भगवान राम ने वनवासियों को जोड़ा था राजमहल से

  •  रमेश शर्मा
  •  अक्टूबर 24, 2020   16:36
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भगवान राम ने वनवासियों को जोड़ा था राजमहल से

रामजी का पूरा वनवास काल वनवासियों और गिरिवासियों के बीच ही बीता है। लेकिन ये बीस दिन वे हैं जब रामजी ने वनवासियों और गिरि वासियों को राजमहलों से जोड़ा था। रामजी ने अपना पूरा वनवास काल को इसी कार्य के लिये समर्पित किया है।

विजयादशमी बीत गई है दीपावली की तैयारी आरंभ हो गयी है। दीपावली की तैयारी में घर की साफ सफाई से लेकर खरीददारी तक, घर दुकान प्रतिष्ठान से मंदिरों की सजावट तक, भजन पूजन से सभी मित्रों रिश्तेदारों को शुभकामनाएँ देने तक के काम होते हैं। यह सभी काम केवल त्यौहार की औपचारिकता मात्र नहीं हैं बल्कि इसका उद्देश्य  समाज और संबंधियों जुड़ाव का अभियान है। यह जुड़ाव किसी क्षेत्र विशेष या मनुष्यों तक सीमित नहीं अपितु पशु पक्षियों तक से जुड़ाव, पूरी प्रकृति से जुड़ाव इसका उद्देश्य है। बदलती जीवन शैली में आज भले घर और मुहल्ले से ही नहीं नगरों से भी पशु पक्षी गायब हो रहे लेकिन एक समय था जब भारत के घर घर में पशु पक्षी होते थे उन्हें भी दशहरे से दीपावली तक सजाया संवारा जाता था। भारत में यह परंपरा परंपरा कब प्रारंभ हुई आज कहना मुश्किल है लेकिन इसका विस्तृत विवरण रामायण काल में मिलता है। सृष्टि के एक एक प्राणी से रामजी के जुड़ने और जोड़ने के अनेक प्रसंग मिलते हैं फिर भी विजय दशमी से दीपावली के बीच के बीस दिन उन्होंने इसी काम में लगाये। यह समय वह था जब उन्होंने रावण का उध्दार कर अयोध्या वापसी की थी।

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यूँ तो रामजी का पूरा वनवास काल वनवासियों और गिरिवासियों के बीच ही बीता है। लेकिन ये बीस दिन वे हैं जब रामजी ने वनवासियों और गिरि वासियों को राजमहलों से जोड़ा था। रामजी ने अपना पूरा वनवास काल को इसी कार्य के लिये समर्पित किया है। वे न केवल वनवासियों से स्वयं जुड़े अपितु उन्हे तंग करने या उनका शोषण करने वाले संगठित समूहों का अंत भी किया। ऐसे शोषक संगठित सशस्त्र शोषणकारी समूहों को तब दैत्य असुर या राक्षस के नाम से संबोधित किया जाता था। ऐसा नहीं था कि ये शक्तियां केवल ऋषि आश्रमों का ही विनाश करती थीं। वे समूचे समाज का शोषण करती थीं। संपूर्ण मनुष्य जाति का शोषण करती थीं। वे मनुष्यों की किस प्रकार सामूहिक हत्या करके संपत्तियों को हड़पते थे इन कथाओं से पुराण भरे पड़े हैं। उनकी घोषणाओं से संबंधित कुछ ऋचाएँ ऋग्वेद में भी आईं हैं। राम का पूरा वनवास काल ऐसी शक्तियों से संघर्ष और वनवासियों का जीवन भय मुक्त बनाने में ही बीता। उन्होंने कैसे यह संघर्ष किया और वनवासियों को एक सूत्र में पिरोया, उनसे अपने अटूट संबंध बनायें इसका विवरण रामायण और विभिन्न ग्रंथो में मिलता है। फिर एक समय ऐसा भी आया जब रामजी ने वनवासी समूहों को राज महल से जोड़ा। यह समय विजयदशमी से दीपावली के बीच का ही मिलता है। 

रावण का वध विजयादशमी को हुआ। विभीषण के राज्याभिषेक और सीता की वापसी में तीन दिन और लगे। तीन दिन बाद रामजी लंका से रवाना हुये और दीपावली को अयोध्या लौटे। उन्हें मार्ग में सत्रह दिन लगे। रामजी पुष्पक विमान से लौटे थे। पुष्पक विमान साधारण नहीं था उसकी गति दिव्य थी वह इक्छा शक्ति से चलता था। पुष्पक विमान कुछ क्षणों में ही रामजी को अयोध्या ला सकता था। फिर भी उन्हें मार्ग में सत्रह दिन लगे। वस्तुतः राम जी लौटते समय उन सभी स्थानों पर एक एक दिन रुके जहाँ उन्होंने अयोध्या से श्रीलंका की यात्रा में जाते समय विश्राम किया था लोगों से भेंट की थी या सीता हरण के बाद सहायता ली थी। रामजी के साथ विभीषण सुग्रीव और हनुमान जी भी थे। विभीषण ने आग्रह पूर्वक श्रीलंका के अक्षय खजाने से विनती पूर्वक कुछ भेंट भी की थी। वह सब सामग्री विमान में थी। वनवासियों को सक्षम और समृद्ध बनाने के लिये रामजी ने वह संपत्ति उनके बीच बाँट दी थी। महाराज सुग्रीव और महाराज विभीषण को यह जिम्मेवारी सौंपी कि दंडकारण्य के उस ओर उनके राज्यों की सीमा से लगे वन क्षेत्रों की सुरक्षा के लिये प्रबंध करें जबकि दंडकारण्य के इस ओर के वन क्षेत्र में रहने वालों की सुरक्षा का भार उन्होंने कौशल राज्य को सौंपा। 

रामजी चाहते तो कुछ क्षणों में ही अयोध्या लौट सकते थे लेकिन उनके मन में वनवासियों की व्यथा का दृश्य था जो उन्होंने लंका जाते समय अनुभव किया था। उन्ही समस्याओं के समाधान और राजमहल से वनवासियों को सीधे जोड़ने के लिये उन्होंने लौटने में विभिन्न स्थानों पर पड़ाव डाले और व्यवस्था बनाई। श्रीलंका में भी तीन दिन वे किसी उत्सव में नहीं रुके वहां भी उन्होंने वे तीन दिन वनवासियों और गिरिवासियों के बीच ही बिताये। श्रीलंका केवल एक नगर भर नहीं था वहां भी वन और पर्वत क्षेत्र रहे हैं जिनपर रावण ने बल पूर्वक अधिकार किया और शोषण किया था। रावण लंका का मूल शासक नहीं था अपने सशस्त्र समूह के साथ आया और उसने बल पूर्वक अधिकार किया। रावण का उद्धार करने के बाद उन्होंने इन सब नागरिकों का आत्मविश्वास जगाया उन्हे महाराज विभीषण से जोड़ा। रावण विजय के बाद रामजी नगर में नहीं गये। उन्होंने ये तीन इन्ही काम लगाये।

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दुनिया के प्रत्येक समाज में क्षेत्रीयता का विभाजन होता है। यह विभाजन प्रकृति के गुणों के कारण है। भूमि के हर हिस्से में एक प्रकार के ही फल फूल या फसल नहीं होते। हर पर्वत पर एक सी औषधि नहीं होती। यह विविधता ही व्यक्ति या समाज की जीवन शैली विकसित करती है। इसी आधार पर समूह बनते हैं जो वर्ग या उपवर्ग का रूप ले लेते हैं। समाज जीवन में यह विभाजन आज भी है। वनवासियों और नगरवासियों के उपवर्ग तब भी थे और आज भी हैं। भील गौंड, कोल, कोरकू माढ़िया मुंडा आदि जो उप वर्ग आज हैं, ऐसे उपवर्ग तब भी थे। रामजी सभी वनवासी वर्गों और उपवर्ग के बीच रहे। उनसे जुड़े और लौटते समय उनके मुखियाओं को अपने साथ लिया। उन सबको साथ लेकर ही रामजी अयोध्या लौटे थे। रामजी जानते थे कि जिसप्रकार एक ही वृक्ष की शाखाएं अलग-अलग दिशाओं में फैलती हैं या उसके पके हुये फल से निकला बीज बीज किसी दूसरे स्थान पर पनप जाता है, नया वृक्ष बन जाता है उसी समाज का विस्तार होता है। विश्व की संपूर्ण मानवता का केन्द्रीभूत विन्दु एक ही है। व्यक्ति अपनी रुचि विशेषता के अनुसार कार्य करता है और रहने के लिये स्थान का चयन करता है। भारत में समाज जीवन की व्यवस्था एक चक्र के समान थी व्यक्ति ने वन सै पहले गाँव आया और गाँव से नगर में। अपनी आयु पूरी करके पुनः वन में लौट गया जिसे वानप्रस्थ कहा गया। तब के भारत में शिक्षा, चिकित्सा और अनुसंधान का केन्द्र वन ही हुआ करते थे। वनों में ही ऋषि आश्रम हुआ करते थे। रामजी पुनः सबको एक सूत्र पिरोया। 

अयोध्या लौटते समय उनके पुष्पक विमान में निषाद, किरात, केवट आदि सभी वनवासी समूहों के प्रतिनिधि और ऋषि आश्रमों के प्रतिनिधि भी अयोध्या आये थे जो रामजी के राज्याभिषेक तक अयोध्या में अतिथि के रूप में रहे। रामजी के राज्याभिषेक के समय बैठने की व्यवस्था का वर्णन भी ग्रंथो में मिलता है। उनकी दाईं ओर ऋषि कुल, बाईं ओर वनवासी और गिरिवासी प्रतिनिधि तथा सम्मुख सामान्य नगरवासी बैठे थे। राज्याभिषेक का यह दिवस ही दीपावली का था। समय के साथ परंपरा में कुछ परिवर्तन तो आये पर मूल भाव नहीं बदला आज भी दीवाली उत्सव में प्रत्येक वर्ग और व्यक्ति का जुड़ाव होता है। वह श्रम के रूप में हो, सहयोग के रूप में हो या पूजन परंपरा में हो कोई नहीं छूटता। कोई फल लाता है, कोई फूल, कोई मिट्टी के दिये लाता है कोई तेल घी, कोई रुई की बाती लाता है कोई कपड़े सिलता है कोई पुताई करता है तो कोई सफाई। कोई पूजन सामग्री लाता है तो पूजन करता है। एक एक व्यक्ति जुड़ता है।

यह ठीक है कि भारत की समाज व्यवस्था में समय के साथ कुछ बुराइयाँ जुड़ गयीं लेकिन यह भारत और भारतीयों के कारण नहीं अपितु यह उस गहन अंधकार के कारण आईं जो परतंत्रता के कारण हजार वर्ष तक गहराया रहा। लेकिन अब हम स्वतंत्रता के धवल प्रकाश में हैं हमें उस अंधकारमयी समय में फैलाये गये भ्रम से ऊपर उठना है, उसका प्रतिकार करना है और अपनी मूल परंपराओं के सत्य को समझना है। भारतीय समाज जीवन में वह वन वासी हो, गिरिवासी हो, ग्रामवासी हो या नगर वासी हो सब एक ही वृक्ष की शाखायें हैं। कोई किसी से पृथक् नहीं सब एक दूसरे के पूरक हैं। सबको मिला कर ही हमारा राष्ट्र जीवन सशक्त होगा। यही अभियान रामजी ने चलाया था और विजयादशमी से दीपावली तक के बीस दिन इसी ध्येय के लिये समर्पित किये थे।

रमेश शर्मा 

वरिष्ठ स्तंभकार







भारतीय संत परम्परा और संत-साहित्य के महान हस्ताक्षर हैं संत रैदास

  •  ललित गर्ग
  •  फरवरी 27, 2021   12:11
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भारतीय संत परम्परा और संत-साहित्य के महान हस्ताक्षर हैं संत रैदास

महान संत, समाज सुधारक, साधक और कवि रैदास ने जीवनपर्यन्त छुआछूत, ऊंच-नीच, जातिवाद जैसी कुरीतियों का विरोध करते हुए समाज में फैली तमाम बुराइयों के खिलाफ पुरजोर आवाज उठाई और उन कुरीतियों के खिलाफ निरन्तर कार्य करते रहे।

महामना संत रैदास भारतीय संत परम्परा और संत-साहित्य के महान् हस्ताक्षर है, दुनियाभर के संत-महात्माओं में उनका विशिष्ट स्थान है। क्योंकि उन्होंने कभी धन के बदले आत्मा की आवाज को नहीं बदला तथा शक्ति और पुरुषार्थ के स्थान पर कभी संकीर्णता और अकर्मण्यता को नहीं अपनाया। ऐसा इसलिये संभव हुआ क्योंकि रैदास अध्यात्म की सुदृढ़ परम्परा के संवाहक भी थे। वे निर्गुण रंगी चादरिया रे, कोई ओढ़े संत सुजान को चरितार्थ करते हुए सद्भावना और प्रेम की गंगा को प्रवाहित किया। मन चंगा तो कठौती में गंगा, यह संत शिरोमणि रैदासजी के द्वारा कहा गया अमर सूक्ति भक्ति दोहा है। जिसमें उनकी गंगा भक्ति को सरलता से समझा जा सकता है। हिंदू धर्म के अनुसार कोई भी इंसान जात-पांत से बड़ा या छोटा नहीं होता। अपितु मन, वचन और कर्म से बड़ा या छोटा होता हैं। संत शिरोमणि रैदासजी जात से तो मोची थे, लेकिन मन, कर्म और वचन से संत थे। उनके भक्त रैदासी कहलाते हैं। 

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सद्गुरु स्वामी रामानन्दजी के बारह शिष्यों में से एक रैदासजी के जीवन में गंगा भक्ति से जुड़े अनेक घटना एवं प्रसंग है। जिनसे स्पष्ट होता है कि उनके जीवन निर्माण, उनकी भक्ति, उनकी धर्म-साधना, उनकी कर्म-साधना एवं साहित्य साधना में गंगा का अलौकिक एवं अनूठा महत्व एवं प्रभाव रहा है। संत कवि रैदास कबीरदास के गुरु भाई थे। गुरु भाई अर्थात् दोनों के गुरु स्वामी रामानंदजी थे। संत रैदास का जन्म लगभग 600 वर्ष पूर्व माघ पूर्णिमा के दिन काशी में हुआ था। मोची कुल में जन्म लेने के कारण जूते बनाना उनका पैतृक व्यवसाय था और इस व्यवसाय को ही उन्होंने भक्ति-साधना एवं ध्यान विधि बना डाला। कार्य कैसा भी हो, यदि आप उसे ही परमात्मा का ध्यान बना लें तो मोक्ष सरल हो जाता है। रैदासजी अपना काम पूरी निष्ठा और ध्यान से करते थे। इस कार्य में उन्हें इतना आनंद आता था कि वे मूल्य लिए बिना ही जूते लोगों को भेंट कर देते थे। रैदासजी के उच्च आदर्श और उनकी वाणी, भक्ति एवं अलौकिक शक्तियों से प्रभावित होकर अनेक राजा-रानियों, साधुओं-महात्मा तथा विद्वज्जनों ने उनको सम्मान दिया है। वे मीरा बाई के गुरु भी थे। रैदासजी श्रीराम और श्रीकृष्ण भक्त परंपरा के कवि और संत माने जाते हैं। उनके प्रसिद्ध दोहे आज भी समाज में प्रचलित हैं जिन पर कई धुनों में भजन भी बनाए गए हैं। जैसे, प्रभुजी तुम चंदन हम पानी- इस प्रसिद्ध भजन को सभी जानते हैं।

महान संत, समाज सुधारक, साधक और कवि रैदास ने जीवनपर्यन्त छुआछूत, ऊंच-नीच, जातिवाद जैसी कुरीतियों का विरोध करते हुए समाज में फैली तमाम बुराइयों के खिलाफ पुरजोर आवाज उठाई और उन कुरीतियों के खिलाफ निरन्तर कार्य करते रहे। समस्त भारतीय समाज को भेदभाव से ऊपर उठकर मानवता और भाईचारे की सीख देने वाले 15वीं सदी के महान समाज सुधारक संत रैदासजी को जो चेतना प्राप्त हुई, वह तन-मन के भेद से प्रतिबद्ध नहीं है, मुक्त है। उन्हें जो साधना मिली, वह सत्य की पूजा नहीं करती, शल्य-चिकित्सा करती है। सत्य की निरंकुश जिज्ञासा ही उनका जीवन-धर्म रहा है। वही उनका संतत्व रहा। वे उसे चादर की भाँति ओढ़े हुए नहीं हैं बल्कि वह बीज की भाँति उनके अंतस्तल से अंकुरित होता रहा है। उनका जन्म ऐसे विकट समय में हुआ था, जब समाज में घोर अंधविश्वास, कुप्रथाओं, अन्याय और अत्याचार का बोलबाला था, धार्मिक कट्टरपंथता चरम पर थी, मानवता कराह रही थी। उस जमाने में मध्यमवर्गीय समाज के लोग कथित निम्न जातियों के लोगों का शोषण किया करते थे। ऐसे विकट समय में समाज सुधार की बात करना तो दूर की बात, उसके बारे में सोचना भी मुश्किल था लेकिन जूते बनाने का कार्य करने वाले संत रैदास ने आध्यात्मिक ज्ञान अर्जित करने के लिए समाधि, ध्यान और योग के मार्ग को अपनाते हुए असीम ज्ञान प्राप्त किया और अपने इसी ज्ञान के जरिये पीड़ित मानवता, समाज एवं दीन-दुखियों की सेवा कार्य में जुट गए। उन्होंने अपनी सिद्धियों के जरिये समाज में व्याप्त आडम्बरों, अज्ञानता, झूठ, मक्कारी और अधार्मिकता का भंडाफोड़ करते हुए समाज को जागृत करने और नई दिशा देने का प्रयास किया।

‘रैदास’ के नाम से चर्चित इस अलौकिक संत चेतना का मूल नाम रविदास है। जूते बनाने के कार्य से उन्हें जो भी कमाई होती, उससे वे संतों की सेवा किया करते और उसके बाद जो कुछ बचता, उसी से परिवार का निर्वाह करते थे। एक दिन रैदास जूते बनाने में व्यस्त थे कि तभी उनके पास एक ब्राह्मण आया और उनसे कहा कि मेरे जूते टूट गए हैं, इन्हें ठीक कर दो। रैदास उनके जूते ठीक करने लगे और उसी दौरान उन्होंने ब्राह्मण से पूछ लिया कि वे कहां जा रहे हैं? ब्राह्मण ने जवाब दिया, ‘‘मैं गंगा स्नान करने जा रहा हूं पर चमड़े का काम करने वाले तुम क्या जानो कि इससे कितना पुण्य मिलता है?’’ इस पर रैदास ने कहा कि आप सही कह रहे हैं ब्राह्मण देवता! हम नीच और मलिन लोगों के गंगा स्नान करने से गंगा अपवित्र हो जाएगी। जूते ठीक होने के बाद ब्राह्मण ने उसके बदले उन्हें एक कौड़ी मूल्य देने का प्रयास किया तो संत रैदास ने कहा कि इस कौड़ी को आप मेरी ओर से गंगा मैया को ‘रविदास की भेंट’ कहकर अर्पित कर देना।

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ब्राह्मण गंगाजी पहुंचा और स्नान करने के पश्चात् जैसे ही उसने रैदास द्वारा दी गई मुद्रा यह कहते हुए गंगा में अर्पित करने का प्रयास किया कि गंगा मैया रैदास की यह भेंट स्वीकार करो, तभी जल में से स्वयं गंगा मैया ने अपना हाथ निकालकर ब्राह्मण से वह मुद्रा ले ली और मुद्रा के बदले ब्राह्मण को एक सोने का कंगन देते हुए वह कंगन रैदास को देने का कहा। सोने का रत्नजड़ित अत्यंत सुंदर कंगन देखकर ब्राह्मण के मन में लालच आ गया और उसने विचार किया कि घर पहुंचकर वह यह कंगन अपनी पत्नी को देगा, जिसे पाकर वह बेहद खुश हो जाएगी। पत्नी ने जब वह कंगन देखा तो उसने सुझाव दिया कि क्यों न रत्नजड़ित यह कंगन राजा को भेंट कर दिया जाये, जिसके बदले वे प्रसन्न होकर हमें मालामाल कर देंगे। पत्नी की बात सुनकर ब्राह्मण राजदरबार पहुंचा और कंगन राजा को भेंट किया तो राजा ने ढ़ेर सारी मुद्राएं देकर उसकी झोली भर दी। राजा ने प्रेमपूर्वक वह कंगन अपनी महारानी के हाथ में पहनाया तो महारानी इतना सुंदर कंगन पाकर इतनी खुश हुई कि उसने राजा से दूसरे हाथ के लिए भी वैसे ही कंगन की मांग की।

राजा ने ब्राह्मण से वैसा ही एक और कंगन लाने का आदेश देते हुए कहा कि अगर उसने तीन दिन में कंगन लाकर नहीं दिया तो वह दंड का पात्र बनेगा। राजाज्ञा सुनकर बेचारे ब्राह्मण के होश उड़ गए। ब्राह्मण रैदास के पास पहुंचा और उन्हें सारे वृत्तांत की विस्तृत जानकारी दी। रैदासजी ने उनसे नाराज हुए बगैर कहा कि तुमने मन के लालच के कारण कंगन अपने पास रख लिया, इसका पछतावा मत करो। रही बात राजा को देने के लिए दूसरे कंगन की तो तुम उसकी चिंता भी मत करो, गंगा मैया तुम्हारे मान-सम्मान की रक्षा करेंगी। यह कहते हुए उन्होंने अपनी वह कठौती (चमड़ा भिगोने के लिए पानी से भरा पात्र) उठाई, जिसमें पानी भरा हुआ था और जैसे ही गंगा मैया का आव्हान करते हुए अपनी कठौती से जल छिड़का, गंगा मैया वहां प्रकट हुई और रैदासजी के आग्रह पर उन्होंने रत्नजड़ित एक और कंगन उस ब्राह्मण को दे दिया। इस प्रकार खुश होकर ब्राह्मण राजा को कंगन भेंट करने चला गया और रैदासजी ने उसे अपने बड़प्पन का जरा भी अहसास नहीं होने दिया।

मीराबाई के आमंत्रण पर संत रैदासजी चित्तौड़गढ़ आ गये लेकिन यहां भी उनकी गंगा भक्ति तनिक भी कम नहीं हुई। वहीं पर उनका 120 वर्ष की आयु में निर्वाह हुआ। भारतीय सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक परिवेश में संत रैदासजी गंगा भक्ति इतिहास में एक अमिट आलेख है। 

- ललित गर्ग







तारापुर शहीद दिवस: जब 34 लोगों की शहादत पाकर तारापुर थाना पर लहराने लगा तिरंगा

  •  कमलेश पांडेय
  •  फरवरी 24, 2021   11:21
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तारापुर शहीद दिवस: जब 34 लोगों की शहादत पाकर तारापुर थाना पर लहराने लगा तिरंगा

1932 की इस घटना ने उन दिनों एक बार फिर 13 अप्रैल 1919 को अमृतसर के जलियांवाला बाग गोलीकांड की बर्बरता की याद ताजा कर दी थी। तभी से हर साल तारापुर शहीद दिवस प्रत्येक वर्ष 15 फरवरी को मनाया जाता है।

# "उस दिन तिरंगा फहराने पर अंग्रेजी अफसरों ने चलवा दी अंधाधुंध गोलियां, जिससे लगभग तीन दर्जन लोग शहीद हो गए थे"

फरवरी का महीना भारतीयों के स्वाभिमान और आन बान शान का प्रतीक है। इसी महीने की 15 फरवरी 1932 को बिहार के मुंगेर जिला के तारापुर वासियों ने अपने अदम्य साहस और राष्ट्रप्रेम का परिचय देते हुए वह कुर्बानी दी, जिस पर राष्ट्र का बच्चा-बच्चा गौरव करता आया है। वैसे तो देश प्रेम में निजी अथवा सामूहिक कुर्बानी देने के अनेक उदाहरण मौजूद हैं, लेकिन तारापुर गोली कांड ने पूर्वी भारत में स्वतंत्रता प्रेम की जो अलख जगाई, उसने महज 15 साल बाद ही 15 अगस्त 1947 के शुभ मुहूर्त को और ज्यादा संभव बना दिया। वैसे तो बचपन से ही तारापुर शहीद स्मारक का दीदार करता आया हूँ जिसे भारतवासियों को यह प्रेरणा मिलती है कि भारत माता के स्वाभिमान की रक्षा के लिए और राष्ट्रध्वज तिरंगा के सम्मान के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देने का वैसा ही जज्बा हमारे दिल में होना चाहिए, जैसा कि हमारे अमर शहीदों ने वक्त वक्त पर प्रदर्शित किया है। 

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यूं तो तारापुर शहीद दिवस के बारे में सभी जानते हैं, लेकिन इतिहास के पन्नों में आज से लगभग 9 दशक पहले क्या हुआ था, शायद कई लोग आज भी इससे अनजान होंगे। दरअसल, आजादी के लिए देश के कोने-कोने में लड़ी गई लड़ाइयां समय-समय पर कहानी और किताबों के माध्यम से सामने आती रही हैं। तारापुर के शहीदों की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मन की बात कार्यक्रम में बिहार राज्य में स्थिति मुंगेर जिले के तारापुर के शहीदों का जिक्र किया था। जिससे इस घटना को एक बार पुनः चर्चा में आने का मौका मिला है। इस बात में कोई दो राय नहीं कि तिब्बत सीमा पर 2020 की गलवान घाटी शहादत देने के पीछे भी हमारे देश के सैनिकों के समक्ष ऐसी ही गिनी चुनी घटनाओं से मिली प्रेरणाएं शामिल हैं। इसलिए हम सभी का यह पुनीत कर्तव्य है कि 15 अगस्त और 26 जनवरी जैसे राष्ट्रीय पर्व के मौके पर ऐसे बलिदान स्थलों पर वैसा स्वाभिमान रक्षा पर्व मनाएं कि भावी पीढ़ियों के लोग न केवल उस पर गौरव कर सकें, बल्कि वक्त आने पर वैसा ही उदाहरण प्रस्तुत करने का मौका मिलने पर कतई नहीं हिचकिचाएं। राष्ट्र की सीमाओं की रक्षा के लिए और देश में आतंकवाद, नक्सलवाद और अंडरवर्ल्ड की कारगुजारियों से लोहा लेते हुए हमारे वीर जवानों ने और आम वीर पुरुषों ने जो शहादत दी है, उसी से स्थापित अमन-चैन के माहौल में हमलोग सांस ले पा रहे हैं, अन्यथा गुलामी की घुटन महसूस करनी हो तो इतिहास के पन्ने पलट लें।

बता दें कि पीएम मोदी ने 31 जनवरी 2021 को मन की बात कार्यक्रम में कहा, "इस वर्ष भारत अपनी आजादी के, 75 वर्ष का समारोह- अमृत महोत्सव शुरू करने जा रहा है। ऐसे में यह हमारे उन महानायकों से जुड़ी स्थानीय जगहों का पता लगाने का बेहतरीन समय है, जिनकी वजह से हमें आजादी मिली। साथियों, हम आजादी के आंदोलन और बिहार की बात कर रहें हैं, तो, मैं, NaMo App पर ही की गई एक और टिप्पणी की भी चर्चा करना चाहूंगा। मुंगेर के रहने वाले एक समाजसेवी ने मुझे तारापुर शहीद दिवस के बारे में लिखा है। 15 फरवरी 1932 को, देशभक्तों की एक टोली के कई वीर नौजवानों की अंग्रेजों ने बड़ी ही निर्ममता से हत्या कर दी थी। उनका एकमात्र अपराध यह था कि वे ‘वंदे मातरम’ और ‘भारत मां की जय’ के नारे लगा रहे थे। मैं उन शहीदों को नमन करता हूं और उनके साहस का श्रद्धापूर्वक स्मरण करता हूं।" 

# ......तब अंग्रेजी अफसरों के सामने ही थाने पर फहरा दिया तिरंगा और हंसते हंसते मौत को गले लगा लिया

मसलन, 1930 के दशक में तत्कालीन ब्रिटिश हुकूमत से आजादी के लिए देश के कोने-कोने से स्वतंत्रता आंदोलन की चिंगारी निकल रही थी। उनमें से एक बिहार राज्य के मुंगेर के तारापुर भी है। जहां 15 फरवरी की दोपहर में क्रांतिवीरों का जत्था घरों से बाहर निकला। क्रांतिवीरों का दल तारापुर तत्कालीन ब्रिटिश थाना पर राष्ट्रीय झंडा फहराने के लिए तिरंगा हाथों में लिए बेखौफ बढ़ते जा रहे थे और उनका मनोबल बढ़ाने के लिए जनता खड़ी होकर भारत माता की जय, वंदे मातरम आदि का जयघोष कर रही थी। तभी मौके पर मौजूद कलेक्टर ई ओली व एसपी डब्लू. एस. मैग्रेथ ने निहत्थे स्वतंत्रता सेनानियों पर अंधाधुंध गोलियां चलवा दीं। गोलियां चलती रहीं और आजादी के दीवाने वहां से हिले तक नहीं। देखते ही देखते 34 लोगों की शहादत के बीच धावक दल के मदन गोपाल सिंह, त्रिपुरारी सिंह, महावीर सिंह, कार्तिक मंडल, परमानन्द झा ने ब्रिटिश थाने पर तिरंगा फहरा दिया। अंग्रेजी हुकूमत की इस बर्बर कार्रवाई में 34 स्वतंत्रता प्रेमी शहीद हुए। हालांकि विद्रोह को दबाने के लिए आनन-फानन में अंग्रेजों ने कायरतापूर्वक वीरगति को प्राप्त कई सेनानियों के शवों को वाहन में लदवाकर सुल्तानगंज भिजवाकर गंगा में बहवा दिया था।

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1932 की इस घटना ने उन दिनों एक बार फिर 13 अप्रैल 1919 को अमृतसर के जलियांवाला बाग गोलीकांड की बर्बरता की याद ताजा कर दी थी। तभी से हर साल तारापुर शहीद दिवस प्रत्येक वर्ष 15 फरवरी को मनाया जाता है। इतिहासकार डी सी डीन्कर ने अपनी किताब "स्वतंत्रता संग्राम में अछूतों का योगदान" में भी तारापुर की इस घटना का जिक्र किया है। इसके अलावा, लोक श्रुतियों, लोक गीतों, स्थानीय पुस्तकों, पत्र-पत्रिकाओं में भी इस घटना के बारे में विस्तृत जानकारियां मौजूद हैं। इस पर कई शोध भी हो चुके हैं, लेकिन आधुनिक परिवेश के मद्देनजर इस पर नए सिरे से शोध होना चाहिए, ताकि राष्ट्रप्रेम के साथ साथ सामाजिक सद्भावना को भी बढ़ावा मिले, जिसका अकाल पड़ता जा रहा है।

- कमलेश पांडेय

वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार







वैज्ञानिकों ने जारी की मंगल ग्रह पर उतरते रोवर की पहली तस्वीर, देखनें के लिए यहां क्लिक करें

  •  प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क
  •  फरवरी 20, 2021   14:34
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वैज्ञानिकों ने जारी की मंगल ग्रह पर उतरते रोवर की पहली तस्वीर, देखनें के लिए यहां क्लिक करें

दुनिया ने शुक्रवार को मंगल ग्रह पर उतरते रोवर की पहली तस्वीर देखी। नासा ने लाल ग्रह के धूल भरे सतह पर उतरते रोवर की ‘विस्मित’ करने वाली तस्वीर जारी की। यह तस्वीर ‘पर्सविरन्स’ रोवर के मंगल ग्रह पर प्राचीन नदी के डेल्टा पर उतरने के 24 घंटे से भी कम समय में जारी की गई है।

केप केनावेरल (फ्लोरिडा)। दुनिया ने शुक्रवार को मंगल ग्रह पर उतरते रोवर की पहली तस्वीर देखी। नासा ने लाल ग्रह के धूल भरे सतह पर उतरते रोवर की ‘विस्मित’ करने वाली तस्वीर जारी की। यह तस्वीर ‘पर्सविरन्स’ रोवर के मंगल ग्रह पर प्राचीन नदी के डेल्टा पर उतरने के 24 घंटे से भी कम समय में जारी की गई है। यह रोवर प्राचीन जीवन के निशान को तलाश करेगा एवं एक दशक में धरती पर लाल ग्रह के चट्टान के प्रमाणिक नमूनों को लाने का भी प्रयास करेगा। नासा ने इस अंतरिक्ष यान में तस्वीर लेने के लिए 25 कैमरे लगाए गए हैं जबकि आवाज रिकॉर्ड करने के लिए दो माइक्रोफोन भी इसमें लगे हैं जिनमें से कई ने बृहस्पतिवार को सतह पर उतरने के दौरान काम करना शुरू दिया है।

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रोवर ने दो मीटर की दूरी से जमीन की असामान्य तौर पर बहुत साफ तस्वीर भेजी है जिसमें वह केबल के जरिये स्काई क्रेन से जुड़ा हुआ है और रॉकेट इंजन की वजह से लाल धूल उड़ रही है। कैलिफोर्निया के पेसाडेना स्थित नासा के जेट प्रोपल्शन लेबोरेटरी ने वादा किया है आने वाले कुछ दिनों में और तस्वीरें जारी की जाएंगी और संभवत: रोवर के उतरने के दौरान रिकॉर्ड आवाज भी सुनने को मिलेगी। फ्लाइट सिस्टम इंजीनियर एरन स्तेहुरा ने संवाददाता सम्मेलन में कहा, ‘‘ यह कुछ ऐसा है जिसे हमने पहले कभी नहीं देखा। यह चौंका देने वाली थी, टीम विस्मित थी। वहां जीत का भाव था कि हम इन तस्वीरों को कैद करने में सक्षम हुए और दुनिया के साथ साझा किया।’’ चीफ इंजीनियर एडम स्टेल्टज्नर ने कहा कि तस्वीर ‘खास’ है।

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जमीनी परिचालन की रणनीतिक मिशन प्रबंधक पॉवलिन ह्वांग ने कहा कि अबतक कई तस्वीरें मिली हैं। उन्होंने कहा, ‘‘टीम शुरुआती तस्वीरों को देख खुशी से झूम उठी।’’ उप परियोजना वैज्ञानिक कैटी स्टाक मॉर्गन ने कहा कि तस्वीर इतने स्पष्ट हैं कि शुरुआत में उन्हें लगा कि वे एनिमेशन हैं। गौरतलब है कि पिछले सात महीने में मंगल के लिए यह तीसरी यात्रा है। इससे पहले संयुक्त अरब अमीरात और चीन के एक-एक यान भी मंगल के पास की कक्षा में प्रवेश कर गए थे।

वैज्ञानिकों का मानना है कि अगर कभी मंगल ग्रह पर जीवन रहा भी था तो वह तीन से चार अरब साल पहले रहा होगा। ‘पर्सविरन्स’ नासा का अब तक का सबसे बड़ा रोवर है और 1970 के दशक के बाद से अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी का यह नौवां मंगल अभियान है। चीन ने अपने मंगल अभियान के तहत ‘तियानवेन-1’ पिछले साल 23 जुलाई को लाल ग्रह रवाना किया था। यह 10 फरवरी को मंगल की कक्षा में पहुंचा। इसके लैंडर के यूटोपिया प्लैंटिया क्षेत्र में मई 2021 में उतरने की संभावना है। यूएई का मंगल मिशन ‘होप’ भी इस महीने मंगल की कक्षा में प्रवेश कर गया है।





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