हिमाचल में सामूहिक भोजन को कहते हैं ''धाम'', बनाने वाले कहलाते हैं ''बोटी''

food culture of himachal pradesh
संतोष उत्सुक । Jul 18 2018 4:24PM

बढ़ती संपन्नता और व्यवसायिक बुद्धि के कारण वैवाहिक आयोजन नए सांचों में ढल रहे हैं। खाने पीने की मेज़ पर दुनिया भर के स्वाद चखे जा रहे हैं। व्यंजनों की विविधता जितनी फैल रही है, खाना उतना ही बर्बाद होते भी देखा गया है।

बढ़ती संपन्नता और व्यवसायिक बुद्धि के कारण वैवाहिक आयोजन नए सांचों में ढल रहे हैं। खाने पीने की मेज़ पर दुनिया भर के स्वाद चखे जा रहे हैं। व्यंजनों की विविधता जितनी फैल रही है, खाना उतना ही बर्बाद होते भी देखा गया है। इधर दिलचस्पियों की धरती हिमाचल में वैवाहिक खानपान आज भी पारम्परिक एवं वैविध्यपूर्ण है। मैदान से पहाड़ चढ़े बदलावों ने पंजाब, उत्तराखंड या हरियाणा की सीमाओं से लगते हिमाचल में आयोजित हो रहे उत्सवों में अपना रंग जमा लिया है। पहाड़ों में अंदरूनी क्षेत्रों में अभी भी हिमाचली धाम संस्कृति आबाद है। 

शादी या अन्य मांगलिक अवसरों पर आयोजित सामूहिक भोजन को हिमाचल में ‘धाम’ कहते हैं और इसे बनाने वालों को बोटी। अनेक परिवारों की कई पुश्तों ने विशिष्ट रेसीपीज़ संभाल कर अपने अग्रजों को सौंपने व पारंपरिक तरीके से पकाते रहने का काम बखूबी किया है। विवाह के मौसम में अनुभवी बोटी मुश्किल से मिलते हैं, उनकी टीम को समय रहते बुक करना पड़ता है। हिमाचल में अनेक गांव तो बोटियों के ही हैं। धाम के आयोजन से कई दिन पहले, आज भी बुजुर्ग औरतें, अवसरानुसार मांगलिक संस्कार गीत गाते हुए मसालों का छांटना कूटना पीसना शुरू करती हैं। ग्यारह फुट लंबी, एक फुट चौड़ी व डेढ़ फुट गहरी चर (खड्डा) खुदवाते हैं। अनुभवी बोटी सुबह स्नान के बाद, पूरी स्वच्छता बरतते हुए नंगे पांव खाना बनाना शुरू करते हैं। खाना पकाने के लिए आज भी पीतल के बड़े, वज़नी, कम चौड़े मुंह वाले गोलाकार बर्तन (बटलोही) का प्रयोग होता है। माना जाता है इसमें सहज स्वादिष्ट पकता है। सही अंतराल पर बोटी मसाले आदि डालते हैं। दिलचस्प यह है कि धाम के व्यंजनों में प्याज़ व लहसुन का प्रयोग नहीं करते बल्कि टमाटर, अदरक, पालक, हरी मिर्च से स्वाद रचा जाता है। अलग अलग ज़िला क्षेत्रों में व्यंजनों की विविधता भी अलग स्वाद उपलब्ध कराती है।    

एक हज़ार साल से ज़्यादा पुरानी इस परंपरा को राजाओं ने शुरू किया जिसमें शासक व शासित साथ बैठकर खाते थे। दो दर्जन से ज्यादा व्यंजन पकाए जाते थे जिसे राजाजी की धाम कहा जाता था। धाम में मुख्यत: चावल व दालें ही पकाई जाती रही हैं लेकिन संपन्नता ने धाम में नए व्यंजन पकवाए हैं। अब आम तौर पर आठ से दस डिशेज़ बनती हैं जिन्हें कुछ परिवार बढ़ा देते हैं। पूरे गांव को भी धाम दी जाती है। दोपहर बाद शुरू होने वाली धाम में हज़ारों लोग कुछ घंटों में ही खाना खा लेते हैं क्यूंकि बांटने वाले अनुभवी होते हैं। वे बार बार आते हैं और खाने वाले को उसकी भूख के अनुसार संयमित ढंग से परोसते हैं। बैठे बैठे लोग गपशप भी कर लेते हैं और इस तरह खाना व्यर्थ भी नहीं जाता। लोग दूर दूर से आते हैं इसलिए खाना गरम रखा जाता है, रात को भी पहुंचो तो भी गरम धाम हाज़िर। खाना आमतौर पत्तल पर ही परोसा जाता है और हाथ से खाया जाता है ताकि उंगलियां पूरा स्वाद मुंह तक पहुंचाएं।   

      

आज भी आम आदमी से लेकर, सभी मंत्री संतरी यहां तक कि मुख्य मंत्री व प्रदेश में पधारे अन्य ‘विशिष्ट’ जन भी ज़मीन पर बिछी पंकत पर एक साथ बैठ कर सामूहिक भोज का लुत्फ उठाते हैं। आपसी सद्भाव व मेलजोल की प्रतीक धाम, धार्मिक सहनशीलता के लिए अच्छा सबक है। इसे एकता का मेला कह सकते हैं।  

धाम में हालांकि सभी पकवान एक निश्चित क्रम से आने चाहिए मगर समय के साथ थोड़ा बहुत बदलाव कई जगह आ चुका है। पहले बोटी पूरा अनुशासन बनाए रखते थे। पकाने व परोसने का कार्य बोटी ही करते थे। खाने वाले एक पंकत से उठ कर दूसरी पंकत में नहीं बैठ सकते थे। खाने का सत्र पूरा होने से पहले उठ नहीं सकते थे। पहले बोटियों के समूह द्वारा धोती पहन कर खाना परोसा जाता था मगर कुछ क्षेत्रों में यह परंपरा छूट रही है। अब चूंकि जंगल कम हो रहे हैं साथ में मेहनती हाथों से पत्तों की प्लेट बनाने वाले भी इसलिए प्लास्टिक की घुसपैठ होना स्वाभाविक है। कड़छी से डाला जाने वाला देसी घी अब छूने के लिए भी उपलब्ध नहीं है। जीवन की हड़बड़ाहट व बिगड़ते अनुशासन ने बदलाव तो लाना ही था। पहले जूते उतार कर खाना खाते थे अब लोग जूतों समेत बैठ जाते हैं। शहरी क्षेत्रों में बफे भी लगाया जाता है मगर ग्रामीण अंचल में पारंपरिक संस्कृति से पलायन अभी शुरू नहीं हुआ है। 

यह सच है कि हिमाचली धाम कम खर्च में ज्यादा लोगों को खिलाती है। बदलाव की महफिल में जहां हमने अपनी कितनी ही सांस्कृतिक परम्पराओं को अंधेरा कोना दिखा दिया है वहीं हिमाचली खानपान की समृद्ध परम्परा बिगड़ते छूटते भी काफी हद तक बरकरार है। यह वाकई प्रशंसनीय है और अनुकरणीय भी। हिमाचल में आकर आवारगी करने वाले पर्यटक चाहें तो इन स्वादिष्ट व स्वास्थ्य रक्षक स्वादों का मज़ा ले सकते हैं।

-संतोष उत्सुक

All the updates here:

अन्य न्यूज़