Narendra Modi की सियासत के 25 साल: Indian Politics में कैसे स्थापित हुआ 'मोदी मार्ग'?

Narendra Modi
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यह मोदी का दुर्भाग्य रहा कि उनके गुजरात की सत्ता संभालने के महज छह महीने बाद ही राज्य को गोधरा कांड के चलते भयानक सांप्रदायिक दंगों का सामना करना पड़ा। गुजरात सरकार की रिपोर्ट के अनुसार इन दंगों में 1044 लोगों के मारे गए , जबकि 2548 लोग घायल हुए थे। इसके अलावा 223 लोग लापता बताए गए।

सात अक्टूबर 2001 को नरेंद्र मोदी ने जब गुजरात के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी, तब कोई नहीं सोच रहा था कि मोदी एक साल का भी कार्यकाल पूरा कर पाएंगे। राजनीतिक जानकारों और गुजरात के लोगों की इस सोच के पीछे कुछ खास वजहें भी थीं। मोदी के गुजरात का सरदार बनने से पहले के पांच वर्षों में राज्य में एक-एक करके चार मुख्यमंत्री आए और चले गए थे। मोदी राज्य के किसी ताकतवर जाति समुदाय से भी नहीं हैं और सबसे बड़ी बात कि मुख्यमंत्री बनने से पहले उन्होंने कोई चुनाव भी नहीं लड़ा था। हां, पर्दे के पीछे की राजनीति के मंजे हुए खिलाड़ी के तौर पर वे स्थापित थे। इतना ही नहीं, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर राज्यों के बीजेपी प्रभारी के रूप में भी अपनी सियासी समझ का भी वे लोहा मनवा चुके थे। लेकिन वक्त के साथ, मोदी ने सभी आशंकाओं को ना सिर्फ खारिज कर दिया है, बल्कि चौथाई सदी तक लगातार सत्ता का केंद्र बिंदु रहने वाले वाली शख्सियत भी बन चुके हैं। इसके पहले मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता ज्योति बसु के नाम देश में सबसे लंबे समय यानी करीब 23 साल सत्ता संभालने का रिकॉर्ड था। मोदी उस रिकॉर्ड से भी काफी आगे बढ़ चुके हैं।

हाल के दिनों में एक वरिष्ठ हिंदी पत्रकार मोदी मार्ग की अवधारणा देकर आलोचनाओं के केंद्र में हैं। मोदी मार्ग की चर्चा हो तो वामपंथी तो सांड़ की तरह भड़केंगे ही, वे समाजवादी भी वरिष्ठ पत्रकार के आलोचक हो गए हैं, जो कभी उनके सहयोगी रहे या वे उनके साथी रहे। बेशक मोदी मार्ग की इन दिनों आलोचना हो रही है, लेकिन आने वाले दिनों में जब नरेंद्र मोदी का अपना और उनके दौर के भारत का इतिहास लिखा जाएगा, निश्चित तौर पर मोदी मार्ग या मोदीत्व की अवधारणा को भी स्वीकार किया जाएगा। किसी शख्सियत के जरिए शुरू पंथ या वैचारिक धारा को उसके जीवन काल में सर्व मान्यता और स्वीकार्यता कम ही मिल पाती है। लेकिन जब वही शख्सियत इतिहास की धारा में विलीन हो जाती है, तो उसकी दिखाई राहों को पंथ का दर्जा मिलने लगता है। गांधी बेशक अपनी जिंदगी में ही महात्मा के रूप में स्थापित हो चुके थे, लेकिन उनके कई प्रयोगों की उसी तरह आलोचनाएं होती रहीं, जैसे आज मोदी के वैचारिक विरोधी उनके तमाम कदमों की कटु आलोचनामें लीन रहते हैं। वैसे भी लोकतांत्रिकक दौर के भारतीय समाज की एक धारा रही है। शुरू में वह पदधारकों का शुरू में स्वागत करता है, बाद में उसका विरोधी हो जाता है। लेकिन वही शख्सियत जब इतिहास में समाहित हो जाती है, कुछ अपवादों को छोड़ समाज उसका घोर प्रशंसक हो जाता है। बीजेपी की ही राजनीति का उदाहरण इस संदर्भ में ले सकते हैं। एक दौर में बीजेपी विरोधियों की नजर में अटल उदार थे, जबकि आडवाणी कट्टर। लिहाजा आडवाणी लगातार विरोधियों के निशाने पर रहे। लेकिन जैसे ही अटल युग की समाप्ति हुई और मोदी युग की ओर बीजेपी बढ़ चली, आडवाणी उन्हीं विरोधियों की नजर में आदर के पात्र होते गए और मोदी के कटु आलोचकों की संख्या बढ़ती गई। कुछ इसी अंदाज में कह सकते हैं कि आने वाले दिनों में भारतीय जनता पार्टी की राजनीति में कोई अन्य नेता उभरा तो हो सकता है कि मोदी बीजेपी विरोधियों की नजर में ही प्रशंसा का पात्र बन जाएं और बीजेपी का भावी नेता आडवाणी और मोदी की तरह आलोचनाओं के केंद्र में आ जाए। सत्ता की राजनीति में मोदी की यात्रा पर निगाह डालते हैं तो उनकी सबसे बड़ी चुनौती खुद की स्वीकार्यता बढ़ाना रही। जिस तरह चौथाई सदी से वे सत्ता के केंद्र में हैं, उसे देख कह सकते हैं कि इसमें वे कामयाब रहे हैं। इतना ही नहीं, वे सबसे ज्यादा समय तक सत्ता को खुद के इर्द-गिर्द केंद्रीकृत करने में भी सफल रहे हैं। आज भारत की केंद्रीय सत्ता ही नहीं, भारतीय जनता पार्टी का संगठन भी उन्हीं के इर्द-गिर्द केंद्रित है और उन्हीं से शक्ति ग्रहण करता है।

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यह मोदी का दुर्भाग्य रहा कि उनके गुजरात की सत्ता संभालने के महज छह महीने बाद ही राज्य को गोधरा कांड के चलते भयानक सांप्रदायिक दंगों का सामना करना पड़ा। गुजरात सरकार की रिपोर्ट के अनुसार इन दंगों में 1044 लोगों के मारे गए , जबकि 2548 लोग घायल हुए थे। इसके अलावा 223 लोग लापता बताए गए। दंगों के सात साल बीतने के बाद सरकार के ही अनुसार, लापता लोगों की संख्या कुछ बढ़ गई। इन दंगों के बाद नरेंद्र मोदी विशेषकर कांग्रेस और वामपंथी दलों के निशाने पर आ गए। देश के वामपंथी सोच से प्रभावित स्वयंसेवी संगठनों ने उनके खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर मोर्चा खोल दिया। एक तरह से मोदी को राजनीतिक घृणा का पात्र बनाने की कोशिश की गई। उनके चरित्र हनन तक की कोशिशें हुईं। गुजरात दंगों के साथ ही इशरत जहां मुठभेड़ कांड को लेकर उनके खिलाफ सीबीआई जांच हुई। सीबीआई के समक्ष बतौर मुख्यमंत्री पूछताछ के लिए उन्हें कई बार घंटों तक उपस्थिति जतानी पड़ी और बतौर मुख्यमंत्री उन्हें घंटों तक सीबीआई के अच्छे-बुरे सवालों का सामना करना पड़ा। गुजरात दंगों के दाग के चलते एक दौर में उन्हें अमेरिका ने वीजा देने से इनकार कर दिया। इस बिंदु पर देखें तो मोदी का जीवट व्यक्तित्व उभरता है। कह सकते हैं कि तिरस्कार और आलोचनाओं से वे ताकत ग्रहण करते हैं, कुछ-कुछ मिथकीय पात्र बालि की तरह। जिस तरह बालि के सामने आए उसके विरोधियों की आधी ताकत बालि में ही समाहित हो जाती थी, मोदी कुछ उसी तरह विरोधियों की आलोचनाओं से ताकत ग्रहण करते हैं और अपनी राह बनाते रहते हैं। तीखे और अपमानजनक विरोध से जीवट से जीवट वाली शख्सियतें टूट जाती हैं, मोदी की ना सिर्फ कटु आलोचना हुई या हो रही है, उन्हें सार्वजनिक मंचों से घटिया, अश्लील और फूहड़ गालियां दी जा रही हैं। अतीत में उन्हें चरित्र हनन की सीमा तक बदनाम करने की कोशिशें हुईं। लेकिन मोदी रूके नहीं। कभी पर्दे के पीछे से राजनीति करने वाले मोदी लगातार आगे बढ़ते रहे।

गुजरात में जब चीजें पटरी पर आनी शुरू हुईं तो उन्होंने राज्य के विकास को लेकर अपना मॉडल पेश किया। जिसे कालांतर में देश ने उसे ‘गुजरात मॉडल’ के नाम से जाना। ‘गुजरात मॉडल’ के विकास और इस विकास की गति को बनाए रखने के लिए प्रवासियों और निवेशकर्ताओं को लुभाने के लिए उन्होंने ‘वायव्रेंट गुजरात’ नाम से आयोजन शुरू किए। जिसे देखते ही देखते राज्य की जनता ने तो अपनाया ही, प्रवासियों ने भी हाथोंहाथ लिया। इसी का असर रहा कि जिस राज्य में महज पांच साल में चार मुख्यमंत्री आए और गए, उसी राज्य में मोदी ने साढ़े बारह साल से अधिक वक्त तक सत्ता संभालने का रिकॉर्ड बनाया। 2012 के विधानसभा चुनाव के दौरान उनकी ख्याति राज्य से बाहर की सीमाओं तक पैठ बना चुकी थी या बना रही थी। इसका ही नतीजा रहा कि 2012 के गुजरात विधानसभा चुनावों के वक्त राष्ट्रीय मीडिया के एक हिस्से ने मोदी को भावी प्रधानमंत्री के रूप में स्वीकार कर लिया। तब कहा जा रहा था कि गुजरात इस बार सिर्फ अपने मुख्यमंत्री का ही नहीं, बल्कि देश के भावी प्रधानमंत्री का भी चुनाव कर रहा है। मोदी की राजनीतिक यात्रा जातिवादी राजनीति का जवाब भी है। कांग्रेस के प्रथम परिवार, नीतीश कुमार और ममता बनर्जी को छोड़ दें तो आज के ज्यादातर बड़े राजनेता कहीं न कहीं सिर्फ अपनी जातियों के नेता हैं या उनकी राजनीतिक बुनियाद का आधार उनकी जाति है। लेकिन मोदी की लोकप्रियता में उनकी जाति का कोई आधार नहीं है।

मोदी ने अपने लंबे शासन काल में ढरों उपलब्धियां हासिल की हैं, लेकिन मोटे तौर पर देखें तो उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि भारत की वैश्विक मंच पर बदली छवि। उनके शासनकाल में भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि में सुधार हुआ है। मोदी ने आर्थिक मोर्चे पर देश को बहुत गति दी है। मोदी कहते हैं कि उनकी नजर में सिर्फ चार जातियां हैं, महिला, युवा, गरीब और किसान। मोदी के लंबे शासन काल में इन चारों ही वर्गों का ध्यान ठीक से रखने की कोशिशें बढ़ी हैं। भारत दुनिया की चौथी बड़ी आर्थिक महाशक्ति अगर बन चुका है, तो इसके पीछे उनका नजरिया भी है। कृषि में साढ़े चार प्रतिशत सालाना की विकास दर हासिल की जा चुकी है, बीजेपी के एजेंडे के तहत अयोध्या में राममंदिर बन चुका है, कश्मीर को अलग-थलग करने वाले संविधान के विशेष अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी बनाया जा चुका है। मोदी के शासनकाल की उपलब्धियों को गिनाने बैठें तो पूरी रात गुजर जाएगी। बस मोटे तौर पर कह सकते हैं कि मोदी राज में देश ने अपना खोया गौरव हासिल करने की दिशा में एक मजबूत कदम जरूर बढ़ाया है।


उमेश चतुर्वेदी
लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक समीक्षक हैं..

(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
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