गीता-तत्व को समझ कर उसे अपने जीवन में उतारने का प्रयत्न करें

  •  आरएन तिवारी
  •  नवंबर 27, 2020   11:24
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गीता-तत्व को समझ कर उसे अपने जीवन में उतारने का प्रयत्न करें

हमारे धर्म शास्त्रों में नैमिषारण्य को सतयुग का परम पवित्र तीर्थ स्थान माना गया है जहाँ एक पल के लिए भी अधर्म का वास न हो। ब्रह्मा जी ने सत्संग के लिए ही इसका निर्माण किया था। त्रेता युग का पवित्र स्थान पुष्कर को कहा गया है।

पिछले अंक में हमने गीता माहात्म्य पर प्रकाश डाला था, हमारे प्रभासाक्षी के पाठकों ने गीता माहात्म्य का आस्वादन लिया। आइए ! इस अंक में हम श्रीमद्भगवत गीता में प्रवेश करें, गीता-तत्व को समझें और उसे अपनी निजी जिंदगी में उतारने का प्रयास करें। भगवान श्री कृष्ण ने आज से लगभग छ: हजार वर्ष पूर्व कुरुक्षेत्र में एकादशी, रविवार के दिन करीब पैंतालीस मिनट तक अर्जुन को गीता का उपदेश दिया था। इससे पहले भगवान ने इसी गीता का गायन सूर्यदेव के समक्ष भी किया था, इसीलिए सूर्य नारायण फल की चिन्ता किए बिना निष्काम भाव से आज तक अपने कर्म में लीन हैं।

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श्रीमद्भगवत गीता में न केवल अन्य शास्त्रों की सारी बातें मिलेंगी बल्कि ऐसी बातें भी मिलेंगी जो अन्यत्र कहीं भी उपलब्ध नहीं हैं। अस्तु -------

ऐसा माना जाता है कि गीता दर्शन की प्रस्तुति कुरुक्षेत्र के युद्ध के मैदान में हुई। द्वापर युग का कुरुक्षेत्र परम पवित्र तीर्थ स्थान रहा है। 

हमारे धर्म शास्त्रों में नैमिषारण्य को सतयुग का परम पवित्र तीर्थ स्थान माना गया है जहाँ एक पल के लिए भी अधर्म का वास न हो। ब्रह्मा जी ने सत्संग के लिए ही इसका निर्माण किया था। त्रेता युग का पवित्र स्थान पुष्कर को कहा गया है।

द्वापर का धर्म स्थल कुरुक्षेत्र और कलियुग का तीर्थ स्थान गंगा को माना गया है। परम पवित्र कुरुक्षेत्र में कौरवों और पांडवों की सेना महाभारत युद्ध के लिए तैयार खड़ी थी। धृतराष्ट्र के मन में संदेह का सागर उमड़ रहा था कि न जाने इस युद्ध का परिणाम क्या होगा?

उन्होने संजय से पूछा---

धृतराष्ट्र उवाच—

धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सव:। 

मामका पांडवाश्चैवकिमकुर्वत संजय।।

हे संजय! धर्म की भूमि कुरुक्षेत्र में युद्ध करने की इच्छा से इकट्ठे हुए मेरे तथा पांडु के पुत्रों ने क्या किया? 

कुरुक्षेत्र के युद्धस्थल में अर्जुन के पक्ष में श्रीकृष्ण स्वयम उपस्थित थे। कौरवों का पिता धृतराष्ट्र अपने अधर्मी पुत्रों को विजयी होते देखना चाहता  था किन्तु उसको इस विषय में संदेह था। वह अपने पुत्रों के विषय में आश्वस्त होना चाहता था। धृतराष्ट्र अत्यधिक भय-भीत था कि इस धर्म क्षेत्र के कुरुक्षेत्र में होने जा रहे युद्ध का विजेता कौन होगा? वह यह सच्चाई भी जानता था कि अर्जुन और पांडवों पर इस युद्ध का प्रभाव अनुकूल पड़ेगा क्योंकि वे स्वभाव से पुण्यात्मा थे।

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धर्म संस्थापनार्थाय संभावमि युगे-युगे 

भगवान का यह अमर संदेश जानते हुए भी धृतराष्ट्र जरूरत से ज्यादा पुत्र-मोह में डूबा हुआ था। भगवान धर्म को अमर करना चाहते हैं और धृतराष्ट्र अधर्म को अमर करना चाहता था। धृतराष्ट्र के जीवन की सबसे बड़ी भूल यही थी, कि वह धर्म युद्ध में अधर्म को विजयी होने का स्वप्न देख रहा था। हम सबके लिए गीता का यही संदेश है कि किसी भी परिस्थिति में अधर्म और अन्याय का साथ नहीं देना चाहिए।  

संजय महर्षि वेदव्यास का परम प्रिय शिष्य था। व्यास जी ने उसको दिव्य-दृष्टि प्रदान की थी, जिसके सहारे वह कुरुक्षेत्र में होने वाले युद्ध का सीधा प्रसारण live telecast कर सकता था। यहाँ हम सबको यह समझ लेना चाहिए कि live telecast आधुनिक खोज नहीं है बल्कि हमारे ऋषि-महर्षियों ने इसकी खोज बहुत पहले कर ली थी। हाँ! इसको और परिष्कृत modify करने का काम आधुनिक समाज ने जरूर किया है।

अस्तु ----

जय श्री कृष्ण -----------   

- आरएन तिवारी







Gyan Ganga: भगवान श्रीरामजी और सुग्रीव के बीच का रोचक वार्तालाप

  •  सुखी भारती
  •  जनवरी 21, 2021   18:56
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Gyan Ganga: भगवान श्रीरामजी और सुग्रीव के बीच का रोचक वार्तालाप

ऐसा ही प्रश्न भक्त त्रिलोचन जी के मन में आया था। जब वे भक्त नामदेव की भक्ति के महान किस्से सुनकर उनके दर्शन हेतु गए तो उनका यह मिथ्या भ्रम टूट कर चकनाचूर हो गया। क्योंकि उन्होंने तो यह सुना था कि भक्त नामदेव चौबीसों घंटे भक्ति−साधना में ही लीन रहते हैं।

सज्जनों विगत अंकों से हम पढ़ रहे हैं कि श्री हनुमान जी जीव को ब्रह्म से मिलाने हेतु प्रतिक्षण तत्पर रहते हैं। श्रीराम अपनी वन यात्रा में श्री हनुमान जी से भी मिलन करते हैं और सुग्रीव से भी। सुग्रीव से मुलाकात में भगवान श्रीराम की वार्तालाप का आप अवलोकन करेंगे तो इस वार्ता का विषय वैसा बिलकुल भी नहीं जैसे श्री हनुमान जी विशुद्ध आध्यात्मिक नाता गांठने के लिए जाने जाते हैं। क्योंकि श्रीराम जी से जब भी जीव का नाता बनता है तो वह भक्ति का ही नाता बनता है। जिसमें संसार का समस्त माया−मोह परे छूट जाता है। और केवल ईश्वर ही ईश्वर का बोलबाला होता है। लेकिन श्रीराम जब सुग्रीव से मिले तो उसको कहीं भी कुछ ऐसा नहीं कहते कि सुग्रीव संसार तो माया है, बंधन है और मुझे पाने के लिए तुझे इसका मोह त्यागना ही होगा। फिर शायद यह भी कह देते कि चलो आधी माया−मोह तो तुम्हारी पहले से ही समाप्त हो गई है क्योंकि तुम्हारा राज्य व पत्नी तो बालि ने पहले से ही छीन रखे हैं। तो अब मेरी भक्ति करने में तुम पूर्णतः स्वतंत्र हो। प्रभु श्रीराम जी ने सुग्रीव से यह भी नहीं कहा कि चलो यह भी अच्छा ही हुआ कि तुम तो पहले ही वनों में निवास कर रहे हो। वरना भक्ति करने हेतु तो बड़े−बड़े तपस्वी भी वनों का ही रूख कर रहे हैं। उलटे प्रभु श्रीराम जी तो सुग्रीव से यह कहते हैं कि सुग्रीव! भला तुम वनों में क्या कर रहे हो− 'कारन कवन बसहु बन मोहि कहहु सुग्रीव' अर्थात तुम वनों में आखिर क्या कर रहे हो? क्योंकि श्री हनुमान जी तो मुझे यह कह कर लाए हैं कि यहाँ उनके राजा रहते हैं। और राजा तो राजमहल में होते हैं। यूं कंन्दराओं में नहीं! क्योंकि कंदराएँ तो बनवासियों का प्रिय स्थल हुआ करती हैं। यूं ही प्रभु यह कहते हैं तो सुग्रीव उनके समक्ष अपनी संपूर्ण गाथा कह सुनाता है कि कैसे बालि ने उसकी पत्नी और राज्य उससे छीन लिए और उसे वनों में छुपकर रहने के लिए विवश कर दिया−

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रिपु सम मोहि मारेसि अति भारी। 

हरि लीन्हसि सर्बसु अरु नारी।।

कहा कि उसने मुझे बहुत अधिक मारा भी। तो प्रभु कहते हैं कि सुग्रीव अब तुम किंचित मात्र भी चिंता न करो। क्योंकि मैं आ गया हूँ। मेरे बल के भरोसे तुम अपनी समस्त चिंता छोड़ दो। मैं सब प्रकार से तुम्हारी सहायता करूँगा और बालि ने तुम्हें मारा है न, तो ठीक है फिर मैं एक ही बाण में बालि का वध कर डालूंगा−

सुनु सुग्रीव मारिहऊँ बालिहि एकहिं बान।

ब्रह्म रूद्र सरनागत गऊँ न उबरिहिं प्रान।।

देखिए श्रीराम सुग्रीव के साथ कितनी मनोवैज्ञानिक उपचार पद्यति का प्रयोग कर रहे हैं। उन्हें पता है कि सुग्रीव बालि से अत्यंत भयभीत हैं एवं इतना भयभीत कि मेरे और लक्ष्मण में भी बालि के ही किसी षड्यंत्र की परछाई देख रहा है। ऐसे में मैं इसे ब्रह्म का उपदेश कहाँ समझ आएगा। इसलिए पहले तो मैं इसका यह भ्रम दूर करूँ और उन्होंने सुग्रीव को कह दिया कि मैं बालि को केवल एक ही बाण से मार डालूंगा। एवं ऐसा मारूंगा कि भागकर वह ब्रह्मा, विष्णु या महेश जी की शरण भी गया तो उसकी कहीं पर भी रक्षा नहीं हो पाएगी। प्रभु ने सोचा कि चलो सुग्रीव का भय तो अब मेरी इस घोषणा से ठीक हो ही गया होगा। लेकिन बालि ने सुग्रीव की पत्नी जो छीन ली है इसका दुख वह भूल ही नहीं पा रहा है। फिर पत्नी के पश्चात् और भी कई गुप्त−प्रकट दुःख होंगे जो सुग्रीव अभी हमसे कह नहीं पायेंगे। तो क्यों न मै कह दूं कि चलो सुग्रीव एक−दो पक्ष में मैं क्या सहायता का वचन दूँ। लो मैं तो तुम्हारी सब और से ही अब सहायता करूँगा−

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सखा सोच त्यागहु बल मोरे। 

सब बिधि घटब काज मैं तोरे।।

आप सोचिए सुग्रीव कितना सहमा, डरा व असुरक्षित महसूस कर रहा होगा कि प्रभु भक्ति व साधना की कोई बात ही नहीं कर रहे। बस भरोसा करवा रहे हैं कि तू चिंता भला क्यों करता है। मैं हूँ न, मैं सब विधि से तुम्हारे काम आऊँगा। हालांकि उनका मूल उद्देश्य तो यही है कि सुग्रीव को आध्यात्मिक जीवन में उतीर्ण करना है। नर व नारायण सेवा में संलग्न करना है। लेकिन सुग्रीव पहले इस के योग्य बने तो सही। क्योंकि निःसंदेह जीव के मानव जीवन का एक ही मूल उद्देश्य है और वह है ईश्वर की भक्ति। लेकिन आवश्यक नहीं कि यह माया त्यागने के पश्चात ही शुरू होती है। अपितु माया व राज−पाट मिलने के पश्चात् भी भक्ति करना अति सुलभ है। बस एक ही शर्त है कि अपनी समस्त माया का प्रयोग ईश्वरीय पथ की साधना के निमित्त प्रयोग करते हुए आगे बढ़ें−

न जग छोड़े न हरि त्यागो, ऐसे रहो जिंदगानी में।

दुनिया में ऐसे रहो जैसे कमल रहता है पानी में। 

कमल अपनी खुराक कीचड़ से ही लेता है। वहीं पलता−बढ़ता है, लेकिन सदा कीचड़ से निर्लिप्त रहता है। क्योंकि वह अपना संबंध सीधे सूर्य से जोड़े रखता है। यद्यपि हो सकता है कि हमारे मन में यह प्रश्न आ जाए कि भला संसार की माया में रहकर भी कोई, कैसे ईश्वर की सेवा व भक्ति कर सकता है ? ऐसा ही प्रश्न एकदा भक्त त्रिलोचन जी के मन में भी आया था। जब वे भक्त नामदेव की भक्ति के महान किस्से सुनकर उनके दर्शन हेतु गए तो उनका यह मिथ्या भ्रम टूट कर चकनाचूर हो गया। क्योंकि उन्होंने तो यह सुना था कि भक्त नामदेव चौबीसों घंटे भक्ति−साधना में ही लीन रहते हैं। और यहाँ तो मैं सुबह से ही देख रहा हूँ कि नामदेव जी तो कपड़ा छपाई में ही लीन हैं। रात होने को है और वे अभी भी शायद और काम करने की धुन में हों। अवश्य ही चारों ओर इनके बारे में झूठ फैलाया गया कि नामदेव जी आठों पहर भक्ति में ही लीन रहते हैं। यह तो धेखा है, पाप है। लेकिन कुछ भी हो मैं उन्हें अवश्य ही प्रश्न करूँगा−

नामा माइआ मोहिआ कहै त्रिलोचनु मीत।। 

काहे छीपहु छाइलै राम न लावहु चीतु।।

अर्थात् हे नामदेव जी! आपको तो माया ने मोह रखा है। आप यह छपाई का कार्य कर रहे हो। क्या आप राम जी के ध्यान में अपना चित्त नहीं लगाते? यह सुनकर नामदेव जी मुस्कुरा पड़े। और भक्त त्रिलोचन जी को संबोधित करते हुए फुरमान करने लगे−

नामा कहै त्रिलोचना मुख ते रामु सम्हालि।।

हाथ पाउ करि कामु सभु चीतु निरंजन नालि।।

अर्थात् हे त्रिलोचन भाई! अपना मन निरंतर प्रभु से जोड़कर रखें और हाथ पैर से काम भी करता रह। भगवान श्रीराम सुग्रीव को इसी साधना−पद्धति की ओर लेकर जा रहे हैं। लेकिन क्या सुग्रीव तुरंत श्रीराम जी की सीख मान लेता है? अथवा नहीं! जानने के लिए अगला अंक अवश्य पढ़ें...क्रमशः... जय श्रीराम

-सुखी भारती







महान दानवीर, क्रांतिवीर और शूरवीर श्री गुरु गोबिंद सिंह जी का पूरा जीवन है प्रेरणादायी

  •  सुखी भारती
  •  जनवरी 19, 2021   19:35
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महान दानवीर, क्रांतिवीर और शूरवीर श्री गुरु गोबिंद सिंह जी का पूरा जीवन है प्रेरणादायी

औरंगजे़ब भी लोगों को जबरन मुसलमान बनने के लिए विवश कर रहा था। औरंगजे़ब ने यहीं आकर भूल की। उसने इंसान की दशा बलदने को ही उसकी दिशा बदलना समझ लिया। बाह्य लिबास व संप्रदाय बदलने के लिए वह लोगों पर अन्याय व अमानवीय अत्याचार करने लगा।

श्री गुरु गोबिंद सिंह जी का पावन नाम हमारे गौरवशाली इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों में अंकित है। आज भी उन्हें सरबंसदानी, दानवीर, क्रांतिवीर एवं संत−सिपाही के रूप में याद किया जाता है। यों तो हमारे देश में अनेकों दानवीर हुए हैं जिन्होंने मानवता को त्रास मुक्त करने के लिए अनेकों बलिदान दिए। जैसे महर्षि शिबि ने इस संसार को राक्षसों के आतंक से बचाने के लिए जीते जी अपनी हडि्डयों का दान तक दे डाला। लेकिन दुनिया के इतिहास को बांचने पर कोई भी ऐसा उद्धरण नहीं मिलता जहाँ पर किसी ने अपने माता−पिता, पुत्रों एवं अपने सर्वस्व का दान दिया हो। मानवता की रक्षा हेतु गुरु जी अपने 7 और 9 साल के बच्चों का बलिदान देने से भी नहीं घबराए।

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हमारे विद्वतजनों का कथन है कि पूत के पैर पालने में ही पहचाने जाते हैं। जिस समय उनका जन्म हुआ तो पीर भीखण शाह जी ने पश्चिम दिशा में सिजदा करने की बजाय पूर्व दिशा में सिजदा किया। जब उनके शिष्यों ने उनकी इस उल्टी रीति का कारण पूछा तो उन्होंने कहा कि इस संसार के दुःख, संताप हरने वाला अवतार धरण कर चुका है। मैंने पूर्व दिशा से उठ रहे उसी इलाही नूर को सिजदा किया है। आप सब देखेंगे कि वो अपने दिव्य बल−शौर्य, कुर्बानी और संतत्व से इस संसार का काया कल्प करके रख देगा। और उनकी इस बात को श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने 9 साल की छोटी-सी अवस्था में ही सिद्ध कर दिया था। जिस समय कश्मीरी पंडित श्री गुरु तेग बहादुर जी के पास आकर उन्हें औरंगज़ेब द्वारा उन पर किए जा रहे अत्याचारों से अवगत कराते हैं। तो उनकी बात सुनकर श्री गुरु तेग बहादुर जी अत्यंत गंभीर होकर वचन करते हैं कि इसके लिए तो किसी महापुरुष को अपनी कुर्बानी देनी पड़ेगी। उस समय बाल गोबिंद भी श्री गुरु तेग बहादुर जी के पास ही बैठे थे, कहने लगे−पिता जी आप से बड़ा महापुरुष इस संसार में भला और कौन हो सकता है? वह जानते थे कि महान उद्देश्य की पूर्ति के लिए कुर्बानियां भी महान ही देनी पड़ती हैं। इसलिए बाल गोबिंद 9 साल की अल्प आयु में ही मानवता की रक्षा हेतु अपने गुरु पिता का बलिदान देकर क्रांति का आगाज़ करते हैं। वे इस बात से भलीभांति परिचित थे कि समाज में फैले अत्याचार, अनाचार, भ्रष्टाचार की जड़ें जमा चुकी गहरी मलीनता को साफ करने लिए किसी महान क्रांति की ही आवश्यकता पड़ती है। क्योंकि क्रांति ही वह मशाल है जो जुल्म और जालिमों द्वारा फैलाई कालिमा को दूर कर सकती है। महान कवि नामधरी सिंह दिनकर भी क्रांति की परिभाषा देते हुए कहते हैं− 'जब अचानक से आई कोई परिवर्तन की लहर इस संसार की दशा व दिशा को तेजी से बदल दे उसे क्रांति कहा जाता है। क्रांति वह धधकती ज्वाला है जो मानव के अंदर पल रहे अन्याय के भय को समाप्त कर इसके खिलाफ लड़ने की शक्ति प्रदान करती है।' और गुरु गोबिंद सिंह जी ने ऐसी ही क्रांति का आगाज़ करते हुए कहा−'चिड़ियों से मैं बाज तुड़ाऊं। तभी गोबिंद सिंह नाम कहाऊं।। 

क्रांति को अंग्रेजी में Revolution कहा जाता है जो लैटिन भाषा के शब्द revolutio से निकला है जिसका अर्थ होता है a turn around अर्थात् किसी अवस्था का बिलकुल ही पलट जाना। अगर हम अवस्था की बात करें तो संसार में रहने वाले जीवों की मुख्यतः दो अवस्थाएं होती हैं। एक है बाह्य और दूसरी है आंतरिक। बाह्य अवस्था में व्यक्तिगत, सामाजिक, आर्थिक आदि कारण आते हैं। परंतु आंतरिक कारणों में मानव का चिंतन, नैतिकता, चरित्र आदि जैसे गुण आते हैं। 

सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि हम क्रांति के द्वारा किसी की बाह्य अवस्था तो बदल सकते हैं लेकिन किसी की आंतरिक अवस्था को बदलना हमारे अधिकार क्षेत्र में नहीं आता। जैसे आप किसी को रहने के लिए अच्छा घर, अच्छे कपड़े व खाना तो दे सकते हैं लेकिन उसे मानसिक तृप्ति देना आप के वश में नहीं है। वस्तुतः यह व्यक्ति की आंतरिक अवस्था है जो उसके अंदर से उत्पन्न होती है। गुरु गोबिंद सिंह जी इस बात से भिज्ञ थे कि बाह्य क्रांति के द्वारा आप लोगों पर कुछ समय तक शासन तो कर सकते हैं लेकिन उनके अंदर आंतरिक परिवर्तन नहीं ला सकते। एवं किसी में अंदरूनी परिवर्तन लाए बिना उसे बदलना सिर्फ उसका लिबास बदलने के समान है। जिन्हें कुछ समय पश्चात फिर से बदलना पड़ सकता है। इसलिए वही क्रांति सफल मानी जाती है जिससे लोगों की सोच में भी अंतर आ जाए। इसलिए वे खालसा पंथ की सृजना करके एक आध्यात्मिक क्रांति का आगाज़ करते हैं। क्योंकि इसी के द्वारा ही समाज के बिगड़े चेहरे को फिर से संवारा जा सकता है। जिससे जालिम हुकमरानों के पैरों तले रौंदी मानवता को फिर से खुले आसमान में उड़ने के लिए पंख मिलते हैं, परिणाम स्वरूप बिचित्र सिंह जैसे डरे, सहमे, भीरु लोगों में शौर्य का संचार हो जाता है।

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उस समय औरंगजे़ब भी लोगों को जबरन मुसलमान बनने के लिए विवश कर रहा था। औरंगजे़ब ने यहीं आकर भूल की। उसने इंसान की दशा बलदने को ही उसकी दिशा बदलना समझ लिया। बाह्य लिबास व संप्रदाय बदलने के लिए वह लोगों पर अन्याय व अमानवीय अत्याचार करने लगा। परिणामतः वह न तो लोगों की दशा बदल सका एवं न ही दिशा। अपितु लोगों के अंदर एक डर, भय व सहम पैदा कर दिया। 

लेकिन श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने जब खालसे का सृजन किया तो वह उनसे शीश भी मांगते हैं। परंतु गुरु जी को बिना कोई प्रश्न पूछे उनके सेवक अपने शीश कुर्बान करने को तैयार हो जाते हैं। आइए देखते हैं अंतर कहाँ पर है? किसी की सोच बदलने या उसे अपनी सोच छोड़ने के लिए उसे नए एवं श्रेष्ठ विचार प्रदान करने पड़ते हैं। जिस पगडंडी को लोग मार्ग समझ लेते हैं उसकी बजाय उन्हें विशाल मार्ग देना पड़ता है। और इस पगडंडी से विशाल मार्ग पर आगे बढ़ना ही क्रांति से आध्यात्मिक क्रांति का सफर है। श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने 13 अप्रैल 1699 को बैसाखी वाले दिन इसी विशाल आध्यात्मिक क्रांति की स्थापना की एवं लोगों के अंदर नवचेतना का संचार किया। हम इस बात को भलीभांति जानते हैं कि श्री गुरु जी एक महान योद्धा व तलवार के धनी थे। वह तलवार के जोर पर लोगों को खालसा बना सकते थे। लेकिन उन्होंने पहले लोगों की आंतरिक अवस्था को बदलकर आध्यात्मिक क्रांति को पहल दी एवं लोगों के अंदर भक्ति एवं शक्ति के सच्चे सुमेल की स्थापना की और वे संत सिपाही कहलाए। एवं दबे कुचले लोगों धर्म, जाति, देश और खुद की रक्षा के लिए शौर्य पैदा किया। समाज पर भारी पड़ रही आतंकी शक्तियों का समूल नाश किया। सज्जनों इतिहास में ऐसे महान पन्ने किसी आध्यात्मिक पुरुष द्वारा ही लिखे जा सकते हैं। जो विश्व पटल पर संपूर्ण क्रांति का शंखनाद करते हैं। 

आज सदियां बीत जाने के बाद भी मानव श्री गुरु गोबिंद सिंह जी द्वारा दर्शाए मार्ग पर चलकर अपना जीवन धन्य कर रहा है। महापुरुष व उनकी शिक्षाएं किसी खास काल के लिए होती अपितु वह आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रकाश स्तंभ का काम करती हैं। 

इसलिए सज्जनों अगर आज हम भी समाज से भ्रष्टाचार, आतंकवाद, चरित्रहीनता, जाति−पाति, ईर्ष्या, द्वेष का समूल नाश करना चाहते हैं तो हमें भी अपने अंदर एक संपूर्ण क्रांति अर्थात आध्यात्मिक क्रांति की मशाल जगानी पड़ेगी। क्योंकि यदि हर एक व्यक्ति अपने अंदर से दूषित विचारों का नाश कर दे तो फिर समाज को सुंदर, आनंदमयी एकता के सूत्र में बंधने से कोई भी अमानवीय ताक्त नहीं रोक सकती। इसलिए आओ हम सब श्री गुरु गोबिंद सिंह जी दानवीरता को याद करते हुए उनके श्री चरणों में अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करें।

-सुखी भारती







Gyan Ganga: सुग्रीव जब मित्रता और सेवा धर्म भूले तो श्रीराम को आ गया था क्रोध

  •  सुखी भारती
  •  जनवरी 19, 2021   19:28
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Gyan Ganga: सुग्रीव जब मित्रता और सेवा धर्म भूले तो श्रीराम को आ गया था क्रोध

जब तक आपके पास खूब धन−दौलत व सामर्थ्य होगा सभी आपके साथ साये की तरह चिपटे रहेंगे। लेकिन विधि वश अगर विपरीत समय आ गया तो सभी ऐसे गायब हो जाते हैं जैसे गधे के सिर से सींग। फिर हमें ऐसे मित्रों का आखिर लाभ ही क्या?

हम विगत अंकों से श्री हनुमान जी के दिव्य चरित की महिमा व उनके समाज पर पड़ रहे उत्कृष्ट प्रभाव का अवलोकन कर पा रहे हैं। उनकी जीव को प्रभु से जोड़ने की कला व उनके पीछे छुपे परमार्थ की स्वर्ण अक्षरों में भी प्रशंसा की जाए तो कम है। कितनी विचित्र बात है कि वे स्वयं तो दास बन गए और सुग्रीव को बनवा दिया मित्र। मानो वे कहना चाह रहे हों कि हे जीव! अगर तूने किसी को मित्र बनाना ही है तो संसार में सच्चा मित्र मिलना अति दुर्लभ व कठिन है। कहने को तो सब कह देंगे कि हे मित्र! हम सदा साये की तरह आपके साथ चलेंगे। लेकिन हम इतना तो जानते ही हैं कि साया भी तो तभी तक साथ चलता है जब तक आपके समीप प्रकाश के स्रोत विद्यमान हैं। प्रकाश हो तो एक साया तो होता ही है और प्रायः अनेकों साए भी प्रकट होने लगते हैं। लेकिन कब तक? ज़रा प्रकाश का साथ घटने तो दो, अंधकार को रास्तों पर बिछने तो दें, फिर देखना। साए का कहीं नामोनिशान भी प्रतीत नहीं होगा। 

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ठीक इसी प्रकार संसार के मित्र होते हैं। जब तक आपके पास खूब धन−दौलत व सामर्थ्य होगा सभी आपके साथ साये की तरह चिपटे रहेंगे। लेकिन विधि वश अगर विपरीत समय आ गया तो सभी ऐसे गायब हो जाते हैं जैसे गधे के सिर से सींग। फिर हमें ऐसे मित्रों का आखिर लाभ ही क्या? जो केवलमात्र स्वार्थ की नींव पर टिके हों। उनके ऐसे बेबुनियाद दावे हमें आखिर कहाँ तक आधार देंगे? जिसमें शब्दों के तो बड़े से बड़े इन्द्र जाल हों लेकिन धरातल पर परिणाम शून्य ही निकले। हम बैठे हैं तो साथ बैठने वालों की संख्या बहुत हो लेकिन प्रश्न तो यह है कि साथ खड़ा कौन होता है? 

मित्रता की ही बात करें तो कर्ण और दुर्योधन में लोक मत के अनुसार गहरी मित्रता है। लेकिन इस मित्रता की आधारशिला क्या थी? यही न कि दुर्योधन ने कुंतीपुत्र कर्ण को अंग प्रदेश का राजा घोषित किया था। उसमें भी उसका कोई स्वार्थ यही था कि इतना बड़ा योद्धा मेरे सदा काम आएगा। कर्ण को भले ही राज्य का लोभ नहीं था। लेकिन मन में यह अहसास तो हावी था ही कि भरी सभा में जब सब मेरा तिरस्कार कर रहे थे तो दुर्योधन ने मुझे अंगराज बना कर सम्मान दिया। मुझे राजा बनाया और इसका ऋण मैं दुर्योधन के काम आकर चुकाऊंगा। यही वह कारण था जिसके चलते कर्ण ने दुर्योधन का अधर्म में भी साथ निभाया। तो क्या मित्र का धर्म यही था कि हमें तो बस आँखें बंद कर अपने मित्र का हर परिस्थिति में साथ देना है भले ही वह धर्म पर हो अथवा अधर्म पर। जी नहीं! वास्तविक मित्र तो वह ही है जो अपने मित्र को अधर्म के मार्ग से हटाकर धर्म की ओर उन्मुख करे। यह कैसी मित्रता है कि एक मित्र कुँए में गिर रहा है और हम उसको गिरने से बचाने के बजाय ऊँचे स्वर में यह कहते आगे बढ़ रहे हैं कि मित्र तुम अकेले कुँए में क्यों गिरोगे, रुको मैं भी तुम्हारे साथ गिरता ही गिरुंगा क्योंकि मैं तेरा सच्चा मित्र हूँ।

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भगवान श्रीराम भी सुग्रीव से मित्रता कर रहे हैं। इसलिए नहीं कि उन्हें कोई व्यक्तिगत स्वार्थ है कि सुग्रीव अपनी सेना सहित श्री सीता जी को ढुंढ़वाने में उनकी सहायता करेंगे। भला उन्हें किसी की सहायता की क्या आवश्यकता हो सकती थी। और वास्तव में तात्त्विक दृष्टि से तो श्रीसीता जी श्रीराम जी से विलग थीं ही नहीं। बस यह सब तो लीला मात्रा घटना थी। किंतु हाँ सहायता की आवश्यकता सुग्रीव को अवश्य थी। और श्रीराम ने सुग्रीव को किष्किन्धा का राज्य एवं पत्नी दिलाकर यह सहायता निश्चित ही की। उसे मान−सम्मान, पद प्रतिष्ठा सब दिया। लेकिन दुर्योधन की तरह उनका मित्र भाव कहीं भी ऐसा नहीं था मैं सुग्रीव का अपने लिए 'योग' नहीं अपितु 'प्रयोग' करूँगा। लेकिन सुग्रीव अगर श्रीराम से हुए इस पावन योग का दुरुपयोग करेगा तो अवश्य ही मैं उसे अधर्म के मार्ग से हटाकर धर्म की ओर मोडूंगा। और श्रीराम ने आगे चलकर ऐसा किया भी। क्योंकि राज्य और पत्नी मिलने के पश्चात तो सुग्रीव अपना सेवा कार्य भूल ही गया था। सिर्फ माया में मस्त होकर रह गया। प्रभु को लगा कि बारिश के चार मास बीतने के बाद भी सुग्रीव ने हमारी कोई सुध नहीं ली तो अब हमें ही उसकी सुध लेनी पड़ेगी। तो श्रीराम लक्ष्मण के समक्ष ही क्रोधित स्वर में यह घोषणा करते हैं कि सुग्रीव अपना सेवा धर्म बिसार चुका है। जिस कारण मैं उसी बाण से उसका वध करूंगा जिस बाण से मैंने बालि को मारा था−

सुग्रीवहिं सुधि मोरि बिसारी बिहारी। पावा राज कोस पुर नारी।। 

जेहिं सायक मारा मैं बाली। तेहिं सर हतौं मूढ़ कहँ काली॥

लक्ष्मण जी श्रीराम जी का यह स्वभाव देखकर एक बार तो आश्चर्य में पड़ जाते हैं कि प्रभु का स्वभाव तो सदैव क्षमा करना और सब कुछ देकर भी, सब भूल जाना ही है। लेकिन कह रहे हैं कि मैं सुग्रीव को उसी बाण से मार डालूंगा जिस से मैंने बालि को मारा था। यह देखकर लक्ष्मण मन ही मन समझ जाते हैं कि प्रभु सुग्रीव को मारने वाले बिलकुल नहीं हैं। क्योंकि प्रायः तो आजतक यही देखा गया है कि अगर कोई किसी पर क्रोधित है तो वह उसे उसी क्षण मारने के लिए दौड़ता है। और अकसर यही कहता है कि रूक तुझे मैं अभी मज़ा चखाता हूँ। लेकिन यहाँ प्रभु कह रहे हैं कि मैं आज नहीं अपितु कल मारूंगा तो इसका अर्थ है कि वे मारने−वारने वाले बिलकुल नहीं हैं। वे तो बस सुग्रीव का कोई पाप ही हर रहे हैं। श्री लक्ष्मण जी ने यह मौका पाकर कहा कि प्रभु आप बड़े हो और सुग्रीव के बड़े भाई को आपने मारा। सुग्रीव छोटा है तो उसे मारने का आदेश अपने छोटे भाई अर्थात् मुझे दीजिए न। श्रीराम ने सुग्रीव को देखा तो सोच में पड़ गए कि अरे लक्ष्मण तो सुग्रीव वध हेतु सच में ही तत्पर हो गए हैं। अरे भाई! अपने मित्र को भी भला कोई मारता है? मित्र की तो रक्षा की जाती है। हमें सुग्रीव को नहीं अपितु उसकी मूढ़ता और अज्ञानता को मारना है। इसलिए हे लक्ष्मण! सुग्रीव हमारे पास बालि के भय के कारण आया था। बालि वध के साथ ही सुग्रीव का भय भी चला गया। अब फिर से तुम भी उसको भय दिखाना, मारना मत। और भय भी इतना नहीं कि वह हमसे डर कर कहीं और दूर ही भाग जाए। बस ऐसे डराना कि भागकर भी हमारी ही तरफ आए।

भय देखाइ लै आवहु तात सखा सुग्रीव।

सज्जनों कितनी पावन व हितकारी मित्रता है श्रीराम जी की। लेकिन यह सब संभव कब हुआ जब श्री हनुमान जी सद्प्रयास करते हैं। श्री हनुमान जी आगे भी कैसे−कैसे परहित के कार्य करते हैं जानेंगे अगले अंक में...क्रमशः...

-सुखी भारती







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