Pakistan Independence Day पर Shehbaz Sharif की गीदड़ भभकी, ''भारत सही रास्ते पर नहीं आया तो सीधा जवाब दिया जाएगा''

शहबाज शरीफ ने कहा कि सिंधु नदी के पानी की ‘हर बूंद’ पाकिस्तान की रेड लाइन है और अगर भारत ‘सही रास्ते’ पर नहीं आया तो उसे सीधा जवाब दिया जाएगा। उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि पाकिस्तान की संप्रभुता और सुरक्षा को चुनौती मिली तो मई 2025 की सैन्य झड़प से भी कड़ा जवाब दिया जाएगा।
पाकिस्तान आज यानि 14 अगस्त को अपना स्वतंत्रता दिवस मना रहा है, लेकिन प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के सामने सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि वह खुलकर जश्न कैसे मनाएं क्योंकि उनके देश में चारों ओर से चुनौतियां बढ़ती ही जा रही हैं। पाकिस्तान के हालात इस समय ऐसे हैं कि आर्थिक, कूटनीतिक और सामाजिक तौर पर विफल हो चुके देश में आजादी का जश्न सरकार भले मना रही है लेकिन आम जनता त्राहि त्राहि कर रही है। ऐसे में जनता को उम्मीदें देने की बजाय प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने एक बार फिर भारत के खिलाफ खोखली धमकियों का ऐलान कर अवाम का ध्यान भटकाने का प्रयास किया है। हम आपको बता दें कि शहबाज शरीफ ने भारत को निशाना बनाते हुए पानी के मुद्दे पर ‘सीधा जवाब’ देने की धमकी दी है। स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर उनका यह बयान पाकिस्तान की पुरानी भारत विरोधी राजनीति की याद दिलाता है, जहां घर के बिगड़ते हालात से ध्यान हटाने के लिए भारत के खिलाफ बयानबाजी को हथियार बनाया जाता है।
शहबाज शरीफ ने कहा कि सिंधु नदी के पानी की ‘हर बूंद’ पाकिस्तान की रेड लाइन है और अगर भारत ‘सही रास्ते’ पर नहीं आया तो उसे सीधा जवाब दिया जाएगा। उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि पाकिस्तान की संप्रभुता और सुरक्षा को चुनौती मिली तो मई 2025 की सैन्य झड़प से भी कड़ा जवाब दिया जाएगा। यानी अपने नागरिकों के सवालों का जवाब देने की बजाय इस्लामाबाद फिर दिल्ली को गीदड़ भभकी देकर अपनी ताकत का प्रदर्शन करना चाहता है।
इसे भी पढ़ें: Partition Horrors Remembrance Day I 1947 में लिए गये Congress के गलत फैसले की कीमत आज भी चुका रहा है भारत
विडंबना देखिए कि जिस पाकिस्तान के प्रधानमंत्री भारत को ‘शांति का दुश्मन’ बता रहे हैं, उसी पाकिस्तान के भीतर शांति और स्थिरता का संकट गहराता जा रहा है। बलूचिस्तान में पाकिस्तान की सत्ता के खिलाफ असंतोष इतना बढ़ा है कि स्वतंत्रता दिवस को ‘ब्लैक डे’ के रूप में मनाने की अपील तक सामने आई है। बलूच नेताओं ने काले झंडे और काली पट्टियां लगाई हैं। सुराब क्षेत्र में पाकिस्तानी सैन्य कार्रवाई में नागरिकों के हताहत होने से असंतोष और भड़का गया है।
बलूच कार्यकर्ताओं के मुताबिक सैन्य कार्रवाई में बच्चों समेत बड़ी संख्या में नागरिक मारे गए या घायल हुए। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने आबादी वाले इलाकों में हवाई हमलों और नागरिकों की मौत पर सवाल उठाए हैं। बलूचिस्तान और इस्लामाबाद के बीच अविश्वास की खाई बेहद गहरी हो चुकी है। जिस देश का एक हिस्सा उसके स्वतंत्रता दिवस को ही ‘ब्लैक डे’ कह रहा हो, उसके प्रधानमंत्री का भारत को धमकाना खोखली ताकत का प्रदर्शन ही अधिक लगता है।
यही नहीं, पश्चिमोत्तर पाकिस्तान का हाल भी शरीफ सरकार के दावों की पोल खोलता है। खैबर पख्तूनख्वा में स्वात के कबाल पुलिस स्टेशन के पास आत्मघाती हमले में 17 लोगों की मौत और 27 के घायल होने की खबर सामने आई है। मृतकों में सात पुलिसकर्मी भी शामिल थे। हमला उस समय हुआ जब लोग क्षेत्र की बिगड़ती कानून-व्यवस्था के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे थे। यानी पाकिस्तान अपने ही शहरों में आतंक और असुरक्षा से जूझ रहा है और फिर भी उसकी सत्ता को भारत के खिलाफ बयानबाजी में राजनीतिक लाभ दिखाई देता है।
पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर भी बेचैनी से गुजर रहा है। वहां राजनीतिक प्रतिनिधित्व और अन्य मांगों को लेकर विरोध प्रदर्शनों, झड़पों, बल प्रयोग, इंटरनेट बंदी और हालिया विधानसभा चुनावों की निष्पक्षता को लेकर गंभीर सवाल उठे हैं। रावलाकोट में सुरक्षा बलों की गोलीबारी में लोगों के घायल होने की बात भी सामने आई। भारत के विदेश मंत्रालय ने पाकिस्तान पर मानवाधिकार उल्लंघनों के लिए अंतरराष्ट्रीय जवाबदेही की मांग करते हुए कहा है कि असंतोष का जवाब ‘गोलियों, ब्लैकआउट और दमन’ से दिया गया।
वहीं राजनीतिक मोर्चे पर भी पाकिस्तान की हालत कम विस्फोटक नहीं है। पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान जेल में हैं और उनके बेटों ने आरोप लगाया है कि परिवार, डॉक्टरों और वकीलों को सात महीने से उनसे मिलने की अनुमति नहीं दी गई। इमरान खान और उनके समर्थक लंबे समय से अपने खिलाफ मामलों को राजनीतिक रूप से प्रेरित बताते रहे हैं। विपक्ष के सबसे प्रमुख चेहरे की लगातार कैद और उनकी पार्टी पर कार्रवाई ने पाकिस्तान की लोकतांत्रिक साख पर भी गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
ऐसे में शहबाज शरीफ की ‘हर बूंद रेड लाइन’ वाली धमकी पाकिस्तान की शक्ति का प्रमाण कम और उसकी बेचैनी का संकेत ज्यादा है। पाकिस्तान को समझना होगा कि बलूचिस्तान में असंतोष, खैबर पख्तूनख्वा में आतंक, पीओजेके में विरोध, राजनीतिक दमन के आरोप और आर्थिक-सामाजिक दबाव, इन सबका समाधान भारत को धमकी देने से नहीं होगा।
उधर, नई दिल्ली का संदेश सीधा है कि आतंकवाद और बातचीत साथ-साथ नहीं चल सकते। भारत का स्पष्ट रुख है कि सीमा पार आतंकवाद को पाकिस्तान जब तक विश्वसनीय और अपरिवर्तनीय तरीके से बंद नहीं करता, तब तक संधि अपने पुराने स्वरूप में नहीं चल सकती। पाकिस्तान को यह भी समझना होगा कि धमकियों से भारत की नीति नहीं बदलेगी। पाकिस्तान को पहले अपने घर की आग बुझानी होगी, अपने नागरिकों को सुरक्षा देनी होगी और सीमा पार आतंकवाद पर निर्णायक कार्रवाई करनी होगी। वरना स्वतंत्रता दिवस के मंच से दी गई उसकी दहाड़ इतिहास में ताकत की आवाज नहीं, एक ऐसे देश की खोखली हुंकार के रूप में दर्ज होगी जो अपने भीतर की दरारों से आंखें चुराकर भारत को डराने की कोशिश कर रहा है।
अन्य न्यूज़













