एक साल में कैसे रहे मोदी सरकार के राज्य सरकारों से संबंध

एक साल में कैसे रहे मोदी सरकार के राज्य सरकारों से संबंध

बीजेपी शासित राज्यों की बात करें तो हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, गुजरात, गोवा, उत्तर प्रदेश, असम, अरूणाचल प्रदेश, कर्नाटक में भाजपा अपने दम पर सत्ता में जबकि बिहार, तमिलनाडु और पूर्वोत्तर के कुछ राज्यों में अपने सहयोगियों के साथ शासन व्यवस्था में बनी हुई है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में बीजेपी को दूसरी बार केंद्र की सत्ता पर काबिज हुए एक साल होने जा रहे हैं। मोदी के नेतृत्व में बीजेपी ने 2019 के मई के महीने में 303 लोकसभा सीटों के साथ सत्ता में वापसी की। इस ऐतिहासिक जनादेश के साथ बुलंद हौसलों को साक्षी मान मोदी सरकार ने अपने वादे-इरादे पूरे करने की कोशिश में लगी है। बीजेपी के बुलंद हौसले को लोकसभा चुनाव से इतर अन्य परिणामों में आंकने की कोशिश करें तो प्रतीत होगा की कैसे बीजेपी ने विधानसभा चुनाव में हारी हुई दो राज्यों की बाजी को अपने नाम करने में कामयाब रही। आत्मविश्वास से लबरेज बीजेपी ने कांग्रेस के हाथों से दो राज्यों की सत्ता छीन ली।

वैसे तो भारत में संघीय सरकार के ढांचे को आत्मसात किया गया। भारत कई राज्यों का संघ है और इसी सिद्धांत के आधार पर संघीय सरकार का मॉडल यहां पर विकसित हुआ। राज्य स्तर पर राजनीतिक विकास के चलते संघवाद सशक्त हुआ, जो संघीय शासन व्यवस्था की एक खूबसूरती है। भारत में 28 राज्य और 9 केंद्रशासित प्रदेश हैं जहां जनता द्वारा चुनी हुई, लोकतांत्रिक सरकारें काम करती है। केंद्र के अलावा राज्यों में एक साथ अलग-अगल दलों की सरकारें आती और जाती रहती हैं पर व्यवस्था एक ही रहती है। फिलहाल केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा की सरकार है तो राज्यों में विभिन्न दलों की नेतृत्व वाली सरकारें काम कर रही हैं। हमारे यहां बहुत बड़ी परंपरा रही है वाद, विवाद और संवाद की। संवाद चाहे सरकार की बात हो या विपक्ष की या केंद्र और राज्यों के बीच। चुनावी फायदे और नुकसान को देखते हुए विपक्ष के नेतृत्व वाली सरकारें केंद्र सरकार पर आरोप भी लगाती हैं तो समय-समय पर केंद्र सरकार पर अपनी पार्टी की सरकार के प्रति ज्यादा झुकाव के आरोप भी लगते हैं। 

बीजेपी शासित राज्यों की बात करें तो हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, गुजरात, गोवा, उत्तर प्रदेश, असम, अरूणाचल प्रदेश, कर्नाटक में भाजपा अपने दम पर सत्ता में जबकि बिहार, तमिलनाडु और पूर्वोत्तर के कुछ राज्यों में अपने सहयोगियों के साथ शासन व्यवस्था में बनी हुई है। सबसे पहले बात भाजपा शासित राज्यों की करें तो यहां केंद्र और राज्य सरकार के बीच सबकुछ सामान्य दिखता है। 

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कर्नाटक में कुमारस्वामी को दी मात

लोकसभा चुनाव जीतने के बाद बीजेपी ने सबसे पहले कर्नाटक के सियासी रणभूमि में सफलता पाई। कर्नाटक में 14 महीने से चल रहे सियासी ड्रामे का अंतिम सीन भी बेहद नाटकीय और हंगामे से भरा रहा। इसमें सीएम एचडी कुमारस्वामी का भावुक भाषण था, कांग्रेस का बागियों के प्रति गुस्सा दिखा और स्पीकर केआर रमेश कुमार की बेचारगी भी दिखी। मई 2018 को सबसे कम सीट (37) पाने वाली जेडीएस पार्टी के कुमारस्वामी दूसरी सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस (78) की मदद से मुख्यमंत्री पद बने और सबसे बड़ी पार्टी (104) बनकर भी भाजपा प्रमुख विपक्षी दल बन कर कर्नाटक में रही, लेकिन 23 जुलाई 2019 को उनकी सरकार भी सत्ता से बाहर हो गई।

15 महीने के बाद कमलनाथ का तख्तापलट

मध्य प्रदेश जैसे महत्वपूर्ण हिन्दी पट्टी के राज्य को बहुत ही नजदीकी अंतर से गंवाने के बाद बीजेपी लगातार इस पर मंथन कर रही थी। विधानसभा चुनाव 2018 में बीजेपी शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में मैदान में उतरी थी और कांग्रेस ने कमलनाथ की अगुवाई में चुनाव लड़ा था। प्रदेश की 230 विधानसभा सीटों में से कांग्रेस ने 114, बीजेपी ने 109, बसपा ने 2, सपा ने 1 और चार निर्दलीय जीते थे। कमलनाथ ने सपा, बसपा और निर्दलीय विधायकों के समर्थन से सरकार बनाई थी।बीजेपी 15 महीने के बाद मध्य प्रदेश में ऑपरेशन लोटस के जरिए कमलनाथ की सत्ता छीनने में कामयाब रही।

राजस्थान, छत्तीसगढ़, पंजाब

कांग्रेस शासित राज्यों की बात करें तो देश की सबसे पुरानी पार्टी और बीजेपी की मुखर आलोचक कांग्रेस  छत्तीसगढ़, राजस्थान, पंजाब और पुडुचेरी में कांग्रेस की सरकारें हैं। राज्य के मुख्यमंत्री हों या फिर मंत्री, सभी के निशाने पर केंद्र की भाजपा सरकार ही रहती है। कभी-कभी ऐसा लगता है कि यहां कि सरकारें संघीय ढांचों को कम महत्व देकर पार्टी लाइन को ज्यादा महत्व देती हैं। 

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महाराष्ट्र और बंगाल में तकरार सबसे ज्यादा

बीते एक बरस में केंद्र की मोदी सरकार पर सबसे ज्यादा हमलावर रहीं पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी। पश्चिम बंगाल में टीएमसी की सरकार है। ममता बनर्जी केंद्र सरकार की विभिन्न योजनाओं पर तो सवाल उठाती ही रहीं साथ ही ध्रुविकरण की राजनीति का आरोप लगाती रहीं। दरअसल, इस सारे जंग की पटकथा लोकसभा चुनाव के दौरान ही लिखी गई। जब पहले तो सूबे में सेंध लगाने के बीजेपी के इरादों पर ममता जमकर मुखर नजर आई और पीएम मोदी को थप्पड़ तक जड़ने की बात करती दिखीं। लेकिन साल 2019 के चुनाव में जनता की ममता बीजेपी पर जमकर बरसने के बाद उसके सीटें बढ़कर 2 से 17 हो गई। जिसके बाद से ही बीजेपी को बंगाल में नई संभावनाओं के खुलते द्वार दिखाए देने लगे हैं। जिसका असर लगातार केंद्र और राज्य के बीच दिखाई देता है। वहीं बात अगर महाराष्ट्र की करें तो यहां के राजनीतिक सियासी घटनाक्रम को कौन भूल सकता है। पहले तो देवेंद्र फडणवीस और अजीत पवार का अहले सुबह का शपथग्रहण, फिर पवार का पावर पालिटिक्स और नतीजतन राज्य में उद्धव के नेतृत्व में बनी महाअघाड़ी सरकार। लेकिन बयानबाजी के दौर में आपसी कलह के साथ ही महाराष्ट्र और केंद्र के बीच भी कई मुद्दों पर तकरार दिखी। वो और बात है कि सीएम उद्धव पीएम नरेंद्र मोदी पर खुलकर प्रहार करने से बचटे नजर आते हैं वहीं कुर्सी बचाने के लिए मदद की गुहार लगाने की खबर भी खूब सुर्खियों में रही थी।

- अभिनय आकाश