सत्ता की निष्कंटक राह बरास्ते सुनेत्रा की ताजपोशी

महाराष्ट्र में भले ही शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को पिछले विधानसभा चुनाव में सफलता नहीं मिली हो, लेकिन राज्य की राजनीति के सबसे मंजे हुए खिलाड़ी शरद पवार हैं। यह बात छुपी हुई नहीं है कि राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के दोनों धड़ों के बीच सुलह और एकीकरण की बात चल रही थी।
राजनीति जज्बात से नहीं, हालात के हिसाब से चलती है। महाराष्ट्र में सुनेत्रा पवार का शपथ ग्रहण इसका उदाहरण है। सुनेत्रा के आंसू अभी सूखे भी नहीं, पति अजित पवार के निधन के शोक से उबरना तो दूर की बात है। फिर भी उन्होंने सियासी तकाजे को ही प्राथमिकता दी और महाराष्ट्र की पहली महिला उपमुख्यमंत्री बनकर इतिहास रच दिया। पारिवारिक वज्रपात के बीच सिंहासन पर बैठने को लेकर उनकी आलोचना स्वाभाविक है, क्योंकि समाज के सोचने का अपना ढंग है। सियासी हस्तियों से भी उसे सामाजिक परंपराओं और पारिवारिक संस्कारों को अपनाने की उम्मीद रहती है। सुनेत्रा सामाजिक सवालों से बच नहीं सकतीं। लेकिन सवाल यह है कि सुनेत्रा की ताजपोशी से महाराष्ट्र की राजनीति पर क्या प्रभाव पड़ने जा रहा है? प्रश्न यह भी उठता है कि आखिर क्या वजह रही कि सुनेत्रा ने आनन-फानन में शपथ ले ली। महाराष्ट्र के राजभवन में जनवरी महीने के आखिरी दिन जो राजनीतिक इतिहास रचा गया, उसकी कहानी किसने लिखी थी।
महाराष्ट्र में भले ही शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को पिछले विधानसभा चुनाव में सफलता नहीं मिली हो, लेकिन राज्य की राजनीति के सबसे मंजे हुए खिलाड़ी शरद पवार हैं। यह बात छुपी हुई नहीं है कि राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के दोनों धड़ों के बीच सुलह और एकीकरण की बात चल रही थी। शरद पवार तो खुलकर स्वीकार भी कर चुके हैं कि उनकी ओर से जयंत पाटिल, अजित पवार से बात कर रहे थे। कहा तो यहां तक जा रहा है कि 12 फरवरी को दोनो पार्टियों के विलय पर अजित और शरद में सहमति हो चुकी थी। लेकिन अजित के न रहने के बाद समीकरण बदल गए। अजित के साथ गए अहम नेताओं प्रफुल्ल पटेल, आर आर पाटिल और सुनील तटकरे जैसे नेताओं की आशंकाएं बढ़ गईं। उन्हें डर था कि अगर विलय हुआ तो शरद पवार की पार्टी पर नियंत्रण बढ़ जाएगा। इसके चलते सुप्रिया सुले की पार्टी पर पकड़ बढ़ जाएगी। सुप्रिया के नियंत्रण में इन नेताओं का काम करना असहज होता। प्रफुल्ल कभी शरद पवार के बेहद नजदीकी होते थे। अजित के साथ जाकर एक तरह से उन्होंने शरद पवार के साथ दगाबाजी ही की है। उन्हें ज्यादा आशंका थी कि विलय के बाद पार्टी पर पकड़ होने के चलते शरद के बहाने सुप्रिया का चाबुक उन पर चल सकता है। लेकिन अगर पार्टी अलग रहती है और सुनेत्रा के हाथ कमान रहती है तो इन नेताओं की सियासी सेहत बनी और बची रह सकती है। यही वजह है कि अजित के निधन के चलते हुए आधिकारिक शोक की मियाद खत्म होते ही प्रफुल्ल पटेल, सुनील तटकरे जैसे नेता सक्रिय हो गए। विधायक दल की बैठक बुलाई गई और सुनेत्रा को तत्काल उसका नेता चुनकर उप मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के लिए तैयार कर लिया गया। शरद पवार भले ही इस सियासी पटकथा का लेखक सुनील तटकरे और प्रफुल्ल पटेल को मानते हों, लेकिन महाराष्ट्र के सियासी हलकों में कहा जा रहा है कि असल में यह पटकथा राज्य की बीजेपी ने लिखा है। पटेल और तटकरे जैसे नेताओं ने सिर्फ इसे अमल में लाने में भूमिका निभाई है।
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सवाल उठ सकता है कि अगर सुनेत्रा शपथ नहीं लेतीं तो क्या बीजेपी की सियासी सेहत गड़बड़ा सकती थी, क्योंकि राज्य में बीजेपी के 132 और एकनाथ शिंदे की अगुआई वाली शिवसेना के 57 विधायक हैं। राज्य में बहुमत के लिए महज 145 सीटें चाहिए होती हैं। इस लिहाज से देखें तो बीजेपी की अगुआई वाली सरकार को कोई खतरा नहीं होने जा रहा था। अजित समेत एनसीपी के 41 विधायक पिछले चुनाव में चुने गए हैं। अजित के न रहने पर यह संख्या 40 रह गई है। लेकिन बीजेपी की चिंता दूसरी है। शरद पवार की राजनीतिक स्थिति भले ही ठीक ना हो, लेकिन जैसे ही दोनों एनसीपी का विलय होता, शरद ताकतवर होकर उभरते। महाराष्ट्र का यह चाणक्य एक बार फिर स्थापित होता और बीजेपी के लिए नई सिरदर्दी खड़ी हो जाती। शरद पवार इतने प्रभावी और सियासी रूप से तिकड़मी हैं कि बीजेपी के लिए संकट बनकर उभर जाते। उनकी प्रभावी सक्रियता के चलते शिवसेना के गुटों को भी एक करने की वे कोशिश कर सकते थे। भले ही यह सोच कल्पना लग रही हो, लेकिन एकबारगी स्वीकार कर लें कि ऐसा होता तो महाराष्ट्र की राजनीति कैसी होती।
महाराष्ट्र में जिला परिषदों के चुनाव हो रहे हैं। पहले विधानसभा और बाद में स्थानीय निकाय चुनावों में कांग्रेस की अगुआई वाली महाविकास अघाड़ी को सफलता नहीं मिली। अजित पवार के न रहने के चलते कांग्रेस को सक्रिय होना चाहिए था। अजित की अगुआई वाले जिला परिषद उम्मीदवार उनके न रहने की वजह से थोड़े आशंकित और निराश भी हैं। इस निराशा को कांग्रेस भुना सकती थी। वह एनसीपी के उम्मीदवारों पर डोरे डाल सकती थी और अपने उम्मीदवारों को नए जोश से भर सकती थी। अजित बेशक सत्ता में थे, लेकिन उन्हें विपक्षी खेमे के लिए अब भी हसरतभरी निगाह से ताकतवर नेता के रूप में देखा जा रहा था। अजित के न रहने के बाद विपक्षी नेतृत्व के लिए आसमान खुल गया है। शरद पवार की उम्र हो गई है। शरद के बाहर जाने के बाद से ही कांग्रेस राज्य में कमजोर हुई है। सुप्रिया सुले का नेतृत्व ऐसा नहीं है कि वह राज्यव्यापी प्रभाव हासिल कर पाए। यह माहौल कांग्रेस के लिए ज्यादा उपयुक्त हो सकता है। ऐसे माहौल में कांग्रेस को अपने ताकतवर नेतृत्व को स्थानीय स्तर पर आगे लाना चाहिए था। लेकिन वह ऐसा करती नहीं दिख रही। 2014 के बाद से उसने जिस नैरेटिव युद्ध की शैली को अपनाया है, राष्ट्रीय स्तर पर उसी युद्ध प्रक्रिया को जारी रखे हुए है। पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व के पास फुर्सत नहीं है कि वह महाराष्ट्र या किसी अन्य राज्य की राजनीति के बारे में स्थानीय जरूरतों के लिहाज से सोचे और स्थानीय समुदायों के लिए उन्हीं के बीच से प्रभावी नेतृत्व उभारे।
रणनीतिक लिहाज से देखें तो महाराष्ट्र में बीजेपी सभी दलों पर एक बार फिर बीस पड़ती नजर आ रही है। उसने सुनेत्रा को अपने खेमे में लाकर एक तीर से दो निशाने साध लिए हैं। उसने एनसीपी की ओर निश्चिंतता हासिल कर ली है, शरद पवार को एक बार फिर किनारे रखने में सफल हुई है और अपने लिए खतरा बनने की शरद की संभावनाओं को एक तरह से नेस्तनाबूद कर दिया है।
महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई देश की आर्थिक राजधानी भी है। इसी वजह से केंद्रीय सत्ता के बाद सबसे ज्यादा प्रभावशाली महाराष्ट्र की सत्ता मानी जाती है। माना जाता है कि कारपोरेट और औद्योगिक जगत पर सबसे ज्यादा पकड़ महाराष्ट्र के सिंहासन की होती है। मौजूदा राजनीति में आर्थिकी सबसे ज्यादा प्रभावी है। महाराष्ट्र की सत्ता पर पकड़ देश की आर्थिक ताकतों की नब्ज पर पकड़ बनाती है। यह बताने की जरूरत नहीं है कि बीजेपी अपनी इस पकड़ को कमजोर होते नहीं देखना चाहती। इसलिए उसने सुनेत्रा को साधने में देर नहीं लगाई। इसके लिए एनसीपी के ही नेताओं को अपना औजार बनाया और सफल रही। वैसे भी शरद पवार उम्र के उस पड़ाव पर हैं, जहां से उनके लिए गुंजाइश कम है। उनके पास सक्रिय रहने के लिए ज्यादा वक्त नहीं है। बेशक वे अब भी कमजोर हों, लेकिन बीजेपी के लिए सबसे बड़ी चुनौती उद्धव ठाकरे नहीं, शरद पवार ही हैं। सुनेत्रा को अपने खेमें में लाकर बीजेपी ने शरद की इस बची-खुची चुनौती भी खत्म करने में कामयाब रही है। सुनेत्रा के साथ से एकनाथ शिंदे के लिए महायुति से बाहर निकलने की सोचना या बीजेपी पर दबाव बढ़ाने का मौका खत्म हो जाता है। कुछ ऐसी ही स्थिति शिंदे के साथ के चलते सुनेत्रा की भी रहेगी। बीजेपी सुनेत्रा के जरिए शिंदे को संतुलित करेगी तो शिंदे के जरिए सुनेत्रा को काबू में रखेगी।
-उमेश चतुर्वेदी
लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तम्भकार हैं
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