पश्चिमी UP में इसबार नहीं है साम्प्रदायिकता का मुद्दा, किसानों पर पड़ेंगे वोट

By अजय कुमार | Publish Date: Mar 28 2019 12:54PM
पश्चिमी UP में इसबार नहीं है साम्प्रदायिकता का मुद्दा, किसानों पर पड़ेंगे वोट
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प्रथम चरण में जिन आठ लोकसभा सीटों पर मतदान होना है, वहां 2014 में भाजपा ने विपक्ष का सफाया करते हुए सभी सीटें जीती थीं, लेकिन भाजपा सांसद हुकुम सिंह की मौत के बाद कैराना लोकसभा सीट के लिए हुए उप-चुनाव में राष्ट्रीय लोकदल ने यह सीट भाजपा से हथिया ली थी।

उत्तर प्रदेश में प्रथम चरण में 11 अप्रैल को पश्चिमी यूपी की आठ लोकसभा सीटों पर मतदान होना है। 25 मार्च को इन सीटों पर नामांकन का आखिरी दिन समाप्त होने के बाद मुकाबले की तस्वीर काफी हद तक साफ हो गई है। हालांकि नाम वापसी की अंतिम तिथि 28 मार्च है, लेकिन नाम वापसी के बाद भी कोई बड़ा उलटफेर होने की संभावना न के बराबर है। प्रथम चरण में सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, बागपत, बिजनौर गाजियाबाद, गौतमबुद्धनगर, मेरठ और कैराना लोकसभा सीट पर मुकाबला होना है।
भाजपा को जिताए

प्रथम चरण में जिन आठ लोकसभा सीटों पर मतदान होना है, वहां 2014 में भाजपा ने विपक्ष का सफाया करते हुए सभी सीटें जीती थीं, लेकिन भाजपा सांसद हुकुम सिंह की मौत के बाद कैराना लोकसभा सीट के लिए हुए उप-चुनाव में राष्ट्रीय लोकदल ने यह सीट भाजपा से हथिया ली थी। बात मुद्दों की कि जाए तो इस बार 2014 के मुकाबले हालात बिल्कुल बदले हुए हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव से करीब कुछ माह पूर्व यहां जबर्दस्त साम्प्रदायिक हिंसा हुई थी, जिसके चलते मुस्लिम और जाट वोटरों के बीच तलवारे खिंच गई थीं। भाजपा ने 2013 की साम्प्रदायिक हिंसा को बड़ा मुद्दा बनाते हुए अखिलेश सरकार को तुष्टिकरण की राजनीति करने के लिए घेरा था। इसका असर यह हुआ जाट और दलितों ने भाजपा के पक्ष में जमकर मतदान किया था। मोदी लहर भी यहां खूब चली थी, इसका भी फायदा भाजपा ने उठाया था। अबकी बार सपा-बसपा के गठबंधन से हालात बदले जरूर हैं, लेकिन कांग्रेस ने भी अबकी से पूरी ताकत झोंक रखी है। कांग्रेस, गठबंधन या भाजपा में से किसके लिए मुसीबत का सबब बनेगी इसको लेकर अटकलों का बाजार गरम है।
 
मुस्लिम मतों में सेंध लगाने के साथ जातीय समीकरण साधकर गठबंधन का खेल खराब करने में कांग्रेस ने कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी है। बसपा व सपा ने जब से कांग्रेस को दूध की मक्खी की तरह निकाल कर फेंका है, उसके बाद से कांग्रेस के तेवर बेहद तीखे हो गए है, जिसका सीधा असर चुनाव नतीजों पर पड़ सकता है। खासकर, राहुल गांधी ने न्यूनतम आय योजना को जो पाशा फेंका है, उसकी परीक्षा भी प्रथम चरण में हो जाएगी। अबकी बार पश्चिमी यूपी में लोकसभा चुनाव के पहले चरण की आठ सीटों के लिए कुल 146 नामांकन हुए हैं। 25 मार्च को नामांकन भरने के अंतिम दिन ही कुल 123 नामांकन हुए। आज 26 नामांकन पत्रों की जांच के बाद 28 मार्च को नाम वापस लिए जा सकते हैं। जो तस्वीर उभर कर आ रही है उसके अनुसार पहले चरण में सहारनपुर में 20, कैराना में 14, मुजफ्फरनगर में 22, बिजनौर में 16, मेरठ में 15, बागपत में 13, गाजियाबाद में 25 व गौतमबुद्धनगर में 21 नामांकन हुए हैं। इस बार के चुनाव में किसानों का बकाया गन्ना मूल्य, कानून व्यवस्था, छेड़छाड़, पलायन, अवैध पशु कटान, हाई कोर्ट  बेंच, प्रदूषित होता और गिरता भू-जल तथा चैपट होते उद्योग धंधे को मुद्दा बनाने की कोशिश हो रही है।
प्रथम चरण के चुनाव में कई दिग्गजों की प्रतिष्ठा दांव पर है। सबसे बड़ी चुनौती पूर्व प्रधानमंत्री स्व. चौधरी चरण सिंह के बेटे और पोते के सामने अपनी सियासी विरासत को बचाए रखने की हैं। रालोद अध्यक्ष अजित सिंह एवं उनके पुत्र जयंत चौधरी की परीक्षा प्रथम चरण में होगी। इसके अलावा केंद्र सरकार के तीन मंत्रियों और भाजपा उम्मीदवार डॉ. महेश शर्मा, डॉ. सत्य पाल सिंह और पूर्व सेनाध्यक्ष वीके सिंह की परीक्षा भी पहले चरण में ही होनी है। गौतमबुद्ध नगर से डॉ. महेश शर्मा और गाजियाबाद से वीके सिंह तो बागपत से सत्यपाल सिंह उम्मीवार हैं। प्रथम चरण में ही कांग्रेस के इमरान मसूद व बसपा के हाजी याकूब के अलावा बिजनौर से नसीमुद्दीन सिद्दकी जैसे नेताओं का भी दमखम परखा जाएगा कि कौन कितने पानी में है। इन के अलावा पूर्व बसपा नेता याकूब कुरैशी के सामने भी अपनी सियासी हैसियत को बनाए रखने का संकट है। एक दशक पूर्व डेनमार्ग को कार्टूनिस्ट का सिर कलम करने के 51 करोड़ रुपये का इनाम बोल कर मुस्लिम सियासत में हलचल मचा देने वाले याकूब की परीक्षा भी प्रथम चरण में होगी। भ् प्रथम चरण में दलितों में तेजी से लोकप्रिय हो रही भीम आर्मी और किसानों के पुराने संगठन भारतीय किसान यूनियन के रूख का भी पता चलेगा। दोनों संगठनों की और से खुद को अराजनीतिक रहने का दावा किया जा रहा है, परंतु पिछले चुनावों में दोनों की भूमिका असरदार रही है। देखना है कि भाकियू पर अजित सिंह व भीम आर्मी पर बसपा का रंग चढ़ता हैं अथवा नहीं।
 
भाजपा ने पश्चिमी यूपी की मुजफ्फरनगर सीट पर संजीव बालियान, बागपत से सत्यपाल सिंह, बिजनौर से कुंवर भारतेन्द्र, सहारनपुर से राघव लखनपाल, मेरठ से राजेंद्र अग्रवाल, गाजियाबाद से वीके सिंह, गौतमबुद्ध नगर (नोएडा) डॉ. महेश शर्मा, कैराना से विधायक प्रदीप चैधरी को मैदान में उतारा है।


 
बात कांग्रेस की कि जाए तो अबकी से उत्तर प्रदेश के पहले चरण के चुनाव में कांग्रेस ने चुन-चुनकर ऐसे प्रत्याशियों को चुनाव मैदान में उतारा है, जो कड़ी चुनौती ही नहीं देंगे, बल्कि गठबंधन का खेल भी बिगाड़ सकते हैं, जिससे भाजपा को इसका फायदा मिल सकता है। कैराना संसदीय सीट से सपा ने तबस्सुम को उतारा है, जिसके सामने कांग्रेस ने जाट समुदाय के हरेंद्र मलिक को अपना प्रत्याशी बनाया है। वहीं भाजपा ने अबकी यहां से अपना पुराना चेहरा बदलकर विपक्षी एकता को भेदने का प्लान तैयार किया हैं। भाजपा ने हुकुम सिंह परिवार से हटकर गंगोह के विधायक प्रदीप चौधरी को मैदान में उतारा है। हुकुम सिंह की बेटी को भाजपा ने उप-चुनाव में प्रत्याशी बनाया था, लेकिन भाजपा का यह प्रयोग सफल नहीं रहा था। बात की कि जाए तो तबस्सुम से विभिन्न दलों के मुस्लिम नेताओं की भारी नाराजगी है। वह नेता तो बसपा की थीं। लेकिन 2018 में उन्होंने उप-चुनाव अजित सिंह की पार्टी रालोद के चुनाव चिन्ह हैंडपंप पर लड़ा और अब आम चुनाव में समाजवादी पार्टी से चुनाव लड़ रही हैं। इससे अन्य सभी दलों के मुस्लिम नेता तबस्सुम की उम्मीदवारी से नाराज हैं। इसका खामियाजा सपा प्रत्याशी को उठाना पड़ सकता है।
 
सहारनपुर संसदीय सीट समझौते के तहत बसपा के कोटे में आई है। बसपा ने यहां से हाजी फजलुर्रहमान को उतारा है तो कांग्रेस ने 2014 के आम चुनाव में मोदी पर विवादित टिप्पणी करने वाले इमरान मसूद को फिर से मैदान में उतारा है। इससे मुस्लिम मतों में विभाजन होना स्वाभाविक है, जो सिर्फ भाजपा को लाभ पहुंचा सकता है। राघव लखनपाल को टिकट दिया है।
बिजनौर में बसपा ने मलूक नागर को प्रत्याशी बनाया है, लेकिन कांग्रेस ने मजबूत मुस्लिम नेता नसीमुद्दीन सिद्दीकी को उतारकर कड़ी चुनौती दी है। सिद्दीकी को मुस्लिम समुदाय का कद्दावर नेता माना जाता है। बसपा में रहते हुए उन्होंने मुस्लिमों के बीच बहुत लोकप्रिय नेता थे। गौतमबुद्ध नगर में कांग्रेस ने अरविंद सिंह चौहान को टिकट देकर सतवीर नागर के लिए मुश्किलें खड़ी कर दी है। मुजफ्फरनगर और बागपत में चौधरी चरण सिंह का परिवार दांव लगा है। पहली बार राष्ट्रीय लोकदल अध्यक्ष अजित सिंह अपनी पुश्तैनी सीट बागपत को छोड़ कर मुजफ्फरनगर में अपनी किस्मत अजमाने पहुंचे है। बागपत की विरासत बचाने के लिए चौधरी चरण सिंह की तीसरी पीढ़ी मैदान में उतरी है। जयंत चैधरी बागपत में संयुक्त विपक्ष के उम्मीदवार हैं। पिता-पुत्र भाजपा से हार का बदला लेने के लिए चुनाव मैदान में है, परंतु बागपत के केंद्रीय मंत्री सतपाल सिंह और मुजफ्फरनगर में डॉ. सजीव बालियान से दोनों को कड़ी चुनौती मिलेगी।
 
उत्तर प्रदेश की वीआईपी लोकसभा सीट माने जाने वाली बिजनौर में जनता को लुभाने के लिए सभी दलों के नेता सक्रिय हैं। वर्तमान में इस सीट पर भाजपा का कब्जा है। इस बार बसपा, सपा और रालोद के गठबंधन से भाजपा के लिए जीत की राह आसान नहीं रहने वाली है। भाजपा ने वर्तमान सांसद कुंवर भारतेंद्र सिंह को फिर से उम्मीदवार बनाया है। जबकि कांग्रेस ने जातीय समीकरण को ध्यान में रखते हुए इंदिरा भाटी को टिकट दिया है। वहीं, महागबंधन के तहत बसपा ने मलूक नागर को प्रत्याशी बनाया है।
 

 
मेरठ लोकसभा सीट राजनीतिक संदेश के हिसाब से अहम सीट मानी जाती है। पिछले दो दशकों से ये सीट भारतीय जनता पार्टी का गढ़ मानी जाती रही है। 2014 के चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उत्तर प्रदेश के अपने चुनाव प्रचार की शुरुआत यहां से ही की थी। बीजेपी के राजेंद्र अग्रवाल यहां से लगातार दो बार सांसद चुने जा चुके हैं और इस बार भी मैदान में हैं।  वहीं एसपी-बीएसपी और आरएलडी गठबंधन ने विवादित और कट्टरवादी छवि के माने जाने वाले बीएसपी प्रभारी याकूब कुरैशी को अपना उम्मीदवार घोषित किया है। चुनाव में दोनों के बीच सीधा मुकाबला होने की संभावाना है। ऐसे में माना जा रहा है कि दोनों ही पार्टियां चुनाव जीतने के लिए ध्रुवीकरण का सहारा ले सकती हैं। कांग्रेस ने हरेंद्र अग्रवाल को अपना प्रत्याशी बनाया है। नामाकंन के दौरान आमना-सामना होने पर कांग्रेस उम्मीदवार हरेंद्र और बीजेपी प्रत्याशी राजेन्द्र जिस तरह से गले मिले, उसकी यहां खूब चर्चा हो रही है।
 
- अजय कुमार

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