जानिये सेक्स वर्करों के लिए माँ समान गंगा की गंगू काठियावाड़ी बनने की कहानी

जानिये सेक्स वर्करों के लिए माँ समान गंगा की गंगू काठियावाड़ी बनने की कहानी

किताब के सह-लेखक एस. हुसैन जैदी समय-समय पर गंगूबाई के व्यक्तित्व के पहलुओं पर विस्तार से बातें बताते रहे हैं। मसलन, गंगूबाई का असली नाम गंगा हरजीवनदास काठियावाड़ी था। जन्म गुजरात के काठियावाड़ में हुआ था और वहीं पलीं-बढ़ीं थीं।

फिल्में समाज का आईना होती है, यह बात हम लंबे समय से सुनते आ रहे हैं और फिल्मों के माध्यम से देखते भी आ रहे हैं। यह एक सच है कि यर्थाथ पर सिनेमा बनाने वाले फिल्म निर्माता-निर्देशक अकसर अपनी कहानियां समाज से ही उठाते हैं। हमारे भारतीय सिनेमा जगत में ऐसे कई फिल्मकार हुए हैं जिनको समाज से सरोकार रखने वाले मुद्दों पर सिनेमा बनाने में आनंद आता है। या यूं कहे ऐसे सामाजिक-मानवीय विषयों पर काम करने का उन पर एक जूनून-सा सवार होता है।

हालिया समय में इस तरह का सिनेमा बनाने का काम संजय लीला भंसाली कर रहे हैं। संजय की ज्यादातर फिल्में समाज से जुड़े मानवीय मुद्दों और इतिहास को परिभाषित करने वाले विषयों पर होती हैं। वह मुंबई के कमाठीपुरा की सेक्स वर्करों को मैनेज करने वाली गंगूबाई के व्यक्तित्व और कृतित्व पर एक सिनेमा बनाने जा रहे हैं। इस फिल्म का पूरा नाम गंगूबाई काठियावाड़ी है। इसमें मुख्य किरदार अदाकारा आलिया भट्ट निभा रही हैं। यह फिल्म उस गंगूबाई के जीवन से प्रेरित है, जो 1960 के दशक में मुंबई के कमाठीपुरा में वेश्यालय चलाती थी। इस फिल्म की कहानी माफिया क्वीन्स ऑफ मुंबई नाम की किताब पर आधारित है। किताब के लेखक जेन बोर्गेस और एस. हुसैन जैदी हैं।

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किताब के सह-लेखक एस. हुसैन जैदी समय-समय पर गंगूबाई के व्यक्तित्व के पहलुओं पर विस्तार से बातें बताते रहे हैं। मसलन, गंगूबाई का असली नाम गंगा हरजीवनदास काठियावाड़ी था। जन्म गुजरात के काठियावाड़ में हुआ था और वहीं पलीं-बढ़ीं थीं। वो काठियावाड़ के एक संपन्न परिवार से थीं। परिवार के लोग पढ़े-लिखे थे और वकालत से जुड़े थे। गंगा को रमणीक लाल नाम के एक अकाउंटेंट से प्यार हो गया था लेकिन उनका परिवार इस रिश्ते के लिए राजी नहीं था। वो मुंबई भाग आईं। लेकिन उस आदमी ने उसे धोखा देकर सेक्स वर्करों के इलाके कमाठीपुरा में बेच दिया। तब कहीं जाकर गंगा हरजीवनदास काठियावाड़ी को अहसास हुआ कि अब उसकी किस्मत में यही है। यहीं से गंगा ने खुद को गंगूबाई के रूप में स्वीकार कर लिया। क्योंकि वह जानती थी कि उसका परिवार उसे स्वीकार नहीं करेगा। इसी कारण से वह अपने परिवार के पास वापस नहीं लौटी और इन हालातों को ही अपनी किस्मत मान कर बतौर सेक्स वर्कर काम करने लग गई। मतलब साफ है कि इस धंधे में वह अपनी इच्छा से नहीं आई थी। उसे धोखा देकर लाया गया था। असल में वो गैंगस्टर नहीं थी और न ही अंडरवर्ल्ड का हिस्सा थी। लेकिन वह ऐसे धंधे में थी जिसे समाज में हेय दृष्टि से देखा जाता था। बहरहाल वह देह के इस बाजार में वक्त के साथ-साथ रमती चली गई। एक समय के बाद वह कोठे की मालकिन बन कर कोठा चलाने लगी। थोड़ा और समय बीता तो कमाठीपुरा रेड लाइट एरिया की प्रमुख बन गईं। बस फिर यहां से वह सबके लिए पूरी तरह से गंगा से गंगू बनी और फिर गंगू से मैडम।

गंगूबाई वहां की सेक्स वर्करों के दिलों में कब इतना रच-बस गई कि उसे भी पता न चला कि वह कब सबकी मां जैसी बन गई। गंगूबाई की लोकप्रियता का आलम यह रहा कि उसने इन सबके प्यार के चलते ही कमाठीपुरा के घरेलू चुनावों में हिस्सा लिया और जीत हासिल की। अब गंगू सेक्स वर्कर से गंगूबाई काठेवाली बन गईं। काठेवाली दरअसल कोठेवाली से जुड़ा है। कोठे का मतलब है वेश्यालय। और कोठे की प्रमुख को कोठेवाली कहा गया। गंगूबाई काठेवाली के नाम के साथ जुड़ा काठियावाड़ी शब्द यह स्पष्ट दर्शाता है कि उसे अपने परिवार से कितना लगाव था।

काबिलेगौर हो कि सन् 1960 और 1970 के दशक में गंगूबाई का नाम कमाठीपुरा ही नहीं बल्कि पूरे मुंबई में काफी चर्चित हो गया था। वह देह व्यापार करने वाली लड़कियों और उम्रदराज सबकी मां की तरह बन गई थी। गंगूबाई ने सब सेक्स वर्करों का खयाल मां से बढ़ कर रखा। गंगूबाई ही वह महिला बनी जिसने कोठा चलाने वाली मैडमों का प्रभाव खत्म किया। हालातों की मारी इस महिला में अजब का साहस था। वह सेक्स वर्करों का दर्द बेहद करीब से जानती थी। बेवजह कोई गंगा से गंगू न बने इसका ख्याल उसे हर वक्त रहता था। शायद वह इसीलिए ऐसी अनेक लड़कियों को घर वापस भेजने में सफल रही जिन्हें धोखा देकर वेश्यालयों में बेचा गया था। वो इस पेशे से जुड़ी महिलाओं की सुरक्षा के प्रति न केवल बेहद सजग रहती थी बल्कि उन पर होने वाली हिंसा के खिलाफ भी हिम्मत से मुकाबला करती थी। जो लोग दुखी हारी महिलाओं के शोषक बने उनके लिए गंगूबाई किसी संरक्षक से कम नहीं थी। एक वक्त के बाद तो वह ऐसी महिलाओं की सशक्त आवाज बन कर उभरी जिन्हें देह व्यापार में धकेला जाता या बेवजह सताया जाता था। गंगूबाई स्वयं हालातों की मारी थी, इसलिए वह ये अच्छे से जानती थी कि इस पेशे में कोई भी महिला अपनी खुशी से नहीं आती है। इस बात का आभास वह हमेशा अपने दिल में रखती थी। और शायद इसी के चलते वह सेक्स वर्करों की एक बड़ी समाजसेवी बन कर भी उभरी। वह मुंबई जैसे बड़े शहर में सेक्स वर्करों को सम्मान की जिंदगी जीने का हक दिलाना चाहती थी। वह अक्सर इस बात का प्रयास करती रही कि शहर में सेक्स वर्करों के लिए भी मान-सम्मान का आशियाना हो। इसके लिए उसने शहर में सेक्स वर्कर्स को जगह मुहैया कराने का अभियान भी चलाया। मुंबई के आजाद मैदान में महिला सशक्तीकरण और महिला अधिकारों के लिए हुई रैली में उनका भाषण काफी चर्चा में रहा था।

आर्कषक पहनावे की शौकीन

वह देह व्यापार की न केवल एक मशहूर और खूबसूरत औरत रही बल्कि इसी खूबसूरती के साथ जीवन को जीने का भी चार्म था। गंगूबाई हमेशा सुनहरे किनारे वाली सफेद साड़ी पहना करती थी। इसके साथ सुनहरे बटन वाला ब्लाउज और सुनहरा चश्मा भी लगाया करती थी। सोने के आभूषण पहनने का भी खासा शौक था। वह कार की भी बेहद शौकीन थी, अक्सर कार से ही चला करती थी।


गंगूबाई के साहस के किस्से भी जुदा

एक वक्त की बात है जब कमाठीपुरा में किसी पठान की तूती बोलती थी। अपने इसी रौब रूतबे के चलते वह वेश्यालय में गंगूबाई से बदसलूकी कर बैठा। उसने गंगूबाई के साथ न केवल जोर-जबर्दस्ती करने की कोशिश कि बल्कि शारिरिक चोटें पहुंचा कर पैसे भी नहीं दिए। ये लगातार होता रहा। लेकिन गंगूबाई ने हिम्मत नहीं हारी। वह उसके इस व्यवहार से तनिक भी डरी और डिग़ी नहीं। एक बार तो नौबत अस्पताल में भर्ती कराने की आ गई। फिर भी वह टूटी नहीं बल्कि उस पठान की कुंडली निकालने में जुट गई। पता चला कि शौकत खान नाम के इस शख्स का ताल्लुक करीम लाला के गैंग से था। अब्दुल करीम खान को अंडरवर्ल्ड में लोग करीम लाला के नाम से जानते थे। गंगूबाई करीम लाला के पास पहुंच गईं और उन्हें वो सब कुछ बता दिया जो उसके साथ घटित हो रहा था। करीम लाला ने गंगूबाई के साहस की कद्र करते हुए तुरंत सुरक्षा देने का वादा कर दिया। जब अगले दिन शौकत खान वेश्यालय पहुंचा तो उसकी जमकर पिटाई कर दी। इस घटना के बाद से ही करीम लाला ने गंगूबाई को अपनी बहन बना लिया। कमाठीपुरा में हुई इस घटना के बाद से तो गंगूबाई का दबदबा और भी बढ़ गया।

मानवीय पहल की अगुवाई और नेहरू से भेंट

बात सन् 1960 के दशक की है। कमाठीपुरा में सेंट एंथनी गर्ल्स हाई स्कूल शुरू होना था। चर्चाएं जोरों पर थीं कि इस स्कूल के चलते वहां से वेश्यालय को बंद किया जाएगा। कारण, पास में वेश्यालय होने से छोटी बच्चियों पर बुरा असर पड़ेगा। यह बात गंगूबाई के कानों तक भी पहुंची। गंगूबाई ने ठान लिया कि वह ऐसा हरगिज नहीं होने देगी। लेकिन गर ऐसा हुआ तो कमाठीपुरा में करीब एक सदी से काम कर रही महिलाओं का क्या होगा। इनको कहां आश्रय मिलेगा। नए ठिकाने पर उनका काम धंधा कितना चलेगा। इन्हीं सवालातों का जवाब खोजने के लिए गंगूबाई सडक़ पर उतर आई। वह जानती थी कि अगर उजाड़ दिए गए तो कई सेक्स वर्कर का जीना हराम हो जाएगा। गंगूबाई ने इस फैसले के खिलाफ आवाज उठाई और स्कूल को आगे ले जाने के लिए पूरी ताकत लगा दी। इस काम में उसने अपने तमाम राजनीतिक परिचितों की मदद ली। इस मुद्दे पर तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से मिलने के लिए वक्त भी मांगा। उन्हें वक्त मिला और भेंट भी हुई लेकिन यह मीटिंग आधिकारिक तौर पर कहीं दर्ज नहीं हुई। इस वाकये के संबंध में एस. हुसैन जैदी ने अपनी किताब में जिक्र किया है। जैदी ने अपनी किताब माफि या क्वीन्स ऑफ मुंबई में लिखा कि- इस मुलाकात में गंगूबाई की सजगता और स्पष्ट विचारों से नेहरू काफी प्रभावित और हैरान हुए। नेहरू ने गंगूबाई से सवाल किया कि वो इस धंधे में क्यों आईं जबकि उन्हें अच्छी नौकरी या अच्छा पति मिल सकता था। ऐसा कहा जाता है कि गंगूबाई ने उसी मुलाकात में तुरंत नेहरू के सामने प्रस्ताव रखते हुए कहा कि अगर वो उन्हें (गंगूबाई को) पत्नी के रूप में स्वीकार करने को तैयार हैं तो वह ये धंधा हमेशा के लिए छोड़ देंगी। इस बात से नेहरू दंग रह गए और उन्होंने गंगूबाई के बयान से असहमति जताई। तब गंगूबाई ने कहा, प्रधानमंत्री जी, नाराज मत होइए। मैं सिर्फ अपनी बात साबित करना चाहती थी। सलाह देना आसान है लेकिन उसे ख़ुद अपनाना बेहद मुश्किल। नेहरू जी इसके जवाब में कुछ नहीं बोल पाए। हालांकि मुलाकात के बाद नेहरूजी ने गंगूबाई से वादा किया कि वो उनकी मांगों पर ध्यान देंगे। प्रधानमंत्रीजी ने जब स्वयं इस मामले में हस्तक्षेप किया तो कमाठीपुरा से वेश्याओं को हटाने का काम कभी नहीं हो सका। तो ऐसी थी गंगूबाई।

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बताते चलें कि गंगूबाई का बचपन से अभिनेत्री बनने का सपना था। वह अपने इस सपने को पूरा करने के लिए सालों तक फिल्मी दुनिया के लोगों के संपर्क में भी बनी रही। गंगूबाई अपने जीवन में बेहद साहसी और सजग महिला रही है। उनकी सहजता का आलम यह रहा है कि मौत के बाद कई वेश्यालयों में उसकी तस्वीरें लगाई गई और मूर्तियां बनाई गईं। सहजता व मानवता की ऐसी ही प्रतिमूर्ति पर अब संजय लीला भंसाली सिनेमा बना रहे हैं। इसमें आलिया भट्ट गंगूबाई के किरदार में नजर आएंगी। सिनेमा का प्रथम लुक लॉन्च हो चुका है। हम सब यह अच्छे से जानते हैं कि संजय के पास एक विजन है। उनमें वह काबिलियत है कि वे किरदार की असलियत को बड़े ही खूबसूरती के साथ दिखाते हैं। अब हम लोग गंगूबाई की असलियत, व्यक्तित्व व कृतित्व को ए. हुसैन जैदी की किताब से हट कर बड़े पर्दे पर देख पाएंगे। संजय की तरह ही हम सब आलिया की अभिनय क्षमता से भी वाकिफ हैं। जिस तरह से वो किरदार निभाती हैं, उसे जीती हैं उससे लगता है कि आलिया और भंसाली दोनों ही इस कहानी को दर्शकों के सामने खुबसूरती से पेश करेगें। संजय की यह फिल्म 11 सितंबर 2020 को टाकीजों में रिलीज होने वाली है। अब फैसला आपका है कि आप आलिया की अदाकारी, संजय की बौद्धिक क्षमता व गंगूबाई की संपूर्ण जीवन गाथा को देखने टाकीज पहुंचेंगे या नहीं।

-संजय रोकड़े

(लेखक दिल्ली व देश के अनेक शहरों से प्रकाशित मुख्यधारा के हिंदी अखबारों के संपादकीय विभाग में अपनी सेवाएं दे चुके हैं। लेखक इस समय द इंडिय़ानामा पत्रिका का संपादन करने के साथ ही समसामयिक विषयों पर कलम चलाते हैं।)