निर्मलाजी सिर्फ ओला और उबर ही नहीं और भी कई कारण हैं इस मंदी के

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कुछ आंकड़ों के जरिये हम आपके सामने अपनी बात को स्पष्ट करते हैं। समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक वित्त वर्ष 2018 में ओला को 2,842.2 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है जबकि इससे पहले के वित्त वर्ष में ओला को 4,897.8 करोड़ रुपये की हानि हुई थी।

देश की अर्थव्यवस्था में इस समय मंदी का माहौल नजर आ रहा है और इसका प्रभाव वैसे तो विभिन्न सेक्टरों पर दिख रहा है लेकिन ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री की हालत कुछ ज्यादा ही खराब नजर आ रही है। लंबे समय बाद ऐसा हुआ कि वाहन विनिर्माता कंपनियों को अपना उत्पादन एक या दो दिन के लिए बंद भी करना पड़ा क्योंकि बिक्री कम हो जाने के चलते स्टॉक रखने की जगह ही नहीं बची है। वाहन उद्योग सरकार से लगातार राहत की गुहार कर रहा है, जीएसटी को 28 प्रतिशत से 18 प्रतिशत पर लाने की मांग कर रहा है, बैंक ब्याज दरों को और कम करने की मांग कर रहा है लेकिन सरकार की ओर से साफ कर दिया गया है कि जीएसटी दरें घटाने का फैसला जीएसटी काउंसिल ही कर सकती है। एक ओर जहां वाहन उद्योग में काम करने वालों की नौकरियां जा रही हैं तो वहीं वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कह दिया है कि ऑटो इंडस्ट्री में जो सुस्ती आई है उसके लिए ओला और उबर जैसी एप बेस्ड कैब सेवाएं प्रदान करने वाली कंपनियां जिम्मेदार हैं। वित्त मंत्री का कहना है कि आजकल लोग ओला-उबर का उपयोग करना पसंद करते हैं। वित्त मंत्री के इस बयान पर समाज के विभिन्न वर्गों की तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं आ रही हैं लेकिन बड़ा सवाल यह उठता है कि जब ओला और उबर की हालत खुद ही खराब है तो यह ऑटो इंडस्ट्री को कैसे नुकसान पहुँचा रही हैं?

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कुछ आंकड़ों के जरिये हम आपके सामने अपनी बात को स्पष्ट करते हैं। समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक वित्त वर्ष 2018 में ओला को 2,842.2 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है जबकि इससे पहले के वित्त वर्ष में ओला को 4,897.8 करोड़ रुपये की हानि हुई थी। उधर अमेरिकी कंपनी उबर तो दुनियाभर में नुकसान झेल रही है और मार्च 2018 में समाप्त वित्त वर्ष के दौरान उसे भारत में मामूली मुनाफा हुआ था। आंकड़ों के मुताबिक इस साल अगस्‍त महीने में उबर को अब तक का सबसे बड़ा तिमाही नुकसान हुआ है। हालांकि ओला और उबर इंडिया के ताजा आंकड़े अभी जारी नहीं किए गए हैं। लेकिन यह दोनों कंपनी फिलहाल घाटे में चल रही हैं और आप ओला तथा उबर के किसी ड्राइवर से पूछ लीजिये- वह यही कहेगा कि अब पहले जैसा फायदा नहीं हो रहा है। ओला और उबर का व्यवसाय धीमा पड़ रहा है इस बात का एक संकेत कमर्श‍ियल व्हीकल रजिस्ट्रेशन से भी मिल रहा है। जैसे कि महाराष्ट्र में वित्तीय वर्ष 2017-18 में ओला और उबर इंडिया के लिए काम करने वाली 66683 टूरिस्ट कैबों का रजिस्ट्रेशन हुआ था, लेकिन यह संख्या वित्तीय वर्ष 2018-19 में घटकर 24386 पर आ गई।

यह तो हुई ओला और उबर की बात...अब दूसरे मुद्दे पर चलते हैं। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने यह भी कहा है कि युवाओं की सोच बदल रही है और लोग अब खुद का वाहन खरीदकर मंथली ईएमआई नहीं भरना चाहते और उन्हें लगता है कि नई कार खरीदने की बजाए ओला और उबर हायर करना खर्च के लिहाज से ज्यादा फायदेमंद है। एक बड़े समाचार-पत्र के अध्ययन में जो बात सामने आई है उसे हम आपके सामने रख रहे हैं। इस अध्ययन के मुताबिक यदि आप कार खरीदते हैं और कार की कीमत 6 लाख रुपए है और उसकी आयु 6 साल रहती है तो आपको पेट्रोल, इंश्योरेंस, टायर, बैटरी, सर्विस, ब्याज भुगतान तथा अन्य खर्चों को मिलाकर प्रतिदिन का खर्च 850 रुपए बैठता है और अगर आप ओला या उबर से सफर करते हैं तो आपको अधिकतम 450 से 500 रुपए तक का भुगतान करना होगा।

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यह सही है कि आज के युवा की चिंता अपनी बचत को बाजार के माध्यम से बढ़ाने पर है और काम के घंटों के अनियमित होने के चलते देर रात में भी उसे खुद ड्राइव करने की बजाय कैब ही सुरक्षित लगती है। आइए डालते हैं कुछ उन बड़े कारणों पर नजर जिनकी वजह से लोग फिलहाल नई कार खरीदने से कतरा रहे हैं-

- भारत चरण-6 उत्सर्जन मानक एक अप्रैल 2020 से प्रभाव में आएगा। फिलहाल देश में वाहन कंपनियां भारत चरण-4 मानकों का पालन कर रही हैं। ऐसे में लोगों को चिंता है कि BS4 वाहनों का भविष्य BS6 वाहनों के आते ही अधर में लटक जायेगा इसीलिए इन्हें खरीदने से बचा जाये।

- डीजल और पेट्रोल की बढ़ती कीमतें- कारण चाहे देशी हों या विदेशी...पेट्रोल और डीजल के बढ़ते दामों की मार आम आदमी को परेशान कर रही है और सार्वजनिक परिवहन के बढ़ते और सुलभ होते साधनों के चलते लोग कार खरीदने से बच रहे हैं।

- अर्थव्यवस्था में मंदी- अर्थव्यवस्था में इस समय मंदी का दौर है और विकास दर 6 साल के न्यूनतम स्तर पर यानि 5 प्रतिशत पर आ गयी है। इसको देखते हुए भी लोग कार खरीदने में बड़ी राशि खर्च करने से बच रहे हैं।

- नौकरियों की कमी- ऑटोमोबाइल सेक्टर में तो नौकरियों में कटौती हो ही रही है अन्य क्षेत्र भी इससे नहीं बच पाये हैं। नौकरीपेशा अधिकांश लोगों को भी अपनी नौकरी पर खतरा मंडराता दिख रहा है इसलिए वह भी कार खरीद कर बड़ी राशि खर्च करने या एक और लोन लेने से बचना चाह रहे हैं।

- ओला और उबर- इसमें कोई दो राय नहीं कि ओला और उबर ने जिस तरह महानगरों से लेकर छोटे शहरों तक अपना जाल फैलाया है उसके चलते लोगों को बड़ी सुविधा मिली है और कारों की बिक्री घटने में इनका एक बड़ा योगदान तो है ही।

- बढ़ती महत्वाकांक्षाएं- कार खरीदने से लोग पूरी तरह बच रहे हैं, ऐसा भी नहीं है क्योंकि छोटी कारों की ही बिक्री घटी है। आज भी आप किसी भी कंपनी की एसयूवी या हैचबैक गाड़ी को या नई लॉन्च हुई गाड़ी के बारे में चेक कर लीजिये, दो से तीन महीने की वेटिंग आ रही है। दरअसल आज का युवा छोटी कार खरीदने की बजाय हैचबैक या एसयूवी को ही तरजीह दे रहा है।

- मोटर वाहन कानून- नया मोटर वाहन कानून अमल में आते ही ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन करना महंगा हो गया है। इसलिए भी लोग खुद गाड़ी रखने, उसे चलाने की बजाय कैब को ही ज्यादा तरजीह दे रहे हैं।

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- ब्याज दरों और रजिस्ट्रेशन शुल्क का बढ़ना- कार लेते समय बड़ी गाड़ियों पर तो ब्याज दरें कम होती हैं लेकिन अकसर छोटी गाड़ियों के लिए ज्यादा ब्याज दर वसूली जाती है। इसके अलावा रजिस्ट्रेशन शुल्क भी बहुत बढ़ गया है।

- इलेक्ट्रिक वाहन- सरकार ने जिस तरह इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देना शुरू किया है और उसे खरीदने पर अतिरिक्त टैक्स छूट का ऐलान किया है उससे डीजल और पेट्रोल की बजाय लोग इलेक्ट्रिक वाहनों के आने का इंतजार भी कर रहे हैं।

- पार्किंग स्पेस कम होना और शुल्क ज्यादा होना- अगर आप दिल्ली जैसे महानगर में गाड़ी रखते हैं तो आपको कार के लिए बीस रुपए घंटा पार्किंग शुल्क देना होता है और अगर आप 9 बजे के बाद ऑफिस पहुँचने वालों में से हैं तो पार्किंग के लिए स्पेस हासिल करने के लिए संघर्ष भी करना पड़ता है। यही नहीं आपको अपनी कॉलोनी आदि में भी कार पार्क करने के लिए अकसर किसी ना किसी से भिड़ना पड़ता है। 

बहरहाल...वित्त मंत्री के बयान में ऑटोमोबाइल जगत की प्रतिक्रिया की बात करें तो देश की सबसे बड़ी कार निर्माता कंपनी मारुति सुजुकी का कहना है कि भारत में कार खरीदने को लेकर धारणा में अभी भी कोई बदलाव नहीं आया है और लोग अपनी आकांक्षा के तहत कार की खरीदते हैं। मारुति सुजुकी इंडिया के विपणन और बिक्री विभाग के कार्यकारी निदेशक शशांक श्रीवास्तव का कहना है कि मौजूदा मंदी के पीछे ओला और उबर जैसी सेवाओं का होना कोई बड़ा कारण नहीं है। मुझे लगता है कि इस तरह के निष्कर्षों पर पहुंचने से पहले हमें और गौर करना होगा और अध्ययन करना होगा।’’ दूसरी ओर बजाज ऑटो के राजीव बजाज का कहना है कि मौजूदा मंदी का कारण अत्यधिक उत्पादन भी है। इस बीच कांग्रेस ने निशाना साधते हुए सरकार से पूछा है कि जब कैब सेवा प्रदाता कंपनियों ने इतना बंटाधार कर दिया है तो फिर देश की अर्थव्यवस्था पांच हजार अरब डॉलर का आंकड़ा कैसे पार करेगी तो वहीं सरकार का कहना है कि चिंता मत करिये मसले का हल शीघ्र निकल आयेगा।

-नीरज कुमार दुबे

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