Shaurya Path: Indian Army के सुरक्षा कवच को भेद पाना दुश्मन के लिए मुश्किल ही नहीं नामुमकिन होगा

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भारतीय सेना जिस रॉकेट आधारित लक्ष्य प्रणाली को विकसित करना चाहती है, वह विशेष रूप से इंफ्रारेड सिग्नल देने वाली प्रणाली होगी। इसका उद्देश्य उन वायु रक्षा हथियारों को प्रशिक्षित करना है जो इंफ्रारेड सिग्नल का पीछा करके लक्ष्य को नष्ट करते हैं।

दुनिया भर में बदलते युद्धक परिदृश्य, ड्रोन हमलों, आत्मघाती विमानों, झुंड आधारित हवाई हमलों और कम लागत वाले घातक मानवरहित हथियारों ने युद्ध की प्रकृति पूरी तरह बदल दी है। ऐसे समय में भारतीय सेना ने ऐसा निर्णायक कदम उठाया है, जो साफ संकेत देता है कि अब भारत दुश्मन के हर हवाई खतरे का जवाब उसी की भाषा में देगा।

हम आपको बता दें कि भारतीय सेना के वायु रक्षा महानिदेशालय ने तीन अत्याधुनिक हवाई लक्ष्य प्रणालियों के लिए सूचना अनुरोध जारी किए हैं। इनमें रॉकेट आधारित मध्यवर्ती लक्ष्य प्रणाली, ड्रोन झुंड लक्ष्य प्रणाली और बहु पंखा युक्त उड़न लक्ष्य शामिल हैं। यह पहल आने वाले युद्धों की तैयारी का वह महाअभियान है जिसमें भारतीय सेना अपने वायु रक्षा सैनिकों को वास्तविक युद्ध जैसी परिस्थितियों में प्रशिक्षित करेगी।

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यह कदम उस समय आया है जब रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया के संघर्षों ने पूरी दुनिया को दिखा दिया कि छोटे और सस्ते ड्रोन भी अरबों की रक्षा व्यवस्था को चुनौती दे सकते हैं। इस संघर्ष ने दिखा दिया कि अब युद्ध केवल टैंक और मिसाइलों से नहीं जीते जाते, बल्कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता, ड्रोन झुंड और तेज प्रतिक्रिया वाली वायु रक्षा प्रणाली ही असली विजेता तय करती है। भारत ने इस चुनौती को समय रहते पहचान लिया है और सेना ने दुश्मन के हर हवाई षड्यंत्र को ध्वस्त करने के लिए अपनी तैयारी तेज कर दी है।

भारतीय सेना जिस रॉकेट आधारित लक्ष्य प्रणाली को विकसित करना चाहती है, वह विशेष रूप से इंफ्रारेड सिग्नल देने वाली प्रणाली होगी। इसका उद्देश्य उन वायु रक्षा हथियारों को प्रशिक्षित करना है जो इंफ्रारेड सिग्नल का पीछा करके लक्ष्य को नष्ट करते हैं। यह लक्ष्य रॉकेट कम से कम एक सौ अस्सी मीटर प्रति सेकंड की गति से उड़ेगा और तीस सेकंड तक हवा में रहेगा। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह प्रणाली छह किलोमीटर से अधिक दूरी तय करते हुए डेढ़ हजार मीटर की ऊंचाई तक पहुंच सकेगी। इसका मतलब साफ है कि भारतीय सेना अब केवल पारंपरिक प्रशिक्षण नहीं चाहती, बल्कि वास्तविक मिसाइल और हवाई खतरे जैसे लक्ष्य तैयार कर रही है।

सेना ने इस प्रणाली को पर्वतीय क्षेत्रों में भी उपयोग योग्य बनाने पर जोर दिया है। चार हजार दो सौ मीटर तक की ऊंचाई वाले क्षेत्रों में इसकी तैनाती की मांग इस बात का प्रमाण है कि भारतीय सेना लद्दाख और उत्तरी सीमाओं जैसे कठिन इलाकों को ध्यान में रखकर तैयारी कर रही है। यह वही क्षेत्र हैं जहां चीन लगातार सैन्य दुस्साहस दिखाने की कोशिश करता रहा है।

दूसरी और सबसे खतरनाक चुनौती है ड्रोन झुंड हमला। दुनिया भर के युद्धों में अब दर्जनों ड्रोन एक साथ हमला कर वायु रक्षा व्यवस्था को भ्रमित करते हैं। इसी खतरे को कुचलने के लिए भारतीय सेना ने बारह ड्रोन वाले झुंड लक्ष्य प्रणाली की मांग की है। यह केवल साधारण ड्रोन नहीं होंगे, बल्कि समन्वित तरीके से हमला करने वाले लक्ष्य होंगे जिनके खिलाफ सेना अपने हथियारों, लेजर आधारित प्रणालियों और आधुनिक वायु रक्षा तंत्र का अभ्यास करेगी।

इन ड्रोन की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह होगी कि यदि वे मार गिराए जाने से बच जाते हैं तो दोबारा उपयोग किए जा सकेंगे। प्रत्येक ड्रोन तीस मीटर प्रति सेकंड की गति से उड़ सकेगा और कम से कम तीस मिनट तक हवा में रहेगा। सेना ने स्पष्ट किया है कि ये सभी ड्रोन सौ मीटर के दायरे में एकजुट होकर झुंड संचालन करने में सक्षम होने चाहिए। यह मांग दर्शाती है कि भारत अब भविष्य के सामूहिक ड्रोन हमलों का मुकाबला करने के लिए पूरी तरह तैयार होना चाहता है।

सबसे महत्वपूर्ण पहलू कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित प्रशिक्षण मॉडल है। सेना ने कंपनियों से पूछा है कि क्या उनकी प्रणाली एक महीने तक की उड़ान संबंधी जानकारी संग्रहित कर सकती है ताकि कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित प्रशिक्षण और विश्लेषण विकसित किया जा सके। इसका सीधा अर्थ है कि भारतीय सेना अब युद्ध के मैदान में केवल सैनिकों की ताकत पर नहीं, बल्कि आंकड़ों, विश्लेषण और मशीन आधारित युद्धक क्षमता पर भी जोर दे रही है।

तीसरी प्रणाली बहु पंखा युक्त लक्ष्य प्रणाली है, जिसे धीमी गति वाले हेलीकाप्टर जैसे खतरों की नकल करने के लिए तैयार किया जाएगा। यह प्रणाली सेना के वायु रक्षा जवानों को वास्तविक परिस्थितियों में अभ्यास का अवसर देगी। इसकी विशेषता यह है कि एक ही नियंत्रण केंद्र से दो लक्ष्यों को नियंत्रित किया जा सकेगा। यह पंद्रह किलोमीटर तक की दूरी पर संचालित होगी और हजार मीटर की ऊंचाई तक उड़ सकेगी।

इस प्रणाली में राडार संकेत बढ़ाने, इंफ्रारेड सिग्नल बढ़ाने और लक्ष्य से दूरी मापने की क्षमता भी होगी। इसका अर्थ है कि भारतीय सेना केवल लक्ष्य पर गोली चलाने का अभ्यास नहीं करेगी, बल्कि यह भी मापेगी कि हमला कितना सटीक था। यही आधुनिक युद्ध की असली पहचान है।

सबसे महत्वपूर्ण और रणनीतिक संकेत वह है जिसमें सेना ने कंपनियों से स्पष्ट पूछा है कि उनकी प्रणाली में चीन निर्मित पुर्जे तो नहीं हैं। यह केवल तकनीकी प्रश्न नहीं, बल्कि भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा नीति के प्रति चिंता भी दर्शाता है। देखा जाये तो भारतीय सेना अब किसी भी हालत में चीन की तकनीक पर निर्भर नहीं रहना चाहती। गलवान से लेकर अरुणाचल तक चीन की विस्तारवादी मानसिकता ने भारत को यह सिखा दिया है कि आत्मनिर्भरता ही सुरक्षा की सबसे बड़ी गारंटी है।

इसीलिए यह पूरी खरीद प्रक्रिया भारतीय श्रेणी के तहत की जा रही है जिसमें कम से कम पचास प्रतिशत स्वदेशी सामग्री अनिवार्य होगी। इसका सीधा लाभ भारत के रक्षा उद्योग, निजी कंपनियों और स्वदेशी तकनीकी विकास को मिलेगा। यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आत्मनिर्भर भारत अभियान को रक्षा क्षेत्र में नई शक्ति देगा।

देखा जाये तो मई 2025 के ऑपरेशन सिंदूर ने भी यह साबित कर दिया था कि भविष्य के युद्ध में ड्रोन और प्रतिड्रोन क्षमता निर्णायक भूमिका निभाएगी। भारतीय सेना ने उस अनुभव से सीख लेते हुए अब प्रशिक्षण व्यवस्था को पूरी तरह बदलने का फैसला किया है। इसमें कोई दो राय नहीं कि आज पूरी दुनिया देख रही है कि भारतीय सेना केवल सीमाओं पर दुश्मन को जवाब नहीं दे रही, बल्कि आने वाले युद्धों के लिए नई रणनीति गढ़ रही है। भारतीय सैनिकों का शौर्य पहले ही दुनिया में अद्वितीय माना जाता है, लेकिन अब उन्हें अत्याधुनिक तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और आधुनिक वायु रक्षा प्रशिक्षण का साथ मिलने जा रहा है। यह वही घातक संगम है जो किसी भी दुश्मन के लिए विनाश का कारण बन सकता है।

बहरहाल, भारत का संदेश बिल्कुल स्पष्ट है। यदि किसी ने भारतीय सीमाओं की ओर आंख उठाई, यदि किसी ड्रोन झुंड ने भारत के आसमान की ओर बढ़ने की कोशिश की, तो भारतीय सेना उसे हवा में ही राख बना देगी। नया भारत अब चेतावनी नहीं देता, बल्कि दुश्मन की हर चाल का जवाब निर्णायक प्रहार से देता है।

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