दिल्ली नगर निगम में क्या बदलना चाहती है मोदी सरकार? बिल के मकसद और नए स्वरूप के बारे में जानें

दिल्ली नगर निगम में क्या बदलना चाहती है मोदी सरकार?  बिल के मकसद और नए स्वरूप के बारे में जानें

पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च द्वारा तैयार किए गए बिल सारांश के अनुसार 2011 के संशोधन ने उन क्षेत्रों को चिह्नित किया जहां दिल्ली सरकार के पास निर्णय लेने की शक्ति होगी। इनमें निगम में अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित सीटों की संख्या, निगमों के क्षेत्र का जोनों और वार्डों में विभाजन, वार्डों का परिसीमन, वेतन और भत्ते शामिल थी।

केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने राष्ट्रीय राजधानी के तीन नगर निगमों को एक इकाई में विलय करने के लिए लोकसभा में दिल्ली नगर निगम (संशोधन) विधेयक, 2022 पेश किया। नॉर्थ, साउथ और ईस्ट एमसीडी नाम हटा कर म्युनिसिपल कॉरपोरेशन ऑफ दिल्ली (एमसीडी) कर दिया गया है। मौजूदा 272 वॉडों की संख्या घटाकर अधिकतम 250 तक निर्धारित करने की बात कही गई है। इसके अलावा बिल में एमसीडी एक्ट में कई चीजों के संशोधन की बात है।

यह बिल अलग है

272 वार्डों की संख्या घटाकर अधिकतम 250 तक निर्धारित करने की बात कही गई है। इसके अलावा बिल में एमसीडी एक्ट में कई चीजों में संशोधन की बात है। विधेयक पारित होने पर ये एमसीडी को 2011 से पहले की स्थिति में नहीं लौटाएगा। विधेयक में ऐसे खंड हैं जो नई एमसीडी को पुराने एमसीडी से बहुत अलग बनाएंगे। सीटों की संख्या कम करने का मतलब है एक नया परिसीमन किया जाएगा। विशेषज्ञों का अनुमान है कि जिसमें कम से कम तीन से छह महीने लगने की संभावना है। यदि ऐसा होता है तो राज्य चुनाव आयोग के अनुसार अप्रैल में होने वाले एमसीडी चुनाव में काफी देरी होगी। विधेयक के सबसे महत्वपूर्ण प्रावधानों में से एक है जो केंद्र को एकीकृत एमसीडी की पहली बैठक होने तक एक विशेष अधिकारी नियुक्त करने की अनुमति देता है। इसका मतलब है कि जब तक चुनाव संपन्न नहीं हो जाते, केंद्र निगम को चलाने के लिए एक अधिकारी की नियुक्ति कर सकता है। अन्य महत्वपूर्ण परिवर्तन सभी स्थानों पर "सरकार" शब्द को "केंद्र सरकार" के साथ प्रतिस्थापित करना है। 

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दिल्ली सरकार ने क्या खोया

पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च द्वारा तैयार किए गए एक बिल सारांश के अनुसार, 2011 के संशोधन ने उन क्षेत्रों को चिह्नित किया जहां दिल्ली सरकार के पास निर्णय लेने की शक्ति होगी। इनमें निगम में अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित सीटों की संख्या, निगमों के क्षेत्र का जोनों और वार्डों में विभाजन, वार्डों का परिसीमन, वेतन और भत्ते और आयुक्त की अनुपस्थिति की छुट्टी शामिल थी। मौजूदा स्थिति में आयुक्त दिल्ली सरकार के सामान्य अधीक्षण और निर्देशों के तहत नियमों के निर्माण के संबंध में प्रयोग किया जाता है। इसके बजाय बिल केंद्र सरकार को इन सभी मामलों को तय करने का अधिकार देता है।

 बिल का मकसद

एमसीडी एक्ट में संशोधन कर तीनों एमसीडी को करना क्यों जरूरी बन गया था, इस संग समझें विषय में विस्तार से बताया गया है। इसमें तीनों एमसीडी के आर्थिक स्थिति मुख्य कारण माना गया है। दिल्ली सरकार ने 2011 में एमसीडी में बांट दिया था। तीनों एमसीडी को एक करने के लिए केंद्र दोबारा एक्ट में संशोधन करने के लिए ये बिल लोकसभा में पेश किया।

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ई-गवर्नेस सिस्टम 

केंद्रीय गृह राज्य मंत्री लोकसभा में एमडी को एक करने का जो बिल पेश किया गया, उसमें नागरिकों को बेहतर नागरिक सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए ई-गवर्नेस सिस्टम लागू करने की पॉलिसी को जरूरी बनाया गया है, ताकि लोगों को नागरिक सुविधाओं का लाभ किसी भी जगह बैठे मिल सके और इसमें पारदर्शिता भी बनी रहे।





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