छोटे होते जा रहे परिवारों की बढ़ती जा रही हैं समस्याएं

एक समय था जब एक ही छत के नीचे दादा−दादी, ताउ−ताई, चाचा−चाची और भाई बहनों से भरा पूरा परिवार रहता था, आज उसकी जगह एकल परिवार ने ले ली है।

परिवार को संजोये रखना आज सारी दुनिया की समस्या हो गई है। हालांकि सारी दुनिया में वसुदेव कुटुंबकम का उद्घोष करने वाले हमारे देश में ही परिवार नामक संस्था को बनाए रखना मुश्किल हो गया है। परिवारों के बिखराव से सारी दुनिया चिंतित हैं और यही कारण है कि 1993 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने मई की 15 तारीख को अन्तरराष्ट्रीय परिवार दिवस मनाने की घोषणा की। हालांकि परिवार दिवस को अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर मनाते 22 साल हो गये हैं पर परिवार की अहमियत दिन प्रतिदिन कम होती जा रही है। परिवार दिवस की गुनगुनाहट ना तो सोशल मीडिया पर मुखर होती है और ना ही प्रिन्ट और इलेक्ट्रेनिक मीडिया में। ना ही वेलेंटाइन डे या मदर्स डे जैसा कुछ देखा जाता है। सही मायने में कहें तो परिवार दिवस आता है और अपने आने का अहसास कराए बिना ही चले जाता है। यह स्थिति तो सारी दुनिया को वसुदेव कुटुंबकम का संदेश देने वाले हमारे देश की है। हालांकि एकल परिवारों के कारण समाज में आ रही विकृतियों के चलते विदेशों में परिवार की अहमियत को समझा जाने लगा है। सारी दुनिया में सनातन परंपराओं के महत्व को समझते हुए उसे अपनाया जाने लगा है। अभी पिछले दिनों ही यूरोप में हुए एक सर्वे में नानी−दादी की कहानियों को बच्चों के लिए जरूरी माना गया है। वहीं एक अन्य सर्वे में जूते पहन कर खाना खाना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक माना गया है और इंग्लैंड के स्कूलों पर कक्षा में जूते खोलकर बैठने पर जोर दिया जाने लगा है। खाना खाने से पहले हाथ धोने के महत्व को सारी दुनिया मानने लगी है। पर तस्वीर का दूसरा पहलू यह है कि हम आज भी हमारी परंपराओं को दकियानूसी कहने में पीछे नहीं रह रहे। यह सब अंधानुकरण का परिणाम है।

बदलते आर्थिक सामाजिक परिदृश्य में संयुक्त परिवार बीते जमाने की बात होते जा रहे हैं। एक समय था जब एक ही छत के नीचे दादा−दादी, ताउ−ताई, चाचा−चाची और भाई बहनों से भरा पूरा परिवार रहता था, आज उसकी जगह एकल परिवार ने ले ली है। समय में तेजी से बदलाव को इस तरह भी देखा जा सकता है कि एकल परिवार भी अब दूर की बात होता जा रहा है और उसकी जगह भी अब लिव इन रिलेशनशीप लेती जा रही है। जब तक चले तब तक ठीक नहीं तो दोनों के रास्ते अलग या फिर एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप कर जग हंसाई। यह सामाजिक बदलाव का संकेत है पर इसके दुष्परिणाम भी चाहे संकेत रूप में ही हो पर सामने आने लगे हैं।

सोशल मीडिया पर इन दिनों चल रहे एक संदेश से परिवार और सामाजिक ताने−बाने के बिखराव को यों समझा जा सकता है कि 'पहले नानी−दादी के घर पैदा होते थे बच्चे इसलिए बार−बार नानी−दादी के घर जाते थे। आजकल के बच्चे अस्पताल में पैदा होते हैं इसलिए वो बार−बार अस्पताल जाते हैं।' इस संदेश के पीछे सामाजिक बदलाव को साफ तौर पर समझा जा सकता है। जनगणना के पिछले आंकड़ों को देखा जाए तो देश में 70 फीसदी एकल परिवार है। हालांकि अब स्थिति में तेजी से बदलाव आया है और एकल परिवारों की संख्या में और अधिक तेजी से बढ़ोतरी हो रही है। जनगणना के आंकड़ों के अनुसार ही केवल 14 फीसदी परिवार ऐसे हैं जिनमें दो विवाहित जोड़े एक साथ रहते हैं। चार विवाहित जोड़े एक घर में रहने वाले परिवारों की संख्या तो एक फीसदी भी नहीं है। एक ही छत के नीचे तीन−चार भाइयों के रहने की बात करना तो बेकार है। हालांकि अब परिवार छोटे होने लगे हैं। बच्चे हद मार के एक या दो ही होते हैं। आज की युवा पीढ़ी में अधिकांश परिवारों में पति−पत्नी दोनों ही नौकरी पेशा होने से परिवार का ताना बाना बदलता जा रहा है। बच्चे के पैदा होते ही उसके कॅरियर के प्रति पेरेन्टस अधिक चिंतित होने लगते हैं। पहले क्रेच में, उसके बाद प्रेप में और फिर अच्छे से अच्छे स्कूल में प्रवेश दिलाने के साथ ही कोचिंग की चिंता में लग जाते हैं। एक ही छत के नीचे रहने के बावजूद एक दूसरे से सार्थक संवाद तो दूर की बात होती जा रही है। इसी का कारण है कि जहां पेरेन्टस अपने काम के बोझ तले तनाव व कुंठा में रहने लगे हैं वहीं बच्चे मां बाप की सोच के चलते बचपन में ही कॅरियर की चिंता के बोझ तले दबते जा रहे हैं। एक जमाना था जब गैरसरकारी संगठन बच्चों को बस्ते के बोझ से बचाने की आवाज उठाते थे आज बस्ते का बोझ बच्चे की नियती बनता जा रहा है। बड़े शहरों की गगनचुंबी इमारतों में परस्पर संवाद तो दूर की बात है एक ही परिसर में रहने वालों को पता नहीं होता कि वहां कौन−कौन लोग रह रहे हैं। कॉम्पलेक्स में क्या चल रहा है। कौन आ रहा है कौन जा रहा है। जब कोई बड़ी घटना घटती है उसका भी पता मीडिया के माध्यम से ही चलता है, यह हमारे सामाजिक ताने−बाने की स्थिति होती जा रही है।

एक समय था जब गर्मियों की छुटि्टयां होते ही बच्चे गांव में दादा−दादी के पास रह आते थे तो कुछ दिनों नाना−नानी के पास। इस कुछ दिनों में ही परिवार के साथ रहने के संस्कार बच्चों पर इस तरह से पड़ते थे कि वे संस्कारवान, संवेदनशील, तनावमुक्त हो जाते थे, पर आज स्थिति में बदलाव यह है कि छुटि्टयों में भी बच्चों को ट्यूशन, डांस, पेंटिंग या अन्य इसी तरह की गतिविधियों को सीखने के लिए भेज देते हैं। इसमें कोई बुराई नहीं हैं पर बच्चों के अपनों से दूर रहने के कारण एकाकीपन, स्वार्थीपन, कुंठा, तनाव, संवेदनशीलता का अभाव आदि आते जाते हैं जिसके परिणाम आज की युवा पीढ़ी में साफ तौर से देखा जा सकता है। 

यूरोपीय देश खासतौर से इंग्लैंड में अब लोगों का एकल परिवार से मोह भंग होता जा रहा है। सामाजिक बदलावों और संकेतों को देखते हुए संयुक्त परिवार के महत्व को समझा जाने लगा है। यह सही है कि आज की पीढ़ी को रोजगार के चलते बाहर रहना पड़ता है। पर यह भी सही है कि अधिकांश कंपनियां अपने कार्मिकों को आवास सहित अन्य सुविधाएं उपलब्ध कराती हैं। ऐसे में पेरेन्टस को साथ में रखने से कई समस्याओं का हल अपने आप ही हो जाता है। हालांकि पेरेन्टस को स्वतंत्रता में बाधा मान लिया जाता है पर इससे होने वाले लाभ को देखना आज की आवश्यकता है। पेरेन्टस साथ रहने से परिवार के तार एक दूसरे से बंधे रहेंगे। बच्चों में संस्कार आंएगे, बच्चों की सही ढंग से देखभाल व परवरिश हो सकेगी, बच्चों में संवेदनशीलता व समझ पैदा होगी। क्रेच या सर्वेंट के सहारे बच्चों को नहीं रहना पड़ेगा। आंखों की शर्म के कारण आपसी सामंजस्य बना रहेगा।

बदलते सामाजिक आर्थिक परिदृश्य में परिवार को बोझ नहीं आवश्यकता समझनी होगी। नहीं तो वह दिन दूर नहीं जब बुजुर्गों के वृद्धाश्रम ही दिखाई देंगे और परिवार कहीं खो जाएगा। यह आज की पीढ़ी को भी समझना होगा नहीं तो कल के बुजुर्ग आज के युवा ही होंगे। परिवार सदस्यों को एकजुटता में बांधे रखने का प्रमुख केन्द्र है और जब परिवार संस्था का ही अस्तित्व नहीं रहेगा तो फिर स्थितियां अराजकता की और ही कदम बढ़ाएंगी। आओ परिवार की अहमियत को समझें, परिवार को अपनाएं।

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

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