आखिर घाटे वाले विदेश व्यापार को मुनाफे वाले कारोबार में कब और कैसे बदलेगा भारत?

देखा जाए तो भारत का विदेश व्यापार वर्तमान में भारी घाटे में है, जो दिसंबर 2025 में 25 अरब डॉलर तक पहुंच गया। विपरीत स्थिति यानी कारोबारी घाटा चीन, रूस, यूएई और इराक जैसे 75 देशों के साथ है जहां व्यापार घाटा हमेशा बना रहता है, क्योंकि यहां से आयात निर्यात से बहुत ज्यादा होता है।
भारत की सियासत 'वैचारिक अकाल' से पीड़ित है, जिसका असर हमारे घरेलू कारोबार के अलावा विदेश व्यापार पर भी स्पष्ट दिखाई देता है। सच कहूं तो राष्ट्र की 'आर्थिक स्वायत्तता' ही चीन और रूस जैसे देशों के समक्ष गिरवी प्रतीत हो रही है। यह ठीक है कि रूस हमारा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मददगार मित्र है, जिसके द्वारा शोषण किया जाना स्वाभाविक है। लेकिन चीन जैसे मजबूत और पड़ोसी शत्रु देश को इतना भारी कारोबारी लाभ देने के बावजूद यदि हम उसे अपना मित्र नहीं बना पाए तो यह बात सिर्फ यही चुगली करती है कि हमारी आंतरिक दलित और पिछड़ी नीतियों की वजह से भारत रणनीतिक रूप से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी पिछड़ता प्रतीत होता हैं। यही वजह है कि आर्थिक विशेषज्ञ यह सवाल दाग रहे हैं कि आखिर घाटे वाले विदेश व्यापार को मुनाफे वाले अंतरराष्ट्रीय कारोबार में कब और कैसे बदलेगा भारत?
देखा जाए तो भारत का विदेश व्यापार वर्तमान में भारी घाटे में है, जो दिसंबर 2025 में 25 अरब डॉलर तक पहुंच गया। विपरीत स्थिति यानी कारोबारी घाटा चीन, रूस, यूएई और इराक जैसे 75 देशों के साथ है जहां व्यापार घाटा हमेशा बना रहता है, क्योंकि यहां से आयात निर्यात से बहुत ज्यादा होता है। इसलिए हमारा सरकारी प्रयास निर्यात बढ़ाने पर केंद्रित हैं, लेकिन अधिशेष (सर्विस ट्रेड को छोड़कर गुड्स ट्रेड में) प्राप्त करने का कोई निश्चित समयसीमा नहीं है। वर्तमान स्थिति में भारत का व्यापार घाटा एफवाई (FY) 2026 के पहले क्वार्टर में एफटीए (FTA) देशों के साथ 59% बढ़कर चिंताजनक स्तर पर पहुंच गया, जहां निर्यात 9% गिरा और आयात 10% बढ़ा। आंकड़े बताते हैं कि दिसंबर 2025 में यह 25.04 अरब डॉलर रहा, जबकि अनुमान 2027 तक -32 अरब डॉलर का है। यानी वर्तमान के साथ साथ निकट भविष्य भी अंधकारमय है।
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खासकर रूस, चीन और आसियान जैसे साझेदारों के साथ ही घाटा प्रमुख समस्या बनी हुई है। रूस तो भारत का भरोसेमंद मित्र है, हथियार व तकनीकी आपूर्तिकर्ता है। लेकिन चीन के खिलाफ आसियान देश समूह को संतुलित करने/रखने की नीति हम पर अब भारी महसूस हो रही है। लुक ईस्ट की नीति भी सफेद हाथी साबित हुई। हां, लाभ देने वाले पश्चिमी देशों को यदि विकल्प दिखाकर काबू में रखना है तो फिर कुछ नहीं कहना। क्योंकि यूरोपीय संघ से मुक्त व्यापार समझौता (एफटीए) होते ही अमेरिकी अकड़ ढीली पड़ गई और उसके साथ भी एफटीए हो गया।
हालांकि भारत की कारोबारी चुनौतियाँ यह हैं कि चीन, रूस और कोरिया के अलावा स्विट्जरलैंड, यूएई, इराक जैसे देशों से आयात अधिक है, जबकि अमेरिकी कूटनीतिक व रणनीतिक टैरिफ ने निर्यात प्रभावित किया, जबकि अब इसका खतरा टल गया है क्योंकि अमेरिका ने टैरिफ घटाकर 18 प्रतिशत कर दिया है। वहीं, एफटीए (FTA) के बावजूद आसियान निर्यात गिरा, और सोना-तेल आयात घाटा बढ़ा रहा। मसलन, लॉजिस्टिक्स, अनुपालन लागत और वैश्विक टैरिफ हमारे विदेश व्यापार की प्रमुख बाधाएँ हैं। फिर भी भविष्य की संभावनाएँ बरकरार हैं। खासकर घाटा कम करने के लिए निर्यात विविधीकरण, जीवीसी (GVC) एकीकरण और अवसंरचना सुधार आवश्यक हैं, लेकिन पूर्वानुमान 2027 तक भी घाटा दिखाते हैं।
कहना न होगा कि भारत का विदेश व्यापार घाटा मुख्य रूप से चीन, रूस, स्विट्जरलैंड, यूएई और सऊदी अरब जैसे देशों के साथ है। दरअसल, यह घाटा ऊर्जा आयात, इलेक्ट्रॉनिक्स और कच्चे माल की उच्च निर्भरता के कारण बढ़ रहा है। इसलिए भारत को नीतिगत दूरदर्शिता दिखाते हुए इन घाटों पर काबू पाना होगा। आंकड़े बताते हैं कि भारत के शीर्ष व्यापारिक साझेदारों में से अधिकांश (शीर्ष 10 में 9) के साथ हमारा घाटा वाला कारोबार है:-
पहला, चीन: सबसे बड़ा घाटा (2024-25 में $99.2 बिलियन, 2025 में $116 बिलियन तक), वजह- इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, APIs और केमिकल्स आयात से।
दूसरा, रूस: $57 बिलियन (2023-24), वजह- मुख्यतः कच्चा तेल आयात से।
तीसरा, यूएई: $9.47 बिलियन, वजह- तेल और सोना आयात।
चतुर्थ, स्विट्जरलैंड: वजह- सोना और घड़ियां आयात से।
पांचवां, इराक: वजह- कच्चा तेल।
छठा- सऊदी अरब: वजह- कच्चा तेल।
बताया जाता है कि उपर्युक्त देशों से घाटे के कारण रणनीतिक तैयारियों में कमियां और भीतरघात की सियासत व कूटनीति है। इन देशों से व्यापार घाटा का मतलब है कि भारत में इन देशों से आयात ज्यादा है, जबकि इन देशों को भारत से निर्यात कम होने से है, खासकर ऊर्जा (तेल 80% आयातित) और मैन्युफैक्चरिंग इनपुट्स क्षेत्र में।जहां चीन के साथ संकीर्ण निर्यात (कच्चा माल), बाजार बाधाएं, और सस्ते आयात की समस्या है। वहीं, रूस/यूएई से तेल आयात में वृद्धि, और निर्यात सम्बन्धी बाधाएं हैं। इस तरह से मुक्त व्यापार समझौते (FTA) वाले देशों के साथ घाटा 59% बढ़ा (2025-Q1) है। हालिया आंकड़े बताते हैं कि दिसंबर 2025 में कुल घाटा $25 बिलियन तक पहुंच चुका है। वित्त वर्ष (FY) 25 में चीन के साथ यह रिकॉर्ड उच्च स्तर है। जबकि सरकार पीएलआई (PLI) जैसी आकर्षक योजना से आयात कम करने की कोशिश कर रही है।
सवाल है कि मुक्त व्यापार समझौता (FTA) वाले देश कौन कौन से हैं जिनके साथ भारत का घाटा बढ़ा है, तो जवाब होगा कि भारत के एफटीए (FTA) देशों के साथ व्यापार घाटा अप्रैल-जून 2025 (Q1 FY26) में 59.2% बढ़कर $26.6 बिलियन हो गया है। कहने का तातपर्य यह कि भारत में आयात 10% बढ़े जबकि निर्यात 9% गिरे, जो हमारी रणनीतिक आर्थिक चौकसी में कमी को दर्शाता है नीति आयोग की एक रिपोर्ट के अनुसार, निम्नलिखित देश भारत के विदेश व्यापार घाटे में योगदान दे रहे हैं। इन देश/समूह से कारोबारी घाटे का कारण/ट्रेंड निम्नलिखित हैं-
पहला, आसियान (ASEAN) समूह के देशों यानी सिंगापुर, मलेशिया, थाईलैंड को निर्यात में 16.9% गिरावट (सिंगापुर -13.3%, मलेशिया -39.7%) आई।
दूसरा, यूएई से आयात बिल बढ़ा, जबकि निर्यात 2.1% गिरा।
तीसरा, दक्षिण कोरिया से आयात बढ़ोतरी हुई।
चतुर्थ, जापान से भी आयात बढ़ोतरी देखी गई।
पंचम, ऑस्ट्रेलिया को निर्यात में -8.7% से -10.9% कमी आई।
छठा, सऊदी अरब को भी निर्यात -8.5 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई।
इसका कारण आसियान (ASEAN) के साथ पुनर्समझौता में देरी और आयात में इलेक्ट्रॉनिक्स, तेल की वृद्धि हुई; जबकि निर्यात में कमी आई है। वहीं, FTA पुनः समझौता (renegotiation) भी लंबित है। शायद इसलिए सरकारी रणनीतियाँ बदली हैं। अब एक्सपोर्ट प्रमोशन मिशन (EPM) के तहत 25,060 करोड़ रुपये की योजना 2025-31 तक चल रही, जिसमें ब्याज सब्वेंशन, क्रेडिट गारंटी और ई-कॉमर्स निर्यात को बढ़ावा मिलेगा। वहीं, फॉरेन ट्रेड पॉलिसी 2023 (बिना समाप्ति तिथि) निर्यात प्रक्रियाओं को सरल बनाती है, SEZ को मजबूत करती है और RoDTEP जैसे स्कीम्स बहाल किए गए। जबकि चीन से घाटा कम करने हेतु पीएम नरेंद्र मोदी ने द्विपक्षीय बातचीत पर जोर दिया है। वहीं, निर्यात बढ़ाने वाली योजनाएँ: (जैसे NIRYAT PROTSAHAN) MSME को लक्षित कर रही हैं, जो लंबी अवधि में अधिशेष की दिशा में ले जा सकती हैं। कोई विशिष्ट समयसीमा नहीं, लेकिन सुधारों से 1-2% GDP पर CAD स्थिर रह सकता है।
वहीं, भारत सरकार ने निर्यात बढ़ाने के लिए कई प्रमुख योजनाएं शुरू की हैं, जो मुख्य रूप से MSME, श्रम-प्रधान क्षेत्रों और पहली बार निर्यात करने वालों पर केंद्रित हैं। ये योजनाएं वित्तीय सहायता, लॉजिस्टिक्स सुधार और बाजार पहुंच को मजबूत करती हैं।
पहला, निर्यात संवर्धन मिशन (EPM) के तहत 2025-26 से 2030-31 तक 25,060 करोड़ रुपये की प्रमुख योजना चलाई जा रही है, जो MSME और श्रम-गहन निर्यात को बढ़ावा देती है। इसमें ब्याज सब्सिडी, क्रेडिट गारंटी (20,000 करोड़ तक), ई-कॉमर्स निर्यात क्रेडिट कार्ड और बाजार पहुंच सहायता शामिल है।
दूसरा, क्रेडिट गारंटी योजना (CGSE) निर्यातकों के लिए 100% सरकारी गारंटी वाली यह योजना संपार्श्विक-मुक्त ऋण उपलब्ध कराती है, विशेषकर MSME को अतिरिक्त कार्यशील पूंजी देती है। यह 31 मार्च 2026 तक वैध है और नए बाजारों में प्रवेश आसान बनाती है।
तीसरा, RoDTEP (Remission of Duties and Taxes on Exported Products) के तहत निर्यात पर लगने वाले कर्तव्यों की प्रतिपूर्ति करता है।
चतुर्थ, PLI स्कीम्स (Production Linked Incentive) अंतर्गत विनिर्माण क्षेत्रों में उत्पादन बढ़ाने पर प्रोत्साहन देती हैं।
पंचम, जिला निर्यात हब अंतर्गत जिलों में निर्यात क्षमता वाले उत्पादों की पहचान और प्रोत्साहन जारी है।
छठा, पीएम (PM) गति शक्ति और राष्ट्रीय लॉजिस्टिक्स नीति अंतर्गत लॉजिस्टिक्स लागत घटाने पर फोकस किया गया है।
इस प्रकार सरकार अब उपर्युक्त सभी योजनाओं के कार्यान्वयन पर भी फोकस कर रही है, क्योंकि ये योजनाएं डिजिटल प्लेटफॉर्म पर परिणाम-आधारित हैं, जो 'विकसित भारत @2047' लक्ष्य को सपोर्ट करती हैं। MSME को प्राथमिकता से निर्यात विविधीकरण और वैश्विक प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी।
आपको यह भी जानना चाहिए कि भारत मुख्य रूप से अमेरिका, नीदरलैंड जैसे 151 देशों के साथ व्यापार सरप्लस (मुनाफा) प्राप्त करता है। 2024 के जनवरी-जून के आंकड़ों के अनुसार, अमेरिका से 21 अरब डॉलर और नीदरलैंड से 11.6 अरब डॉलर का सरप्लस रहा। इस प्रकार प्रमुख देश अमेरिका भारत का सबसे बड़ा सरप्लस साझेदार है, जहां होने वाला निर्यात वहां से होने वाले आयात से कहीं अधिक है। इसी प्रकार नीदरलैंड से व्यापार 11.6 अरब डॉलर का सरप्लस है। वहीं अन्य यूरोपीय देशों और विकसित बाजारों के साथ कुल 151 देशों में भारत का व्यापार सरप्लस है। भारत का वैश्विक व्यापार सरप्लस वाले देशों से लाभान्वित होता है।
ऐसे में स्वाभाविक सवाल है कि ट्रेड सरप्लस वाले टॉप 10 देश कौन कौन से हैं? तो यह जान लीजिए कि भारत के साथ ट्रेड सरप्लस (मुनाफे का व्यापार) वाले टॉप देशों की बात करें तो हालिया आंकड़ों के अनुसार अमेरिका और नीदरलैंड सबसे आगे हैं। वर्ष 2024 की पहली छमाही (जनवरी-जून) में भारत को 151 देशों से सरप्लस मिला, जिनमें प्रमुख हैं: देश और उससे सरप्लस राशि (अरब डॉलर) में- अमेरिका- 21.4 अरब डॉलर, नीदरलैंड- 11.6 अरब डॉलर, बेल्जियम - 8-10 अरब डॉलर (अनुमानित), इटली- उच्च सरप्लस, जर्मनी- मध्यम सरप्लस, फ्रांस- मध्यम सरप्लस, स्पेन- सरप्लस श्रेणी, ब्रिटेन- सरप्लस, सिंगापुर- कुछ हद तक और ऑस्ट्रेलिया- सरप्लस।
बता दें कि ये आंकड़े जीटीआर (GTR) रिपोर्ट पर आधारित हैं, जहां अमेरिका सबसे बड़ा साझेदार है। वहीं पूर्ण टॉप-10 सूची वित्त वर्ष 2023-24 तक अमेरिका, यूरोपीय देशों पर केंद्रित रही। जहां कुल सरप्लस रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा। सवाल है कि ट्रेड सरप्लस वाले टॉप देशों के मुख्य निर्यात उत्पाद क्या हैं? तो जवाब होगा कि भारत के ट्रेड सरप्लस वाले टॉप देशों (जैसे अमेरिका, नीदरलैंड) को भारत मुख्यतः फार्मास्यूटिकल्स, इलेक्ट्रॉनिक्स, रत्न-आभूषण, वस्त्र, चमड़ा उत्पाद और इंजीनियरिंग सामान निर्यात करता है।
अमेरिका (शीर्ष साझेदार): भारत अमेरिका को दवाइयां (जेनरिक दवाएं), सॉफ्टवेयर सेवाएं, रत्न-आभूषण और वस्त्र निर्यात करता है। ये निर्यात आयात (तेल, मशीनरी) से कहीं अधिक हैं, जिससे 21 अरब डॉलर का सरप्लस बनता है।
नीदरलैंड (उपशीर्ष साझेदार): नीदरलैंड को पेट्रोलियम उत्पाद, फार्मा, इलेक्ट्रॉनिक्स और रसायन भेजे जाते हैं। यह यूरोप का प्रवेश द्वार होने से री-एक्सपोर्ट बढ़ाता है।
वहीं, अन्य प्रमुख देश और उनको होने वाला मुख्य निर्यात उत्पाद निम्नलिखित है-
बेल्जियम- फार्मा, रसायन, आभूषण। इटली- चमड़ा, वस्त्र, जूते। जर्मनी- मशीनरी पार्ट्स, ऑटो कंपोनेंट्स। फ्रांस- वस्त्र, आभूषण, चमड़ा। स्पेन- कृषि उत्पाद, मसाले।
दरअसल, ये उत्पाद सरप्लस का आधार हैं, खासकर PLI योजनाओं से बढ़ावा पाकर। बताया जाता है कि भारत सरकार इनमें से बहुत सारे देशों जैसे- अमेरिका, यूरोपीय संघ, ब्रिटेन, ओमान आदि के साथ मुक्त व्यापार समझौता कर चुकी है, इसलिए इनके साथ विदेश व्यापार लाभ और बढ़ने की उम्मीद है। इसलिए भारत सरकार ने MSME निर्यातकों के लिए क्रेडिट गारंटी योजना (CGSE) को हाल ही में विस्तार दिया है, जो 20,000 करोड़ रुपये तक की 100% गारंटी कवरेज प्रदान करती है। यह योजना नेशनल क्रेडिट गारंटी ट्रस्टी कंपनी (NCGTC) के माध्यम से कार्यान्वित होती है और बिना संपार्श्विक के अतिरिक्त कार्यशील पूंजी ऋण सुनिश्चित करती है।
इस योजना का उद्देश्य यह है कि इस योजना के तहत MSME निर्यातकों को वैश्विक बाजारों में प्रतिस्पर्धा बढ़ाने, नए बाजारों में प्रवेश और लिक्विडिटी सुधारने के लिए मदद दी जाती है क्योंकि यह योजना इसी नजरिए से डिज़ाइन की गई है। मौजूदा निर्यात क्रेडिट सीमा के 20% तक अतिरिक्त ऋण उपलब्ध कराती है, जो कारोबार निरंतरता और रोजगार संरक्षण पर फोकस करती है। 31 दिसंबर 2025 तक 1,788 आवेदनों में से 716 को 3,141 करोड़ रुपये मंजूर हो चुके हैं।
जहां तक इस योजना की प्रमुख विशेषताओं की बात है तो गारंटी कवरेज के तहत सदस्य ऋणदाता संस्थाओं (MLIs) को 100% क्रेडिट गारंटी, विशेषकर प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष निर्यातकों के लिए। इसकी ऋण सीमा 20,000 करोड़ रुपये तक अतिरिक्त बिना गारंटी वाला क्रेडिट है। इसकी अवधि: 31 मार्च 2026 तक वैध है। इससे लाभ यह हुआ कि MSME को क्षमता निर्माण, बाजार विविधीकरण और वैश्विक चुनौतियों से निपटने में मदद मिली।
जहां तक इस योजना की पात्रता और कार्यान्वयन का सवाल है तो MSME और अन्य पात्र निर्यातक MLIs के माध्यम से आवेदन कर सकते हैं। यह एक्सपोर्ट प्रमोशन मिशन (EPM) का हिस्सा है, जो 'विकसित भारत @2047' को सपोर्ट करता है। इससे निर्यात इकोसिस्टम मजबूत होगा। इससे स्पष्ट है कि भारत घाटे वाले विदेश व्यापार को मुनाफे वाले कारोबार में बदलने के लिए ततपर है और जिन देशों से वह कारोबारी मुनाफे में है, उनके साथ कारोबारी विस्तार करने के लिए प्रयत्नशील भी दिखाई देता है। कांग्रेस और समाजवादी मूल की यूपीए सरकारों की अपेक्षा भाजपा की एनडीए सरकार की उपलब्धि इस दिशा में बोल रही है।
- कमलेश पाण्डेय
वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
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