राम जन्मभूमि है दिव्य स्थान, जिसे बदला नहीं जा सकता: आलोक कुमार

  •  प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क
  •  नवंबर 30, 2018   13:05
राम जन्मभूमि है दिव्य स्थान, जिसे बदला नहीं जा सकता: आलोक कुमार

जिस प्रकार शरीर आत्मा निकलने पर मृत हो जाता है और उसे एक दिन भी घर में नहीं रखा जाता उसी प्रकार भगवान राम के बिना यह भारत भूमि आत्मा विहीन हो जाएगी।

नई दिल्ली। श्री राम जन्मभूमि राष्ट्रीय धरोहर की पुनर्स्थापना विषय पर आयोजित सेमिनार में विश्व हिन्दू परिषद् के अंतर्राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष श्री आलोक कुमार ने कहा कि देश की आज़ादी के समय कांग्रेस ने जिस प्रकार इंडिया गेट से जार्ज पंचम की प्रतिमा, ब्रिटिश वायसरायों की प्रतिमाएं नई दिल्ली से हटा दी, अनेक मार्ग जो ब्रिटिश दासता का बोध करते थे उनको बदला गया, उसी प्रकार अयोध्या में गिराया गया बाबरी ढांचा भी विदेशी दासता का बोध करवाता था और देश के स्वाभिमान पर धब्बा था। जिस प्रकार शरीर आत्मा निकलने पर मृत हो जाता है और उसे एक दिन भी घर में नहीं रखा जाता उसी प्रकार भगवान राम के बिना यह भारत भूमि आत्मा विहीन हो जाएगी।

अयोध्या में श्री राम जन्मभूमि देश की सांस्कृतिक एकता का प्रतीक है। श्री राम जन्मभूमि पर भव्य राम मंदिर सोमनाथ मंदिर की तर्ज पर अध्यादेश लाकर बनना चाहिए। जिस स्थान पर श्री राम का जन्म हुआ वो स्थान दिव्य है, यह स्थान पूज्य है इसलिए यह बदला नहीं जा सकता, मस्जिद अयोध्या की सांस्कृतिक सीमा से बाहर कितने भी बड़े स्थान पर बनाई जा सकती है। अयोध्या में श्री राम जन्मभूमि में भव्य राम मंदिर देश की साम्प्रदायिक और सांस्कतिक एकता को अक्षुण बनाने का बहुत बढ़ा सुअवसर है। 

श्री आलोक कुमार ने बताया की जैसे अभी अयोध्या में धर्म सभा हुई वैसी दिल्ली के रामलीला मैदान में करेंगे, यह अभूतपूर्व सभा होगी इतनी बड़ी सभा दिल्ली ने पहले कभी देखा नहीं होगी। ऐसी543 धर्म सभाएं देश के सभी लोकसभा क्षेत्रों में एक साथ करेंगे. उसके उपरान्त सभी सांसदों के पास मतदाता के नाते राममंदिर निर्माण के लिए संसद में अध्यादेश लाने की मांग करेंगे। जनता के इतने बड़े दबाव को जब वह देखेंगे तो वह संसद में इस बिल के विरोध का साहस नहीं कर सकेंगे।

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राज्य सभा सांसद प्रोफ़ेसर राकेश सिन्हा ने इस अवसर पर अपने वक्तव्य में कहा कि देश से अंग्रेजों को निकालने और आज़ादी के आंदोलन के तीन चरण थे। 1920 से 30 में असहयोग आंदोलन एक चेतावनी थी, 1930-31 में सविनय अवज्ञा आंदोलन हुआ वह तैयारी थी और 1942 में भारत छोडो आंदोलन हुआ वह अंग्रेजों की भारत से विदाई थी. इसी तरह रामजन्म भूमि का 1990 का आंदोलन असहयोग आंदोलन था, 1992 का आंदोलन सविनय अवज्ञा आंदोलन था जिसमें ढांचा टूटा और अब 2018 का आंदोलन क्विट इंडिया मूवमेंट है। भारत की सरकार और समाज इस बात को स्वीकार करेगा कि यह हिन्दू मुस्लिम विवाद का प्रश्न नहीं है। यह सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की पुनर्स्थापना का यज्ञ है हम इसे मिलकर करेंगे। भारतीय वित्त सलाहकार समिति द्वारा आयोजित इस सेमिनार में इसके चेयर मैन श्री सुभाष अग्रवाल सहित कई जाने माने वित्त विशेषज्ञों ने भी राम मंदिर की पुनर्स्थापना पर अपने विचार रखे।





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