कब्जे वाले शासन को मान्यता नहीं देगा जिसने नरसंहार किया हो और बच्चों की हत्या की हो।</div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 26 May 2026 14:40:22 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/what-is-the-real-meaning-of-the-abraham-accords</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[क्या सच में यूरेनियम सौंपने को ईरान तैयार? Trump के आगे तेहरान के हथियार डालने की इनसाइड स्टोरी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/is-iran-really-ready-to-surrender-uranium]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>मिडिल ईस्ट में जिस तरह की तनावपूर्ण स्थिति थी उससे पूरे दुनिया में तहलका मचा हुआ था। लेकिन अब क्या एक बड़े युद्ध के मुहाने से वापस लौट रहे हैं? क्या वही ईरान जिसने सालों तक अमेरिका के सामने झुकने से इंकार किया। अब अपना सबसे बड़ा हथियार एनरिच्ड यूरेनियम सौंपने को तैयार हो गया है। क्या डोनाल्ड ट्रंप का वो लंबा पोस्ट सिर्फ एक राजनीतिक बयान नहीं बल्कि आने वाले मिडिल ईस्ट के रिश्तों का एक रिसेट का संकेत माना जाए। कहा गया कि ईरान ने अपने हाईली इनरड्ड यूरेनियम का स्टॉक छोड़ने पर हामी भर दी है। अगर ऐसा होता है तो यह सिर्फ अमेरिका ईरान के रिश्तों में नहीं बल्कि पूरे पश्चिम एशिया की राजनीति में बड़ा मोड़ माना जाएगा। क्योंकि पिछले कई महीनों से हालात ऐसे थे कि कभी भी बड़ा युद्ध छिड़ सकता था। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पहले ही कह चुके हैं कि अमेरिका और ईरान के बीच बहुत जल्द ऐसा समझौता हो सकता है जिससे जंग रुक सकती है और हॉर्मोज स्टेट फिर से पूरी तरह खुल सकता है। आज के एमआरआई में बताएंगे कि आखिर अमेरिका बार-बार ईरान के यूरेनियम पर इतना जोर क्यों दे रहा था? स्टेट ऑफ हॉर्मूस क्यों सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है? क्या ईरान हकीकत में अपना संवर्धित यूरेनियम अमेरिका को सौंप देगा? क्योंकि अगर यह डील सच में हो गई तो इसका असर तेल से लेकर भारत से लेकर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पूरी तरीके से पड़ने वाला है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/rubio-says-ready-to-discuss-nuclear-talks-if-hormuz-opens" target="_blank">खुल जाएगा होर्मुज, Iran बेच सकेगा तेल? US के साथ Nuclear Deal पर दुनिया की टिकी नजरें</a></h3><h2>होर्मुज से होती है दुनिया के करीब 20% तेल को सप्लाई</h2><div>पिछले कई महीनों से अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच तनाव लगातार बढ़ता हुआ रहा है। 2026 में हालात यहां तक पहुंच गए कि अमेरिका और इजराइल ने ईरान के कई सैन्य और न्यूक्लियर टारगेट्स पर स्ट्राइक कर दिया। जवाब में ईरान ने स्टेट ऑफ होर्मुज पर दबाव बढ़ाया। अब यही वो समुद्री रास्ता है जहां से दुनिया के करीब 20% तेल को सप्लाई दी जाती है। मतलब कि अगर होर्मुज बंद तो पूरी दुनिया में तेल महंगा, बाजार लाल और आर्थिक संकट शुरू हो जाएगा। लेकिन अब अचानक तस्वीर कहीं ना कहीं बदलती हुई नजर आ रही है। डोनाल्ड ट्रंप ने एक लंबा बयान जारी किया और बयान जारी करके यह दावा किया कि ईरान पीस डील में लार्जली नेगोशिएटेड वो हो चुका है। यानी कि समझौता लगभग तय है। अब रिपोर्ट्स की अगर मानें तो तमाम अलग-अलग तरीके की बातें सामने आई और रिपोर्ट्स के मुताबिक इस डील के तहत स्ट्रेट ऑफ होर्मुज खोला जा सकता है। सीज फायर आगे बढ़ सकता है। ईरान को प्रतिबंधों से राहत मिल सकती है और सबसे बड़ा मुद्दा संवर्धित यूरेनियम का है। UN का अनुमान है कि इस साल वैश्विक अर्थव्यवस्था की विकास दर 2.6% रह सकती है। कोरोना के पहले यह एवरेज 3% और 2008 के वित्तीय संकट के पहले 4.4% थी। वहीं, IMF का आकलन तो और भी डराने वाला है। अगर जल्द सप्लाई चेन बहाल नहीं हुई, तो अगले साल ग्लोबल ग्रोथ गिरकर केवल 2% रह सकती है, जबकि महंगाई 6% पर पहुंच जाएगी।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/russia-makes-a-strong-announcement-on-india-as-soon-as-the-deal-with-america-is-done" target="_blank">कोई कमी नहीं आने देंगे...अमेरिका के साथ डील होते ही रूस का भारत पर तगड़ा ऐलान!</a></h3><h2>अमेरिका और ईरान के बीच बड़े समझौते की तैयारी</h2><div>अमेरिकी अखबार द न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका और ईरान के बीच जो बड़े समझौते की तैयारी हो रही है उसमें ईरान अपने उस यूरेनियम स्टॉक को छोड़ सकता है जिसे हथियार बनाने के बेहद करीब माना जाता है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि अगले 30 से 60 दिनों में इस पर बातचीत होगी कि ईरान अपने यूरेनियम का क्या करेगा। अभी सिर्फ शुरुआती सहमति बनी है। यानी यह तय नहीं हुआ है कि यूरेनियम देश के बाहर भेजा जाएगा या उसकी क्षमता कम की जाएगी या उसे किसी और तरीके से बेअसर किया जाएगा। अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि इसकी टेक्निकल डिटेल्स बाद की न्यूक्लियर मुद्दे पर होने वाली बातचीत में तय होगी। यह बदलाव इसलिए भी बड़ा माना जा रहा है क्योंकि हाल ही में ईरानी सूत्रों ने दावा किया था कि देश के सर्वोच्च नेता यानी कि मोजतबा खामेनई ने निर्देश दिया था कि यूरेनियम देश से बाहर नहीं भेजा जाएगा। इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी के मुताबिक इस समय ईरान के पास करीब 400 किलो यूरेनियम है जिसे 60% तक एनरच किया जा चुका है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह स्तर परमाणु हथियार बनाने के काफी करीब होता है। यूरेनियम को एक प्रक्रिया से गुजारा जाता है जिससे उसमें काम आने वाला हिस्सा बढ़ जाता है। इसे ही यूरेनियम एनरचमेंट कहते हैं।&nbsp;</div><h2>यूरेनियम पर टिका पूरा मुद्दा</h2><div>इजराइल भी लंबे समय से कहता रहा है कि अगर इस यूरेनियम को और एनरिच किया गया तो उससे कई परमाणु बम बनाए जा सकते हैं। यही वजह थी कि बातचीत में सबसे बड़ा अड़ंगा यही मुद्दा बना हुआ था। रिपोर्ट के मुताबिक ईरान चाहता था कि यूरेनियम वाला मुद्दा बाद में देखा जाए। लेकिन अमेरिका ने साफ कह दिया था कि शुरुआती समझौते में ही इस पर कम से कम शुरुआती वादा तो किया ही जाना चाहिए। वरना बातचीत खत्म हो सकती है और सैन्य कारवाई फिर से शुरू हो सकती है। रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि हाल के दिनों में अमेरिकी सेना ने ईरान के यूरेनियम स्टॉक पर हमला करने के कई विकल्प तैयार किए थे। माना जाता है कि ईरान का काफी यूरेनियम न्यूक्लियर फैसिलिटी के नीचे जमीन के अंदर रखा गया है। इस ठिकाने पर पिछले साल अमेरिकी टॉमहोक मिसाइलों से हमला किया गया था। अमेरिकी सैन्य अधिकारियों ने ऐसे बंकर बस्टर बम इस्तेमाल करने का विकल्प भी तैयार किया था जो जमीन के अंदर बने ठिकानों को तबाह कर सकते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक एक समय पर ट्रंप ने अमेरिका और इजराइल के संयुक्त कमांडो ऑपरेशन पर भी विचार किया था। मकसद था कि ईरान के</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/was-pakistan-army-chief-asim-munir-visit-to-tehran-a-success" target="_blank">पाक आर्मी चीफ Asim Munir की तेहरान यात्रा सफल? USA को उम्मीद, Iran आज मान लेगा डील</a></h3><h2>क्या ईरान सच में अपना न्यूक्लियर लेवरेज छोड़ देगा?&nbsp;</h2><div>यह अपने आप में बहुत बड़ा सवाल है और इसी के पीछे अमेरिका बार-बार ईरान के ऊपर दबाव भी बना रहा है। क्योंकि फिलहाल अभी जो यह युद्ध रुका है, यह सिर्फ टेंपरेरी पॉज है। तूफान से पहले की शांति भी इसे कहा जा सकता है। अब आने वाले समय में देखना यह होगा कि किस तरीके से सीज फायर की तरफ बढ़ते हैं। क्या ईरान सच में अपने संवर्धित यूरेनियम को सौंप देगा? क्या अमेरिका जो लंबा चौड़ा पोस्ट लिख रहा है कि अब शायद हो सकता है कि हम बहुत ज्यादा क्लोज टू सीज फायर की डील पर पहुंच चुके हैं। वो हकीकत है। इन सारी बातों को देखना होगा। ये परिस्थितियां भारत के लिए भी बुरी हैं। इकॉनमी की रफ्तार को बनाए रखने के लिए ईंधन चाहिए, जिसके लिए भारत बुरी तरह से आयात पर निर्भर है। पेट्रोल-डीजल की खरीद में विविधता के बावजूद संकट महसूस हो रहा है, और तभी पिछले कुछ अरसे में तीन बार दाम बढ़ाने पड़े हैं।</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 25 May 2026 14:34:35 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/is-iran-really-ready-to-surrender-uranium</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[ Trump-Netanyahu के बीच क्यों हुआ झगड़ा, ईरान को कैसे इससे मिल गया बड़ा मौका?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/why-did-the-fight-between-trump-netanyahu-happen-how-did-iran-get-a-big-opportunity-from-this]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>ईरान को घुटनों पर लाने के लिए जिस अमेरिका और इजराइल ने कंधे से कंधा मिलाकर बम बरसाए थे, आज वही दोनों महाशक्तियां आपस में भिड़ गई हैं। वजह कोई जमीन का टुकड़ा नहीं, बल्कि वही 'ईरान' है जिस पर दोनों मिलकर फतह पाना चाहते थे। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के बीच 19 मई की रात हुई एक सीक्रेट फोन कॉल ने दोनों देशों के रिश्तों में छिपे तनाव को दुनिया के सामने ला दिया है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह बातचीत इतनी तीखी थी कि इसके बाद नेतन्याहू गुस्से से तमतमा उठे थे। अमेरिकी मीडिया आउटलेट्स सीएनएन और एग्जिओस ने खुफिया सूत्रों के हवाले से इस महा-तनाव की इनसाइड स्टोरी पब्लिश की है। सूत्रों के मुताबिक, करीब एक घंटे चली इस मुश्किल कॉल के बाद नेतन्याहू का पारा सातवें आसमान पर था। अमेरिकी अधिकारियों ने तंज कसते हुए कहा कि कॉल के बाद बीबी (नेतन्याहू) के बालों में आग लग गई थी। नेतन्याहू चाहते हैं कि ईरान के सैन्य ठिकानों और इंफ्रास्ट्रक्चर पर दोबारा भीषण हमले किए जाएं ताकि वह संभल न सके। वहीं, ट्रंप ने ऐन वक्त पर हमलों को रोक दिया है। वह कतर, सऊदी अरब और पाकिस्तान जैसे खाड़ी मध्यस्थों द्वारा तैयार 'लेटर ऑफ इंटेंट' को मौका देना चाहते हैं, जिसके तहत 30 दिनों के लिए युद्ध विराम और बातचीत का रास्ता खुल सके। इस तनातनी के बाद डोनाल्ड ट्रंप ने मीडिया के सामने एक ऐसा बयान दे दिया, जिसने इजराइल की संप्रभुता और नेतन्याहू के ईगो पर गहरी चोट की है। ट्रंप ने कैमरे पर बेबाकी से कह दिया बेंजामिन नेतन्याहू वही करेंगे, जो मैं उनसे चाहूंगा। नेतन्याहू का मानना है कि ट्रंप का यह यू-टर्न ईरान को परमाणु हथियार बनाने और मिसाइलें रीग्रुप करने का समय दे रहा है। फिलहाल, इस 'पावर स्ट्रगल' ने यह साफ कर दिया है कि ईरान वॉर के अगले कदम को लेकर वाशिंगटन और तेल अवीव के बीच सबकुछ ठीक नहीं है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/israel-abducted-a-pakistani-from-the-middle-of-the-sea-action-created-a-stir-in-whole-world" target="_blank">पाकिस्तानी को बीच समुंदर से उठा ले गया इजरायल, एक्शन से पूरी दुनिया में हड़कंप!</a></h3><h2>फोन पर ट्रंप और नेतयाहू के बीच क्या-क्या बातें हुई?</h2><div>19 मई 2026 की तारीख वाइट हाउस और यरूशलम फोन लाइन से जुड़े। करीब 1 घंटे तक डोनाल्ड ट्रंप और बेंजामिन नेतन्याहू की बात हुई। एग्जिओस की रिपोर्ट के मुताबिक नेतन्याहू इस कॉल के दौरान परेशान नजर आए। बहुत हद तक इसका कारण है 17 मई का दिन। इस दिन डोनाल्ड ट्रंप ने नेतन्याहू को भरोसा दिलाया था कि अमेरिका मंगलवार यानी 19 मई को ईरान पर नए और घातक हमलों की शुरुआत करेगा। इजराइल इसी की उम्मीद में बैठा था। लेकिन 24 घंटे के भीतर ट्रंप ने यू टर्न ले लिया क्योंकि कतर, सऊदी अरब और यूएई जैसे खाड़ी ने ऐसे हमले ना करने का अनुरोध किया था। ऐसे में नेतयाहू ने कहा कि हमलों को टालना एक बहुत बड़ी गलती है और इससे केवल ईरान को अपनी सैन्य ताकत फिर से संगठित करने का समय मिलेगा। एग्जिओस ने एक अमेरिकी सूत्र के हवाले से दोनों नेताओं के बीच हुई बातचीत की जानकारी छापी है। रिपोर्ट के मुताबिक ट्रंप ने नेतन्याहू से कहा कि मीडिएटर एक लेटर ऑफ इंटेंट पर काम कर रहे हैं जिस पर अमेरिका और ईरान दोनों साइन करेंगे। जिसका मकसद युद्ध को औपचारिक रूप से खत्म करना है। साथ ही इसके जरिए ईरान के एटम प्रोग्राम और स्टेट ऑफ फोरमच को खोलने जैसे मुद्दों पर 30 दिनों की बातचीत शुरू होगी।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/us-iran-peace-agreement-drafted-after-tense-talks-major-announcement-expected-within-hours" target="_blank">US-Iran Ceasefire | तनावपूर्ण बातचीत के बाद अमेरिका-ईरान शांति समझौते का मसौदा तैयार, कुछ ही घंटों में हो सकती है बड़ी घोषणा</a></h3><h2>ईरान को लेकर दोनों की राय बिल्कुल अलग</h2><div>दो इजराइली सूत्रों के हवाले से लिखा गया है कि दोनों नेता ईरान को लेकर आगे के प्लान पर एकमत नहीं हैं। सोर्सेस का कहना है कि वाशिंगटन में इजराइल के राजदूत ने अमेरिकी सांसदों को जानकारी दी थी कि नेतन्या इस बातचीत को लेकर चिंतित थे। हालांकि दूतावास के एक प्रवक्ता ने एक्सियोस को इस बात से इंकार किया और कहा राजदूत निजी बातचीत पर कोई टिप्पणी नहीं करते हैं। दरअसल अमेरिका और इजराइल ने ईरान पर दोबारा हमला करने का प्लान बनाया था। इस बार होने वाले ऑपरेशन को नया नाम दिया गया था। सीएनएन की रिपोर्ट के मुताबिक दोनों देश ईरान के खिलाफ ऑपरेशन स्लेज़ हैमर शुरू करने वाले थे। इसी प्लानिंग की वजह से नेतयाओं को लग रहा था कि वह अपना एकमेव लक्ष्य हासिल कर लेंगे। यानी ईरान को पूरी तरह से तबाह कर देंगे। लेकिन कहानी में ट्विस्ट ना आए तो किरदार का नाम ट्रंप का आएगा। ट्रंप ने ऐन वक्त पर ऑपरेशन स्लेज़ हैमर को टाल दिया। ट्रंप ने 18 मई को सोशल मीडिया पर लिखा कि वो ईरान पर 1 घंटे में ही हमला कर सकते हैं। लेकिन वो ऐसा नहीं करेंगे और डिप्लोमेसी के लिए वक्त देंगे। बस यह ट्विस्ट नेऊ के लिए टेंशन बन गया। क्योंकि जिन ट्रंप के बारे में कहा जाता था कि ईरान पर हुए हमले में इजराइल ने जैसा चाहा अमेरिका ने वैसा ही बिहेव किया।</div><h2>ईरान ने कहा, अमेरिकी प्रस्ताव की हो रही समीक्षा</h2><div>ट्रंप ने कहा है कि ईरान के साथ बातचीत अंतिम चरण में है, जबकि तेहरान ने पाकिस्तान के जरिए मिले नए अमेरिकी प्रस्ताव की समीक्षा शुरू कर दी है। ईरान ने अपनी शर्तों में विदेशों में फसी संपत्तियों की रिहाई और ईरानी बंदरगाहों पर अमेरिकी नाकेबंदी खत्म करने की मांग दोहराई है।</div><h2>दूसरे देश को यूरेनियम नहीं देंगे</h2><div>ईरान के सुप्रीम लीडर मुज्तबा खामेनेई ने निर्देश दिया है कि देश का हथियार-ग्रेड समृद्ध यूरेनियम किसी भी हालत में विदेश नहीं भेजा जाएगा। दो वरिष्ठ ईरानी सूत्रों के हवाले से यह दावा सामने आया है। इस रुख से अमेरिका-ईरान के बीच चल - रही शांति वार्ता में नया पेंच फंस सकता है। इसकी वजह अमेरिका-इजराइल की प्रमुख मांगों में ईरान के यूरेनियम को दूसरे देश में भेजना शामिल है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/israel-abducted-a-pakistani-from-the-middle-of-the-sea-action-created-a-stir-in-whole-world" target="_blank">पाकिस्तानी को बीच समुंदर से उठा ले गया इजरायल, एक्शन से पूरी दुनिया में हड़कंप!</a></h3><h2>ईरान तेजी से बढ़ा रहा ड्रोन प्रोडक्शन</h2><div>अमेरिकी खुफिया आकलन के मुताबिक ईरान सैन्य क्षमता तेजी से खड़ी कर रहा है। युद्धविराम के दौरान उसने ड्रोन प्रोडक्शन भी शुरू कर दिया है। - अनुमान है कि वह 6 महीने में ड्रोन हमले की - क्षमता बहाल कर लेगा। रिपोर्ट में कहा गया है कि -ईरान नष्ट हुई मिसाइल साइट्स, लॉन्चर्स व हथियार उत्पादन क्षमता को भी जल्द तैयार कर लेगा। अमेरिका ने अपना रवैया बदल दिया है। नेतन्याहू के गुस्से की एक बड़ी वजह यह भी थी कि इजराइली खुफिया एजेंसी मोसाद और सैन्य अधिकारियों का मानना है कि ईरान युद्ध के दौरान बंद किए गए अपने मिसाइल ठिकानों को फिर से सक्रिय कर चुका है। इजराइल का मानना है कि इस वक्त ईरान पर हमला ना करना उसे परमाणु बम बनाने की खुली छूट देने जैसा है। उधर ट्रंप और नेतन्या की बातचीत को लेकर मचे बवाल के बीच ईरान का भी जवाब आ गया। ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजिशकियन ने एक्स पर लिखा ईरान ने हमेशा अपने वादे को निभाया है। युद्ध को टालने की हर संभव कोशिश की है। हमारी ओर से रास्ते खुले हैं लेकिन दबाव डालकर ईरान को सरेंडर के लिए मजबूर करना सिर्फ एक भ्रम है। ईरान के रेवोल्यूशनरी गार्ड्स आईआरजीसी ने और भी सख्त चेतावनी दी है। उन्होंने कहा अगर अमेरिका ने फिर से हमला किया तो वे खाड़ी देशों के तेल की आपूर्ति को सालों के लिए काट देंगे। धमकी यह भी दी कि अगला हमला किसी क्षेत्रीय संघर्ष तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि यह पूरी दुनिया में फैल जाएगा। तो ट्रंप बातचीत की राह पर हैं। उनके पार्टनर नेतन्या इस बात से निराश हैं। इन दोनों के बीच टेंशन का यह कोई पहला मौका नहीं है। याद कीजिए जंग के दौरान ईरान के साउथ पार्ट्स गैस क्षेत्र पर एक बड़ा हमला हुआ। रिपोर्ट्स आई कि यह हमला इजराइल ने किया। ट्रंप इस हमले की वजह से इजराइल पर भड़क गए तब ट्रंप ने कहा था कि इजराइल ने अकेले कारवाई की है और वाशिंगटन को इस बारे में पहले से कुछ नहीं पता था। ट्रंप ने यह भी कहा था हमने ईरान के साउथ पार्ट्स गैस क्षेत्र इजराइल के हमले का विरोध किया और बेंजामिन नेतन्या से सीधे तौर पर ऐसा ना करने का आग्रह किया था। इसके अलावा ट्रंप ने चेतावनी भी दी थी कि हम ऐसे कामों के लिए मना करते हैं वो नहीं मानते और हमें काम पसंद नहीं आता तो हम आगे काम नहीं करते हैं।</div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 22 May 2026 14:16:15 +0530</pubDate>
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      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[कॉकरोच जनता पार्टी किसने बना ली? महुआ-कीर्ति आजाद समेत 5 लाख लोग जुड़े! मैनिफेस्टो तो होश उड़ा देगा ]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/who-formed-the-cockroach-janata-party-five-lakh-people-including-mahua-and-kirti-azad]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>जब व्यवस्था की सफाई करने के बजाय सिस्टम खुद सड़ने लगता है, तब अंधेरी रातों में, सुनसान राहों पर एक 'मसीहा' निकलता है। जिसे लोग शहंशाह नहीं, बल्कि 'कॉकरोच' कहते हैं! यह एक ऐसा सर्वव्यापी मसीहा है जो कहीं भी प्रकट हो सकता है। आपके चमचमाते किचन में, भारतीय रेल के डिब्बों में, या फिर सरकारी दफ्तर के उस सीलन भरे कमरे में जहां धूल खाती फाइलें सदियों से सो रही हैं। अब आप सोच रहे होंगे कि अचानक इस महान जीव का जिक्र क्यों? तो जनाब, राजनीति के गलियारे से एक ब्रेकिंग न्यूज़ आई। देश की राजनीति में इस वक्त एक ऐसी पार्टी की एंट्री हुई है जिसने बिना चुनाव लड़े, बिना रैलियां निकाले और बिना पोस्टर्स लगाए सोशल मीडिया पर तहलका मचा दिया है। नाम है कॉकरोच जनता पार्टी यानी कि सीजेपी। सीजेपी का नाम इस समय इंटरनेट पर टॉक ऑफ द टाउन बना हुआ है। सुनने में यह किसी मीम या मजाक जैसा आपको लग सकता है लेकिन इंटरनेट पर इसकी लोकप्रियता अब मजाक से आगे निकलती दिखाई दे रही है। दावा यह किया जा रहा है कि लॉन्च होने के महज कुछ दिनों के भीतर इस पार्टी से हजारों लोग जुड़ चुके हैं। सबसे दिलचस्प बात यह है कि इसके सदस्य खुद को सेकुलर, सोशलिस्ट, डेमोक्रेटिक और लेजी बताते हैं और यही लाइन अब सोशल मीडिया पर वायरल हो गई है। कोई इसे युवाओं की हताशा का नया प्रतीक बता रहा है तो कोई इसे मौजूदा राजनीति पर सबसे बड़ा व्यंग मान रहा है। लेकिन सवाल सबसे बड़ा यहां पर यह है कि क्या कॉकरोच जनता पार्टी सिर्फ इंटरनेट का मजाक है या फिर सिस्टम से नाराज युवाओं की नई डिजिटल आवाज। दरअसल इस पूरी कहानी की शुरुआत एक विवादित टिप्पणी से हुई जिसमें बेरोजगार युवाओं और एक्टिविस्ट को लेकर कॉकरोच शब्द का इस्तेमाल किए जाने पर सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई। पार्टी के नाम कॉकरोच जनता पार्टी को लेकर भी चर्चा है। माना यह जा रहा है कि यह नाम हाल ही में भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की कथित टिप्पणी पर आधारित है। जिसमें उन्होंने यह कहा था कि कुछ युवा कॉकरोच जैसे होते हैं जिन्हें रोजगार नहीं मिलता और वह सोशल मीडिया, मीडिया या आरटीआई एक्टिविस्ट बनकर सिस्टम पर हमला करने लगते हैं। हालांकि बाद में सीजीआई ने सफाई भी दी थी और कहा था कि उनके बयान को गलत तरीके से पेश किया गया है। जिस दिन सीजीआई सूर्यकांत ने कॉकरोच वाली टिप्पणी की उसी दिन यानी 16 मई को अभिजीत डिपके ने सोशल मीडिया एक्स पर लोगों से कॉकरोच जनता पार्टी में रजिस्टर करने की अपील की। साफ कर दें कि इस पार्टी का मकसद चुनाव लड़ना नहीं है। यह व्यंग करने वाला एक पॉलिटिकल आउटफिट है। पार्टी में शामिल होने की दिलचस्प शर्तें बताएं। उससे पहले बता दें कि कॉकरोच वाली जो टिप्पणी सीजीआई सूर्यकांत ने की थी, उस पर बाद में उन्होंने साफ किया कि उनकी मौखिक टिप्पणी फर्जी डिग्रियों का इस्तेमाल करके कानून और मीडिया जैसे पेशों में एंट्री करने वाले लोगों के लिए थी ना कि बेरोजगार युवाओं के लिए। अब सवाल यह उठता है कि आखिर कौन सी 'जनता' इस अनूठी पार्टी की रीढ़ बन रही है और इस पार्टी का वीआईपी मेंबर बनने के लिए क्या योग्यताएं चाहिए? चलिए आज इसी का एमआईआर स्कैन करते हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/cji-advice-in-navi-mumbai-airport-case-protest-peacefully" target="_blank">Navi Mumbai Airport केस में CJI की नसीहत- Peaceful Protest करें, पर सड़क पर समस्या न बनें'</a></h3><h2>क्या थी सीजेआई की कॉकरोच वाली टिप्पणी</h2><div>भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत ने शुक्रवार को कीड़ों और परजीवियों का उदाहरण देते हुए कहा कि बेरोजगार युवा सोशल मीडिया और सूचना के अधिकार (आरटीआई) का इस्तेमाल करके हर किसी पर हमला करते हैं। ये टिप्पणियां तब आईं जब मुख्य न्यायाधीश कांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ एक ऐसे वकील को फटकार लगा रही थी जो वरिष्ठ अधिवक्ता का पदनाम मांग रहा था। समाचार एजेंसी एएनआई के अनुसार, पीठ ने याचिकाकर्ता का प्रतिनिधित्व करने वाले वकील संजय दुबे&nbsp; से कहा कि पूरी दुनिया वरिष्ठ अधिवक्ता बनने के योग्य हो सकती है, लेकिन कम से कम आप तो इसके हकदार नहीं हैं। मुख्य न्यायाधीश ने याचिकाकर्ता के वकील द्वारा फेसबुक पर इस्तेमाल की गई भाषा का भी उल्लेख किया। तभी मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने समाज के बारे में बात की। उन्होंने कहा कि समाज में पहले से ही ऐसे परजीवी मौजूद हैं जो व्यवस्था पर हमला करते हैं और आप उनके साथ हाथ मिलाना चाहते हैं। उन्होंने आगे कहा कि ऐसे कई युवा हैं, जो तिलचट्टों की तरह हैं, जिन्हें न तो रोजगार मिलता है और न ही पेशे में कोई स्थान। उनमें से कुछ मीडिया में चले जाते हैं, कुछ सोशल मीडिया कार्यकर्ता बन जाते हैं, कुछ आरटीआई कार्यकर्ता और अन्य कार्यकर्ता बन जाते हैं, और वे हर किसी पर हमला करना शुरू कर देते हैं।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/cji-surya-kant--statement-people-attack-system-by-posing-as-social-media-rti-activists" target="_blank">बेरोजगार युवा कॉकरोच की तरह...CJI सूर्यकांत का अजीबोगरीब बयान, कहा- सोशल मीडिया और RTI एक्टिविस्ट बनकर सिस्टम पर हमला करते हैं</a></h3><h2>बाद में अपने बयान पर दी सफाई&nbsp;</h2><div>भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने शनिवार को अपने विवादास्पद "तिलचट्टे" वाले बयान पर स्पष्टीकरण जारी करते हुए कहा कि मीडिया के एक वर्ग ने उनके मौखिक कथनों को गलत तरीके से प्रस्तुत किया और उन्हें देश के युवाओं की आलोचना के रूप में पेश किया। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने अपने स्पष्टीकरण में कहा kf मुझे यह पढ़कर बहुत दुख हुआ कि मीडिया के एक वर्ग ने कल एक तुच्छ मामले की सुनवाई के दौरान मेरे मौखिक कथनों को गलत तरीके से उद्धृत किया है। मैंने विशेष रूप से उन लोगों की आलोचना की थी जिन्होंने फर्जी और फर्जी डिग्रियों की मदद से वकालत जैसे पेशे में प्रवेश किया है। ऐसे ही लोग मीडिया, सोशल मीडिया और अन्य प्रतिष्ठित पेशों में भी घुसपैठ कर चुके हैं, इसलिए वे परजीवी की तरह हैं। यह कहना पूरी तरह निराधार है कि मैंने हमारे देश के युवाओं की आलोचना की है।</div><h2>कॉकरोच जनता पार्टी में शामिल होने की 'खास' योग्यताएं</h2><div>आप चाहे जितने भी घोटालों, विवादों या जनता के गुस्से की मार झेलें, आपका बाल भी बांका नहीं होना चाहिए। जैसे कॉकरोच परमाणु हमले में भी बच सकता है, वैसे ही आपको हर राजनीतिक संकट में 'अमर' रहना होगा। इस पार्टी का सबसे बड़ा और मजबूत आधार है देश की बेरोजगार सेना। अगर आपके पास करने को कोई काम नहीं है और आप दिन भर क्या करें, क्या न करें के चक्रव्यूह में फंसे हैं, तो आप इस पार्टी के मेंबर बनने के लिए सबसे उपयुक्त हो। इसके अलावा यदि आपकी सुबह सूरज की रोशनी से नहीं, बल्कि रील स्क्रॉल करने से होती है। अगर आपकी उंगलियां बिना वजह हर दो सेकंड में स्क्रीन अनलॉक कर देती हैं, तो बधाई हो! आप पार्टी के आईटी सेल के लिए बिल्कुल परफेक्ट हैं। दुनिया में दुख बहुत है, लेकिन उस दुख को, उस गुस्से को बिना गाली-गलौज के, एकदम 'प्रोफेशनल' तरीके से, कीबोर्ड पर टाइप करके निकालने की कला जिसमें है, वो इस पार्टी का सबसे कीमती हीरा है। सरकार से लेकर समाज तक, बिना किसी लॉजिक के, लेकिन पूरे स्वैग और व्याकरण के साथ भड़ास निकालने की क्षमता रखने वाले युवाओं का यहाँ रेड कारपेट स्वागत है। पार्टी का मूल मंत्र डले रहो! जब तक बहुत ज्यादा जरूरी न हो, अपनी जगह से न हिलना। कॉकरोच भी तब तक एक कोने में चुपचाप पड़ा रहता है जब तक कि उस पर झाड़ू न तन जाए। अगर आप भी आलस के उस शिखर पर हैं जहाँ पानी का ग्लास उठाने के लिए भी आपको मोटिवेशनल स्पीच की जरूरत पड़ती है, तो आप इस पार्टी के सबसे वफादार और अनुशासित कार्यकर्ता हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/after-uproar-over-his-cockroach-comment-cji-surya-kant-clarified-media-misrepresented-his-statement" target="_blank">'Cockroach' कमेंट पर बवाल के बाद CJI Surya Kant की सफाई, Media ने मेरी बात को गलत पेश किया</a></h3><h2>किसने बनाई सीजेपी</h2><div>कॉकरोच जनता पार्टी बनाने वाले अभिजीत अमेरिका की बोस्टन यूनिवर्सिटी में पब्लिक रिलेशन की मास्टर डिग्री कर रहे हैं। वह 2020 से 2023 तक आम आदमी पार्टी की सोशल मीडिया टीम में भी वालंटियर रह चुके हैं। द हिंदू अखबार से बात करते हुए अभिजीत ने कहा कि कॉकरोच जनता पार्टी माननीय मुख्य न्यायाधीश के उस बयान के खिलाफ युवाओं की असहमति है जिसमें उन्होंने युवाओं को कॉकरोच और परजीवी करार दिया था। भारत जैसे लोकतंत्र में इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता। जहां संविधान और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संरक्षक माने जाने वाले सुप्रीम कोर्ट के सीजेआई युवाओं की आलोचना कर उनका अपमान करते हैं। वो आगे कहते हैं कि अगर युवाओं को अपनी आवाज पहुंचाने के लिए कॉकरोच बनना पड़े तो हम इस पहचान को अपनाते हैं। इसीलिए हमने अपना नाम रखा है कॉकरोच जनता पार्टी। हमने आपको पहले ही बताया कि एक सिटेरिकल पॉलिटिकल पार्टी है।&nbsp;</div><h2>क्या है पार्टी का मिशन</h2><div>पार्टी के मिशन और विज़न को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी ने वेबसाइट पर लिखा है कि हम यहां ना तो एक और पीएम केयर्स योजना शुरू करने आए हैं ना ही टैक्स पेयर की सैलरी पर दाबोस में छुट्टियां मनाने आए हैं। ना ही भ्रष्टाचार को रणनीतिक खर्च के तौर पर रिब्रांड करने आए हैं। हम यहां पूछने आए हैं जोर से बार-बार लिखित रूप में कि पैसा गया कहां? पार्टी की टैगलाइन है आलसी और बेरोजगारों की आवाज। पार्टी का दावा है कि वो उन लोगों को रिप्रेजेंट करती है सिस्टम जिनको गिनना भूल गया है। पार्टी एक बड़ा जिद्दी झुंड है जिसका कोई स्पॉन्सर नहीं है। बस हैं तो सिर्फ पांच चीजें जो सरकार में आने पर लागू की जाएंगी। मेनिफेस्टो में किए गए पांच वादे भी दिलचस्प हैं। वादा नंबर एक अगर सीजेपी यानी कॉकरोच जनता पार्टी सरकार में आती है तो रिटायरमेंट के बाद किसी भी सीजीआई को राज्यसभा जाने का रिवॉर्ड नहीं मिलेगा। वादा नंबर दो अगर कोई वैध वोट डिलीट किया जाएगा तो चाहे उस राज्य में जहां सीजेपी की सरकार हो या विपक्ष की सीईसी को यूएपीए के तहत गिरफ्तार किया जाएगा क्योंकि किसी के वोटिंग का अधिकार छीनना आतंकवाद से कम नहीं। वादा नंबर तीन महिलाओं के लिए 50% आरक्षण होगा। 33% नहीं और इसके लिए सांसदों की संख्या भी नहीं बढ़ाई जाएगी। कैबिनेट में भी महिलाओं के लिए 50% आरक्षण होगा। वादा नंबर चार, बड़ी कॉर्पोरेट कंपनियों के टीवी चैनलों के लाइसेंस रद्द किए जाएंगे और उनके एंकर्स के बैंक अकाउंट्स की जांच होगी। वादा नंबर पांच, अगर कोई विधायक या सांसद दूसरी पार्टी में पाला बदल कर जाता है तो उसके चुनाव लड़ने पर पाबंदी लगाई जाएगी और उसे अगले 20 साल तक किसी भी पब्लिक ऑफिस में कोई पद नहीं दिया जाएगा। कॉकरोच जनता पार्टी बनने के दो दिन बाद 18 मई को अभिजीत ने दावा किया कि पार्टी से 500 लोग जुड़ चुके हैं। अभिजीत का कहना है कि उनकी पार्टी एक धर्मनिरपेक्ष, समाजवादी, लोकतांत्रिक और जाति विरोधी संगठन है। हमारी विचारधारा गांधी, अंबेडकर और नेहरू से प्रेरित है। अभिजीत का कहना है कि हम देश से यह वास्तविकता स्वीकार करने का आग्रह कर रहे हैं कि आज के युवा सिस्टम से अपना भरोसा खो रहे हैं क्योंकि ये अब उनकी सेवा नहीं कर रहा है।&nbsp; उनकी बातें नहीं सुन रहा है। उन्हें देख भी नहीं रहा है और व्यवस्था जितनी देर तक इस बात को नजरअंदाज करती रहेगी निराशा उतनी ही बढ़ती जाएगी। अभिजीत के मुताबिक कॉकरोच बताता है कि वह हालात के हिसाब से खुद को ढाल लेता है कि देश के लोकतांत्रिक संगठनों के कामकाज को लेकर बढ़ रही फ्रस्ट्रेशन का लक्षण है।</div><h2>महुआ मोइत्रा और कीर्ति आजाद ने मेंबरशिप की इच्छा जताई</h2><div>मामले में राजनीतिक तड़का तब लगा जब तृणमूल कांग्रेस सांसद महुआ मोइत्रा और कीर्ति आजाद ने भी मजाकिया अंदाज में इस पार्टी में शामिल होने की इच्छा जताई। महुआ मोहत्रा ने सोशल मीडिया पर पोस्ट कर लिखा कि वह एंटी नेशनल पार्टी की कार्ड होल्डर सदस्य होने के साथ सीजेपी में भी शामिल होना चाहती हैं। जवाब में पार्टी ने लिखा लोकतंत्र को आप जैसे फाइटर की जरूरत है। महुआ मोहित्रा आपका स्वागत है। वहीं कीर्ति आजाद ने पूछा कि पार्टी जाइन करने की योग्यता क्या है? तो सीजेपी ने जवाब दिया 1983 वर्ल्ड कप जीतना काफी है। इन पोस्ट के बाद सोशल मीडिया पर मीम्स और मजाक की बाढ़ आ गई है। लेकिन इसी बीच पार्टी ने कुछ गंभीर मुद्दे भी उठाने शुरू कर दिए। सीजेपी ने नीट और सीबीएसई जैसी परीक्षाओं में गड़बड़ियों के खिलाफ आवाज उठाई। वहीं सीबीएसई रिचेकिंग फीस खत्म करने की मांग की और छात्रों से बोर्ड की गलती का फैसला वसूलने को भ्रष्टाचार बताया है। यानी व्यंग के बीच पार्टी शिक्षा, बेरोजगारी और सिस्टम की जवाबदेही जैसे मुद्दों को भी हवा देने लग गई है। सबसे ज्यादा चर्चा अब सीजेपी के घोषणापत्र की हो रही है।&nbsp;</div><h2>पार्टी के घोषणापत्र की क्यों इतनी चर्चा</h2><div>पार्टी ने पांच सूत्रिय एजेंडा जारी किया है। इसमें रिटायरमेंट के बाद जजेस को राज्यसभा सीट ना देने, संसद और कैबिनेट में महिलाओं को 50% आरक्षण देने, मीडिया की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने और दल बदलने वाले नेताओं पर 20 साल का चुनावी प्रतिबंध लगाने जैसी मांगे शामिल कर दी है। यहां तक कि पार्टी ने कहा है कि अगर किसी वैध वोटर का नाम वोटर लिस्ट से हटाया जाता है तो चुनाव आयोग के अधिकारियों पर सख्त कार्यवाही होनी चाहिए।&nbsp;</div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 20 May 2026 14:01:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/who-formed-the-cockroach-janata-party-five-lakh-people-including-mahua-and-kirti-azad</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[दोस्त रूस से तेल खरीदते थे, खरीदते रहेंगे, भारत का ये रूप देख अमेरिका को भी बोलना पड़ा- 30 दिन की राहत और ले लो]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/friends-used-to-buy-oil-from-russia-and-will-continue-to-do-so-seeing-this-form-of-india]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारत और रूस के बीच होने वाले कच्चे तेल कारोबार का क्या होगा? क्या अमेरिका अपनी प्रतिबंध से छूट जारी रखेगा? क्या भारत उस छूट के आधार पर रूस से तेल खरीदेगा? इस सवाल के जवाब में जो जवाब भारत के पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय में संयुक्त सचिव सुजाता शर्मा ने जो जवाब दिया है वो वाकई में भारत की तरफ से एक बड़ा बयान है क्योंकि उन्होंने यह साफ कर दिया है कि हालात कैसे भी हो कोई वेबर हो या ना हो भारत अपना तेल रूस से खरीदता रहेगा। उन्होंने साफ तौर पर कहा है कि भारत का रुख पूरी तरह से अडिग है कि भारत अपनी आयात रणनीति पूरी तरह से सुसंगत रखता है और अपनी जरूरत के हिसाब से तेल खरीद करता है। ऐसे में रूस पर अमेरिकी छूट के संबंध में उन्होंने यह जोर दिया कि पहले भी रूस से खरीदारी जारी थी और छूट से पहले भी छूट के दौरान भी और अब भी यह खरीद जारी रहेगी।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/trump-chair-told-which-country-will-be-attacked-next-india-preparations-begin" target="_blank">Trump की कुर्सी ने बताया किस देश पर होगा अगला हमला, भारत की तैयारी शुरू!</a></h3><h2>रूस से तेल खरीद</h2><div>दरअसल लगातार यह सवाल उठ रहे थे कि भारत क्या रूस से तेल खरीदना बंद कर देगा क्योंकि अमेरिकी वेवर की मियाद खत्म हो रही थी। ऐसे में पहले रूस की तरफ से यह कहा गया था कि वह भारत को कच्चे तेल की सप्लाई कम नहीं होने देगा। भारत को जितना कच्चा तेल चाहिए रूस उतना सप्लाई करने के लिए तैयार था। ऐसे में भारत की तरफ से यह स्टेटमेंट का आना साफ तौर पर यह बताता है कि अब अमेरिका तेल के मामले में कोई प्रतिबंध लगाए या ना लगाए। भारत रूस से अपनी तेल खरीद की नीति तब तक जारी रखेगा जब तक उसकी जरूरतें वहां से पूरी हो रही हैं और जनता के हित को ध्यान में रखकर जिस तरीके से तेल खरीद की जाती है जिससे तेल की कीमतें स्थिर होती रहे। वह भारत की प्राथमिकता में रहेगा। इस बीच अमेरिका ने रूसी तेल खरीदने के लिए प्रतिबंधों में दी गई छूट को बढ़ाने का फैसला किया है। अमेरिका की यह समय सीमा शनिवार को खत्म हो गई थी। रॉयटर्स के मुताबिक यह फैसला कई देशों की ओर से रूसी तेल खरीदने के लिए और समय मांगने के बाद लिया गया है। सूत्रों ने बताया है कि अमेरिका इस छूट को 30 दिनों के लिए और बढ़ाएगा। गौरतलब है कि रूसी कच्चे तेल का एक प्रमुख खरीदार भारत ने इससे पहले कहा था कि वह अमेरिकी छूट के बावजूद मॉस्को से कच्चा तेल खरीद रहा है और व्यावसायिक व्यवहार्यता और ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए इसका आयात जारी रखेगा। हालांकि, इस छूट से भारतीय रिफाइनरियों के लिए रूसी तेल का भारी आयात जारी रखना आसान हो गया है। रूसी तेल की खरीद पर अमेरिका की ओर से दी गई छूट की अवधि खत्म होने पर क्या किया जाएगा, इस सवाल पर सुजाता ने कहा कि 'छूट की अवधि से पहले भी रूसी तेल खरीदा जा रहा था, उस दौरान भी खरीदा जा रहा था और अब भी खरीदा जा रहा है, क्योंकि यह कंपनियों के कमर्शल फैसले से जुड़ी बात है।' हालांकि उन्होंने यह भी साफ किया कि 'देश में कच्चे तेल की कोई तंगी नहीं है। इसकी सप्लाई का पूरा इंतजाम किया गया है। छूट मिले या न मिले, कोई फर्क नहीं पड़ेगा।</div><h2>LPG पर OMC की अंडर-रिकवरी 750 करोड़ रुपये</h2><div>ऑयल मार्केटिंग कंपनियों को देश में पेट्रोल-डीजल और LPG की बिक्री पर हो रहा रहा नुकसान कीमतें बढ़ाए जाने के बाद नीचे आया है, लेकिन अब भी यह काफी ऊंचे स्तर पर है। पेट्रोलियम एंड नैचरल गैस मिनिस्ट्री में जॉइंट सेक्रेटरी सुजाता शर्मा ने&nbsp; कहा कि पेट्रोल-डीजल और LPG पर OMC की रोजाना की अंडर-रिकवरी 750 करोड़ रुपये है। शर्मा ने यह भी कहा कि रूसी तेल खरीदने पर अमेरिकी छूट रहे या न रहे, भारत के लिए कच्चे तेल की सप्लाई पर कोई आंच नहीं आएगी। पेट्रोल-डीजल के दाम 3-3 रुपये प्रति लीटर बढ़ाए जाने से पहले पिछले हफ्ते तेल और गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने कहा था कि OMC को 1000 करोड़ रुपये रोजाना की अंडर-रिकवरी का सामना करना पड़ रहा है। क्या सरकारी तेल कंपनियों के नुकसान की सरकार भरपाई करेगी, इस पर सुजाता ने कहा कि कंपनियों को राहत पैकेज देने का फिलहाल कोई प्लान नहीं है। उन्होंने आने वाले दिनों में पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ाए जा सकने के बारे में कहा, 'इस बारे में कोई अनुमान नहीं लगा सकते।' इंडस्ट्री सूत्रों के मुताबिक, दाम बढ़ाए जाने के बाद भी OMC को पेट्रोल पर करीब 11 रुपये/लीटर और डीजल पर 39 रुपये/लीटर की अंडर रिकवरी है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/iran-and-russia-enter-cuba-usa-surrounded-by-300-drones-raising-concerns-for-trump-administration" target="_blank">Cuba में Iran-Russia की एंट्री! 300 Drones से घिरा America, Trump प्रशासन की बढ़ी चिंता</a></h3><h2>अमेरिकी ट्रेजरी विभाग ने क्या कहा</h2><div>अमेरिकी ट्रेजरी विभाग ने यह कदम वैश्विक कच्चे तेल के बाजार में स्थिरता लाने और सबसे कमजोर देशों को ऊर्जा संकट से बचाने के लिए उठाया है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट करते हुए बेसेंट ने लिखा कि अमेरिकी ट्रेजरी विभाग एक अस्थायी 30 दिनों का सामान्य लाइसेंस जारी कर रहा है ताकि सबसे कमजोर देशों को समुद्र में फंसे हुए रूसी तेल तक अस्थायी रूप से पहुंचने की क्षमता मिल सके। यह विस्तार उन्हें अतिरिक्त लचीलापन (फ्लेक्सिबिलिटी) देगा, और हम इन देशों की जरूरत के हिसाब से उन्हें विशेष लाइसेंस देने के लिए मिलकर काम करेंगे। यह सामान्य लाइसेंस भौतिक कच्चे तेल के बाजार को स्थिर करने में मदद करेगा और यह सुनिश्चित करेगा कि तेल सबसे अधिक ऊर्जा-संवेदनशील&nbsp; देशों तक पहुंचे। इससे चीन की रियायती तेल का भंडारण करने की क्षमता कम हो जाएगी और मौजूदा आपूर्ति को सबसे जरूरतमंद देशों तक पहुंचाने में भी मदद मिलेगी।&nbsp;</div><h2>अमेरिका ने क्यों उठाया ये कदम</h2><div>अमेरिकी वित्त विभाग के विदेशी संपत्ति नियंत्रण कार्यालय (OFAC) द्वारा 17 अप्रैल को जारी एक सामान्य लाइसेंस के अनुसार, प्रतिबंधित जहाजों सहित टैंकरों पर लदे रूसी तेल और पेट्रोलियम उत्पादों को 17 अप्रैल को पूर्वी समयानुसार 12:01 बजे (भारतीय समयानुसार सुबह 9:31 बजे) या उससे पहले अधिकांश देशों द्वारा 16 मई तक खरीदा और प्राप्त किया जा सकता था। OFAC द्वारा संशोधित सामान्य लाइसेंस के माध्यम से इस छूट को अब 17 जून तक बढ़ा दिया गया है। अप्रैल में भी यह छूट समाप्त हो गई थी, लेकिन अमेरिका ने कुछ दिनों बाद इसे बढ़ा दिया था, वह भी पहले यह घोषणा करने के बाद कि इसका नवीनीकरण नहीं किया जाएगा। मार्च में जारी की गई प्रारंभिक छूट 11 अप्रैल को समाप्त हो गई थी, लेकिन बाद में 17 अप्रैल को इसका नवीनीकरण किया गया था। उद्योग विशेषज्ञों के अनुसार, मई के मध्य तक छूट बढ़ाने का निर्णय संभवतः रूसी कच्चे तेल खरीदने वाले देशों के दबाव के बाद लिया गया था ताकि होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने के कारण खाड़ी देशों में तेल की कमी की आंशिक भरपाई की जा सके। इस बार भी यही स्थिति हो सकती है। विशेषज्ञों का मानना ​​है कि डोनाल्ड ट्रम्प प्रशासन इस तरह की छूटों को अंतरराष्ट्रीय तेल की कीमतों में लगातार हो रही बढ़ोतरी और इसके परिणामस्वरूप अमेरिका में घरेलू ईंधन की कीमतों में होने वाली वृद्धि को रोकने के प्रयासों का हिस्सा मानता है, खासकर इस साल के अंत में होने वाले मध्यावधि चुनावों को देखते हुए। लेकिन इस छूट की अमेरिका के विभिन्न वर्गों द्वारा आलोचना की गई है। आलोचकों का तर्क है कि इससे मॉस्को को भारी लाभ हो रहा है, जिसका उपयोग वह यूक्रेन में अपने युद्ध प्रयासों को वित्त पोषित करने के लिए करेगा। पश्चिम एशिया में अमेरिका ईरान के साथ चल रहे संघर्ष के दौरान ईरान से तेल और ईंधन की खरीद पर दी गई इसी तरह की छूट के खिलाफ भी इसी तरह के तर्क दिए गए थे। वाशिंगटन ने रूसी छूट को दो बार बढ़ाया है, लेकिन उसने ईरानी छूट का नवीनीकरण नहीं किया है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/tehran-big-bet-for-peace-in-the-middle-east-sending-a-14-point-roadmap-through-pakistan" target="_blank">Middle East में शांति के लिए Tehran का बड़ा दांव, Pakistan के जरिए भेजा 14-Point Roadmap</a></h3><h2>भारत ऊर्जा जरूरतों के लिए रूसी तेल खरीदता रहा है</h2><div>हाल के महीनों में भारत के कच्चे तेल के आयात का लगभग 2.5 से 2.7 मिलियन बैरल प्रति दिन (bpd) जो देश के कुल तेल आयात का लगभग आधा हिस्सा है। होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरा है; जबकि इसका दीर्घकालिक औसत लगभग 40% रहा है। पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) युद्ध के कारण इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग से जहाजों की आवाजाही नाममात्र रह गई है, जिससे इस आपूर्ति का अधिकांश हिस्सा प्रभावी रूप से बंद हो गया है। मॉस्को से अधिक तेल आयात ने इराक और कुवैत जैसे देशों से होने वाले पश्चिम एशियाई तेल के नुकसान की आंशिक रूप से भरपाई की है। रूस नई दिल्ली के लिए कच्चे तेल का सबसे बड़ा स्रोत है। फरवरी में, भारतीय रिफाइनरियों ने 1 मिलियन bpd से कुछ अधिक रूसी कच्चे तेल का आयात किया था, जो कि 2025 के 2 मिलियन bpd से अधिक के उच्च स्तर (पीक) का लगभग आधा था। मात्रा में इस भारी गिरावट के बावजूद, फरवरी में रूस भारत का सबसे बड़ा कच्चा तेल आपूर्तिकर्ता बना रहा, जो उसके कुल तेल आयात के लगभग पांचवें हिस्से (20%) के बराबर था। इसके बाद, कमोडिटी मार्केट एनालिटिक्स फर्म 'केपलर' के टैंकर डेटा के अनुसार, पश्चिम एशिया में भीषण युद्ध और प्रतिबंधों में छूट (मिलने के कारण, मार्च में रूस से तेल आयात लगभग दोगुना होकर 2 मिलियन bpd हो गया। यह उस महीने के लिए भारत के कुल तेल आयात का लगभग 45% था, जबकि दूसरी ओर पश्चिम एशिया से होने वाला आयात धराशायी हो गया। अप्रैल में रूसी कच्चे तेल का आयात घटकर 1.6 मिलियन bpd रह गया, जिसका मुख्य कारण नयारा एनर्जी रिफाइनरी का मेंटेनेंस (रखरखाव) के लिए बंद होना था, जो रूसी कच्चे तेल की बड़ी उपभोक्ता है। मई में अब तक रूसी कच्चे तेल का आयात फिर से लगभग 2 मिलियन bpd पर पहुँच गया है।</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 19 May 2026 14:11:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/friends-used-to-buy-oil-from-russia-and-will-continue-to-do-so-seeing-this-form-of-india</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[यूरोप की कट्टरपंथी लहर ने ब्रिटेन में दस्तक देते हुए कैसे राजनीति में मचा दिया भूचाल, PM स्टार्मर की चली जाएगी कुर्सी?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/how-has-the-radical-wave-from-europe-knocked-on-britain-door-and-caused-an-earthquake-in-politics]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>ब्रिटेन की राजनीति में इस समय बड़ा भूचाल देखने को मिल रहा है। प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर को लेकर इस्तीफे की अटकलें और तेज हो गई है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक लेबर पार्टी के अंदर बढ़ते दबाव और खराब राजनीतिक माहौल के कारण स्टार्मर अपनी कुर्सी छोड़ सकते हैं। बताया जा रहा है कि वह सम्मानजनक तरीके से पद छोड़ने की रणनीति बना रहे हैं। इस बीच लेबर पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व स्वास्थ्य सचिव वैस स्ट्रिंग के बयान ने ब्रिटिश राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। वैस ने खुलकर कहा है कि ब्रेग्जिट यानी यूरोपियन संघ से अलग होना ब्रिटेन की बहुत बड़ी गलती थी। उन्होंने कहा कि आने वाले समय में ब्रिटेन को दोबारा यूरोपियन संघ के करीब जाना होगा। उनके मुताबिक ब्रिटेन का भविष्य यूरोप से जुड़ा हुआ है और एक दिन ऐसा भी आ सकता है जब ब्रिटेन फिर से यूरोपियन संघ में शामिल हो जाए। स्ट्रिंग के इस बयान के बाद लेबर पार्टी के अंदर सत्ता संघर्ष की चर्चा तेज होगी। माना जा रहा है कि अगर स्टारमर इस्तीफा देते हैं तो वैस खुद पार्टी नेतृत्व की दौड़ में उतर सकते हैं। वहीं स्टार्मर की मुश्किलें हाल ही में सामने आई। जेफरी एपस्टिन विवाद के बाद और बढ़ गई। रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि लेबर पार्टी से जुड़े कुछ नेताओं के एब्सस्टीन से संबंध की जानकारी पहले से ही मौजूद थी। हालांकि इस मामले में कोई आधिकारिक आरोप साबित नहीं हुआ है। लेकिन विपक्ष लगातार सरकार और पार्टी पर सवाल उठा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर लेबर पार्टी में नेतृत्व परिवर्तन होता है और यूरोप समर्थक नेता मजबूत होते हैं तो ब्रिटेन और यूरोपियन संघ के रिश्तों में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। 12 मई को कैबिनेट मीटिंग के दौरान स्टार्मर रिजाइन करने से मना कर दिया है। इसके बाद स्टार्मर सरकार के एक जूनियर मंत्री ने इस्तीफा दे दिया। कुछ सहयोगी भी पहले ही सरकार छोड़ चुके हैं। अब 80 से ज्यादा लेबर सांसद खुलकर यह मांग कर चुके हैं कि कीर स्टार्मर अपने इस्तीफे की तारीख तय करें ताकि पार्टी व्यवस्थित तरीके से अपना नया नेता चुन सके। ऐसे में पहला बड़ा सवाल तो यही है कि 2 साल पहले ही इतनी बड़ी बहुमत के साथ जीतकर 10 डाउनिंग स्ट्रीट पहुंचे स्टारमर पर अब कुर्सी छिनने का खतरा क्यों मंडरा रहा है?</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/uk-health-minister-wes-streeting-has-dealt-a-major-blow-to-pm-starmer" target="_blank">अब आपके नेतृत्व पर भरोसा नहीं, UK Health Minister Wes Streeting ने PM Starmer को दिया बड़ा झटका</a></h3><h2>लोकल इलेक्शन है बड़ी वजह</h2><div>ब्रिटेन में हाल ही में हुए लोकल चुनाव में लेबर पार्टी को करारी शिकस्त मिली है। पार्टी ने स्थानीय परिषदों में 1400 से ज्यादा सीटें गवा दी। वेल्स में भी दशकों बाद उसे बड़ी हार मिली। वहीं रिफॉर्म यूके पार्टी ने कई जगह जीत दर्ज की। जबकि उसे कुल वोटों का 30% से भी कम हिस्सा मिला था। नतीजे आने के बाद स्टारमर ने 11 मई को एक भाषण भी दिया। बिना टाई और जैकेट के सफेद शर्ट पहनकर मंच पर आए स्टारमर ने इमोशनल अंदाज में अपनी गलतियों पर अफसोस जताया। हार की जिम्मेदारी लेते हुए उन्होंने लेबर पार्टी के मूल्यों को दोहराया। स्टारमर और उनके समर्थकों ने दलील दी कि अगर लीडरशिप बदला गया तो देश में राजनीतिक अराजकता फैल सकती है। उन्होंने याद दिलाया कि 204 में लेबर पार्टी की जीत से पहले कंजर्वेटिव पार्टी में लगातार प्रधानमंत्री बदलते रहे थे। लेकिन उनकी इस स्पीच का पार्टी सांसदों पर कोई असर नहीं दिखा। कई सांसदों का मानना है कि जनता के बीच स्टारमर की गिरती लोकप्रियता की वजह से लेबर पार्टी को ऐतिहासिक हार झेलनी पड़ी। पार्टी नगर परिषदों की सीटें हार गई। स्कॉटलैंड और वेल्स की संसदों में भी खराब प्रदर्शन हुआ।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/russia-intercepts-two-ukrainian-drones-no-casualties-reported" target="_blank">रूस ने यूक्रेन के 2 ड्रोन को रोका, कोई हताहत नहीं हुआ</a></h3><h2>9 साल के भीतर स्टार्मर ने पूरा किया पीएम का सफर</h2><div>14 साल बाद 2024 में लेबर पार्टी को इंग्लैंड के चुनाव में ऐतिहासिक जीत दिलाई थी। कीर ने सांसद बनने के मात्र 9 साल के भीतर प्रधानमंत्री पद तक का सफर पूरा किया। ब्रिटेन के 50 साल के इतिहास में पहले व्यक्ति थे जो 60 की उम्र के बाद पीएम बने। स्टार्मर खुद को नास्तिक कहते हैं, लेकिन पत्नी की यहूदी मान्यताओं का पूरा सम्मान करते हैं।&nbsp; ब्रिटेन को 'क्लीन एनर्जी सुपरपावर' बनाने का लक्ष्य रखा है। 'ग्रेट ब्रिटिश एनर्जी' कंपनी बनाएंगे। कीर कहते हैं फुटबॉल के मैदान पर वे न 'सर' होते हैं न ही नेता। वे आम इंसान बन जाते हैं। यूनिवर्सिटी लाइफ में दक्षिण फ्रांस के फ्रेंच रिवेरा इलाके में आइसक्रीम बेचकर पैसा कमाने का सोचा। पुलिस ने आइसक्रीम जब्त की कर ली। पब्लिक प्रॉसिक्यूशन के डायरेक्टर पद के दौरान वे नियमों और डिटेल को लेकर इतने सख्त थे कि साथियों ने उन्हें मि. रूल्स नाम दे दिया था।</div><h2>जेफरी एपस्टीन की बातचीत का मामला क्या है?</h2><div>स्टार्मर की घटती पॉपुलैरिटी ये जो है इसकी वजह सिर्फ लोकल इलेक्शंस नहीं है। पिछले कई महीनों से स्टार्मर की स्थिति कमजोर होती जा रही है। वे खराब अर्थव्यवस्था, अवैध प्रवास को लेकर जनता की नाराजगी झेल रहे हैं। अमेरिका में ब्रिटेन के राजदूत रहे पीटर मैडलसन की नियुक्ति भी विवाद बन गई थी। पिछले सितंबर ब्रिटिश मीडिया ने मेंडिलसन और जेफरी एपस्टीन की बातचीत के कई ईमेल्स शेयर किए थे। जिसके बाद उन्हें पद से हटाना पड़ा था। इसके बाद मेंडलसन पर आरोप लगे कि उन्होंने 2006 2007 के वैश्विक आर्थिक संकट के दौरान एपस्टीन के साथ वित्तीय बाजारों से जुड़ी सेंसिटिव जानकारी साझा की थी। कीर स्टारमर पर आरोप लगा कि उन्होंने वार्निंग्स को नजरअंदाज किया और एपस्टीन से मेंडलसन के रिश्तों की जानकारी होने के बावजूद उन्हें राजदूत बना दिया। बवाल के बाद स्टार्मर ने सार्वजनिक तौर पर माफी भी मांगी थी। उन्होंने कहा कि उन्हें यह नहीं पता था कि मेंडलसन और एपस्टीन इतने करीब थे। इन सब घटनाओं की वजह से स्टार्मर की लोकप्रियता पश्चिमी देशों के नेताओं में सबसे नीचे मानी जा रही है।</div><h2>यूरोप में कट्टरपंथी बढ़त</h2><div>इमिग्रेशन ने कट्टरपंथी पार्टियों को यूरोप में मुख्यधारा में ला दिया है। जर्मनी में एएफडी 2021 की 83 सीटों से 2025 में 152 पर पहुंची। फ्रांस में नेशनल रैली 2022 की 89 सीटों से 2024 में 142 सीटों तक पहुंची। इटली में जॉर्जिया मेलोनी की ब्रदर्स ऑफ इटली 2018 की 32 सीटों से 2022 में 119 सीटों तक पहुंची और सत्ता में आ गई।</div><h2>स्थायी निवास खत्म और 'ब्रिटिश वर्कर फर्स्ट'</h2><div>निगेल फराज की रिफॉर्म यूके राजनीति का मुख्य मुद्दा इमिग्रेशन है। पार्टी गैर-कानूनी माइग्रेंट्स को सीधे डिपोर्ट करने बात करती है। यूरोपियन कन्वेंशन ऑन ह्यूमन राइट्स छोड़ने और ह्यूमन राइट्स एक्ट खत्म करने का वादा है। फराज ब्रिटेन में स्थायी निवास अधिकार खत्म कर 5 साल का रिन्यूएबल वीजा चाहते हैं; ऊंची सैलरी और वेलफेयर बैन भी शर्त होगी।&nbsp;</div><h2>ब्रिटेन में 18.6 लाख भारतीय</h2><div>आंकड़े के मुताबिक ब्रिटेन में 18.64 लाख भारतीय हैं इसलिए रिफॉर्म यूके इमिग्रेशन सख्ती का असर छात्रों, वर्कर्स और परिवारों तक जाएगा। स्किल्ड वर्कर वीसा की फीस 1.84 से 2.12 लाख रुपए है। हेल्थ सरचार्ज 1.18 लाख रु. सालाना है। यानी 5 साल में हेल्थ सरचार्ज ही करीब 5.90 लाख रु. होगा। कुल मिलाकर हर रिन्यूअल पर प्रति व्यक्ति 8.02 लाख रु. खर्च हो सकता है।&nbsp;</div><h2>ये 4 लेबर नेता स्टार्मर को दे रहे चुनौती</h2><div><b>वेस स्ट्रीटिंगः</b> 43 वर्षीय पूर्व स्वास्थ्य मंत्री कैबिनेट छोड़कर सीधे नेतृत्व चुनौती देने वाले पहले बड़े लेबर नेता। आरोप- स्टारमर में 'विजन और दिशा' नहीं। स्थानीय चुनावों की हार को वे जनता की चेतावनी बता रहे हैं। ईयू से जुड़ने की वकालात।</div><div><b>एंडी बर्नहमः </b>ग्रेटर मैनचेस्टर मेयर और पूर्व हेल्थ मंत्री। उपचुनाव जीतकर संसद लौटना चाहते हैं। जीतने पर नेतृत्व चुनौती दे सकते हैं। मुद्दा लेबर कामकाजी वर्ग से कट गई। महंग जरूरी सेवाएं और स्टारमर मॉडल की कमजोरी बता रहे हैं।</div><div><b>जोश साइमंसः</b> मेकरफील्ड से सांसद 32 साल के साइमंस अपनी सीट एंडी बर्नहम के लिए छोड़ने को तैयार। वे बर्नहम की संसद वापसी का रास्ता बना रहे हैं। दावा- स्टारमर नेतृत्व में लेबर स्थानीय चुनावों में कमजोर हुई और नया चेहरा चाहिए।</div><div><b>लिसा नंदीः </b>भारतीय मूल की लिसा नेंडी मौजूदा सरकार में संस्कृति मंत्री हैं। मौजूदा हालात में उनका समर्थन भी स्टारमर विरोधी बर्नहम खेमे को है। लिसा 2020 में लेबर पार्टी के नेतृत्व पद के लिए चुनाव में अंतिम 3 उम्मीदवारों में से एक थीं।</div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 18 May 2026 13:31:29 +0530</pubDate>
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      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[राहुल गांधी के राइट हैंड से कैसे छिनी केरल CM की कुर्सी? क्या प्रियंका की एंट्री ने पलट दी पूरी बाजी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/how-did-rahul-gandhi-right-hand-man-snatch-the-kerala-cm-chair]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>10 दिन और कई दौर की लंबी बातचीत के बाद आखिरकार केरलम के नए सीएम के नाम पर मुहर लग गई है। वीडी सतीशन सूबे के 13वें मुख्यमंत्री होंगे। यह ऐलान 13 मई को हो जाना था लेकिन 14 मई को हुआ। 5 साल अब सतीश त्रिवेंद्रम की कुर्सी पर बैठने वाले हैं। अब कांग्रेस के भीतर इस टॉप पोस्ट के लिए दो और बड़े नामों की ज्यादा चर्चा थी। एक नाम की तो खूब थी। कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल और केरल विधानसभा के पहले नेता प्रतिपक्ष रह चुके पहले मतलब पूर्व में रमेश रामकृष्णन चेन्नईथला कांग्रेस के सामने यह एक बहुत बड़ी चुनौती बन गई थी क्योंकि केसी वेणुगोपाल के बारे में कहा जाता है कि राहुल गांधी हर वक्त उनसे फोन पर टच में रहते हैं। किसी सूबे में मुख्यमंत्री चुनना हो, एलओपी चुनना हो, प्रदेश अध्यक्ष चुनना हो या पार्टी की कोई दूसरी बड़ी योजना हो, सबसे अहम सलाहकार की भूमिका केसी वेणुगोपाल के पास ही है। वही राहुल को एडवाइस करते हैं। फिर कुछ स्टैंडिंग रमेश चनेथला की भी थी। 4 मई को केरल विधानसभा के चुनाव के नतीजों में यूडीएफ यानी यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट एलडीएफ यानी कि लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट पर भारी पड़ा। पिनराई विजयन की सरकार चली गई। यूडीए ने 10 सालों बाद सत्ता में वापसी करते हुए 140 में से 102 सीटें जीत ली। अब कांग्रेस नीत गठबंधन चुनाव तो जीत गया था लेकिन फिर सीएम कौन होगा? तीन नाम थे। 10 दिन ड्रामा चला। फिर 3 मिनट में कहानी खत्म। वेणुगोपाल को शायद इसका अंदाजा नहीं था। सवाल है कि वेणुगोपाल की तपस्या में कोई कमी रह गई या फिर राहुल को उनकी अतिरिक्त या फिर यूं कह लें कि अपनी मर्जी की तपस्या पसंद नहीं आई। वेणुगोपाल सीएम नहीं बने तो क्या उनका बतौर संगठन महासचिव वाला जो रुतबा था या है अब वह पहले जैसा रह पाएगा? राहुल ने इस फैसले से क्या कर्नाटक, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे किचकिच से खुद को और पार्टी को बचा लिया है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/kerala-will-become-south-india-number-one-state-under-leadership-of-vd-satheesan-ak-antony-said" target="_blank">AK Antony का बड़ा बयान, VD सतीशान के नेतृत्व में Kerala बनेगा South India का नंबर-1 राज्य</a></h3><h2>केरल की राजनीति और कांग्रेस का दौर</h2><div>इस कहानी की शुरुआत 20 की 21 की निराशाओं से होती है। पूरे देश में कांग्रेस पार्टी बुरी तरह चुनाव हारी थी। लेकिन एक प्रदेश था जहां पर अब भी उसकी सांसे दुरुस्त चल रही थी। यह प्रदेश था केरल का प्रदेश जहां पर 2014 में 12 सीटें जीती थी और उसके बाद भी प्रदर्शन खराब नहीं रहा था 2019 में। ऐसे में पार्टी को लग रहा था कि परंपराओं का पालन होगा। 2021 में लेफ्ट के नेतृत्व वाली सरकार हट जाएगी और यूडीएफ यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट सत्ता में आ जाएगी। सबसे ज्यादा इस बात का इंतजार कर रहे थे। कांग्रेस के विधायक पूर्व गृह मंत्री रमेश चेनीथला जो 5 वर्ष तक पिनराई विजय सरकार के मुकाबले नेता प्रतिपक्ष थे। पर ऐसा हुआ नहीं। कांग्रेस बुरी तरह लगातार दूसरा विधानसभा चुनाव हार गई। अब 5 बरस का और इंतजार था। इस बीच 2024 में लोकसभा चुनाव हुए और यूडीएफ केरल की 20 में से 18 सीटें जीत कर आई। यह विजयन के लिए एक बड़ा झटका था। 2025 में लोकल बॉडी के इलेक्शन हुए तो यहां भी कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ ने बड़ी जीत हासिल की। इस जीत के बाद तीन नेता थे जो केरल के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर एक तक नजर लगाए हुए थे। पहले रमेश चेनीथला 28 वर्ष की उम्र में मंत्री बन गए। चार बार सांसद रहे। छात्र राजनीति के जरिए कांग्रेस में मजबूत हुए। यूथ कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी रहे। कई सरकारों में मंत्री ओमन चांडी की सरकार में गृह मंत्री भी। उन्हें लग रहा था 71 की उम्र में वरिष्ठता का मेरा दावा सबसे ज्यादा मजबूत होगा। पार्टी ने उनकी वरिष्ठता को ध्यान में रखते हुए 2026 के विधानसभा चुनाव में उन्हें कैंपेन कमेटी का मुखिया भी बनाया था। दूसरे दावेदार थे आलाकमान के प्रिय केसी वेणुगोपाल। 28 वर्ष की उम्र में कासरगोर से 1991 में पहली बार लोकसभा का चुनाव लड़ते रहे। उन दिनों वह केरल के कद्दावर नेता और मुख्यमंत्री के करुणाकरण के खेमे में माने जाते थे। 1996 से उन्होंने विधानसभा चुनाव लड़ना शुरू किया 2006 तक यानी लगातार तीन विधानसभा चुनाव में जीत हासिल की। ओमान चांडी की सरकार में कुछ वक्त तक मंत्री भी रहे।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/vd-satheesan-will-be-the-new-chief-minister-of-keralam-congress-high-command-has-taken-the-decision" target="_blank">आखिरकार लग गई मुहर! VD Satheesan होंगे Keralam के नए CM, Congress हाईकमान ने लिया फैसला</a></h3><h2>कैसे चमकी केसी वेणुगोपाल की किस्मत</h2><div>केसी वेणुगोपाल के बारे में कहा जाता है कि उन्हें अपने राजनीतिक आका चुनने और उनके हिसाब से पाला बदलने में महारत हासिल है। कभी करुणाकरण के खास हुआ करते थे। फिर करुणाकरण का सूर्य अस्त हुआ। एक के एंटनी मजबूत हुए तो केसी वेणुगोपाल ने रमेश च्नीथला का हाथ थाम लिया। चेन्नथला उन दिनों केरल की कांग्रेस में तीसरे मोर्चे की अगुवाई किया करते थे। चेन्नथला का यह चेला जब दिल्ली पहुंचा तो धीमे से गांधी परिवार में अपनी मजबूती बनाई और इसकी पटकथा लिखी गई 2009 के लोकसभा चुनाव में जब वह लोकसभा चुनाव जीतकर आए। 2014 में पार्टी के केरल से 12 सांसद थे। कांग्रेस अपने सबसे कमजोर स्तर पर थी। ऐसे में केरल के सांसदों को तरजीह देना आलाकमान के लिए लाजमी था और तब केसी वेणुगोपाल को पहली बार एक बड़ी जिम्मेदारी मिली पार्टी में चीफ व्हिप की। हालांकि उससे पहले यूपीए दो के दौरान भी वह कुछ वक्त के लिए राज्य मंत्री रहे थे। यहां से केसी वेणुगोपाल पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के करीब आना शुरू हो गए और इस पर आखिरी बड़ी मोहर लगी जब 2019 के उत्तरार्ध में अशोक गहलोत की जगह उन्हें पार्टी का संगठन महासचिव बनाया गया। यह कांग्रेस की कांग्रेस की दृष्टि से एक बड़ा पद था। उसके बाद केसी वेणुगोपाल राज्यसभा के रास्ते राजस्थान से दिल्ली पहुंचे। राज्यसभा के सांसद हो गए। लेकिन केसी को लग रहा था कि जब तक वो लोकसभा में राहुल गांधी के बगल वाली सीट पर नहीं होंगे तब तक उनका राजनीतिक कद और बड़ा नहीं होगा। ऐसे में उन्होंने 2 बरस का अंतराल रहने के बावजूद दो बरस अभी बाकी थे। उनकी राज्यसभा की सांसदी में वो पद छोड़ दिया और अल्पुजा से एक बार फिर से लोकसभा का चुनाव लड़े और जीते। इस चक्कर में कांग्रेस को राज्यसभा की एक सीट का नुकसान भी हुआ क्योंकि 2023 के उत्तरार्ध में राजस्थान में विधानसभा का अंकगणित नए चुनाव के बाद बदल चुका था। गहलोत चुनाव हार चुके थे। भजन लाल शर्मा के नेतृत्व में सरकार बन चुकी थी। ऐसे में जब वहां राज्यसभा के उपचुनाव हुए केसी की खाली की हुई सीट पर तो वहां से भाजपा जीती। यह थे दावेदार नंबर दो जो बहुत मुतमई थे क्योंकि पार्टी में उनकी चल रही थी। केरल में जब सनी जोसेफ को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया तो वह केसी वेणुगोपाल के आदमी कहे गए। विधायकों के टिकट वितरण में भी सबसे ज्यादा उनकी चली।</div><h2>हाई कमान के पास क्या थे बड़े सवाल</h2><div>मुख्यमंत्री चयन को लेकर कांग्रेस नेतृत्व के सामने कई राजनीतिक और संगठनात्मक समीकरण थे। पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और राहुल गांधी की शुरुआती बैठकों के बाद भी सहमति नहीं बन सकी थी। इस बीच पार्टी के भीतर भी यह संदेश जाने लगा था कि पिछले पांच वर्षों में विपक्ष के नेता के तौर पर उन्होंने कांग्रेस को नई ऊर्जा दी। कांग्रेस नेतृत्व ने पूर्व प्रदेश अध्यक्षों और वरिष्ठ नेताओं से भी राय ली। कई नेताओं ने आगाह किया कि अगर सतीशन की दावेदारी नजरअंदाज की गई तो जनता में गलत संदेश जाएगा, क्योंकि 2021 की हार के बाद उन्होंने पार्टी को जमीन पर फिर खड़ा किया।</div><h2>प्रियंका गांधी की एंट्री</h2><div>प्रियंका वायनाड से सांसद हैं। केरल पर कोई भी फैसला बिना उनकी सहमति के कैसे होता? गांधी फैमिली की राय वैसे इस तरह के मामलों में अलग नहीं होती है। आपस में बैठकर विमर्श के बाद फिर पब्लिक का फीडबैक लिया जाता है।&nbsp; एक दावा तो ये भी किया जा रहा है कि अगले साल यानी 2027 के अक्टूबर में कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर मल्लिकार्जुन खड़गे का कार्यकाल समाप्त हो रहा है। ऐसे में हो सकता है कि राहुल जितना केसी को पसंद करते हैं, जितने उनके करीबी हैं और कहा जाता है कि वेणुगोपाल ने राहुल को आईने में उतार लिया है। तो हो सकता है कि राष्ट्रीय अध्यक्ष पर भी उनकी नजर हो अगर यह ना मिले तो वह सही नहीं।</div><h2>टॉक टू वेणू वाला पावर अब भी क्या रहेगा कायम</h2><div>राहुल गांधी के जो आज के जो फेवरेट लोग हैं जिन पर वो ट्रस्ट करते हैं जो पार्टी के भीतर हैं वो दो ही लोग हैं। पहले हैं अजय माकन जिनके पास पार्टी के संसाधनों की चाबी है और दूसरे हैं वेणुगोपाल जिनको उन्होंने पार्टी सौंप रखी है। राहुल गांधी को हो सकता है कि यह चुनने में भी बड़ी मुश्किल आए कि वेणुगोपाल की जगह कौन लेगा। पिछले कुछ सालों में एक चीज जरूर हुई है कि वेणुगोपाल इतने शक्तिशाली हो गए हैं&nbsp; कि उन्होंने राहुल गांधी के दफ्तर को जरूर उनकी पावर को जरूर कंट्रोल किया है जो पहले एब्सोल्यूट पावर एंजॉय राहुल गांधी का ऑफिस करता था वो अब पूरी नहीं कर पाता है क्योंकि एक ही बात वो बार-बार कहते हैं जब भी कोई विषय आता है कि टॉक टू वेणू। तो ये जो टॉक टू वेणू है ये अपने आप में एक बहुत महत्वपूर्ण लाइन है कि आपको अपने दफ्तर के लोगों को भी आप ऐसे कह देते हो तो उसने उसने राहुल गांधी के दफ्तर की पावर्स को बहुत नीचे लेकर आया और राहुल&nbsp; ने अब्सोल्यूट पावर&nbsp; वेणु गोपाल को दी। लेकिन आज उस उसी का खामियाजा भी शायद वेणु गोपाल को भुगतना पड़ रहा होगा। बहरहाल, कहा जा रहा है कि राहुल ने फैसला इस बात पर नहीं लिया कि कौन उनके ज्यादा करीब है, बल्कि इस आधार पर लिया गया कि पार्टी के हित में क्या है। वेणु गोपाल की सेट की हुई गोटी में वो खुद ही गच्चा खा गए। अब यहां से कहा जा सकता है कि राहुल और ज्यादा मैच्योर राजनेता बनकर उभर रहे हैं।&nbsp;</div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 15 May 2026 15:52:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/how-did-rahul-gandhi-right-hand-man-snatch-the-kerala-cm-chair</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[वर्षों तक भारत पर लगाया दांव, अब चीन के धुन पर नाचने पर अचानक क्यों मजबूर हुआ अमेरिका, ट्रंप के डबलगेम ने कैसे बढ़ाई दिल्ली की टेंशन?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/trump-who-has-been-betting-on-india-for-years-is-now-suddenly-forced-to-dance-to-chinas-tun]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>21 फरवरी 1972 का दिन अमेरिका के राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन और चीन के संस्थापक माओ से तुंग बीजिंग में हाथ मिलाते, मुस्कुराते नजर आए थे। अमेरिका से पहली बार कोई राष्ट्रपति चीन पहुंचा था और चीन से दोस्ती का हाथ बढ़ाने का ही मकसद था। चीन ने भी निक्सन का खूब स्वागत किया और पहली बार चीन और अमेरिका में फिर से दोस्ती हुई। ये एक बड़ा उदाहरण था और दुनिया को ये सबक मिला की अंतरराष्ट्रीय राजनीति में स्थाई दोस्त नहीं होता, स्थाई दुश्मन नहीं होता। अमेरिका और चीन दशकों तक एक दूसरे के खिलाफ खड़े रहे थे। कोरिया वॉर में दोनों अप्रत्यक्ष रूप से आमने-सामने भी आए थे। अमेरिका ताइवान को असली चीन मानता था और चीन की कम्युनिस्ट सरकार को अपने लिए खतरा बताता था। लेकिन हर बीतते साल के साथ ये साफ होता गया कि असली चीन तो वही है जहां माओ का राज था और इस चीन की अमेरिका को बहुत जरूरत थी। दरअसल, उसे सोवियत संघ से मुकाबला करना था और इसी मकसद के लिए निक्सन 1972 में बीजिंग गए थे। चीन भी ये जानता था कि सोवियत संघ ये दोस्ती कहां तक निभाएगा। सोवियत ने पहले न्यूक्लियर बम बनाने का चीन को वादा किया था। लेकिन बीच में ही चीन को छोड़ दिया। फिर चीन को अकेले ही बम बनाना पड़ा। चीन और अमेरिका दोनों देश अपने पुराने मतभेंदो को कुछ समय के लिए पीछे छोड़ दोस्ती का हाथ बढ़ाते हैं। इस मुलाकात ने आने वाले दशकों में दुनिया की दिशा और दशा इसी गुंजाइश के चलते तय की। लेकिन उस वक्त शायदकिसी ने नहीं सोचा कि अमेरिका और चीन आने वाले सालों में केवल पार्टनर नहीं बनेंगे बल्कि एक दूसरे की अर्थव्यवस्था में इतने घुस जाएंगे कि दोनों चाहकर भी एक दूसरे से अलग नहीं हो पाएंगे। आज 50 साल बाद इतिहास फिर उसी मोड़ पर खड़ा है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार लड़ाई साम्यवाद और पूंजीवाद की नहीं बल्कि दुनिया की अर्थव्यवस्था और टेक्नोलॉजी पर नियंत्रण की है। सितंबर 2016 में बराक ओबामा चीन गए थे और अब मई 2026 में ट्रंप आए हैं।&nbsp;</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/diplomatic-significance-of-the-meeting-between-trump-and-jinping-is-crucial-for-rest-of-the-world" target="_blank">डोनाल्ड ट्रंप और शी जिनफिंग की मुलाकात के कूटनीतिक मायने शेष दुनिया के लिए अहम</a></h3><h2>बीजिंग पहुंचे ही जिनपिंग का गुणगान करने लगे ट्रंप&nbsp;</h2><p>दोनों देशों के शीर्ष नेताओं- डोनाल्ड ट्रंप और शी जिनपिंग ने एक-दूसरे से अच्छे रिश्ते पर जोर दिया है और जमकर एक-दूसरे की तारीफ की है। डोनाल्ड ट्रंप ने अपने शुरुआती संबोधन में शी जिनपिंग को महान नेता बताया है। वहीं चीनी राष्ट्रपति ने दोस्ती पर जोर देते हुए दोनों देशों में सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया है। बीजिंग की फ्लाइट में बैठने से पहले पत्रकारों से बात करते हुए डोनाल्ड ट्रंप ने कहा था कि दोस्त जिनपिंग से मिलूंगा तो ईरान पर लंबी बातचीत करूंगा। ऐसी ख्वाहिश जाहिर करने से कुछ घंटे पहले ट्रंप ने ही कहा था कि ईरान पर चीन से कोई खैरात नहीं चाहिए, हम कई मुद्दों पर बात करेंगे। लेकिन उनमें ईरान नहीं होगा। ईरान की बात ही क्या करनी। वो तो तो हमारे कंट्रोल में है और नेस्तोनाबूद है। जो ईरान ट्रंप के बयानों में नेस्तोनाबूद है वो अमेरिकी खुफिया एजेंसियों की फाइलों नें चुपचाप अपनी ताकत समेट रहा है। तहखानों में मिसाइलें फिर से तैनात हो रही हैं। लॉन्चर्स अपनी जगह पर लौट आए हैं। खबर है कि डीलमेकर-पीसमेकर दो दिन पहले फिर से बड़े हमले का मन बना रहे थे। फिर बीजिंग के लिए निकल लिए। इतना लंबा नैरेशन देने के पीछे का मकसद ये है कि ट्रंप क्या कह रहे हैं और क्या नहीं इन सब से जंग के भविष्य का पता नहीं चलता। फिर भी दुनिया शांति के सपने देख रही है। जैसे मानो दो सुपरपावर मिल रहे है तो गैस, पेट्रोल और डीजल तो सस्ते हो ही जाएंगे। भले ही वो दोनों सुपरपावर बंद कमरों में अपने मतलब की चीज खरीदने-बेचने के सौदे निपटा रहे हो। आज इन्हीं अनिश्चितताओं का एमआरआई स्कैन करेंगे। ये भी बताएंगे कि इस मुलाकात का भारत अमेरिका के रिश्तों पर क्या असर पड़ेगा।&nbsp;</p><h2>‘5 बी’ और ‘3 टी’</h2><p>अमेरिका का पूरा ध्यान अंग्रेजी के 'B' अक्षर से शुरू होने वाले पांच मोर्चों पर टिका है: बोइंग विमान, बीफ, बीन्स यानी सोयाबीन, बोर्ड ऑफ ट्रेड (व्यापार बोर्ड) और बोर्ड ऑफ इन्वेस्टमेंट (निवेश बोर्ड)। अमेरिका की मंशा बिल्कुल साफ है। वह सेमीकंडक्टर और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी संवेदनशील और अहम तकनीकों को विवादों से बचाकर रखना चाहता है, जबकि बाकी सामान्य व्यापार को पटरी पर लाना चाहता है। अमेरिकी प्रशासन का मानना है कि चीन के मौजूदा आर्थिक ढांचे से निपटने के लिए पुराने नियम अब नाकाफी हैं, इसलिए वे अब सीधे और बराबरी के सौदों पर ज्यादा जोर दे रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ, चीन का सारा जोर 'T' अक्षर वाले तीन मुख्य मुद्दों पर है: ताइवान,टैरिफ यानी आयात शुल्क और टेक्नोलॉजी। चीन की कोशिश है कि अमेरिका द्वारा उस पर लगाए गए तकनीकी और निवेश प्रतिबंधों में ढील दी जाए और दोनों देशों के बीच व्यापारिक तनातनी पर लंबे समय के लिए विराम लगे। दरअसल, अमेरिका की सख्त पाबंदियों ने चीन को तकनीकी रूप से आत्मनिर्भर बनने की राह पर तेजी से धकेल दिया है। इस वक्त चीन की आर्थिक रफ्तार भी कुछ धीमी पड़ी है, जिससे वहां की सरकार पर बाहरी व्यापार को सुधारने का भारी दबाव है। ऐसे में, दुनिया भर में बदलते हालातों के बीच चीन की यह भी कोशिश है कि उसकी इलेक्ट्रिक कारों और स्वच्छ ऊर्जा से जुड़े अन्य उत्पादों के लिए वैश्विक बाजारों के दरवाज़े पूरी तरह से खुल जाएं।</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/pakistan-commits-another-major-crime-at-the-same-place-where-india-brahmos-missile-had-fallen" target="_blank">जहां गिरी थी भारत की ब्रह्मोस, वहां पाकिस्तान ने फिर किया बड़ा कांड</a></h3><h2>एआई, सेमीकंडक्टर और नया बैटलग्राउंड</h2><p>यदि कभी व्यापार और शुल्क अमेरिका-चीन प्रतिद्वंद्विता की पहचान थे, तो अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता और उन्नत सेमीकंडक्टर रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के मुख्य युद्धक्षेत्र बन गए हैं। शिखर सम्मेलन में तेजी से शक्तिशाली हो रहे अत्याधुनिक कृत्रिम बुद्धिमत्ता प्रणालियों से उत्पन्न जोखिमों पर पहली बार गंभीर उच्च-स्तरीय चर्चा भी हो सकती है। यह उन कुछ क्षेत्रों में से एक है जहां वाशिंगटन और बीजिंग बढ़ते अविश्वास के बावजूद सीमित सहयोग की आवश्यकता को समझते हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस संबंधों में एक और बड़ी दरार बनकर उभरी है। एंथ्रोपिक के "क्लाउड मिथोस प्रीव्यू" एक हाइटेक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस प्रणाली जो सॉफ्टवेयर कमजोरियों की स्वायत्त रूप से पहचान करने और जटिल साइबर ऑपरेशन करने में सक्षम है। इसके जारी होने से तेजी से शक्तिशाली हो रहे कृत्रिम बुद्धिमत्ता एजेंटों से उत्पन्न जोखिमों को लेकर वैश्विक चिंताएं बढ़ गई हैं। हालांकि दोनों पक्षों ने एआई की सुरक्षा और दुरुपयोग पर संवाद स्थापित करने में सीमित तत्परता दिखाई है, फिर भी गहरा अविश्वास सहयोग पर हावी है। यह अविश्वास चीन के हालिया फैसले में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है, जिसमें उसने चीनी मूल की एआई स्टार्टअप कंपनी मैनस के मेटा द्वारा 2 अरब डॉलर के अधिग्रहण को रोक दिया, जो बीजिंग के अग्रणी एआई प्रतिभा और बौद्धिक संपदा को अपने रणनीतिक पारिस्थितिकी तंत्र के भीतर बनाए रखने के दृढ़ संकल्प का संकेत देता है। इस प्रकरण ने इस बात पर ज़ोर दिया कि तकनीकी प्रतिस्पर्धा अब हार्डवेयर तक पहुंच से हटकर प्रतिभा, डेटा और नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र पर नियंत्रण की ओर बढ़ रही है। इन घटनाक्रमों से दोनों पक्षों के बीच शत्रुतापूर्ण धारणाएं और भी प्रबल होने की संभावना है, जिससे अंतर्निहित "कबीले का प्रभाव" और भी स्पष्ट हो जाएगा।</p><h2>दोनों को एक दूसरे की जरूरत</h2><p>अपने पहले कार्यकाल में ही उन्होंने चीन से होने वाले आयात पर टैरिफ की घोषणा की थी। दूसरे टर्म में वह इस लड़ाई को और आगे ले गए और 125% तक टैरिफ जड़ दिया। हालांकि रेयर अर्थ मिनरल्स पर चीनी नियंत्रण की वजह से आखिरकार ट्रंप को समझौता करना पड़ा था।&nbsp; टैरिफ वॉर भले थम गई हो, पर अमेरिका और चीन के बीच की होड़ कायम है। दोनों एक-दूसरे पर दबाव बनाने की कोशिश करते हैं, पर इतना नहीं जिससे बात ज्यादा बिगड़े। ईरान युद्ध के दौरान भी यह देखने को मिला है। ईरान की मदद के आरोप में अमेरिका ने कुछ चीनी कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई की, जबकि चीन ने वॉशिंगटन की नीतियों का विरोध किया, पर सब नियंत्रण में। इसकी वजह है आपसी निर्भरता और जरूरत। चीन के लिए अमेरिका आज भी सबसे बड़ा बाजार है। हालांकि इस साल चीनी निर्यात में करीब 10% की कमी आई है। चीन की निर्यात आधारित अर्थव्यवस्था के लिए यह झटका है। खाड़ी देशों में भी उसका निर्यात घटा है। तेहरान का सबसे बड़ा तेल खरीदार होने के नाते भी उसकी परेशानी बढ़ रही है। वह चाहता है कि युद्ध जल्दी थमे। दूसरी ओर, ट्रंप को ईरान पर समर्थन और निवेश के लिए चीन चाहिए। इसीलिए वह अपने साथ कई बड़े उद्यमियों को लेकर पहुंचे हैं।</p><h2>भारत के लिए संतुलन की चुनौती</h2><p>भारत हाल के वर्षों में अमेरिका भारत का अहम रणनीतिक साझेदार बनकर उभरा है। दूसरी ओर चीन भारत का अहम पड़ोसी देश है, जिसके साथ सीमा विवाद के बाद रिश्ते व्यवहारिक समझ पर वापस लौट रहे हैं। ऐसे में दोनों देशों के आपसी संबंध और इस दौरे के निष्कर्ष भी भारत पर असर डालेगा। अमेरिका और चीन के रिश्ते एक लंबे वक्त तक असहजता के दायरे में रहे, जिसके जियोपॉलिटिकल प्रभाव से भारत भी अछूता नहीं रहा है। बीजिंग में चल रही बातचीत का तुरंत नतीजा चाहे जो हो। भारत के कूटनीतिक और विदेश नीति के विशेषज्ञ इन घटनाक्रमों पर पैनी नज़र है। अमेरिका और चीन के बीच लंबे समय तक चलने वाली इस गहरी खींचतान से, पहले से ही उलझी और बंटी हुई वैश्विक व्यवस्था पर दबाव और ज्यादा बढ़ जाएगा। जैसे-जैसे दुनिया भर के व्यापार, तकनीक और कूटनीतिक रिश्ते दो अलग-अलग खेमों में बंटते जा रहे हैं, भारत की 'मल्टी-अलाइनमेंट' (यानी किसी एक गुट में न बंधकर, सभी देशों के साथ संतुलन बनाकर चलने की) नीति की असली परीक्षा होगी। आने वाले समय में भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि वह किसी एक महाशक्ति या शक्तिशाली गुट पर पूरी तरह निर्भर हुए बिना, अपनी रणनीतिक आज़ादी को कैसे बरकरार रखता है। साथ ही, उसे अपने राष्ट्रीय हितों और अलग-अलग मुद्दों के हिसाब से अन्य देशों के साथ मिलकर चलने का यह नाजुक संतुलन भी साधे रखना होगा।</p><h2>ट्रंप के धोखे से बढ़ेगी दिल्ली की टेंशन?</h2><p>अमेरिका ने हलिया वर्षों में चीन को अपने सबसे प्रमुख प्रतिद्वंद्वी की तरह देखा है और भारत को बीजिंग को संतुलित करने के लिए आगे बढ़ाने की कोशिश की है लेकिन अब से स्थिति बदल सकती है। यह स्थिति भारत के लिए एक इम्तिहान की तरह हो सकती है। बीते दो दशको से अमेरिका ने भारत को इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव के मुकाबले के लिए एक संतुलन बनाने वाले देश के तौर पर देखा है। हालांकि मौजूदा ट्रंप प्रशासन का रवैया बीजिंग के पक्ष में और भारत को नुकसान पहुंचाने जैसा है। ऐसे में अमेरिका-चीन शिखर सम्मेलन की खासतौर से नई दिल्ली के लिए अहमियत है। भारत की चिंता होगी कि चीन को अमेरिका एशिया में केंद्रीय रणनीतिक चुनौती के बजाय वार्ताकार साझेदार के तौर पर देख सकता है। भारत नहीं चाहेगा कि अमेरिका क्षेत्र में उसकी रणनीतिक अहमियत को नजरअंदाज करे।</p><p>&nbsp;</p>]]></description>
      <pubDate>Thu, 14 May 2026 14:16:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/trump-who-has-been-betting-on-india-for-years-is-now-suddenly-forced-to-dance-to-chinas-tun</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[जेल में प्रिटिंग, आर्मी कैंप में प्रश्नपत्र तैयार, करेंसी से ज्यादा सिक्योरिटी, NEET पेपर लीक के बीच चीन मॉडल की क्यों हो रही इतनी चर्चा]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/why-is-the-china-model-being-discussed-so-extensively-amidst-the-neet-paper-leak-controversy]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>अभी 3 मई की रात को करीब 23 लाख बच्चों ने महीनों बाद पहली बार सुकून की सांस ली थी। किसी ने मां से कहा कि मम्मी पेपर अच्छा हो गया। किसी ने पापा से कहा कि शायद सरकारी नौकरी मिल जाएगी। मेडिकल कॉलेज मिल जाएगा। उन लाखों बच्चों को लग रहा था कि उनकी जिंदगी जो है वह बदलने वाली है। लेकिन कुछ ही दिनों बाद ये खबर आती है जिसने उनकी दुनिया को हिला कर दिया है। पेपर लीक की शिकायतों के बाद नीट एग्ज़ाम रद्द हो गया है। 3 मई को ऑलरेडी कंडक्ट हो चुका एग्ज़ाम अब फिर से होगा। ऐसे में सवाल है कि आखिर कब तक इस देश में लाखों बच्चों से कहा जाएगा कि बच्चे तुम ना फिर से तैयारी कर लो। एग्जाम जो है वो कैंसिल हो गया। आखिर कब तक इस देश में बच्चे पेपर लीक, करप्शन और सिस्टम की नाकामियों का बोझ उठाते रहेंगे? एक बच्चा है जिसकी दुनिया स्कूल, कोचिंग, टेस्ट सीरीज और चार दीवारी के एक छोटे से कमरे तक सिमट चुकी थी। जिसने महीनों से सालों से अपने दोस्तों से दूरियां बनाई थी। वो त्यौहार पर अपने घर नहीं गया। उसने मोबाइल फोन छोड़ दिया। उसने क्रिकेट खेलना छोड़ दिया। आईपीएल देखना छोड़ दिया। दोस्तों के साथ मौज मस्ती, बाहर घूमना फिरना छोड़ दिया। क्योंकि उसे यह बताया गया था उसके टीचर्स, उसके पेरेंट्स के थ्रू कि बच्चे मेहनत कर लो जिंदगी बदल जाएगी। लेकिन अचानक सिस्टम एक दिन कहता है कि एग्जाम कैंसिल हो चुका है। उसी पल उन लाखों बच्चों को ऐसा लगता है जैसे उनकी मेहनत नहीं उनके भरोसे को खत्म कर दिया गया हो। उनकी जिंदगी उन्हें करियर से खिलवाड़ कर दिया गया हो।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/pakistan-paid-off-its-1971-debt-by-hiding-iranian-planes" target="_blank">ईरानी विमानों को अपने यहाँ छिपा कर पाकिस्तान ने उतार दिया 1971 का कर्ज</a></h3><h2>तब और अब में क्या चदल गया?</h2><div>2024 में लीक स्थानीय (पटना और गोधरा) था, जबकि 2026 में डिजिटल प्रसार के कारण यह राष्ट्रव्यापी हो गया।</div><div>तब बचाव की नीति थी, 2026 में जीरो टॉलरेंस के तहत तुरंत फैसला।</div><div>अब सार्वजनिक परीक्षा अधिनियम लागू है। इसमें सजा जुर्माना ज्यादा है।&nbsp;</div><div>दूसरे देशों में कैसे कानून हैं?</div><div>चीनः नकल या पेपर लीक पर 7 साल तक वेल। इसे 'देशद्रोह जैस्स मानते हैं।&nbsp;</div><div>बांगलादेश, द. कोरिया पेपर लीक पर 10 साल तक की बेल और आजीवन ब्लैकलिस्ट करने का सख्त नियम।&nbsp;</div><div>अल्जीरियाः परीक्षा के दौरान देशव्यापी इंटरनेट शटडाउन व जेल का प्रावधान।</div><h2>अभ्यर्थियों पर क्या असर होगा?</h2><div>दोबारा परीक्षा की अनिश्चितता, तैयारी की लय टूटना बड़ा मनोवैज्ञानिक बोइा।&nbsp; परीक्षा और काउंसलिंग उत्लने से पूरा शैक्षणिक सत्र पिछड़ जाता है, जिससे</div><div>मेडिकल शिक्षा का समय बढ़ जाता है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/netanyahu-makes-a-big-revelation-on-pakistan-by-taking-the-name-of-india" target="_blank">ऐसा खेल खेल रहा...भारत का नाम लेकर नेतन्याहू का पाकिस्तान पर बहुत बड़ा खुलासा</a></h3><h2>आरोपियों के लिए क्या सजा?</h2><div>नीट 2024 के बाद बने 'सार्वजनिक परीक्षा अधिनियम 2024 में सख्ती</div><div>संगठित पेपर लीक के लिए 5-10 वर्ष की जेल। न्यूनतम 1 करोड़ रु. जुर्माना। परीक्षा कराने वाली एजेंसी से पूरी लागत वसूलेंगे। 4 साल बैन भी संभव। ऐसे केस में दोषसिद्दिध की दर कम है।</div><h2>परीक्षा में कितना खर्च आता है?</h2><div>23 लाख बच्चों को परीक्षा पर लगभग 400-500 करोड़ रु. खर्च आ सकता है। इसमें प्रश्नपत्रों को छपाई, सुरक्षित परिवहन, परीक्षा केंद्रों का किराया और स्टाफ का मानदेय शामिल है। छात्रों से दोचारा फीस नहीं ली जाएगी। मतलब है कि इसका पूरा खर्च एजेंसी उठाद्गी।</div><h2>ये सुझाव पहले मान लिए जाते तो शायद ऐसी नौबत नहीं आती</h2><div>करीब 24 लाख स्टूडेंट्स का फ्यूचर अब दांव पर है। लेकिन कुछ ऐसे काम हैं जो अगर पहले हो गए होते अगर वो सुझाव मान लिए जाते तो शायद यह नौबत ना आती। बात यह है कि साल 2024 में गवर्नमेंट ऑफ इंडिया की ओर से पार्लियामेंट्री स्टैंडिंग कमिटी ऑन एजुकेशन वुमेन चिल्ड्रन यूथ एंड स्पोर्ट्स बनाई गई थी। जिसके चेयर पर्सन थे कांग्रेस नेता और मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह। इस कमेटी ने पेपर लीक्स रोकने के लिए कुछ सुझाव दिए थे। पहला सुझाव था प्राइवेट वेंडर्स पर डिपेंडेंसी कम करना। पैनल ने इस बात पर फोकस किया था कि पेपर हैंडलिंग, एग्जाम, लॉजिस्टिक्स, टेक्निकल सपोर्ट्स के लिए गवर्नमेंट इंस्टीटशंस प्राइवेट वेंडर्स का सपोर्ट लेते हैं। यह पूरे एग्जाम सिस्टम को वनरेबल बनाता है। अगर कोई प्राइवेट वेंडर गड़बड़ी करता है तो उसे हमेशा के लिए ब्लैक लिस्ट किया जाना चाहिए। दूसरा सुझाव था फंड का बेहतर इस्तेमाल। पैनल ने एक जरूरी सवाल उठाया था कि जब एग्जाम सिस्टम के लिए करोड़ों रुपए का फंड एलोकेट किया जाता है तो उस फंड का इस्तेमाल एग्जाम सिक्योरिटी के लिए क्यों नहीं होता? इस दिशा में फंड का ज्यादा से ज्यादा और बेहतर से बेहतर इस्तेमाल होना चाहिए। तीसरा सुझाव था एग्जाम सेंटर का चुनाव। कमेटी ने ऑनलाइन एग्जामिनेशन पर संदेश जताया। सुझाव दिया कि अगर कंप्यूटर बेस्ड एग्जाम हो तो सिर्फ और सिर्फ गवर्नमेंट सेंटर्स पर हो। मतलब पेन पेपर सिस्टम पर जोर दिया गया था। चौथा सुझाव था एनटीए को यूपीएससी पैटर्न समझना चाहिए। नेशनल टेस्टिंग एजेंसी यानी कि एनटीए जो नीट एग्जाम कंडक्ट कराती है उसे यूपीएससी एग्जाम पैटर्न को समझना चाहिए। कमेटी का यह भी मानना है कि यूपीएससी का एग्जाम पैटर्न कंपैरेटिवली फेयर और ट्रांसपेरेंट होता है। सुझाव सुनने में तो बहुत अच्छे हैं, लेकिन फिर मन में सवाल आता है कि इन्हें अब तक लागू क्यों नहीं किया गया?</div><div><b>स्ट्रक्चरल प्रॉब्लम: </b>करीब 22 से 24 लाख स्टूडेंट्स नीट अपीयर करते हैं। ऐसे में गवर्नमेंट एजेंसीज के लिए बहुत मुश्किल हो जाता है कि वो बिना प्राइवेट वेंडर्स की सहायता के इंफ्रास्ट्रक्चर हैंडल करें।</div><div><b>पेन पेपर मोड वर्सेस कंप्यूटर बेस्ड एग्जाम</b> एक तरफ दिग्विजय सिंह की कमेटी इस बात पर जोर देती है कि बेटर ट्रांसपेरेंसी के लिए पेन पेपर मोड ही एग्जाम के लिए ठीक है। वहीं दूसरी तरफ सरकार की ओर से अपॉइंटंटेड के राधाकृष्णन कमिटी जिसमें बायोमेट्रिक वेरिफिकेशन, जीपीएस ट्रैकिंग, एआई मॉनिटरिंग जैसी सुविधाओं वाले एग्जाम्स पर जोर देती है। इन सजेशन को गवर्नमेंट अभी इवैल्यूएट कर रही है। अंडर कंसीडरेशन है। मतलब इंप्लीमेंट नहीं हो पाए हैं। हो जाते तो शायद पेपर लीक नहीं होता।</div><h2>एनटीए प्रमुख बोले- हम जिम्मेदारी लेते हैं...&nbsp;</h2><div>दोबारा परीक्षा कराने की प्रक्रिया 7-10 दिन में शुरू हो जाएगी एनटीए के महानिदेशक अभिषेक सिंह ने कहा, 'जो कुछ भी हुआ हम उसकी जिम्मेदारी लेते हैं, यह गलत था। दोबारा परीक्षा की तारीख के लिए मैं अपनी टीम के साथ बैठक करूंगा। अगले कुछ दिनों में पूरा परीक्षा शेड्‌यूल और तारीखें घोषित कर दी जएंगी। हमारी कोशिश होगी कि कम से कम समय में परीक्षा हो जाए ताकि शैक्षणिक कैलेंडर और प्रवेश प्रक्रिया बाधित</div><h2>इतने बड़े नेशनल एग्जाम्स बार-बार विवादों में क्यों&nbsp;</h2><div>&nbsp;पिछले कई सालों में एनटीए बार-बार अलग-अलग कंट्रोवर्सीज को लेकर सवालों घेरे में है। 2019 में जब एनटीए ने पहली बार नीट एग्जाम कराया तब आंसर की को लेकर विवाद हुआ। 2020 में जेईई मेंस में विवाद हुआ। उसी साल नीट यूजी में मध्य प्रदेश की एक छात्रा को सिर्फ छह नंबर दिए गए। लेकिन बाद में ओएमआर मिलान से उसके करीब 590 मार्क्स निकले। अब सोचिए कि एक सिस्टम की गलती ने बच्ची से उसका भविष्य नहीं बल्कि जिंदगी तक छीन ली थी। इसके बाद 2022 में जेईई मेंस के दौरान टेक्निकल ग्लिचेस की शिकायतें आई। 2024 में नीट कंट्रोवर्सी ने पूरे देश को हिलाया। 67 स्टूडेंट्स के फुल मार्क्स, ग्रेस मार्क्स के विवाद और पेपर लीक के आरोपों ने लाखों बच्चों के भरोसों को अंदर तोड़ दिया। सुप्रीम कोर्ट ने तक यह मान लिया कि पेपर लीक हुआ था। लेकिन पूरे एग्जाम में सिस्टमैटिक ब्रीच साबित नहीं होने के चलते तब उस बार री एग्जाम नहीं कराया गया। और 2026 में जब आया तो फिर वही डर, फिर वही गुस्सा, फिर वही सवाल, फिर वही कहानी।&nbsp;</div><h2>चीन में कैसे होती है लीक प्रूफ परीक्षा</h2><div>चीन की सरकारी टीवी सीसीटीवी ने बताया कि परीक्षा से 3 महीने पहले सेकेंडरी स्कूलों और विश्वविद्यालयों से कुछ सीनियर टीचर्स को टेस्ट पेपर्स डिजाइन करने के लिए चुना जाता है। इन बाद इन शिक्षकों को बीजिंग के दूर-दराज और सुनसान इलाकों जैसे मिलिट्री कैंपों या जेलों में भेजा जाता है, ताकि एग्जाम के सवाल बनाने से पहले उन्हें गोपनीयता बनाए रखने की ट्रेनिंग दी जा सके। साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार टेस्ट पेपर शिक्षा मंत्रालय और नेशनल एडमिनिस्ट्रेशन ऑफ़ स्टेट सीक्रेट्स प्रोटेक्शन दोनों के अधिकार में जेलों में प्रिंट किए जाते हैं। हर प्रिंट वर्कशॉप में कैमरे और गार्ड जैसे 24 घंटे सुरक्षा के कई तरीके होते हैं। टेस्ट पेपर की प्रिंटिंग के बाद इसे हथियारबंद गार्ड पूरे देश में ले जाते हैं। इनकी सुरक्षा बैकों और कैश ले जाने वाली आर्मर्ड गाड़ियों से भी ज़्यादा होती है। द गार्जियन की रिपोर्ट के चीन की बड़ी टेक कंपनियां सरकार के आदेश पर कॉम्पिटिटिव यूनिवर्सिटी एंट्रेंस एग्जाम के दौरान चीटिंग रोकने के लिए कई एप के AI फंक्शन बंद कर दिए हैं।</div><div>बहरहाल, पेपर लीक या एग्जाम कैंसिल होने की जब खबर आती है तो सरकार को यह समझना चाहिए। सिर्फ एक परीक्षा नहीं टूटती है। लाखों बच्चों का सिस्टम से भरोसा टूट जाता है।&nbsp; चंद लोगों की लापरवाही, चंद लोगों करप्शन और 23 लाख बच्चों की जिंदगी जो है उसे मजाक बनाकर रख दिया गया है।&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 13 May 2026 15:03:22 +0530</pubDate>
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      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[अनकहा लॉकडाउन? कितना बड़ा है आने वाला संकट, इससे निकलने का क्या है फॉर्मूला, आंकड़ों से समझें पूरा जियोपॉलिटिकल अर्थशास्त्र]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/an-unspoken-lockdown-how-big-is-the-impending-crisis-geopolitical-economy-through-data]]></guid>
      <description><![CDATA[<div><b>देश हमे देता है सबकुछ</b></div><div><b>हम भी तो कुछ देना सीखें।&nbsp;</b></div><div>बचपन की किताबों में ये कविता हम सबने कभी न कभी पढ़ी ही होगी। लेकिन हम देश को क्या दे सकते हैं। जवाब है-बहुत कुछ।&nbsp;<span style="font-size: 1rem;">सरकार की हमेशा यही दिली ख्वाहिश रहती है कि जनता छप्पर फाड़कर कमाए और दोनों हाथों से लुटाए, क्योंकि जब पैसा बाज़ार में घूमता है, तभी अर्थव्यवस्था का पहिया तेज़ी से भागता है, नई नौकरियां पैदा होती हैं और जेब में तनख्वाह आने से इंसान को पैसों से खरीदी जाने वाली सारी खुशियां मिल जाती हैं। नतीजा यह होता है कि आम आदमी का मूड एकदम चकाचक रहता है और वह सरकार से फालतू की शिकायतें करना बंद कर देता है। इसीलिए आपके शौक या बेतहाशा खर्चों को देखकर सरकार मन ही मन गदगद होकर सोचती है कि वाह, क्या शानदार आदमी है! मसलन, आपने शौक-शौक में किचन में भी एक टीवी लगवा लिया, तो सरकार खुश हो जाती है कि उसे इस पर टैक्स मिल गया, फिल गुड वाली फीलिंग आएगी। या फिर आप बिना किसी वजह के बस यूं ही गोवा ट्रिप पर निकल गए, गाड़ी में पेट्रोल भरवाया, रास्ते भर टोल टैक्स दिया और सरकार की बैठे-बिठाए कमाई करा दी, तो सरकार मन ही मन आपको सैल्यूट मारते हुए यही कहती है , ओय! तुस्सी कमाल कर दित्ता। अरे, इसने तो बिना बात ही बीवी को इतना महंगा गिफ्ट दे दिया! एनिवर्सरी तो अप्रैल में थी, पर खर्चा मई में ही कर डाला! सरकार फिर गदगद मुझे मेरा टैक्स मिल गया, सब चंगा! पूरी हाइपोथेटिकल थ्योरी का मजमून ये है कि अगर सरकार के सीने में कोई दिल धड़कता होगा, तो उसमें दिन-रात बस यही सब चलता रहता है। लेकिन ज़रा सोचिए, अगर आपके खर्चों पर तालियां पीटने वाली यही सरकार अचानक आपसे कहने लगे कि भाइयों-बहनों पेट्रोल बचाओ, सोना-वोना मत खरीदो, गोवा जाना है तो कारपूल करके जाओ, साल भर विदेश घूमने का प्लान तो भूल ही जाओ और हड़तालें कम करो ताकि तांबे की फैक्ट्री चालू हो सके। तो आपको तुरंत समझ जाना चाहिए कि स्थिति वाकई बेहद गंभीर है। इसका सीधा सा मतलब है कि सरकार को किसी ऐसे भयंकर आर्थिक तूफान की आहट सुनाई दे रही है, जो सीधे आपकी जेब, आपकी नौकरी और देश की पूरी अर्थव्यवस्था को हिलाकर रख सकता है। यही वजह है कि प्रधानमंत्री ने यूं ही नहीं, बल्कि किसी खास इशारे के तहत मार्च में संसद में दिए अपने बयान और अब हैदराबाद की रैली में अचानक 'कोविड-19' का ज़िक्र किया है।&nbsp;</span></div><h2>कितना बड़ा है आने वाला संकट?<span style="font-size: 1rem;">&nbsp;</span></h2><div><span style="font-size: 1rem;">ईरान पर ट्रंप और नेतन्याहू की चढ़ाई से पूरी दुनिया परेशान है। भारत जैसे देश जो तमाम दावों के बावजूद आज भी आयात पर निर्भर हैं क्रिटिकल सेक्टर्स में उनके लिए परेशानी बड़ी तो है लेकिन कितनी बड़ी अब मालूम चल रहा है।&nbsp;</span>इस तरह की अपील जैसी प्रधानमंत्री मोदी ने की है इतिहास में और भी मौकों पर की गई। जैसे द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटेन और अमेरिका में लोगों को राशन कार्ड दिए गए थे। पेट्रोल, चीनी, रबर जैसी चीजों पर कंट्रोल था। उन्हें न खरीदने की ताकीद की गई थी। कार फैक्ट्री स्टैंक बनाती थी।&nbsp;&nbsp;1973 में फिर ऑयल क्राइसिस आया। उस समय कई देशों ने कार फ्री डे तक लागू किया क्योंकि तेल बहुत महंगा हो गया था। भारत में भी 1991 के आर्थिक संकट के दौरान सरकार का पूरा फोकस डॉलर बचाने और जरूरी आयात ही करने पर आ गया था। दुनिया के अधिकतर देश ईरान पर हुए हमले के नतीजे भुगत रहे हैं। कई जगह फाइव डे व्हीकल रोटेशन आया है। ऑड इवन लागू हुआ है।&nbsp;10 मई को प्रधानमंत्री ने भाषण दिया है और एक ही दिन में इसका असर दिख गया। 11 मई को स्टॉक मार्केट धड़ाम हो गया क्योंकि आशंका दोहरी है। महंगाई बढ़ने का डर भी है और साथ में मंदी का भी।&nbsp;जिस संकट में हम प्रवेश करने वाले हैं बाकी की दुनिया तो प्रवेश कर चुकी है। हमारा देश जिस संकट में प्रवेश करने वाला है उससे निकलने के दो फार्मूले हैं। एक ऊर्जा को बचाइए यानी आपके सामने जो भी एनर्जी है। ऊर्जा मतलब आपका आपकी बिजली को आपको बचानी है। आपको पेट्रोल बचाना है। डीजल बचाना है। यह ऊर्जा आपको बचानी है। दूसरा अपने देश की विदेशी मुद्रा को आपको बचाना है। विदेशी मुद्रा कम से कम खर्च करनी है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/jewellers-launch-new-scheme-attractive-schemes-for-buying-new-jewellery-in-exchange-of-old-gold" target="_blank">Gold नहीं खरीदने की मोदी की अपील के बाद ज्वैलर्स लाये नई योजना, पुराने सोने के बदले नये गहने खरीदने पर आकर्षक स्कीमें</a></h3><h2>किन-किन चीजों की खरीद पर सबसे ज्यादा पैसा खर्च होता है</h2><div>इसमें सबसे ऊपर नाम है कच्चे तेल का। भारत अपनी जरूरत का लगभग 90% कच्चा तेल दूसरे देशों से खरीदता है। 90% वर्ष 2024 में तेल के इंपोर्ट पर लगभग 12 लाख करोड़ खर्च हुए थे। ईरान युद्ध के बाद जिस तरह से कच्चे तेल के दाम बढ़े हैं, उससे आने वाले दिनों में तेल के इंपोर्ट पर भारत का खर्च और भी ज्यादा बढ़ सकता है। हमारे ऊपर बहुत बड़ा बोझ यह पड़ने वाला है। कच्चे तेल के बाद भारत को विदेशों से सोना खरीदने पर भी ज्यादा पैसा खर्च करना पड़ता है। वर्ष 2024 में हमने विदेशों से 5.5 लाख करोड़ का सोना खरीदा जिसकी पेमेंट डॉलर्स में की थी और जैसे-जैसे डॉलर की कीमत बढ़ रही है सोना खरीदना और महंगा हो रहा है। जबकि पिछले साल यह जो खर्च है जो हमने सोना खरीदने पर किया था यह बढ़कर हो गया था 6.8 लाख करोड़ हमारे देश ने खरीदा।&nbsp;</div><h2>विदेशों से सोना खरीदने के मामले में भारत दुनिया में पांचवें नंबर पर</h2><div>भारत विदेशों से हर रोज यानी एक दिन में सोना खरीदने पर ₹1800 करोड़ खर्च करता है। एक दिन में हर दिन ₹1860 करोड़ का सोना खरीद लेते हैं और हर घंटे ₹78 करोड़ का सोना भारत खरीदता है। विदेशों से सोना खरीदने के मामले में भारत पूरी दुनिया में पांचवें नंबर पर है। इसीलिए प्रधानमंत्री मोदी ने कहा है कि एक साल तक आप बिल्कुल सोना मत खरीदिए। सोना हमें बाहर विदेशों से खरीदना पड़ता है। पेमेंट डॉलर में देनी पड़ती है। और इस समय हम ऐसी स्थिति में नहीं है। हर वर्ष बड़ी संख्या में हमारे देश के लोग छुट्टियों में विदेश घूमने जाते हैं। विदेशी सामान की खरीददारी करते हैं और उस पर बहुत पैसा खर्च करते हैं। लेकिन यह सारा पैसा असल में विदेशी कंपनियों की जेब में जाता है। दूसरे देशों की अर्थव्यवस्था में जाता है। वर्ष 2023 में भारत के लोगों ने ₹7,20,000 करोड़ रुपया विदेशों में जाकर खर्च किया। पिछले साल लगभग 3.5 करोड़ भारत के लोग विदेश यात्रा पर गए। अगर आप मेड इन इंडिया सामान खरीदेंगे वह अपने देश में ही रहेगा। केमिकल फर्टिलाइज़र्स के मामले में भी भारत इंपोर्ट पर निर्भर है। पिछले वर्ष भारत ने ₹1.5 लाख करोड़ के केमिकल फर्टिलाइजर विदेशों से खरीदे।&nbsp;<span style="font-size: 1rem;">&nbsp;</span></div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/sharad-pawar-advice-to-pm-modi-on-west-asia-crisis-call-an-all-party-meeting-immediately" target="_blank">West Asia संकट पर Sharad Pawar की PM Modi को सलाह, तुरंत बुलाएं सर्वदलीय बैठक</a></h3><h2>पीएम मोदी की अपील से कैसे विदशी मुद्रा बचेगी और महंगी घटेगी</h2><div>भारत को तेल और सोना चाहिए और ये दोनों चीजें हमें विदेशों से खरीदना होगा।</div><div>तेल और सोना खरीदने के लिए डॉलर में पेमेंट करना होगा और डॉलर जितना महंगा होगा, उतना ही हमारा नुकसान होगा।</div><div>इससे रुपए में गिरावट आएगी क्योंकि जो भी डॉलर हम खरीदते हैं वो रुपया देकर खरीदते हैं।</div><div>रुपया कमजोर होगा तो तेल और दूसरे सामानों को विदेशों से खरीदना और महंगा होगा।</div><div>महंगाई बढ़ेगी और भारत का व्यापार घाटा बढ़ेगा व हमारी अर्थव्यवस्था पर दबाव आएगा।<span style="font-size: 1rem;">&nbsp;</span></div><h2><span style="font-size: 1rem;"><b>भारत ने कच्चा तेल और सोना खरीदना कम किया तो क्या होगा?</b></span></h2><div>इससे विदेशों को हमें कम पेमेंट करनी पड़ेगी। इससे डॉलर की मांग कम हो जाएगी। यानी डॉलर खरीदने के लिए हमें कम रुपया खर्च करना पड़ेगा। इससे रुपए में मजबूती आएगी। रुपया मजबूत होने के पांच फायदे आपको होंगे। पहला विदेशों से सामान खरीदने का हमारा बिल कम हो जाएगा। तेल खरीदने पर हमारा खर्चा कम हो जाएगा। हमारे अपने देश में महंगाई इसकी वजह से कम होगी।&nbsp; विदेशी मुद्रा की हमारी बचत होगी और हमारे देश का व्यापार घाटा भी कम होगा। ईरान युद्ध के बाद से पूरी दुनिया के बड़े-बड़े विकसित देशों में तेल के दाम बढ़ चुके हैं। बस अभी हमारे देश में ही नहीं बढ़े। भारत अकेला ऐसा देश है जहां तेल संकट के बावजूद अभी तक तेल के दाम नहीं बढ़े।</div><h2>आत्मनिर्भर भारत का मंत्र संकट टलने के बाद भी जारी रहे</h2><div>अगर होर्मुज में रुकावट है तो जापान की अर्थव्यवस्था पर भी सीधा असर है। जापान भी कई महीनों का तेल पहले से जमा रखता है ताकि अचानक आपूर्ति रुकने पर देश ठप ना हो जाए। उसने अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और दूसरे मित्र देशों से अतिरिक्त गैस और ईंधन खरीदने की कोशिश की ताकि पश्चिम एशिया पर निर्भरता थोड़ी कम की जा सके। लेकिन इसमें सबसे गौर करने वाली बात यह थी कि जापान की अर्थव्यवस्था पहले ही ऑयल और गैस की निर्भरता से अपने को आगे ले जा चुकी है। वहां लोग पहले से ही मेट्रो का खूब इस्तेमाल करते हैं। स्पेशली अर्बन एरियाज में बिजली का उपयोग ज्यादा होता है। साउथ कोरिया और जापान दोनों देश बिजली से चलने वाले उपकरण जो इलेक्ट्रॉनिक्स हैं उस गेम में बहुत आगे हैं। दूसरे देशों को सेमीकंडक्टर के उपकरण देते हैं। इलेक्ट्रॉनिक पुर्जे देते हैं। मशीनें देते हैं। चिप बनाने वाली मशीनें देते हैं। सेंसर बैटरीज बेचते हैं। टोयटो जैसी गाड़ियां जापान में बन रही हैं। सैमसंग जैसा फोन साउथ कोरिया में बन रहा है। अरबों डॉलर का यह सालाना एक्सपोर्ट करते हैं। एक्चुअल एक्सपोर्ट इसलिए इनका फॉरेन रिजर्व भी लबा-लब भरा रहता है। इसलिए उनके देश में लोगों को खामियाजा उस तरह से नहीं भुगतना पड़ता। भारत को अगर ऐसी समस्याओं से बचना है। बेहतर तैयार होना है तो सफलता के दावों से पहले सफल होना होगा। संप्रभु होना होगा और ताकत सिर्फ गोली बंदूक वाली नहीं होती है। जब आप खुद आत्मनिर्भर और मजबूत होते हैं तब आपकी इज्जत होती है और तब आपको खुद कुछ नहीं कहना पड़ता। जैसे अमेरिका के राष्ट्रपति अगर आप ट्रंप को छोड़ दें तो कभी वह खुद नहीं कहते कि दुनिया का सबसे ताकतवर मुल्क है अमेरिका। क्योंकि कहने की बात नहीं है। यह वो बात है जो दुनिया जानती है। शी जिनपिंग को एक कहना नहीं पड़ता है कि चीन दुनिया की फैक्ट्री। लोग जानते हैं, मानते हैं, थर-थर कांपते हैं कि कहीं रेयर अर्थ मेटल्स की सप्लाई ना रुक जाए। जरूरी है कि सरकार जिस आग्रह के साथ अभी आत्मनिर्भर भारत की बात कर रही है, यह संकट टलने के बाद भी करती रहे।</div><div><span style="font-size: 1rem;">&nbsp;</span></div><div>&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 12 May 2026 14:38:45 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/an-unspoken-lockdown-how-big-is-the-impending-crisis-geopolitical-economy-through-data</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
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      <title><![CDATA[नॉर्थ ईस्ट का चाणक्य या सियासत का शाहरुख खान...नरसिम्हा राव की वो सलाह और कैसे  इस शख्स ने असम को BJP के लिए गुजरात बना दिया]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/chanakya-of-the-northeast-or-the-shah-rukh-khan-of-politics]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>90 के दशक का दौरा और गुवाहाटी का कॉटन कॉलेज। वकालत पढ़ रहे 22 साल के लड़के से उसकी दोस्त ने पूछा कि मैं अपनी मां से तुम्हारे बारे में क्या बताऊं? उस छात्र नेता ने जवाब दिया, अपनी मां से कहना, मैं एक दिन असम का मुख्यमंत्री बनूंगा। मुख्यमंत्री बनना उस लड़के की महत्वाकांक्षा थी और इसे खुलकर जाहिर करने की उसे भारी कीमत भी चुकानी पड़ी। इसी लड़के की जो छात्र राजनीति के दौर से ही चुनाव मैनेज करने का एक्सपर्ट था। जिसे तीन-तीन मुख्यंत्रियों का सीधा संरक्षण प्राप्त था और हर कोई उसके रणनीतिक कौशल का मुरीद था जो 15 साल तक राज्य की सत्ता में नंबर दो रहा और जब नंबर एक बनने की बारी आई तो मुख्यमंत्री ने अपना बेटा आगे कर दिया। जब उस नेता ने गुवाहाटी से लेकर दिल्ली तक विधायकों की परेड करा दी और बताया कि यह सरकार उसने बनाई है तो पार्टी में शीश पर बैठे नंबर दो की हैसियत रखने वाले नेता ने वीटो लगा दिया और कहा तो क्या इंतजार पार्टी बदलने पर भी खत्म नहीं हुआ। अगले 5 साल फिर से नंबर दो की ही कुर्सी रही। लेकिन जब वो आया तो अपनी ही नहीं अगल-बगल की छह सात राज्यों की राजनीति बदल कर रख दी। उस पर सांप्रदायिक राजनीति के आरोप हैं। भ्रष्टाचार के भी आरोप हैं। आरोप एक नेता की हत्या और प्रतिबंधित संगठन उल्फा के लिए वसूली के भी लगे लेकिन कभी साबित नहीं हो पाए। पश्चिम बंगाल में पहली बार शुभेंदु अधिकारी के रूप में बीजेपी को अपना डेब्यू मुख्यमंत्री मिल गया। ममता बनर्जी को पिछले चुनाव में नंदीग्राम से शिकस्त देने वाले अधिकारी ने इस बार टीएमसी सुप्रीमो के गढ़ भबानीपुर में जाकर उन्हें हराया और जायंट किलर का तमगा पाया। लेकिन इसके साथ ही एक और राज्य में बीजेपी ने वो करिश्मा कर दिखाया जिसे पूरा करना सालों पहले तक बहुत मुश्किल लगता था।&nbsp; जिस नॉर्थ ईस्ट में कभी बीजेपी का झंडा ढूंढना मुश्किल था, आज वहां भगवा लहर दिख रही है। ये मोदी लहर नहीं क्योंकि यह कहना इस कहानी को फिर छोटा करना होगा। यह कहानी है हेमंता विश्व शर्मा की जिन्हें आप नॉर्थ ईस्ट का चाणक्य भी कह सकते हैं।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/himanta-biswa-sarma-to-rule-assam-again-will-take-oath-as-cm-on-may-12-pm-modi-will-attend" target="_blank">Assam में फिर Himanta Biswa Sarma का राज, 12 मई को लेंगे CM पद की शपथ, PM Modi होंगे शामिल</a></h3><h2>नॉर्थ ईस्ट के चाणक्य</h2><div>वो चाणक्य जिसे कभी कांग्रेस नजरअंदाज किया। उनके शब्दों में कहें तो अपमानित किया और जिसके बदले में हेमंता ने नॉर्थ ईस्ट में कांग्रेस का नामोनिशान मिटा दिया। यह कहानी सिर्फ एक नेता की सफलता की नहीं बल्कि आधुनिक राजनीति के सबसे बड़े बदले की कहानी है। यहीं से सवाल है कि क्या एक कद्दावर नेता का मान किसी एक राजनीतिक पार्टी किस्मत चमका और किसी की खत्म कर सकता है। 2026 के नतीजे तो यही कहते हैं। 2026 में असम में एनडीए ने 100 प्लस सीटें जीती। अगर सबसे कम सीटों के हारने का मार्जिन निकाला जाए तो जो जीत बंगाल में बीजेपी को मिली, केरल में कांग्रेस को मिली, तमिलनाडु में विजय को मिली उन सब में सबसे बड़ी जीत असम की है। 100 प्लस सीटें बीजेपी गठबंधन जीतता है। अकेले 82 बीजेपी जीतती है। असम में बीजेपी की यह प्रचंड हैट्रिक केवल एक चुनावी जीत नहीं है बल्कि उस तिरस्कार का भी अंतिम न्याय है जिसने कांग्रेस के अभेद किले को खंडाहर में तब्दील कर दिया। क्योंकि हेमंता कभी कांग्रेस के सच्चे सिपाही थे। लेकिन आज वो बता रहे हैं कि वह दिल्ली के आदेश पर चलने वाले मोहरे नहीं है बल्कि गुवाहाटी की गलियों से दिल्ली का सफर तय करने वाले हैं। आज नॉर्थ ईस्ट के इस चाणक्य की कहानी जब हम आपको सुनाएंगे तो यह कहानी उस साम्राज्य के पतन की दास्तान होगी जिसने अपने ही सबसे घातक सिपाही को कम आकने की ऐतिहासिक भूल की। शतरंज के बसद भी खुद बिछाई और साबित किया कि सियासत में जब स्वाभिमान को चोट लगती है तो सीधे सत्ता नहीं इतिहास बदलता है।</div><h2>आजादी के बाद से ही घुसपैठ और अवैध प्रवास से जूझता असम</h2><div>असम पूर्वोत्तर में भारत का सबसे बड़ा राज्य आजादी के बाद से ही घुसपैठ और अवैध प्रवास से जूझ रहा है। बंटवारे के वक्त पूर्वी पाकिस्तान से लाखों बंगाली शरणार्थी असम में घुसे। यह शरणार्थी चाय बागान, जंगल, बंजर जमीन पर बसते गए और स्थाई होते गए और इससे स्थानीय असमिया लोगों को अपनी भाषा, रोजगार, जमीन पर कब्जे का खतरा महसूस हुआ। 1960 में एसएमीस को राजकीय भाषा बनाने का कानून बना तो बंगाली इलाकों में बवाल शुरू हो गया। दंगे हुए। यहीं से असम के नौजवानों के मन में एक सवाल उठा। क्या असम के लोग अपने ही राज्य में अल्पसंख्यक हो जाएंगे? फिर आया 1971 बांग्लादेश बना। फिर से लाखों की संख्या में शरणार्थी असम आ गए। युद्ध खत्म हुआ पर ज्यादातर लोग वापस नहीं गए। अचानक से कई जिलों में बांग्ला भाषियों की संख्या बढ़ गई। 1979 में मंगलदोई लोकसभा सीट पर उपचुनाव हुए। वोटर लिस्ट आई तो बवाल शुरू हो गया। करीब 45,000 से ज्यादा अवैध प्रवासियों के नाम वोटर लिस्ट में दर्ज थे। यहीं से बाियों को असम से निकालने के लिए आंदोलन की शुरुआत हुई। नारा था जोकर जति तेकर मत जिसकी जमीन उसी का वोट और दूसरा नारा लगा विदेशी खेदा यानी विदेशियों को भगाओ। ऑल असम स्टूडेंट यूनियन यानी आसू और अखिल असमगढ़ संग्राम परिषद यानी एएजीएसपी के नेतृत्व में शुरू हुआ यह आंदोलन शुरुआत में अहिंसक था। बाद में यह हिंसक हो गया। आंदोलन का नेतृत्व प्रफुल कुमार महंत और भृगु फुकन जैसे छात्र नेता कर रहे थे। इन्हें पूरे असम के अलग-अलग कॉलेजों के छात्र संघों का समर्थन था। यह वो लड़के थे जो अभी कॉलेज में पढ़ रहे थे। लेकिन रातोंरात पूरे असम के हीरो बन गए। 1979 से 1985 छ साल तक असम में अस्थिरता रही। बंद धरना प्रदर्शन से लेकर रेल रोको आंदोलन और तेल कुओं पर हमले तक हुए। पुलिस की गोलियों से लगभग 850 से ज्यादा छात्र नेताओं की जान गई। फरवरी 1983 में हुए नीली और खराबारी नरसंहारों में 2000 से ज्यादा लोग मारे गए। जिसके बाद 1985 में असम अकॉर्ड हुआ। 15 अगस्त 1985 को राजीव गांधी ने भृगुफन और प्रफुल महंत और विराज शर्मा जैसे छात्र नेताओं के साथ समझौते पर हस्ताक्षर किए। आंदोलन रुका। आसू के नेताओं ने असम गण परिषद नाम से पार्टी बनाई और चुनावी राजनीति में उतर गए। 1985 में हुए चुनावों में एजीपी ने 67 सीटें जीतकर कमाल कर दिया। छात्रों ने सत्ता पर कब्जा कर लिया। कॉटन कॉलेज के छात्र नेता रहे प्रफुल महंत असम के सबसे युवा मुख्यमंत्री बने और भृगुफन गृह मंत्री। यह वो दौर था जब असम की राजनीति पूरी तरह से छात्र नेताओं के हाथ में थी। और 70 के दशक से ही कॉटन कॉलेज स्टूडेंट यूनियन की आंसू यूनिट को सबसे ताकतवर और प्रतिष्ठित यूनिट माना जाता था। कॉटन कॉलेज पूर्वोत्तर का सबसे पुराना हायर एजुकेशन इंस्टट्यूट। गुवाहाटी शहर के बीचों-बीच बसे इस पुराने से कैंपस को बाहर से देखो तो लगता है जैसे ब्रिटिश काल में बने किसी किले का अवशेष हो। लेकिन अंदर घुसो तो पेड़ों की छांव, लाल ईंटों की इमारतें और एक हवा है जो किताबों और राजनीति की खुशबू से भरी है। कॉटन कॉलेज का असम की राजनीति में कितना दखल है? इस बात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अब तक असम के जो 15 मुख्यमंत्री हुए हैं उनमें से सात इसी कॉलेज के छात्र रहे हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/congress-brainstorms-after-assam-election-defeat-gaurav-gogoi-says-high-command-take-a-decision" target="_blank">Assam Election में हार के बाद Congress में मंथन, Gaurav Gogoi ने कहा- अब High Command लेगा फैसला</a></h3><h2>नरसिम्हा राव की सलाह मान हेमंता ने पलट दी बाजी</h2><div>19 साल का यह खास मेहमान चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहा था। हॉस्टल के गलियारों से लेकर चाय की दुकानों तक की चर्चाओं का हिस्सा हुआ करता था। एक तेजतर्रार लड़का जो दबंग था और भाषण देने में फायर ब्रांड था। चुनाव से पहले अक्सर डीएस कॉलेज के रूम नंबर 20 में वह रुकता था ताकि हॉस्टल के इन मेट्स को अपने साथ जोड़कर रख सके। यह लड़का क्लास खत्म होने के बाद घर लौटने की बजाय हॉस्टल में रहने वाले छात्रों के साथ घूमना शुरू कर देता था क्योंकि उसे पता था कि अगर कॉलेज की राजनीति में अपना बेस मजबूत करना है तो सबसे पहले हॉस्टल में रहने वाले स्टूडेंट्स के बीच अपनी पैठ मजबूत करनी होगी। जल्द ही डीएस हॉस्टल का कमरा नंबर 20 छात्र संघ चुनाव के हाई वोल्टेज वॉर रूम में तब्दील हो गया क्योंकि खास मेहमान छात्र संघ के सबसे प्रभावशाली पद महासचिव के लिए अपनी दावेदारी पेश कर रहा था। यह दावेदारी राज्य में सबसे ताकतवर संगठन माने जाने वाले आंसू से थी। कॉटन कॉलेज का महासचिव बनना पूरे राज्य में छात्र नेतृत्व और बाद में मुख्यधारा की राजनीति के लिए सबसे बड़ा लॉन्चपैड माना जाता था और इस चुनाव को जीतने के लिए यह महत्वाकांक्षी खास मेहमान कोई कसर नहीं छोड़ना चाहता था। वह जब भी भाषण देता तो हॉल के हर कोने में अपने लोगों को बिठाता ताकि तालियों और नारों की गूंज हर कोने से आए। हॉस्टल में हेमंता दा के नाम से लोकप्रिय यह युवा अब कॉटन कॉलेज छात्र संघ का महासचिव था। पूरा नाम हेमंता विश्व शर्मा। 1994 में हेमंता को छात्र और युवा कल्याण सलाहकार समिति का सदस्य बनाया गया। 1996 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने उन्हें भृगुफ फूंकन के मुकाबले जालक कुबारी सीट से उतार दिया। हेमंता पहला चुनाव हार गए, लेकिन यह पहली और आखिरी हार थी। चुनाव में हार के बाद हेमंता प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव से मिलने गए। नरसिम्हा राव ने उन्हें एक सलाह दी। हारे हुए उम्मीदवार को अपना क्षेत्र कभी नहीं छोड़ना चाहिए। हेमंता ने इसे पूरी गंभीरता से लिया। हारने के बावजूद जालकुबारी विधानसभा में सक्रिय रहे। 2001 में कांग्रेस ने उन्हें फिर से गुवाहाटी की जालकुबारी सीट से टिकट दिया। इस बार हेमंता ने अपने गुरु और दिग्गज नेता भृगुफ फुकन को हराकर उलटफेर कर दिया। इस तरह वो पहली बार विधानसभा पहुंचे और जालकुबारी सीट उनका स्थाई ठिकाना बन गई। 2001 से 2021 तक वह लगातार पांच बार जालक कुबारी सीट से विधायक चुने जा चुके हैं और मार्जिन लगातार बढ़ता ही जा रहा है। पहला चुनाव 10,000 वोटों से जीतने वाले हेमंता 2021 में 1,000 वोटों से जीते।</div><h2>2026 के नतीजे क्या कहानी कहते हैं</h2><div>दरअसल, 2026 के नतीजों से क्योंकि असम विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजे केवल आंकड़ों के खेल नहीं है। यह हेमंता की उस कार्यशैली की जीत है जिसने विपक्ष को पूरी तरह अप्रसंगिक बना दिया। बीजेपी और उनके सहयोगी ने असम की 126 में से 101 सीटें जीती। लगातार तीसरी बार सत्ता। अपने दम पर बीजेपी 82 सीटें हासिल कर रही। डाटा कहता है कि कांग्रेस का वोट शेयर उन इलाकों में भी गिरा जहां पर उनके मजबूत गढ़ थे। हेमंता की जीत का सबसे बड़ा आधार अपर असम और लोअर असम के वो इलाके जहां डेमोग्राफिक बदलाव की वजह से स्थानीय लोगों में डर था। उन्होंने खुद को उस डर का एकमात्र ठोस समाधान बनाकर पेश किया। यह जीत इसलिए बड़ी है क्योंकि हेमंता ने इसे केवल हिंदुत्व के मुद्दे पर नहीं बल्कि काम की राजनीति पर लड़ा और खुलकर कहा कि मुझे मुसलमानों का वोट नहीं चाहिए। उनके कई इंटरव्यूज वायरल हुए जहां पूछा गया कि मोदी जी हिंदू मुसलमान नहीं करते तो वो कहते हैं हम तो करते हैं। 2026 के नतीजों ने साबित किया कि असम की जनता पुराने सुस्त शासन की जगह एक ऐसी सरकार चाहती है जो बेबाक है, बिंदास है। स्पष्ट है। जैसा भी है। रिकॉर्ड कहते हैं कि असम के ग्रामीण इलाकों में बीजेपी की पैठ पहले से मजबूत हुई। महिलाओं ने बढ़-चढ़कर हेमंता के पक्ष में वोट दिया और इसी वजह से बीजेपी की हैट्रिक हुई। अब असम की राजनीति में कांग्रेस के लिए वापसी का रास्ता लगभग बंद है क्योंकि हेमंता ने उनके पूरे स्ट्रक्चर को ही ध्वस्त कर दिया और एक ऐसा किला तैयार किया है जिसे अगले कुछ सालों में तो भेजना बड़ा मुश्किल है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/conspiracy-to-terrorize-and-create-widows-hundreds-of-white-sarees-in-tmc-office" target="_blank">आतंक और ‘विधवा’ बनाने की साजिश, TMC दफ्तर में सैंकड़ो सफेद साड़ी, सच्चाई जान हिल जाएगा पूरा देश!</a></h3><h2>पिद्दी कुत्ता और हेमंता के स्वाभिमान की कहानी</h2><div>राहुल गांधी और उनके कुत्ते पिद्दी से जुड़ा वो चर्चित किस्सा जो अक्सर सुर्खियों में रहा। वो एक किस्सा था लेकिन असली कहानी उस जिद्दी सोच की है जिसने हेमंता को फॉलोअर्स से हटाकर किंग मेकर बना दिया।&nbsp; नॉर्थ ईस्ट में आज चारों तरफ भगवा ही भगवा फैला दिया। दुनिया अक्सर यह मानती है कि हेमंता ने केवल सत्ता की चाहत में पाला बदला। उन पर कुछ मुकदमे चल रहे थे। सारी बातें लेकिन एक बड़ी हकीकत उस मुलाकात में छिपी है जिसने भारतीय राजनीति का रुख बदला। यह मुलाकात जिसके बारे में हेमंता ने खुद बताया। 2015 की मुलाकात जो दिल्ली में राहुल गांधी के साथ हुई जो स्वाभिमान की चोट का बड़ा कारण बनी। हेमंता ने कई बार साझिक तौर पर बताया कि जब वह असम की समस्याओं को लेकर पार्टी की गिरती साख को लेकर चर्चा करने दिल्ली पहुंचे तब राहुल गांधी अपने पालतू कुत्ते पिद्दी को बिस्किट खिलाने में व्यस्त थे। अब आलोचक इसे व्यक्तिगत नाराजगी या एक छोटी सी घटना बताते हैं। लेकिन गहराई से देखें तो यह कांग्रेस की उस हाई कमांड संस्कृति का प्रतीक है। जहां जमीन के बड़े नेताओं की तुलना में दरबारी वफादारी को ज्यादा अहमियत दी जाती है। हेमंता ने शायद समझा कि जिस पार्टी में राज्य के मुद्दों से ज्यादा प्राथमिकता एक पालतू जानवर को दी जाए वहां रुकना उनके वजूद के खिलाफ होगा और यह घटना कांग्रेस के लिए घातक साबित हुई क्योंकि हेमंता ने सिर्फ पार्टी नहीं छोड़ी बल्कि उत्तर पूर्व से कांग्रेस का नामोनिशान मिटा दिया। यह उस पिद्दी के बदले जिद्दी सोच की शुरुआत थी जिसने फॉलोअ को पूरे पूर्वोत्तर किंग मेकर बनाया और आज 2026 के नतीजे उस तिरस्कार का अंतिम न्याय बनकर सामने खड़े हैं।&nbsp;</div><h2>कैसे लाचित बोरफुकन की विरासत को 21वीं सदी का हथियार बनाया गया</h2><div>बता दें कि लाचित वही महानायक थे जिन्होंने मुगलों को सराय घाट की लड़ाई में शिकस्त दी थी। असम की रक्षा की थी। हेमंता ने खुद को इसी सांस्कृतिक रक्षक की भूमिका में बड़ी सफाई से ढाला। लाचित की विरासत को राजनीतिक हथियार बनाने में हेमंता ऐसे सफल रहे क्योंकि सांस्कृतिक गौरव को विकास के एजेंडे के साथ बड़ी कुशलता से जोड़ा। अनधिकृत घुसपैठ और तेजी से बदलते डेमोग्राफिक बदलावों को रोकने के लिए जो कड़े फैसले लिए उसने लाचित की रक्षात्मक विरासत के साथ जोड़ दिया। विपक्ष ने जब बार-बार हेमंता पर सांप्रदायिक होने का आरोप लगाया तो हेमंता ने उसे बहुत ही चतुराई से असमिया अस्मिता की रक्षा बताकर पलट दिया। उनका साफ कहना रहा कि असम की डेमोग्राफी को बदलने के लिए किसी भी कोशिश को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा क्योंकि यह केवल जमीन का मुद्दा नहीं बल्कि जड़ों और पहचान की सुरक्षा का सवाल है।</div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 11 May 2026 14:36:35 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/chanakya-of-the-northeast-or-the-shah-rukh-khan-of-politics</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[RSS के सबसे बड़े दुश्मन का कैसे हुआ End? आजाद भारत के इतिहास से एक रंग के मिटने की कहानी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/story-of-the-disappearance-of-a-single-color-from-independent-indias-history]]></guid>
      <description><![CDATA[<div><span style="font-size: 1rem;">5 अप्रैल 1957 की वह सुबह भारतीय राजनीति के लिए एक ऐसा मोड़ थी, जिसने दुनिया के दो सबसे शक्तिशाली देशों अमेरिका और सोवियत संघ को एक साथ चौंका दिया था। एक ब्राह्मण जमींदार परिवार का दुबला-पतला शख्स, इलम कुलम मनक्कलम शंकरन नंबूदरीपाद केरल के मुख्यमंत्री पद की शपथ ले रहा था। यह कोई साधारण शपथ नहीं थी। यह दुनिया की पहली ऐसी चुनी हुई कम्युनिस्ट सरकार थी जिसने बंदूक के दम पर नहीं, बल्कि लोकतंत्र के रास्ते सत्ता हासिल की थी। ईएमएस सरकार ने गद्दी संभालते ही जमींदारी प्रथा की जड़ों पर प्रहार किया और शिक्षा व्यवस्था को निजी चंगुल से छुड़ाने की कोशिश की। लेकिन क्रांति का यह रास्ता इतना आसान भी कहा रहने वाला था। जमीन सुधार और एजुकेशन बिल ने चर्च से लेकर नायर सर्विस सोसाइटी और कांग्रेस तक, सभी को एक पिच पर लाकर खड़ा कर दिया। सड़कों पर खून बहा, पुलिस की गोलियां चलीं और देखते ही देखते शांत केरल 'विमुक्ति समरम' (मुक्ति संघर्ष) की आग में जल उठा। जब हालात का जायजा लेने खुद प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू त्रिवेंद्रम पहुंचे, तो उन्होंने ईएमएस से एक तीखा सवाल पूछ डाला। पंडित नेहरू ने पूछा कि इतने कम वक्त में आपने इतने दुश्मन कैसे बना लिए? नेहरू हिचकिचा रहे थे, लेकिन तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष इंदिरा गांधी का इरादा साफ था। नतीजा यह हुआ कि 31 जुलाई 1959 को आर्टिकल 356 का वह पहला बड़ा प्रहार हुआ, जिसने महज 28 महीने पुरानी एक चुनी हुई सरकार का गला घोंट दिया। यह कहानी सिर्फ एक सरकार के गिरने की नहीं, बल्कि भारतीय संविधान के पहले बड़े दुरुपयोग और वैचारिक युद्ध की भी है। लेकिन केरल से सरकार की बर्खास्तगी के बाद कम्युनिस्ट मूवमेंट की कहानी खत्म नहीं हुई। लेकिन इस घटना के 69 साल बाद अब ये सवाल पूछा जाने लगा है कि क्या लाल झंडा अब केवल हमारे देश के इतिहास से किताबों और पुरानी तस्वीरों में सिमट कर रह जाएगा? दरअसल, केरल के 2026 के चुनावी नतीजों ने पूरे देश को चौंका दिया है और इस सवाल को पहले से कहीं ज्यादा धार देती है कि क्या लाल सलाम का पैकअप हो चुका है?&nbsp; यह गिरावट उनके पतन की तरफ एक बड़ी कड़ी है क्योंकि कहानी अब सिर्फ केरल की नहीं है। इसके धागे बंगाल और त्रिपुरा तक जाते हैं। जहां पर कभी इनका राज अटूट माना जा रहा था। 34 सालों तक यह बंगाल में रहे। लेकिन आज वहां नेस्तोनाबूद हो चुके हैं। एक आखिरी लड़ाई केरल की बची थी। वहां भी कहानी खत्म हो गई है। सोशल मीडिया पर लाल सलाम केवल एक हैशटग बनकर रह गया है। जबकि कभी यह इंकलाब की आवाज हुआ करता था। </span></div><div><span style="font-size: 1rem;">1967 के बाद पहली बार&nbsp;</span><span style="font-size: 1rem;">कोई भी राज्य कम्युनिस्ट शासन नहीं</span></div><div><span style="font-size: 1rem;">2026 के नतीजों के साथ भारत में पहली बार 1967 के बाद कोई भी राज्य कम्युनिस्ट शासन से पूरी तरह मुक्त हो गया। एक भी राज्य में देश में अब लाल सलाम नहीं है। तीन राज्य जहां यह मजबूत थे, बंगाल, त्रिपुरा, केरल वहां भी शून्य पर पहुंच गए।&nbsp; इसीलिए यह सिर्फ हार नहीं बल्कि आज पूरी विचारधारा के अस्तित्व की लड़ाई है। यह सवाल है कि क्या भारत में लाल सलाम की विचारधारा को देश ने खारिज कर दिया? क्योंकि फर्क अब सिर्फ सीटों का नहीं है। फर्क पकड़ का है। वही पकड़ जो कभी इनकी सबसे बड़ी ताकत थी। एक दौर था जब मजदूर से लेकर किसान और आम आदमी की आवाज बनने का दावा इनकी पहचान हुआ करता था। लेकिन आज इनकी जमीन खिसक गई है। सवाल कि क्या वक्त के साथ ये अपने आप को बदल नहीं पाए या फिर जमीन से जुड़ी राजनीति अब जमीन में ही खो चुकी है। बंगाल में गिरावट है। त्रिपुरा में सफाया है। केरल में झटका लगा है। इसीलिए सवाल है कि यह संयोग है या संकेत? क्या यह अंत की शुरुआत है या कोई वापसी की गुंजाइश बाकी है? आज का एमआरआई इसी पर करेंगे कि कैसे एक समय की सबसे बड़ी ताकत आज इस मोड़ पर आकर खड़ी हो गई है। केरल के पतन बंगाल के सबक, भ्रष्टाचार के दाग, आर्थिक नाकामी और कैडर के गहरे संकट की बात करेंगे जिसने लाल झंडे को आज इतिहास के चौराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है।&nbsp; यह कहानी सिर्फ केरल की नहीं है। यह भारत में सत्ता के नक्शे से एक रंग के मिटने की कहानी है। लाल रंग उस रंग की जो आजाद भारत में हुए पहले आम चुनाव में मुख्य विपक्षी पार्टी का रंग था।</span></div><h2>बंगाल में वाम का उदय</h2><div>आज से करीब 100 साल पहले 1925 में देश में दो वैचारिक संगठन बने। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी आरएसएस और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया यानी कि सीपीआई। यह तथ्य भी हमें ताज्जुब से भर देता है कि आरएसएस की विचारधारा पर चलने वाली पार्टी बीजेपी आज देश के 17 राज्यों में सरकार में है। साथ ही लगातार तीन लोकसभा चुनाव जीतकर केंद्र में भी सरकार में है। वहीं कम्युनिस्ट दलों की केवल एक राज्य केरल में सरकार बची है। आखिर ऐसा क्यों हुआ? यह जानने के लिए हमें इतिहास के कुछ पुराने पन्ने पलटने होंगे। प्रदेश में कभी 34 सालों तक इनका राज था।&nbsp; यहीं से इसकी शुरुआत करेंगे क्योंकि एक वक्त था जब बंगाल में ज्योति बसु का राज पत्थर की लकीर बनाता था। 34 साल का वह शासन था। सरकार की चाबी हमेशा इनके पास थी। कैडर का अनुशासन ऐसा था कि विपक्ष के लिए वहां पैर रखना मुश्किल था। 1964 में सीपीआई दो हिस्सों में टूट गई। बंगाल साल 1977 इमरजेंसी हट चुकी थी। केंद्र में जनता पार्टी की मोरारजी देसाई सरकार बनी। बंगाल में भी असेंबली चुनाव हुए। सीपीआईएम की अगुवाई में लेफ्ट फ्रंट बना। 14 जून 1977 के चुनाव में 294 में से 200 सीट से ज्यादा सीटें लेफ्ट फ्रंट को मिली। कांग्रेस को सिर्फ 20। 21 जून 1977 को 63 साल के एक कम्युनिस्ट नेता ने मुख्यमंत्री की शपथ ली। नाम ज्योति बसु। बसु एक रईस घराने से आते थे। खुद बसु ने लंदन में बैरिस्ट्री पढ़ी थी। लेकिन इंडिया लौटकर रेल मजदूरों के बीच काम करने लगे। 23 साल 1977 से 2000 तक अकेले बसु ने पांच विधानसभा चुनाव जीते। उनके बाद बुद्धदेव भट्टाचार्य ने दो जीते। कुल मिलाकर लेफ्ट फ्रंट ने बंगाल में सात लगातार चुनाव जीते। 34 साल लगातार सत्ता। यह दुनिया की सबसे लंबे वक्त तक चलने वाली चुनाव से बनी कम्युनिस्ट सरकार थी। बसु की सरकार ने ऑपरेशन बर्गा चलाया। बटाईदार किसानों के नाम सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज किए गए ताकि जमींदार उन्हें मनमानी से ना निकाल सकें। बंगाल पहला राज्य था जहां पंचायतों के सीधे चुनाव हुए जून 1978 में। इस मॉडल ने गरीब किसानों, दलितों, खेत मजदूरों के बीच कांग्रेस का जो वोट था वो लेफ्ट फ्रंट की तरफ मोड़ दिया। लेकिन सीपीआईएम कैडर इतना ताकतवर हो गया कि जिले में कोई भी काम बिना पार्टी की मंजूरी के नहीं होता था। नौकरी, ट्रांसफर, राशन सब कुछ। लोग तंग आ गए और फिर आया सिंघूर और नंदीग्राम। 2006 में बुद्धदेव भट्टाचार्य की सरकार ने टाटा मोटर्स के लिए सिंघूर में और एक केमिकल हब के लिए नंदीग्राम में किसानों की जमीन लेने की कोशिश की। नंदीग्राम में मार्च 2007 में पुलिस फायरिंग में 14 लोग मारे गए। इसी आंदोलन से एक नेता राष्ट्रीय स्तर पर उभरी ममता बनर्जी। 2011 के विधानसभा चुनाव में ममता की तृणमूल कांग्रेस ने 184 सीटें जीती। लेफ्ट फ्रंट 62 पर सिमट गया। 34 साल पुराना लाल किला ढह गया।&nbsp;</div><h2>25 साल तक त्रिपुरा पर किया राज</h2><div>बंगाल से वाम की विदाई के बाद भी एक राज्य अब भी बचा था त्रिपुरा। त्रिपुरा में सीपीआईएम ने पहली बार 1978 में सरकार बनाई थी। फिर 1993 से 2018 तक लगातार 25 साल। सीपीआईएम के नेतृत्व वाले लेफ्ट फ्रंट का राज रहा। मानिक सरकार 1998 से 2018 तक मुख्यमंत्री रहे। 20 साल मुख्यमंत्री रहने के बावजूद उनके नाम पर अपना घर नहीं था। 3 मार्च 2018 नतीजे आए। बीजेपी को 36 सीटें, सीपीआईएम को 16, विप्ल कुमार देव मुख्यमंत्री बने। इसके दो दिन बाद 5 मार्च को त्रिपुरा के बेलोनिया में लेनिन की एक बड़ी मूर्ति बुलडोजर से गिरा दी गई। यह एक प्रतीक था एक युग के अंत का। 2018 के बाद सीपीआईएम के पास सिर्फ केरल बचा था।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/we-have-not-lost-we-have-been-defeated-mamata-banerjee-called-the-ec" target="_blank">हम हारे नहीं, जबरदस्ती हराया गया, ममता ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में EC को बताया मुख्य विलेन, कहा- INDIA गठबंधन के सदस्य एक साथ</a></h3><div>केरल में भी सत्ता हर 5 साल में बदलती रही है। 1980 के बाद से लगभग हर बार एक बार एलडीएफ, एक बार यूडीएफ। 2016 में पिनरई विजयन ने इस पैटर्न को तोड़ा। 2021 में दोबारा जीते। ये पहली बार था कि केरल में किसी मुख्यमंत्री ने लगातार दो बार वापसी की हो। लेकिन तीसरी बार वापसी मुश्किल थी। 2026 के चुनाव के पहले से ही एलडीएफ पर कई आरोप थे। गोल्ड स्मगलिंग केस, एसएफआई से जुड़े विवाद, बेरोजगारी और कांग्रेस नीत यूडीएफ अब बेहतर तरीके से एकजुट है। राहुल गांधी खुद वायनाड से सांसद थे और शायद इसलिए जो नतीजे आए वह कह रहे हैं कि केरल भी फिसल गया। इसी के साथ पूरे देश में लेफ्ट की एक सरकार भी नहीं बची है। लेफ्ट का पतन सिर्फ चुनावी हार नहीं है। यह एक विचारधारा का पीछे हटना है। एक जमाना था जब बंगाल का हर बच्चा होते ही जानता था कि लाल झंडा क्या है। जेएनयू से लेकर जाधवपुर तक कैंपस लाल थे। 2026 आते-आते बंगाल त्रिपुरा में इनकी स्थिति और कमजोर हो गई। हालांकि जमीन सुधार जैसे कामों में इनका ऐतिहासिक योगदान रहा है और इसने लाखों गरीबों को छत पहचान दी है। लेकिन सिंघूर और नंदीग्राम जैसे मामलों के बाद सब बदल गया। वहां विकास और किसान हितों के बीच संतुलन बिठाने में ये पार्टी असफल रही और फिर जनता ने महसूस किया कि जो पार्टी उनकी लड़ रही थी उनके खिलाफ खड़ी हो गई। आज इन राज्यों में इनका पक्का वोटर दूसरी पार्टियों की तरफ चला गया क्योंकि इन्हें वहां सुरक्षा और विकास की नई उम्मीदें नजर आ रही।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/suvendu-adhikari-reaches-bjp-office-in-kolkata" target="_blank">शुभेंदु अधिकारी कोलकाता में भाजपा कार्यालय पहुंचे, भाबानीपुर और नंदीग्राम दोनों सीटों से दर्ज की है जीत</a></h3><h2>भ्रष्टाचार के आरोपों ने केरल सरकार की जड़े हिला दी</h2><div>त्रिपुरा में भी भाजपा की जीत ने साबित किया कि केवल पुराने कार्यकर्ताओं के दम पर आप सालों तक राज नहीं कर सकते। अगर आपके पास युवा कार्यकर्ता नहीं है, नया विज़न नहीं है तो फिर धीरे-धीरे आपसे लोग मुंह मोड़ लेंगे और यही इनके साथ हुआ। लेकिन अब केरल में जो हार हुई वह सिर्फ चुनाव की हार नहीं है। यह उस भरोसे की हार है जो दशकों से बना हुआ था और वही भरोसा आज इनके अस्तित्व पर सवाल खड़ा कर रहा है। केरल के 2026 के चुनाव के नतीजों ने सभी को हिला दिया। पिनराई विजयन की छवि पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों ने सरकार की जड़े हिला दी। केरल की सबसे बड़ी समस्या आज उसकी आर्थिक हालत में छिपी है क्योंकि राज्य का कर्ज जो है वह 4 लाख करोड़ के पार जा चुका है। सरकार अपनी कमाई का करीब 20% हिस्सा केवल पुराने कर्ज का ब्याज चुकाने में खर्च कर रही है। केरल में पढ़ाई और सेहत की सुविधाएं तो अच्छी रही लेकिन वहां नौजवानों के लिए नई नौकरियां पैदा नहीं हो पाई और युवा आज भी खाड़ी देशों में नौकरी करने को मजबूर है क्योंकि उसके अपने राज्य में नए काम और नए निवेश के मौके नहीं। केरल मुफ्त सुविधाएं देने और कल्याणकारी योजनाओं का मॉडल अब वहां की अर्थव्यवस्था पर भारी पड़ने लगा और इसी के चलते घाटा काबू से बाहर। महिलाओं और युवाओं में जो नाराजगी दिखी उसकी बड़ी वजह सबरीमाला का विवाद और वहां की उच्च शिक्षा में प्राइवेट सेक्टरी कमी दिखाई पड़ी। रही सही कसर भ्रष्टाचार ने पूरी कर दी।&nbsp;</div><h2>पिनरई विजयन पर आरएसएस कार्यकर्ता की हत्या का आरोप क्यों लगा था?&nbsp;</h2><div>साल 1970 का था। केरल में विधानसभा चुनाव हुए। पिनरई विजयन को भी कन्नूर की कुतुपरम सीट से सीपीएम ने टिकट दिया। विजयन पहली बार महज 26 साल की उम्र में विधायक बने। इन्हीं दिनों विजयन का नाम पहली बार एक पॉलिटिकल मर्डर से जुड़ा। इसी समय आरएसएस के एक कार्यकर्ता की हत्या में विजयन का नाम आया। साल 1967 में कम्युनिस्ट पार्टियों के दोबारा सत्ता में आने के बाद केरल की राजनीति बदलने लगी। आए दिन वहां सीपीएम और आरएसएस के कार्यकर्ताओं के बीच हिंसा की खबरें आने लगी। इसी हिंसा में वर्टिकल रामकृष्णन नाम से आरएसएस कार्यकर्ता की हत्या हो गई। रामकृष्णन पर कुल्हाड़ी से वार किया गया था। इसी हत्या में सीपीएम के कई नेताओं का नाम आया। इन नेताओं में पिनरई विजयन का नाम भी शामिल था। हालांकि अदालत में विजयन पर आरोप तय नहीं हो पाया और विजयन बरी हो गए।&nbsp;<span style="font-size: 1rem;">&nbsp;</span></div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/who-will-be-the-congress-cm-in-kerala-ajay-maken-said-we-will-look-at-the-wishes-of-the-mlas" target="_blank">Keralam में कौन होगा Congress का CM? अजय माकन बोले- विधायकों की इच्छा देखेंगे</a></h3><h2>लेफ्ट के कैडर में 50 साल से ऊपर लोगों का दबदबा</h2><div>लेफ्ट की सबसे बड़ी ताकत उसका अनुशासित कैडर यानी कार्यकर्ता रहे। लेकिन आज वही कार्यकर्ता कमजोरी है। पार्टी के भीतर आंतरिक लोकतंत्र लगभग खत्म है। परिवारवाद की झलक दिख रही है। जिसने समर्पित कार्यकर्ताओं के मनोबल को तोड़ा। जमीन पर काम करने वाला कार्यकर्ता अब युवा नहीं रहा। वो बूढ़ा हो गया और आज के इंटरनेट और सोशल मीडिया वाली पीढ़ी से कोई जुड़ाव नहीं। आंकड़े कहते हैं कि लेफ्ट के कैडर में 50 साल से ऊपर लोगों का दबदबा बढ़ा है। जबकि 18 से 25 सालों की युवाओं का मोह भंग हुआ। आज भी 1970 के दशक के घिसे फूटे नारे दोहराए जा रहे हैं।</div><div><br></div><div><span style="font-size: 1rem;">&nbsp;</span></div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 08 May 2026 14:32:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/story-of-the-disappearance-of-a-single-color-from-independent-indias-history</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[हिंदू अस्मिता की बातें, विवेकानंद सा पहनावा, बंगाल के 'योगी' को CM बनाएगी BJP?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/talks-about-hindu-identity-dressing-like-vivekananda-will-bjp-make-bengal-yogi-the-cm]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>राजनीति में सबसे बड़ा झटका क्या होता है? जब नाम हार जाता है और नैरेटिव टूट जाता है। पश्चिम बंगाल में इस बार यही हुआ है। वो बंगाल जहां ममता बनर्जी सत्ता की परिभाषा थी। जहां ममता से विरोध करना जोखिम भरा था। जहां ममता की इजाजत के बगैर पत्ता तक नहीं हिल रहा था। सत्ता सरकार का ऐसा रुतबा था कि हर गली, हर बूथ, हर फैसले पर कंट्रोल ममता का था। आज उस जमीन पर ममता बनर्जी के साथ खेला है। वो जमीन भगवा मय हो गई है। राम मंदिर, हिंदुत्व और कल्चरल नेशनलिज्म यानी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद। इन तीन विषयों को भाजपा ने देश के हर राज्य में धुरी की तरह इस्तेमाल किया है। सफलता भी मिली है। इसी धुरी के इर्द-गिर्द भाजपा बंगाल में भी घूमी जीती भी। लेकिन यह जीत 5 सालों की यात्रा में पहला कदम है और भाजपा तो इस सोच के साथ बंगाल में दाखिल हुई है कि अब टिकना है। तो ऐसे में भाजपा के सामने चुनौती यह है कि सूबे का मुखिया ऐसे किसी शख्स को बनाया जाए जो इस जीत को पक्का भी कर सके और दोहरा भी सके। कुछ-कुछ वैसा जैसे योगी आदित्यनाथ ने किया या हेमंता विश्वा शर्मा ने। संयासी का भगवा वस्त्र, हिंदू अस्मिता की बातें, मुस्लिम तुष्टीकरण के खिलाफ सीधी आवाज और राजनीति में कदम रखकर हिंदुओं की रक्षा का वादा। जब हम भारतीय राजनीति में भगवा और सत्ता के मिलन की बातें करते हैं तो सबसे पहला नाम उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का आता है। कारण सीधा सा है कि एक संयासी और मठ के प्रमुख से लेकर देश के सबसे बड़े सूबे के मुख्यमंत्री तक का सफर तय करके भारतीय राजनीति में हिंदुत्व की एक नई परिभाषा लिखी।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/the-defeat-of-ruthlessness-the-attack-on-appeasement-and-the-wind-of-development-in-bengal" target="_blank">बंगाल में निर्ममता की हार, तुष्टिकरण पर प्रहार और विकास की बयार</a></h3><h2>विवेकानंद का पहनावा याद आ जाएगा</h2><div>बंगाल में भाजपा बिना चेहरे के चुनाव में उतरी। इस सवाल में उलझी नहीं कि ममता का विकल्प कौन होगा। लेकिन अब उसे अपने 100 से ज्यादा विधायक एक नाम के पीछे इकट्ठा करने हैं। क्या उसके पास कोई ऐसा नेता है? एक नाम आगे किया जा रहा है। उत्पल ब्रह्मचारू पगड़ी से लेकर धोती तक सब कुछ भगवा बिल्कुल योगी आदित्यनाथ की तरह। बयान भी वैसे ही मुखर। लेकिन सब कुछ योगी जैसा ही नहीं। उत्पल ब्रह्मचारू ने अपने पहनावे में बारीक काम किया है। वह धोती कुर्ता पहनने के बाद शॉलनुमा एक भगवा कपड़ा भी ओढ़ते हैं। जिसे देखकर कहीं ना कहीं आपको विवेकानंद का पहनावा याद आ सकता है। यही कारण है कि इन्हें पश्चिम बंगाल में लोग उत्पल महाराज कहकर बुलाते हैं। फिर जब से इन्होंने भगवा वेशभूषा पर भाजपा का गमछा उड़ा है, तब से यह बंगाल के योगी आदित्यनाथ भी कहे जा रहे हैं। क्या उत्पल को मौका मिल सकता है? आज इसी का एमआरआई स्कैन करेंगे। मगर ध्यान रहे कि उत्पल महाराज की जीत यूं ही नहीं आई। इसके पीछे उत्पल महाराज की वह जड़ है जिसकी गहराई को भाजपा आलाकमान ने बहुत पहले भांप लिया था। दरअसल उत्पल महाराज की पहचान नेता से पहले एक सन्यासी के तौर पर है जो लंबे वक्त तक भारत सेवाश्रम संघ के हिस्सा रहे। उत्पल महाराज साल 2000 में आधिकारिक तौर पर भारत सेवाश्रम संघ से जुड़े थे। बाद में कालियागंज और कुन्नौर में स्थापित संघ के शाखा के प्रमुख भी रहे।&nbsp;</div><h2>भारत सेवाश्रम संघ का एक बड़ा नेटवर्क</h2><div>बंगाल में भारत सेवाश्रम संघ का प्रमुख होने भर से आपके साथ लाखों लोग जुड़ जाते हैं। जिसका कारण इस संघ का दावा और बंगाल में गहरा प्रभाव है। 1917 में इसकी स्थापना स्वामी प्रणवानंद महाराज ने की थी। तब से यह सामाजिक सेवा के काम करता आ रहा है। जैसे इनके बहुत से कार्यकर्ता की भूमिका बाढ़ और कोविड-19 के वक्त में लोगों को राहत पहुंचाने में रही है। इसके अलावा इस संघ का मुख्य उद्देश्य हिंदू धर्म का प्रचार प्रसार है। यह संगठन अस्पताल, स्कूल और आदिवासी कल्याण केंद्र भी चलाता है। 1920 के दशक से ही इस संघ ने बंगाल के ग्रामीण इलाकों खासकर दलितों और पिछड़ी जातियों के बीच जाकर उन्हें हिंदू समाज की मुख्यधारा से जोड़ने का काम किया है। आज पूरे भारत में इसके आश्रमों और केंद्रों का एक बड़ा नेटवर्क है। यह कुंभ मेला और अमरनाथ यात्रा जैसे बड़े आयोजनों में भी लाखों तीर्थ यात्रियों की सेवा करते हैं। कहने का अर्थ यह है कि बंगाल में इस संघ को मानने वाले लाखों करोड़ों लोग हैं। जाहिर है संघ से जुड़े संतों की भी अच्छी फॉलोइंग होगी। यही कारण है कि भाजपा ने उत्पल महाराज को चुना और नतीजा जीत में तब्दील हुआ। अब सवाल वही कि जब बंगाल में भाजपा का हिंदुत्ववादी चेहरा काम तो कर गया लेकिन क्या इनके अंदर योगी आदित्यनाथ वाली क्वालिटी है? तो इस सवाल का जवाब उत्पल महाराज के बयानों और भाजपा की रणनीति में मिलता है। उत्पल महाराज का साफ मानना है कि राज्य में तुष्टीरण की राजनीति के कारण हिंदुओं को अपने धार्मिक त्यौहार जैसे रथ यात्रा और रामनवमी मनाने के लिए भी पुलिस से विशेष अनुमति लेनी पड़ती है। एक आध्यात्मिक संगठन में रहकर वे हिंदुओं की इन समस्याओं को पूरी तरह से हल नहीं कर पा रहे थे। इसलिए उन्होंने राजनीति का रास्ता चुना। जाहिर है उत्पल महाराज हिंदू अस्मिता और हिंदू एकीकरण की बात करते हैं जो सीधे तौर पर भाजपा की विचारधारा से मेल खाती है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/dharmendra-pradhan-scathing-attack-on-west-bengal-said-mamata-banerjee-is-insulting-the-mandate" target="_blank">West Bengal पर धर्मेंद्र प्रधान का तीखा प्रहार, कहा- Mamata Banerjee जनादेश का अपमान कर रहीं</a></h3><h2>संघ ने किया किनारा</h2><div>उत्पल महाराज ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि उन्होंने संघ के अधिकारियों को चुनाव लड़ने के अपने निर्णय के बारे में सूचित कर दिया था, लेकिन जब वे सहमत नहीं हुए, तो उन्होंने अपनी उम्मीदवारी की घोषणा के एक दिन बाद, 17 मार्च को अपना इस्तीफा सौंप दिया, जिसे स्वीकार कर लिया गया। भारत सेवाश्रम संघ पूरी तरह से गैर-राजनीतिक, सामाजिक सेवा और धार्मिक संगठन है। संघ के महासचिव स्वामी विश्वत्मानंद ने पत्र में लिखा किसी भी परिस्थिति में संघ का कोई संन्यासी, ब्रह्मचारी या आश्रम निवासी किसी भी राजनीतिक गतिविधि में शामिल नहीं हो सकता। उन्होंने आगे कहा कि यदि कोई व्यक्ति किसी राजनीतिक दल के प्रभाव या प्रलोभन में आ जाता है, तो उसका धार्मिक जीवन पूरी तरह नष्ट हो जाता है। यह उसे त्याग के गौरव से विमुख कर देता है और सांसारिक सुखों की लत में डुबो देता है… जबकि हमें संसार के कल्याण के लिए काम करना चाहिए, सांसारिक ऐश्वर्य की ओर लौटने के लिए अपनी अंतरात्मा और वैराग्य का त्याग करना कभी भी उचित नहीं है।</div><h2>बताया क्यों लिया संयासी बनने का फैसला</h2><div>दक्षिण दिनाजपुर जिले के बलुरघाट में जन्मे उत्पल महाराज ने बताया कि वे 2000 में इस संगठन में शामिल हुए और चार साल बाद स्थानीय कॉलेज से इतिहास में स्नातक की डिग्री पूरी की। उन्होंने कहा कि मैं बचपन से ही संन्यासी जीवन से बहुत प्रभावित था, क्योंकि मैंने आश्रम के छात्रावास में रहकर पढ़ाई की। तभी मैंने संन्यासी बनने का फैसला किया था। 1917 में स्थापित यह संघ राजनीति से दूर रहता है और परोपकारी कार्यों तथा आपदा राहत कार्यों में संलग्न रहता है, साथ ही यह देश भर में हिंदू मिलन मंदिरों का एक नेटवर्क भी संचालित करता है। उत्पल महाराज का दावा है कि इनका उद्देश्य हिंदुओं को एकजुट करना है। हिंदुओं की सेवा करते हुए मैंने महसूस किया कि राजनीति के कारण यह समुदाय खतरे में है। एक विशेष समुदाय को खुश करने की कोशिशों के कारण हिंदू पीड़ित हैं। आजकल रथ यात्रा या राम नवमी के अवसर पर पूजा-अर्चना करने के लिए भी हिंदुओं को पुलिस की विशेष अनुमति लेनी पड़ती है। हिंदुओं की समस्याओं का समाधान किसी आध्यात्मिक संगठन के माध्यम से नहीं किया जा सकता। तृणमूल कांग्रेस के पूर्व नेता हुमायूं कबीर और वरिष्ठ टीएमसी नेता फिरहाद हकीम की टिप्पणियों का जिक्र करते हुए उत्पल महाराज ने कहा कि मंदिरों में प्रार्थना करने का समय समाप्त हो गया है। उन्होंने कहा कि भले ही संघ ने उन्हें निष्कासित कर दिया हो, लेकिन वे इसे हमेशा अपने दिल और दिमाग में रखेंगे और संगठन के संन्यासियों के साथ संपर्क में रहेंगे। उन्होंने कहा कि मैं कालियागंज में रहता हूँ और इस इलाके की हर गली से वाकिफ हूँ। मैं यहाँ के लोगों को जानता हूँ और उनकी भावनाओं को समझता हूँ। वे कह रहे हैं कि उन्होंने कभी सोचा भी नहीं था कि मैं उम्मीदवार बनूँगा। एक भिक्षु होने के नाते मेरा अपने परिवार से कोई संपर्क नहीं है, लेकिन मैं एक भिक्षु के रूप में ही अपना जीवन व्यतीत करता रहूँगा।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/the-defeat-of-ruthlessness-the-attack-on-appeasement-and-the-wind-of-development-in-bengal" target="_blank">बंगाल में निर्ममता की हार, तुष्टिकरण पर प्रहार और विकास की बयार</a></h3><div>खैर योगी आदित्यनाथ की तरह वेशभूषा और विवेकानंद की तरह दिखने की कोशिश भाजपा कमान को कितना रिझाएगी यह तो वक्त बताएगा। लेकिन उत्पल बाबा के बयानों और उनके समर्थकों का बल भाजपा की विचारधारा से मेल खाने के बावजूद उन्हें अभी मुखिया बनने के लिए मेहनत करनी पड़ सकती है। क्योंकि भारत सेवा श्रम संघ द्वारा उन्हें बाहर निकाला जाना भी एक बड़ी चुनौती है क्योंकि संघ ने साफ कर दिया है कि वे किसी भी राजनीतिक दल का समर्थन नहीं करते। ऐसे में उत्पल महाराज को विधायक से ज्यादा अपनी पहचान बनाने के लिए सड़क पर उतरना ही होगा।&nbsp;</div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 06 May 2026 13:06:00 +0530</pubDate>
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      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
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      <title><![CDATA[तमिलनाडु में धोनी से ज्यादा पॉपुलर हो गए PK? बिहारी बाबू ने कैसे उसी फिनिशर अंदाज में पूरा किया अपना वादा]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/has-pk-become-more-popular-than-dhoni-in-tamil-nadu]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>धोनी इज मोर पॉपुलर इन तमिलनाडु देन प्रशांत किशोर। नेक्स्ट ईयर व्हेन आई कंट्रिब्यूट एंड आई हेल्प यू विन देन आई विल बी टेकिंग ओवर धोनी इन इन पॉपुलैरिटी। प्रशांत किशोर का ओवर कॉन्फिडेंस वाला दावा जो आज तमिलनाडु का सच बन चुका है। यह भविष्यवाणी जो कल तक हवाबाजी लग रही थी। आज करोड़ों लोगों के जनादेश के जरिए थलापति को विजय बना चुकी है। सत्ता के सिंहासन की तरफ बढ़ा रही है और दशकों से तमिलनाडु की राजनीति के चाणक्य माने जाने वाले एमके स्टालिन को अपने ही घर में हरा चुकी है। क्या यह सिर्फ एक हार है या फिर द्रविडियन राजनीति के उस विशाल बरगद का गिरना जिसकी जड़े बहुत गहरी है और जयललिता के जाने के बाद उसे लेकर एक धारणा थी कि अब तो कोई इसे हिला नहीं सकता, हटा नहीं सकता। लेकिन वो हिली है तमिलनाडु की सड़कों पर विजय का उत्सव है। डीएमके के दफ्तरों में सन्नाटा है और यहीं से सवाल है कि क्या ये सिर्फ एक सुपरस्टार एक करिश्मे की जीत है या रणनीतिकार के ठंडे नपे तुले दिमाग का असर। क्या ये डीएमके की हार एंटी इनकंबेंसी है सालों के अहंकार की वजह है। जनता से दूरी की वजह या फिर विजय के वह लोक लुभावने वादे कि हम बिजली फ्री में देंगे, गाड़ी फ्री में देंगे, सोना फ्री में देंगे, पढ़ाई फ्री में देंगे, यह भी फ्री देंगे, वो भी फ्री देंगे, सब दे देंगे। बस वोट दे दो। कई सवाल हैं जो तमिलनाडु की जीत को लेकर आज सोशल मीडिया पर उठ रहे हैं और सबसे बड़ा सवाल जो उठ रहा है वो बिहारी अस्मिता को लेकर है क्योंकि प्रशांत किशोर ने बिहारियों के अपमान का बदला लिया है। स्टालिन की बिसात को उल्टा है। क्या धोनी की तरह उनका जो ये फिनिशर अंदाज है यह उनके करियर में एक नया ट्विस्ट लाएगा? बिहार में उनके रिवाइवल की वजह बनेगा? तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के नतीजे सिर्फ एक चुनावी परिणाम नहीं है बल्कि दक्षिण भारत की राजनीति में आए भूकंप की तरह है जिसने देश को हिलाया है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/vijay-impersonator-the-man-who-turned-the-election-around" target="_blank">विजय का बहरूपिया, जिसने पलटा चुनाव, स्टालिन को हराने वाले शख्स की कहानी</a></h3><h2>बिहारी बाबू ने अपना धोनी वाला पूरा किया</h2><div>कहानी की शुरुआत होती है 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव से। देश के सबसे बड़े पॉलिटिकल स्ट्रेटजिस्ट कहे जाने वाले प्रशांत किशोर पहली बार दूसरों के लिए चुनाव रणनीति बनाने के बजाय खुद अपनी पार्टी जन स्वराज बनाते हैं। चुनावी मैदान में उतरते हैं। लेकिन नतीजा क्या रहा? नील बटे सन्नाटा। उनकी पार्टी एक भी सीट नहीं जीत पाई। जो पीके दूसरों को मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री बनाने का दावा करते हैं। उनका अपने ही घर में सूपड़ा साफ हो गया। सियासी पंडितों ने मान लिया कि किंग मेकर का जादू अब हमेशा के लिए खत्म हो चुका है। लेकिन आज 2026 में जब तमिलनाडु में एक्टर थलपति विजय की पार्टी टीवी ने ऐतिहासिक जीत दर्ज कर ली है तो सोशल मीडिया पर विजय से ज्यादा पीके का एक पुराना वीडियो आग की तरह फैल रहा है। यह वायरल रील फरवरी 2025 के एक इवेंट की है। तब पीके अभी-अभी विजय के साथ जुड़े ही थे। वीडियो में पीके एकदम मजाकिया लेकिन बेहद कॉन्फिडेंट लहजे में कहते दिख रहे हैं मुझे तमिलनाडु में सबसे पॉपुलर बिहारी बनना है तो मुझे धोनी के साथ कंपटीशन करना होगा जो चेन्नई सुपर किंग्स को आईपीएल जीताते हैं। हम आपके नेता के नेतृत्व में टीवीके को जीत दिलाएंगे। अब जब विजय की पार्टी ने इतना बेहतरीन प्रदर्शन किया तो पब्लिक उसी रील को शेयर करके लिख रही है कि बिहारी बाबू ने अपना धोनी वाला वादा पूरा कर दिया।&nbsp;</div><h2>फिल्मों की ब्लॉकबस्टर ओपनिंग वोट में कैसे तब्दील</h2><div>प्रशांत किशोर और थलपति विजय का यह गठबंधन कोई रातोंरात हुआ चमत्कार नहीं था। तमिलनाडु की राजनीति दशकों से डीएमके और एआईए डीएमके की मजबूत बाइनरी में कैद रही है। इस द्रविड़ियन किले को सिर्फ फिल्मी स्टारडम से नहीं भेजा जा सकता था। रजनीकांत और कमल हसन जैसे दिग्गज इसका उदाहरण रहे हैं। विजय यह बात बहुत अच्छी तरह जानते थे कि सिर्फ फिल्मों की ब्लॉकबस्टर ओपनिंग के वोट में तब्दील करने के लिए उन्हें एक ऐसे माइंड की जरूरत है जो जमीन का गणित समझता हो और यहीं से शुरू हुआ पीके और थलपति का मिशन। 2025 में फरवरी के शुरुआती दिनों में इन दोनों की पहली मुलाकात हुई। राजनीति में कोई भी मुलाकात बेवजह नहीं होती। लेकिन मीडिया की नजरों से इसे बचाने के लिए शुरुआत में इसे महज एक शिष्टाचार भेंट बता दिया गया। पीके बहुत अच्छे से जानते थे कि अगर शुरुआत में ही यह मैसेज चला गया कि एक नॉर्थ इंडियन रणनीतिकार विजय की पार्टी चला रहा है तो तमिलनाडु की जनता जो अपनी भाषाई और क्षेत्रीय अस्मिता को लेकर बेहद संवेदनशील है इसे खारिज कर देगी। इसलिए जब कुछ ही हफ्तों बाद फरवरी के अंत में एक बड़े कार्यक्रम के दौरान पीके और विजय पहली बार एक ही मंच पर सार्वजनिक रूप से खड़े हुए तो पीके ने माइक पकड़ते ही सबसे पहले इसी नैरेटिव को सेट किया। पीके ने कहा मैं यहां अपने भाई अपने दोस्त विजय को कोई चुनाव जिताने के लिए या मदद करने नहीं आया हूं। विजय को किसी मदद की जरूरत है ही नहीं। मैं यहां आया हूं क्योंकि वह तमिलनाडु के लिए नई उम्मीद है। यह महज एक बयान नहीं था। एक मास्टर स्ट्रोक था। पीके ने एक ही लाइन में विजय के ईगो को भी पुचकारा। उनके समर्थकों को यह मैसेज भी दे दिया कि उनका हीरो किसी बाहरी पर मोहताज नहीं है और साथ ही खुद को एक गाइड की सुरक्षित भूमिका में सेट कर लिया। यह पीके का वो ठेट स्टाइल है जिसमें वो क्रेडिट बैक सीट पर रखते हैं और और कैंडिडेट को फ्रंट सीट पर बिठाते हैं। इस पूरी जीत का एनालिसिस तब तक अधूरा है जब तक हम प्रशांत किशोर के उस भारी-भरकम पॉलिटिकल रिज्यूम को नहीं समझ लेते जिसने भारतीय राजनीति के पिछले एक दशक को आकार दिया है। पीके कोई साधारण चुनाव प्रचारक नहीं है। वह चुनाव को एक कॉर्पोरेट प्रोजेक्ट की तरह हैंडल करते हैं।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/vijay-has-achieved-what-rajinikanth-and-kamal-haasan-failed-to-achieve" target="_blank">रजनीकांत और कमल हासन जो नहीं कर पाए, विजय ने कर दिखाया, जानें तमिलनाडु में कैसे रच दिया इतिहास</a></h3><h2>आधुनिक चाणक्य</h2><div>बिहार राजनीति, कूटनीति और अर्थशास्‍त्र के पंडित माने जाने वाले चाणक्‍य की धरती है, जिसने चंद्रगुप्‍त मौर्य को पाटलिपुत्र पर राज करने के तरीकों और राजनीति के रहस्‍यों से रूबरू करवाया था। लेकिन वर्तमान में मगध के एक आधुनिक चाणक्य जिसने बचपन में चाय बेचने वाले नरेंद्र मोदी की चुनावी रणनीति की कमान को संभालते हुए लोकसभा चुनाव 2014 में उनका प्याला वोटों से भर दिया, फिर नीतीश कुमार को 'बिहार में बहार हो नीतेशे कुमार हो' के नारे के साथ फिर से राज्य के सर्वोच्च कुर्सी पर काबिज किया और अमरिंदर सिंह को पंजाब का कैप्टन बना दिया। साल 1977 में प्रशांत किशोर का जन्म बिहार के बक्सर जिले में हुआ था। उनकी मां उत्तर प्रदेश के बलिया जिले की हैं वहीं पिता बिहार सरकार में डॉक्टर हैं। उनकी पत्नी का नाम जाह्नवी दास है। जो असम के गुवाहाटी की एक डॉक्टर हैं। राजनीतिक करियर की बात करें तो 2014 में मोदी सरकार को सत्ता में लाने की वजह से वह चर्चा में आए थे। उन्हें एक बेहतरीन चुनावी रणनीतिकार के तौर पर जाना जाता है। हमेशा से वह पर्दे के पीछे रहकर अपनी चुनावी रणनीति को अंजाम देते आए हैं। इसी वजह से उन्हें सबसे ज्यादा भरोसेमंद माना जाता रहा है। चुनावी रणनीतिकार माने जाने वाले प्रशांत किशोर का मैजिक आंध्र प्रदेश के विधानसभा और लोकसभा चुनाव में देखने को मिला जब राष्ट्रीय चाणक्य की भूमिका निभाने के ख्वाब संजोये चंद्रबाबू नायडू को निराशा हाथ लगी और जगन मोहन रेड्डी की वाईएसआर कांग्रेस ने आंध्र प्रदेश की 22 लोकसभा सीटें जीतीं और विधानसभा में 175 में से 150 सीटों पर कब्जा जमाया। अपने कॅरियर की शुरुआत यूनिसेफ में नौकरी से करने वाले किशोर ने वहां ब्रांडिंग का जिम्मा संभाला। गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के चर्चित आयोजन ‘वाइब्रेंट गुजरात’ की ब्रांडिंग का ज़िम्मा संभालते हुए प्रशांत ने इसे सफलता की ऊंचाइयों तक पहुंचाया। इसी दौरान उनकी जान-पहचान नरेंद्र मोदी से हुई और प्रशांत किशोर ने टीम मोदी के लिए काम करना शुरू किया लेकिन पीके की मज़बूत पहचान बनी 2014 के चुनाव से जिसमें उनके प्रचार-प्रसार के पेशेवर तरीकों ने नरेन्द्र मोदी की जीत को काफी हद तक आसान बना दिया। ‘चाय पर चर्चा’ और ‘थ्री-डी नरेंद्र मोदी’ के पीछे प्रशांत का ही दिमाग था।&nbsp;</div><h2>अमरिंदर सिंह से लेकर स्टालिन तक</h2><div>2017 में पंजाब में कांग्रेस के लिए कैप्टन अमरिंदर सिंह का कैप्टन द नवा पंजाब कैंपेन हो। 2019 में आंध्र प्रदेश में जगन मोहन रेड्डी के लिए पद यात्रा का डिजाइन हो या 2020 में अरविंद केजरीवाल के लिए लगे रहो केजरीवाल का नारा हो। पीके ने हर राज्य हर नेता और हर हालात के हिसाब से एक नई राजनीतिक चाबी घड़ी। सबसे बड़ी परीक्षा 2021 में बंगाल में हुई जब बीजेपी ने ममता बनर्जी को हराने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी। तब पीके ने ही बंगाल निजेर में कई चाय यानी बंगाल अपनी बेटी को ही चाहता है का वो इमोशनल नैरेटिव गढ़ा था जिसने प्लास्टर चढ़े पैर वाली ममता बनर्जी को एक ऐसी सिंपैथी और ताकत दी कि बीजेपी का किला वहीं रह गया। पीके की राजनीति की सबसे बड़ी ताकत उनका डाटा कलेक्शन हर बूथ की माइक्रो मैनेजमेंट और वोटर के दिमाग में पल रहे एंटी इनकंबेंसी को एक सधे हुए स्लोगन में बदल देने की कला है। विजय की टीवी के साथ मिलकर दर्ज की गई 2026 की इस ताजा जीत में सबसे दिलचस्प और हैरान करने वाला पहलू कुछ और ही है। राजनीति में अक्सर कहा जाता है कि आपको अपने दुश्मनों से ज्यादा अपने उन दोस्तों से डरना चाहिए जो आपके सारे राज जानते हो। पीके ने इस बार उसी सत्ता को जड़ से उखाड़ फेंका जिसे उन्होंने खुद 5 साल पहले अपने हाथों से स्थापित किया था। याद कीजिए 2021 के तमिलनाडु विधानसभा चुनाव तब डीएमके 10 सालों से सत्ता से बाहर थी। एमके स्टालिन के सामने एआईए डीएमके को हराने की चुनौती थी। तब स्टालिन ने प्रशांत किशोर और उनकी टीम आईपैक को हायर किया था। पीके ने ही तब डीएमके के लिए ओंद्री नाइवोम वा यानी आईए एकजुट होकर जबरदस्त कैंपेन चलाया था।</div><h2>अब कैसे पलट दी बाजी</h2><div>पीके ने डीएमके के ब्लॉक और बूथ लेवल के स्ट्रक्चर को एक मशीन की तरह सेट किया और स्टालिन को मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाया था। अब 5 साल बाद 2026 के अखाड़े में कहानी पूरी तरह पलट गई। पीके अब विजय के साथ खड़े थे और उनका निशाना थी वही डीएमके। वेडीएमके के हर कमजोर बूथ संगठन की हर खामी स्टालिन की कैबिनेट के खिलाफ सुलग रहे सत्ता विरोधी गुस्से और द्रविड़ राजनीति के उस लूप होल को बखूबी जानते थे जहां से एक नया युवा नेता की एंट्री करवाई जा रही थी। उन्होंने डीएमके के उस अभेद किले को उसी के ब्लूप्रिंट का इस्तेमाल करके ढहा दिया। तमिलनाडु में मिली यह जीत विजय से भी कहीं ज्यादा प्रशांत किशोर के लिए एक जीवनदान है। इस जीत को समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे लौटकर 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव के पन्ने को पलटना होगा। दूसरों को राजा बनाने वाले पीके के मन में भी खुद सत्ता संभालने की महत्वाकांक्षा जागी थी। उन्होंने जन स्वराज नाम से अपनी राजनीतिक पार्टी बनाई। बिहार की राजनीति में बुरी तरह फ्लॉप हो गए। इस करारी हार के बाद राजनीतिक पंडितों ने उनके करियर का मर्सिया पढ़ने में देर नहीं लगाई। कहा जाने लगा कि पीके का गुब्बारा फूट गया।&nbsp; चुनाव लड़ना मुश्किल। हार से जूझ रहे पीके ने आखिरकार तय किया कि वह वापस उसी काम पर लौटेंगे, जिसमें उनका कोई सानी नहीं है। धोनी की ही तरह पीके ने भी जड़ दिया है।&nbsp;</div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 05 May 2026 14:05:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/has-pk-become-more-popular-than-dhoni-in-tamil-nadu</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[5'M' के जरिए प्लान-A हुआ मुकम्मल, अब प्लान-B में बंगाल में BJP कौन से 5 बड़े काम करने वाली है?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/plan-a-has-been-completed-5m-now-what-are-the-5-major-tasks-of-bjp-in-bengal-in-plan-b]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>बंगाल के इस चुनावी महासमर की असली दास्तान महज़ हार-जीत के आंकड़ों में नहीं, बल्कि 'M फैक्टर' के इर्द-गिर्द बुनी गई। राजनीति अब केवल ध्रुवीकरण या विकास के वादों के पुराने चश्मे से नहीं देखी जा रही। आइए डिकोड करते हैं कि आखिर ये 5 'M' कैसे तय कर रहे हैं बंगाल की सियासत की नई दिशा और दशा। बंगाल की सियासत में एक बड़े युग का बदलाव हुआ है। पूरे 15 साल तक सत्ता के शिखर पर काबिज रही टीएमसी सरकार को बेदखल कर बीजेपी ने एक नया इतिहास रच दिया है। इस महाविजय के पीछे सिर्फ चुनावी हवा का रुख नहीं, बल्कि एक बेहद सधी हुई बिसात थी। पार्टी ने जीत का ब्लूप्रिंट बहुत पहले ही तैयार कर लिया था। सत्ता के शिखर तक पहुंचने का उनका 'प्लान-A' तो अब मुकम्मल हो चुका है, लेकिन असली काम अब शुरू होता है। अब नजरें बीजेपी के 'प्लान-B' पर टिकी हैं। यानी वह रोडमैप, जिसके जरिए बंगाल की खोई हुई अस्मिता, सांस्कृतिक साख और औद्योगिक पहचान को दोबारा वापस लाने का खाका खींचा गया है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/why-did-the-west-bengal-election-results-create-a-stir-in-bangladesh-media" target="_blank">भविष्य संकट में है...पश्चिम बंगाल चुनाव के नतीजों से बांग्लादेश के मीडिया में क्यों मची खलबली?</a></h3><h2>'M' फैक्टर ने कैसे बंगाल का भविष्य तय किया</h2><h2>मुस्लिम फैक्टर&nbsp;</h2><div>पश्चिम बंगाल की राजनीति में 30% मुस्लिम आबादी वह 'M' फैक्टर है, जो किसी भी दल को सत्ता के शिखर पर पहुंचा सकता है। पारंपरिक तौर पर यह टीएमसी का पक्का वोट बैंक रहा है। लेकिन इस चुनाव में टीएमसी के इस वोट बैंक पर दोहरी मार पड़ी। पहला झटका हुमायूं कबीर ने दिया, जिन्होंने अपनी नई आम जनता उन्नयन पार्टी (AJUP) के जरिए मुस्लिम वोटों में बड़ी सेंध लगाई। रही-सही कसर बीजेपी की आक्रामक ध्रुवीकरण की राजनीति ने पूरी कर दी, जिसने इस 'M' फैक्टर के इर्द-गिर्द एकदम नए और चौंकाने वाले सियासी समीकरण गढ़ दिए।</div><h2>महिला वोटर्स&nbsp;</h2><div>बंगाल की सियासत में इस बार महिलाओं ने ही 'किंगमेकर' की कमान संभाल ली है। टीएमसी के लिए 'लक्ष्मी भंडार' जैसी योजनाएं महिलाओं को लुभाने का सबसे बड़ा ट्रंप कार्ड रहीं। लेकिन बीजेपी ने भी इस मोर्चे पर कड़ी घेराबंदी की। मोदी सरकार की कल्याणकारी योजनाओं के अलावा, बीजेपी का सीधा वार महिला सुरक्षा के मुद्दे पर था। संदेशखाली की घटना हो या आरजी कर का खौफनाक कांड—बीजेपी ने इन्हें महिला सम्मान का ज्वलंत मुद्दा बनाकर ममता सरकार के खिलाफ एक मजबूत नैरेटिव सेट कर दिया। इसी आधी आबादी को अपने पाले में करने की इस होड़ ने बंगाल के पूरे चुनावी समीकरण को बदलकर रख दिया है।</div><h2>माइग्रेंट&nbsp;</h2><div>इस बार बंगाल चुनाव में हार-जीत की एक बड़ी चाबी उन लाखों प्रवासी मज़दूरों के हाथ में भी रही, जो अक्सर चुनाव के दिन अपने घरों से दूर रहते हैं। रोज़गार के अभाव में पलायन कर चुके इन युवाओं और उनके परिवारों ने इस बार वोट डालने के लिए जिस तरह बंगाल का रुख किया, उसने सारे समीकरण बदल दिए। इसका असर इतना व्यापक था कि दिल्ली-एनसीआर और ख़ासकर नोएडा की रिहायशी सोसाइटियों में बंगाली कामगारों के छुट्टी पर जाने से कामकाज ठप पड़ गया। मज़दूरों की यह वापसी चुनाव में एक बड़ा नैरेटिव बन गई। वोट की इस अहमियत को समझते हुए बीजेपी ने इन प्रवासियों को 'सोनार बांग्ला' का विज़न दिखाकर राज्य में ही रोज़गार देने का वादा किया। इसके विपरीत, ममता सरकार ने आक्रामक रुख अपनाते हुए मज़दूरों की इस स्थिति के लिए सीधे तौर पर मोदी सरकार की नीतियों और वित्तीय असहयोग को ज़िम्मेदार ठहराया।</div><h2>मतुआ</h2><div>उत्तर 24 परगना और उसके सीमावर्ती इलाकों में सत्ता का रास्ता सीधे मतुआ समुदाय के दरवाज़े से होकर गुज़रता है। नागरिकता कानून (CAA) की मांग इस समुदाय की सबसे बड़ी धुरी है, जिसके इर्द-गिर्द बीजेपी की पूरी राजनीति घूमती है। इस बार भी बीजेपी का पूरा ज़ोर सीएए के ज़रिए अपने इस पारंपरिक और निर्णायक वोट बैंक को एकजुट रखने पर रहा। लेकिन टीएमसी ने इस बार पूरी बिसात बदल दी। सीएए के राष्ट्रीय मुद्दे को कमज़ोर करने के लिए टीएमसी ने बहुत सधी हुई चाल चली और 'लोकल मुद्दों' के साथ-साथ ज़मीनी स्तर पर जनता के भरोसे को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया। इसी स्थानीय रणनीति ने मतुआ बहुल इलाकों की चुनावी लड़ाई को बेहद दिलचस्प बना दिया है।</div><h2>मोदी फैक्टर</h2><div>बंगाल फतह के लिए बीजेपी का सबसे बड़ा हथियार 'मोदी फैक्टर' ही साबित हुआ। पीएम मोदी की रैलियों का आक्रामक रुख, केंद्रीय योजनाओं का रिपोर्ट कार्ड और राष्ट्रीय विमर्श ने पूरी पार्टी को नए जोश से भर दिया। मोदी की व्यापक स्वीकार्यता ने नए वोटर्स को बड़ी तादाद में पार्टी से जोड़ा। ज़मीन पर जनता से सीधे कनेक्ट होने की पीएम की इस कला का एक यादगार पल झाड़ग्राम में सामने आया। जब अपने मेगा रोडशो के बीच पीएम मोदी एक आम बंगाली की तरह सड़क किनारे 'झालमुड़ी' का लुत्फ़ उठाते दिखे, तो इस दृश्य ने साबित कर दिया कि चुनाव जीतने के लिए महज़ वादे नहीं, बल्कि जनता के साथ ज़मीनी और सांस्कृतिक जुड़ाव भी उतना ही ज़रूरी है।</div><h2>बंगाल के लिए बीजेपी का प्लान B</h2><div>रोजगार, निवेश और 'सोनार बांग्ला'</div><div>बंगाल की चुनावी बिसात पर इस बार सिर्फ नारों की गूंज नहीं है, बल्कि एक ठोस आर्थिक रोडमैप पेश करने की होड़ है। बीजेपी ने राज्य की जर्जर हो चुकी औद्योगिक साख को फिर से खड़ा करने के लिए कई अहम दांव चले हैं:</div><div>जूट उद्योग का 'पुनर्जागरण'</div><div>बंगाल की पहचान और कभी रोजगार का सबसे बड़ा इंजन रहा जूट उद्योग, बीजेपी के मुख्य एजेंडे में है। दशकों से जंग खा रही और बंद पड़ी जूट मिलों के ताले खोलने का वादा किया गया है। योजना महज इन्हें चालू करने की नहीं है, बल्कि तकनीकी मदद और पूंजी के जरिए इन्हें 'हाईटेक' बनाने की है, ताकि युवाओं के लिए फिर से बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा हो सके।</div><div><b>2. युवाओं को 'जॉब क्रिएटर' बनाने की पहल</b></div><div>लघु और मध्यम उद्योगों (MSME) में नई जान फूंकने के लिए राज्य में एक विशेष निगम बनाने की तैयारी है। इसके तहत 'लोकल मैन्युफैक्चरिंग' को बढ़ावा देने और युवाओं को उद्यमी बनाने के लिए 10 लाख रुपये तक की आर्थिक मदद (जिसमें ग्रांट और ब्याज-मुक्त लोन शामिल है) का प्रस्ताव रखा गया है।</div><div><b>3. 'ग्रेटर कोलकाता' और वर्ल्ड-क्लास इंफ्रास्ट्रक्चर</b></div><div>पार्टी के 'सोनार बांग्ला' विजन का सबसे बड़ा हिस्सा है। कोलकाता और उसके आसपास के उपनगरों को मिलाकर एक 'ग्लोबल इंडस्ट्रियल हब' तैयार करना। इसके लिए लॉजिस्टिक खर्च को कम करने और निर्यात को रफ्तार देने पर फोकस है। हल्दिया पोर्ट का आधुनिकीकरण, नए डीप-सी पोर्ट का निर्माण और बेहतरीन रेल-सड़क नेटवर्क बिछाना इस रणनीति का मुख्य हिस्सा है।</div><div><b>4. सिंगूर का नया अध्याय: विशेष औद्योगिक जोन</b></div><div>उद्योग के नाम पर सियासत का केंद्र रहे सिंगूर जैसे इलाकों की तस्वीर बदलने के लिए 'डेडिकेटेड इंडस्ट्रियल पार्क' बनाने का वादा है। इन पार्कों का खाका इस तरह तैयार किया गया है कि एक हिस्सा भारी उद्योगों के लिए और दूसरा हिस्सा MSME के लिए आरक्षित रहे, ताकि दोनों एक-दूसरे के पूरक बन सकें।</div><div><b>5. पलायन रोकना&nbsp;</b></div><div>पिछले 15 सालों में राज्य से उद्योगों के पलायन को रोकने के लिए बीजेपी ने लाल फीताशाही को खत्म कर निवेशकों के लिए 'रेड कार्पेट' बिछाने का भरोसा दिया है। 'सिंगल विंडो क्लीयरेंस', पारदर्शी प्रशासन और स्थिर नीतियों के जरिए प्राइवेट सेक्टर का खोया हुआ विश्वास वापस लाने की योजना है। इसके अलावा, राज्य को भविष्य की अर्थव्यवस्था के लिए तैयार करने के वास्ते आईटी (आईटी) और सेमीकंडक्टर जैसे आधुनिक सेक्टर्स पर भी खास दांव खेला गया है।</div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 04 May 2026 19:16:00 +0530</pubDate>
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      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[10 रुपए का नोट...क्या इस कथित स्कैम की वजह से चुनाव हार जाएंगी ममता बनर्जी? बंगाल में कैसे BJP ने खेला कर दिया]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/will-mamata-banerjee-lose-the-election-because-of-this-alleged-scam]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>पश्चिम बंगाल में मतदान संपन्न हो चुके हैं। अब इंतजार है तो सिर्फ 4 मई का जब नतीजे आएंगे और क्लियर हो जाएगा कि सत्ता में ममता बनर्जी की वापसी होगी या फिर इस बार पश्चिम बंगाल में कमल खिलेगा। लेकिन उससे पहले जो एग्जिट पोल सामने आए हैं, वह कहीं ना कहीं ममता बनर्जी की जमीन हिला रहे हैं। तमाम टीएमसी नेताओं की धड़कनें बढ़ा रहे हैं। और कुछ नेता तो क्या कह रहे हैं टीएमसी के? टीएमसी के नेता कह रहे हैं कि बीजेपी हर बार इस तरीके का माहौल बनाती है और उसका माहौल उल्टा ही साबित होता है। इस बार जो बंगाल में 200 पार का यह लोग बातें कर रहे हैं। इस बार वो बातें हवा-हवाई ही साबित होंगी क्योंकि 4 मई को जो नतीजे आएंगे वो टीएमसी के पक्ष में आएंगे। हालांकि बीजेपी वाले जो हैं वो ये कह रहे हैं कि इस बार ममता बनर्जी के साथ खेला होगा। इस बार बंगाल परिवर्तन चाहता है और इस बार बंगाल में परिवर्तन होगा। देखिए इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ जब बंगाल में बिना किसी हिंसा के बिना किसी मौत के चुनाव संपन्न हुए। क्योंकि हर बार आप देखते थे चुनाव होते थे। जगह-जगह आगजनी की खबरें, हिंसा की खबरें, बूथ लूटने की खबरें सामने आती थी। कई लोगों की मौत तक की खबरें सामने आती थी। लेकिन इस बार जहां बवाल करने की कोशिश की वहां केंद्रीय बलों ने अच्छे से हिसाब किताब कर दिया और उसका नतीजा क्या हुआ? ऐतिहासिक जो मतदान प्रतिशत सामने आया वह रहा है। पिछले चुनाव में 92 से ऊपर रहा और इस बार 91 से ज्यादा मतदान प्रतिशत रहा है। अब&nbsp; एग्जिट पोल का भी जिक्र कर लेते हैं क्योंकि इस बार जो चुनाव के बाद बंगाल के एग्जिट पोल आ रहे हैं वो कहीं ना कहीं बीजेपी की आंधी में ममता बनर्जी को उड़ा रहे हैं। पोल ऑफ एग्जिट पोल्स की जिसमें टीएमसी को 147 सीटें दिखाई गई हैं। जबकि बीजेपी टक्कर देती यहां नजर आ रही है। 137 सीटें बीजेपी को दिखाई गई हैं। वहीं कांग्रेस की बात कर लें तो कांग्रेस सिर्फ दो पर सिमटती नजर आ रही है। चाणक्य का सर्वे भी ममता बनर्जी की धड़कनें बढ़ा रहा है। इस बार चाणक्य के सर्वे में टीएमसी को 130 से 140 सीटें दिखाई गई हैं। बीजेपी को 150 से 160 सीटें दिखाई गई हैं। अगर ये एग्जिट पोल सही साबित हो जाता है 4 तारीख का ये जो एग्जिट पोल है अगर यह 4 तारीख को नतीजों में बदल जाता है तो वाकई में इस बार बंगाल में परिवर्तन होगा कमल खिलेगा ममता की कुर्सी हिल सकती है। राजनीतिक जानकारों की मानें तो बंगाल में इस बार अगर कोई बड़ा उलटफेर हुआ तो उसके पीछे कोयला घोटाला भी एक बड़ी वजह होगा। दरअसल, यही वो घोटाला था जिसकी पहली एफआईआर तो दर्ज हुई कुछ चुनिंदा लोगों पर। लेकिन 6 साल बाद वो जांच पहुंची एक ऐसी कंपनी के दरवाजे तक जो पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी की चुनावी रणनीतिकार है। बात कर रहे हैं पॉलिटिकल कंसलटेंसी फर्म आईपैक की जिसके कर्ताधर्ता कभी खुद प्रशांत किशोर हुआ करते थे। जिसे चलाने वाला एक शख्स फिलहाल जेल में है और बाकी दो भी खुद को बचाने की जुगत में लगे हुए हैं&nbsp; जिन पर जांच एजेंसियों का शिकंजा लगातार कसता जा रहा है। राजनीतिक जानकारों की मानें तो अगर इस बार बंगाल में कोई बड़ा उलटफेर हुआ तो इसकी एक वजह यह कोयला घोटाला भी होगा जिसके चलते आईपैक चारों तरफ से घिरी हुई है। ममता बनर्जी के लिए आईपैक की क्या अहमियत है? इसका अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि जब आईपेक के दफ्तर पर ईडी का छापा पड़ा तो पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खुद आईपैक के दफ्तर पहुंच गई थी।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/after-60-years-a-major-announcement-from-this-country" target="_blank">60 साल बाद इस देश का बड़ा ऐलान, रातों-रात बदली भारत की किस्मत!</a></h3><h2>650 करोड़ के घोटाले को फिल्मी तरीके से दिया गया अंजाम</h2><div>27 नवंबर 2020 की&nbsp;<span style="font-size: 1rem;">तारीख थी और</span><span style="font-size: 1rem;">&nbsp;शाम के करीब 7:00 बज रहे थे। उस वक्त देश की जांच एजेंसी सीबीआई अपने कोलकाता ऑफिस में एक एफआईआर दर्ज कर रही थी। यह एफआईआर थी पश्चिम बंगाल की कोयला कंपनी से जुड़े एक खनन घोटाले को लेकर। शुरुआत में इस एफआईआर में उस कोयला कंपनी के एंप्लाइज, कुछ सुरक्षा अधिकारियों और सीआरपीएफ से लेकर रेलवे से जुड़े लोगों को आरोपी बनाया गया था। तब यह मामला एक नॉर्मल घोटाले जैसा लग रहा था। लेकिन यह मामला गंभीर तब हुआ जब इसमें इनफोर्समेंट डायरेट की भी एंट्री हो गई और उसके बाद जो खुलासा हुआ उसने दिल्ली से लेकर कोलकाता तक सबको चौंका दिया। क्योंकि सीबीआई और ईडी ने यह दावा किया कि यह घोटाला कोई 10 20 करोड़ का नहीं था। यह घोटाला था पूरे ₹650 करोड़ का। इस घोटाले को पूरे फिल्मी तरीके से अंजाम दिया गया था और उगाही का एक ऐसा खुफिया नेटवर्क बनाया गया था जिसमें 10 से ₹20 के नोटों का इस्तेमाल एक कोडेड मैसेज की तरह किया जाता था और अवैध रूप से खुदाई किए गए कोयले को ऐसी कंपनियों के नाम पर भेजा जाता था जिनका कोई रिकॉर्ड ही नहीं था| इस पूरे घोटाले में इकट्ठा किए गए पैसे को गुंडा टैक्स कहा गया जिसके पीछे मास्टरमाइंड था अनूप मांझी उर्फ लाला।&nbsp; जांच एजेंसियों ने इल्जाम लगाए कि इसी घोटाले के पैसे से इस पॉलिटिकल कंसलटेंसी फर्म को उसकी फीस अदा की गई और पैसा इसी एजेंसी के जरिए ब्लैक से व्हाइट किया गया।&nbsp;</span></div><h2>केंद्रीय जांच एजेंसियों के रडार पर ममता सरकार</h2><div>प्रशांत किशोर के अलग होने के बाद से 'आई-पैक' (I-PAC) की पूरी कमान प्रतीक जैन, ऋषिराज सिंह और विनेश चंदेल के हाथों में है। आईआईटी बॉम्बे के पूर्व छात्र और मल्टीनेशनल कंपनी 'डेलॉयट' में एनालिस्ट रहे प्रतीक जैन 2015 में आई-पैक के को-फाउंडर बने थे। पीके के जाने के बाद उन्होंने ही मीडिया की नजरों से दूर रहकर ममता बनर्जी की पार्टी व सरकार के प्रबंधन की पूरी जिम्मेदारी संभाली। इस बीच, ममता सरकार के तीसरे कार्यकाल में शिक्षक भर्ती, मवेशी तस्करी और कोयला घोटाले जैसे भ्रष्टाचार के कई बड़े मामले उजागर हुए, जिससे पूरी सरकार केंद्रीय जांच एजेंसियों के रडार पर आ गई। जांच की यह आंच आई-पैक तक भी पहुंच गई है, क्योंकि एजेंसियों को गहरा शक है कि तृणमूल कांग्रेस के चुनावी अभियानों का प्रबंधन करने के लिए आई-पैक को जो भारी-भरकम रकम दी गई थी, वह वास्तव में कोयला घोटाले से कमाया गया अवैध धन ही है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/now-waiting-for-the-results-after-voting-in-bengal-mamta-tough-test-bjp-hopeful-of-success" target="_blank">West Bengal Elections 2026: पश्चिम बंगाल में मतदान के बाद अब नतीजों का इंतजार, ममता बनर्जी की कड़ी परीक्षा, भाजपा को सफलता की उम्मीद</a></h3><h2>लाला पैड का फर्जी चालान सिस्टम</h2><div>इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, अनूप मांझी (उर्फ लाला) ने अवैध कोयला तस्करी का एक बड़ा नेटवर्क चलाने के लिए 'लाला पैड' नामक फर्जी चालान सिस्टम तैयार किया था। अवैध कोयले से भरे ट्रकों को चेक पोस्ट से सुरक्षित निकालने के लिए ₹10 या ₹20 के नोट का इस्तेमाल 'पासवर्ड' की तरह होता था। नोट का सीरियल नंबर और ट्रक की फोटो व्हाट्सएप के जरिए भ्रष्ट अधिकारियों तक पहुंचाई जाती थी, जिससे ट्रक बिना जांच के पास हो जाते थे। जांच एजेंसियों (ED) के मुताबिक, बंगाल की कुछ कंपनियों को अवैध कोयला बेचकर करीब ₹650 करोड़ की नकदी जुटाई गई। इस काले धन को हवाला ऑपरेटरों के जरिए सफेद धन (White Money) में बदला गया और फिर कथित तौर पर आई-पैक (I-PAC) के माध्यम से इसका इस्तेमाल चुनावी प्रबंधन में किया गया।</div><h2>ईडी की कार्रवाई</h2><div>इसी मामले की जांच और पैसों के लेन-देन (मनी ट्रेल) का पता लगाने के लिए ईडी (प्रवर्तन निदेशालय) ने 8 जनवरी 2026 को कोलकाता के साल्ट लेक स्थित आई-पैक के दफ्तर पर छापेमारी की थी। ममता बनर्जी का सीधा दखल नहीं हुआ। ममता बनर्जी के दखल के साथ ही यह मामला कानूनी के साथ-साथ राजनीतिक रंग भी लेने लगा। जिसने भाजपा और टीएमसी को आमने-सामने लाकर खड़ा कर दिया।</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 30 Apr 2026 14:11:58 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/will-mamata-banerjee-lose-the-election-because-of-this-alleged-scam</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Doval-MBZ की हुई मीटिंग, ठीक 2 दिन बाद UAE ने लिया ऑयल मार्केट को हिलाने वाला फैसला, भारत के लिए सस्ते तेल का रास्ता कैसे खुल रहा है?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/doval-mbz-meeting-took-place-just-two-days-later-uae-took-a-decision-that-shook-the-oil-market]]></guid>
      <description><![CDATA[<div><div>दुबई से खबर आई है जो पूरे ग्लोबल एनर्जी मार्केट को हिला सकती है। यूनाइटेड अरब अमीरात ने ऐलान किया है कि वो ओपक छोड़ रहा है और सिर्फ ओपक नहीं ओपक प्लस भी छोड़ रहा है। यह कोई मामूली खबर नहीं है। यूईई 1967 से यानी 1976 से ओपक का मेंबर है। यानी लगभग 60 साल से वह दुनिया का सातवां सबसे बड़ा तेल प्रोड्यूसर है। ओपक के अंदर सऊदी अरब इराक के बाद तीसरा सबसे बड़ा प्रोड्यूसर माना जाता है यूएई। माना क्या जाता है? है यह सबसे बड़ा प्रोड्यूसर तीसरा। ऐसा देश अगर इस ग्रुप को छोड़ रहा है तो यह एक ऐसी दरार है जो सालों तक भरी नहीं जा सकेगी। यूएई के इस फैसले के बाद इंटरनेशनल ऑयल ट्रेड का क्या होगा? वो एक अलग सवाल है। लेकिन इस फैसले के पीछे कहानी सिर्फ तेल की नहीं है। इसमें ईरान के साथ चल रही जंग है, अमेरिका का दबाव है और साथ ही सऊदी अरब और यूएई के बीच की पुरानी खटास का भी योगदान है। लेकिन इन सब के बीच एक दिलचस्प बात ये है कि दो दिन पहले एनएसए अजीत डोभाल यूएई के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायेद अल नहयान से मिलकर आए थे। इसके साथ&nbsp; काफी चर्चा हो रही है। क्योंकि चर्चा भारत की यूएई के साथ एनर्जी सिक्योरिटी पर हुई थी। तो डेफिनेटली अगर यूएई इतना बड़ा फैसला लेने वाला होगा तो इस पर भी चर्चा हुई होगी और भारत की तरफ से भी कुछ ना कुछ तो जरूर इस पर कहा गया होगा।&nbsp;</div><h2>अजीत डोभाल पहुंचे थे यूएई</h2><div>विशेषज्ञों का मानना है कि यूएई के इस फैसले का असर भारत पर अच्छा पड़ने वाला है। भारत के यूएई के बेहतरीन संबंध हैं। इस फैसले से पहले ही भारत ने बड़ी रणनीतिक पहल करते हुए अपने हाल ही में विदेश मंत्री एस जयशंकर और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल को यूएई के दौरे पर भेजा था। यूएई से बातचीत में रणनीतिक संबंधों को बढ़ाए जाने के साथ-साथ एनर्जी सिक्योरिटी पर भी सार्थक चर्चा हुई थी। यूएई के इंडस्ट्री और एडवांस्ड टेक्नोलॉजी मंत्री सुल्तान अहमद अल जबेर भी एक प्रतिनिधिमंडल के साथ इस साल की शुरुआत में दिल्ली के दौरे पर आए थे। उस वक्त उन्होंने यह ऐलान किया था-ग्लोबल एनर्जी की मांग के मामले में 'भारत अब निर्णायक मुखिया' है। भारत के एनएसए अजीत डोभाल ने हाल ही में अबुधाबी में थे। उन्होंने यूएई के एनर्जी मिनिस्टर और राष्ट्रपति से मुलाकात की थी। भारतीय विदेश मंत्रालय के अनुसार, डोभाल ने यूएई के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायेद अल नहयान से मुलाकात की थी। इस दौरान भारत और यूएई के बीच व्यापक रणनीतिक भागीदारी को और गहरा करने और क्षेत्रीय हालात व साझा हितों के मुद्दों पर भी चर्चा की गई। दोनों नेताओं ने व्यापक रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करने के उपायों, इलाके के हालात और आपसी लाभ के दूसरे मुद्दों पर चर्चा की थी।</div></div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/why-is-the-uae-leaving-opec-should-india-be-happy" target="_blank">UAE OPEC Exit Impact India: यूएई क्यों हो रहा OPEC से बाहर, क्‍या हमें खुश होना चाह‍िए?</a></h3><h2>ओपैक क्या है</h2><div>ऑर्गेनाइजेशन ऑफ द पेट्रोलियम एक्सपोर्टिंग कंट्रीज। हिंदी में कहें तो तेल निर्यात करने वाले देशों का संगठन या समूह। इसकी जो शुरुआत थी वो हुई थी 1960 में बगदाद में जब पांच देशों ने मिलकर इसे बनाया था। ईरान, इराक, कुवैत, सऊदी अरब और वेनेजुएला इसमें शामिल थे। इन देशों का मकसद एक था तेल की कीमतें कैसे तय हो, कितना तेल निकाला जाए, कितना प्रोड्यूस किया जाए, यह फैसला अमेरिका और यूरोप की बड़ी कंपनियों के हाथ से वापस लेकर खुद करना। यूएई 1967 यानी 1976 में इसमें शामिल हुआ। आज ओपेक में 12 देश हैं और दुनिया का करीब 38% तेल यही ग्रुप प्रोड्यूस करता है।&nbsp;</div><h2>ओपक प्लस क्या है?</h2><div>2016 के आसपास ओपेक ने रूस जैसे कुछ बड़े गैर ओपेक तेल उत्पादक देशों के साथ एक एक्सटेंडेड अलायंस बनाया था। इसी को कहा जाता है ओपेक प्लस। यह ग्रुप मिलकर तय करता है कि दुनिया में कितना तेल बेचा जाएगा ताकि कीमतें ना बहुत ज्यादा गिरे और ना बहुत ज्यादा चढ़े। यूएई ने अब इन देशों से नाता तोड़ने का फैसला कर लिया है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/uae-has-announced-its-withdrawal-from-the-oil-producing-groups-opec-and-opec" target="_blank">Iran-Israel War के बीच OPEC को UAE का बड़ा झटका, तेल संगठन से बाहर होने का ऐलान किया</a></h3><div><b>1. तेल कीमतों पर क्या असर?</b></div><div>ओपेक एक 'कार्टल' है जो सप्लाई घटाकर कीमतें ऊंची रखता है। ट्रम्प लंबे समय से ओपेक की आलोचना करते रहे हैं। उनका आरोप है कि यह संगठन तेल की कीमतों को जानबूझकर बढ़ाकर पूरी दुनिया को लूट रहा है। यूएई के बाहर आने से बाजार में सप्लाई बढ़ेगी, जिससे तेल की कीमतें $5 से $10 प्रति बैरल गिर सकती हैं।</div><div><b>2. भारत को कितना फायदा?</b></div><div>भारत सालाना करीब 140 अरब डॉलर का तेल खरीदता है। तेल की कीमत में $1 की कमी से भारत का आयात बिल करीब 10,000 करोड़ कम हो जाता है। यूएई के कदम से भारत सालाना 50,000 से 1 लाख करोड़ बचा सकता है। अगर यूएई ओपेक के कोटा सिस्टम से बाहर होकर तेल उत्पादन को बढ़ाता है, तो इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में कमी आ सकती है। इससे भारत में पेट्रोल और डीजल सस्ता हो सकता है।</div><div><b>3. तेल कंपनियों को क्या लाभ?</b></div><div>जब रिफाइनरियों को कच्चा तेल सस्ता मिलेगा, तो सरकार व तेल कंपनियों के पास कीमतों में कटौती करने की गुंजाइश बढ़ेगी।</div><div><b>4. क्या यूएई डिस्काउंट देगा?</b></div><div>ओपेक से बाहर होने के बाद यूएई मर्जी का मालिक है। वह भारत जैसे 'रणनीतिक साझेदार' को लुभाने के लिए खास डिस्काउंट या लचीली भुगतान शर्तें दे सकता है।</div><div><b>5. होर्मुज बाधित हो तो क्या ? </b></div><div>होर्मुज मार्ग बाधित हो, तो अबू धाबी क्रूड ऑयल पाइपलाइन' अबू धाबी के रेगिस्तान से होते हुए सीधे फुजैरा बंदरगाह तक जाती है। फुजैरा ओमान की खाड़ी के तट पर है। यहां से तेल के टैंकर निकलते ही सीधे अरब सागर में प्रवेश करते हैं। जहाज को होर्मुज पार करने की जरूरत नहीं। फुजैरा से भारत के पश्चिमी तट के बंदरगाहों की दूरी बहुत कम है, जिसे तय करने में टैंकरों को औसतन 3-4 दिन ही लगते हैं।</div><div><b>6. भारत का कोटा सुरक्षित है? </b></div><div>ओपेक में रहते हुए यूएई को अपना उत्पादन कम करना पड़ता था। अब यह बंदिश खत्म हो जाएगी।</div><div><b>7. सऊदी अरब और रूस पर हमारी निर्भरता का क्या होगा?</b></div><div>अभी भारत रूस और सऊदी पर बहुत ज्यादा निर्भर है। यूएई से सप्लाई बढ़ने पर भारत के पास विकल्प बढ़ जाएंगे और वह किसी एक देश के दबाव में नहीं रहेगा।</div><div><b>8. ऐसा पहले क्यों नहीं किया?&nbsp;</b></div><div>पहले तेल बाजार अस्थिर था। ओपेक के साथ रहने से 'सुरक्षा कवच' मिलता था कि कीमतें बहुत ज्यादा नहीं गिरेंगी। अकेले बाहर निकलने पर 'प्राइस वार' का खतरा था। तब यूएई और सऊदी के रिश्ते गहरे थे। सऊदी के नेतृत्व वाले संगठन को छोड़ना दुश्मनी मोल लेने जैसा था।</div><div><b>9. अब क्या बदल गया?&nbsp;</b></div><div>पिछले 2-3 सालों से ओपेक की बैठकों में यूएई और सऊदी में तीखी बहस हो रही थी। यूएई लगातार अपना कोटा बढ़ाने की मांग कर रहा था, जिसे सऊदी अरब खारिज कर देता था। यूएई को ये भी लगा कि जब उस पर हमले हुए या सप्लाई रूट (होर्मुज) में संकट आया, तो ओपेक और खाड़ी के अन्य देशों ने उसका वैसा साथ नहीं दिया जैसा देना चाहिए था। उसे लगा कि संगठन केवल तेल की राजनीति कर रहा है, सुरक्षा पर गंभीरता नहीं।</div><div><b>10.यूएई और सऊदी अरब में मतभेद</b></div><div>ओपेक पर सऊदी अरब का वर्चस्व है। सऊदी अरब ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए ओपेक देशों से उत्पादन कम करने की नीति को मंजूरी दिला दी। इसके अलावा दोनों देशों में यमन और सूडान में सैन्य टकराव और क्षेत्रीय नेतृत्व को लेकर होड़ है। जनवरी 2026 की शुरुआत में, सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन ने यमन के हद्रा मौत प्रांत में यूएई समर्थित सदन ट्रांजिशनल काउंसिल के ठिकानों पर हवाई हमले किए थे। तब सऊदी अरब ने यूएई पर यमन में अलगाववादी समूहों को हथियारों की आपूर्ति करने और अपने देश को अस्थिर करने का आरोप लगाया था।</div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 29 Apr 2026 13:31:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/doval-mbz-meeting-took-place-just-two-days-later-uae-took-a-decision-that-shook-the-oil-market</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[नेता VS जज पहली बार ऐसी लड़ाई, आखिर कोर्ट में ऐसा क्या हुआ? केजरीवाल ने सत्यग्रह का ऐलान कर सबको चौंका दिया!]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/kejriwal-stunned-everyone-by-declaring-a-satyagraha-against-the-judge]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>क्या किसी केस में आरोपी यह कह सकता है कि जज बदलो वरना पेशी के लिए नहीं आऊंगा। जज से यह कह दे कि आप केस से हट जाइए वरना ना मैं पेश होऊंगा ना मेरी तरफ से कोई वकील आएगा। अब तक शायद आपने ऐसा कोई केस देखा सुना नहीं हो। लेकिन दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने साफ कह दिया है कि दिल्ली हाईकोर्ट की जज जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा अगर आबकारी नीति केस से नहीं हटी तो ना ही वह पेश होंगे और ना ही उनके वकील। सवाल है कि क्या हमारी न्याय व्यवस्था इस बात की इजाजत देती है कि कोई वादी हाई कोर्ट के जज के खिलाफ मोर्चा खोल दे। इस तरह पेश होने से ही मना कर दे। और क्या केजरीवाल के पहले किसी और ने ऐसा किया है या केजरीवाल ही कोई नज़र पेश करने जा रहे हैं। पूरे मामले को सिलसिलेवार ढंग से समझते हैं।&nbsp;</div><h2>दिल्ली की एक्साइज पॉलिसी&nbsp;</h2><div>&nbsp;एक्साइज का मतलब है शराब बेचने का सरकारी नियम। साल 2021 में दिल्ली की केजरीवाल सरकार एक नई एक्साइज पॉलिसी लेकर आई थी। बाद में इस पॉलिसी पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे। तत्कालीन उपराज्यपाल विनय कुमार सक्सेना ने सीबीआई जांच के आदेश दिए। सीबीआई मतलब केंद्रीय जांच ब्यूरो। साथ ही ईडी यानी प्रवर्तन निदेशालय ने भी मनी लॉन्ड्रिंग का अलग केस दर्ज किया। इसी मामले में मनीष सिसोदिया लगभग 500 दिन जेल में रहे। केजरीवाल खुद 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान गिरफ्तार हुए और 156 दिन जेल में बिताने के बाद सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिली। फिर आया 27 फरवरी 2026 का दिन। दिल्ली के राउस एवन्यू ट्रायल कोर्ट में एक बड़ा फैसला सुनाया। इस फैसले में अदालत ने केजरीवाल, मनीष सिसोदिया के कविता समेत कुल 23 आरोपियों को डिस्चार्ज कर दिया। डिस्चार्ज का मतलब इन पर मुकदमा चलाने लायक सबूत है ही नहीं। इसलिए केस यहीं खत्म। ट्रायल कोर्ट ने अपने आर्डर में सीबीआई की जांच पर सख्त टिप्पणी की और जांच अधिकारी के खिलाफ विभागीय कार्यवाही की सिफारिश तक कर दी। लेकिन कहानी यहां खत्म नहीं हुई। सीबीआई ने इस डिस्चार्ज ऑर्डर को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी। यह केस जिस जज की बेंच में आया वही हैं जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा। 9 मार्च 2026 को इस मामले की पहली सुनवाई हुई। केजरीवाल और बाकी आरोपियों का कहना है कि इस सुनवाई में सिर्फ सीबीआई मौजूद थी। उनके वकीलों को बुलाया ही नहीं गया और उसी सुनवाई में जस्टिस शर्मा ने प्रथम दृष्ट्या यह पाया कि ट्रायल कोर्ट का आर्डर गलत है। साथ ही जांच अधिकारी के खिलाफ विभागीय कार्यवाही पर रोक लगा दी। ईडी की कारवाई भी टालने को कहा। केजरीवाल का तर्क यह है कि जिस ऑर्डर को बनाने में ट्रायल कोर्ट ने हजारों पन्नों के दस्तावेज पढ़े उसे केवल 5 मिनट की एक तरफा सुनवाई में गलत कैसे कहा जा सकता है? इसके बाद केजरीवाल और पांच और आरोपियों मनीष सिसोदिया, विजय नायर, राजेश जोशी, अरुण रामचंद्रन, पिल्लई और दुर्गेश पाठक ने एक अर्जी दाखिल की। मांग थी कि जस्टिस शर्मा खुद को इस केस से अलग कर लें। इसे कानूनी भाषा में रिकुज़ल कहते हैं। केजरीवाल पक्ष ने तीन मुख्य तर्क रखे। पहला जज के बच्चे केंद्र सरकार के पैनल वकील हैं और इसी केस में सरकार की तरफ से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता पेश हो रहे हैं। दूसरा जस्टिस शर्मा 2022 से 2025 के बीच चार बार अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद के कार्यक्रम में शामिल हुए हैं। यह संगठन आरएसएस से जुड़ा हुआ माना जाता है। तीसरा 9 मार्च के ऑर्डर की भाषा में लगता है कि अदालत ने पहले ही मन बना लिया है। 20 अप्रैल 2026 को जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा का फैसला आया। 115 पेज का यह ऑर्डर रिकुज़ल की मांग को खारिज करता है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/bengal-politics-heats-up-arvind-kejriwal-attacks-bjp" target="_blank">Bengal Politics में उबाल, Arvind Kejriwal का BJP पर हमला- 90 लाख वोट कटने का बदला लेगी जनता</a></h3><h2>केजरीवाल ने अपने लेटर में क्या लिखा</h2><div>दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने 27 अप्रैल को दिल्ली हाईकोर्ट की जज जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा के सामने पेश होने से ही मना कर दिया। जस्टिस स्वर्णकांता को चिट्ठी लिख के कह दिया कि अगर केस की सुनवाई आप करेंगी यानी वह करेंगी तो ना तो केजरीवाल खुद आएंगे ना ही उनकी ओर से कोई वकील आएगा। यह वही एक्साइज पॉलिसी वाला केस है जिसमें 27 फरवरी को अरविंद केजरीवाल को ट्रायल कोर्ट ने बरी कर दिया था। सीबीआई ने हाई कोर्ट में अपील की। मामला जस्टिस स्वर्णकांता की बेंच में पहुंचा। अब केजरीवाल कह रहे हैं कि जस्टिस स्वर्णकांता मामले की सुनवाई करेंगी तो वह कोर्ट नहीं जाएंगे, पेश भी नहीं होंगे। चार पेज के लेटर में केजरीवाल ने 25 पॉइंट्स लिखे हैं। कहा कि वह महात्मा गांधी के सत्याग्रह सिद्धांत का पालन कर रहे हैं। लेटर के दो खास पॉइंट्स आपको बताते हैं जो केजरीवाल के जस्टिस स्वर्णकांता पर आरोप हैं। चिट्ठी का पॉइंट नंबर छह केजरीवाल कहते हैं कि जब मैंने पहले भी केस में जज बदलने की मांग की थी तब भी यह चिंताएं बताई थी। पहला जस्टिस स्वर्णकांता आरएसएस के लीगल संगठन अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद से सार्वजनिक रूप से जुड़ी रही हैं। आरएसएस मौजूदा सरकार की विचारधारा से जुड़ा माना जाता है। राजनीतिक रूप से हम केंद्र की सरकार के विरोधी हैं और विचारधारा के स्तर पर मैं और मेरी पार्टी आरएसएस की सोच से सहमत नहीं है। ऐसे में जब जज साहिबा उनके कार्यक्रमों में बार-बार जाती रही हैं तो मुझे कैसे भरोसा हो कि इस अदालत से मुझे न्याय मिलेगा। पॉइंट नंबर सेवन में केजरीवाल जस्टिस स्वर्णकांता के बच्चों का मुद्दा उठाते हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/will-the-aam-aadmi-party-face-questions" target="_blank">सवालों का सामना करेगी आम आदमी पार्टी?</a></h3><h2>न्याय दिखना चाहिए</h2><div>केजरीवाल ने कहा कि मैं जस्टिस शर्मा का सम्मान करता हूं लेकिन न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि होते हुए दिखना भी चाहिए। ऐसी दुविधा के मौके पर बापू ने हमे सत्याग्रह का रास्ता दिखाया है। केजरीवाल ने कहा कि अगर भविष्य में भी कभी जज स्वर्णकाता के सामने मेरा कोई दूसरा केस आता है जिसमे मेरे विरोध में बीजेपी, केंद्र सरकार या तुषार मेहता नहीं है तो मै उनके समक्ष जरूर पेश होऊगा। आप नेताओ ने केजरीवाल के इस कदम को साहसी कदम बताया। सासद संजय सिंह ने कहा कि आरएसएस के कार्यक्रम में जज स्वर्णकाता शर्मा का कहना कि जब यहां आती हूं, मेरा प्रमोशन हो जाता है, तो उनसे न्याय की उम्मीद क्या की जाए? आप दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष सौरभ भारद्वाज ने कहा कि अरविंद केजरीवाल का यह बेहद साहसी फैसला है, जो व्यवस्था को मजबूत करने में सहायक होगा। आप के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल के दिल्ली शराब नीति मामले में अदालत की कार्यवाही का बहिष्कार करने के अभूतपूर्व फैसले के बाद, देश की न्यायिक प्रणाली की पवित्रता विवादों के घेरे में आ गई है। हाल के एक फैसले को चुनौती देने के लिए सामान्य कानूनी रास्तों का पालन करने के बजाय, केजरीवाल ने जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा को एक निजी पत्र लिखा है, जिसमें उन्होंने स्पष्ट रूप से व्यक्तिगत रूप से या अपने कानूनी वकील के माध्यम से पेश होने से इनकार कर दिया है।&nbsp;</div><h2>हिट एंड रन स्टाइल वाली राजनीति फिर से शुरू</h2><div>अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के खिलाफ मोर्चा खोला। खोला था। आपको याद होगा उनकी सिर्फ सरकार ही नहीं गई। केजरीवाल ने उन्हें नई दिल्ली सीट से हराया भी। नितिन गडकरी पर केजरीवाल ने भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगा दिए थे। दिल्ली में बीजेपी के अध्यक्ष थे सतीश उपाध्याय। उनके खिलाफ केजरीवाल ने भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे। इसे एक तरह से केजरीवाल स्टाइल ऑफ पॉलिटिक्स कहा जाने लगा था जिसमें अंधाधुंध आरोपों की फायरिंग होती थी कि बड़े लोगों से लोहा लो। लेकिन बीते कुछ समय से केजरीवाल इस स्टाइल से थोड़ा परहेज करते नजर आ रहे थे या इसका टैक्टिकल उपयोग करते नजर आ रहे थे। लेकिन लोग कह रहे हैं कि जस्टिस स्वर्णकांता पर सीधे सवाल उठाकर केजरीवाल ने अपने पुराने दिन याद दिला दिए हैं जब वो दिल्ली चुनावों से पहले प्रचार करते हुए कुछ पर्चे दिखाया करते थे।&nbsp;</div><h2>क्या संविधान के खिलाफ सत्याग्रह?</h2><div>इसका राजनीतिक प्रभाव भी उतना ही गहरा है। एकानूनी दिग्गज केजरीवाल की इस रणनीति को एक खतरनाक मिसाल बता रहे हैं।&nbsp; केजरीवाल पर अपनी पसंद का जज चुनने का प्रयास करने का आरोप लगाया। भले ही कोई वादी मुकदमा जीतता हो या हारता हो, किसी भी निराशाजनक आदेश के लिए एकमात्र वैध उपाय उच्च अदालत में औपचारिक चुनौती देना ही है। अदालत शक्तिहीन नहीं है, वह जमानती वारंट के माध्यम से मौजूदगी अनिवार्य कर सकती है, या बहिष्कार के बावजूद मामले की सुनवाई जारी रखने के लिए 'एमिकस क्यूरी' नियुक्त कर सकती है। यह विवाद केजरीवाल द्वारा मौजूदा बेंच पर व्यक्त किए गए अविश्वास से उपजा है। हालांकि, बार काउंसिल के नियम आम तौर पर यह अनिवार्य करते हैं कि वकील उन अदालतों में पेश न हों जहां जज के साथ उनके व्यक्तिगत संबंध हों।&nbsp;</div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 28 Apr 2026 13:18:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/kejriwal-stunned-everyone-by-declaring-a-satyagraha-against-the-judge</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[वो 'गुप्त' शक्ति जिसके आगे नतमस्तक मोदी-शाह, जिसने बंगाल में तैयार की बीजेपी की जीत की ज़मीन?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/secret-force-before-which-modi-and-shah-bow-down-bjp-victory-in-bengal]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>साल 2010 की बात है&nbsp; बंगाल में सीपीएम के शासन का अंतिम दौर चल रहा था और बिमान बोस उस वक्त बहुत बड़े कम्युनिस्ट नेता थे। उनसे एक बार बंगाल में आरएसएस के बारे में पूछा गया। उन्होंने तब कहा कि कोलकाता की इस सड़क को देख लो। इस सड़क पे आरएसएस का एक झंडा नहीं लगेगा। तुम पूरे बंगाल की बात कर रहे हो। 2006 से पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सिर्फ 500 शाखाएं चलती थी। 2011 में 830 हुई जब ममता बनर्जी आई लेकिन अचानक ममता बनर्जी के आते ही आरएसएसएस की शाखाओं में अप्रत्याशित वृद्धि हुई 2024 तक 4540 यानी 500 शाखा से 4540 तक पहुंची है 2024 तक और 2026 के अंत आते-आते 8000 से अधिक शाखाएं। तो जरा सोचिए कि पिछले चंद सालों में बंगाल में किस गति से बढ़ी है आरएसएस और नंबर जो बढ़े हैं शाखाओं की संख्या जो बढ़ी है वो किस गति से बढ़ी है। यही वो साइलेंट फोर्स है जो लोगों को एक से दो से चार लोगों को जोड़ते जोड़ते बंगाल में बीजेपी के पूरे संगठन को खड़ा किया है। नरेंद्र मोदी का भाषण है जिसमें उन्होंने कहा था कि नेता वो असली नेता है ही नहीं जो सुबह की चाय अपने घर में पिए। नेता वो है जो सुबह की चाय किसी दूसरे के घर में पिए। यानी आप हर दिन कहीं ना कहीं किसी घर में बैठे रहते हो। उस घर के परिवार से आपका वास्ता होता है। पहली बार भगाएगा। दूसरी बार बात करेगा। तीसरी बार कुर्सी देगा और तब करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान रसियारी आवत जात के सिल पर पड़त निशान यह होता है संगठन का काम दुनिया में सबसे मुश्किल लोगों को संगठित करना है जिसने यह कर लिया वही अंत में किला फतह करेगा संघ शक्ति कलयुगे यही है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/kuwait-and-israel-open-airspace-flights-to-resume-soon" target="_blank">West Asia से भारतीयों के लिए बड़ी राहत, Kuwait और Israel ने खोला Airspace, जल्द शुरू होंगी उड़ानें</a></h3><h2>पश्चिम बंगाल से RSS का ऐतिहासिक जुड़ाव</h2><div>पश्चिम बंगाल से संघ का पुराना नाता रहा है। यहां 1937 से ही संघ की गतिविधियों का संचालन हो रहा है। राज्य में संघ के पूर्व क्षेत्र के प्रचार प्रमुख जिश्नु बसु के अनुसार, द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान कुछ समय के लिए संघ की गतिविधियां रोकी गईं थीं और उसके बाद दोबारा शुरू कर दी गईं थीं। संघ के दिग्गज नेताओं गुरु गोलवलकर, मोरोपंत पिंगले, विट्ठल राव पतकी, दत्तोपंत ठेंगडे, एकनाथ रानाडे, बाला साहेब देवरस के साथ ही वर्तमान संघ प्रमुख मोहन भागवत का भी पश्चिम बंगाल एक प्रमुख केंद्र रहा है। पश्चिम बंगाल में संघ वैसे तो लगातार अपनी गतिविधियां मजबूत करता आया है। हालांकि पिछले कुछ वर्षों में इसकी गतिविधियों में अभूतपूर्व विस्तार हुआ है।</div><h2>बंगाल में ऐसा कोई ज़िला नहीं है जहाँ RSS के कार्यकर्ता सक्रिय न हों</h2><div>आकलन के अनुसार, पश्चिम बंगाल में ऐसा कोई ज़िला नहीं है जहाँ RSS के कार्यकर्ता सक्रिय न हों, और स्थानीय स्तर पर लोगों तक पहुँच बनाना ही इस प्रयास की रीढ़ है। आंतरिक तौर पर, यह विश्वास है कि भारतीय जनता पार्टी 2021 में जीती गई 77 सीटों की संख्या में सुधार करेगी; मौजूदा अभियान को राज्य में अब तक किया गया सबसे व्यापक संगठनात्मक प्रयास बताया जा रहा है। संघ के भीतर भी ध्यान अगले बड़े चुनावी पड़ाव, यानी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों पर केंद्रित है। ये चुनाव 2027 की शुरुआत में होने हैं, क्योंकि मौजूदा विधानसभा का कार्यकाल मार्च 2027 में समाप्त हो रहा है। इस समय-सीमा को राज्य की चुनावी राजनीति से कहीं ज़्यादा महत्वपूर्ण माना जा रहा है।&nbsp; केंद्र और संगठन के बीच के समीकरण की बात करें तो, संगठनात्मक सूत्रों ने दोनों के बीच उच्च स्तर के तालमेल का ज़िक्र किया है। उनके अनुसार, दोनों के बीच ऐसा कोई टकराव नहीं है जिसका असर शासन-प्रशासन या राजनीतिक दिशा पर पड़ सकता हो। यह तालमेल इस बात से भी ज़ाहिर होता है कि संघ के तंत्र के भीतर सरकार के कामकाज को किस तरह से प्रस्तुत किया जा रहा है। संघ के पदाधिकारियों ने मई 2014 में नरेंद्र मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद से लगातार जारी रक्षा तैयारियों की ओर इशारा किया। उन्होंने कहा कि 'ऑपरेशन सिंदूर' की सफलता, और साथ ही पाकिस्तान स्थित आतंकी ठिकानों पर पहले की गई सीमा-पार की जवाबी कार्रवाइयाँ। ये सभी पिछले एक दशक में हमारी सैन्य क्षमताओं को मज़बूत किए जाने के ही परिणाम हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/will-passengers-luggage-be-charged-at-the-india-nepal-border-ministry-clarified-the-situation" target="_blank">India-Nepal Border | भारत-नेपाल सीमा पर यात्रियों के सामान पर लगेगा शुल्क? विदेश मंत्रालय ने स्थिति की स्पष्ट</a></h3><h2>हर तीसरे महीने में संघ प्रमुख का एक दौरा</h2><div>2021 में विधानसभा चुनाव हुए। ममता बनर्जी को प्रचंड बहुमत मिली। भारतीय जनता पार्टी की सीटें चार से बढ़कर 77 हो गई। जब अचानक इतनी सीटें बढ़ी तो हर किसी का ध्यान ध्यान गया। देश की मीडिया कह रही थी कि बीजेपी बुरी तरह हारी थी। लेकिन भारतीय जनता पार्टी और संघ के लोग कह रहे थे कि हम 4 से 77 पहुंचे हैं। यह अचानक नहीं हुआ। उसके बाद 21 के विधानसभा चुनाव के बाद ठीक 1 साल बाद मोहन भागवत कोलकाता आते हैं और बंगाल का दौरा उनका शुरू होता है और इस चुनाव की घोषणा के एक डेढ़ महीने पहले तक उनके 13 दौरे हो चुके हैं। 13 दौरे हर तीसरे महीने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख लगभग कोलकाता में मौजूद होते थे। मतलब बंगाल के किसी भी हिस्से में मौजूद होते थे। कोलकाता नहीं। और फिर शुरू हुआ संगठन का काम। यह पिछले 4 साल की जो मेहनत है गांव-गांव में, गलियों में वह आज दिख रहा है। 2021 में करीब 1000 ऐसी बूथें थी, बूथ थे जहां पर बीजेपी को पोलिंग एजेंट नहीं मिला था। इस बार चुनाव की घोषणा के 3 महीने पहले तक हर बूथ पर कम से कम दो बैठकें हो चुकी थी।&nbsp;</div><h2>संघ के नजरिए से बंगाल को एक मॉडल स्टेट बनाने की मुहिम</h2><div>राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने राजनीति से नहीं अपने सामाजिक कार्यों से पहचान बनाई है। लोगों में गुडविल पैदा किया है। कुछ जो मुद्दे इन्होंने बताया है कि हर बूथ पे बूथ लेवल पर स्वयंसेवक का डिप्लॉयमेंट जरूर होना चाहिए। हिंदू के वोट हैं वह ऐसे कंसोलिडेट नहीं करेंगे नारे लगाने से नहीं करेंगे। एक भाव जगाना होगा तो उस दिशा में मेहनत किया गया। 4 साल तक 26 तक जब चुनाव की ये घोषणा हुई थी उससे पहले तक बंगाल को एक मॉडल स्टेट संघ के नजरिए से बनाने की कोशिश की गई जिसमें श्याम प्रसाद मुखर्जी का बार-बार जिक्र हो जिसमें विवेकानंद का जिक्र हो, रामकृष्ण परमहंस का जिक्र हो, वहां से चुने गए महापुरुष और उसके उसके बारे में नैरेटिव पूरे देश में बनाया गया कि यह हैं असली महापुरुष। हर समाज के प्रबुद्ध लोगों से संपर्क कर उन्हें जोड़ा गया सामाजिक कार्य में क्योंकि शायद उनमें से बहुत सारे सीधे राजनीति में आने से परहेज करते हैं। यह बारीक काम हुआ है। आज चर्चा भले ही भीड़ की हो रही हो, रैलियों की हो रही हो, लेकिन एक खामोश शक्ति है जो लगभग हर तीसरे घर में घुसकर हर तीसरा हिंदू के घर में घुसकर वो प्रेरित कर रही है कि बंगाल बदलाव मांगता है। बंगाल आमार सुनार बंगला बनना चाहिए। बंगाल की यश कृति जो पहले थी वह दोबारा वापस आनी चाहिए। पलायन रुकना चाहिए।</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 27 Apr 2026 17:05:12 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/secret-force-before-which-modi-and-shah-bow-down-bjp-victory-in-bengal</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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