मुलायम के समाजवाद की सभी निशानियां मिटा देना चाहते हैं अखिलेश यादव

मुलायम के समाजवाद की सभी निशानियां मिटा देना चाहते हैं अखिलेश यादव

कभी−कभी तो ऐसा लगता है कि अखिलेश पिता मुलायम सिंह यादव के समाजवाद की सभी निशानियां मिटा देना चाहते हों। अखिलेश ने मुलायम के करीबियों को एक−एक कर किनारे लगा दिया है। चाचा शिवपाल के साथ अखिलेश का व्यवहार भूला नहीं जा सकता है।

मुलायम की सियासी विरासत के हकदार केवल अखिलेश यादव ही कैसे हो सकते हैं, जितना हक उनका है उतना ही मुलायम के दूसरे बेटे प्रतीक का भी होना चाहिए। मुलायम की विरासत से उस भाई को कैसे बेदखल कर दिया गया जिसके कंधे का सहारा लेकर मुलायम ने वोट बैंक की पूंजी कमाई और बढ़ाई थी। थोड़ी देर के लिए यह मान भी लिया जाए कि मुलायम ने 2012 में अपनी जगह अखिलेश को मुख्यमंत्री बनाकर अपनी सियासी विरासत उन्हें सौंप दी थी, लेकिन इसके बाद अखिलेश ने नेताजी के साथ जो किया वह किसी से छिपा नहीं है। मुलायम को जबर्दस्ती समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष पद से चलता कर दिया गया। शिवपाल यादव को पार्टी से बाहर चलता कर दिया गया। मुलायम के छोटे बेटे प्रतीक का तो राजनीति में रूझान नहीं था, परंतु छोटी बहू अपर्णा जो शुरू से समाज सेवा और राजनीति में रूचि लेती थीं, उनकी सियासत की डोर हमेशा अखिलेश ही थामे रहे। अखिलेश ने कभी अपर्णा को कोई ऐसा प्लेटफार्म नहीं दिया जिससे वह भी अपनी जेठानी और अखिलेश की पत्नी डिंपल यादव की तरह लोकसभा पहुंच पातीं। अपर्णा को पार्टी में भी कोई पद नहीं दिया गया। सबसे ताज्जुब की बात यह है कि इतनी मनमानी करने के बाद भी अखिलेश अपने आप को समाजवादी कहते हैं। अपने टि्वटर अकाउंट में स्वयं का परिचय 'सोशलिस्ट लीडर ऑफ इंडिया' के रूप में देते हैं। अपने बल पर कोई भी बड़ा चुनाव नहीं जीत पाने वाले अखिलेश हमेशा यह मुगालता पाले रहते हैं कि वह राजनैतिक रूप से काफी परिपक्व हैं। जबकी हकीकत यह है समाजवादी पार्टी इस समय सबसे बुरे दौर से गुजर रही है। अखिलेश के खाते में मुख्यमंत्री बनने के अलावा कोई बड़ी कामयाबी नहीं है।

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कभी−कभी तो ऐसा लगता है कि अखिलेश पिता मुलायम सिंह यादव के समाजवाद की सभी निशानियां मिटा देना चाहते हों। अखिलेश ने मुलायम के करीबियों को एक−एक कर किनारे लगा दिया है। चाचा शिवपाल के साथ अखिलेश का व्यवहार भूला नहीं जा सकता है। मुलायम ने अपनी राजनैतिक विचारधारा को कांग्रेस से मुकाबला करके मजबूती प्रदान करी थी, लेकिन अखिलेश ने 2017 के विधान सभा चुनाव में कांग्रेस से हाथ मिलाने में जरा भी संकोच नहीं किया। जबकि मुलायम सिंह इसके खिलाफ थे। उन्होंने अखिलेश को आगाह भी किया था, लेकिन अखिलेश नहीं माने। परिणाम यह रहा कि 2012 में मुलायम की अगुवाई में हुए विधान सभा चुनाव में 229 सीटें जीतने वाली समाजवादी पार्टी अखिलेश युग में सबसे करारी हार झेलते हुए 47 सीटों पर सिमट गई। इससे पूर्व 2014 में लोकसभा चुनाव में भी सपा को करारी हार का सामना करते हुए मात्र 05 सीटों पर संतोष कराना पड़ा था। कभी−कभी तो ऐसा लगता है जैसे अखिलेश का आत्मविश्वास डिगा हुआ है। वह चुनावी समर में अकेले उतर ही नहीं पाते हों। अबकी तो उन्होंने मायावती से ही हाथ मिला लिया। ने केवल हाथ मिलाया, बल्कि उस बसपा सुप्रीमो के सामने नतमस्तक नजर आए जो लोकसभा चुनाव में एक भी सीट नहीं जीत सकी थीं।

मायावती से अखिलेश का हाथ मिलाना अखिलेश की सियासी मजबूरी हो सकती है। वह अकेले मोदी का सामना करने में सक्षम नहीं हैं, लेकिन जब वह इतना समझते हैं तो उन्हें इस बात का भी ज्ञान रहना चाहिए था कि मोदी से मुकाबला करने के लिए मायावती के साथ के अलावा परिवार का मजबूती होना भी बेहद जरूरी है, लेकिन अखिलेश की विवादित कार्यशैली के चलते एक के बाद एक परिवार का सदस्य नाराज होता जा रहा है। मुलायम और शिवपाल यादव की नाराजगी तो किसी से छिपी ही नहीं है, अपर्णा यादव भी अखिलेश के व्यवहार से खुश नहीं हैं। अपर्णा को मुलायम सिंह का भी पूरा साथ मिल रहा है।

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लब्बोलुआब यह है कि 2019 के चुनाव अखिलेश यादव के लिए जीवन−मरण जैसे हैं। यह चुनाव उनकी सियासी समझ व भविष्य का सबसे बड़ा इम्तिहान साबित हो सकते हैं। लोकसभा चुनाव का फैसला अंदर और बाहर दोनों ही मोर्चों पर अखिलेश की प्रासंगिकता सिद्ध करेंगे। क्योंकि इस बार की जीत−हार के वह अकेले ही नायक या खलनायक होंगे। सहारे के लिए उनके पास डिंपल के अलावा कोई और कंधा नहीं होगा।

समाजवादी पार्टी के ही एक पुराने नेता कहते हैं कि नेताजी मुलायम सिंह की हैसियत के आसपास भी अखिलेश पहुंच जाएं तो बहुत बड़ी बात है। अखिलेश को तो विरासत में सियासत मिली, लेकिन मुलायम ने सियासी जमीन अपने खून−पसीने से तैयार की थी। आज भी यादव बिरादरी मुलायम को ही अपना रहनुमा और सबसे बड़ा नेता मानती है। मुलायम के वर्चस्व वाले इलाकों- मैनपुरी, इटावा आदि में तो अभी भी ऐसे लोगों की बड़ी तादाद है जो यह कहते मिल जाते हैं कि वह तो मुलायम को ही अपना नेता मानते हैं और उनके कहने पर वोट डालते हैं, अगर नेताजी का आदेश हुआ कि मोदी को वोट दो, तो हम मोदी को वोट दे देंगे। बात मुलायम युग के बड़े नेताओं को अखिलेश द्वारा हाशिये पर डाले जाने की की जाए तो पता चलता है कि मुलायम के नेपथ्य में जाने के बाद उनके संगी साथियों ने भी अपने आप को पार्टी से अलग−थलग कर लिया है। मुलायम के करीबी और बड़े कुर्मी नेता बेनी प्रसाद वर्मा आज की तारीख में समाजवादी पार्टी में हैं तो जरूर लेकिन उनकी सक्रियता न के बराबर है। आजम खां ने अपने आप को रामपुर तक समेट लिया है। शिवपाल से लेकर अंबिका चौधरी तक पाला बदल चुके हैं। भगवती सिंह अखिलेश−शिवपाल दोनों से ही मिलते−जुलते रहे हैं।

-अजय कुमार