भारत नरक नहीं, स्वर्ग का अहसास है, मानवता का वैभव, सभ्यता का प्रकाश है!

व्यापार के मोर्चे पर भारत को “टैरिफ किंग” और हानिकारक बताने के साथ साथ राजनयिक रूप से “अच्छे रिश्ते” बताकर दोहरा रुख अपनाया है। इसी प्रकार ट्रंप भारतीय अर्थव्यवस्था को डेड इकॉनमी भी करार दे चुके हैं टैरिफ वार की खींझ में। उनके इस रवैये से भारत का अविश्वास अमेरिका और उनके प्रति बढ़ा है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत के लिए अब तक कई बार ऐसे तीखे या अपमानजनक बयान दिए हैं जिनके पश्चात उन्होंने या तो रुख बदल दिया या सॉफ्ट स्टेटमेंट जारी करके अपनी बात पर “यू टर्न” लेकर साफ साफ मुकर जैसा अंदाज़ दिखाया है। हाल ही में फिर उन्होंने “नरक जैसा देश” वाला बयान दिया और फिर यू टर्न ले लिया। उनका रवैया दुनिया का थानेदार समझे जाने वाले सर्वाधिक विकसित और धनी देश अमेरिका के शालीन, सभ्य और सुसंस्कृत होने पर सवालिया निशान लगाने को काफी है।
खासकर भारत के खिलाफ जिसका अंतर्राष्ट्रीय आचरण सदैव मर्यादित रहता आया है। भारत पैसे वालों की कद्र नहीं करता, क्योंकि यह तो देशी-विदेशी अपराधियों और वेश्याओं के पास भी खूब होता है, लेकिन सामाजिक प्रतिष्ठा बिल्कुल नहीं होती। ट्रंफ के नेतृत्व में अमेरिका इसी फूहड़ता से ग्रसित है, अभिशप्त है और अंतर्राष्ट्रीय गुंडई में इतना आगे निकल चुका है कि उसके मित्र देश भी उसके साथ खड़े होने में परहेज कर रहे हैं और उसे यूज एंड थ्रो कर रहे हैं। ईरान-अमेरिका युद्ध ने अमेरिका की पूरी मिट्टी पलीद कर दी है और उसके डीप स्टेट की जो भद्द पिटी है, वैसा कोई उदाहरण अन्यत्र नहीं मिलता। शायद इसी खीझ का नाता ट्रंफ के नारकीय विवाद से है।
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आइए, जानते हैं कि सबसे हाल का विवाद 24 घंटे में ही कैसे दोनों ध्रुवों पर घूम गया, जब भारतीय विदेश मंत्रालय ने कड़ी प्रतिक्रिया दी। ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म “ट्रुथ सोशल” पर एक रेडियो होस्ट माइकल सैवेज के पॉडकास्ट का हिस्सा शेयर किया, जिसमें भारत और चीन जैसे देशों को “नरक” (hellholes / hell on earth) जैसी जगह बताया गया। इस पोस्ट में भारतीयों के बारे में नस्लवादी टिप्पणी भी थी कि भारत–चीन से लोग अमेरिका आते हैं बस यहीं बच्चे पैदा करने के लिए ताकि उन्हें तुरंत अमेरिकी नागरिकता मिल जाए, जो भारतीय डिप्लोमैसी और जनता के लिए बेहद अपमानजनक माना गया।
फिर अगले ही नए बयान में ट्रंप ने रुख पूरी तरह बदल दिया, क्योंकि समझ में आ गया कि ये मोदी का भारत है, चुपचाप उल्टा लटका देगा। कोई काम नहीं आएगा, जब कूटनीतिक शतरंज की एक चाल चल देगा तो। लिहाजा, उन्होंने जनता के बीच और अमेरिकी दूतावास के प्रवक्ता के ज़रिए कहा कि भारत “एक महान देश” (a great country) है, “मजबूत और महान राष्ट्र” है और भारत के शीर्ष नेता (प्रधानमंत्री मोदी) के साथ उनकी “निजी दोस्ती” है। काबिलेगौर है कि इस तरह 24 घंटे के अंदर वही शख्स जो भारत को “hard to deal with” या नरक जैसी जगह कह चुके थे, उसी देश की तारीफ़ में बोलने लगे, जिसे राजनीतिक यू टर्न और दबाव में बदला गया माना जा रहा है।
अब इनकी टैरिफ और “टैरिफ किंग” वाली पुरानी टिप्पणी को स्मरण करा देते हैं। इसके अलावा ट्रंप ने व्यापार के मसले पर भी दोहरा अपना बयान दिया है। अपने कई इंटरव्यू और भाषणों में उन्होंने भारत को “टैरिफ किंग” (tariff king) कहा है, और यह कहा है कि भारत दुनिया में सबसे ज्यादा शुल्क लगाने वाले देशों में से एक है, जिससे अमेरिकी उत्पादों को नुकसान होता है। इसी क्रम में उन्होंने भारत पर जवाबी टैरिफ लगाने की धमकी भी दी, लेकिन एक ही हवन में ही यह भी कहा कि भारत के साथ “बहुत अच्छे संबंध” हैं, यानी एक ही बयान में औपचारिक तारीफ़ और व्यावहारिक धमकी दोनों। निष्कर्षन के तौर पर पैटर्न यह दिखता है कि ट्रंप ने भारत के लिए एक बार नफरत भरी, नस्लवादी, “नरक जैसा देश” वाली भाषा इस्तेमाल की, और फिर तुरंत मिटाने के लिए भारत को “महान देश” और प्रधानमंत्री मोदी को “अपना दोस्त” कहकर मुकर जैसा कर दिया।
वहीं, व्यापार के मोर्चे पर भारत को “टैरिफ किंग” और हानिकारक बताने के साथ साथ राजनयिक रूप से “अच्छे रिश्ते” बताकर दोहरा रुख अपनाया है। इसी प्रकार ट्रंप भारतीय अर्थव्यवस्था को डेड इकॉनमी भी करार दे चुके हैं टैरिफ वार की खींझ में। उनके इस रवैये से भारत का अविश्वास अमेरिका और उनके प्रति बढ़ा है।
स्पष्ट है कि अमेरिका के सफल बिजनेसमैन और शातिर राजनेता से राष्ट्रपति बने डॉनल्ड ट्रंफ अपने सिरफिरे विचारों के लिए जाने जाते हैं, लेकिन जब से वो डीप स्टेट के हाथों का खिलौना बने, अपने अनाप-शनाप और अदूरदर्शिता भरे फैसलों से अंतरराष्ट्रीय जगत में अमेरिका की थू-थू करवा रखी है। पहले ट्रेड वार और अब सैन्य वार के बाद उसकी जो अंतरराष्ट्रीय फजीहत हुई है, उसके जैसे सो कॉल्ड देश ताकतवर की कलई खुल गई। यूक्रेन से शुरू हुई कूटनीतिक दोगलागिरी ईरान पहुंचते-पहुंचते न केवल चारो खाने चित्त हो गई, बल्कि आज अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंफ की बयानबाजी अब समझदार लोगों के लिए कोई मायने नहीं रखी। कभी वह भारत को "डेड इकोनॉमी" बताते हैं, तो कभी नरक जैसा देश! शायद इसलिए कि भारतीय नेतृत्व उनके इशारों पर नहीं थिरक रहा है, जिससे रूस-चीन भी उसे भाव देना बंद कर चुके हैं।
दुनिया का थानेदार अमेरिका को बेनेजुएला के राष्ट्रपति को गिरफ्तार करने के बाद जब कड़ी अंतर्राष्ट्रीय प्रतिक्रिया नहीं मिली तो उसने यह समझ लिया कि रूस-चीन भी उससे डरे हुए हैं। इसी उत्साह में अमेरिका ने इजरायल के साथ मिलकर ईरान पर धावा बोल दिया और महज दो माह के भीतर ही परेशान हो उठा। इससे ईरान-रूस-चीन की संयुक्त ताकत का उसको एहसास हुआ। वहीं इसी मुद्दे पर नाटो में फूट भी पड़ गई और यूरोप तटस्थ बन गया। इसी बौखलाहट में ट्रंफ भारत और चीन को नरक जैसा बताने लगे।
बताते चलें कि भारत और चीन जैसी प्राचीन सभ्यताओं को "नरक" बताने का संदर्भ हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के एक विवादित सोशल मीडिया पोस्ट से जुड़ा है, जिसमें उन्होंने जन्मसिद्ध नागरिकता (birthright citizenship) के मुद्दे पर भारत-चीन को "hellhole" कहा। यह बयान ट्रंप की इमीग्रेशन पॉलिसी से प्रेरित है, जहां वे आरोप लगाते हैं कि इन देशों से प्रवासी अमेरिका की सुविधाओं का दुरुपयोग करते हैं। जबकि ऐतिहासिक वास्तविकता कुछ और है, जो कई मायने में गौरवशाली भी है।
वास्त्व में, भारत और चीन दुनिया की सबसे प्राचीन सभ्यताएं हैं, जिन्होंने ज्ञान, संस्कृति और व्यापार में दुनिया को प्रभावित किया—चीन भारत को कभी "स्वर्ग से बढ़कर" मानता था। जबकि अमेरिका की कोई प्राचीन सभ्यता नहीं है; यहां माया-इंका जैसी मूल निवासी सभ्यताएं 3000 ईसा पूर्व की हैं, लेकिन आधुनिक अमेरिका 15वीं शताब्दी के बाद यूरोपीय उपनिवेशवाद से उभरा है। अब तो यूरोप भी उससे दूर होते जा रहा है।
स्वाभाविक सवाल है कि आधुनिक अमेरिका "स्वर्ग" क्यों?
तो जवाब होगा कि ट्रंप जैसे अधकपाली नेता अमेरिका को "स्वर्ग" के रूप में पेश करते हैं क्योंकि यह उच्च जीवन स्तर, आर्थिक अवसरों और कानून के शासन के लिए जाना जाता है, लेकिन यह धारणा चुनिंदा है—अमेरिका में भी गरीबी, असमानता और अपराध मौजूद हैं। भारत-चीन की आबादी और विकास चुनौतियां उन्हें नजरअंदाज कर "नरक" कहना राजनीतिक प्रचार है, जबकि ये देश तेजी से उभर रही महाशक्तियां हैं। ट्रंफ को यह समझ लेना चाहिए कि भारत नरक नहीं दुनिया का स्वर्ग है, सत्योंमुख मानवता का वैभव है! अहिंसा का पुजारी है। यहां शाकाहारी मिलते हैं, लेकिन ईसाईयत और इस्लाम की गुलामी के पश्चात यहां मांसाहारी बढ़े और निरीह पशु-पक्षियों की शामत आ गई। पहले धर्म आधारित युद्ध होते थे, लेकिन षड्यंत्र उतना नहीं जितनी कि पिछले 1000-14000 वर्षों में दिखी। कड़वा सच है कि प्राचीन भारत और चीन दुनिया की सबसे समृद्ध सभ्यताओं में से थे, जिनकी समृद्धि व्यापार, संस्कृति, विज्ञान और वास्तुकला के प्रमाणों से सिद्ध होती है।
सांस्कृतिक आदान-प्रदान के तहत भारत से बौद्ध धर्म चीन पहुंचा, जहां फाह्यान (402 ईस्वी) और ह्वेनसांग जैसे चीनी यात्रियों ने नालंदा-तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालयों में अध्ययन किया और ग्रंथ अनुवादित किए। चीन में भारतीय प्रभाव वाले स्थल जैसे युंगांग-लोंगमेन गुफाएं, बिग गूस पगोडा और शाओलिन मंदिर इसकी गवाही देते हैं। वहीं, व्यापारिक समृद्धि के नजरिए से रेशम मार्ग (दक्षिणी समुद्री रूट सहित) से भारत-चीन के बीच रेशम, मसाले, मोती, लोहे के बर्तन और हस्तशिल्प का आदान-प्रदान होता था; रामायण-महाभारत में भी चीन का उल्लेख सोने के भंडार के रूप में है। चोल साम्राज्य ने समुद्री मार्ग सुरक्षित कर व्यापार बढ़ाया। जहां तक वैज्ञानिक योगदान की बात है तो आर्यभट्ट की ज्या तालिका का 8वीं शताब्दी में चीनी अनुवाद हुआ; पाणिनि ने चीनी रेशम को 'चीनांशुक' कहा। खोतान जैसे क्षेत्रों में भारतीय शासन, संस्कृत भाषा और विष्णु पूजा के पुरातात्विक प्रमाण मिले।
प्राचीन भारत और चीन की समृद्धि मिस्र व ग्रीस से व्यापक और निरंतर थी, जहां पूर्वी सभ्यताओं ने आध्यात्मिक-वैज्ञानिक योगदान दिए जबकि पश्चिमी ने स्थापत्य-दार्शनिक। कृषि व अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में भारत-चीन की उपजाऊ गंगा-ह्वांगहो घाटियां मिस्र के नील नदी की तरह ही अतिरिक्त उत्पादन देती रहीं, लेकिन सिंधु घाटी की नियोजित शहर व्यवस्था और चीन के रेशम व्यापार ने वैश्विक नेटवर्क बनाया। ग्रीस में मिनोअन-माइसीन व्यापार सीमित था, मिस्र निर्यात-आधारित।
सच कहा जाए तो भारत नरक नहीं, स्वर्ग है—यह मानवता का वैभव है, विविधता में एकता का अद्भुत उदाहरण है, जहाँ संस्कृति, करुणा और सहअस्तित्व की धारा अनवरत बहती है। काव्य शैली में लिखूं तो “भारत नरक नहीं, स्वर्ग का अहसास है, मानवता का वैभव, सभ्यता का प्रकाश है।” इस पंक्ति में एक गहरी सकारात्मकता और सांस्कृतिक आत्मविश्वास झलकता है।
- कमलेश पांडेय
वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
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