Gyan Ganga: भगवान दूसरों के हित के लिए ही इस धरती पर लेते हैं अवतार

  •  आरएन तिवारी
  •  जनवरी 15, 2021   16:50
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Gyan Ganga: भगवान दूसरों के हित के लिए ही इस धरती पर लेते हैं अवतार

भगवान ने बड़ी विलक्षण बात कही है। अपने लिए कोई कर्तव्य न होने पर भी भगवान दूसरों के हित के लिए इस धरती पर अवतार लेते हैं और सज्जनों का उद्धार, दुर्जनों का विनाश तथा धर्म की स्थापना करने के लिए कर्म करते हैं।

सज्जनों! श्रीमद्भगवत गीता केवल श्लोकों का पुंज नहीं है। श्लोक होते हुए भी भगवान की वाणी होने से ये मंत्र भी हैं। इन मंत्र रूपी श्लोकों में बहुत गहरा अर्थ भरा हुआ है जो समस्त मानव जाति के लिए अत्यंत उपयोगी है।

आइए ! गीता प्रसंग में चलें--- पिछले अंक में भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन के मन में उत्पन्न शंका का समाधान करते हुए कर्मयोग करने का उपदेश दिया था। इस जगत में कर्म ही प्रधान है, कर्म की प्रधानता को देखकर ही गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में कहा—

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कर्म प्रधान विश्व करि राखा, जो जस करहि सो तस फल चाखा।

श्री भगवान उवाच

यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।

स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥ 

आगे भगवान कहते हैं- हे अर्जुन! महापुरुष जो-जो आचरण करता है, सामान्य मनुष्य भी उसी का ही अनुसरण करते हैं, वह श्रेष्ठ-पुरुष जो कुछ आदर्श प्रस्तुत कर देता है, समस्त संसार भी उसी का अनुसरण करने लगता है। 

इंसान के कर्तव्य कर्म का असर देवताओं पर भी पड़ता है और वे भी अपने कर्तव्य कर्म में संलग्न हो जाते हैं। 

इस विषय में एक दृष्टांत है- चार किसान बालक थे। आषाढ़ का महीना आने पर भी वर्षा नहीं हुई तो उन्होंने विचार किया कि हल चलाने का समय आ गया है, वर्षा नहीं हुई तो न सही, हम तो समय पर अपने कर्तव्य का पालन कर दें। ऐसा सोचकर उन्होंने खेत में जाकर हल चलाना शुरू कर दिया। मोरों ने उनको हल चलाते देखा तो सोचा कि क्या बात है? वर्षा तो अभी हुई नहीं, फिर 

ये हल क्यों चला रहे हैं? जब उनको पता लगा कि ये अपने कर्तव्य का पालन कर रहे हैं, तब उन्होंने विचार किया कि हम अपने कर्तव्य पालन में पीछे क्यों रहें? ऐसा सोचकर मोर भी बोलने लगे। अब मेघों (बादलों) ने विचार किया, हमारी गर्जना सुने बिना मोर कैसे बोल रहे हैं? सारी बात पता लगने पर उन्होंने भी सोचा कि हम अपने कर्तव्य से क्यों हटें? उन्होंने भी गर्जना करनी शुरू कर दी। अब मेघों की गर्जना सुनकर इंद्र ने सोचा कि बात क्या है? जब इंद्र को मालूम हुआ कि वे अपने कर्तव्य का पालन कर रहे हैं, तब इंद्र ने भी अपने कर्तव्य-पालन का निश्चय किया और मेघों को वर्षा करने की आज्ञा दे दी।    

यह है, कर्म का प्रभाव। जब प्रत्येक व्यक्ति अहंकार छोड़कर अपने-अपने कर्तव्य का पालन करता है, तब परिवार, समाज, राष्ट्र और सम्पूर्ण संसार को सुख पहुंचता है। 

अब निम्नलिखित श्लोक में भगवान अपना स्वयं का उदाहरण देकर अपने वक्तव्य की पुष्टि करते हैं। 

न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किंचन।

नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि॥

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं- हे पृथा पुत्र पार्थ! इस त्रैलोक में मेरे लिए कुछ भी करना बाकी नहीं है। मुझे सब कुछ प्राप्त है फिर भी मैं कर्म करता हूँ। भगवान ने बड़ी विलक्षण बात कही है। अपने लिए कोई कर्तव्य न होने पर भी भगवान दूसरों के हित के लिए इस धरती पर अवतार लेते हैं और सज्जनों का उद्धार, दुर्जनों का विनाश तथा धर्म की स्थापना करने के लिए कर्म करते हैं।

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“धर्म संरक्षणार्थाय धर्म संस्थापनाय च”

यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः।

मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥

भगवान कहते हैं- हे अर्जुन ! यदि मैं अपना कर्म सावधानी पूर्वक न करूँ तो बड़ा अनर्थ हो जाएगा, क्योंकि मैं आदर्श पुरुष हूँ। सम्पूर्ण प्राणी मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं, यदि मैं अपने कर्तव्य का पालन नहीं करूँ, तो इस संसार में कोई भी अपने कर्तव्य का पालन नहीं करेगा और कर्तव्य का पालन नहीं करने से उनका पतन हो जाएगा। मनुष्य को इस जगत में कैसे रहना चाहिए? यह बताने के लिए भगवान मनुष्य लोक में अवतार लेते हैं। सच पूछिए, तो संसार एक पाठशाला है जहाँ हमें लोभ और लालच को किनारे कर अपने साथ-साथ दूसरों के हित के लिए कर्म करना सीखना है। शास्त्र और उपनिषदों का यही निचोड़ है कि हम जीवन पर्यंत दूसरों के हित में लगे रहें। उसी का जीवन धन्य है जिसने स्वयं को पर हित में लगा दिया।

गोस्वामी तुलसीदास महाराज की यह अमर चौपाई भी इसी बात का समर्थन करती है।

परहित सरिस धर्म नहिं भाई।

पर पीड़ा सम नहिं अधमाई ॥

श्री वर्चस्व आयुस्व आरोग्य कल्याणमस्तु...

जय श्रीकृष्ण

- आरएन तिवारी







Gyan Ganga: श्रीराम की बात सुन कर क्यों सुग्रीव की आँखें आश्चर्य से फट गयी थीं

  •  सुखी भारती
  •  मार्च 2, 2021   18:00
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Gyan Ganga: श्रीराम की बात सुन कर क्यों सुग्रीव की आँखें आश्चर्य से फट गयी थीं

अचानक प्रभु श्रीराम जी ने कुछ ऐसा कह डाला कि सुग्रीव के तो प्राण ही सूख गए। भय के मारे उसकी रूह ही कांप गई। क्योंकि श्रीराम जी ने सुग्रीव से वह कह डाला जिसकी उसने स्वप्न में भी कल्पना नहीं की थी। अब सुग्रीव सोचने लगे कि करें तो क्या करें?

सुग्रीव ने जब देखा कि प्रभु श्रीराम जी तो बालि वध हेतु अडिग हैं और वे बालि को मारकर ही दम लेंगे। तो हो सकता है सुग्रीव ने फिर सोचा हो कि चलो कोई नहीं, अब बालि के मरने का समय आ ही गया होगा, तो कोई क्या कर सकता है? मन में वैराग्य होने के कारण सुग्रीव महान ज्ञानी होने का प्रदर्शन कर ही रहा था और उसे यह भलीभांति आश्वासन भी था कि चलो बालि श्रीराम जी के हाथों से मरेगा तो यह भी शुभ ही है। स्वयं को प्रत्येक क्रिया व परिस्थिति से तटस्थ मान, सुग्रीव को लग रहा था कि बस अभी श्रीराम जी अपना बाण निकालेंगे और बालि का दो क्षण में वध कर निवृत हो जाएंगे। और हमें तो दर्शक की भांति बस देखना ही है। फिर इसके पश्चात् न बालि होगा और न उसका भय। 

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सुग्रीव को यह सब बड़ा सरल व सीधा-सा प्रतीत हो रहा था। मानो हथेली पर लड्डू रखा है और बस उठाकर खा ही लेना है। शायद सुग्रीव के हृदय के किसी कोने में यह भाव भी हों कि चलो अच्छा ही हो रहा है कि बालि का जड़ से ही इलाज होने जा रहा है। और वह भी बड़े तरीके से। अब तो बालि वध का आक्षेप भी मुझ पर नहीं आएगा। क्योंकि मेरी इच्छा नहीं है फिर भी श्रीराम जी बालि का वध कर रहे हैं। तो उत्तरदायित्व भी श्रीराम जी पर ही आएगा। समाज में इसके द्वारा मेरा नाम भी कलंकित होने से बच जाएगा। 

निःसंदेह सुग्रीव स्वयं को अत्यंत ही सुरक्षात्मक घेरे में महसूस कर रहा था। लेकिन अचानक प्रभु श्रीराम जी ने कुछ ऐसा कह डाला कि सुग्रीव के तो प्राण ही सूख गए। भय के मारे उसकी रूह ही कांप गई। क्योंकि श्रीराम जी ने सुग्रीव से वह कह डाला जिसकी उसने स्वप्न में भी कल्पना नहीं की थी। जी हाँ! श्रीराम जी सुग्रीव को संबोधित करते बोले कि हे वीर सुग्रीव! तैयार हो जाओ, समय आ चुका है कि तुम अब बालि को उसके द्वार पर जाकर युद्ध के लिए ललकारो। यह सुनकर सुग्रीव का मुख खुला का खुला रह गया, आँखें आश्चर्य से फटने वाली हो गईं। उसे लगा कि अरे यह श्रीराम जी ने क्या कह डाला। अवश्य ही वे मेरे संग उपहास या व्यंग्य ही कर रहे हैं। लेकिन भाई ऐसा भी क्या उपहास कि सामने वाले का कलेजा ही फटकर मुँह को आ जाए। बोले कि बालि से जाकर युद्ध करो। मेमने को कहो कि जाकर सिंह से भिड़े या कद्दू को कहो कि जाकर चाकू पर जोर से कूदो तो अंजाम तो किसी से छुपा नहीं होता न। ठीक वैसे ही जाकर बालि को युद्ध के लिए ललकारो तो परिणाम मेरी मृत्यु ही तो है। पूर्व की तरफ चलते−चलते श्रीराम जी यूं पश्चिम की तरफ क्यों लौट पड़े। प्रण बालि को मारने का किया है या बालि द्वारा मुझे मरवाने का? न बाबा न, मुझे ऐसा उपहास तनिक भी पसंद नहीं। लेकिन यह क्या श्रीराम जी की भाव भंगिमा तो कहीं से भी उपहास के चिन्ह समेटे नहीं है। 

तो इसका तात्पर्य श्रीराम जी सत्य कह रहे हैं क्या? लेकिन यह क्या धोखा है? कहा तो था कि वे ही बालि को अपने एक तीर में मार डालेंगे और अब अवसर आया तो मुझे ही युद्ध के लिए धकेल रहे हैं। भला यह कैसा प्रण और क्षत्रिय धर्म? श्रीराम जी का क्या है, वे तो वापिस अयोध्या लौट जाएंगे, बखेड़ा तो मुझसे खड़ा हो गया था। बालि से मुझे ही भिड़ना था तो पहले ही बता देते न। मैं व्यर्थ ही क्यों इस झमेले में पड़ता। न, न, न यह तो कदापि उचित नहीं है। 

सुग्रीव अंदर तक डगमगा गया। वैराग्य क्षण भर में छू मंतर हो गया। चंद पल पहले जो सुग्रीव ने कहा था कि प्रभु मुझ पर ऐसी कृपा कीजिए कि सब त्यागकर केवल आपकी सेवा भक्ति करूं तो श्रीराम जी हँस पड़े थे। क्योंकि श्रीराम जी जानते थे कि सुग्रीव जब मैं किसी के समक्ष हूँ तो कोई भी भक्त होने का दंभ भर सकता है। लेकिन बात तो तब है न कि सामने साक्षात् यमराज हो और तब भी भक्ति भाव बना रहे। और देखो तुम्हारा भक्ति भाव ढेरी होता जा रहा था। प्रण किया था सेवा का, लेकिन प्राणों का मोह हावी हो रहा हो। सुग्रीव तो मानो सर्प के मुख में छिपकली जैसा प्रतीत कर रहा था। न मौत की रागनी से बच पा रहा है और न जीवन की स्वर लहरियों को अनसुना कर पा रहा है। न श्रीराम जी को छोड़े बन पा रहा है, न बालि को पकड़े चल पा रहा है। हो सकता है कि सुग्रीव को श्री हनुमान जी पर क्रोध आ रहा हो कि पवन पुत्र ने अच्छा फंसाया मुझे। अच्छा होता, श्री हनुमान जी को मैंने परीक्षा के लिए भेजा ही नहीं होता और पहाड़ी छोड़कर चुपचाप भाग जाता। लेकिन अब तो बीच मंझधार में फंस गया हूँ।

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सुग्रीव को यूं दुविधा में फंसा देख श्रीराम जी को दया आ गई। श्रीराम जी सुग्रीव को स्नेह व आश्वासन देते हुए कहते हैं कि सुग्रीव तुम क्यों व्यर्थ चिंता करते हो। बालि को तो निश्चित ही मैं अपने बाण से ही मारूंगा। लेकिन लड़ना तो बालि के समक्ष तुम्हें ही पड़ेगा। श्रीराम जी ने मानो अध्यात्म का पूरा सूत्र ही खोलकर रख दिया। कर्म सिद्धांत समझने के लिए प्रभु ऐसे ही जीवंत घटनाक्रमों का ही तो चयन करते हैं। जीव चाहता है कि बालि वध रूपी फल अथवा लक्ष्य मुझे यूं ही बैठे−बैठे प्राप्त हो जाए। मैं कुछ न करूं बस चुपचाप बैठा रहुँ और स्वयं प्रभु ही जाकर मेरा कार्य सिद्ध कर दें। परंतु प्रभु कहते हैं कि हे सुग्रीव! निश्चित ही बालि वध तो हम ही करेंगे लेकिन करेंगे छुपकर। हम सामने प्रकट होने की बजाए पेड़, लताओं के पीछे रहकर ही कार्य करेंगे। लेकिन हमारी यह कृपा तब ही होगी, जब तुम भी कर्म करने की अनिवार्यता व रीति का दामन नहीं छोडेंगे। यह तो मुझे भी पता है कि बालि को मारना तुम्हारे वश की बात नहीं। लेकिन मुझ पर विश्वास करके तुम बालि से भिड़ो तो सही। घबराना क्यों, मैं हूँ न तुम्हारे साथ। बालि मुझे नहीं देख पा रहा हो तो मुझे आश्चर्य नहीं। मैं उसके लिए छुपा हूँ लेकिन अपने भक्त के लिए नहीं, तुम तो मुझे देख ही पा रहे हो न कि मैं तुम्हारी खातिर छुपकर खड़ा हूँ। फिर भय क्यों, अविश्वास क्यों? 

क्या सुग्रीव बालि से युद्ध के लिए तत्पर होता है या नहीं जानेंगे अगले अंक में...क्रमशः...जय श्रीराम

-सुखी भारती







संत रविदास ने लोगों को कर्म की प्रमुखता और आंतरिक पवित्रता का संदेश दिया

  •  सुखी भारती
  •  फरवरी 27, 2021   11:17
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संत रविदास ने लोगों को कर्म की प्रमुखता और आंतरिक पवित्रता का संदेश दिया

निःसंदेह संत रविदास जी दैवीय अवतार तो थे ही। लेकिन तब भी वे गुरू धारण करने की सनातन परंपरा व सिद्धांत की अवहेलना नहीं करते। और स्वामी रामानंद जी की शरणागत हो गुरू शिष्य−परंपरा के महान आदर्श का निर्वहन करते हुए इसे संसार में स्थापित करते हैं।

समाज को जब चारों ओर से अज्ञान की अंधकारमय चादर ने अपनी मजबूत जकड़न में जकड़ा हो। यूं लगता हो कि धरती रसातल में धंस गई है और दैहिक, दैविक व भौतिक तीनों तापों के तांडव से समस्त मानव जाति त्रस्त हो चुकी है। तो यह कैसे हो सकता है कि ईश्वर यह सब कुछ एक मूक दर्शक बनकर देखता रह जाए। कष्टों की अमावस्या को मिटाने हेतु प्रभु अवश्य ही पूर्णिमा के चाँद को आसमां के मस्तक पर सुशोभित करते हैं। ऐसे ही दैवीय पूर्णिमा के चाँद का इस धरा धाम पर उदय हुआ था। जिन्हें संसार संत रविदास जी के नाम से जानता है। काशी का वह गाँव संवत 1433 को ऐसा धन्य महसूस कर रहा था मानो उस जैसा कोई और हो ही न। माघ मास की पूर्णिमा भी खूब अंगड़ाइयां लेकर अपना आशीर्वाद लुटा रही थी। पवन तो मानों हज़ारों−हज़ारों इत्र के पात्रों में नहा कर सुगंधित होकर बह रही थी। कारण कि श्री रविदास जी ही वह महान दैवीय शक्ति थे जो मानव रूप में इस धरा को पुनीत करने हेतु अवतरित हुए थे। उनके जन्म के साक्ष्य निम्नलिखित वाणियों में भी मिलते हैं−

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चौदह से तैंतीस कि माघ सुदी पन्दरास।

दुखियों के कल्याण हित प्रगटे श्री रविदास।।

माता करमा और पिता राहु को तो भान भी नहीं था कि उनकी कुटिया में साक्षात भानू का प्रकटीकरण हुआ है। भानू तो छोडि़ए उन्हें तो वे एक अदना सा जुगनूं भी प्रतीत नहीं हो रहे थे। पिता चाहते तो थे कि बेटा संसार के समस्त दाँव−पेंच सीखे। घर परिवार चलाने में हमारा हाथ बंटाए। लेकिन वे क्या जाने कि रविदास जी तो प्रभु के पावन, पुनीत व दिव्य कार्य को प्रपन्न करने हेतु अपना हाथ बंटाने आए हैं। संसार के दाँव−पेंच सीखने नहीं अपितु स्वयं को ही प्रभु के दाँव पर लगाने आए हैं। क्योंकि मानव जीवन का यही तो एकमात्र लक्ष्य है कि श्रीराम से मिलन किया जाए। वरना संसार के रिश्ते−नाते, धन संपदा तो सब व्यर्थ ही हैं, जिन्हें एक दिन छोड़कर हमें अनंत की यात्रा पर निकल जाना है। पत्नी जो जीवित पति को तो खूब प्यार करती है लेकिन प्रभु शरीर से क्या निकले कि वही पत्नी पति की लाश को देख कर भूत−भूत कहकर भाग खड़ी होती है−

ऊचे मंदर सुंदर नारी।। एक घरी पुफनि रहनु न होई।।

इहु तनु ऐसा जैसे घास की टाटी।। जलि गइओ घासु रलि गइओ माटी।।

भाई बंध् कुटुम्ब सहेरा।। ओइ भी लागे काढु सवेरा।।

घर की नारि उरहि तन लागी।। उह तउ भूतु−भूतु कर भागी।।

कहै रविदास सभै जगु लूटिआ।। हम तउ एक रामु कहि छूटिआ।। 

निःसंदेह संत रविदास जी दैवीय अवतार तो थे ही। लेकिन तब भी वे गुरू धारण करने की सनातन परंपरा व सिद्धांत की अवहेलना नहीं करते। और स्वामी रामानंद जी की शरणागत हो गुरू शिष्य−परंपरा के महान आदर्श का निर्वहन करते हुए इसे संसार में स्थापित करते हैं। 

यह वह समय था जब समाज में जाति पाति प्रथा का विष जन मानस की रग−रग में फैला हुआ था। जिसे निकालना अति अनिवार्य था। काशी नरेश ने जब एक बार सामूहिक भंडारे का आयोजन करवाया तो उसमें असंख्य साधु−संत, गरीब−अमीर व उच्च कोटि के ब्राह्मण सम्मिलति हुए। परंतु काशी नरेश उच्च जाति के प्रभाव में थे तो सर्वप्रथम जाति विशेष को भोजन करवाना था। श्री रविदास जी भी उनकी पंक्ति में बैठ गए। उच्च जाति वर्ग ने इसका विरोध किया। श्री रविदास जी तो मान−सम्मान से सर्वदा विलग थे। इसलिए वे सहज ही उक्त पंक्ति से उठ गए। विशेष वर्ग भले ही संतुष्ट हुआ और पुनः भोजन करने बैठ गया। लेकिन तभी एक महान आश्चर्य घटित हुआ। पंक्ति में बैठे प्रत्येक विप्र के बीच श्री रविदास जी बिराजे दर्शन दे रहे थे। और भोजन ग्रहण कर रहे थे। सभी यह कौतुक देख कर हैरान थे। और रविदास जी मुस्कुराते हुए मानो कह रहे थे कि हे प्रतिष्ठित वर्ग के लोगों, माना कि मेरी जाति−पाति सब नीच है। मैं कोई विद्वान भी नहीं लेकिन तब भी उसने आप सब के मध्य लाकर मुझे सुशोभित कर दिया क्योंकि मैं अहंकार की नहीं निरंकार की शरणागत हूँ−

मेरी जाति कमीनी पांति कमीनी ओछा जन्मु हमारा।।

तुम सरनागति राजा राम चंद कहि रविदास चमारा।।

श्री रविदास जी की यह लीला देख समाज का एक बड़ा वर्ग उनका अनुसरण करने लगा। चितौड़ की महारानी मीरा बाई भी उन्हीं में से एक थी। जिन्होंने गुरू रविदास जी से योग−विद्या हासिल कर श्री कृष्ण के वास्तविक स्वरूप को समझा। वे कहती भी हैं−

गुरू रैदास मिले मोहि पूरन, धूरि से कलम भिड़ी।

सतगुरू सैन दई जब आके, जोति से जोति मिली।।

श्री रविदास जी की ख्याति दिन−प्रतिदिन भास्कर की किरणों की भांति निरंतर सब और फैलती जा रही थी। एक दिवस जब श्री रविदास जी बैठे जूते गांठ रहे थे। तो वहाँ से गुजर रहे एक पुजारी जी की दृष्टि उन पर पड़ी। उन्होंने वैसे ही श्री रविदास जी को बोल दिया कि रविदास तुम क्या यहाँ जूते गांठने में लगे हो। जीवन में कभी गंगा स्नान नहीं करोगे क्या? हालांकि श्री रविदास जी का जूते गांठना तो सिर्फ एक बहाना था। असल में गांठा तो आत्मा को प्रमात्मा से जा रहा था। ऐसा भी नहीं कि श्री रविदास जी गंगा स्नान के विरोधी थे। अपितु यह कहो कि वे इसके पक्षधर थे। क्योंकि यूं धर्मिक स्थलों पर किया जाने वाला सामूहिक स्नान समाज को एक साथ जोड़े रखता है। गंगा मईया जिन पर्वत शिखरों से निकलती हैं, वहाँ की असंख्य दुर्लभ व गुणकारी जड़ी−बूटियों के रस भी गंगा के पावन जल में घुले हुए होते हैं। जिस कारण गंगा स्नान अनेकों शरीरिक बीमारियों का इलाज का साधन हैं।

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गंगा स्नान और गंगा पूजन एक सुंदर संस्कार जनक है कि हमें अपनी नदियों व अन्य जल−ड्डोतों का संरक्षण एवं संर्वधन करना चाहिए। लेकिन इसी गंगा स्नान से जब मिथ्या धारणाएं जुड़ जाती हैं और गंगा स्नान अहंकार की उत्पत्ति का साधन हो जाए तो हम वास्तविक लाभ से वंचित हो जाते हैं। और वे पुजारी अहंकार रूपी इसी वृत्ति के धारक थे। उन्हें दिशा दिखाने हेतु श्री रविदास जी एक लीला करते हैं। पुजारी जी को एक दमड़ी देकर कहते हैं कि मैं तो नहीं जा पाऊँगा। लेकिन कृपया मेरा यह सिक्का गंगा मईया को अर्पित कर दीजिएगा। हाँ यह बात याद रखना कि मेरी दमड़ी गंगा मईया को तभी अर्पित करना जब वे स्वयं अपना पावन कर कमल बाहर निकाल कर इसे स्वीकार करें। और उन्हें कहना कि वे मेरे लिए अपना कंगन भी दें। उनकी यह बात सुनकर भले ही पुजारी ने श्री रविदास जी को बावले की श्रेणी में रखा हो। लेकिन उसके आश्चर्य की तब कोई सीमा न रही जब सचमुच गंगा मईया स्वयं श्री रविदास जी की दमड़ी को अपने पावन हस्त कमल से स्वीकार किया। और बदले में एक कंगन भी दिया।

अच्छा होता अगर पुजारी यह सब देख श्री रविदास जी की दिव्यता व श्रेष्ठता को समझ पाता। लेकिन वह तो कंगन देखकर बेईमान ही हो गया। और श्री रविदास जी को देने की बजाय अपनी पत्नि को वह कंगन दे देता है। उसकी पत्नि रानी की दासी थी। और नित्य प्रति रानी की सेवा हेतु महल में जाया करती थी। जब वो उस कंगन पहन कर रानी के समक्ष गई तो वह कंगन पर इतनी मोहित हुई कि पुजारी की पत्नि से मुँह मांगी कीमत पर उससे कंगन ले लिया। और उसे कहा कि हमें शाम तक इस कंगन के साथ वाला दूसरा जोड़ा भी चाहिए। ताकि मैं अपनी दोनों कलाइयों में कंगन पहन सकूं। अगर तूने मुझे दूसरा कंगन लाकर नहीं दिया तो तुम्हारे लिए मृत्यु दंड निश्चित है। पुजारी की पत्नि ने जब यह वृतांत घर आकर अपने पति को बताया तो उसके तो हाथ पैर ही फूल गए। क्योंकि ऐसा सुंदर दिव्य कंगन तो केवल गंगा मईया के ही पास था। और मईया भला मुझे अपना कंगन क्यों देंगी? यह तो सिर्फ रविदास जी के ही बस की बात है। बहुत सोचने के बाद पुजारी ने रविदास जी के समक्ष पूरा घटनाक्रम रखने में ही समझदारी समझी। और कहा कि कृपया मुझे एक दमड़ी और देने का कष्ट करें। ताकि मैं गंगा मईया से दूसरा कंगन लाकर मृत्यु दंड से मुक्ति पा सकूं।

श्री रविदास जी पुजारी की बात सुनकर मुस्कुरा पड़े। और बोले विप्रवर कहाँ आप इतनी मशक्कत करते फिरेंगे। देखिए मेरे इस कठौते में भी तो जल है। और गंगा जी में जल है। अगर गंगा जल से मईया प्रकट हो सकती है तो मेरे इस कठौते के जल में क्या कमी है? आप डालिए कठौते में हाथ, विश्वास कीजिए गंगा मईया भीतर ही आपके लिए कंगन लिए बैठी होंगी। हाथ डालकर स्वयं ही निकाल लीजिए। पुजारी को यह सुनकर रविदास जी पर क्रोध तो बहुत आया लेकिन उनकी बात मानने के अलावा उसके पास कोई चारा भी तो नहीं था। पुजारी ने कठौते में हाथ डाला तो एक बार फिर महान आश्चर्य घटित हुआ। पुजारी की उंगली में सचमुच कंगन अटका। जब उसने अपना हाथ बाहर खींचा तो उसकी हैरानी की कोई हद न रही। क्योंकि उसके हाथ में एक कंगन नहीं अपितु कंगन में अटके अनेकों कंगनों की एक लंबी श्रृंखला थी। श्री रविदास जी बोले कि अरे विप्रवर आपको तो सिर्फ एक की कंगन चाहिए था न। बाकी मईया के पास ही रहने दें। श्री रविदास जी के भक्ति भाव के आगे पुजारी का मिथ्या अहंकार टूटकर चूर−चूर हो गया। वह श्री रविदास जी के चरणों में गिर कर सदा के लिए उनकी शरणागत हो गया। और तभी से यह कहावत जगत विख्यात हो गई−'मन होवे चंगा तो कठौती में गंगा।' 

- सुखी भारती







सामाजिक एकता का संदेश देते थे संत रविदास

  •  प्रज्ञा पाण्डेय
  •  फरवरी 27, 2021   11:01
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सामाजिक एकता का संदेश देते थे संत रविदास

संत रविदास एक महान संत थे। उनके बारे में एक रोचक कथा भी प्रचलित है। इस कथा के अनुसार एक बार एक पंडित जी गंगा स्नान के लिए उनके पास जूते खरीदने आए। पंडित जी ने गंगा पूजन की बात रविदास को बतायी।

आज रविदास जयंती है। सतगुरु रविदास भारत के उन महान संतों में से एक हैं जिन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से सारे संसार को एकता, भाईचारा का संदेश दिया। उन्होंने जीवन भर समाज में फैली कुरीतियों को समाप्त करने का प्रयास किया, तो आइए हम आपको संत रविदास को कुछ बातें बताते हैं।

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जानें गुरु रविदास जयंती के बारे में

रविदास जयंती प्रमुख त्यौहार है। इस साल गुरु रविदास जयंती 27 फरवरी को है। माघ पूर्णिमा के दिन हर साल गुरु रविदास जी की जयंती मनायी जाती है। संत शिरोमणि रविदास का जीवन ऐसे अद्भुत प्रसंगों से भरा है, जो दया, प्रेम, क्षमा, धैर्य, सौहार्द, समानता, सत्यशीलता और विश्व-बंधुत्व जैसे गुणों की प्रेरणा देते हैं। 14वीं सदी के भक्ति युग में माघी पूर्णिमा के दिन रविवार को काशी के मंडुआडीह गांव में रघु व करमाबाई के पुत्र रूप में इन्होंने जन्म लिया। इन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से आदर्श समाज की स्थापना का प्रयास किया। रविदास जी के सेवक इनको " सतगुरु", "जगतगुरू" आदि नामों से भी पुकारते हैं। 

जन्म तथा जाति आधारित वर्ण व्यवस्था के विरूद्ध थे संत रविदास 

संत रविदास अपने समकालीन चिंतकों से पृथक थे उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से विभिन्न सामाजिक कुरीतियों को दूर करने का प्रयास किया। वह जन्म तथा जाति आधारित वर्ण व्यवस्था के भी विरूद्ध थे।

संत रविदास के बारे में जानें रोचक कहानी 

संत रविदास एक महान संत थे। उनके बारे में एक रोचक कथा भी प्रचलित है। इस कथा के अनुसार एक बार एक पंडित जी गंगा स्नान के लिए उनके पास जूते खरीदने आए। पंडित जी ने गंगा पूजन की बात रविदास को बतायी। उन्होंने पंडित महोदय को बिना पैसे लिए ही जूते दे दिए और निवेदन किया कि उनकी एक सुपारी गंगा मैया को भेंट कर दें। संत की निष्ठा इतनी गहरी थी कि पंडित जी ने सुपारी गंगा को भेंट की तो गंगा ने खुद उसे ग्रहण किया। संत रविदास के जीवन का एक प्रेरक प्रसंग यह है कि एक साधु ने उनकी सेवा से प्रसन्न होकर, चलते समय उन्हें पारस पत्थर दिया और बोले कि इसका प्रयोग कर अपनी दरिद्रता मिटा लेना। कुछ महीनों बाद वह वापस आए, तो संत रविदास को उसी अवस्था में पाकर हैरान हुए। साधु ने पारस पत्थर के बारे में पूछा, तो संत ने कहा कि वह उसी जगह रखा है, जहां आप रखकर गए थे। 

सामाजिक एकता पर बल देते थे संत रविदास 

संत रविदास बहुत प्रतिभाशाली थे तथा उन्होंने विभिन्न प्रकार के दोहों तथा पदों की रचना की। उनकी रचनाओं की विशेषता यह थी कि उनकी रचनाओं में समाज हेतु संदेश होता था। उन्होंने अपनी रचनाओं के द्वारा जातिगत भेदभाव को मिटा कर सामाजिक एकता को बढ़ाने पर बल दिया। उन्होंने मानवतावादी मूल्यों की स्थापना कर ऐसे समाज की स्थापना पर बल दिया जिसमें किसी प्रकार का भेदभाव, लोभ-लालच तथा दरिद्रता न हो।

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कई नामों से जाने जाते थे संत रविदास 

संत रविदास पूरे भारत में बहुत लोकप्रिय थे। उन्हें पंजाब में रविदास कहा जाता था। उत्तर प्रदेश, राजस्थान तथा मध्य प्रदेश में उन्हें रैदास के नाम से भी जाना जाता था। बंगाल में उन्हे रूईदास के नाम से जाना जाता है। साथ ही गुजरात तथा महाराष्ट्र के लोग उन्हें रोहिदास के नाम से भी जानते थे।

बहुत दयालु प्रवृत्ति के थे संत रविदास 

संत रविदास बहुत दयालु प्रवृत्ति के थे । वह बहुत से लोगों को बिना पैसे लिए जूते दे दिया करते थे। वह दूसरों की सहायता करने में कभी पीछे नहीं हटते थे। साथ ही उन्हें संतों की सेवा करने में भी बहुत आनंद आता था। 

वाराणसी में है संत रविदास का मंदिर 

उत्तर प्रदेश के बनासर शहर में संत रविदास का भव्य मंदिर है तथा वहां सभी धर्मों के लोग दर्शन करने आते हैं।

प्रज्ञा पाण्डेय







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