3 राज्यों के 4 मंत्री इन जेल, सोनिया-राहुल ऑन बेल, 8 साल में 5 गुना बढ़े ED के एक्शन, क्या हैं वो शक्तियां जो बनाती है इस एजेंसी को सुपरपावर

ED
prabhasakshi
अभिनय आकाश । Aug 02, 2022 4:46PM
ईडी का गठन 1 मई 1956 को हुआ था। लेकिन उस समय इसका नाम 'एनफोर्समेंट यूनिट' था। यह विशेष जांच एजेंसी वित्त मंत्रालय की पहल पर बनाई गई थी। ईडी बनाने का फैसला देश में मनी लॉन्ड्रिंग, वित्तीय धोखाधड़ी समेत किसी भी तरह के वित्तीय घोटाले को रोकने के लिए लिया गया है।

2013 में आई नीरज पांडे की बेहतरीन फिल्म ‘स्पेशल 26’ में रेड मारने गए सीबीआई इंस्पेक्टर वसीम खान का रोल निभा रहे मनोज बाजपेयी कहते हैं, ‘हम सीबीआई से हैं… असली वाले।’ ‘असली वाले’ बताने का कारण यह था कि अक्षय कुमार की अगुवाई वाला एक दूसरा ग्रुप सीबीआई से होने का दावा करके अमीर लोगों के यहां रेड कर रहा था और उनकी संपत्ति लेकर गायब हो जा रहा था। एक जमाना था जब लोग सीबीआई का नाम सुनते ही डर जाते थे। वक्त बदला और इन दिनों लोगों को दंबग फिल्म के चर्चित डॉयलाग थप्पड़ से डर नहीं लगता की माफिक प्यार से नहीं लेकिन ईडी से जरूर डर लगने लगा है। इन दिनों अखबारों-टीवी देखते वक्त आप अक्सर सुनते-पढ़ते होंगे ईडी का छापा, ईडी की कार्रवाई। नेता से लेकर अफसर तक और कारोबारियों से लेकर उद्योगपति तक अब सीबीआई से ज्यादा ईडी से डरने लगे हैं। मानों किसी से पूछों कि और क्या चल रहा है तो वो फॉग की बजाए कह दे कि ईडी का खौफ चल रहा है। ईडी से जुड़े ताजा मामलों की फेहरिस्त इन दिनों काफी लंबी है। चाहे ममता के पूर्व मंत्री पार्थ चटर्जी के घर से नोटों का पहाड़ मिलने की बात हो या सोनिया-राहुल से पूछताछ व नेशनल हेराल्ड के दफ्तरों पर छापेमारी। संजय राउत की गिरफ्तारी भी ईडी की कार्रवाईयों की सूची में एक और नाम है। ईडी के एक्शन से पहली बार एक साल के भीतर तीन राज्यों के चार प्रभावशाली मंत्रियों को जेल जाना पड़ा है। इनमें महाराष्ट्र के तत्कालीन कैबिनेट मंत्री अनिल देशमुख और नवाब मलिक शामिल हैं। दिल्ली सरकार में स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन को मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में ईडी ने 30 मई को गिरफ्तार किया था। ऐसे में आपको बताते हैं कि ये ईडी आखिर है क्या भला जो सभी इससे इतना थर्राए रहते हैं। 

ईडी के पास सीबीआई से ज्यादा ताकत?

हाल ही में ममता सरकार से हटाए गए मंत्री पार्थ चटर्जी को प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने भ्रष्टाचार के आरोप में गिरफ्तार किया है। पार्थ की करीबी अर्पित मुखर्जी के घर से करोड़ों रुपये और घर से सोना बरामद होने के बाद अर्पिता मुखर्जी को भी ईडी की हिरासत में ले लिया गया था। इसके अलावा नेशनल हेराल्ड मामले में ईडी लगातार कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और उनके बेटे राहुल गांधी से पूछताछ कर रही है। शिवसेना नेता संजय राउत को भी ईडी ने भूमि भ्रष्टाचार मामले में गिरफ्तार किया है।  

इसे भी पढ़ें: क्या है हवाला कारोबार? कहां से हुई इसकी शुरुआत, कैसे ब्लैक मनी को एक जगह से दूसरे जगह पहुंचाया जाता है

ईडी करता क्या है?

प्रवर्तन निदेशालय यानी ईडी एक विशेष वित्तीय जांच एजेंसी है। ये वित्त मंत्रालय के राजस्व विभाग का हिस्सा है। आसान शब्दों में कहें तो जहां पैसों से संबंधित गड़बड़ होती है वहां प्रवर्तन निदेशालय दखल देता है। किसे ने अगर फर्जी तरीके से या जुगाड़ लगाकर पैसा इधर से उधर किया है। काले पैसों को सफेद बनाया है, विदेशी पैसों से जुड़ा कोई कांड किया है तो वो ईडी के रडार पर आ जाता है। ईडी मुख्त: दो राजकोषिय कानूनों को लागू कराने का काम करती है। इनके दुरुपयोग पर नजर रखती है। इनमें पहला है- विदेशी मुद्रा प्रबंधन 1999 यानी एफईएमए (फेमा) और दूसरा है प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट 2002 (पीएमएलए) 

क्या है पीएमएलए कानून

धन शोधन निवारण अधिनियम को 2002 में अधिनियमित किया गया था और इसे 2005 में लागू किया गया। इस कानून का मुख्य उद्देश्य काले धन को सफेद में बदलने की प्रक्रिया (मनी लॉन्ड्रिंग) से लड़ना है। मनी लॉन्ड्रिंग को रोकना, अवैध गतिविधियों और आर्थिक अपराधों में काले धन के उपयोग को रोकना, मनी लॉन्ड्रिंग में शामिल या उससे प्राप्त संपत्ति को जब्त करना और मनी लॉन्ड्रिंग के जुड़े अन्य प्रकार के संबंधित अपराधों को रोकने का प्रयास करना। पीएमएलए के तहत 2014-15 में 178 मामले दर्ज थे, जो साल 2021-22 में बड़ कर 1180 हो गए। इस तरह 2014 से अब तक ईडी के दर्ज मामलों में पांच गुना का उछाल आया है। 

इसे भी पढ़ें: संसदीय दल की बैठक में शामिल होने के बाद बोले प्रह्लाद जोशी, उप-राष्ट्रपति चुनाव के संबंध में 5 अगस्त को होगी बैठक

फेमा क्या है?

विदेशी मुद्रा प्रबंध अधिनियम (1999), 1 जून 2000 से लागू हुआ। फेमा के सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य बाहरी व्यापार और भुगतान को सुगम बनाना। भारत में विदेशी मुद्रा बाजार के व्यवस्थित विकास और रखरखाव को बढ़ावा देना और भारत में सभी विदेशी मुद्रा लेनदेन के लिए औपचारिकताओं और प्रक्रियाओं को परिभाषित करना है। फेमा ने विदेशी मुद्रा से संबंधित सभी अपराधों को नागरिक अपराध माना जाता है, जबकि फेरा ने उन्हें आपराधिक अपराध माना गया था। पिछले 10 साल में ईडी ने विदेशी मुद्रा से जुड़े फेमा के तहत 24, 893 मामले दर्ज किए हैं। इसमें मनी लॉन्ड्रिंग के 3985 मामले हैं। साल 2014-15 में फेमा के तहत दर्ज 915 मामले 2021-22 में बढ़ कर 5313 हो गए। 

ईडी किस आधार पर आरोपी व्यक्तियों की संपत्तियों को कुर्क करता है?

पीएमएलए के तहत ईडी निदेशक के निर्देश पर अपराध की आय, जो कि एक आपराधिक गतिविधि से उत्पन्न धन है, संलग्न है। हालांकि, अगर वह संपत्ति कुर्की के लिए उपलब्ध नहीं है, तो एजेंसी उस मूल्य के बराबर संपत्ति संलग्न कर सकती है। पीएमएलए "अपराध की आय" को "किसी भी व्यक्ति द्वारा किसी अनुसूचित अपराध या ऐसी किसी संपत्ति के मूल्य से संबंधित आपराधिक गतिविधि के परिणामस्वरूप प्राप्त की गई संपत्ति के रूप में परिभाषित करता है। जहां ऐसी संपत्ति को लिया या रखा जाता है। जबकि अपराध की आय के बराबर संपत्ति की कुर्की के विचार का विरोध किया गया है, अतीत में विभिन्न अदालती आदेशों ने "ऐसी किसी भी संपत्ति के मूल्य" शब्द की ईडी की व्याख्या के पक्ष में फैसला सुनाया है, जिसका अर्थ है कि एजेंसी किसी भी संपत्ति को कुर्क कर सकती है। 

इसे भी पढ़ें: समाजवाद में राष्ट्रवाद का तड़का लगाकर अपनी राजनीति चमकाएंगे अखिलेश

इस केंद्रीय जांच एजेंसी की क्या शक्तियां हैं?

ईडी का गठन 1 मई 1956 को हुआ था। लेकिन उस समय इसका नाम 'एनफोर्समेंट यूनिट' था। यह विशेष जांच एजेंसी वित्त मंत्रालय की पहल पर बनाई गई थी। ईडी बनाने का फैसला देश में मनी लॉन्ड्रिंग, वित्तीय धोखाधड़ी समेत किसी भी तरह के वित्तीय घोटाले को रोकने के लिए लिया गया है। ईडी वर्तमान में वित्तीय धोखाधड़ी, अनियमित वित्तीय घोटालों और विदेशी मुद्रा भ्रष्टाचार के मामलों की जांच का प्रभारी है। 1957 में, प्रवर्तन इकाई का नाम बदलकर प्रवर्तन निदेशालय कर दिया गया। पूर्व आयकर प्रमुख संजय कुमार मिश्रा को इस एजेंसी का प्रमुख बनाया गया है। ईडी का मुख्यालय दिल्ली में है। दिल्ली के बाद, संगठन की शाखाएँ कलकत्ता और बॉम्बे (अब मुंबई) में स्थापित की गईं। बाद में मद्रास (अब चेन्नई) में शाखाएँ खोली गईं। वर्तमान में देश के लगभग सभी प्रमुख शहरों में इस केंद्रीय जांच एजेंसी की शाखाएं हैं। देश के कई नेताओं और मंत्रियों की गिरफ्तारी के बाद एक ही सवाल उठ रहा है कि क्या ईडी के पास सीबीआई से ज्यादा ताकत है?

 ईडी की पूछताछ की कोई समय सीमा नहीं 

1977 में इंदिरा गांधी को गिरफ्तार करने वाले सीबीआई के पूर्व संयुक्त निदेशक एनके सिंह के मुताबिक ईडी सीबीआई से ज्यादा ताकतवर हो गया है। अगर किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जाता है, तो भी ईडी के पास वित्तीय धोखाधड़ी अधिनियम के तहत उस व्यक्ति की संपत्ति को जब्त करने की शक्ति होती है। यहां तक ​​कि ईडी के किसी मामले में गिरफ्तार होने पर जमानत मिलना भी बहुत मुश्किल है। यदि सीबीआई द्वारा गिरफ्तार किया जाता है, तो व्यक्ति को विशेष परिस्थितियों में रिहा किया जा सकता है। ईडी अधिकारी किसी भी आरोपी व्यक्ति या संगठन के खिलाफ सबूत इकट्ठा करने के लिए बिना किसी बाधा के कहीं भी स्वतंत्र रूप से यात्रा कर सकते हैं। ईडी के पास जरूरत पड़ने पर किसी भी मामले को गैर-जमानती बनाने का भी अधिकार है। ईडी की पूछताछ की कोई समय सीमा नहीं है। ईडी किसी व्यक्ति से चाहे तो घंटों या एक महीने तक भी पूछताछ कर सकता है।

आम हो या खास सभी पर एक समान कार्रवाई 

आम आदमी ही नहीं, देश के मंत्रियों और नौकरशाहों को किसी भी तरह के वित्तीय भ्रष्टाचार के मामले में ईडी के हाथों से छूट नहीं मिलती है। ईडी की हिरासत में नौकरशाहों-मंत्रियों को कोई विशेष लाभ नहीं मिलता है। सुप्रीम कोर्ट ने ईडी की शक्तियों को और बढ़ा दिया है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक ईडी पैसे से जुड़े किसी भी मामले में स्वतंत्र रूप से कहीं भी तलाशी ले सकता है. इसके अलावा ईडी किसी व्यक्ति की संपत्ति को जब्त कर सकता है और उसे गिरफ्तार भी कर सकता है। यह भारत सरकार के वित्त मंत्रालय के राजस्व विभाग का हिस्सा है। आईआरएस, आईपीएस और आईएएस अधिकारियों के अलावा ईडी भी अलग-अलग भर्तियां करता है। ईडी में करीब दो हजार अधिकारी हैं। इनमें से करीब 70 फीसदी अधिकारी दूसरे संगठनों से प्रतिनियुक्ति पर आए हैं। बाकी ईडी के अपने कैडर हैं। -अभिनय आकाश

अन्य न्यूज़