व्यक्ति, विचार, संस्था और संकटमोचक थे अरुण जेटली

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कमलेश पांडे । Aug 25 2019 12:06PM

इस बात में कोई दो राय नहीं कि अरुण जेटली संघ, संगठन और सरकार के लिए आजीवन संकटमोचक बने रहे। एक अधिवक्ता और प्रबुद्ध विचारक के रूप में आपने अपनी स्पष्ट छाप छोड़ी है। आप एक शानदार, जानदार और ईमानदार व्यक्तित्व के स्वामी थे।

दिवंगत बीजेपी नेता अरुण जेटली (1952-2019) तब अचानक चले गए, जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, भारतीय जनता पार्टी और केंद्र में दूसरी बार स्पष्ट बहुमत से सत्तारूढ़ हुई मोदी सरकार को उनके जैसे बेबाक और सशक्त मार्गदर्शक की जरूरत थी। पीएम मोदी के शब्दों में- 'वह एक असाधारण राजनेता थे।' शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने ठीक ही कहा कि राष्ट्र को एकजूट रखने वाला पिलर टूट गया।

इस बात में कोई दो राय नहीं कि वह संघ, संगठन और सरकार के लिए आजीवन संकटमोचक बने रहे। एक अधिवक्ता और प्रबुद्ध विचारक के रूप में आपने अपनी स्पष्ट छाप छोड़ी है। आप एक शानदार, जानदार और ईमानदार व्यक्तित्व के स्वामी थे। आप ओजस्वी विचारों के अग्रदूत थे। अपनी अटल वैचारिक प्रतिबद्धता के चलते आप अपने आप में एक अडिग संस्था भी समझे गए। 

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कहना न होगा कि विपक्ष में रहकर सरकार को घेरने और सरकार में रहते हुए विपक्ष को रणनीतिक रूप से मात देने की जो आपकी अदा थी, उसका कोई समकालीन सानी नहीं दिखता। यही वजह है कि पक्ष-विपक्ष के सभी संवेदनशील लोग आपके कायल बने रहे। आपके व्यक्तिगत सम्बन्ध भी दलगत सीमाओं से परे रहे। आपकी रायशुमारी की अदा भी गजब निराली समझी गई। यही वजह है कि पक्ष क्या, विपक्ष के लोग भी आपसे व्यक्तिगत सलाह मांगते, जिसे देने में आप कतई संकोच नहीं करते, क्योंकि आप एक सफल पेशेवर व्यक्तित्व के स्वामी थे और उसे बखूबी जीते भी थे।

वाकई, राष्ट्र निर्माण में आपका बहुमूल्य योगदान है। देश हित में आपके अनेक फैसले याद किये जाएंगे। चाहे राजनैतिक फैसले हों या आर्थिक फैसले या फिर कानूनी फैसले, आपने दलगत हितों के बजाए राष्ट्रहित को सदैव अहमियत दी। क्योंकि संगठन और सत्ता से जुड़े प्रायः हर विषय पर आपकी गहरी पकड़ थी और बारीक समझ भी। जिससे हर कोई आपका मुरीद बनने को विवश हो जाता था। निःसंदेह, आपके ज्ञान और अभिव्यक्ति का दूसरा कोई सानी नहीं था। 

पहले अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के नेता के रूप में, फिर बीजेपी के राजनेता के रूप में, उसके बाद विपक्ष अथवा सरकार के रणनीतिकार के रूप और इन सभी के समानांतर एक प्रखर और दिग्गज अधिवक्ता के रूप में आपने अपनी अकाट्य दलीलों से जनमानस पर एक अलग छाप छोड़ी है। आप एक जुझारू नेता थे और धारदार अधिवक्ता भी। सत्ता के भीतर या बाहर रहते हुए भी देश-विदेश की समकालीन हस्तियों से आपके निजी सम्बन्ध प्रगाढ़ बने रहे, क्योंकि आपका व्यक्तित्व चुम्बकीय था। आपके मिलने या बातचीत करने का अंदाज बहुत ही निराला और दमदार था। आप अंत-अंत तक सियासी और वैचारिक रूप से समाचार माध्यमों में सक्रिय रहे। 

सुलगते राष्ट्रीय सवालों यथा- समान नागरिक संहिता, राममंदिर और जम्मू-कश्मीर से धारा 370 को समाप्त करने आदि जैसे अहम मुद्दों पर आपने सड़क से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक हमेशा तर्कसम्मत बचाव किया, जिससे देश लाभान्वित हुआ। यही नहीं, प्रायः सभी दलों के नेताओं से भी आपके व्यक्तिगत सम्बन्ध थे, जो बीजेपी के उतार-चढ़ाव में अक्सर काम आया करते थे। ऐसा इसलिए कि आप सभी का दिल से सम्मान करते थे, जिससे आपकी वाजिब बात कोई चाहकर भी नहीं काट पाता था। 

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राष्ट्रीय हिंदी दैनिक 'वीर अर्जुन' के लिए जब मैं बीजेपी और राज्य सभा बीट कवर किया करता था, उन दिनों आपको काफी नजदीक से जानने-समझने का मौका मिला। बेशक, आप अपने छोटे-बड़े सरकारी-निजी आत्मीय जनों, पत्रकारों और राजनैतिक कार्यकर्ताओं का तहेदिल से सम्मान करते थे। शायद यही वजह है कि बीजेपी में पहले अटल-आडवाणी, फिर सुषमा-जेटली और अब मोदी-शाह की जिन उत्कृष्ट जोड़ी की गणना की जाती है, उनमें से एक आप भी थे। 

देखा जाए तो पहले सुषमा स्वराज और फिर अरुण जेटली का अचानक चला जाना महज एक संयोग है, जिससे बीजेपी को काफी क्षति हुई है। ऐसी अपूरणीय क्षति हुई है, जिसे निकट भविष्य में भरना नामुमकिन है।

कमलेश पांडे

वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार

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