बहनजी के बदले राजनीतिक रुख का आखिर राज क्या है? क्यों बात-बात पर भाजपा का समर्थन कर रही है BSP

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ANI
राष्ट्रपति चुनावों के दौरान भी विपक्षी एकता के साथ खड़े नहीं होकर मायावती ने आदिवासी महिला और एनडीए उम्मीदवार श्रीमती द्रौपदी मुर्मू को समर्थन दिया। अब उपराष्ट्रपति चुनाव में भी उन्होंने एनडीए उम्मीदवार जगदीप धनखड़ का समर्थन करने का ऐलान कर दिया है।

यह सवाल सबके मन में उठ रहा है कि बहुजन समाज पार्टी आजकल किस रणनीति पर काम कर रही है? यह सवाल भी सबके मन में उठ रहा है कि अब तक भाजपा की तगड़ी खिलाफत करती रहीं बहन मायावती 2019 के लोकसभा चुनावों के बाद से भाजपा के प्रति नरम रुख क्यों अपनाये हुए हैं? यह सवाल भी सबके मन में उठ रहा है कि कहीं बहनजी के इस बदले रुख का कारण बसपा शासनकाल में हुए कथित घोटाले तो नहीं हैं। उल्लेखनीय है कि मायावती पर ताज कॉरिडोर तथा कई अन्य मामलों को लेकर केंद्रीय एजेंसियों का शिकंजा कसने का खतरा बना हुआ है। सोशल मीडिया पर लोग कह रहे हैं कि ईडी कांग्रेस पर छापे मार रही है, शिवसेना, तृणमूल कांग्रेस और झारखंड मुक्ति मोर्चा के नेताओं के यहां छापे मार रही है लेकिन बसपा का कोई नेता अब तक उसके रडार पर नहीं आया है। लोग जानना चाह रहे हैं कि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों से पहले समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव के करीबी इत्र व्यापारी के यहां तो छापे पड़ गये थे लेकिन बसपा को क्यों किसी ने परेशान नहीं किया?

उल्लेखनीय है कि मायावती ने 2019 का लोकसभा चुनाव अखिलेश यादव के साथ महागठबंधन बनाकर लड़ा था। लेकिन यह प्रयोग कामयाब नहीं हुआ। महागठबंधन से समाजवादी पार्टी को तो कुछ लाभ हो गया लेकिन बसपा को नहीं हुआ। इसके बाद मायावती ने समाजवादी पार्टी पर धोखा देने का आरोप लगाते हुए अखिलेश यादव के साथ महागठबंधन तोड़ने का ऐलान कर दिया। इसके बाद से उनका झुकाव भाजपा की ओर हो गया। जब जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाये जाने की बात आई तो मायावती ने तत्काल सरकार को समर्थन दे दिया। इसके बाद उन्होंने अपनी राजनीतिक गतिविधियों को सीमित ही रखा। योगी सरकार को पहले कार्यकाल में मायावती की ओर से बमुश्किल ही घेरा गया। विधानसभा चुनावों से पहले मात्र एक ब्राह्मण सम्मेलन को छोड़ दें तो बसपा की गतिविधियां ठप्प-सी थीं जिसको देखकर हर कोई हैरत में था कि क्यों बसपा चुनावों में रुचि नहीं दिखा रही है। बसपा ने बेमन से उम्मीदवारों को उतारा और निचले स्तर पर चल रही उन अफवाहों का खंडन करने की जरूरत भी नहीं समझी जिसमें कहा जा रहा था कि बसपा कैडर को भाजपा उम्मीदवारों को वोट देने का निर्देश दिया गया है। परिणाम आया तो बसपा के हाथ मात्र एक सीट लगी जबकि उत्तर प्रदेश में उससे कम जनाधार वाली कांग्रेस के चार उम्मीदवार जीत कर आये।

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पूरे यूपी चुनाव के दौरान ऐसा लग रहा था कि मायावती का एक ही प्रयास है कि अखिलेश यादव मुख्यमंत्री नहीं बन पायें भले भाजपा की दोबारा सरकार बन जाये। यही नहीं जब अखिलेश यादव ने आजमगढ़ संसदीय सीट से और आजम खान ने रामपुर सीट से इस्तीफा दे दिया तो उपचुनाव में मायावती ने सिर्फ आजमगढ़ से अपना उम्मीदवार उतारा। उम्मीदवार भी ऐसा मजबूत उतारा कि वह समाजवादी पार्टी के वोटों में सेंध लगा जाये। आजमगढ़ से अगर भाजपा उम्मीदवार दिनेश लाल निरहुआ चुनाव जीते हैं तो इसमें सबसे बड़ा हाथ मायावती का है।

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यही नहीं राष्ट्रपति चुनावों के दौरान भी विपक्षी एकता के साथ खड़े नहीं होकर मायावती ने आदिवासी महिला और एनडीए उम्मीदवार श्रीमती द्रौपदी मुर्मू को समर्थन दिया। अब उपराष्ट्रपति चुनाव में भी उन्होंने एनडीए उम्मीदवार जगदीप धनखड़ का समर्थन करने का ऐलान कर दिया है। दरअसल धनखड़ का समर्थन कर मायावती ने जहां अखिलेश पर निशाना साधा है वहीं बसपा को भी मजबूत करने की दिशा में कदम उठाया है। जगदीप धनखड़ जब पश्चिम बंगाल के राज्यपाल थे तब मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के साथ उनके खूब विवाद हुआ करते थे। अखिलेश यादव ममता बनर्जी के करीबी हैं। यूपी चुनावों के दौरान भी ममता बनर्जी अखिलेश यादव के समर्थन में जनसभाएं करने आई थीं। अब अखिलेश ममता बनर्जी के करीबी हैं तो मायावती ने ममता के विरोधी धनखड़ का समर्थन कर दिया है। इसके अलावा धनखड़ का समर्थन करने के पीछे पश्चिमी उत्तर प्रदेश और राजस्थान में बसपा को मजबूत करने की कवायद भी शामिल है। उल्लेखनीय है कि एक जमाने में पश्चिमी उत्तर प्रदेश बसपा का मजबूत गढ़ था। यहां जाट, जाटव और मुस्लिमों के सहारे बसपा बाजी मारती रही थी लेकिन अब बदले हालात में यहां भाजपा और आरएलडी का दबदबा है। धनखड़ चूंकि राजस्थान से ताल्लुक रखते हैं और अगले साल वहां विधानसभा चुनाव होने हैं, इसलिए बसपा चाहती है कि वह चुनावों के वक्त इस बात का हवाला देकर वोट मांग सके कि जब राजस्थान के लाल को देश का उपराष्ट्रपति बनाने की बात आई तो बसपा ने उनका समर्थन किया था।

बहरहाल, आने वाले दिनों में बसपा का हाथी किस करवट बैठता है यह तो देखने वाली बात होगी लेकिन इतना तो दिख ही रहा है कि भाजपा के नेता भी आजकल मायावती की काफी तारीफ करते नजर आ रहे हैं। दोनों दलों के बीच गठबंधन तो होना नहीं है ऐसे में सवाल उठता है कि क्या बसपा अपने सारे फैसले भाजपा के डर की वजह से ले रही है या फिर अब बसपा का एक ही मिशन है कि भले अपने को कितना भी नुकसान हो जाये लेकिन समाजवादी पार्टी को खत्म करना है और उसे सत्ता से दूर रखना है।

-नीरज कुमार दुबे

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