गुरदासपुर का ''संदेश'' हिमाचल और गुजरात भी पहुंच सकता है

Gurdaspurs ''message'' can reach Himachal and Gujarat
गुरदासपुर की जीत का संदेश उत्तर भारत के हिमाचल से पश्चिम के गुजरात तक पहुंचने में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा। राहुल जिस तरीके की राजनीति इन दिनों कर रहे हैं, उसमें यह जीत दम भरने का काम करेगी।

गुरदासपुर लोकसभा उपचुनाव की जीत कांग्रेस को आक्सीजन देने का काम करेगी। हालांकि इस जीत से न तो संसद का गणित बदलेगा और न ही राष्ट्रीय राजनीति के समीकरण। फिर भी इस उपचुनाव परिणाम को महज स्थानीय मान लेना राजनीतिक समझदारी नहीं होगी। इस जीत से पूर्व कांग्रेस ने महाराष्ट्र के नांदेड़ महानगरपालिका चुनाव में बड़ी जीत हासिल की। 2014 में कांग्रेस की बुरी शिकस्त के बाद देश के कई राज्यों से कांग्रेस की सत्ता सिमट गयी। इस साल विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने पंजाब में सत्ता हासिल करने में कामयाबी पाई थी। गुजरात और हिमाचल प्रदेश में होने जा रहे विधानसभा चुनाव से पहले मिली इस जीत से कांग्रेस बेहद उत्साहित है। माना जा रहा है कि पार्टी इस नतीजे को केंद्र सरकार के फैसलों खासकर जीएसटी के खिलाफ जनता की प्रतिक्रिया बताते हुए सरकार के खिलाफ हमले को तेज करेगी।

पंजाब से सटे पहाड़ी राज्य हिमाचल प्रदेश में विधानसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है। हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस की सरकार है। ऐसे में गुरदासपुर की जीत से कांग्रेस को मनोवैज्ञानिक बढ़त मिलना लाजिमी है। कांग्रेस नेता हिमाचल प्रदेश में चुनाव प्रचार के दौरान गुरदासपुर की जीत को भुनाने की हरसंभव कोशिश करेंगे। उपचुनाव में केवल 56 फीसदी वोटिंग हुई। नतीजे बताते हैं कि सात महीने पुरानी कांग्रेस की सरकार के खिलाफ लोगों में कोई बड़ी नाराजगी नहीं थी। ये साफ है कि लोग कैप्टन अमरिंदर सिंह की सरकार के बारे में कोई राय बनाने से पहले उन्हें थोड़ा वक्त देना चाहते हैं।

वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में फिल्म अभिनेता विनोद खन्ना ने भारतीय जनता पार्टी की टिकट पर गुरदासपुर सीट एक लाख वोटों से ज्यादा अंतर से जीती थी। उन्हीं के निधन के चलते उपचुनाव कराना पड़ा। बेशक इस बीच पंजाब में हुए विधानसभा चुनावों में इसी साल शिरोमणि अकाली दल-भाजपा सरकार को सत्ताच्युत कर कांग्रेस ने सत्ता में जोरदार वापसी की, लेकिन उसके बावजूद गुरदासपुर उपचुनाव में ऐसे नतीजे का विश्वास तो किसी को भी नहीं रहा होगा। कांग्रेस उम्मीदवार सुनील जाखड़ ने भाजपा प्रत्याशी स्वर्ण सलारिया को लगभग दो लाख के अंतर से हराया। मतदान होते-होते राजनीतिक प्रेक्षक कांग्रेस उम्मीदवार सुनील जाखड़ की जीत की संभावना तो स्वीकारने लगे थे, लेकिन अंतर दो लाख के आसपास पहुंच जायेगा, इसकी उम्मीद उन्हें भी नहीं थी। 50 हजार के अंतर की उम्मीद वाला चुनाव परिणाम एक लाख 90 हजार मतों से भी ज्यादा अंतर के साथ सामने आया है तो मान लेना चाहिए कि यह पंजाब की कैप्टन अमरेंद्र सिंह सरकार के पक्ष के बजाय केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के कामकाज के खिलाफ है। 

इस जमीनी सच्चाई से इंकार नहीं किया जा सकता कि विरासत में मिली खस्ताहाल अर्थव्यवस्था के चलते अमरेंद्र सिंह सरकार तो अभी तक कोई ऐसा उल्लेखनीय काम कर ही नहीं पायी है, जिसके पक्ष या विपक्ष में बड़े पैमाने पर जनमत उद्वेलित हो। पिछले एक साल में नोटबंदी से लेकर जीएसटी तक मोदी सरकार ने अवश्य कई ऐसे काम किये हैं, जिन पर जनसाधारण में तीव्र प्रतिक्रिया साफ देखी जा सकती है। बेशक पंजाब की पूर्ववर्ती अकाली-भाजपा सरकार की कारगुजारियों तथा हाल ही में पूर्व अकाली मंत्री सुच्चा सिंह लंगाह के विरुद्ध बलात्कार सरीखे आरोपों ने भी इस उपचुनाव नतीजे में भूमिका निभायी होगी।

बीजेपी और अकालियों की तुलना में कांग्रेस लोगों के सामने ज्यादा एकजुट और संगठित नजर आई। पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल चुनाव प्रचार में नहीं दिखे। हालांकि इसकी वजह उनका खराब स्वास्थ्य बताया गया। दूसरी तरफ पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह, वित्त मंत्री मनप्रीत बादल और नवजोत सिंह सिद्धू ने सुनील जाखड़ का प्रचार किया। 

स्वर्ण सलारिया की छवि भी उनके लिए परेशानी का सबब बनी। बलात्कार का आरोप लगने से उनकी संभावनाएं और कमजोर हो गई थीं। हालांकि सलारिया ने इन आरोपों से इनकार किया। उधर, सुनील जाखड़ के खिलाफ कोई आरोप नहीं था। हालांकि बीजेपी ने जाखड़ को निर्वाचन क्षेत्र में बाहरी उम्मीदवार के रूप में प्रचारित किया था। शिरोमणी अकाली दल के नेता सुच्चा सिंह लंगा पर लगे बलात्कार के आरोप से भी अकाली-बीजेपी उम्मीदवार की संभावनाएं कमजोर हुईं। हालांकि अकालियों ने सुच्चा सिंह को बाहर का दरवाजा दिखा दिया, लेकिन इससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ा।

मुद्दों से इतर बात करें तो शायद उम्मीदवार के चयन में भी भाजपा से चूक हुई। सत्तारूढ़ दलों से अति आत्मविश्वास में अक्सर ऐसी भूल हो भी जाती है। बेशक विनोद खन्ना कई बार गुरदासपुर से सांसद चुने गये। वह पुलोंवाले बाबा के रूप में लोकप्रिय भी रहे, लेकिन सच यह भी है कि चुनाव के बाद वह जब कभी कभार ही क्षेत्र में नजर आते थे। ऐसे में मतदाताओं से संपर्क-संवाद तथा विकास कार्यों पर नजर रखने की जिम्मेदारी उनकी पत्नी कविता खन्ना ही निभाती थीं। विनोद खन्ना के निधन के बाद कविता भी गुरदासपुर से टिकट की दावेदार थीं, लेकिन भाजपा ने, संभवतः राजपूत मतों के लालच में योग गुरु रामदेव के करीबी एक व्यापारी स्वर्ण सलारिया पर दांव लगाया। निश्चय ही यह दांव उलटा पड़ा और एक लाख से भी ज्यादा वोटों से जीती गयी सीट भाजपा लगभग दो लाख मतों के अंतर से हार गयी। ऐसा मानने वालों की कमी नहीं है कि अगर भाजपा ने कविता खन्ना को उम्मीदवार बनाया होता तो शायद चुनाव परिणाम दूसरा होता, लेकिन अब ऐसे तर्कों-दावों का कोई अर्थ नहीं है। कुछ जानकार इसे जीएसटी और किसानों को लेकर मोदी सरकार की नीति पर लोगों का फैसला भी बता रहे हैं।

कांग्रेस के लिये यह जीत काफी मायने रखती है। खासकर मुख्यमंत्री अमरेंद्र सिंह के लिये। आखिरकर पूर्व लोकसभा अध्यक्ष के बलराम जाखड़ के पुत्र सुनील जाखड़ उन्हीं की पसंद के उम्मीदवार थे, लेकिन इससे अति आत्मविश्वासी होने के बजाय अमरेंद्र सिंह सरकार को उन कामों पर ध्यान देना चाहिए, जिनके लिए राज्य के मतदाताओं ने उसे चुना है। यह उपचुनाव परिणाम हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनावों से ठीक पहले आया है, इसलिए इसका मनोवैज्ञानिक असर तो प्रचार अभियान के दौरान रहेगा। आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार लेफ्टिनेंट जनरल सुरेश खजूरिया को मिले मात्र 23579 मत बताते हैं कि पार्टी को अपनी दशा-दिशा पर गंभीर चिंतन की जरूरत है।

गुरदासपुर उपचुनाव नतीजों के बाद केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि, एक सीट पर जीतने से जन भावनाओं पर कोई फर्क नहीं पड़ता। भले ही ऊपरी तौर पर राजनाथ सिंह ऐसे बयान पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने के लिये दे रहे हों। पर असलियत यह है कि एक सीट पर जीत हार संकेत होती है जनभावनाओं का। इसका सीधा यह भी संदेश जाता है कि पार्टी ने पार्टी नेताओं, कार्यकर्ताओं के विरूद्ध जाकर टिकट बांटा। यह इस बात की ओर भी इशारा करता है कि जनता में मोदी सरकार की नीतियों और निर्णयों के प्रति नाराजगी है। राजनीति में संकेतों के माध्यम से बहुत कुछ कहा और सुना जाता है। गुरदासपुर में भाजपा की हार एक संकेत भी हो सकता है कि जनता के मन बदल रहा है। 

आम आदमी पार्टी का निराशाजनक प्रदर्शन भी सोचने को मजबूर करता है। जो पार्टी छह महीने पूर्व प्रदेश की सत्ता पर काबिज होने का सपना देख रही थी। आज उसके उम्मीदवार की इतनी दुर्गति क्यों हुई। आम आदमी पार्टी की पंजाब इकाई के अध्यक्ष एवं सांसद भगवंत मान ने हार के कारणों की समीक्षा करने की बात कही है। इसमें दो राय नहीं कि इस जीत से कांग्रेस और राज्य की राजनीति में सुनील जाखड़ का कद बढ़ेगा। कैप्टन अमरेंद्र सिंह को भी इसका श्रेय मिलना ही चाहिए। 

गुरदासपुर सीट गंवाने के बाद भाजपा को अब जरूरत है, इस उपचुनाव परिणाम में निहित संकेत-संदेश को सही अर्थों में समझने की। गुरदासपुर की जीत का संदेश उत्तर भारत के हिमाचल से पश्चिम के गुजरात तक पहुंचने में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा। राहुल जिस तरीके की राजनीति इन दिनों कर रहे हैं, उसमें यह जीत दम भरने का काम करेगी। 

डॉ0 आशीष वशिष्ठ

अन्य न्यूज़