संवैधानिक संस्थाओं पर उठते सवालों से कमजोर होता लोकतंत्र

नेता विपक्ष राहुल गांधी पर हमला करते हुए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि 17वीं लोकसभा में उनकी अटेंडेंस 51% थी। नेशनल एवरेज 66% था। 16वीं लोकसभा में उनकी अटेंडेंस 52% थी। नेशनल एवरेज 80% था। 15वीं लोकसभा में उनकी अटेंडेंस 43% थी, जबकि नेशनल एवरेज 76% था।
देश में समय के साथ लोकतंत्र के परिपक्कव होने के बजाए कमजोर होने की आहट आ रही है। आजादी के बाद देश में ऐसा पहली बार हुआ है कि संवैधानिक संस्थाओं को पक्षपात के आरोपों के कारण कटघरे में खड़ा किया जा रहा है। इन संस्थाओं के कामकाज के तौर—तरीकों पर सवाल उठाए जा रहे हैं। इन पर पूरी तरह से सत्तारुढ केंद्र की नरेन्द्र मोदी सरकार के इशारों पर काम करने करने और विपक्ष के अधिकारों को दबाने के आरोप लगाए जा रहे हैं। आरोपों के इस घेरे में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला, राज्यसभा के सभापति रहे जगदीप धनखड़, भारत के नियंत्रक-महालेखा परीक्षक और अब मुख्य चुनाव आयुक्त आ चुके हैं।
लोकसभा स्पीकर को हटाने के लिए 118 विपक्षी सांसदों के समर्थन से अविश्वास प्रस्ताव लाया गया था। विपक्षी सांसदों का दावा था कि ओम बिरला ने "पक्षपातपूर्ण व्यवहार" दिखाया है और उनका कार्यालय अपेक्षित निष्पक्षता बनाए रखने में विफल रहा है। अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने कहा कि कई बार लोकतांत्रिक प्रक्रिया और स्पीकर की भूमिका पर चर्चा हुई है और कई बार मेरा नाम लिया गया, मेरे बारे में गंदी बातें कही गईं। उन्होंने कहा कि यह सदन भारत के लोगों की अभिव्यक्ति है। यह सदन किसी एक पार्टी का नहीं है, यह पूरे देश का प्रतिनिधित्व करता है। जब भी हम बोलने के लिए उठते हैं, हमें बोलने से रोक दिया जाता है। ""पिछली बार जब मैंने बात की थी, तब मैंने हमारे प्रधानमंत्री के किए गए समझौतों के बारे में एक बुनियादी सवाल उठाया था। कई बार मुझे बोलने से रोका गया है। पहली बार लोकसभा के इतिहास में नेता प्रतिपक्ष को बोलने नहीं दिया गया है।
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नेता विपक्ष राहुल गांधी पर हमला करते हुए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि 17वीं लोकसभा में उनकी अटेंडेंस 51% थी। नेशनल एवरेज 66% था। 16वीं लोकसभा में उनकी अटेंडेंस 52% थी। नेशनल एवरेज 80% था। 15वीं लोकसभा में उनकी अटेंडेंस 43% थी, जबकि नेशनल एवरेज 76% था। उन्होंने कुछ सदस्यों की शिकायतों पर भी बात की कि उन्हें माइक्रोफोन की दिक्कतों की वजह से बोलने नहीं दिया गया। शाह ने कहा कि जो कोई भी नियमों का पालन नहीं करेगा या सदन में अनुशासन बनाए नहीं रखेगा, उसका माइक्रोफोन बंद कर दिया जाएगा और कहा कि संसद की कार्यवाही इसी तरह चलनी चाहिए।
लोकसभा स्पीकर बिरला के कामकाज के तौर—तरीकों पर उनको हटाने का प्रस्ताव लाकर नाराजगी जताने से पहले राज्यसभा के सभापति रहे जगदीप धनखड़ पर इसी तरह के आरोप लगाते हुए विपक्ष ने दिसंबर 2024 में उन्हें पद से हटाने का नोटिस दिया था। विपक्ष का आरोप था कि राज्य सभा के सभापति जगदीप धनखड़ पक्षपातपूर्ण तरीके से सदन की कार्यवाही का संचालन करते हैं। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खर्गे ने आरोप लगाया था कि कि धनखड़ एक सरकारी प्रवक्ता के रूप में काम कर रहे हैं और एक स्कूल के प्रधानाध्यापक की तरह व्यवहार कर रहे हैं, जो अक्सर अनुभवी विपक्षी नेताओं को उपदेश देते हैं और उन्हें सदन में बोलने से रोकते हैं। खरगे ने यह भी दावा किया था कि सदन में हुई गड़बड़ी के लिए स्वयं श्री धनखड़ जिम्मेदार हैं।
राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश ने विपक्ष का सभापति धनखड़ को हटाने का नोटिस खारिज कर दिया था, जिसमें पक्षपातपूर्ण तरीके से उच्च सदन के संचालन का आरोप लगाते हुए सभापति जगदीप धनखड़ को पद से हटाने की मांग की गई थी। हरिवंश ने यह कहते हुए विपक्ष का नोटिस खारिज कर दिया कि यह तथ्यों से परे है और इसका मकसद केवल प्रचार हासिल करना है। उपसभापति ने कहा था कि धनखड़ के खिलाफ नोटिस अनुचित और त्रुटिपूर्ण है, जिसे उपराष्ट्रपति की प्रतिष्ठा को धूमिल करने के लिए जल्दबाजी में तैयार किया गया है। राज्यसभा के महासचिव पी सी मोदी को सौंपे अपने फैसले में हरिवंश ने कहा कि नोटिस देश की संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा कम करने और मौजूदा उपराष्ट्रपति की छवि खराब करने की साजिश का हिस्सा है।
इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इन्क्लूसिव अलायंस (इंडिया गठबंधन) के घटक दलों ने सभापति धनखड़ को उपराष्ट्रपति पद से हटाने के लिए प्रस्ताव लाने संबंधी नोटिस 10 दिसंबर को राज्यसभा के महासचिव को सौंपा था। नोटिस पर कांग्रेस, टीएमसी, आम आदमी पार्टी, डीएमके, समाजवादी पार्टी और कई अन्य विपक्षी दलों के 60 नेताओं ने हस्ताक्षर किए थे। कांग्रेस संसदीय दल की प्रमुख सोनिया गांधी, नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, डीएमके नेता तिरुचि शिवा और टीएमसी के नेता डेरेक ओब्रायन ने इस नोटिस पर हस्ताक्षर नहीं किए थे। समाजवादी पार्टी के नेता रामगोपाल यादव, आम आदमी पार्टी के संजय सिंह, तृणमूल कांग्रेस के सुखेंदु शेखर रॉय, राज्यसभा में कांग्रेस के उप नेता प्रमोद तिवारी, मुख्य सचेतक जयराम रमेश, वरिष्ठ नेता राजीव शुक्ला तथा कई अन्य सीनियर सदस्यों ने धनखड़ के खिलाफ दिए गए नोटिस पर हस्ताक्षर किए थे।
संसद के दोनों सदनों के प्रमुखों के खिलाफ हटाने के प्रयासों के अलावा विपक्षी दलों ने देश के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने के लिए महाभियोग प्रस्ताव लाने के संबंध में लोकसभा और राज्यसभा में सौंपा है। एसआईआर को लेकर विपक्ष लगातार सवाल उठाता रहा है। विपक्ष का आरोप है कि इस प्रक्रिया का इस्तेमाल भाजपा को चुनावी लाभ पहुंचाने के लिए किया जा रहा है। हालांकि जिस तरह लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति को हटाने के विपक्ष के प्रयास सफल नहीं हो सके, उसी तरह मुख्य निर्वाचन आयुक्त के खिलाफ महाभियोग के भी पारित होने की संभावना क्षीण है। विपक्ष के पास महाभियोग पारित कराने के लिए आवश्यक संख्या बल नहीं है। इस तरह के संवैधानिक पदों पर आसीन लोगों को हटाने के लिए एकजुट विपक्ष के प्रयास बेशक सफल नहीं हो पाएं, किन्तु ऐसे प्रयासों से इन पदों की गरिमा कम हुई है। देश में विपक्ष को पूरी तरह से खारिज करके मजबूत लोकतंत्र की तरफ नहीं बढ़ा जा सकता।
संवैधानिक संस्थाओं की निष्पक्षता पर उठते सवालों के घेरे में भारत के नियंत्रक-महालेखा परीक्षक (कैग) का पद भी आ चुका है। इस पद के चयन के लिए कमेटी बनाने की मांग पर सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका लंबित है। एनजीओ सेंटर फॉर पब्लिक इंट्रेस्ट लिटिगेशन की याचिका में कहा गया है कि अभी कैग की नियुक्ति प्रधानमंत्री की सिफारिश पर राष्ट्रपति करते हैं। इस पद की अहमियत को देखते हुए इसके लिए योग्य और निष्पक्ष व्यक्ति का चयन जरूरी है इसलिए, सुप्रीम कोर्ट प्रधानमंत्री, लोकसभा में नेता विपक्ष और सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस की कमेटी के जरिए कैग के चयन का आदेश दे। सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर चुका है।
संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर उठते सवाल भारतीय लोकतंत्र में एक गंभीर विषय बन गए हैं। इन संस्थाओं को परिपक्वता से काम करना चाहिए ताकि उन पर सवाल न उठें। विपक्ष का आरोप है कि इन संस्थाओं का इस्तेमाल राजनीतिक हितों के लिए किया जा रहा है, वहीं सरकार का कहना है कि वे संविधान के अनुसार काम कर रही हैं। यह बहस लोकतंत्र के लिए जन आंदोलन का रूप ले चुकी है।
- योगेन्द्र योगी
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