वफादारी अगर वैक्सीन सी हो जाए तो (व्यंग्य)

  •  संतोष उत्सुक
  •  जनवरी 25, 2021   15:30
  • Like
वफादारी अगर वैक्सीन सी हो जाए तो (व्यंग्य)

इतिहास मानता है उनमें आम लोग ही नहीं ख़ासम खास लोगों से भी ज्यादा वफादारी साबित हुई है। वफादारी ने हर युग में कुछ भी करवाने का साहस दिखाया है, वैसे इस बहाने वफादारों का ख्याल रखने वालों में भी बढ़ोतरी हुई है।

चिर प्रतीक्षित, आदरणीय वैक्सीनजी ने अपने लावलश्कर के साथ पहुंचकर जलवा दिखाना शुरू कर दिया है। तालियां और थालियां बजने को बेकरार हैं । लोकतंत्र की फ़िज़ा में खुशनुमा ख़बरें बर्फ के मनोरम फाहों की तरह उतर रही हैं, पृष्ठभूमि में मंगलगीत सुना जा सकता है, ‘वैक्सीनजी आ गई हैं तो नूर आ गया है’। एक महा वायरस धकेलने में ट्वेंटी ट्वेंटी हो गया, दबाव बकाया है और इधर पक्षियों ने डराना शुरू कर दिया है। मुर्गों और बतखों को भूल भी जाएं लेकिन ख़बरों के बदलाव बताते हैं कि वफादारी के लिए जाने जाने वाले प्रसिद्द प्राणी से भी डरने का वक़्त आ गया है। बताते हैं उधर खासे लोग अभी भी महामारी की छाया से डरे बैठे हैं। पता नहीं यह गोरखधंधा है या सिर्फ धंधा, उन्हें लग रहा है कि कहीं पागल कुत्तों की वजह से वह वायरस की चपेट में न आ जाएं। बताते हैं वेटेनरी कोरोना वैक्सीन की बिक्री भी कई गुना बढ़ गई है। दिलचस्प यह है कि इतिहास रचने वाले कोरोना से इसका कोई लेना देना नहीं है लेकिन बेचारी वफ़ादारी की परेशानी बढती जा रही है।

इसे भी पढ़ें: टीका से टिकाऊ हुआ टीका (व्यंग्य)

डर वास्तव में चुम्बकीय वस्तु होती है, इसी डर ने इंसान, वेटेनरी वैक्सीन और चिकित्सक को मिला दिया है। कुत्ता यानि वफादारी पालने का शौक या मज़बूरी रखने वालों को खौफ के साए में जाना स्वाभाविक रहा, तभी तो इन भ्रांतियों ने ज़िंदगी की गलियों में घूमना शुरू कर दिया है कि कुत्तों से भी कोरोना हो सकता है। इतिहास मानता है उनमें आम लोग ही नहीं ख़ासम खास लोगों से भी ज्यादा वफादारी साबित हुई है।  वफादारी ने हर युग में कुछ भी करवाने का साहस दिखाया है, वैसे इस बहाने वफादारों का ख्याल रखने वालों में भी बढ़ोतरी हुई है। बजट की पुरानी दिलचस्पियों  में दर्ज है, एक बार बड़ी सरकार ने कुत्तों को खिलाए जाने वाले बिस्कुटस के दाम भी कम कर दिए थे। इन बिस्कुटों को भी तो व्यवहारिक वफादारी का ठोस प्रतीक माना जा सकता है। उस समय में लोगों ने कुत्ते ज़्यादा पालने शुरू किए होंगे तो वफादारी में भी उछाल आया होगा। हालांकि इसमें कोई शक नहीं कि इसी किस्म के बिस्कुट या अन्य खाद्य, बेवफा इंसानों को नियमित अंतराल पर खाने को दिए जाएं तो समाज में वफ़ा और वफादारी का प्रचलन बढ़ सकता है। पड़ोसियों में सदभाव बढ़ सकता है, आपसी झगड़े कम हो सकते हैं। पुलिस की सामाजिक परेशानियां कम हो सकती हैं।

इसे भी पढ़ें: वैक्सिन ले लो वैक्सिन...रंग-बिरंगी वैक्सिन (व्यंग्य)

किसी भी किस्म की वैक्सीन, बीमारी या संक्रमण से तो बचा सकती है लेकिन एक बार वफ़ा के बीजों से पौधे उगने शुरू हो गए तो कुत्तों की कद्र के साथ उनको पालने वालों का सम्मान भी खूब बढ़ सकता है। बस ख्याल ज़रूर रखना पड़ेगा कि बदलते वक़्त के साथ कहीं जानवर, इंसानी गुण इख़्तियार न कर ले। ऐसा हो गया तो जानवरों में बची खुची वफादारी, जानवरीयत का भी ख़ासा बड़ा नुक्सान कर सकती है। वफादारी की ज़रूरत तो पूरी ईमानदारी से बेवफाई करने वालों को भी रहती है। एक सैनिटाइज्ड सवाल यहां प्रवेश करना चाहता है कि क्या हमें किसी भी किस्म की वैक्सीन में वफादारी के साथ वफ़ादारी की वैक्सीन की भी ज़रूरत है या नहीं।  

संतोष उत्सुक







इधर उधर के बीच में (व्यंग्य)

  •  डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा उरतृप्त
  •  मार्च 2, 2021   18:38
  • Like
इधर उधर के बीच में (व्यंग्य)

एक दिन सोसाइटी की मीटिंग हुई। मीटिंग में अधूरे पड़े कार्यों की समीक्षा की गयी। दूर के ढींगे हांकने वाले अध्यक्ष जी के काम नाम बड़े और दर्शन छोटे की तरह दिखाई दिए। उन्हें लगा कि आज उनकी खैर नहीं है। फट से उन्होंने अपना रंग बदला।

प्यारेलाल सरकाने और टरकाने का नुस्खा बड़ी सफाई से इस्तेमाल करते हैं। हर काम को कल पर टाल कर आज को आराम देह बनाने के लिए अपने टाइप के आधुनिक कबीर बनने का दावा करते हैं। उनकी मानें तो दौड़-धूप कर मेवा खाने से अच्छा बैठे-बिठाए रूखी सूखी खाना है। वे अपनी रेसिडेंस सोसाइटी के अध्यक्ष हैं। इसका उन्हें तनिक भी गुमान नहीं है। हाँ यह अलग बात है कि सुबह-शाम उन्हें सलाम न ठोंकने तथा जी हुजूरी करने से बचने वालों की खबर अच्छे से लेते हैं। ऊपर से ऐसे लोगों का काम मजे से लटका कर रखते हैं। लटकाने का यह सिलसिला तब तक चलता है जब तक लटकू महाराज उनसे माफी मांग नहीं लेते।

इसे भी पढ़ें: उचित दूरी का मतलब... (व्यंग्य)

वैसे तो प्यारेलाल जी ज्यादा पढ़े लिखे तो नहीं हैं लेकिन अहंकार पढ़े-लिखों से ज्यादा है। अपने गुमान का पारा सदा सातवें आसमान पर रखते हैं। कभी कभार पत्नी उनकी पढ़ाई को लेकर चुहल बाजी कर बैठती है तो तैश में तिलमिला उठते हैं और कहते हैं- रिक्शा चलाने वाला पढ़ा-लिखा न हुआ तो क्या हुआ बच्चों को अंग्रेजी स्कूल में डाल कर खुद अंग्रेजों-सा फील करता है या नहीं? राधे लाल की पत्नी उन्हें छोड़ जमाना हो गया लेकिन मजाल कोई उन्हें महिला सशक्तीकरण पर भाषण देने से रोक कर दिखाए। व्यापार में डूबे हुए न जाने कितने विफलधारी व्यापार में सफलता के गुरु मंत्र नहीं बांटते क्या? खुद सिविल की परीक्षा की चौखट पर हजार बार माथा फोड़ने वाले कोचिंग सेंटरों में सिविल अधिकारी तैयार नहीं करते क्या? पावर में बने रहने के लिए दिमाग की नहीं समय को भुनाने की कला आनी चाहिए। पत्नी थक हार कर उनकी दलीलों के आगे नतमस्तक हो जाती है और अपने तीसमार खान पति की अड़ियलता को अपने कर्मों का फल मानकर मन मसोसकर रह जाती है।

एक दिन सोसाइटी की मीटिंग हुई। मीटिंग में अधूरे पड़े कार्यों की समीक्षा की गयी। दूर के ढींगे हांकने वाले अध्यक्ष जी के काम नाम बड़े और दर्शन छोटे की तरह दिखाई दिए। उन्हें लगा कि आज उनकी खैर नहीं है। फट से उन्होंने अपना रंग बदला। किसान नेता टिकैत की भांति आंखों में आंसू भर लिए और कहा- हमारे किसान दिल्ली की सीमाओं पर मर रहे हैं और तुम सब मुझसे हिसाब मांग रहे हो? मैंने सोसाइटी का कुछ फंड किराए पर ट्रैक्टर लेकर दिल्ली भिजवाने में खर्च कर दिए। बचा खुचा अयोध्या में भव्य मंदिर के निर्माण में लगा दिया। यह सुन सोसाइटी के सदस्य हक्के बक्के रह गए। इससे पहले कि सदस्य अध्यक्ष से सवाल करते उन्होंने तुरंत प्रत्येक सदस्यों के नाम वाले किसान समर्थक धर्मरक्षक का प्रमाण पत्र व्हाट्सएप कर दिया। सदस्यों को लगा हींग लगे न फिटकरी रंग चोखा की तरह बिना दिल्ली गए किसान और बिना मंदिर गए आस्तिक बनना आज के समय की बड़ी उपलब्धि है। किंतु तभी एक सदस्य ने अध्यक्ष पर एक संदेह भरा सवाल दागा- किसान का समर्थन और मंदिर निर्माण के लिए दान जैसे कार्य दोनों पक्ष-विपक्ष का समर्थन करने जैसा विरोधाभासी कार्य है। वैसे हम सब किसकी और हैं?

इसे भी पढ़ें: टूल किट की किटकिटाहट (व्यंग्य)

इस पर अध्यक्ष जी मुस्कुराए और बोले आज का समय पक्ष-विपक्ष में रहने वालों का नहीं दोनों और रहने वालों का है। ऐसे लोग सदा सुरक्षित और सुखी रहते हैं। वह दिन दूर नहीं जब स्त्री-पुरुष और अन्यों की तरह पक्ष-विपक्ष और वह उभय पक्ष की कैटेगरी होगी। मुझे सदस्य बनकर अध्यक्ष को और अध्यक्ष बनकर सदस्यों को डांटने का बड़ा शौक था। इसीलिए मैं सोसाइटी का सदस्य और अध्यक्ष दोनों हूं। जो दोनों और रहते हैं वही आगे बढ़ते हैं। यही आज के समय का सबसे बड़ा गुरु मंत्र है।

-डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा उरतृप्त







उचित दूरी का मतलब... (व्यंग्य)

  •  संतोष उत्सुक
  •  फरवरी 25, 2021   17:01
  • Like
उचित दूरी का मतलब... (व्यंग्य)

अब पुराना गाना जुबान पर आ रहा है, मानो तो मैं गंगा मां हूं न मानो तो बहता पानी। हमने मां विषय पर लाखों कविताएं लिखी लेकिन गंगा को सामान्य पानी समझ कर गंदा करते रहे। अमिताभ जैसी आभा ने करोड़ों बार समझाया कि उचित दूरी बनाकर रखें...

कृपया उचित दूरी बनाए रखें, सुन सुन कर मेरा मन आज भी संगीतमय हो उठता है और गुनगुनाने भी लगता है, उचित दूरी क्या है यह उचित दूरी क्या है। यह वैसा ही लगता है जैसा हम किसी ज़माने में गाया करते थे, चोली के पीछे क्या है या ज़्यादा शरीफाना अंदाज़ में आज भी गा सकते हैं, पर्दे के पीछे क्या है पर्दे के पीछे क्या है। लेकिन हम गा ऐसे रहे हैं, परदे में रहने दो पर्दा न उठाओ। उचित दूरी का मतलब दो गज तो है लेकिन यह अभी तक भेद ही है कि दो गज की दूरी व्यवहार में कितनी है। इस दूरी के अपने अपने प्रयोग हैं जिन्होंने सबके भेद खोल दिए हैं। हम सब यही मानने लगे हैं कि जो उचित है वह अनुचित है और जो अनुचित है वह वास्तव में उचित है ठीक जैसे अनेक बार असवैंधानिक को वैधानिक मान लिया जाता है।

इसे भी पढ़ें: टूल किट की किटकिटाहट (व्यंग्य)

अब पुराना गाना जुबान पर आ रहा है, मानो तो मैं गंगा मां हूं न मानो तो बहता पानी। हमने मां विषय पर लाखों कविताएं लिखी लेकिन गंगा को सामान्य पानी समझ कर गंदा करते रहे। अमिताभ जैसी आभा ने करोड़ों बार समझाया कि उचित दूरी बनाकर रखें, बार बार हाथ धोएं लेकिन सर्दी में सभी को गर्म पानी नहीं मिलता तभी शायद बार बार हाथ धोना मुश्किल है। जितनी दूरी उचित लगे, बनाकर रखी जाने बारे सलाह देने वाले भी ऐसी सलाह देते हैं जैसे, बीते न बिताए रैना बिरहा की जाई रैना। गलत चीज़ों से उचित दूरी न बनाए रखने के कारण डॉक्टर के पास जाना पड़ा, वहां एक कंपनी का विज्ञापन बोर्ड लगा हुआ था जिसमें लिखा हुआ था कि एक से डेढ़ गज की दूरी बनाए रखें। हमें यह किसी सूझ बूझ वाले समझदार व्यक्ति द्वारा रचाया लगा। उन्हें मालूम है आम क्लिनिक में खड़े होने की जगह भी नहीं होती तभी तो उचित दूरी की परिभाषा खुद ही बनानी ज़रूरी है। कोई पूछे, जनता के सेवक ने जनता के साथ उचित बातें करनी हों तो उचित दूरी बनाकर ही बात करेगा लेकिन उस उचित दूरी का निर्धारण उसे उस पुल के निर्माण की तरह करना होगा जो वह उचित जगह बनवाता है। मास्क लगाकर रखेगा तो मुस्कराहट कैसे अपनी वोट तक पहुंचाएगा। तभी यह सवाल बार बार होता है कि उचित दूरी क्या है, उचित दूरी का मतलब.... 

इसे भी पढ़ें: कल्पना बड़े काम की चीज़ है (व्यंग्य)

एक सरकारी कार्यालय जाना हुआ जहां रोज़ काफी जनता आती है, वहां प्रवेश द्वार पर लिखे अनुरोध के अनुसार उचित दूरी तीन से छ फुट तक मानी गई। उचित शारीरिक दूरी को नए प्रायोगिक अर्थों में सामाजिक दूरी परिभाषित किया जा रहा है। यह एक सरकारी विवरणी की तरह हो गई है जिसमें नियंत्रक कार्यालय को उचित अंतराल पर पुष्टि भेज दी जाती है कि हमारे शाखा कार्यालय में अपाहिज व्यक्तियों के लिए रैंप का उचित प्रावधान किया गया है, लेकिन वास्तव में वहां सीमेंट की सीढियां ही रहती हैं। कहने और करने का व्यवहारिक फर्क रहता है। मुहब्बत कम होते ज़माने में, उचित दूरी का मतलब आई हेट यू ... भी तो नहीं हो सकता। जवाबों के बीच वही सवाल खड़ा है.......उचित दूरी क्या है।

संतोष उत्सुक







टूल किट की किटकिटाहट (व्यंग्य)

  •  डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा उरतृप्त
  •  फरवरी 23, 2021   17:44
  • Like
टूल किट की किटकिटाहट (व्यंग्य)

काश हमारे पास भी कोई दिशा रवि होती तो कितना अच्छा होता, जो हमारे सभी तरह के पेंच टाइट करने वाले पाने ढूँढ़ कर दे देती। अब दिशा को कौन बताए कि यहाँ किसी का पेंच ढीला है तो किसी का कुछ। किसी के मुँह का ढक्कन खुला हुआ है तो किसी के हाथ-पैर छूटे हुए हैं।

आप लोग टूल किट तो जानते ही होंगे। नहीं जानते? अरे भैया! वही औजारों की पेटी जिसमें ढूँढ़ने पर सब कुछ मिल जाता है सिर्फ हमारी जरूरत की चीज़ को छोड़कर। यह दुनिया भी तो एक टूल किट है। जहाँ सभी टूल सिर्फ और सिर्फ किट-किट करते रहते हैं। यह किट-किट बंद हो जाए तो संयुक्त राष्ट्र संघ लंबी छुट्टी के लिए जा सकता है। न किट-किट बंद होगी न कोई लंबी छुट्टी पर जाएगा।

इसे भी पढ़ें: कल्पना बड़े काम की चीज़ है (व्यंग्य)

काश हमारे पास भी कोई दिशा रवि होती तो कितना अच्छा होता, जो हमारे सभी तरह के पेंच टाइट करने वाले पाने ढूँढ़ कर दे देती। अब दिशा को कौन बताए कि यहाँ किसी का पेंच ढीला है तो किसी का कुछ। किसी के मुँह का ढक्कन खुला हुआ है तो किसी के हाथ-पैर छूटे हुए हैं। किसी का खाली दिमाग बंद होने का नाम नहीं ले रहा है। इन सबके लिए टूल किट की जबरदस्त जरूरत आन पड़ी है। वह न जाने किस दिशा से आशा की रवि किरण बनकर आयी है कि सभी उसी के नाम का जप करने में व्यस्त हैं। टूल-अटूल किट-किट करावै, जब-जब दिशा का नाम सुनावै। दिशा ने मानो जंग लगे टूल किटों में जान फूँक दी है। जिन टूल के बारे में कल तक देश नहीं जानता था अब सबकी जुबान पर दिशानामी का रट्टा लगा हुआ है।

दिशा टूलकिट का अपने ढंग से इस्तेमाल करना चाहती थी। न जाने उससे कहाँ गड़बड़ हो गई कि टूल किट के खुलते ही तरह-तरह के स्क्रू ड्राईवर, स्पैनर, की-सैट, और चाबी-पाने खुलकर बिखर गये। किसान सरकार के पेंच टाइट करने में लगी थी वहीं सरकार दिशा जैसे टूल किटों की मालकिनों को टाइट करने में लगी थी। टाइट करने का असर यह हुआ कि किसी को दस्त तो किसी को उल्टी होने लगी। कुछ तो जंपिंग-जपांग करने में अपना हुनर दिखाने लगे।

इसे भी पढ़ें: आविष्कारों की गिरफ्त्त में ज़िंदगी (व्यंग्य)

कोई महंगाई के टूल किट से समाज के सोने वाले लोगों को उठाने के लिए यूज होने वाले हैशटैग के अलावा किस दिन, किस वक्त और क्या ट्वीट्स या पोस्‍ट्स रूपी टूलोपयोग करना है, के बारे में बताता तो कितना अच्छा होता। यहाँ सभी अपने-अपने टूल किटों की किटकिटाहट में लगे हैं। कितना अच्छा होता कि सोशल मीडिया के टूलकिट में कट, कॉपी, पेस्ट मटेरियल और अंधभक्तों की हुड़दंग से बचाने वाले टूल्स होते। यहाँ महंगाई के बारे में कुछ कहने जाओ पेट्रोल, डीजल की कीमतें बढ़ाकर आम जनता के पेंच टाइट कर दिए जाते हैं। अस्पतालों के बारे में बात करो तो धर्म का पेंच बीच में फिट कर देते हैं। नौकरी देने के बारे में बात करो तो प्राइवेटीकरण का हथौड़ा लिये सरकारी संस्थाओं का रूप-नक्शा ही बदल दिया जाता है। देश में मुश्किल यह है कि जिनके पास टूल किट है उन्हें इस्तेमाल करना नहीं आता। जिन्हें इस्तेमाल करने आता है उनके पास टूल किट नहीं है। देश को तोड़ने वाली दिशा को जेल की दिशा तो दिखा दी गयी, लेकिन जो देश को जोड़ने का स्वांग रचाते हैं उनकी दिशा और दशा कैसे तय करेंगे....इसी को कहते हैं जिसका टूल उसी की किट...मैं हूँ फिट और तू है अनफिट।

-डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा उरतृप्त







This website uses cookie or similar technologies, to enhance your browsing experience and provide personalised recommendations. By continuing to use our website, you agree to our Privacy Policy and Cookie Policy.Accept