Kashmiri Pandits पर हुए अत्याचारों का मोदी सरकार चुन चुन कर ले रही है हिसाब, 36 साल पहले Sarwanand Koul Premi, Virender Koul की निर्मम हत्या की फाइलें दोबारा खोलीं

Kashmiri Pandits
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यह सिर्फ एक पुराने हत्या मामले की फाइल खोलना नहीं है, बल्कि उस दौर के आतंक के उस चेहरे को बेनकाब करने की कोशिश है जिसने कश्मीर की सामाजिक भावना को लहूलुहान किया था। कोकरनाग के सोफ शाली गांव में रहने वाले सरवनंद कौल प्रेमी कोई आम व्यक्ति नहीं थे।

भले ही दशकों पहले कश्मीरी पंडितों की हत्या की फाइलों पर धूल जम गई हो और उन्हें बंद समझ लिया गया हो, लेकिन मोदी सरकार हर कश्मीरी पंडित को न्याय दिलाने की अपनी प्रतिबद्धता से पीछे हटने वाली नहीं है। अब एक-एक पुरानी फाइल से धूल हटाई जा रही है, बंद दरवाजे खोले जा रहे हैं और उन हत्यारों को कानून के कठघरे तक पहुंचाने की कोशिश तेज हो गई है, जिन्होंने कश्मीर में निर्दोष कश्मीरी पंडित परिवारों को अपना घर छोड़ने और अपनों को खोने के लिए मजबूर किया था। सरवनंद कौल प्रेमी और उनके बेटे वीरेंद्र कौल की हत्या की जांच में SIA की ताजा कार्रवाई इसी न्याय अभियान की बड़ी कड़ी है।

12 अगस्त 2026 को SIA ने इस दोहरे हत्याकांड की जांच फिर से अपने हाथ में लेते हुए जम्मू-कश्मीर में एक साथ नौ ठिकानों पर छापेमारी की। इनमें राजौरी जिले के छह, जम्मू के दो और कश्मीर का एक स्थान शामिल था। मामला मूल रूप से अनंतनाग के दूरू थाने में दर्ज FIR से जुड़ा था, जिसे अब SIA ने अपने व्यापक जांच अभियान का हिस्सा बना लिया है। जांच एजेंसी उन लोगों और संपत्तियों तक पहुंचने की कोशिश कर रही है, जिनका संबंध 1990 में प्रेमी और उनके बेटे के अपहरण तथा हत्या की साजिश से माना जा रहा है।

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यह सिर्फ एक पुराने हत्या मामले की फाइल खोलना नहीं है, बल्कि उस दौर के आतंक के उस चेहरे को बेनकाब करने की कोशिश है जिसने कश्मीर की सामाजिक भावना को लहूलुहान किया था। कोकरनाग के सोफ शाली गांव में रहने वाले सरवनंद कौल प्रेमी कोई आम व्यक्ति नहीं थे। वह कवि, लेखक, विद्वान, सामाजिक कार्यकर्ता और पूर्व स्कूल प्रधानाचार्य थे। भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में भी उनकी भूमिका रही थी और वह जीवनभर राष्ट्रीय एकता, सांप्रदायिक सौहार्द और कश्मीर की साझा संस्कृति के पक्षधर रहे। लेकिन आतंकवादियों ने उसी आवाज को निशाना बनाया जो कश्मीरियत और भाईचारे की बात करती थी।

29 और 30 अप्रैल 1990 की दरम्यानी रात हथियारबंद लोग उनके घर में घुसे। वह लोग प्रेमी और उनके 27 वर्षीय बेटे वीरेंद्र को यह कहकर साथ ले गए कि प्रेमी को आतंकियों के ‘कमांडर’ से मिलाना है। अगले दिन दोनों के शव पेड़ से लटके मिले। रिपोर्टों के अनुसार उन्हें बुरी तरह प्रताड़ित किया गया था। इस हत्या की क्रूरता ने पूरे परिवार को तोड़ दिया। कुछ ही दिनों बाद परिवार को कश्मीर छोड़कर दिल्ली जाना पड़ा।

सबसे बड़ा सवाल यही है कि इतने भयावह अपराध के बाद भी दोषियों तक कानून की पहुंच क्यों नहीं हो सकी? दशकों तक यह मामला लगभग अंधी गली में पड़ा रहा। लेकिन अब SIA का दावा है कि जांच में साजिश की बड़ी तस्वीर सामने आई है, संदिग्ध आरोपियों और उनके सहयोगियों की पहचान हुई है और अपहरण तथा हत्या की घटनाओं के क्रम को दोबारा जोड़ा गया है। यानी जिस अपराध की कड़ियां वर्षों तक बिखरी हुई थीं, उन्हें अब जोड़ने की कोशिश तेज हो गई है।

देखा जाये तो प्रेमी और वीरेंद्र की हत्या अकेली घटना नहीं थी। 1990 के शुरुआती महीनों में कश्मीरी पंडितों और प्रमुख सार्वजनिक हस्तियों की लक्षित हत्याओं का सिलसिला चला। वकील टीका लाल टपलू, हाई कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश नीलकंठ गंजू और दूरदर्शन के निदेशक लस्सा कौल जैसे नाम इस भयावह दौर की याद दिलाते हैं। इन हत्याओं ने ऐसा आतंक पैदा किया जिसने पूरे समुदाय को घाटी छोड़ने पर मजबूर कर दिया।

इसी पृष्ठभूमि में सरला भट हत्याकांड में SIA की हालिया कार्रवाई भी बेहद महत्वपूर्ण है। जून 2026 में एजेंसी ने 737 पन्नों की चार्जशीट दाखिल कर जेल में बंद JKLF प्रमुख यासीन मलिक को 1990 में कश्मीरी पंडित नर्स सरला भट के अपहरण, यातना और हत्या की साजिश का कथित मास्टरमाइंड बताया। सरला भट का मामला भी 34 वर्षों तक अनसुलझा रहा था।

अब प्रेमी परिवार के बेटे राजिंदर कौल की मांग साफ है कि अगर एक-एक पुराने मामले की फाइल खोली जा सकती है तो बाकी मामलों को भी इसी तरह SIA को सौंपा जाए। उनका कहना है कि उनके पिता और भाई की हत्या को उस समय ‘कश्मीरियत’, धर्मनिरपेक्ष भरोसे और इंसानियत की हत्या कहा गया था। अब परिवार चाहता है कि हर पीड़ित को न्याय मिले और हर दोषी को सजा।

देखा जाये तो यही इस पूरी कार्रवाई का सबसे बड़ा संदेश है कि आतंक के दौर में जिन परिवारों से उनका घर, अपनों का साथ और न्याय का भरोसा छीन लिया गया था, उनकी फाइलें हमेशा के लिए बंद नहीं हुई हैं। 36 साल का इंतजार भले लंबा हो, लेकिन न्याय की घड़ी के लिए देर का मतलब अंत नहीं है। कश्मीर की उन खूनी फाइलों को अब फिर खोला जा रहा है, जिनमें सिर्फ नाम और तारीखें नहीं, बल्कि एक उजड़े हुए समुदाय का दर्द और न्याय की अधूरी पुकार दर्ज है।

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