भारतीय टीकों की बदौलत पड़ोसी देश भी कोरोना वायरस से लड़ पाएँगे

  •  डॉ. वेदप्रताप वैदिक
  •  जनवरी 22, 2021   11:34
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भारतीय टीकों की बदौलत पड़ोसी देश भी कोरोना वायरस से लड़ पाएँगे

भारतीयों टीकों का इस्तेमाल अपने पड़ोसी देशों में भी जमकर होगा। पाकिस्तान के अलावा दक्षेस के सभी राष्ट्र आस लगाए बैठे हैं कि भारतीय टीका उनका उद्धार करेगा। वह सस्ता भी है और उसे सहेजना भी आसान है। भारत इन पड़ोसी देशों को लगभग एक करोड़ टीके शीघ्र देने वाला है।

कोरोना टीकाकरण अभियान भारत में शुरू हो चुका है। यह अभियान नहीं, युद्ध है। युद्ध से भी बड़ी तैयारी इस अभियान के लिए भारत सरकार और हमारे वैज्ञानिकों की है। यह दुनिया का सबसे बड़ा टीकाकरण होगा। 30 करोड़ से ज्यादा लोगों को यह टीका जुलाई तक लगा दिया जाएगा। 30 करोड़ से ज्यादा जनसंख्या वाले देश भारत के अलावा सारी दुनिया में सिर्फ दो हैं- अमेरिका और चीन, लेकिन इन दोनों के मुकाबले भारत में कोरोना काफी कम फैला है, क्योंकि भारत के खान-पान में ही जबर्दस्त रोग-प्रतिरोधक क्षमता है। कोरोना से युद्ध में भारत को इसलिए भी गर्व होना चाहिए कि सबसे पहले वह अपने उन 3 करोड़ लोगों को यह टीका मुफ्त लगा रहा है, जो स्वास्थ्य और सेवाकर्मी हैं और उनमें से कइयों ने जन-सेवा करते हुए अपना बलिदान किया है।

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यों तो अलग-अलग संक्रामक बीमारियों के लिए टीके बनाने में भारत दुनिया का सबसे अग्रगण्य राष्ट्र है लेकिन आजकल बने उसके दो टीकों पर तरह-तरह के संदेह किए जा रहे हैं और उन्हें लेकर राजनीतिक फुटबाल भी खेला जा रहा है। यदि विपक्षी नेता इन दो भारतीयों टीकों- कोवेक्सीन और कोविशील्ड की प्रामाणिकता पर संदेह न करें तो वे विपक्षी ही क्या हुए? उनका संदेह लाभप्रद है। वह सरकार और वैज्ञानिकों को अधिक सावधान बनाएगा। पिछले तीन दिनों में चार लाख लोगों को ये टीक लगा दिए गए हैं। मुश्किल से 500 लोगों को थोड़ी-बहुत तकलीफ हुई है। वह भी अपने आप ठीक हो गई है। चार-पांच लोगों के मरने की खबर भी है लेकिन डॉक्टरों का कहना है कि उसका कारण टीका नहीं है। वे लोग पहले से ही गंभीर रोगों से ग्रस्त थे।

लेकिन अफवाहें आग की तरह फैलती हैं। टीकाकरण के तीसरे दिन टीका लगाने वालों की संख्या काफी घट गई है। यह ठीक नहीं है। यदि टीके की प्रामाणिकता संदेहास्पद होती तो आप ही बताइए कि ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस के निदेशक को क्या इसका पता नहीं होता ? उन्होंने आगे होकर यह टीका पहले ही दिन क्यों लगवाया ? नीति आयोग के सदस्य (स्वास्थ्य) और पुणे के सीरम इंस्टीट्यूट के कर्ता-धर्ता ने पहले ही दिन टीका लगवाया, यह किस बात का प्रमाण है ? क्या यह इसका प्रमाण नहीं है कि देश के सर्वोच्च स्वास्थ्यकर्मियों ने अपने आपको टीके की कसौटी पर कस कर दिखा दिया ?

कुछ विपक्षी नेता पूछते हैं कि यह टीका राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री ने सबसे पहले क्यों नहीं लगवाया ? मेरी अपनी राय थी कि वे यदि सबसे पहले लगवाते तो देश के करोड़ों लोगों को प्रेरणा मिलती, जैसे कि अमेरिका के नेता जो बाइडन, पोप और ब्रिटेन की महारानी ने लगाया था लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह विचार भी तर्कसंगत है कि नेताओं की बारी बाद में आएगी, पहले स्वास्थ्यकर्मियों को मौका मिलना चाहिए। किसी भी बात का फायदा उठाने में नेतागण हमेशा सबके आगे रहते हैं, इस दृष्टि से मोदी की सोच ठीक है लेकिन सिर्फ वे स्वयं और राष्ट्रपति टीका सबसे पहले लेते तो देश के करोड़ों लोगों के मन में इस टीके के प्रति उत्साह जागृत हो जाता। इसके लिए अभी भी मौका है।

वैसे स्वास्थ्यकर्मियों के बाद यदि नेताओं को यह टीका लगे तो वह इस दृष्टि से उचित होगा कि नेता लोग सबसे अधिक जन-सम्पर्क में रहते हैं। उन्हें कोरोना का शिकार होने में देर नहीं लगती। इसके अलावा देश की पंचायतें, नगर निगम, विधानसभाएँ और संसद का जो काम ढीला पड़ गया है, उसमें भी गति आ जाएगी। यदि कृषि-कानूनों पर संसद लंबी बहस करती तो क्या सरकार को इस किसान आंदोलन के दिन देखने पड़ते ?

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सरकार के सामने यह भी बड़ा प्रश्न है कि 140 करोड़ लोगों में अब सबसे पहले किन-किन लोगों को यह टीका दिया जाए? स्वास्थ्यकर्मियों के बाद अब यह टीका उन लोगों को दिया जाएगा, जिनकी उम्र 50 साल से ज्यादा है, क्योंकि उन्हें कोरोना का खतरा ज्यादा होता है। यदि इन लोगों को यह टीका मुफ्त या कम कीमत पर दिया जाए तो ज्यादा अच्छा है, क्योंकि इस वर्ग में मजदूर, किसान, ग्रामीण और गरीब लोगों की संख्या ज्यादा है। यों भी ये भारतीय टीके दुनिया के सबसे सस्ते टीके हैं। विदेशी टीकों की कीमत 5 से 10 हजार रु. तक है जबकि हमारे टीके दो सौ से तीन सौ रु. तक में ही मिल जाएंगे। सरकार चाहे तो इन्हीं टीकों को निजी अस्पतालों को हजार-डेढ़ हजार रु. में बेचकर उस पैसे का इस्तेमाल मुफ्त टीके बांटने में कर सकती है। 

वैसे भी पिछले दो-तीन हफ्तों में देश के लगभग सभी प्रदेशों से उत्साहजनक खबरें आ रही हैं। जिन अस्पतालों में इस महामारी के मरीजों के लिए विशेष बिस्तर लगवाए गए थे, वे अब खाली पड़े रहते हैं। जो निजी डॉक्टर और नर्सें पहले अपने अस्पतालों में आने से घबराते थे, वे अब आने लगे हैं। अब स्कूल-कॉलेज भी खुलने लगे हैं। सड़कों और बाजा़रों में भी चहल-पहल बढ़ गई है। हो सकता है कि भारत का काम 30 करोड़ टीकों से ही चल जाए। 

इन भारतीयों टीकों का इस्तेमाल अपने पड़ौसी देशों में भी जमकर होगा। पाकिस्तान के अलावा दक्षेस के सभी राष्ट्र आस लगाए बैठे हैं कि भारतीय टीका उनका उद्धार करेगा। वह सस्ता भी है और उसे सहेजना भी आसान है। भारत इन पड़ौसी देशों को लगभग एक करोड़ टीके शीघ्र देने वाला है। भारत के इन दोनों टीकों ने दुनिया में धूम मचा दी है। दक्षिण अफ्रीका और ब्राजील भी इन्हें मंगा रहे हैं। कोई आश्चर्य नहीं कि पाकिस्तान भी एक-दो दिन में इसकी मांग करने लगे। यह भी हो सकता है कि वह काबुल या दुबई से होकर इन्हें मंगवा ले। कोरोना का यह टीका दुनिया में भारत की छवि को चमकाए बिना नहीं रहेगा।

कोरोना-युद्ध में भारत सबसे बड़ी विश्वशक्ति बनकर उभरेगा। उसके आम लोगों की सावधानियां, उसकी भोजन-पद्धति, उसके आयुर्वेदिक काढ़े, उसके टीके और उसके स्वास्थ्य-कर्मियों की साहसिक सेवाओं ने कोरोना महामारी को मात देने की पूरी तैयारी कर रखी है।

-डॉ. वेदप्रताप वैदिक







महिला सशक्तिकरण की बातें ही ज्यादा होती हैं, हकीकत में महिलाएं आज भी संघर्षरत हैं

  •  रमेश सर्राफ धमोरा
  •  मार्च 8, 2021   12:46
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महिला सशक्तिकरण की बातें ही ज्यादा होती हैं, हकीकत में महिलाएं आज भी संघर्षरत हैं

वर्तमान दौर में महिलाओं ने अपनी ताकत को पहचान कर काफी हद तक अपने अधिकारों के लिए लड़ना भी सीख लिया है। अब महिलाओं ने इस बात को अच्छी तरह जान लिया है कि वे एक-दूसरे की सहयोगी हैं। महिलाओं का काम अब केवल घर चलाने तक ही सीमित नहीं है।

महिलाओं के प्रति सम्मान प्रकट करने के लिये हर वर्ष 8 मार्च को विश्व भर में अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जाता है। हमारे देश की महिलायें आज हर क्षेत्र में पुरूषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम कर अपनी ताकत का अहसास करवा रही हैं। भारत में रहने वाली महिलाओं के लिये इस वर्ष का महिला दिवस कई नई सौगातें लेकर आया है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी महिलाओं के अधिकार को बढ़ावा और सुरक्षा देने के लिए दुनियाभर में कुछ मापदंड निर्धारित किए हैं।

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महिलाओं के लिये अच्छी खबर यह है कि लोकसभा में महिला सांसदों की संख्या बढ़कर 78 हो गयी है जो अब तक की सबसे ज्यादा है। सेना में महिलाओं को स्थाई कमीशन मिलने से अब सेना में महिलायें भी पुरुषों के समान पदों पर काम कर पायेंगी। इससे महिलाओं का मनोबल बढ़ेगा। उनके आगे बढ़ने का मार्ग प्रशस्त होगा।

स्वतंत्रता प्राप्ति के 74 वर्ष बाद भी भारत में 70 प्रतिशत महिलाएं अकुशल कार्यों में लगी हैं। जिस कारण उनको काम के बदले कम मजदूरी मिलती है। पुरुषों की तुलना में महिलाएं औसतन हर दिन छः घण्टे ज्यादा काम करती हैं। चूल्हा-चौका, खाना बनाना, सफाई करना, बच्चों का पालन पोषण करना तो महिलाओं के कुछ ऐसे कार्य हैं जिनकी कहीं गणना ही नहीं होती है। दुनिया में काम के घण्टों में 60 प्रतिशत से भी अधिक का योगदान महिलाएं करती हैं। जबकि उनका संपत्ति पर मात्र एक प्रतिशत ही मालिकाना हक है।

वर्तमान दौर में महिलाओं ने अपनी ताकत को पहचान कर काफी हद तक अपने अधिकारों के लिए लड़ना भी सीख लिया है। अब महिलाओं ने इस बात को अच्छी तरह जान लिया है कि वे एक-दूसरे की सहयोगी हैं। महिलाओं का काम अब केवल घर चलाने तक ही सीमित नहीं है। बल्कि वे हर क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज करवा रही हैं। परिवार हो या व्यवसाय, महिलाओं ने साबित कर दिखाया है कि वे हर काम करके दिखा सकती हैं जिसमें अभी तब सिर्फ पुरुषों का ही वर्चस्व माना जाता था। शिक्षित होने के साथ ही महिलाओं की समझ में वृद्धि हुयी है। अब उनमें खुद को आत्मनिर्भर बनाने की सोच पनपने लगी है। महिलाओं ने अपने पर विश्वास करना सीखा है और घर के बाहर की दुनिया को जीतने का सपना सच करने की दिशा में कदम बढ़ाने लगी है।

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सरकार ने महिलाओं के लिए नियम-कायदे और कानून तो बहुत सारे बना रखे हैं किन्तु उन पर हिंसा और अत्याचार के आंकड़ों में अभी तक कोई कमी नहीं आई है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार भारत में 15 से 49 वर्ष की उम्र वाली 70 फीसदी महिलाएं किसी न किसी रूप में कभी न कभी हिंसा का शिकार होती हैं। इनमें कामकाजी व घरेलू महिलायें भी शामिल हैं। देशभर में महिलाओं पर होने वाले अत्याचार के लगभग डेढ़ लाख मामले सालाना दर्ज किए जाते हैं। जबकि इसके कई गुणा अधिक मामले दबकर रह जाते हैं।

घरेलू हिंसा अधिनियम देश का पहला ऐसा कानून है जो महिलाओं को उनके घर में सम्मानपूर्वक रहने का अधिकार सुनिश्चित करता है। इस कानून में महिलाओं को सिर्फ शारीरिक हिंसा से ही नहीं बल्कि मानसिक, आर्थिक एवं यौन हिंसा से बचाव करने का अधिकार भी शामिल है। भारत में लिंगानुपात की स्थिति भी अच्छी नहीं मानी जा सकती है। लिंगानुपात के वैश्विक औसत 990 के मुकाबले भारत में 941 ही हैं। हमें भारत में लिंगानुपात सुधारने की दिशा में विशेष काम करना होगा ताकि लिंगानुपात की खराब स्थिति को बेहतर बनाया जा सके।

दुख की बात यह है कि नारी सशक्तिकरण की बातें और योजनाएं केवल शहरों तक ही सिमटकर रह गई हैं। एक ओर शहरों में रहने वाली महिलाएं शिक्षित, आर्थिक रूप से स्वतंत्र हैं जो पुरुषों के अत्याचारों का मुकाबला करने में सक्षम हैं। वहीं दूसरी तरफ गांवों में रहने वाली महिलाओं को तो अपने अधिकारों का भी पूरा ज्ञान नहीं है। वे चुपचाप अत्याचारों को सहती रहती हैं और सामाजिक बंधनों में इस कदर जकड़ी हैं कि वहां से निकल नहीं सकती हैं।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार पिछले कुछ वर्षों में महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामले दोगुने से भी अधिक हुए हैं। पिछले दशक के आंकड़ों के मुताबिक भारत में हर घंटे महिलाओं के खिलाफ अपराध के 26 मामले दर्ज होते हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार महिलाओं के प्रति की जाने वाली क्रूरता में वृद्धि हुई है।

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कहने को तो सम्पूर्ण विश्व की महिलाएं एकजुट होकर महिला दिवस मनाती हैं। मगर हकीकत में यह सब बातें सरकारी दावों व कागजों तक ही सिमट कर रह जाती हैं। देश की अधिकांश महिलाओं को तो आज भी इस बात का पता नहीं है कि महिला दिवस का मतलब क्या होता है। महिला दिवस कब आता है कब चला जाता है। भारत में अधिकतर महिलायें अपने घर-परिवार में इतनी उलझी होती हैं कि उन्हें बाहरी दुनिया से मतलब ही नहीं होता है। लेकिन इस स्थिति को बदलने का बीड़ा महिलाओं को स्वयं उठाना होगा। जब तक महिलायें स्वयं अपने सामाजिक स्तर व आर्थिक स्थिति में सुधार नहीं करेंगी तब तक समाज में उनका स्थान गौण ही रहेगा।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान का जरूर कुछ असर दिखने लगा है। इस अभियान से अब देश में महिलाओं के प्रति सम्मान बढ़ने लगा है। जो इस बात का अहसास करवाता है कि आने वाले समय में महिलाओं के प्रति समाज का नजरिया सकारात्मक होने वाला होगा। विकसित देशों की तुलना में हमारे देश में महिलाओं की स्थिति अपेक्षाकृत अच्छी नहीं है। आज भी महाराष्ट्र के बीड़, गुजरात के सूरत, भुज में घटने वाली महिला उत्पीड़न की घटनायें सभ्य समाज पर एक बदनुमा दाग लगा जाती हैं।

देश में आज भी सबसे ज्यादा उत्पीड़न महिलाओं का ही होता है। आये दिन महिलाओं के साथ बलात्कार, हत्या, प्रताड़ना की घटनाओं से समाचार पत्रों के पन्ने भरे रहते हैं। महिलाओं के साथ आज के युग में भी दोयम दर्जे का व्यवहार किया जाता है। बाल विवाह की घटनाओं पर पूर्णतया रोक ना लग पाना एक तरह से महिलाओं का उत्पीड़न ही है। कम उम्र में शादी व कम उम्र में मां बनने से लड़की का पूर्ण रूपेण शारीरिक व मानसिक विकास नहीं हो पाता है। आज हम बेटा बेटी एक समान की बातें तो करते हैं मगर बेटी होते ही उसके पिता को बेटी की शादी की चिंता सताने लग जाती है। समाज में जब तक दहेज लेने व देने की प्रवृत्ति नहीं बदलेगी तब तक कोई भी बाप बेटी पैदा होने पर सच्चे मन से खुशी नहीं मना सकता है।

महिला दिवस पर देश भर में अनेकों स्थान पर कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। मगर अगले ही दिन उन सभी बातों को भुला दिया जाता है। समाज में अभी पुरुषवादी मानसिकता मिट नहीं पायी है। समाज में अपने अधिकारों एवं सम्मान पाने के लिए अब महिलाओं को स्वयं आगे बढ़ना होगा। देश में जब तक महिलाओं का सामाजिक, वैचारिक एवं पारिवारिक तौर पर उत्थान नहीं होगा तब तक महिला सशक्तिकरण की बातें करना बेमानी होगा।

-रमेश सर्राफ धमोरा

(लेखक अधिस्वीकृत स्वतंत्र पत्रकार हैं। इनके लेख देश के विभिन्न समाचार पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते हैं।)







यूपी चुनाव से पहले कांग्रेस और सपा ही सक्रिय नजर आ रही हैं, बसपा की चुप्पी का राज क्या है?

  •  अजय कुमार
  •  मार्च 6, 2021   15:54
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यूपी चुनाव से पहले कांग्रेस और सपा ही सक्रिय नजर आ रही हैं, बसपा की चुप्पी का राज क्या है?

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का दलित वोटर मायावती के साथ और पिछड़ा एवं मुस्लिम वोटर समाजवादी खेमे में चला गया। बनिया-ब्राह्मणों तथा अन्य अगड़ी जातियों ने बीजेपी का दामन थाम लिया, तभी से कांग्रेस का ग्राफ गिरता गया।

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अब साल भर का समय बचा है। सभी राजनैतिक पार्टियां एड़ी-चोटी का जोर लगाए हुए हैं। हाल यह है कि प्रदेश की सियासत दो हिस्सों में बंट गई है। एक तरफ योगी के नेतृत्व में बीजेपी आलाकमान अपनी सत्ता को बचाए रखने के लिए हाथ-पैर मार रहा है तो दूसरी ओर कांग्रेस एवं समाजवादी पार्टी 'साम-दाम-दंड-भेद’ के तहत किसी भी तरह से योगी सरकार को सत्ता से बेदखल कर देना चाहती हैं। इसके लिए इन दलों द्वारा प्रदेश की जनता के बीच योगी सरकार के खिलाफ बेचैनी का माहौल पैदा करने का प्रयास किया जा रहा है। सपा-कांग्रेस द्वारा प्रदेश में घटने वाली हर छोटी-बड़ी घटना को साम्प्रदायिक और जातिवाद के रंग में रंगने की साजिश रची जा रही है। कभी योगी सरकार को ब्राह्मण विरोधी तो कभी महिला, दलित विरोधी करार दिया जाता है। 

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खैर, कांग्रेस तो पिछले तीन दशकों से अधिक समय से यूपी में हाशिये पर पड़ी है। इसलिए बीजेपी नेताओं के पास उसकी सरकार के खिलाफ बोलने को कुछ अधिक नहीं है। यह और बात है कि यूपी में जब तक कांग्रेस की सरकार रही, तब कांग्रेस कैसे सत्ता चलाती थी, किसी से छिपा नहीं था। कांग्रेस की पूरी सियासत जातिवादी राजनीति के इर्दगिर्द घूमती रहती थी। दिल्ली में बैठे गांधी परिवार के हाथ में यूपी के मुख्यमंत्री का रिमोट रहता था। 

      

यूपी में 32 वर्षों से सत्ता के केन्द्र में आने के लिए संघर्षरत कांग्रेस पार्टी का बुरा दौर 1989 के बाद शुरू हो गया था। इसकी वजह थी, अयोध्या का रामजन्म भूमि विवाद, जिसको लेकर बीजेपी हिन्दुत्व को भुनाने में जुटी हुई थी लेकिन कांग्रेसी दोनों हाथों में लड्डू चाहते थे। इसके चलते कांग्रेस न इधर की रही, न उधर की रही। इस दौरान कांग्रेस के नेताओं की लंबी फेहरिस्त भी जातीय राजनीति का शिकार होने से अपने आप को बचा नहीं पाई थी। नतीजा, एक के बाद चुनाव हारते और गिरते प्रदर्शन से यूपी कांग्रेस हाशिए पर चली गई। अगर कहा जाये कि केन्द्र में बदलती सरकारों के समीकरण का सबसे ज्यादा असर यूपी कांग्रेस पर पड़ा तो कोई गलत नहीं होगा। जब-जब केन्द्र की राजनीति ने करवट ली, प्रदेश की राजनीति भी विकास के वादे से दूर जातिवादी राजनीति पर आकर टिक गई। 

   

यह सच है कि यूपी में कांग्रेस को खड़ा करने के लिए दिल्ली कांग्रेस नेतृत्व ने प्रदेश को कई कैडर के नेता दिए, इसमें महावीर प्रसाद, सलमान खुर्शीद, श्रीप्रकाश जायसवाल, निर्मल खत्री, राज बब्बर जैसे नाम शामिल थे। लेकिन स्थानीय और क्षेत्रीय समीकरणों में फिट न बैठ पाने की वजह से एक के बाद एक कांग्रेस अध्यक्ष पार्टी की दशा सुधारने की बजाए बारी-बारी से अध्यक्ष की कुर्सी को शोभायमान कर चले गए। कांग्रेस का प्रदर्शन लगातार गिरता चला गया। यहां तक कि यूपी में प्रियंका वाड्रा से पूर्व तीन बार यूपी कांग्रेस के प्रभारी की जिम्मेदारी संभाल चुके गुलाम नबी आजाद भी कोई कमाल न दिखा सके और उन्हें भी वापस जाना पड़ा। प्रदेश में एनडी तिवारी कांग्रेस के अंतिम मुख्यमंत्री साबित हुए थे। उसके बाद समाजवादी जनता दल से मुलायम सिंह यादव की प्रदेश में सरकार बनी थी।

इस बारे में राजनीति के जानकार कहते हैं कि देश में क्षेत्रीय क्षत्रपों के पनपने के बाद देश हो या प्रदेश, हर जगह जातिवादी राजनीति का बोलबाला बढ़ने लगा। यूपी के परिप्रेक्ष्य में अगर देखें तो यहां मुलायम और मायावती जैसे नेताओं ने जाति आधारित राजनीति को काफी तेजी से आगे बढ़ाया। इसी वजह से कांग्रेस का दलित वोटर मायावती के साथ और पिछड़ा एवं मुस्लिम वोटर समाजवादी खेमे में चला गया। बनिया-ब्राह्मणों तथा अन्य अगड़ी जातियों ने बीजेपी का दामन थाम लिया, तभी से कांग्रेस का ग्राफ गिरता गया। 1989 के बाद के समीकरणों को गौर से देखें तो अलग-अलग नेताओं के अलग-अलग जाति का प्रतिनिधित्व करने से केन्द्र व प्रदेश दोनों की राजनीति प्रभावित हुई। गौर से देखें तो जातिवादी राजनीति में खास जाति का प्रभुत्व सरकार का प्रतिनिधित्व करता नजर आयेगा। इस लहर में कांग्रेस के लीडर एक के बाद एक धराशायी हो गए। न पहले सोनिया गांधी इस गिरावट को रोक पाईं, न अब राहुल-प्रियंका कुछ कर पा रहे हैं।

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बात समाजवादी पार्टी की कि जाए तो पिछले दो चुनावों (2014 के लोकसभा और 2017 के विधान सभा चुनाव) में उसका भी हाल बुरा ही रहा। बात सपा की कि जाए तो 2013 में उसके राज में हुए मुजफ्फरनगर दंगों ने 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को बढ़त बनाने का मौका दिया तो 2017 में सत्ता विरोधी लहर और प्रदेश में जंगलराज जैसे हालात के चलते अखिलेश को सत्ता से बेदखल होना पड़ गया। फिर भी 2022 के विधान सभा चुनाव को लेकर सपा प्रमुख अखिलेश यादव के हौसले बुलंद हैं तो इसका कारण उप-चुनावों में समाजवादी पार्टी का अच्छा प्रदर्शन है। क्योंकि उप-चुनावों में समाजवादी पार्टी को जीत का स्वाद भले कम मिला हो, लेकिन समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी ही भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशियों को टक्कर देते नजर आए। इतना ही नहीं अखिलेश के कार्यक्रमों में भीड़ भी जुट रही है। इससे भी अखिलेश गद्गद् हैं।   

       

बात बसपा सुप्रीमो मायावती की कि जाए तो अगले वर्ष होने वाले विधान सभा चुनाव को लेकर उनकी सुस्ती किसी के समझ में नहीं आ रही है। लम्बे समय से वह कहीं दिखाई नहीं दे रही हैं। योगी सरकार को घेरने के लिए भी वह ज्यादा रूचि नहीं दिखाती हैं। हाँ, जनवरी में अपने 65वें जन्मदिन पर जरूर उन्होंने उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान कर सबको चौंका दिया था। वैसे भी मायावती का यही मानना है कि हमें गठबंधन से नुकसान होता है। मायावती ने दावा भी किया था कि आगामी चुनाव में बहुजन समाज पार्टी की जीत तय है, लेकिन जो हालात नजर आ रहे हैं उससे तो यही लगता है कि मायावती विधानसभा चुनाव को लेकर ज्यादा उत्साहित नहीं हैं। बसपा ने अभी तक तमाम विधानसभा सीटों के लिए प्रभारी तक नहीं नियुक्त किए हैं।

उल्लेखनीय है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में सपा और बसपा ने हाथ मिलाया था। 2014 के चुनाव में एक भी सीट नहीं जीतने वाली बसपा ने तब 10 सीटों पर जीत दर्ज की थी, वहीं सपा 2014 की ही तरह 2019 में भी 5 सीट पर सिमट कर रह गई थी। आश्चर्य की बात यह है कि मायावती कभी बीजेपी को चुनौती देती नजर आती हैं तो कभी वह बीजेपी के कामों की तारीफ करने लगती हैं या फिर तमाम मौकों पर चुप्पी साध लेती हैं। इसी के चलते राजनैतिक पंडित भी मायावती की भविष्य की राजनीति को समझ नहीं पा रहे हैं।

-अजय कुमार







कांग्रेस के हाथ में डंडा तो धर्मनिरपेक्षता का लेकिन उस पर झंडा सांप्रदायिकता का है

  •  डॉ. वेदप्रताप वैदिक
  •  मार्च 5, 2021   12:10
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कांग्रेस के हाथ में डंडा तो धर्मनिरपेक्षता का लेकिन उस पर झंडा सांप्रदायिकता का है

बंगाल में अब्बास सिद्दिकी के ‘इंडियन सेक्युलर फ्रंट’, असम में बदरूद्दीन अजमल के ‘ऑल इंडिया यूनाइटेड फ्रंट’ और केरल में ‘वेलफेयर पार्टी’ से कांग्रेस ने गठबंधन किसलिए किया है, इसीलिए कि जहां इन पार्टियों के उम्मीदवार न हों, वहां मुस्लिम वोट कांग्रेस को सेंत-मेंत में मिल जाएं।

कांग्रेस पार्टी आजकल वैचारिक अधःपतन की मिसाल बनती जा रही है। नेहरू की जिस कांग्रेस ने पंथ-निरपेक्षता का झंडा देश में पहराया था, उसी कांग्रेस के हाथ में आज डंडा तो पंथ-निरपेक्षता का है लेकिन उस पर झंडा सांप्रदायिकता का लहरा रहा है। सांप्रदायिकता भी कैसी ? हर प्रकार की। उल्टी भी, सीधी भी। जिससे भी वोट खिंच सकें, उसी तरह की। भाजपा भाई-भाई पार्टी बन गई है, वैसे ही कांग्रेस भी भाई-बहन पार्टी बन गई है। भाई-बहन को लगा कि भाजपा देश में इसलिए दनदना रही है कि वह हिंदू सांप्रदायिकता को हवा दे रही है तो उन्होंने भी हिंदू मंदिरों, तीर्थों, पवित्र नदियों और साधु-संन्यासियों के आश्रमों के चक्कर लगाने शुरू कर दिए लेकिन उसका भी जब कोई ठोस असर नहीं दिखा तो अब उन्होंने बंगाल, असम और केरल की मुस्लिम पार्टियों से हाथ मिलाना शुरू कर दिया।

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बंगाल में अब्बास सिद्दिकी के ‘इंडियन सेक्युलर फ्रंट’, असम में बदरूद्दीन अजमल के ‘ऑल इंडिया यूनाइटेड फ्रंट’ और केरल में ‘वेलफेयर पार्टी’ से कांग्रेस ने गठबंधन किसलिए किया है, इसीलिए कि जहां इन पार्टियों के उम्मीदवार न हों, वहां मुस्लिम वोट कांग्रेस को सेंत-मेंत में मिल जाएं। क्या इन वोटों से कांग्रेस चुनाव जीत सकती है ? नहीं, बिल्कुल नहीं। लेकिन फिर ऐसे सिद्धांतविरोधी समझौते कांग्रेस ने क्यों किए हैं ? इसीलिए की इन सभी राज्यों में उसका जनाधार खिसक चुका है। अतः जो भी वोट, वह जैसे भी कबाड़ सके, वही गनीमत है। इन पार्टियों के साथ हुए कांग्रेसी गठबंधन को मैंने ठग-बंधन का नाम दिया है, क्योंकि ऐसा करके कांग्रेस अपने कार्यकर्ताओं को तो ठग ही रही है, वह इन मुस्लिम वोटरों को भी ठगने का काम कर रही है।

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कांग्रेस को वोट देकर इन प्रदेशों के मुस्लिम मतदाता सत्ता से काफी दूर छिटक जाएंगे। कांग्रेस की हार सुनिश्चित है। यदि ये ही मुस्लिम मतदाता अन्य गैर-भाजपा पार्टियां के साथ टिके रहते तो या तो वे किसी सत्तारुढ़ पार्टी के साथ होते या उसी प्रदेश की प्रभावशाली विरोधी पार्टी का संरक्षण उन्हें मिलता। कांग्रेस के इस पैंतरे का विरोध आनंद शर्मा जैसे वरिष्ठ नेता ने दो-टूक शब्दों में किया है। कांग्रेस यों तो अखिल भारतीय पार्टी है लेकिन उसकी नीतियों में अखिल भारतीयता कहां है ? वह बंगाल में जिस कम्युनिस्ट पार्टी के साथ है, केरल में उसी के खिलाफ लड़ रही है। महाराष्ट्र में वह घनघोर हिंदूवादी शिवसेना के साथ सरकार में है और तीनों प्रांतों में वह मुस्लिम संस्थाओं के साथ गठबंधन में है। दूसरे शब्दों में कांग्रेस किसी भी कीमत पर अपनी जान बचाने में लगी हुई है। मरता, क्या नहीं करता ?

-डॉ. वेदप्रताप वैदिक







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