गहरे समुद्र के नीचे पाइपलाइन बिछवाने जा रहे हैं मोदी, Oman से India को गैस सप्लाई में नहीं आएगी कोई बाधा

Modi Gaspipeline LPG
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भारत अपनी तेल और गैस जरूरतों के लिए लंबे समय से खाड़ी देशों पर निर्भर रहा है। होरमुज जलडमरूमध्य को दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा गलियारा माना जाता है, जहां से एशिया और यूरोप तक तेल और गैस की भारी आपूर्ति होती है।

संकट और चुनौतियों का डटकर सामना करने तथा उनसे मिले अनुभवों के आधार पर आगे के लिए पुख्ता तैयारी करने में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कोई जवाब नहीं। पश्चिम एशिया में ईरान युद्ध के बाद पैदा हुए तनाव और होरमुज जलडमरूमध्य में ऊर्जा आपूर्ति बाधित होने के चलते भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा को लेकर जो सबसे महत्वाकांक्षी कदम उठाया है, वह दर्शाता है कि प्रधानमंत्री मोदी कितनी दूरदर्शिता रखते हैं। हम आपको बता दें कि मोदी सरकार करीब 40 हजार करोड़ रुपये की लागत वाली एक विशाल गहरे समुद्र की गैस पाइपलाइन परियोजना को तेजी से आगे बढ़ा रही है, जिसका उद्देश्य आने वाले कई दशकों तक देश में गैस की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करना है। यह परियोजना केवल ऊर्जा सुरक्षा का मामला नहीं है, बल्कि बदलते वैश्विक हालात में भारत की दूरदर्शी कूटनीति और रणनीतिक सोच का भी प्रतीक मानी जा रही है।

दरअसल, भारत अपनी तेल और गैस जरूरतों के लिए लंबे समय से खाड़ी देशों पर निर्भर रहा है। होरमुज जलडमरूमध्य को दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा गलियारा माना जाता है, जहां से एशिया और यूरोप तक तेल और गैस की भारी आपूर्ति होती है। लेकिन ईरान युद्ध और अमेरिका तथा इजराइल के साथ बढ़े तनाव के कारण इस मार्ग पर संकट गहरा गया। फरवरी में ईरान की ओर से इस मार्ग पर प्रभावी रोक लगाए जाने से वैश्विक तरल प्राकृतिक गैस आपूर्ति में 20 प्रतिशत से अधिक गिरावट आई और अंतरराष्ट्रीय बाजार में गैस कीमतों में तेज उछाल देखा गया। भारत की दो तिहाई तरल प्राकृतिक गैस आपूर्ति इसी मार्ग से आती रही है, इसलिए नई दिल्ली के लिए यह संकट एक गंभीर चेतावनी साबित हुआ।

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इसी पृष्ठभूमि में भारत सरकार ने ओमान से सीधे गुजरात तक गहरे समुद्र के नीचे पाइपलाइन बिछाने की योजना को प्राथमिकता दे दी है। प्रस्तावित मध्य पूर्व भारत गहरे समुद्र पाइपलाइन परियोजना लगभग दो हजार किलोमीटर लंबी होगी और अरब सागर के नीचे से गुजरते हुए ओमान को सीधे गुजरात तट से जोड़ेगी। इस पाइपलाइन के जरिये प्रतिदिन लगभग 31 मिलियन मानक घन मीटर प्राकृतिक गैस की आपूर्ति संभव होगी। परियोजना का मार्ग इस तरह तैयार किया जा रहा है कि यह भू राजनीतिक रूप से संवेदनशील इलाकों से बचते हुए ओमान और संयुक्त अरब अमीरात के रास्ते भारत तक पहुंचे।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस परियोजना के पूरा होने के बाद भारत को ओमान, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, ईरान, तुर्कमेनिस्तान और कतर जैसे गैस संपन्न देशों के विशाल भंडार तक सीधी पहुंच मिल सकेगी। इन देशों के पास मिलाकर करीब 2500 ट्रिलियन घन फीट गैस भंडार मौजूद हैं। इससे भारत की ऊर्जा जरूरतें लंबे समय तक सुरक्षित रह सकती हैं।

पेट्रोलियम मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों के अनुसार केंद्र सरकार इस परियोजना को सर्वोच्च प्राथमिकता के साथ आगे बढ़ा रही है। सरकार जल्द ही गेल, इंजीनियर्स इंडिया लिमिटेड और इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन जैसी सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार करने का निर्देश दे सकती है। इस योजना की बुनियाद नई दिल्ली स्थित निजी क्षेत्र के समूह साउथ एशिया गैस एंटरप्राइज की पूर्व व्यवहार्यता रिपोर्ट पर रखी गई है। यदि अंतिम मंजूरी मिलती है तो परियोजना को पूरा होने में पांच से सात वर्ष लग सकते हैं।

तकनीकी दृष्टि से भी यह परियोजना बेहद चुनौतीपूर्ण मानी जा रही है। पाइपलाइन को समुद्र तल से करीब 3450 मीटर की गहराई में बिछाने की योजना है, जिससे यह दुनिया की सबसे गहरी समुद्री पाइपलाइन परियोजनाओं में शामिल हो सकती है। हालांकि हाल के तकनीकी अध्ययनों में गहरे समुद्र में पाइप बिछाने और मरम्मत की आधुनिक तकनीकों के कारण इसे व्यवहारिक बताया गया है। साउथ एशिया गैस एंटरप्राइज का दावा है कि प्रस्तावित मार्ग पर करीब 3000 मीटर परीक्षण पाइपलाइन पहले ही बिछाई जा चुकी है ताकि समुद्री तल की स्थिति का अध्ययन किया जा सके।

देखा जाये तो मोदी सरकार की ऊर्जा कूटनीति का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि भारत केवल वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों पर ही नहीं, बल्कि वैकल्पिक आपूर्ति मार्गों पर भी गंभीरता से काम कर रहा है। भारत अब महंगे और अस्थिर तात्कालिक तरल प्राकृतिक गैस बाजार पर अपनी निर्भरता कम करना चाहता है। अधिकारियों का मानना है कि पश्चिम एशिया से सीधी पाइपलाइन भारत को स्थिर और अपेक्षाकृत सस्ती गैस उपलब्ध कराएगी तथा किसी तीसरे देश या समुद्री मार्ग पर निर्भरता भी घटेगी।

इसी बीच, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की संयुक्त अरब अमीरात यात्रा भी भारत की ऊर्जा कूटनीति को नई मजबूती देने वाली मानी जा रही है। आधिकारिक सूत्रों के अनुसार इस यात्रा के दौरान रसोई गैस और रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार से जुड़े दो महत्वपूर्ण समझौता ज्ञापनों पर हस्ताक्षर हो सकते हैं। भारत के लिए संयुक्त अरब अमीरात कच्चे तेल का चौथा सबसे बड़ा तथा तरल प्राकृतिक गैस और रसोई गैस का दूसरा सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता है। प्रधानमंत्री मोदी संयुक्त अरब अमीरात के राष्ट्रपति मोहम्मद बिन जायद अल नहयान के साथ ऊर्जा सहयोग, द्विपक्षीय संबंधों और क्षेत्रीय हालात पर व्यापक चर्चा करेंगे। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच यह यात्रा इस बात का संकेत है कि मोदी सरकार केवल वैकल्पिक परियोजनाओं पर ही नहीं, बल्कि खाड़ी देशों के साथ रणनीतिक साझेदारी को भी लगातार मजबूत कर रही है। इसके साथ ही भारत, यूरोप और पश्चिम एशिया को जोड़ने वाले आर्थिक गलियारे तथा उन्नत प्रौद्योगिकी सहयोग पर भी बातचीत होने की संभावना है, जिससे भारत की वैश्विक रणनीतिक स्थिति और सशक्त होगी।

हम आपको बता दें कि भारत में प्राकृतिक गैस की मांग लगातार बढ़ रही है। वर्तमान में देश की खपत लगभग 190 से 195 मिलियन मानक घन मीटर प्रतिदिन है, जो 2030 तक बढ़कर 290 से 300 मिलियन मानक घन मीटर प्रतिदिन तक पहुंचने का अनुमान है। इसी अवधि में तरल प्राकृतिक गैस आयात भी 180 से 200 मिलियन मानक घन मीटर प्रतिदिन तक पहुंच सकता है। ऐसे में यह परियोजना भारत की भविष्य की ऊर्जा जरूरतों को ध्यान में रखते हुए बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

उधर, पश्चिम एशिया में तनाव के बावजूद भारत ने अपनी आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत बनाए रखा है। वियतनाम के ध्वज वाला रसोई गैस टैंकर एनवी सनशाइन 46 हजार टन गैस लेकर सुरक्षित रूप से होरमुज जलडमरूमध्य पार कर न्यू मंगलुरु की ओर बढ़ चुका है। इससे पहले सिमी नामक टैंकर भी सफलतापूर्वक यह मार्ग पार कर चुका था। ये जहाज भारत की 41 जहाजों वाली विशेष आपूर्ति और निकासी योजना का हिस्सा हैं, जिसमें भारतीय नौसेना समेत कई एजेंसियां समन्वित रूप से काम कर रही हैं।

बहरहाल, पश्चिम एशिया संकट के बीच भारत ने जिस तरह तेजी, संतुलन और दूरदर्शिता के साथ अपनी ऊर्जा रणनीति तैयार की है, वह मोदी सरकार की सक्रिय कूटनीति और मजबूत वैश्विक संबंधों का स्पष्ट उदाहरण बनकर सामने आया है।

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