मुलायम सिंह को बिल क्लिंटन से जोड़ने वाले अमर सिंह, जिनके कई किस्से हैं मशहूर

  •  अभिनय आकाश
  •  जनवरी 27, 2021   15:04
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मुलायम सिंह को बिल क्लिंटन से जोड़ने वाले अमर सिंह, जिनके कई किस्से हैं मशहूर

ये अमर सिंह का ही करिश्मा था कि पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन 2005 में लखनऊ के एक भोज में शामिल हुए थे। व्यापार जगत में भी उनके संबंध अनिल अंबानी से लेकर सुब्रत राय सहारा से अच्छे लिंक थे।

राजनीति की अमर कथा, सियासत की अमरवाणी। जब कभी ये वाक्य कहे जाते हैं तो सभी को पता होता है कि बात किसकी हो रही है। अमर सिंह राजनीति के गलियारों में ऐसा नाम जिसे दोस्तों का दोस्त और संकटमोचक कहा जाता था। कभी अखाड़ों में अपने विरोधियों को चित करने वाला एक पहलवान जो साइकिल से चढ़कर संसद तक पहुंचा। समाजवाद के आंदोलन से शुरुआत की तो समाजवादी पार्टी बना ली। समाजवाद से सियासत तक के सफर में नेताजी का यादववंश राजनीति का सबसे बड़ा कुनबा रहा। मैनपुरी से लोकसभा का चुनाव जीतकर मुलायम पहली बार संसद पहुंचे और देवगौड़ा की यूनाइटेड फ्रंट सरकार में रक्षा मंत्री बने।  यहीं से एक ऐसी दोस्ती की नींव पड़ी जिसके बाद तो राजनीति में उन दोनों की दोस्ती के कई किस्से चर्चा-ए-आम बने। दरअसल, मुलायम सिंह औ अमर सिंह के रिश्ते की नींव एचडी देवगौड़ा के प्रधानमंत्री बनने के साथ ही शुरू हुई। एचडी देवगौड़ा को हिंदी नहीं आती थी और मुलायम सिंह अंग्रेजी नहीं जानते थे। उस वक्त देवगौड़ा और मुलायम के बीच संवादवाहक की भूमिका अमर सिंह की अदा करते थे। 

अमर सिंह को यूं ही संकटमोटक और दोस्तों का दोस्त नहीं कहा जाता था। उन्होंने मुश्किल वक्त में गिरती हुई सरकार और लड़खड़ाते हुए दोस्तों बखूबी संभाला था। अमर सिंह को 2008 में यूपीए की नेतृत्व वाली मनमोहन सरकार बचाने के लिए हमेशा याद किया जाएगा। गठबंधन की राजनीती वाले दौर में समाजवादी पार्टी जैसी 20-30 लोकसभा सीटें हासिल करने वाली पार्टियों की अहमियत को बढ़ा दिया। इसके साथ ही अमर सिंह की भूमिका में भी इजाफा हुआ। साल 1999 में सोनिया गांधी ने बहुमत के आंकड़े वाले 272 के जादुई नंबर का दावा तो कर दिया, लेकिन ऐन मौके पर सपा ने कांग्रेस को अपना सरर्थन नहीं दिया। जिसके बाद सोनिया गांधी की खूर किरकिरी भी हुई थी। साल दर साल बीता और 2008 में भारत के परमाणु करार के दौरान लेफ्ट पार्टियों ने यूपीए से अपना समर्थन वापस लेकर मनमोहन सरकार को अल्पमत में ला दिया। उ वक्त अमर सिंह संकट मोचक की भूमिका में सामने आए और समाजवादी पार्टी के सांसदों के अलावा कई निर्दलीय सांसदों को भी मनमोहन सरकार के पाले में ला कर खड़ा कर दिया। 

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जुदा हुई राहें

2009 के लोकसभा चुनाव से पहले अमर सिंह ने राजनीति के दो विपरीत ध्रुव मुलायम सिंह और कल्याण सिंह को एक साथ ला दिया। लेकिन राजनीति और क्रिकेट में हर किसी का दिन एक जैसा नहीं  रहता। कल्याण सिंह की मुलायम से नजदीकी सपा को भारी पड़ी। मुलायम के कोर मुस्लिम वोट बैंक सपा से छिटकने लगे और पार्टी के 12 मुस्लिम प्रत्याशी चुनाव हार गए। चुनाव परिणाम के बाद पार्टी में उठते सवालों के बीच 6 जनवरी 2010 को अमर सिंह ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया। बाद में 2 फरवरी 2010 को मुलायम सिंह ने उन्हें पार्ची से ही बाहर का रास्ता दिखा दिया। बाद में अमर सिंह ने लोकमंच नाम से एक नई पार्टी का गठन किया और 14 छोटे दलों का सहयोग भी लिया। अमर सिंह अपने अंदाज में मुलायम सिंह को लगातार घेरते रहे लेकिन मुलायम ने उनके खिलाफ कुछ भी नहीं कहा। साल 2011 में अमर सिंह का वक्त न्यायिक हिरासत में बीता। साल 2012 में उत्तर प्रदेश की 403 सीटों में से 360 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे। लेकिन एक भी सीट पर अमर सिंह की पार्टी को सफलता नहीं मिली। साल 2014 के लोकसभा चुनाव में अमर सिंह ने राष्ट्रीय लोक दल में शामिल होकर चुनाव लड़ा। लेकिन इस बार भी निराशा ही हाथ लगी।  कहा तो ये भी जाता है कि उन्होंने कांग्रेस में भी शामिल होने की खूब कोशिश की लेकिन बात नहीं बनी। आखिर में अमर सिंह की निगाहें वहीं आकर रूकी जिसके रंग ढंग को उन्होंने बगला था। 2016 में उनकी समाजवादी पार्टी में पुन: वापसी हुई। 

कैश फाॅर वोट कांड

2008 में संसद का मानसून सत्र चल रहा था। सदन में बीजेपी के तीन सांसद पहुंचे और नोटों की गड्डी लहराते हुए विरोध जताना शुरू किया। उस वक्त लोकसभा के स्पीकर सोमनाथ चटर्जी हुआ करते थे। सांसदों ने अमर सिंह पर दलबदल को बढ़ावा देने का आरोप लगाया। आरोप लगाने वाले सांसदों के नाम - फग्गन सिंह कुलस्ते, महावीर भगोरा और अशोक अर्गल थे। जिन्होंने दावा किया कि मनमोहन सरकार के पक्ष में वोट देने के लिए उनको पैसे दिए गए। अमर सिंह पर दिल्ली पुलिस का शिकंजा कसा और उन्हें संसद कांड में मुख्य आरोपी बताकर तिहाड़ जेल भेज दिया गया। हालांकि बाद में अमर सिंह को इन आरोपों से बरी कर दिया गया। 

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राज्यसभा के लिए चयन

16 मई 2016 को सपा की संसदीय बोर्ड की बैठक में अमर सिंह के राज्यसभा जाने पर मुहर लगी। हालांकि अमर सिंह के नाम को लेकर पार्टी में विरोध की आवाजें भी उठी। लेकिन पार्टी मुलायम सिंह यादव के कड़े रुख को देखते हुए ये स्वर उस वक्त प्रखर नहीं हो सके।

अखिलेश से टकराव

मुलायम सिंह द्वारा अमर सिंह को राज्यसभा भेजे जाने के बाद कहा जाता है कि अमर सिंह ने कई बार अखिलेश से मिलने की कोशिश की। लेकिन अखिलेश ने उन्हें मिलने का वक्त तक नहीं दिया, जिसके बाद अमर सिंहृ की कुछ बयानबाजी आखिलेश को रास नहीं आई। अखिलेश को लगने लगा कि पार्टी में हो रहे विवाद के सूत्रधार अमर सिंह ही हैं। अमर सिंह उनके पिता मुलायम को भड़का रहे हैं। बाद में फिर से अमर सिंह को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया गया। 

बिल क्लिंटन लखनऊ भोज में हुए शामिल

समाजवादी पार्टी में फिल्म और ग्लैमर का तड़का लगाने वाले अमर सिंह ही थे। चाहे वो जया प्रदा को सांसद बनाना हो या जया बच्चन को राज्यसभा पहुंचाना। ये अमर सिंह का ही करिश्मा था। अमिताभ बच्चन के साथ तो अमर सिंह के ऐसे रिश्ते थे कि दोनों एक दूसरे को परिवार का सदस्य मानते थे। कहा तो ये भी जाता है कि अमिताभ बच्चन की मुश्किल परिस्थितियों में अमर सिंह ने मदद की थी। हालांकि समाजवादी पार्टी से अमर सिंह के निकाले जाने के वक्त उनके कहने पर जया बच्चन ने राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा नहीं दिया। इसके बाद से ही दोनों के रास्ते अलग हो गए। व्यापार जगत में भी उनके संबंध अनिल अंबानी से लेकर सुब्रत राय सहारा से अच्छे लिंक थे। ये अमर सिंह का ही करिश्मा था कि पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन 2005 में लखनऊ के एक भोज में शामिल हुए थे। 

पीएम मोदी को समर्पित है जीवन

योगी सरकार की ग्राउंड सेरेमनी का मौका था अमर सिंह अपने मित्र बोनी कपूर के साथ बैठे थे। प्रधान मंत्री मुस्कुराते हुए कहते हैं अमर सिंह बैठे हैं, सबकी हिस्ट्री निकाल देंगे। उस वक्त प्रधानमंत्री मोदी उद्योगपतियों और राजनेताओं के संबंध की बात कर रहे थे। अमर सिंह ने सपा से मोहभंग होने के बाद सार्वजनिक तौर पर कहा था कि मेरा अब समाजनादी पार्टी से कोई लेना देना नहीं। मेरा जीवन नरेंद्र मोदी को समर्पित है। अमर सिंह ने योगी आदित्यनाथ से भी मुलाकात की थी। कहा तो ये भी जाता है कि लोकसभा चुनाव 2019 के वक्त अमर सिंह के कहने पर ही जया प्रदा को रामपुर से टिकट दिया गया था। हालांकि जया प्रदा इस चुनाव में रामपुर से हार गईं थीं। 

बीच में अमर सिंह के मौत की खबर वायरल हुई जिसके बाद सिंगापुर से वीडियो जारी करते हुए अमर सिंह ने का था कि मैं अच्छा हूं या बुरा, लेकिन मैं आपका हूं। मैंने अपने तरीके से जिंदगी जी ली है मैं वापस लौटूंगा। हालांकि अमर सिंह नहीं लौट सके। अमर सिंह का 1 अगस्त 2020 को सिंगापुर के अस्पताल में निधन हो गया।  







लेटरल एंट्री क्या आरक्षण पर खतरा है या ब्यूरोक्रेसी में 'निजीकरण' की एक कोशिश? जानें हर सवाल का जवाब

  •  अभिनय आकाश
  •  मार्च 2, 2021   18:43
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लेटरल एंट्री क्या आरक्षण पर खतरा है या ब्यूरोक्रेसी में 'निजीकरण' की एक कोशिश? जानें हर सवाल का जवाब

लेटरल एंट्री सिस्टम के अंतर्गत सरकारी विभागों में बिना परीक्षा दिए अधिकारियों की भर्ती की जा सकती है। हालांकि इसके लिए कुछ वांछित योग्यताओँ का होना जरूरी है। जैसे उम्र सीमा, कार्यकुशलता, कार्यानुभव, शैक्षणिक योग्यता आदि।

प्रशासनिक सुधार की दिशा में उठाया गया महत्वकांक्षी कदम लेटरल एंट्री से आरक्षण को खतरा है? क्या सीनियर अधिकारियों के पद पर सीधी नियुक्ति की इस प्रक्रिया से मौजूदा व्यवस्था प्रभावित होगी? क्या इस नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी रहेगी? क्या लेटरल एंट्री ब्यूरोक्रेसी में निजीकरण की एक कोशिश है? ये तमाम सवाल हैं जो केंद्र सरकार द्वारा विभिन्न सरकारी विभागों में संयुक्त सचिव और निदेशक जैसे प्रमुख पदों पर निजी क्षेत्र के 30 और विशेषज्ञों को सीधे नियुक्त करने के फैसले के बाद फिर से चर्चा में हैं। संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) ने विभिन्न सरकारी विभागों में तीन संयुक्त सचिव तथा 27 निदेशक स्तर के कुल 30 पदों के लिए प्रतिभाशाली और भारतीय नागरिकों से आवेदन मांगे हैं। कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग (DOP&T), भारत सरकार से प्राप्त आवश्यकताओं के अनुसार राष्ट्र निर्माण की दिशा में योगदान करने के इच्छुक प्रतिभाशाली और प्रेरित भारतीय नागरिकों से संविदा के आधार (Contract Basis) पर सरकार में शामिल होने के लिए आवेदन मांगे हैं।

संयुक्त सचिव को जानिए

संयुक्त सचिव किसी भी विभाग के एक विंग का हेड होता है। एक विभाग में कई संयुक्त सचिव हो सकते हैं। संयुक्त सचिव अपने विभाग के सचिव या अतिरिक्त सचिव को रिपोर्ट करता है। किसी विभाग में संयुक्त सचिव के ऊपर अतिरिक्त सचिव और सचिव होता है। आम तौर पर यूपीएससी के जरिये संयुक्त सचिव का चयन होता है। देश में ज्वाइंट सेक्रेटरी के कुल 341 पद होते हैं, जिनमें से 249 पदों पर आईएएस अधिकारी ही होते हैं।

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क्या है लेटरल एंट्री सिस्टम

लेटरल एंट्री सिस्टम के अंतर्गत सरकारी विभागों में बिना परीक्षा दिए अधिकारियों की भर्ती की जा सकती है। हालांकि इसके लिए कुछ वांछित योग्यताओँ का होना जरूरी है। जैसे उम्र सीमा, कार्यकुशलता, कार्यानुभव, शैक्षणिक योग्यता आदि। लेटरल एंट्री सिस्टम के तहत उम्मीदवारों को चयन इंटरव्यू के आधार पर किया जाता है। नौकरशाही में लेटरल एंट्री का पहला प्रस्ताव 2005 में लाया गया था लेकिन तब इसे माना नहीं गया। इसके बाद 2010 में भी इसकी अनुशंसा की गई लेकिन काम नहीं बन सका। इस दिशा में पहली गंभीर पहल 2014 में मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद की गई है। मोदी सरकार ने 2016 में इसकी संभावना तलाशने के लिए एक कमेटी बनाई। जिसके मूल प्रस्ताव में आंशिक बदलाव कर इस सिस्टम को लागू कर दिया गया। अब इसके पहले प्रस्ताव के अुसार सचिव स्तर के पदों की भर्ती निकाली गई है।

लेटरल एंट्री का इतिहास

इसे विस्तार से समझने के लिए साल 70 के दशक में जाना होगा। जब 1966में देश में पहली बार प्रशासनिक सुधार आयोग की स्थापना हुई। 5 जनवरी 1966 को देश की प्रशासनिक सेवा में सुधार लाने के लिए एक सुधार आयोग बना और मोरारजी देसाई जिसके अध्यक्ष बनाए गए। हालांकि 1967 को जब देश में इंदिरा गांधी की सरकार आई तब मोरारजी देसाई को उपप्रधानमंत्री बनाया गया और फिर इस समिति के अध्यक्ष बने कांग्रेस नेता के हनुमंथैया। इस समीति ने प्रशासनिक सुधारों के लिए 20 रिपोर्ट्स तैयार की जिनमें कुल 537 सुझाव थे। वर्तमान दौर में ब्यूरोक्रेसी उन्हीं नियमों और सुधारों पर चल रही है। 5 अगस्त 2005 में यूपीए सरकार ने फिर से प्रशासनिक सुधार आयोग का गठन किया और इसके अध्यक्ष हुए उस वक्त के यूपीए सरकार में मंत्री वीरप्पा मोईली। इसी समिति की देन थी। प्रशासनिक सेवा में लैट्रल एंट्री इस समिति ने अपने रिपोर्ट में कहा कि ज्वाइंट सेक्रेटरी स्तर पर होने वाली भर्तियों में हमें विशेषज्ञों को लेना चाहिए। इसमें कहा गया था कि इनकी भर्ती बिना किसी परीक्षा के सिर्फ इंटरव्यू के आधार पर हो सकती है। हालांकि यहां भी चयन का मानदंड वही था जो अब है यानि उम्र कम से कम 40 वर्ष और15 साल का अनुभव होना ही चाहिए। लेकिन उस वक्त की यूपीए सरकार ने इन सिफारिशों को सिरे से खारिज कर दिया था। इसके बाद साल 2010 में रामचंद्रन की अध्यक्षता वाली समिति ने सरकार के सामने फिर से प्रशासनिक सुधारों की एक रिपोर्ट रखी जिसमें यूपीएससी परीक्षा के तरीकों और उम्र सीमा पर विशेष जोर दिया गया साथ ही इसमें 2005 की सिफारिशों को भी जोड़ा गया। लेकिन उस वक्त की मनमोहन सरकारने इसे फिर से खारिज कर दिया। साल 2014 में केंद्र में मोदी सरकार आने के बाद से ही प्रधानमंत्री मोदी ने इन सिफारिशों पर ध्यान दिया और इसे लागू करने में लग गए।

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लेटरल एंट्री के लिए सरकार का तर्क क्या है

4 जुलाई, 2019 को, राज्य मंत्री,  डिपार्टमेंट ऑफ पर्सनल ट्रेनिंग जितेन्द्र सिंह ने राज्यसभा को बताया कि समय-समय पर सरकार ने विशेष ज्ञान और विशेषज्ञता को ध्यान में रखते हुए विशिष्ट कार्यों के लिए कुछ प्रमुख व्यक्तियों की नियुक्ती की है। राज्यसभा में ही इसी प्रश्न के एक उत्तर में उन्होंने कहा कि लेटरल भर्ती को दोहरे उद्देशय के तहत लाया जा रहा है कि जिसके तहत मैनपॉवर बढ़ाने के साथ ही नई प्रतिभाओं का भी शामिल होना है।

क्या सरकार ने अब तक कोई लेटरल एंट्री ’नियुक्तियां की हैं?

नया विज्ञापन ऐसी भर्तियों के दूसरे दौर के लिए है। इससे पहले, सरकार ने विभिन्न मंत्रालयों / विभागों में संयुक्त सचिव के 10 पदों और उप सचिव / निदेशक के स्तर पर 40 पदों के लिए सरकार के बाहर के विशेषज्ञों को नियुक्त करने का निर्णय लिया था। 2018 की शुरुआत में जारी संयुक्त सचिव स्तर की नियुक्तियों के लिए विज्ञापन के बाद 6,077 आए जिनमें यूपीएससी द्वारा चयन प्रक्रिया के बाद, नौ अलग-अलग मंत्रालयों / विभागों में 2019 में नियुक्ति के लिए नौ व्यक्तियों की सिफारिश की गई थी। इनमें से एक काकोली घोष ने ज्वाइन नहीं किया बाकी - अंबर दुबे, राजीव सक्सेना, सुजीत कुमार बाजपेयी, दिनेश दयानंद जगदाले, भूषण कुमार, अरुण गोयल, सौरभ मिश्रा और सुमन प्रसाद सिंह - को तीन साल के अनुबंध पर नियुक्त किया गया। अरुण गोयल ने प्राइवेट सेक्टर में लौटने के लिए पिछले साल दिसंबर में इस्तीफा दे दिया था।

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लेटरल एंट्री की आलोचना क्यों?

इन नियुक्तियों में कोई आरक्षण नहीं होने की वजह से SC, ST और OBC का प्रतिनिधित्व करने वाले समूहों ने इसका विरोध किया।  वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 5 फरवरी को सरकार की अधिसूचना के लिए एक ट्वीट करते हुए कहा संयुक्त सचिव स्तर और निदेशक स्तर के पदों के लिए लेटरल भर्ती कान्ट्रैक्ट लेवल पर होगी। इच्छुक उम्मीदवार 6 फरवरी 2021 से 22 मार्च 2021 तक आवेदन कर सकते हैं। बिहार के नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने निशाना साधते हुए कहा कि क्या यूपीएससी की चयन प्रक्रिया राष्ट्र निर्माण के लिए इच्छुक, प्रेरित और प्रतिभाशाली उम्मीदवारों का चयन सुनिश्चित करने में विफल हो रही है या चुनिंदा लोग ज्यादा हैं? क्या यह वंचित वर्गों के लिए दिए गए आरक्षण को दरकिनार और कम करने की एक और चाल नहीं है? यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने ट्वीट किया, भाजपा खुले आम अपनों को लाने के लिए पिछला दरवाजा खोल रही है और जो अभ्यर्थी सालों-साल मेहनत करते हैं उनका क्या? भाजपा सरकार अब खुद को भी ठेके पर देकर विश्व भ्रमण पर निकल जाए वैसे भी उनसे देश नहीं संभल रहा है।

तो क्या ये संविदा नियुक्तियां कोटा के लिए नहीं हैं?

15 मई, 2018 के सर्कुलर में डिपार्टमेंट ऑफ पर्सनल ट्रेनिंग की ओर से कहा गया कि केंद्र सरकार के पदों और सेवाओं के लिए नियुक्तियों के संबंध में अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति / अन्य पिछड़ा वर्ग के उम्मीदवारों के लिए 45 दिनों या उससे अधिक समय तक चलने वाले अस्थायी नियुक्तियों में आरक्षण होगा। हालाँकि, इन पदों को "अनारक्षित" होने का दावा किया जाता है। वर्तमान में लागू "13-पॉइंट रोस्टर" के अनुसार, तीन पदों तक कोई आरक्षण नहीं है। आरटीआई अधिनियम राज्य के तहत द इंडियन एक्सप्रेस (14 जून, 2019 को रिपोर्ट) को डीओपीटी द्वारा दी गई फाइल नोटिंग किसी विभाग में पेशेवरों की जरूरत के मुताबिक एक या दो पदों पर भर्ती की मांग आयोग के समक्ष पेश की जाती है। इसीलिये इसे ‘सिंगल काडर’ पद कहा जाता है। ऐसे में आरक्षण दे पाना व्यवहारिक नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सिंगल काडर पद के लिए सृजित पद, सिविल सेवा के पदों से बिल्कुल भिन्न होते है। इसलिए सिविल सेवा के आरक्षित पदों पर सिंगल काडर पद से कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। चूंकि इस योजना के तहत भरा जाने वाला प्रत्येक पद एक ही पद है, इसलिए आरक्षण लागू होगा। 2019 में नियुक्त नौ व्यक्तियों में से प्रत्येक को एक अलग नियुक्ति के रूप में भर्ती किया गया था। ओबीसी के लिए कम से कम दो सीटें थीं और एक सीट अनुसूचित जाति के उम्मीदवार के लिए केंद्र के आरक्षण नियमों के अनुसार थी। इसी तरह, नवीनतम विज्ञापन में, यदि 27 निदेशकों को एक ही समूह के रूप में माना जाता है, तो सात पदों को ओबीसी के लिए चार, एससी के लिए चार, एसटी के लिए एक और ईडब्ल्यूएस श्रेणी के लिए दो के लिए 13 अंक रोस्टर के अनुसार आरक्षित करना होगा। लेकिन जैसा कि उन्हें प्रत्येक विभाग के लिए अलग से विज्ञापित / माना गया है, उन सभी को "अनारक्षित" घोषित किया गया है।-अभिनय आकाश







सोशल मीडिया और OTT को लेकर सरकार की नई गाइडलाइंस में क्या है?

  •  अभिनय आकाश
  •  मार्च 1, 2021   16:40
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सोशल मीडिया और OTT को लेकर सरकार की नई गाइडलाइंस में क्या है?

केंद्र सरकार सोशल मीडिया और ओटीटी प्लेटफॉर्म के लिए गाइडलाइंस का मसौदा लेकर आई है। सरल भाषा में कहें तो फेसबुक, ट्विटर., ऐमजॉन प्राइम वीडियो और नेटफ्लिक्स के लिए गाइडलाइन। मतलब कि आप क्या पोस्ट करेंगे, क्या ट्वीट करेंगे और क्या देख पाएंगे इन सब के लिए एक तरह का दिशा-निर्देश।

सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों और सोशल मीडिया के दुरुपयोग के बारे में संसद में उठाई गई चिंताओं का हवाला देते हुए, सरकार ने सोशल मीडिया, डिजिटल न्यूज मीडिया और ओवर-द-टॉप (ओटीटी) सामग्री प्रदाताओं को विनियमित करने के लिए दिशानिर्देश जारी किए। सोशल मीडिया, डिजीटल मीडिया और ओटीटी को सेफ और सेक्योर बनाने के लिए सरकार ने नई गाइडलाइन को पेश किया। आज हम आपको बताएंगे सरकार द्वारा लाए गए नियमन की दशा और दिशा के बारे में। 

केंद्र सरकार सोशल मीडिया और OTT प्लेटफॉर्म्स को लेकर गाइडलाइन्स का ड्राफ्ट लेकर आ गई है. सादी भाषा में – फेसबुक, ट्विटर, ऐमज़ॉन प्राइम वीडियो और नेटफ्लिक्स के लिए गाइडलाइन. माने आप क्या पोस्ट करेंगे, क्या ट्वीट करेंगे और मनोरंजन के लिए क्या देख पाएंगे, उसके लिए गाइडलाइन

केंद्र सरकार सोशल मीडिया और ओटीटी प्लेटफॉर्म के लिए गाइडलाइंस का मसौदा लेकर आई है। सरल भाषा में कहें तो फेसबुक, ट्विटर., ऐमजॉन प्राइम वीडियो और नेटफ्लिक्स के लिए गाइडलाइन। मतलब कि आप क्या पोस्ट करेंगे, क्या ट्वीट करेंगे और क्या देख पाएंगे इन सब के लिए एक तरह का दिशा-निर्देश। इनफार्मेशन टेक्नॉलाजी (इंटरमेडरी गाइडलाइन और डीजिटल मीडिया एथिक्स कोड) रूल 2021 के नाम से सारे नियम बनाए गए। 

सबसे पहले आपको सोशल मीडिया के बारे में बताएं तो सोशल मीडिया को अब दो अलग-अलग कैटेगरी में डिवाइड कर दिया गया है। 

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पहली है इंटरमेडरी सोशल मीडियादूसरी है सिग्निफिकेंट इंडेमडरी सोशल मीडिया- सोशल मीडिया कंपनियों को शिकायतों के लिए एक अधिकारी रखना होगा और इसका नाम भी बताना होगा। अब तीन के ऑफीसर को एपाउंट करना होगा। चीफ कंपलाइंस ऑफीसर, ग्रिवलेंस ऑफीसर और एक लोकल नोडल ऑफीसर। लोकल नोडल ऑफीसर को 24 घंटे को लॉ एजेंसियों के साथ टच में रहना होगा ताकि अगर किसी तरह का कंटेट उनके प्लेटफॉर्म पर आता है तो जल्द से जल्द उस पर एक्ट किया जा सके। 

सोशल मीडिया कंपनी को अब यूजर्स से 24 घंटे के अंदर-अंदर शिकायत को दर्ज करना होगा। कंपनियों को हर महीने एक रिपोर्ट देनी होगी कि कितनी शिकायत आई और उन पर क्या कार्रवाई हुई। उन्हें 15 दिन के अंदर इस शिकायत को साल्व भी करना होगा। न्युडिटी के मामलों में शिकायत पर 24 घंटे के भीतर उस कंटेट को हटाना होगा। गलती होने पर ओटीटी प्लेटफॉर्म को भी अन्य सभी की तरह माफी प्रसारित करनी होगी। 

अगर कोर्ट या सरकारी एजेंसी किसी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को कोई जानकारी होस्ट करने या पब्लिश करने से मना करती है तो उसे वो मानना होगा। इस जानकारी में देश की एकता-अखंडता को खतरे में डालने वाली, कानून व्यवस्था को भंग करने वाली मित्र देशों से रिश्ते खराब करने वाली जानकारी शामिल हो सकती है। 

ओटीटी प्लेटफॉर्म के नियम

ओटीटी प्लेटफॉर्म को टीवी और अखबार की तरह एक सेल्फ रेगुलेशन बॉडी बनानी होगी। इसमें सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज या कोई और गणमान्य व्यक्ति होंगे। इसके जरिए शिकायत निवारण सिस्टम भी शुरू करना होगा। 

सरकार ने कहा है कि ओटीटी के लिए कोई सेंसरशिप नहीं लगाई जा रही। लेकिन ओटीटी प्लेटफॉर्म को अपने स्तर पर ही दर्शकों की उम्र के हिसाब से कॉन्टेंट को अलग-अलग कैटेगरी में रखना होगा, जैसे 13 प्लस या 16 प्लस या वयस्कों के लिए।

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डिजिटल न्यूज़ मीडिया के लिए नियम

डिजिटल न्यूज मीडिया को अपने बारे में विस्तृत जानकारी देनी होगी। टीवी और अखबार की तरह उन्हें भी रजिस्ट्रेशन कराना जरूरी होगा। 

डिजिटल न्यूज मीडिया को बताना होगा कि उसका मालिक कौन है और उसमें किसने पैसा लगाया है। 

इन दिशानिर्देशों की पृष्ठभूमि क्या है

प्रेस कॉन्फेंस में, कानून और आईटी मंत्री रविशंकर प्रसाद ने 2018 के सुप्रीम कोर्ट के ऑब्जर्वेशन और 2019 के एससी के ही आदेश का हवाला दिया। राज्य सभा में एक बार 2018 में  और फिर 2020 में समिति द्वारा रखी गई रिपोर्ट का जिक्र करते हुए आईटी मंत्री ने डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म यूजर्स को उनकी शिकायतों के निवारण के लिए सशक्त बनाने और उनके अधिकारों के उल्लंघन के मामले में जवाबदेही की आवश्यकता बताया। सरकार तीन वर्षों से इन दिशानिर्देशों पर काम कर रही थी। हालांकि, 26 जनवरी को लाल किले में हिंसक घटनाओं के बाद इसमें और तेजी आई, जिसके बाद सरकार और ट्विटर के बीच कुछ खातों को हटाने के लिए विवाद भी देखने को मिला था। 

दुनिया के देशों में सोशल मीडिया के हालिया घटनाक्रम

सोशल मीडिया ने सीधे तौर पर लोकतंत्र और लोगों को प्रभावित करना भी शुरू कर दिया है। सोशल मीडिया व्यापक स्तर पर संचार सुविधाओं का लोकतंत्रीकरण करता जा रहा है। विश्वभर के अरबों लोगों ने अब सूचना को संरक्षित रखने और इसका प्रसार करने के पारंपरिक माध्यमों को चलन से लगभग बाहर कर दिया है। सोशल मीडिया के उपभोक्ता अब मात्रा उपभोक्ता ही नहीं हैं, वे अब इस पर प्रसारित होने वाली साम्राग्री को तैयार करने वाले प्रसारकर्ता भी बन गए हैं। 

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जब टिक-टॉक ने दीं गलत सूचनाएं

टिक-टॉक ने पिछले साल जुलाई और दिसबंर के बीच ऐप ने 2020 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव और कोरोना वायरस महामारी के बारे में गलत जानकारी देने के लिए अपने हजारों वीडियो हटा दिए हैं। यह तो यही साबित करता है कि टिक टॉक गलत जानकारी साझा कर चुका था। रिपोर्ट के अनुसार कंपनी ने चुनाव में गलत सूचना या मीडिया को साझा किए 347,225 वीडियो बाहर निकाले। अतिरिक्त 441000 क्लिप को ऐप की सिफारिशों से हटा दिया गया क्योंकि सामग्री आपत्तिजनक थी। 

फेसबुक की म्यांमार में भूमिका

फेसबुक इंक ने म्यांमार की सेना से जुड़े पृष्ठों पर प्रतिबंध लगा दिया और संबद्ध वाणिज्यिक संस्थाओं से विज्ञापन पर रोक लगा दी है। जिससे दक्षिण पूर्व एशियाई राष्ट्र में तख्तापलट का विरोध बढ़ रहा है। म्यांमार की सत्तारूढ़ सरकार ने इंटरनेट सेवा प्रदाताओं को फेसबुक तक पहुंच को अवरूद्ध करने का आह्वान किया। 

सरकार के मांगने पर देनी होगी जानकारी

नई गाइडलाइंस के अनुसार इंड टू इंड एनक्रिप्शन देने वाली व्हाट्सएप के सामने एक बड़ी मुश्किल खड़ी हो सकती है। भारत की संप्रभुता, सुरक्षा, विदेशों से संबंध, दुष्कर्म जैसे अहम मामलों पर सरकार की गाइडलाइन के हिसाब से अब सोशल मीडिया कंपनियों को शरारती कंटेंट फैलाने वाले शख्स के बारे में भी जानकारी देनी होगी। नियम के अनुसार विदेश से शुरू होने वाले कंटेंट को भारत में पहले किसने शेयर या ट्वीट किया है। इसकी जानकारी देनी होगी। कोर्ट के आदेश या सरकार द्वारा पूछे जाने पर सोशल मीडिया कंपनियों को उस शख्स की जानकारी साझा करनी होगी। इसी के साथ सरकार ने फेक अकाउंट्स के लिए कंपनियों को कहा है कि वे खुद से ऐसा नियम बनाए, जिससे यह न हो सके। इसके लिए वह आधार कार्ड लें या फिर मोबाइल नंबर का इस्तेमाल करें। 

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तीन महीने में कानून

नई गाइडलाइंस के अनुसार फेसबुक, ट्वीटर, इंस्टाग्राम, नेटफिलक्स, अमेजन प्राइम, न्यूज वेबसाइट, व्हाट्सएप और लिंक्डइन जैसे सोशल मीडिया और ओटीटी प्लेटफॉर्म को सरकार की ओर से मांगे जाने पर कंटेंट की जानकारी देना जरुरी हो गया है। 

भारत और अन्य देशों में डाटा संरक्षण कानून

अनुमान के अनुसार साल 2023 तक यग संख्या लगभग 447 मिलियन तक पहुंच जाएगी। 

भारत में साल 2019 तक 574 मिलियन सक्रिय इंटरनेट उपयोगकर्ता थे। इंटरनेट प्रयोग करने के मामले में चीन के बाद भारत दूसरे स्थान पर हैं। 

फिलहाल भारत के पास किसी व्यक्ति के डाटा की सुरक्षा को लेकर कोई सख्त कानून या विशेष प्रावधान नहीं है। 

अमेरिकी के पास विशिष्ट डाटा सुरक्षा कानून और नियम हैं जो अमेरिकी नागरिकों के डाटा के लिए राज्य स्तरीय कानून के तहत काम करते हैं। -अभिनय आकाश







नीरव मोदी प्रत्यर्पण: क्या है अब तक की कहानी, भारत वापसी में क्या रोड़ा?

  •  अभिनय आकाश
  •  फरवरी 27, 2021   18:30
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नीरव मोदी प्रत्यर्पण: क्या है अब तक की कहानी, भारत वापसी में क्या रोड़ा?

भारत के भगोड़े कारोबारी नीरव मोदी को लंदन की अदालत से तगड़ा झटका लगा है।वेस्ट विंसर की कोर्टने नीरव मोदी के भारत प्रत्यर्पण को मंजूरी दे दी है। कोर्ट ने भारत में न्याय नहीं मिलने और सेहत के आधार पर नीरव मोदी की दलीलों को सिरे से खारिज कर दिया।

25 फरवरी को वो तारीख जब लंदन की कोर्ट ने वो बात कह दिया जो हम कोहिनूर के लिए बरसों से सुनना चाहते थे। मतलब, इसे भारत को लौटा दो। नीरव मोदी और माल्या के लिए भी हम ऐसा ही कुछ सुनना चाहते थे। हमारे देश का भगौड़ा नीरव मोदी कब आएगा? कितने किंतु-परंतु हैं उसके आने में लेकिन 25 फरवरी 2021 ब्रिटेन से खबर आई नीरव मोदी से जुड़ी की कोर्ट ने कह दिया है अपनी इसे ले जाओ। उसके बाद तो ऐसा हल्ला मचा कि मानों रात होते-होते नीरव मोदी को कॉलर पकड़कर भारत की जेल में ठूस दिया जाएगा। लेकिन जानकारों ने बताया इतना उत्तेजित होने की आवश्यकता नहीं है। अभी बहुत समय लगने वाला है। तो आइए मामला समझते हैं। 

पहला सवाल- लेटेस्ट क्या हुआ जो विपक्षी दलों की धराधड़ प्रतिक्रिया आने लगी?

कांग्रेस के नेता और पूर्व कानून मंत्री सलमान खुर्शीद ने सवाल किया कि यह भारतीय एजेंसियों की सफलता है या ब्रिटेन के कानून की। उन्होंने कहा कि हम इसका स्वागत करते हैं। यूके कानून बधाई का पात्र है। वहीं कांग्रेस के प्रवक्ता मीम अफजल ने कहा कि खबर के अनुसार ऐसा लग रहा है कि जैसे बहुत बड़ी कामयाबी भारत सरकार को मिल गई है और वो बहुत जल्द उसको वापस ले आएंगे। लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि ये खबर ठीक नहीं है। 

जवाब- नीरव मोदी भाग गया भारत से 2018 में तब से बातें चल रही थी सरकार वापस लाएगी। नीरव मोदी वापस आएगा। किसरे नीरव मोदी की करीबी हैं नीरव मोदी ने किसके राज में पैसा बनाया है आदि इत्यादि। फिर मोदी जी ने नया नियम बनाया। दिवालिया कानूननका बहुत ही शानदार नियम और इसी के तहत नीरव मोदी भगोड़ा घोषित किया गया। फिर हमारी सरकार ने अंग्रेजों की सरकार से कहा नीरव मोदी हमारा मुजरिम है, हमें सौंप दो। मामला ब्रिटेन की कोर्ट पहुंचा। वहां भारत के भगोड़े कारोबारी नीरव मोदी को लंदन की अदालत से तगड़ा झटका लगा है।वेस्ट विंसर की कोर्टने नीरव मोदी के भारत प्रतर्पण को मंजूरी दे  दी है। कोर्ट ने भारत में न्याय नहीं मिलने और सेहत के आधार पर नीरव मोदी की दलीलों को सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने माना की भारत में नीरव मोदी की कई मामलों में जवाबदेही है। 

फैसला सुनाते हुए लंदन की कोर्ट ने कहा कि हम इस बात से संतृष्ट हैं कि नीरव मोदी को दोषी ठहराए जाने के लिए पर्याप्त सबूत उपलब्ध हैं। 

शानो-शौकत वाले हीरा व्यापारी से लेकर भगोड़े तक का सफर

 25 फरवरी को भगोड़े हीरा कारोबारी नीरव मोदी के प्रत्यर्पण मामले में ब्रिटेन की एक अदालत ने बृहस्पतिवार को जब निर्णय सुनाया तो वह अपने विरोधाभासों से भरे जीवन के 50 साल पूरे करने से महज दो दिन दूर था। गुजरात के एक हीरा कारोबारी का सदस्य नीरव मोदी यूरोप के आभूषणों के केंद्र बेल्जियम के एंटवर्प में बड़ा हुआ था पहले उसकी बड़ी बड़ी हस्तियों के साथ जान पहचान थी और उसके हीरों के डिजायन संबंधी कार्यक्रम में बड़े बड़े सितारे शामिल होते थे। पिछले साल प्रत्यर्पण सुनवाई के दौरान बड़े फ्रांसीसी ज्वैलरी विशेषज्ञ थीरी फ्रिटस्क ने कहा, ‘‘ मैं (भारत में) कार्यशाला में शिल्पकारिता से बहुत प्रभावित था।..’’ अदालत में सुनवाई के दौरान नीरव मोदी के वकीलों ने उसके अवसाद और मानसिक स्थिति को लेकर भी तमाम दलीलें दीं।

क्या-क्या आरोप हैं

हीरा व्यापारी नीरव मोदी पर आरोप  है कि उसने पंजाब नेशनल बैंक के साथ लगभग 11 हजार 345 करोड़ रुपये का घोटाला किया। इसके अलावा उसके खिलाफ भारत में मनी लॉन्ड्रिंग के भी केस पेंडिंग हैं। भारत लगभग दो साल से नीरव मोदी के प्रत्यर्पण की कोशिश कर रहा है। नीरव मोदी इस प्रत्यर्पण के खिलाफ ब्रिटेन में कानूनी लड़ाई लड़ रहा है। 2018 में भारत से भागने के बाद नीरव कई अज्ञात स्थानों पर रहा है। बाद में पता चला कि वो ब्रिटेन में है। उसे मार्च 2019 में प्रत्यर्पण वारंट पर गिरफ्तार किया गया। ब्रिटेन में निचली अदालत या उच्च न्यायालय से जमानत प्राप्त करने के उसके प्रयास विफल रहे। इस वक्त वो लंदन की एक जेल में है। लंदन की कोर्ट ने नीरव मोदी की सभी दलीलें खारिज कर दी।  नीरव मोदी ने बैंक पीएनबी के साथ इस तरह के लेन-देन किए।

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कोर्ट यहां तो कोर्ट कचहरी वहां क्यों?

साल 2018 में भारत से भागने के बाद नीरव मोदी के ब्रिटेन में होने की खबर आई। ब्रिटेन की स्कॉटलैंड यार्ड पुलिस ने 13 मार्च 2019 को लंदन से उसे गिरफ्तार किया। मध्य लंदन में एक बैंक की शाखा से 19 मार्च 2019 को एक प्रत्यर्पण वारंट पर गिरफ्तार किया गया था। वह उस समय बैंक शाखा में नया खाता खुलवाने का प्रयास कर रहा था। वह लंदन में सेंटर प्वाइंट के पेंटहाउस इलाके में रह रहा था। वह नियमित रूप से अपने कुत्ते के साथ समीप की एक नयी ज्वैलरी दुकान में जाता था। बाद में सामने आया कि लंदन में वेस्टमिनिस्टर मजिस्ट्रेट की अदालत में हिरासत सुनवाई के दौरान उसने बुटिक लॉ एलएलपी की सेवा ली थी। तब से वह साउथ वेस्ट लंदन की वैंड्यवर्थ जेल में बंद है। नीरव ने अपने खिलाफ आए प्रत्यर्पण आदेश को अदालत में चुनौती दी थी। हमारे यहां से एक आदमी बैंकों का इतना पैसा लेकर भागा है इसे पकड़कर हमें दे दीजिए। टेक्निकल शब्दों में इसे ही प्रत्यर्पण कहा जाता है। दो साल की लंबी कानूनी लड़ाई के बाद डिस्टि्किट जज सैम्यूल गूजी ने फैसला सुनाया कि नीरव के खिलाफ कानूनी मामला है, जिसमें उसे भारतीय अदालत में पेश होना होगा। 

अब आगे क्या

यूके की कोर्ट के इस फैसले से ही नीरव मोदी को भारत वापस लाया जा सकेगा? जवाब है नहीं। कई कानूनी पेंचीदगियां अभी बाकी हैं। मजिस्ट्रेट कोर्ट का फैसला अंतिम फैसला नहीं होगा। वेस्ट मिनस्टर कोर्ट के फैसले के बाद प्रत्यर्पण की फाइल को अब ब्रिटेन की गृह मंत्री के पास भेजा जाएगा। प्रत्यर्पण के लिए सरकार की मंजूरी जरूरी है। वहीं नीरव मोदी के पास प्रत्यर्पण के इस फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती देने का अधिकारभी है। इन सब में कई महीने लग सकते हैं और हर जगह से हार चुकने के बाद भी वो विजय माल्या की तरह असायलम यानी शरण के लिए आवेदन कर सकता है ताकी उसे और समय मिल जाए। इन असायलम वाली याचिका पर निर्णय आने में कई महीने लग जाते हैं। इसका सीधा अर्थ है कि इस पूरी प्रक्रिया में अभी एक से दो साल और लग सकते हैंष अगर नीरव मोदी इस फैसले को चुनौती नहीं देता है को उसे एक महीने के भीतर ही भारत लाया जा सकेगा। 

सब हो जाएगा और नीरव मोदी को भारत लाया जाएगा तो क्या होगा। पंजीरी तो खिलाएंगे नहीं जेल भेजेंएंगे। मुंबई की प्रिवेंसन ऑफ मनी लॉऩ्ड्रिंग एक्ट के हिसाब से भगोड़ा नीरव मोदी, बैकों को 11 हजार कोरड़ का चूना लगाने वाला नीरव मोदी जिसके पीछे सीबीआई, ईडी जैसी देश की प्रमुख एजेंसियां पड़ी हैं। एक बार इनको भारत आने तो दीजिए इतने मुकदमें चलेंगे कि शानो शौकत में जिंदगी बिताने वाले हीरा कारोबारी को देश की बैंकों का पैसा लेकर फरार होने का इल्म हो जाएगा। 

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चलते-चलते आपको नीरव मोदी केस से जुड़ी और एक दिलचस्प जानकारी देते हैं। दरअसल, 

यूकी के जज ने भारत के सेवानिवृत जज अभय थिप्से और मार्केंडेय काटजू की तरफ से भगोड़े हीरा कारोबारी नीरव मोदी के समर्थन में एक्सपर्ट के रूप में राय को पूरी तरह से खारिज कर दिया। यूके जज ने मार्कडेय काटजू की गवाही पर भी सवाल खड़े किए। बता दें कि काटजू ने वेस्टमिंस्टर कोर्ट में एक्सपर्ट के रूप में नीरव मोदी के पक्ष में बाते कही थीं। उन्होंने कहा था कि भारत के जूडिशरी का अधिकांश हिस्सा भ्रष्ट है और जांच एजेंसिया सरकार की ओर झुकाव रखती हैं। लिहाजा नीरव मोदी को भारत में निष्पक्ष सुनवाई का मौका नहीं मिलेगा। जिसके बाद बारी थी यूके के जज गूजी के बोलने की और उन्होंने न केवल काटजू की टिप्पणी को अनुचित और हैरान करने वाला बताया बल्कि कहा कि मेरी नजर में उनकी राय निष्पक्ष और विश्वसनीय नहीं थी। यूके जज ने कहा कि काटजू ने भारतीय जूडिशरी में इतने ऊंचे ओहदे पद पर काम किया है। इसके बावजूद उनकी पहचान ऐसे मुखर आलोचक के रूप में रही है जिनका अपना एजेंडा होता है। मुझे उनके सबूत के साथ ही उनका व्यवहार भी सवालों के घेरे में लगा। 

बहरहाल, नीरव मोदी को लेकर ब्रिटेन की कोर्ट का फैसला आ गया और इसको लेकर देश में राजनीतिक बयानबाजी भी शुरू हो गई। लेकिन इन सब के बीच नीरव मोदी के लिए भारत में जेल भी तैयार रखा गया है। 

आर्थर रोड जेल में रखा जाएगा

नीरव मोदी के प्रत्यर्पण के पक्ष में एक ब्रिटिश अदालत का फैसला आ जाने के साथ ही मुम्बई की आर्थर रोड जेल ने उसे रखने के लिए एक विशेष कोठरी तैयार कर ली है। एक अधिकारी ने शुक्रवार को यह जानकारी दी। जेल अधिकारी ने बताया कि नीरव मोदी को यहां लाये जाने के बाद उसे अतिसुरक्षा वाले बैरक नंबर 12 की तीन कोठरियों में से एक में रखा जाएगा। -अभिनय आकाश







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