बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव और पश्चिम बंगाल प्रभारी कैलाश विजयवर्गीय ने संविधान के अनुक्षेद 30 पर उठाए सवाल

बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव और पश्चिम बंगाल प्रभारी कैलाश विजयवर्गीय ने संविधान के अनुक्षेद 30 पर उठाए सवाल

आपको बता दे कि आर्टिकल 30(1) के मुताबिक, किसी भी धर्म या भाषा के अल्पसंख्यकों को शैक्षणिक संस्थान स्थापित करने और उन्हें प्रशासित करने का अधिकार है। आर्टिकल 30(2) के मुताबिक, किसी भी शैक्षणिक संस्थान से किसी विशेष समुदाय, भाषा या धर्म के आधार पर किसी भी तरह का भेदभाव नहीं किया जा सकता।

भोपाल। बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव और पश्चिम बंगाल प्रभारी कैलाश विजयवर्गीय ने भारतीय संविधान के अनुक्षेद 30 (आर्टिकल 30) पर सवाल उठाए है। कैलाश विजयवर्गीय ने अपने ट्विटर हेडिंल से आर्टिकल 30 हटाओ हैसटैग किया है। उन्होनें अपने ट्विट में लिखा है कि- देश में संवैधानिक समानता के अधिकार को 'आर्टिकल 30' सबसे ज्यादा नुकसान पहुँचा रहा है। ये अल्पसंख्यकों को धार्मिक प्रचार और धर्म शिक्षा की इजाजत देता है, जो दूसरे धर्मों को नहीं मिलती। जब हमारा देश धर्मनिरपेक्षता का पक्षधर है, तो 'आर्टिकल 30' की क्या जरुरत!#आर्टिकल_30_हटाओ

भाजपा महासचिव के इस ट्वीट के बाद आर्टिकल 30 टेंड कर रहा है। आपको बता दे कि आर्टिकल 30(1) के मुताबिक, किसी भी धर्म या भाषा के अल्पसंख्यकों को शैक्षणिक संस्थान स्थापित करने और उन्हें प्रशासित करने का अधिकार है। आर्टिकल 30(2) के मुताबिक, किसी भी शैक्षणिक संस्थान से किसी विशेष समुदाय, भाषा या धर्म के आधार पर किसी भी तरह का भेदभाव नहीं किया जा सकता।

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संविधान का ‘भाग-3’ देश के नागरिकों को मिले मौलिक अधिकारों के बारे में बात करता है। इस भाग में आर्टिकल 12 से 35 तक शामिल हैं। जहां तक आर्टिकल 30 का सवाल है, तो यह अल्पसंख्यकों को शिक्षण संस्थानों की स्थापना और उनको चलाने का अधिकार देता है। इसके तहत भाषा और धर्म, दोनों के आधार पर अल्पसंख्यक की श्रेणी में आने वाले समुदाय को यह अधिकार दिया गया है। आर्टिकल 30(1) में लिखा है, ‘भाषा या धर्म के आधार पर जो भी अल्पसंख्यक हैं, उन्हें अपनी मान्यता के शैक्षणिक संस्थान स्थापित करने और उन्हें चलाने का अधिकार होगा।’ आर्टिकल 30(1A) में लिखा है, ‘यदि किसी अल्पसंख्यक समुदाय के द्वारा स्थापित और संचालित शिक्षण संस्थान का अधिग्रहण राज्य द्वारा ज़रूरी हो जाता है, ऐसी स्थिति में राज्य, अधिग्रहण के एवज में देने वाला मुआवजा ऐसे तय करेगी कि अल्पसंख्यकों को मिले अधिकार में अंतर न आए।’ 

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वही आर्टिकल 30(2)  के मुताबिक, ‘शैक्षणिक संस्थाओं को सहायता देने के दौरान, राज्य किसी भी संस्थान के साथ इस आधार पर भेदभाव नहीं करेगा कि वो धर्म या भाषा पर आधारित किसी अल्पसंख्यक वर्ग के अधीन संचालित किया जाता है।’ बता दें कि 27 जनवरी, 2014 के भारत के राजपत्र के मुताबिक, मुस्लिम, सिख, ईसाई, पारसी, बौद्ध और जैन धर्म के लोगों को अल्पसंख्यक समुदाय का दर्जा मिला है।

जबकि आर्टिकल 30 की विशेषताओं की बात करें तो आर्टिकल 30 में समानता के सिद्धांत को ध्यान में रखते हुए भारत में अल्पसंख्यक समुदाय के कुछ अधिकारों की रक्षा करने का शामिल है। इसके अलावा इसमें धर्म और भाषा के आधार पर सभी अल्पसंख्यकों को अपनी पसंद के अनुसार शैक्षणिक संस्थानों को स्थापित और प्रबंध करने का अधिकार है। साथ ही इसके अंतर्गत देश की सरकार धर्म या भाषा की वजह से किसी भी अल्पसंख्यक समूह द्वारा संचालित शैक्षिक संस्थानों को सहायता देने में कोई भी भेदभाव नहीं करने की बात कही गई है।

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भारतीय संविधान के अनुक्षेद 30 को लेकर एक बहुत बड़ा समुदाय इसकी आलोचना भी करता है। इसको लेकर आलोचकों का कहना है कि अल्पसंख्यकों के पास स्थापित शैक्षिक संस्थानों का व्यक्तिगत नियंत्रण होता है, जिसका अर्थ यह है कि सरकार इसमें कोई हस्तक्षेप नहीं कर सकती। साथ ही उनका मानना है कि जहां अल्पसंख्यक संस्थान पूर्ण स्वतंत्रता का आनंद लेते हैं, वहीं बहुसंख्यक हिंदू संस्थानों को सरकार के हस्तक्षेप का सामना करना पड़ता है, जो गैर-अल्पसंख्यक के खिलाफ साफ भेदभाव है। जबकि भारतीय संविधान भेदभाव की बात न करते हुए समानता की बात करता है। 

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लेकिन भाजपा महासचिव कैलाश विजयवर्गीय ने गुरूवार को ट्वीट कर इस मुद्दे को और हवा दे दी है। एक सत्ताधारी दल के पदाधिकारी और वरिष्ठ नेता द्वारा आर्टिकल 30 के खिलाफ ट्वीट को लेकर राजनीतिक हलचल बढ़ गई है। वही राष्ट्रीय स्वमंसेवक संघ हमेशा से देश में समान नगरिक सहिंता लागू करने की बात करती रही है। जिसे उससे राजनितिक अनुशांगिक संगठन बीजेपी के नेताओं ने मंचों से इसकी वकालत की है। तो अब आर्टिकल 30 को लेकर पूरे देश में इसको संविधान से हटाने का मुद्दे को बल मिल रहा है। 





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