माहिरा खान की इस दुआ ने कर दी पाकिस्तानी औरतों की बोलती बंद, वीडियो आग लगा रहा है

mahira
रेनू तिवारी । Mar 16 2020 11:51AM

समाज में औरत को लेकर क्या सोच है और आज की औरत बदलते जमाने के हिसाब से क्या सोचती है। उसे लेकर पाकिस्तान का एक बड़ा ही खूबसूरत गाना आया है। गाने में इस कदर भाव डाले गये हैं कि आप इस वीडियो सॉन्ग को देखते हुए काफी डीप चले जाएंगे।

औरतें घर का श्रृंगार होती है। मर्द तो होते ही खराब है लेकिन औरते ही मर्द को सही रास्ता दिखा सकती है। अदमी को गुस्सा आ जाए तो औरत को चुप हो जाना चाहिए, गुस्से में थप्पड़ भी मार तो उस समय बेहस नहीं करनी चाहिए। शादी को संभालने की जिम्मेदारी औरत की होती है। दूसरे के घर जाकर बहुत कुछ सहना पड़ता है। सहने की आदत डालनी होगी...

ऐसी बहुत सारी चीजें है जो एक लड़की को शादी के दौरान लोगों की तरफ से सिखाई जाती है। ये हाल केवल भारत और पाकिस्तान जैसे देशों का नहीं बल्कि दुनिया के अधिकतर देश में लैंगिक असमानता देखी जाती रही है। 

भारतीय समाज की आज भी ये सच्चाई है कि ये समाज औरत को समानता का अधिकार नहीं देना चाहता। कोई औरत को देवी बना देता है तो कोई संभोग की वस्तु। कुछ औरतों को सारे हक दे दिए जाते हैं और तमाम जिम्मेदारियों में बाध दिया जाता है ताकि वह अपनी जिंदगी को हमेशा के लिए भूल जाए।

समाज में औरत को लेकर क्या सोच है और आज की औरत बदलते जमाने के हिसाब से क्या सोचती है। उसे लेकर पाकिस्तान का एक बड़ा ही खूबसूरत गाना आया है। गाने में इस कदर भाव डाले गये हैं कि आप इस वीडियो सॉन्ग को देखते हुए काफी डीप चले जाएंगे। अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर पाकिस्तानी सिनेमा की तरफ से रिलीज हुआ ये गाना लैंगिक असमानता को हंसते-खेलते हुए, नाच गाना करते हुए बखूबी समझा देता है। यकीनन ये गाना काफी खूबसूरती से पाकिस्तानी एक्ट्रेस माहिरा खान पर फिल्माया गया है। गाने को आवाज दामिया फारूक, शहनाज़ और महक अली दी है।

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इस गाने को डायरेक्ट करे वाले हैं शोएब मंसूर। पाकिस्तानी फिल्म निर्देशक शोएब मंसूर ने अपनी ‘बोल’ और ‘ख़ुदा के लिए’ जैसी फिल्मों से पाकिस्तान की कमियों पर चोट की है। इस गाने से इस बार उन्होंने समाज में फैली पुरुषप्रधान संस्कृती पर प्रहार किया है। गाने के बोल 1902 में अल्लामा इक़बाल की नज्म 'लब पे आती है दुआ बनके तमन्ना मेरी, ज़िंदगी शम्मा की सूरत हो खुदाया मेरी' की तर्ज पर बनाया गया है।

पाकिस्तान के इस खूबसूरत सॉन्ग में दिखाया गया है कि शादी का माहौल है। शादी माहिरा खान की होने वाली है। घर की सभी औरतें वहां मौजूद है। दूसरी तरफ दुआ पढ़ने वाली टोली आयी हुई है। जो माहिला खान ने कि दुआ इस तरह पढ़ती है- 

 

लब पे आवे है दुआ बनके तमन्ना मेरी

ज़िंदगी अम्मा की सूरत हो खुदाया मेरी


मेरा ईमां हो शौहर की इताअत करना

उनकी सूरत की न सीरत की शिकायत करना


घर में गर उनके भटकने से अंधेरा हो जावे

नेकियां मेरी चमकने से उजाला हो जावे


धमकियां दे तो तसल्ली हो के थप्पड़ न पड़ा

पड़े थप्पड़ तो करूं शुक्र के जूता न हुआ


हो मेरा काम नसीबों की मलामत करना

बीवियों को नहीं भावे है बगावत करना


मेरे अल्लाह लड़ाई से बचाना मुझको

मुस्कुराना गालियां खा के सिखाना मुझको

इस दुआ को पढ़ता देख वहां की हर औरत मायूस हो जाती है। दुआ में पढ़ा जा रहा है कि मां की सूरत हो खुदाया मेरी, लेकिन मां की सूरत देखकर कोई भी ये आसानी से कह सकता है कि उनकी जिंदगी कितनी परेशान है। मारपीट करने वाले पति की गुलामी करने वाली दुआ को सुनकर माहिरा खान काफी नाराज हो जाती है और कहती है। सब करें... ये मेरी दुआ है मैं खुद अपनी दुआ पढूंगी। फिर माहिरा खान अपनी दुआ पढ़ती है- 

 

लब पे आती है दुआ बनके तमन्ना मेरी

घर तो उनका हो हुकूमत हो खुदाया मेरी


मैं अगर बत्ती बुझाऊं के अंधेरा हो जाए

मैं ही बत्ती को जलाऊं के उजाला हो जाए

मेरा ईमान हो शौहर से मुहब्बत करना

न इताअत न गुलामी न इबादत करना


न करूं मैके में आकर मैं शिकायत उनकी

करनी आती हो मुझे खुद ही मरम्मत उनकी


आदमी तो उन्हें तूने है बनाया या रब

मुझको सिखला उन्हें इंसान बनाना या रब


घर में गर उनके भटकने से अंधेरा हो जाए

भाड़ में झोंकू उनको और उजाला हो जाए


वो हो शाहीन तो मौला मैं शाहीना हो जाऊं

और कमीने हो तो मैं बढ़के कमीना हो जाऊं


लेकिन अल्लाह मेरे ऐसी न नौबत आए

वो रफाकत हो के दोनों को राहत आए


वो मुहब्बत जिसे अंदेशा-ए-ज़वाल न हो

किसी झिड़की, किसी थप्पड़ का भी सवाल न हो


उनको रोटी है पसंद, मुझको है भावे चावल

ऐसी उल्फत हो कि हम रोटी से खावे चावल

दुल्हन माहिरा खान की तरफ से पढ़ी गई ये दुआ महिलाओं को जूते से मारने वाली सोच पर कटाक्क्ष करती है। पति और पत्नी का रिश्ता राजा और गुलाम का नहीं बल्कि मोहब्बत का होता है। महिरा अपने शोहर से मोहब्बत की दुआ करती है। मोहब्बत के अलावा वह ये भी दुआ करती है कि मैं अपने पति को अच्छा इंसान बनने में मदद करूं। 


 

शोएब मंसूर ने इस सात मिनट की दुआ में बहुत कुछ बयां कर दिया है। इस दुआ में ये भी भाव डाला है कि कैसे एक औरत ही औरत की दुश्मन होती है। गाने में बैठी दादी के जो एक्सप्रेशन है वो इस बात को दर्शाते हैं। दुल्हन को सब्र की, दरगुज़र की नसीहत देने वाली तमाम की तमाम औरतें ही हैं। घर की बड़ी बूढ़ियां, परिवार की आंटियां. ऐसा ही अमूमन होता भी है। पाकिस्तान की औरतों की ये दुआ जब से रिलीज हुई है तब से कहर मजा रही है। सोशल मीडिया पर इस दुआ को खूब पसंद किया जा रहा है। इस दुआ को लोग खूब शेयर कर रहे हैं। खासकर औरते और लड़कियों को इस गाने ने काफी कनेक्ट किया है। 


आप भी सुने ये दुआ-

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