विश्व धरोहर में शामिल है ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक जल दुर्ग गागरोन

Gagron Fort

गागरोन दुर्ग झालावाड से मात्र तीन किलोमीटर दूरी पर कालीसिंध, परवन एवं आयड़ नदियों के संगम पर स्थित है। दुर्ग तीन ओर से पानी से धिरा है। सड़क मार्ग से जाने पर यह 14 किलोमीटर दूरी पर पड़ता है। इसका निर्माण समय-समय पर 8 वी से 18 वीं शताब्दी के मध्य किया गया।

ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक रूप से देश के जल दुर्गों में दक्षिणी राजस्थान में मध्यप्रदेश राज्य की सीमा से लगते जिले झालवाड़ में स्थित गागरोन का दुर्ग जल दुर्ग का बेहतरीन उदहारण है। इतिहास की कई गाथाएं अपने में समेटे इस दुर्ग को यूनेस्को ने अपनी प्राकृतिक, सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक साइट की श्रेणी में विश्व धरोहर में शामिल कर इसके महत्व को प्रतिपादित किया है। आइये! आप भी जानिए इस दुर्ग के बारे में, क्यों वर्षो से यह दुर्ग सैलानियों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। 

गागरोन दुर्ग झालावाड से मात्र तीन किलोमीटर दूरी पर कालीसिंध, परवन एवं आयड़ नदियों के संगम पर स्थित है। दुर्ग तीन ओर से पानी से धिरा है। सड़क मार्ग से जाने पर यह 14 किलोमीटर दूरी पर पड़ता है। इसका निर्माण समय-समय पर 8 वी से 18 वीं शताब्दी के मध्य किया गया। दुर्ग के चारों तरफ विशाल खाई, नदियां एवं सुदृढ़ प्राचीर इसे सुरक्षा प्रदान करते हैं। दुर्ग तक पहुँचने के लिए नदी में एक पुल बनाया गया है।

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दुर्ग पर शुंग, मालवों, गुप्तों, राष्ट्रकूटों, खींचियों का शासन रहा। अल्लाउद्दीन खिलजी इसे कई वर्षो तक घेरे रखने के बाद भी जीत नहीं सका। अकबर ने यह दुर्ग बीकानरे के पृथ्वीराज राठौड़ को दे दिया। भक्त शिरोमणी रामानंद के शिष्य संता पीपा भी इस दुर्ग के शासक रहें, जिन्होंने अपना राजपाठ त्याग कर दुर्ग अपने भाई अचलदास खींची को सौंप दिया। वर्ष 1436 ई. में राजा की रानी उमादेवी की सुंदरता के कारण उसे पाने के लिए सुल्तान महमूद खिलजी (मालवा) ने काफी समय दुर्ग को घेरे रखा। शत्रु को हराने का उपाय न सूझा तो स्त्रियों ने जौहर कर लिया एवं पुरूष रण में मारे गये। अचलदास खिचीं की वचनिका नामक काव्य रचना से पता चलता है कि उमा रानी ने चालीस हजार महिलाओं के साथ जौहर किया। अगले वर्ष अचलदास के पुत्र पाल्हणसी ने अपने मामा कुंभा की सहायता से दुर्ग पर आक्रमण कर अधिकार कर लिया। 

राठौड़ों के पतन के बाद दुर्ग बूंदी के शासकों हाड़ाओं के अधीन आ गया एवं यहीं से कोटा रियासत के अधीन हो गया।दुर्ग में सूरजपोल, भैरवपोल एवं गणेशपोल के साथ दुर्ग की सुदृढ़ बुर्जों में राम बुर्ज एवं ध्वज बुर्ज बनी हैं। विशाल जौहर कुंड, राजा अचलदास एवं रानियों के महल, बारूदघर, शीतलामाता एवं मधुसूदन के मंदिर हैं। यहाँ कोटा राज्य के सिक्के ढालने की टकसाल भी थी। वर्ष 1838 ई. में झालावाड़ राज्य की स्थापना के बाद से यह दुर्ग स्वतंत्रता प्राप्ति तक झालाओं के अधीन रहा।

सांस्कृतिक रूप से संतपीपा की समाधि गागरोन दुर्ग के समीप संत पीपा की समाधी बनी है। संत पीपा संत कबीर, रैदास के समकालीन थे। पीपा जी तपस्या करते हुए वहीं समाधिष्ठ हो गये थे। उनकी समाधि पर जयंती पर प्रतिवर्ष चैत्र शुक्ल दशमी को पांच दिवसीय महोत्सव धूम-धाम से मनाया जाता है। हजारों श्रद्धालु पीपा जी की समाधि पर मत्था टेकते हैं। समस्त हिन्दु एवं सिक्ख समाज के लोग पीपाजी में गहरी अस्था रखते हैं। पंजाब सहित देश के कई हिस्सों से श्रद्धालु यहाँ आते हैं। दर्जी समाज के लोग उन्हें अपना कुल गुरू मानते हैं। पीपा जी ने सदाचार एवं शाकाहार पर बल दिया उनके नीति परक दोहें आज भी चांव से सुने जाते हैं।

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वर्षों से उपेक्षित इस स्थान का धार्मिक एवं अध्यात्मिक महत्व को देखते हुऐ वर्ष 2003 में तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुन्धरा राजे ने यहाँ भव्य मंदिर बनवाया। अखिल भारतीय पीपा क्षत्रिय महासभा ने भी भरपूर सहयोग किया। अब यहाँ सवा तीन एकड़ जमीन पर पीपा जी पैनोरमा विकसित किया जा रहा है। गागरोन दुर्ग में स्थित सूफी संत मीठेशाह की दरगाह भी मुसलमानों की जियारत का प्रसिद्ध स्थल है। दरगाह का प्रवेश द्वार औरंगजेब द्वारा बनवाया बुलन्द दरवाजा देखते ही बनता है। 

राजमहल

झालावाड़ नगर की नींव 1791 ई. में कोटा राज्य के फौजदार झाला जालिमसिंह द्वारा रखी गई। राणा मदन सिंह ने 1838 में झालवाड़ को अपनी राजधानी बनाया और नये राज्य की स्थापना की। उसके द्वारा बनाया गया दुर्गनुमा महल दर्शनीय है। महलों का निर्माण कार्य राज राणा पृथ्वी सिंह के समय 1854 ई. में पूर्ण हुआ। आयताकार महल में प्रवेश हेतु तीन दरवाजे बनाये गये हैं। महल में बने रंगशालाएं, झरोखे, जनानी ड्यौढ़ी दरीखाना, सभागार एवं शीश महल दर्शनीय हैं। पांच मंजिला महल बाहर से आकर्षक एवं फतहपुर सीकरी के पंच महल जैसा नजर आता है। रंगशाला एवं शीश महल के सुन्दर जाली वाले झरोखे, अष्टदल कमल की, आकृति वाले पुष्प, आयाताकार कक्ष एवं बड़े-बड़े हॉल बने हैं। जनानी ड्योढ़ी महल कक्ष में एक गुप्त सुरंग मार्ग भी बनाया गया है। महल के कोनों पर अष्टकोणीय छतरियां बनाई गई हैं। महलों में बने भित्ति-चित्र कोटा-बूंदी शैली के चित्रों से मिलते-जुलते हैं। चित्रों में शासकों के चित्र, शाहजी जुलूस, दरबार, पर्वो,उत्सवों, नृत्य, रासलीला, चौबीस अवतार, शाही इन्द्र विमान की सवारी, वन्य-जीव एवं प्रकृति के साथ पक्षियों के चित्रों का चित्रांकन दर्शनीय है। 

संग्रहालय

महलों में स्थित राजकीय संग्रहालय में प्रमुख केन्द्रों, चन्द्रभागा नदी का तट, रंगपटन काकूनी, डग एवं रामगढ़ आदि स्थानों के पुरातात्विक महत्व के वास्तुखण्ड, देवी-देवताओं की मूर्तियों और शिलालेख, विशेष उल्लेखनीय चन्द्रभागा नदी के तट पर स्थित शिवालय का तिथियुक्त लेख प्रदर्शित किया गया हैं। मूर्तियों में संयुक्त मूर्तियों जैसे अर्द्धनारीश्वर-शिव एवं शक्ति का संयुक्त रूप, मार्तण्ड भैरव-शिव व सूर्य, हरिहर-शिव व विष्णु प्रमुख है। यों तो मध्यकालीन राजस्थान में इन स्वरूपों की बहुलता है पर हाड़ौती में सबसे अधिक। चूंकि यह शैव क्षेत्र था, इसलिए मठों के वास्तु खण्ड और शैवाचार्यो की अनेक मूर्तियां मिलती हैं। इन सबके विशाल संग्रह को यहां प्रदर्शित किया गया। तत्कालीन परम्परा के अनुसार कतिपय हस्त लिखित, चित्रित एवं अचित्रित ग्रन्थ, हाथ की बनी तस्वीरें और स्थानीय हस्तकोशल के उदाहरण भी प्रदर्शित किए गए। संग्रहालय में सिक्कों का बहुत अच्छा संग्रह है, जिसमें प्राचीन, मध्यकालीन और आधुनिक सिक्के सम्मिलित हैं। चित्रों को देखकर लगता है कि झालावाड़ में कोटा से अलग एक शैली विकसित हुई, इनकी रेखाओं में गति है, रंग तेज है और श्रृंगारिकता अधिक है। 

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भवानी नाट्यशाला

महल के समीप स्थित भवानी नाट्यशाला को देखकर हर कोई आश्चर्य करने लगता है। ओपेरा शैली में बनी यह रचना जटिल तकनीक एवं रंगमचीय व्यवस्था का अनूठा उदाहरण है। नाट्यशाला में मंच को ऊपर नीचे ले जाने एवं हाथी घोड़ों एवं रथों को मंच पर उतारने की अद्भुत व्यवस्था है। इन्हें ध्वनि एवं प्रकाश व्यवस्था से हवा में तैरता हुआ दिखाया जा सकता है। करीब 50 फुटे ऊँचे मंच के तलघर में 8 कक्ष बने हैं जिन्हें ग्रीन रूम के लिए उपयोग में लाया जाता है। प्रेक्षागृह तिमंजिला है जहां बैठने के लिए 36 कक्ष बने हैं। यहां प्रथम बार 16 जुलाई 1921 को अभिज्ञान शाकुन्तलम नाटक का प्रदर्शन किया गया। यहां स्वतंत्रता संग्राम के दौरान स्वतंत्रता की भावनाओं संबंधित नाटक खेले जाते थे। इस विचित्र नाट्यशाला का निर्माण राणा भवानी सिंह ने 1921 ई. में करवाया था।

चंद्रभागा मंदिर समूह

झालवाड़ के समीप झालरापाटन की चंद्रभागा नदी के किनारे अनेक प्राचीन कलात्मक मंदिर धर्म-संस्कृति एवं पुरातत्व की धरोहर दर्शनीय है। गुप्तकालीन महादेव का मंदिर प्रमुख है जिसके गर्भगृह की पट्टिका पर लकुलीश की सुन्दर लघुमूर्ति स्थापित है। मंदिर द्वार के नीचे दोनों ओर गंगा-यमुना की प्रतिमाएं हैं। यह मंदिर समूचे उत्तर भारत का कला की दृष्टि से सबसे अधिक अनोखा तथा राजस्थान का एक मात्र तिथियुक्त मंदिर है। यहां से प्राप्त अर्धनारीश्वर की प्रतिमा बेजोड़ है। प्रतिवर्ष कार्तिक पूर्णिमा पर यहां लगने वाले धार्मिक मेले का दृश्य अत्यंत मनोरम होता है।

झालरापाटन के समीप गोमती सागर की ओर एक रमणिक उद्यान एवं सड़क के दूसरी तरफ हर्बल उद्यान दर्शनीय हैं। गौमती सागर के किनारे नगर का प्रमुख द्वारिकाधीश मंदिर है। यहाँ का सूर्य मंदिर एवं जैन मंदिर भी दर्शनीय हैं। कोटा से 85 किमी दूर स्थित झालवाड़ जाने के लिए कोटा से रेल, बस एवं टैक्सी सुविधाएं उपलब्ध हैं। कोटा दिल्ली-मुम्बई बड़ी रेल लाइन का प्रमुख  रेलवे स्टेशन है।

डॉ. प्रभात कुमार सिंघल

लेखक एवं पत्रकार

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