हिटलर समर्थक पार्टी जर्मनी में चुनाव जीतकर भी क्यों नहीं बना पाई सरकार? वजह चौंकाने वाला!

जर्मनी में धुर दक्षिणपंथी पार्टी एएफडी प्रांतीय चुनावों में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। हालांकि पार्टी की कट्टर राष्ट्रवादी नीतियों और नाजी अतीत के कारण मुख्यधारा के दल उससे दूरी बनाए हुए हैं। इसी राजनीतिक फायरवॉल की वजह से भारी जनसमर्थन के बावजूद एएफडी सरकार नहीं बना पा रही है।
जर्मनी की राजनीति में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। जिस देश ने हिटलर के नाजी शासन का दौर देखा, जिस देश में 1945 के बाद यह कोशिश रही कि ऐसी हार्ड लाइन राइट विंग पॉलिटिक्स दोबारा मजबूत ना होने पाए। आज उसी जर्मनी में एएफडी यानी कि अल्टरनेटिव फॉर जर्मनी नाम की एक फार राइट पार्टी लगातार बड़ी हो रही है। सितंबर में पहले एक राज्य में चुनाव हुआ। फिर अब मैक्लिनबर्ग और वेस्टर्न पोमेरनिया में चुनाव हुआ और वहां एएफडी सबसे बड़ी पार्टी बनकर जो है वह सामने आई। सनोग्जी में जो चुनाव हुआ था वहां 44% वोट जो है वो एएफडी को मिला लेकिन बहुमत से वो दूर रह गई। वहीं एएफडी जो है अब जर्मनी में राजनीति में ऐसी जगह पहुंच गई है जहां उसे नजरअंदाज करना मुश्किल है। लेकिन यहां दिलचस्प बात ये है कि इतने वोट मिल रहे हैं उसके बावजूद भी ये एएफडी सरकार नहीं बना पा रही है।
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एएफडी को इतने वोट क्यों मिल रहे हैं?
जिस देश का नाजी अतीत आज भी उसकी राजनीति को प्रभावित करता है, वहां एएफडी को बार-बार हिटलर नाजी विचारधारा के संदर्भ में क्यों देखा जाता है? सबसे बड़ा सवाल ये कि क्या यह सिर्फ एक पार्टी की जीत है या फिर जर्मनी की राजनीति सच में बदल रही है? सैग्जोनी में एएफडी को करीब 44% वोट मिले। 83 सीटों वाली विधानसभा में उसे 39 सीटें मिली। यानी कि सरकार बनाने के लिए जितनी सीटें चाहिए थी उससे पार्टी सिर्फ तीन सीट पीछे रही। यही वजह है कि यह जीत इतनी बड़ी मानी जा रही है क्योंकि जर्मनी में 1945 के बाद किसी फॉर राइट पार्टी के लिए किसी राज्य में सरकार बनाने के इतना करीब पहुंचना एक बहुत बड़ा राजनीतिक बदलाव माना जा रहा है। इसके बाद अगर हम बात करें तो मैक्लिनर्ग और वेस्टर्न पोरेनिया में भी एएफडी करीब 38% वोट लेकर सबसे बड़ी पार्टी बन गई। वहीं चांसलर फेड्रिक मर्ज की सीडीयू को करीब 5% वोट मिले। यानी कि मामला सिर्फ एएफडी के मजबूत होने का नहीं है। जर्मनी की पुरानी और बड़ी पार्टियों के सामने भी बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है। जो सेंट्रल पॉलिटिक्स करते हैं, सेकुलर पॉलिटिक्स करते हैं, उनके सामने चुनौती है। अब एक और बात समझना जरूरी है। सबसे ज्यादा वोट मिलना और सरकार बन जाना एक ही बात नहीं है। क्योंकि एएफडी को जहां 39 सीटें मिली थी, वहां वो अकेले सरकार बनाने के लिए उसे और सीटों की जरूरत थी। महज तीन सीटें दूर। इसके लिए उसे दूसरी पार्टी के साथ जाना चाहिए था। लेकिन जर्मनी की जो बड़ी पार्टी फिलहाल एएफडी के साथ सरकार बनाने को तैयार नहीं है। इसे वहां फायर वाल कहा जाता है। बाकी पार्टियां एएफडी से राजनीतिक दूरी बनाए रखना चाहती हैं। यानी कि जनता के बीच एएफडी का जो समर्थन बढ़ रहा है। लेकिन बाकी पार्टियों के बीच उसे सरकार में शामिल ना करने या उसके साथ सरकार बनाने को लेकर कोई सहमति नहीं है।
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जर्मनी की जो मुख्यधारा की पार्टियां हैं उसने एएफडी के साथ गठबंधन या राजनीतिक सहयोग नहीं करने की नीति बनाई हुई है। यानी कि चुनाव में एएफडी कितनी भी सीटें जीत ले अगर उसके पास अकेले बहुमती है यानी कि 51% नहीं है तो सरकार बनाने के लिए दूसरी पार्टियों के साथ उसको जाना होगा। लेकिन यहां यही खेल हो जाता है कि दूसरी पार्टियां एएफडी के साथ जाने से इंकार कर देती हैं। इसी राजनीतिक दीवार को फायर वॉल कहा जाता है। जैसे किसी इमारत में आग लगने को एक हिस्से से दूसरे हिस्से में फैलने से रोकने के लिए दीवार बनाई जाती है। वैसे ही जर्मनी में यहां राजनीतिक फायर वॉल एएफडी को चुना की चुनावी ताकत को सीधे सत्ता की साझेदारी तक पहुंचने से रोकने के लिए काम करती है। इसके पीछे जो जर्मनी का नाजी अतीत है वो भी एक बड़ी वजह है। द्वितीय विश्व युद्ध और अडॉल्फ हिटलर के नाजी शासन के भयावह इतिहास के बाद जर्मनी में यह स्पष्ट राजनीतिक सहमति रही है कि देश में फिर कभी अति राष्ट्रवाद या फांसीवाद का फिर सिर ना उठाने दिया जाए क्योंकि एएफडी की विचारधारा नीतियां अत्याधिक राष्ट्रवादी है। अप्रवासी विरोधी है। कई बार नस्लवादी उसे माना तक जाता है। इसलिए मुख्यधारा के दल इसे लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए खतरा मानते हैं। यानी कि वह चुनाव में देखिए हिस्सा ले रहा है। लेकिन उसके साथ नहीं जाना चाहते। एएफडी को नाजी पार्टी कहना सही नहीं होगा लेकिन दोनों अलग संगठन है और अलग दौर की पार्टियां हैं। लेकिन एएफडी की जो दक्षिणपंथी राजनीति है और उसके कुछ नेताओं के जो बयान है उसको लेकर जर्मनी में लंबे समय से विवाद रहा है। इसलिए मुख्यधारा की पार्टियां उससे दूरी बनाए रखती हैं।
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