योगी 2.0 मंत्रिमंडल: भाजपा की ये रणनीति बढ़ाएगी अखिलेश यादव की सीयासी मुश्किलें

योगी 2.0 मंत्रिमंडल: भाजपा की ये रणनीति बढ़ाएगी अखिलेश यादव की सीयासी मुश्किलें

प्रयागराज, जौनपुर, वाराणसी की जिस भी सीट पर कुर्मी समाज का झुकाव सपा की ओर था, वहां सपा जीत गई। वहीं कानपुर देहात और बुंदेलखंड में कुर्मी समाज का झुकाव बीजेपी की ओर था तो यहां सपा को हार मिली।

योगी 2.0 सरकार में इस बार कुर्मी समाज पर खास ध्यान दिया गया है, जिसके पीछे सियासी नफा नुकसान छुपा हुआ है। दरअसल अब भाजपा 2024 की तैयारियों में जुट गई है जिसके तहत ही उसने इस बार उत्तर प्रदेश सरकार में कुर्मी जाति के तीन कैबिनेट और एक राज्य मंत्री बनाकर कुर्मी समाज को सियासी संदेश देने की कोशिश की है। बीजेपी ने इस बार मंत्रिमंडल में कुर्मी समाज के 4 विधायकों स्वतंत्र देव सिंह, राकेश  साचन, और अपना दल से आशीष पटेल को कैबिनेट मंत्री बनाया है। वहीं संजय गंगवार को राज्य मंत्री के तौर पर शामिल किया है। भाजपा के इस कदम से अखिलेश यादव की परेशानी बढ़ गई है।  इस बार उत्तर प्रदेश सदन में भी कुर्मी समाज की नुमाइंदगी बढ़ी है, और सदन में कुर्मी जाति के विधायकों की संख्या 37 से बढ़कर 41 हो गई है।  इस बार भाजपा के कुर्मी विधायकों की संख्या कम होकर 22 रह गई है, जो पिछली बार के मुकाबले 4 कम है। वहीं अपना दल से 5 कुर्मी विधायक चुने गए हैं। सपा के कुल में विधायकों की संख्या में भी इजाफा हुआ है और यह 2 से बढ़कर 14 हो गई है।

उत्तर प्रदेश की सियासत को देखने वाले सियासी जानकार कहते हैं कि पिछड़ी जाति में यादव सपा के साथ जाते हैं। पिछड़ी जातियों में कुर्मी दूसरे नंबर पर आते हैं। लेकिन कुर्मी वोटर बिखरा हुआ नजर आता है, यह कहीं तो बीजेपी के साथ है और कहीं सपा के साथ। इस समाज का एक बड़ा हिस्सा अपना दल से भी जुड़ा हुआ है। भाजपा की सारी रणनीति कुर्मी समाज के एक बड़े हिस्से को अपनी और करने की है।

भाजपा अपनी रणनीति पर इसलिए भी काम कर रही है क्योंकि इस चुनाव में आधा दर्जन से ज्यादा सीटें ऐसी हैं, जहां सपा को 200 वोटों के अंतर से शिकस्त का मुंह देखना पड़ा है। दूसरी ओर बसपा के कद्दावर कुर्मी नेता सपा की साइकिल पर सवार हो गए हैं जिससे अंबेडकरनगर में भाजपा खाता तक नहीं खोल पाई।

अंबेडकरनगर में राममूर्ति वर्मा के बाद बसपा के लाल जी वर्मा ने सपा का दामन थाम लिया, जिससे भाजपा का यहां खाता खोलना भी मुश्किल हो गया। इस बार के चुनाव में सिराथू से दिग्गज नेता उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य को भी सपा की डॉक्टर पल्लवी पटेल ने हरा दिया। प्रयागराज, जौनपुर, वाराणसी की जिस भी सीट पर कुर्मी समाज का झुकाव सपा की ओर था, वहां सपा जीत गई। वहीं कानपुर देहात और बुंदेलखंड में कुर्मी समाज का झुकाव बीजेपी की ओर था तो यहां सपा को हार मिली।

अब पार्टियों की रणनीति यह भी है कि सुबे में इन जातियों के नई पीढ़ी के नेताओं को आगे किया जाए। एक वक्त था जब सूबे की सियासत में बीजेपी के पास विनय कटियार, ओमप्रकाश सिंह, राजकुमार वर्मा जैसे दिग्गज नेता थे। वहीं सपा की नाव को भी प्रसाद वर्मा जैसे नेता का सहारा था। अब सियासत भी बदल गई है, और हालात भी बदल गए हैं। नई पीढ़ी के कुर्मी नेता सपा और भाजपा के साथ जरूर हैं, लेकिन जातीय गोलबंदी नहीं हो सकी है। यही वजह है कि बीजेपी अपना दल को साथ रखे हुए है। इसके साथ-साथ भाजपा अलग-अलग क्षेत्र से कुर्मी नेताओं को आगे बढ़ा रही है। भाजपा कुर्मी समाज को यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि उसका भविष्य भाजपा के साथ ही सुरक्षित है।

सूबे में कुर्मी समाज सियासी तौर पर हमेशा अपनी उपस्थित रहा है। सियासी इतिहास में झांके तो कुर्मी जाति 1989 गोलबंद होकर जनता दल के साथ थी। फिर यह जाति मुलायम और बेनी प्रसाद वर्मा की जोड़ी के साथ जुड़ गई। पूर्वांचल में बेनी प्रसाद वर्मा को कुर्मीयों ने अपना नेता स्वीकार किया। मुलायम सिंह से बढ़ती नाराजगी के बाद जब बेनी प्रसाद वर्मा ने सपा छोड़ी और कांग्रेस के साथ आए तो इस वोट बैंक का असर भी दिखा।

कुर्मी समाज भी अपना स्वतंत्र प्रतिनिधित्व तलाश कर रहा है। दरअसल पिछड़ी जाति में यादवों के नेता मुलायम सिंह यादव व लोद समाज से आने वाले नेता कल्याण सिंह मुख्यमंत्री बने, लेकिन कुर्मी समाज को अभी तक यह हासिल से नहीं हो सका है। कुर्मी समाज में अपना दल के उभार का कारण यह भी माना जाता है। अगर बीजेपी को लोकसभा में कुर्मी वोट बैंक को साधना है तो  इस बिरादरी की मंत्रिमंडल में संख्या बढ़ानी होगी।





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