Ghooskhor Pandat Film Controversy: क्या Brahmin Vote पर है Mayawati की नजर? 'घूसखोर पंडित' पर बैन की मांग के पीछे UP Politics का गेम!

Ghooskhor Pandat Film Controversy
ANI
Neha Mehta । Feb 6 2026 5:12PM

बीएसपी प्रमुख मायावती द्वारा 'घूसखोर पंडित' फिल्म पर प्रतिबंध की मांग ने सिनेमा, जाति और राजनीति के संवेदनशील गठजोड़ को फिर से उजागर कर दिया है, जो न केवल ब्राह्मण समुदाय के चित्रण पर केंद्रित है बल्कि एक व्यापक राजनीतिक रणनीति का भी संकेत देता है।

हाल ही में बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) प्रमुख मायावती के एक तीखे बयान ने सियासी हलकों के साथ-साथ फिल्म जगत में भी हलचल मचा दी है। उन्होंने फिल्म ‘घूसखोर पंडित’ पर ब्राह्मण समाज का अपमान करने का आरोप लगाते हुए इसे प्रतिबंधित करने की मांग की है। इस पूरे प्रकरण ने एक बार फिर भारतीय सिनेमा में जाति आधारित प्रस्तुति और उसकी राजनीतिक अहमियत को चर्चा के केंद्र में ला दिया है।

फिल्म के एक दृश्य पर आपत्ति, बढ़ा राजनीतिक तापमान

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, मायावती की नाराजगी फिल्म के एक खास दृश्य को लेकर है, जिसे वह ब्राह्मण समुदाय को नकारात्मक रूप में दिखाने वाला मानती हैं। ‘घूसखोर पंडित’ को सामाजिक बुराइयों और भ्रष्टाचार पर व्यंग्यात्मक फिल्म के तौर पर पेश किया गया है, लेकिन इसके कथित कंटेंट को लेकर कई राजनीतिक दलों ने आपत्ति जताई है। मायावती द्वारा फिल्म पर बैन की मांग यह दिखाती है कि भारत में सिनेमा केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सामाजिक पहचान और राजनीतिक विमर्श का भी अहम हिस्सा बन चुका है।

जाति राजनीति की संवेदनशीलता फिर उजागर

मायावती की कड़ी प्रतिक्रिया इस बात को रेखांकित करती है कि भारत में जाति से जुड़े मुद्दे कितने संवेदनशील हैं। किसी भी समुदाय के खिलाफ अपमानजनक चित्रण का आरोप तेज विरोध और राजनीतिक दबाव को जन्म दे सकता है। उनका यह रुख केवल ब्राह्मण समाज की छवि बचाने तक सीमित नहीं है, बल्कि उस राजनीतिक सोच को भी दर्शाता है, जिसके तहत वह मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर सभी समुदायों के चित्रण को जवाबदेह बनाने की बात करती रही हैं।

फिल्मकारों की जिम्मेदारी पर सवाल

यह विवाद फिल्म निर्माताओं की भूमिका और जिम्मेदारी पर भी सवाल खड़े करता है। व्यंग्य और कटाक्ष सामाजिक सच्चाइयों को सामने लाने का सशक्त माध्यम हो सकते हैं, लेकिन यदि इन्हें संतुलन के बिना प्रस्तुत किया जाए तो गलतफहमी और विरोध की स्थिति बन सकती है। भारतीय सिनेमा का इतिहास बताता है कि जाति जैसे विषयों पर बनी फिल्मों ने कभी समाज को आईना दिखाया है, तो कभी विरोध प्रदर्शन और सेंसरशिप की मांग को जन्म दिया है।

सोशल मीडिया के दौर में बढ़ी चुनौतियां

‘घूसखोर पंडित’ को लेकर उठा विवाद आज के डिजिटल युग की एक और सच्चाई को उजागर करता है। सोशल मीडिया के चलते जनभावनाएं तेजी से आकार लेती हैं और राजनीतिक बयान तुरंत बहस का रूप ले लेते हैं। मायावती की त्वरित प्रतिक्रिया और उसके बाद छिड़ी चर्चा यह संकेत देती है कि आने वाले समय में फिल्मों के कंटेंट पर राजनीतिक और सामाजिक नजर और सख्त हो सकती है।

राजनीतिक रणनीति का भी हिस्सा

मायावती का यह कदम केवल एक फिल्म विरोध तक सीमित नहीं माना जा रहा। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह उनके व्यापक राजनीतिक एजेंडे का हिस्सा भी हो सकता है। इस मुद्दे को उठाकर वह अपने समर्थक वर्ग को एकजुट करने के साथ-साथ उत्तर प्रदेश की राजनीति में ब्राह्मण मतदाताओं के बीच भी अपनी पकड़ मजबूत करने का संदेश देती नजर आती हैं। इसके जरिए वह यह भी जताना चाहती हैं कि किसी भी समुदाय को, चाहे उसका सामाजिक इतिहास कुछ भी रहा हो, उपहास का पात्र नहीं बनाया जाना चाहिए।

कुल मिलाकर, ‘घूसखोर पंडित’ पर प्रतिबंध की मांग ने यह साफ कर दिया है कि भारत में सिनेमा, जाति और राजनीति एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। जहां एक ओर रचनात्मक स्वतंत्रता का सवाल है, वहीं दूसरी ओर सामाजिक जिम्मेदारी और भावनाओं का सम्मान भी उतना ही जरूरी है। यह मामला फिल्मकारों और नेताओं—दोनों के लिए एक संकेत है कि विविधताओं से भरे भारतीय समाज में संतुलन बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती है।

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