कोरोना के चलते इस बार अक्षय तृतीया पर बाल विवाह बिलकुल नहीं हो पाएंगे

कोरोना के चलते इस बार अक्षय तृतीया पर बाल विवाह बिलकुल नहीं हो पाएंगे

बाल विवाह की दुष्प्रथा को रोकने के लिए कानून भी बना है। हर साल जागरूकता अभियान चलाए जाते हैं। निरन्तर प्रयासों से शहरी इलाकों में तो अब कभी-कभार ही इक्का-दुक्का उदहारण देखने को मिलता है परंतु ग्रामीण इलाकों में लुक-छुप कर बाल विवाह होते हैं।

हमारे देश में अक्षय तृतीया या अबुझ सावे पर हर साल होने वाले बाल विवाह इस बार शायद मीडिया की सुर्खियां नहीं बनेंगे। कई सालों से किये जा रहे जागरूकता प्रयासों से यद्यपि बाल विवाहों में कमी आई है परंतु इस बार कोरोना का कहर इस प्रथा को रोकने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। बाल विवाह यूं तो पूरे विश्व में होते हैं परंतु भारत में विश्व के 40 प्रतिशत बाल विवाह होने का अनुमान लगाया गया है। भारत में केरल, बिहार, हिमाचल, गुजरात, पश्चिम बंगाल एवं राजस्थान में इनका ज्यादा प्रचलन है। यूनिसेफ की एक रिपोर्ट के मुताबिक ग्रामीण क्षेत्रों में बाल विवाह का प्रचलन अधिक है। अनुमान लगाया गया है कि अभी भी 18 वर्ष से कम उम्र की 49 प्रतिशत लड़कियों के विवाह होते हैं। वर्ष 2016 में किये गए चौथे राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के निष्कर्ष के मुताबिक भारत में विवाह की कानूनी उम्र से पूर्व पश्चिम बंगाल में 40.7 प्रतिशत, बिहार में 39.1, राजस्थान में 35.4, आंध्र प्रदेश में 32.6, मध्य प्रदेश में 30 एवं गुजरात में 24.9 प्रतिशत बाल विवाह होते हैं।

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अक्षय तृतीया पर लुक छुप कर होने वाले बाल विवाह इस बार कोरोना महामारी के चलते होने की सम्भावनायें कम हैं। यह सम्भव होगा कोरोना के कारण लगाए गए प्रतिबंधों से। न भीड़, न सामूहिक भोज, न हलवाई, न टैंट, न फोटोग्राफर और न ही बैंड बाजा। दुकानें बंद होने से कपड़ों, गहने, बर्तन, इलेक्टॉनिक आइटम जैसे समान भी नहीं खरीद पाएंगे। वर वधु को आशीर्वाद देने के लिए न ही किसी विशिष्ट अथिति को आमंत्रित कर पाएंगे। केवल 20, कहीं-कहीं 5 अधिकृत व्यक्तियों की अनुमति प्राप्त कर सादे विवाह में वर-वधू के सात फेरों की रस्म पूरी कर विवाह रचाएंगे। 

               

कोरोना के कारण इस बार अक्षय तृतीया पर होने वाले विवाहों पर सरकार की और से अनेक प्रतिबंध लगाए गये हैं जिससे सोशल डिस्टेंसिंग की पालना सम्भव हो सके। विवाह सामूहिक रूप से करने पर 3 मई तक पूर्ण स्थगन है। विवाह एवं उसमें शामिल होने वालों की पूर्व अनुमति अधिकृत अधिकारी से लेनी होगी। निगरानी दल निरंतर निगाह रखेंगे कि किसी भी सूरत में बाल विवाह नहीं हो। जिला स्तर से लेकर तहसील स्तर तक नियंत्रण कक्ष स्थापित किये गए हैं।

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हर साल अक्षय तृतीया पर रहने वाला माहौल इस बार देखने को नहीं मिलेगा। सबसे बड़ा असर खरीददारी पर रहेगा। इस मौके पर होने वाली साल की 50 प्रतिशत बिक्री होने से साल के शुरू में थोक व्यापारियों द्वारा की गई खरीददारी को लेकर वे अपने को लुटा-पिटा महसूस कर रहे हैं। राशन दुकानदार, हलवाई, होटल और टैंट वाले सभी का व्यवसाय चौपट होने से मायूस-निराश हैं। राजस्थान में अक्षय तृतीया के दिन बड़े पैमाने पर एकल एवं सामूहिक विवाह होते हैं। वर्षों से इस अवसर पर बाल विवाह भी होते आये हैं। लोग इस दिन को अति शुभ मान कर छोटे बच्चों को परना देते हैं।

बाल विवाह की प्रथा भारत में दिल्ली सल्तनत के समय में अस्तित्व में आयी जब राजशाही प्रथा प्रचलन में थी। भारतीय बाल विवाह को लड़कियों को विदेशी शासकों से बलात्कार और अपहरण से बचाने के लिये एक हथियार के रूप में प्रयोग किया जाता था। बाल विवाह को शुरू करने का एक और कारण था कि बड़े बुजुर्गों को अपने पोतों को देखने की चाह अधिक होती थी इसलिये वो कम आयु में ही बच्चों की शादी कर देते थे जिससे कि मरने से पहले वो अपने पौत्रों के साथ कुछ समय बिता सकें। लड़की की शादी को माता-पिता द्वारा अपने ऊपर एक बोझ समझना, शिक्षा का अभाव, रूढ़िवादिता का होना, अन्धविश्वास एवं निम्न आर्थिक स्थिति बाल विवाह के महत्वपूर्ण कारकों में माने जाते हैं।

बाल विवाह की परंपरा में एक समय था जब दूध मुहे बच्चों को गोद में लेकर या टोकरी में बैठा कर फेरे लगा लिए जाते थे। जो यह नहीं जानते कि विवाह क्या होता है उन बच्चों को विवाह बंधन में बांध दिया जाता था, जिससे आगे चल कर कई बार सामाजिक समस्याएं जन्म लेती थीं। कम उम्र में लड़की द्वारा गर्भधारण करने एवं कच्ची उम्र में प्रसव होने से कई बार दोनों की या किसी एक की मौत हो जाती थी। दोनों के स्वास्थ्य की दृष्टि से भी यह किसी प्रकार उचित नहीं है। सबसे बड़ा खतरा मातृ-शिशु मृत्यु दर की बढ़ोतरी होती है। खेलने की उम्र में सामाजिक जिम्मेदारी का बोझ कंधों पर आ जाता है जिसे सम्भालने में वह असमर्थ रहती है। बड़े होने पर पसन्द या नापसंद का सवाल भी खड़ा हो जाता है। कम उम्र में विधवा हो जाने का दंश झेलना भी मजबूरी बन जाती है।

   

बाल विवाह की दुष्प्रथा को रोकने के लिए कानून भी बना है। हर साल जागरूकता अभियान चलाए जाते हैं। निरन्तर प्रयासों से शहरी इलाकों में तो अब कभी-कभार ही इक्का-दुक्का उदहारण देखने को मिलता है परंतु ग्रामीण इलाकों में लुक-छुप कर बाल विवाह होते हैं। कई मामलों में लोग पुलिस को ऐसे विवाह की गुप्त सूचना भी देते हैं और पुलिस न केवल बाल विवाह रुकवाती है बल्कि सभी को गिरफ्तार भी कर लेती है। लड़कियों में भी जागरूकता आने से कई बार वे स्वयं विवाह का पुरजोर विरोध करती हैं। महिला एवं बाल विकास विभाग की साथिनें हर वर्ष अनेक बाल विवाहों को रुकवाने की सारथी बनती हैं। उम्मीद कर सकते हैं कि इस बार 26 अप्रैल को अक्षय तृतीया पर होने वाले विवाहों में कोरोना के कारण लागू प्रतिबंध से आसान नहीं होगी बाल विवाह की राह।

-डॉ. प्रभात कुमार सिंघल

(लेखक एवं पत्रकार, कोटा-राजस्थान)