Gyan Ganga: रावण दरबार में हनुमानजी की रक्षा के लिए प्रभु श्रीराम ने किसे भेजा था?

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सुखी भारती । May 17, 2022 2:57PM
श्रीहनुमान जी ने जैसे ही रावण के मुख से कटु भाषण सुना तो उन्हें भी क्रोध आ गया। अभी तक जो श्रीहनुमान जी बड़ी मीठी-मीठी वाणी का प्रयोग कर रहे थे, वे अचानक पलटवार पर उतारू हो गए। श्रीहनुमान जी ने कहा कि रे दुष्ट रावण! तू भला मुझे क्या मारेगा।

रावण को श्रीहनुमान जी से इतना कटु भाव नहीं था, जितना कि उस समय हो उठा, जब-जब श्रीहनुमान जी ने रावण को श्रीराम जी की महिमा सुनाई और बार-बार इसी बात पर बल दिया, कि वह समस्त पापों का त्याग करके, प्रभु श्रीराम जी की शरणागति को प्राप्त करे। रावण सोचता है, कि कमाल का मूर्ख वानर है। इसके उपदेश तो ऐसे हैं, कि बड़े-बड़े विद्वान भी इसके समक्ष नत्मस्तक हो जायें। लेकिन इस मंदबुद्धि को इतना-सा ज्ञान क्यों नहीं है, कि मैं भला उन निर्बल वनवासियों की शरणागति क्यों होऊंगा। वो मुझसे कोई श्रेष्ठ थोड़ी न हैं? वे श्रेष्ठ होते, तो अपनी पत्नि की रक्षा करने में समर्थ न होते? रही बात हे वानर तुम्हारी, तो तुम मनोरंजन के लिए तो अच्छे हो। लेकिन तुम यह कैसे मान कर बैठ गए, कि मैं तुम्हारे उपदेश मान कर तुम्हारा चेला बनना स्वीकार कर लूँगा। हमने तुम्हें रुचिकर जान, तुमसे कुछ बातें क्या कर लीं, तुम तो सिर पर ही चढ़ कर बैठ गए। चलो यह भी बढ़िया है। संसार में यह भी एक व्यंग्य के तौर पर जाना जायेगा, कि रावण का गुरु एक बँदर भी हुआ था। यह सोच कर तो मेरी हँसी रोके नहीं रुक रही है-

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‘जदपि कही कपि अति हित बानी।

भगति बिबेक बिरति नय सानी।।

बोला बिहसि महा अभिमानी।

मिला हमहि कपि गुर बड़ ग्यानी।।’

रावण जो अभी तक तो श्रीहनुमान जी की खरी-खोटी जैसे-तैसे सुन रहा था। लेकिन अब उसकी कलुषित वाणी विष उगलने लगी। रावण ने कहा कि रे दुष्ट वानर! तेरा साहस कैसे हुआ, कि तू हमें उपदेश दे। मैं कब से तेरा मुँह ताके जा रहा हूँ। वह भी इस आशा में कि तू अपनी जिह्वा व शब्दों को लगाम देगा। लेकिन तूने हमारी शिष्टता को, ऐसे ही, हल्के में ही ले लिया? लेकिन अब हम और नहीं सहेंगे। हम तुम्हें तुम्हारे अपराधों का दण्ड अवश्य देंगे। और दण्ड में मृत्यु से कम तो तुम्हें कुछ देना ही नहीं। अगर तू सोच रहा है, कि तुम्हें कौन से अपराध के चलते मृत्यु दण्ड दिया जा रहा है, तो हे दुष्ट वानर सुन! तूने मेरे पुत्र अक्षय कुमार सहित अनेकों राक्षसों को मार डाला, तो इस सबका मुझे वह दुख नहीं, जितना कि इसका, कि तू एक वानर होकर, मुझे शिक्षा कैसे देने चला था। मेरी दृष्टि में इसका फल केवल और केवल तुम्हारी मृत्यु ही है-

‘मृत्यु निकट आई खल तोही।

लागेसि अधम सिखावन मोही।।’

श्रीहनुमान जी ने जैसे ही रावण के मुख से यह कटु भाषण सुना। तो उन्हें भी क्रोध आ गया। अभी तक जो श्रीहनुमान जी बड़ी मीठी-मीठी वाणी का प्रयोग कर रहे थे, वे अचानक पलटवार पर उतारू हो गए। श्रीहनुमान जी ने कहा कि रे दुष्ट रावण! तू भला मुझे क्या मारेगा। देखना, इसका उलट न हुआ तो कहना। अर्थात मैं नहीं, अपितु तुम ही मारे जाओगे-

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‘उलट होइहि कह हनुमान।

मतिभ्रम तोर प्रगट मैं जाना।।’

रावण ने जब श्रीहनुमान जी के श्रीमुख से अपने बारे में ऐसे कठोर वचन सुने, तो वह क्रोध से तिलमिला उठा। वह ऐसा कुपित हुआ, कि तुरन्त आदेश देता है, कि हे सैनिकों, इस वानर को तत्काल मृत्यु के घाट उतार दो। यह सुनते ही सभी राक्षस श्रीहनुमान जी की ओर दौड़े, और उन्हें मारने का प्रयास करते हैं। हालाँकि सभी राक्षस अभी भी श्रीहनुमान जी से थर-थर काँप रहे हैं। कारण कि श्रीहनुमान जी के बल व सामर्थ्य का संपूर्ण लंका नगरी में आतंक ही इतना था, कि श्रीहनुमान जी भले ही इस समय पाश में बँधे दिख रहे हैं। लेकिन तब भी राक्षस, श्रीहनुमान जी को हाथ डालने में संकुचा रहे हैं। लेकिन उनका संकुचाना भी आखिर कब तक चलता। कारण कि सामने रावण बैठा सबको घूर रहा था, कि राक्षस वानर को मार क्यों नहीं रहे। तो राक्षसों के पास, अब बिना प्रहार के कोई रास्ता भी तो नहीं बचा था। अब जैसे ही राक्षसों ने, श्रीहनुमान जी पर प्रहार करने करने का निर्णय लिया, और प्रहार बस करने को ही थे, कि उसी समय वहाँ कोई आन पहुँचा। जिसने सभा में घट रहे इस नाटक का पूरा पासा ही पलट दिया। श्रीहनुमान जी बस इसी चिंतन में ही थे, कि ब्रह्मा जी के पाश से मुक्त हों, अथवा नहीं। कारण कि अगर हमने कोई ‘एक्शन’ नहीं लिया, तो यह राक्षस निश्चित ही अपने मनोरथ में सफल हो जायेंगे। माना कि हम इस पाश से मुक्त भी न हुए। तो ऐसे में ते प्रभु श्रीराम ही किसी को भेजेंगे। कारण कि अशोक वाटिका में रावण भी, जब माता सीता जी पर चँद्रहास खडग का प्रहार करते वाला था, तो प्रभु श्रीराम जी ने रानी मंदोदरी को ही, माता सीता जी की रक्षार्थ खड़ा किया था। उस समय तो माता सीता जी पर प्राणों का संकट प्रभु ने टाल दिया। लेकिन प्राण संकट की बारी अब हमारी है। मैं भी इस चिंतन में तो था ही, कि क्या मेरी रक्षा के लिए भी प्रभु किसी को भेजेंगे, अथवा मुझे स्वयं ही अपने हाथ-पाँव चलाने पड़ेंगे। लेकिन मान गये प्रभु आपको भी न। क्या सही समय आपने अपना दूत भेजा। ओर दूत भी आप ऐसा भेजते हैं, कि रावण सहित संपूर्ण सभा में कोई उसका प्रतिकार ही नहीं कर पाता। पहले आपने रानी मंदोदरी का चयन किया, और अब इन महोदय का चयन किया है? चलो देखते हैं, अब आपकी कौन-सी लीला घटती है।

कौन था, जो श्रीहनुमान जी की रक्षा हेतु प्रगट हुआ था। क्या वह भद्र पुरुष अपने लक्षय में सफल हो पाता है, अथवा नहीं। जानेंगे अगले अंक में---(क्रमशः)---जय श्रीराम।

-सुखी भारती

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