मुस्लिम संगठनों ने भी किया गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने समर्थन

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अजय कुमार । Sep 2 2021 6:41PM

भारतीय जनता पार्टी भी अपने जन्म से गाय के लिए जुनून से भरी रही है। यही वजह है कि 2014 में जब मोदी प्रधानमंत्री की गद्दी पर बैठे उसके बाद से गाय भी खबरों में काफी उछाल देखने को मिला। दरअसल, बीजेपी जानती है कि गाय के लिए जुनून हर हिन्दुस्तानी से भरा है।

लखनऊ। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने के सुझाव के बाद तमाम दलों और संगठनों की प्रतिक्रियां आनी शुरू हो गई है। कई मुस्लिम संगठनों ने भी आगे आकर गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने के इलाहाबाद हाईकोर्ट के सुझाव का समर्थन किया है। लखनऊ में दारुल उलूम फरंगी महल प्रदेश तथा केन्द्र सरकार से गाय को राष्टीय पशु घोषित करने की मांग की है। इसके साथ ही सभी से गाय की हिफाजत करने के पुख्ता इंतजाम भी करने का भी अनुरोध किया है। मौलाना सूफियान निजामी ने इस मामले पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि हम शुरू से कहते आए हैं कि गाय के संरक्षण और सुरक्षा के लिए केन्द्र सरकार के स्तर पर एक कानून बनना चाहिए, जिससे गाय की हिफाजत भी हो सकेगी और गाय का सम्मान भी होगा। लखनऊ में दारुल उलूम फरंगी महल के प्रवक्ता मौलाना सुफियान निजामी ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने के सुझाव का स्वागत किया है। उन्होंने कहा कि राज्य तथा केन्द्र सरकार को सभी हिंदू भाइयों की आस्था का ख्याल रखते हुए इस पर चर्चा करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि गाय की हिफाजत के लिए भी एक कानून बनना चाहिए।

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बहरहाल,उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव से पूर्व इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने का जो सुझाव दिया है,उससे चुनाव की सियासत गरमा सकती है। वैसी भी गाय ने भारतीय राजनीति को लंबे अरसे से प्रभावित कर रखा है. भारत चाहे कोविड-19 की महामारी से जूझ रहा हो या आर्थिक सुस्ती से या सीमा पर तनाव के कारण राष्ट्रीय सुरक्षा पर संकट का सामना कर रहा हो, गाय का राजनीतिक महत्व विमर्श में कभी फीका नहीं पड़ा. वास्तव में गाय हमेशा भारत के सार्वजनिक सोच में छायी रही, चाहे सत्ता में कोई भी पार्टी या नेता क्यों न रहा हो गाय हमेश प्रसांगिक रही। आजादी से पूर्व ब्रिटिश शासन मंें भारत में 1857 का विद्रोह इस अफवाह से भड़का था कि भारतीय सिपाहियों को गाय की चर्बी वाले कारतूस दिए जा रहे थे जिन्हें दांतों से खोलना पड़ता था (यह भी अफवाह थी कि कारतूस में सुअर की चर्बी डाली जाती थी जिससे मुसलमान सिपाही भड़के)। 1966 में दिल्ली के रायसीना हिल की घेराबंदी लोग देख चुके हैं। जब तमाम भगवाधारी साधुओं ने गोहत्या को अपराध घोषित कराने के लिए प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी पर दबाव डालने की खातिर संसद भवन घेर लिया था। तब इस घेराबंदी के पीछे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और हिन्दू संगठनों को जिम्मेदार ठहराया गया था।

भारतीय जनता पार्टी भी अपने जन्म से गाय के लिए जुनून से भरी रही है। यही वजह है कि 2014 में जब मोदी प्रधानमंत्री की गद्दी पर बैठे उसके बाद से गाय भी खबरों में काफी उछाल देखने को मिला। दरअसल, बीजेपी जानती है कि गाय के लिए जुनून हर हिन्दुस्तानी से भरा है। गाय आस्था की भी प्रतीक है और गाय का दूध से लेकर गौमूत्र और गोबर तक उपयोगी रहता है। एक अनुमान के अनुसार एक गाय अपने जीवन काल में करीब 400 लोगों का पालन-पोषण करती है। वहीं कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्हें गौमांस बहुत पंसद हैं। वह गौमांस खाने को अपना मौलिक अधिकार समझते हैं,ऐसे ही लोगों को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यह कहते हुए आईना दिखाया है कि किसी को पशु-पक्षी मार कर खा जाना किसी व्यक्ति का मौलिक अधिकार नहीं हो सकता है। यह कहकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गौमांस खाने वाले को जमानत देने से यह कहते हुए मना कर दिया कि यह शख्स बाहर छूट कर आएगा तो फिर से गौमांस खाएगा।

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भारत का यह दुर्भाग्य है कि जिस गाय को हिन्दू पूजते हैं और इस्लाम में भी गौमांस को नुकसान दायक बताया गया हो,वहां ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो गौमांस के सेवन को अपना मौलिक अधिकार समझते हैं।इसी लिए अपने देश में गाय के नाम पर  खून-खराबा भी खूब होता है। चाहे हत्या गाय की हो रही हो या गाय के लिए लोगों की हो रही हो, गाय के नाम पर राजनीति उग्र और हिंसक रूप लेती रही है और समस्या यह है कि भारतीयों का बड़ा तबका, खासकर दक्षिण, पूरब और उत्तर-पूर्व भारत के गैर-हिंदू ही नहीं बल्कि हिंदू भी भोजन में गोमांस का सेवन करते हैं। गोवा, पश्चिम बंगाल, केरल, असम, अरुणाचल प्रदेश, मिज़ोरम, मेघालय, नागालैंड और त्रिपुरा में गोमांस कानूनन और मुक्त रूप से उपलब्ध है। इनमें से कई राज्यों में भाजपा की सरकार है,लेकिन यहां वोट बैंक की चिंता में बीजेपी सरकारें अपने यहां प्रतिबंध नहीं लगा पा रही हैं।

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