UK में Keir Starmer अर्श से फर्श पर, प्रचंड बहुमत के 2 साल बाद ही क्यों देना पड़ा इस्तीफा?

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री केअर स्टॉर्मर को प्रचंड बहुमत के बावजूद दो साल में ही इस्तीफा क्यों देना पड़ा? यह विश्लेषण उनकी सरकार की प्रमुख चूकों, जैसे दिशाहीन 'स्टॉर्मरवाद', लोकलुभावन राजनीति के सामने विफलता और विवादास्पद नियुक्तियों की पड़ताल करता है, जिसने लेबर पार्टी की सत्ता का अंत किया।
ब्रिटेन के राजनीतिक इतिहास में पांच जुलाई 2024 का दिन केअर स्टॉर्मर के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि लेकर आया था। आम चुनाव में 174 सीट के प्रचंड बहुमत के साथ जीत दर्ज करने के बाद वह पहली बार प्रधानमंत्री के रूप में ‘डाउनिंग स्ट्रीट’ (ब्रिटेन के प्रधानमंत्री का आधिकारिक आवास एवं कार्यालय) पहुंचे थे। लेकिन सत्ता की यह शानदार शुरुआत महज दो वर्ष के भीतर ही ऐसे मोड़ पर पहुंच गई, जहां उन्हें प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देने के लिए मजबूर होना पड़ा। आखिर हालात यहां तक कैसे पहुंच गए? भावनाओं और गरिमा से परिपूर्ण केअर स्टॉर्मर का इस्तीफा भाषण कई लोगों के लिए इसलिए भी चौंकाने वाला था, क्योंकि उनके अनुसार सरकार ने अपने कार्यकाल में ऐसी कई उपलब्धियां हासिल की थीं, जिनकी अपेक्षा आमतौर पर लेबर पार्टी के किसी प्रधानमंत्री से की जाती है।
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न्यूनतम वेतन बढ़ाया गया, श्रमिकों के रोजगार अधिकारों को मजबूत किया गया, राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा (एनएचएस) में उपचार के लिए प्रतीक्षा सूची कम हुई, पांच लाख बच्चों को गरीबी से बाहर निकालने की दिशा में प्रगति हुई और कठिन परिस्थितियों के बावजूद अर्थव्यवस्था ने वृद्धि दर्ज की, भले ही इसकी रफ्तार धीमी रही हो। स्टॉर्मर के समर्थकों की नजर में वह (निवर्तमान प्रधानमंत्री) आंडबरविहीन और मर्यादित व्यक्ति हैं, जो राष्ट्रीय हित को ध्यान में रखते हुए पूरी गंभीरता के साथ अपनी जिम्मेदारियां निभा रहे थे, लेकिन जमीनी स्तर पर तस्वीर बिल्कुल अलग थी। सांसदों को मतदाताओं के बीच अक्सर स्टॉर्मर के प्रति गहरी नाराजगी और तीखे विरोध का सामना करना पड़ता था।
वर्ष 2024 में ‘‘बदलाव’’ लाने के उनके वादे के पूरा नहीं होने की शिकायतों के बीच उनकी लोकप्रियता तेजी से गिरती चली गई। अतीत में कई प्रधानमंत्रियों को भी इस तरह जनता की नाराजगी का सामना करना पड़ा था। वर्ष 1980-81 में मार्गरेट थैचर का कार्यकाल भी इसका उदाहरण पेश करता है, लेकिन बाद में उन्होंने लगातार दो और आम चुनाव जीते। फिर भी आज की स्थिति अलग प्रतीत होती है और यही वजह है कि स्टॉर्मर को महसूस हुआ कि अब पद छोड़ने का समय आ गया है। इतने बड़े बहुमत के बावजूद उनकी सरकार कभी बहुत लोकप्रिय नहीं रही। उनकी पार्टी की जीत का बड़ा कारण सत्ता में रही कंजर्वेटिव पार्टी के प्रति, खासकर बोरिस जॉनसन और लिज ट्रस के कार्यकाल से जुड़ी विफलताओं के बाद व्यापक असंतोष था।
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स्टॉर्मर की जीत ऐसे चुनाव में हुई थी, जिसमें मतदान प्रतिशत ऐतिहासिक रूप से सबसे निचले स्तरों में से एक था और उनकी पार्टी को केवल 33.7 प्रतिशत वोट मिले थे। ‘स्टॉर्मरवाद जैसी कोई चीज नहीं’ नयी सरकार दिशाहीन नजर आई, क्योंकि वह देश के लिए कोई प्रेरक और स्पष्ट दृष्टिकोण पेश नहीं कर सकी। स्वयं स्टॉर्मर ने एक बार कहा था, “स्टॉर्मरवाद जैसी कोई चीज नहीं है और न कभी होगी।” स्टॉर्मर का तरीका गंभीर तो था, लेकिन तकनीकी और व्यावहारिक पहलुओं पर केंद्रित था; (तथा) उन्हें विचारों या सिद्धांतों में कोई दिलचस्पी नहीं थी। इसका परिणाम यह हुआ कि जब दक्षिणपंथी जनवादी राजनीति का प्रतिनिधित्व करने वाली निगेल फराज की ‘‘रिफॉर्म यूके’’ और वामपंथी जनवादी राजनीति का प्रतिनिधित्व करने वाले जैक पोलांस्की के ‘ग्रीन्स’ जैसे दल मतदाताओं से भावनात्मक जुड़ाव स्थापित कर रहे थे, तब सरकार उनसे कटी हुई दिखाई दी।
स्टॉर्मर ऐसे समय में मध्यमार्गी सरकार की पेशकश कर रहे थे, जब ब्रिटेन की राजनीति का रुझान तेजी से केंद्र से दूर, अधिक ध्रुवीकृत और भावनात्मक राजनीति की ओर बढ़ रहा था। सरकार शुरुआत से ही चुनौतियों में घिर गई। उसने सबसे पहले गरीबतम पेंशनभोगियों को छोड़कर अन्य सभी के लिए शीतकालीन ईंधन सहायता में कटौती का फैसला किया। इस कदम के राजनीतिक प्रभावों का सही आकलन नहीं किया गया और मतदाताओं ने इसे नकारात्मक रूप से लिया। इसके कुछ समय बाद सरकार ने तेजी से बढ़ रहे कल्याणकारी खर्च में कटौती का प्रयास किया। दोनों ही मुद्दों पर उसे अपने फैसले वापस लेने पड़े और यही सरकार की पहचान बन गया। मानो इतना सब भी काफी नहीं था, तभी अमेरिका में राजदूत के रूप में पीटर मैंडेलसन की नियुक्ति का फैसला सरकार के लिए भारी पड़ गया।
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जेफ्री एप्स्टीन से जुड़ी फाइलों में हुए खुलासे सार्वजनिक होने के बाद यह नियुक्ति राजनीतिक रूप से विनाशकारी साबित हुई। ईमानदारी और नैतिकता की छवि गढ़ने की कोशिश कर रहे स्टॉर्मर इस पूरे घटनाक्रम में असहाय और अक्षम नजर आए। हालांकि मतदाताओं के लिए सबसे बड़ा मुद्दा बढ़ती महंगाई थी। सरकार ने न्यूनतम वेतन बढ़ाने और रोजगार अधिकारों को मजबूत करने जैसे कदम उठाकर कामकाजी गरीबों की स्थिति सुधारने की कोशिश की, लेकिन बहुत से लोगों को लगा कि उनकी जिंदगी में कोई वास्तविक बदलाव नहीं आया है और वे अब भी मितव्ययिता तथा आर्थिक दबाव के दौर में जी रहे हैं। मई 2026 में इंग्लैंड के स्थानीय चुनावों के नतीजे इसी भावना को दर्शाते है।
लेबर पार्टी को केवल 17 प्रतिशत वोट मिले, जबकि ‘रिफॉर्म यूके’ ने 26 प्रतिशत मत हासिल किए। वेल्स में लेबर पार्टी को पहली बार सेनेड की सत्ता गंवानी पड़ी और क्षेत्रीय राष्ट्रवादी पार्टी प्लेड काम्री ने उसे पीछे छोड़ दिया। हालात इतने प्रतिकूल रहे कि वेल्श लेबर तीसरे स्थान पर खिसक गई और पार्टी की नेता एलुनेड मॉर्गन भी अपनी सीट बचाने में असफल रहीं। रिफॉर्म यूके की संभावित सरकार का खतरा ही वह कारण बना जिसने लेबर सांसदों को चिंतित कर दिया और स्टॉर्मर के समर्थन की जमीन खिसका दी। मेकरफील्ड में एंडी बर्नहैम की जीत ने संकेत दिया कि वह खोए हुए मतदाताओं को पार्टी में वापस ला सकते हैं। मेकरफील्ड में मई में रिफॉर्म यूके ने अधिकांश परिषद सीट जीती थीं। लेबर सरकारों को ब्रिटेन के मुख्यतः दक्षिणपंथी मीडिया परिदृश्य के ध्रुवीकरण वाले प्रभावों का भी सामना करना पड़ता है।
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यह मीडिया अक्सर असंतोष और अलगाव की भावना को हवा देता है तथा प्रवासियों और कथित रूप से ‘‘जनता से कटे हुए’’ अभिजात वर्ग के प्रति नाराजगी को बढ़ावा देता है। ऐसा लगता था कि स्टॉर्मर चाहते थे कि लोग जटिल मुद्दों को गहराई और संतुलन के साथ समझें, ताकि उनके विवेकपूर्ण समाधान निकल सकें, लेकिन शायद वह दौर अब खत्म हो रहा है। मतदाता ज्यादातर यह चाहते हैं कि राजनीति से तुरंत असर दिखे। ऐसा लगता है कि बहुत से लोगों को रोज़गार और स्वास्थ्य जैसे मामलों पर किए गए कामों के बारे में पता ही नहीं है। कुछ लोगों को लगता है कि अपराध और आव्रजन बढ़ रहे हैं, जबकि वास्तविकता इसके विपरीत है। इसके बावजूद जनधारणा और तथ्यों के बीच की इस खाई को पाटना स्टॉर्मर सरकार के लिए आसान नहीं रहा। ऐसे दौर में, जब जनवादी राजनीति भावनाओं और त्वरित संदेशों के बल पर आगे बढ़ रही हो, स्टॉर्मर का तथ्य-आधारित और प्रशासनिक दृष्टिकोण स्वाभाविक रूप से संघर्ष करता दिखाई दिया।
इतिहासकार स्टॉर्मर को किस रूप में याद करेंगे, यह काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगा कि आगे क्या होता है। यदि लेबर सत्ता में रहते हुए खुद को नए सिरे से मजबूत करने में सफल होती है तो स्टॉर्मर को ऐसे नेता के रूप में देखा जाएगा जिसने लेबर को फिर से शासन करने योग्य पार्टी बनाया और देश तथा विदेश में मौजूद जटिल चुनौतियों से जूझने का प्रयास किया। अंतरराष्ट्रीय मंच पर उनका प्रदर्शन घरेलू राजनीति की तुलना में बेहतर रहा। उन्होंने यूक्रेन के प्रति समर्थन बनाए रखा, फलस्तीनी राष्ट्र को मान्यता दी और ब्रिटेन को ट्रंप के ईरान युद्ध से दूर रखा। लेकिन यदि अगला आम चुनाव रिफॉर्म यूके जीतती है, तो इतिहास उन्हें उस नेता के रूप में भी देख सकता है जिसके कार्यकाल ने फराज सरकार के लिए रास्ता तैयार किया। उनका इस्तीफा भाषण एक ऐसे ईमानदार नेता की तस्वीर पेश करता है, जिसने गंभीरता, जिम्मेदारी और जनकल्याण की भावना के साथ अपने देश की सेवा करने का प्रयास किया। स्टॉर्मर हमेशा कहते रहे कि ब्रिटेन को नयी दिशा देने में दस वर्ष लगेंगे। उनकी बदकिस्मती रही कि उन्हें केवल दो वर्ष ही मिले।
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