देश का भविष्य सँवारने के लिए बच्चों का विशेष ध्यान रखते थे पं. नेहरू

By अमृता गोस्वामी | Publish Date: Nov 13 2018 3:46PM
देश का भविष्य सँवारने के लिए बच्चों का विशेष ध्यान रखते थे पं. नेहरू
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देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के जीवन में बच्चों की खास अहमियत थी। उनका मानना था कि भविष्य निर्माण में भावी पीढ़ी बहुत मायने रखती है, इसलिए बच्चों के विकास पर हमारा विशेष ध्यान आवश्यक है।

बच्चों! आपके प्रिय नेता और देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के जीवन में आपकी खास अहमियत थी। उनका मानना था कि भविष्य निर्माण में भावी पीढ़ी बहुत मायने रखती है, इसलिए बच्चों के विकास पर हमारा विशेष ध्यान आवश्यक है। प्रेम और सरलता से भरा उनका स्वभाव बच्चों को भी बहुत पसंद था इसलिए वे प्यार से उन्हें 'चाचा नेहरू' के नाम से पुकारते थे। बच्चों से विशेष लगाव के कारण ही उनके जन्म दिवस 14 नवंबर को हम 'बाल दिवस' के रूप में मनाते हैं। 
 
पंडित जवाहर लाल नेहरू का जन्म 14 नवंबर 1889 को उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद शहर में हुआ था। इनकी पढ़ाई ब्रिटेन के लंदन में हुई। उन्हें खेलों विशेष रूप से क्रिकेट में बहुत दिलचस्पी थी। अपनी पढ़ाई के दौरान वे लार्डस पर होने वाले मैच देखने भी चले जाते थे। रामुन्नों जो उस समय वायुसेना में थे, ने लिखा कि वे कई बार कार्यालय छोड़कर दिल्ली में चल रहे टेस्ट मैच देखने जाते थे और उसमें पूरी रूचि लेते हुए स्कोर भी स्कोरशीट पर लिखा करते थे। शंकर घोष ने 'जवाहरलाल नेहरू ए बायोग्राफी' में लिखा है कि पढ़ाई के अलावा वे वहां क्रिकेट भी खेला करते थे। और सिर्फ क्रिकेट ही नहीं यहां उन्होंने कई बार टेनिस भी खेला। 
 


पंडित नेहरू की छवि एक मृदुभाषी और कम बोलने वाले व ज्यादा सोचने वाले नेता की है। चूंकि इनका जन्म उस समय हुआ था जब हमारा देश आजाद नहीं था। देश की आजादी में पंडित नेहरू का विशेष योगदान रहा। उनका नाम आजादी के लिए लड़ाई लड़ने वाले प्रमुख नेताओं में जाना जाता है। उन्होंने भारत को न सिर्फ आजादी दिलाई बल्कि सशक्त लोकतंत्र तैयार करने में भी मदद की। राष्ट्रीय संप्रभुता बनाए रखने और अन्य राष्ट्रों के निजी मामलों में दखलअंदाजी न करने जैसे शांति सिद्धांतों को देने वाले पंडित नेहरू भारत को एक स्वतंत्र पहचान दिलाने की निरंतर कोशिश करते रहे। वे चाहते थे कि भारत की एक स्वतंत्र आवाज हो। स्वतंत्रता संग्रामों के दौरान उन्हें कई बार जेल भी जाना पड़ा। जेल में उन्होंने अपनी पुत्री इंदिरा गांधी को मार्गदर्शन के लिए कई पत्र लिखे जो उनके देशप्रेम से सराबोर थे।
 
कहते हैं कि भारत में परंपरा रही है कि दीपावली पर अपने घर के अलावा पड़ोसी के घर पर भी एक दीपक जरूर जलाएं क्योंकि आपका सुख−चैन पड़ोसी के सुख चैन से पूरी तरह प्रभावित रहता है। यही सोच थी हमारे प्रथम प्रधानमंत्री की। उनका मानना था कि सुख समृद्धि और शांति पर सबका हक है, सिर्फ भारत ही नहीं कोई भी देश गुलाम नहीं होना चाहिए। भारत की आजादी दूसरे देशों की आजादी से समृद्ध होगी। दुनिया की अशांति हमें भी शांति नहीं दे सकती। सर्वत्र एकता ही पृथ्वी का स्वर्ग है।
 
यही कारण था कि पाकिस्तान के आक्रमण का विरोध करते हुए भी आवश्यकता पड़ने पर वे उसके सहयोग के लिए भी हमेशा तैयार रहे। जब जापान ने एशिया पर हमले किए तो उसके खिलाफ भी उन्होंने आवाज़ उठाई साथ ही जापानियों पर होने वाले अन्याय का भी विरोध किया।


 
देश की मिट्टी और देशवासियों से सच्चे प्रेम की बदौलत ही आज भी वे लोगों के आदर्श हैं। उनका भारत की मिट्टी से यहां के कण−कण से प्रेम ही था कि उन्होंने अपनी वसीयत में इच्छा जाहिर की थी कि मेरी राख को देश के खेतों, पहाड़ों और नदियों में विसर्जित किया जाए ताकि मैं इस देश के कण−कण में व्याप्त रहूं। 1955 में पंडित नेहरू को देश के सर्वोच्च सम्मान 'भारत रत्न' से सम्मानित किया गया। 27 मई 1964 को उनका निधन हो गया। उनके सम्मान में 1965 से भारत सरकार द्वारा जवाहरलाल नेहरू पुरूस्कार भी उन व्यक्तियों को दिया जाता रहा है जो शांति और विकास में सहयोगी हैं। मार्टिन लूथर किंग जूनियर, मदर टेरेसा, इंदिरा गांधी, नेलसन मंडेला, ब्राजील के राष्ट्रपति रहे लुइज इनैसियो लूला डा सिल्वा सहित विभिन्न हस्तियों को यह सम्मान दिया जा चुका है। इस पुरस्कार में एक ट्रॉफी और प्रशस्ति पत्र के अलावा 50 लाख रुपये की राशि भी प्रदान की जाती है।
 
-अमृता गोस्वामी


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