गुटबाजी के चक्रव्यू में फंसी मध्य प्रदेश की मुख्य पार्टियां, ग्वालियर-चंबल क्षेत्र में शुरू हुई जोर आजमाइश

आज के परिवेश में सत्ता हासिल करने की परिभाषा ही बदल सी गई है। जहां एक तरफ स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेई ने सिर्फ 1 वोट के चलते अपनी सत्ता खो दी थी। वहीं दूसरी ओर अब अधिकांश राज्यों में खरीद-फरोख्त देखने को मिलती है।
भोपाल। 17 अप्रैल 1999 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए गठबंधन सरकार के घटक दल में से एक की समर्थन वापसी के कारण लोकसभा में एक वोट से विश्वास मत हासिल करने में विफल रही। अन्नाद्रमुक की महासचिव जे. जयललिता ने लगातार धमकी दी थी कि अगर कुछ मांगों को पूरा नहीं किया गया तो वे सत्तारूढ़ गठबंधन से समर्थन वापस ले लेंगे। जिसके चलते अटल बिहारी वाजपेई अपनी सरकार नहीं बचा पाए थे।
दरअसल इस संदर्भ का इस्तेमाल इसलिए किया गया है क्योंकि आज के परिवेश में सत्ता हासिल करने की परिभाषा ही बदल सी गई है। जहां एक तरफ स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेई ने सिर्फ 1 वोट के चलते अपनी सत्ता खो दी थी। वहीं दूसरी ओर अब अधिकांश राज्यों में खरीद-फरोख्त देखने को मिलती है।
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ऐसा ही कुछ मध्य प्रदेश में 2018 के विधानसभा चुनाव में देखने को मिला। इस विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने बहुमत हासिल कर अपनी सरकार बनाई। मध्यप्रदेश में मतदाताओं ने पहली बार खंडित जनादेश दिया है। कांटे के मुकाबले में फंसी दोनों पार्टियों कांग्रेस और भाजपा को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। कांग्रेस 114 सीटों के साथ पहले नंबर पर और 109 सीटों के साथ भाजपा दूसरे स्थान पर रही।
वहीं, बसपा को 2, सपा को 1 और 4 सीटें निर्दलीय उम्मीदवारों के खाते में गई। 230 विधानसभा सीटों वाली राज्य विधानसभा में बहुमत के लिए 116 सीटों की जरूरत होती है। और गठबंधन के साथ कांग्रेस ने मध्यप्रदेश में अपनी सरकार बनाई।
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हालांकि कांग्रेस मध्यप्रदेश में ज्यादा दिनों तक सत्ता में नहीं रही। आपसी गुटबाजी के चलते कांग्रेस में फूट डली और पार्टी बिखर कर रह गई। दिग्गज नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया समेत 22 विधायक पार्टी छोड़ के अचानक से बीजेपी में शामिल हो गए जिसके बाद कांग्रेस की सरकार गिरी और पुनः शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में बीजेपी ने मध्यप्रदेश में अपनी सरकार बनाई। इन 22 विधायकों के बाद धीरे-धीरे कांग्रेस के कई और नेता और विधायकों ने बीजेपी का दामन थामा। लगभग 30 विधायक बीजेपी में शामिल हो चुके हैं। और इसी के चलते बीजेपी का धीरे-धीरे कांग्रेसी करण होना शुरू हुआ।
वहीं जब यह विधायक भाजपा में शामिल हुए थे तो कांग्रेस ने यह दावा किया था कि इन सभी विधायकों को बीजेपी ने 30 करोड़ रुपए का लालच देकर पार्टी में शामिल करवाया है। हालांकि यह कहीं भी सिद्ध नहीं हुआ कि इन विधायकों ने किसी भी प्रकार की राशि ली है। यह सिर्फ कांग्रेस का एक दावा था। और इसे एमपी के उपचुनावों में ट्रंप कार्ड की तरह कांग्रेस ने से इस्तेमाल किया था। लेकिन उसमें भी कांग्रेस विफल साबित हुई।
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ज्योतिरादित्य सिंधिया का भाजपा में शामिल होने के बाद उन्हें राज्यसभा सांसद बनाया गया साथ ही केंद्रीय मंत्रिमंडल में भी शामिल किया गया। फिलहाल ज्योतिरादित्य सिंधिया नागरिक उड्डयन मंत्री हैं। इधर प्रदेश में सिंधिया समर्थक विधायकों को भी बीजेपी सरकार में स्वतंत्र प्रभार और निगम मंडलों में एडजस्ट किया गया। इसके साथ-साथ कई सिंधिया समर्थकों को बीजेपी के अलग-अलग प्रकोष्ठ में भी शामिल कर उन्हें पद दिया गया।
दिलचस्प बात ये है कि सिंधिया के भाजपा में शामिल होने के बाद अब बीजेपी में भी कांग्रेस की तरह गुटबाजी देखने को मिल रही है। बीजेपी के कई दिग्गज नेताओं को इसका सामना भी करना पड़ रहा है। और इसका सबसे ज्यादा असर ग्वालियर चंबल क्षेत्र में देखने को मिल रहा है।
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बता दें कि बीजेपी के वरिष्ठ नेता जैसे मंत्री गोपाल भार्गव, मंत्री डॉ नरोत्तम मिश्रा, केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर, सांसद केपी यादव, केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया सभी ग्वालियर चंबल क्षेत्र से आते हैं। माना जाता है कि इनमें से कुछ नेता मुख्यमंत्री की दौड़ में भी शामिल हैं। ग्वालियर चंबल संभाग में इन सभी नेताओं और मंत्रियों का अपना अपना वर्चस्व है।
ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीजेपी में शामिल होने के बाद जिस प्रकार से सिंधिया समर्थकों को भाजपा में लगातार जगह मिल रही है उसे लेकर बीजेपी के पुराने नेता और कार्यकर्ताओं में आक्रोश नजर आने लगा है। बीजेपी के एक कद्दावर नेता ने अपना नाम न बताने की शर्त पर कहा कि हम सालों से पार्टी के लिए समर्पित रहे हैं । लेकिन अगर हमारा पद कुछ दिनों पहले कांग्रेस से पाला बदलकर बीजेपी में शामिल हुए नेताओं को मिलता है तो हमें दुख होता है।
हाल ही में ज्योतिरादित्य सिंधिया को हराने वाले सांसद के पी यादव का भी दर्द सामने आया था। गुना सांसद कृष्णपाल सिंह यादव ने लेटर लिख सियासी गलियारों में बम फोड़ा। उन्होंने उपेक्षा और साइडलाइन करने का आरोप लगाते हुए बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा को एक पत्र लिखा जिसमें उन्होंने आरोप लगाया कि ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनके समर्थक पार्टी का माहौल बिगाड़ रहे हैं। उन्होंने सिंधिया समर्थक मंत्रियों पर गुटबाजी और भेदभाव करने का भी आरोप लगाया। यह चिट्ठी सार्वजनिक होने के बाद पार्टी में गुटबाजी का मामला तूफान बनकर सामने आ रहा है।
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ऐसा ही कुछ बीजेपी के वरिष्ठ नेता और संघ से जुड़े पुराने कार्यकर्ता उमेश शर्मा ने आरोप लगाया है। उन्होंने अपनी पीड़ा बताते हुए यह कहा कि मैं एक अनुशासित कार्यकर्ता हूं कोई गुलाम नहीं। बीजेपी इंदौर जिला अध्यक्ष गौरव रणदिवे के खिलाफ उन्होंने नाराजगी व्यक्त करते हुए यह कहा कि जब आप कांग्रेस में थे तो हमने आप की सरकार में खूब लठ खाई हैं। ऐसे ही आपको इंदौर में बीजेपी को चलाने नहीं देंगे। गौरव रणदिवे भी सिंधिया खेमे के माने जाते हैं।
ऐसा ही हाल कांग्रेस में भी देखने को मिल रहा है हाल ही में गुटबाजी को चलते पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह का एक वीडियो सोशल मीडिया पर लगातार वायरल हो रहा है। दिग्विजय सिंह वीडियो में कहते हुए नजर आ रहे हैं कि इस गुटबाजी के चक्कर में अगर रहे तो कांग्रेस कभी भी दोबारा सत्ता में वापस नहीं आएगी। 2023 का विधानसभा चुनाव कांग्रेस के लिए आखिरी चुनाव है।
उधर पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ भी गुटबाजी के शिकार हैं। लगातार बैठकों में देखा जाता है कि कमलनाथ कार्यकर्ताओं पर नाराज होते दिख जाते हैं। क्योंकि उनके अनुसार कोई भी कार्यकर्ता पार्टी में काम नहीं कर रहा है। हाल ही में महिला कांग्रेस को भी अपनी कार्यकारिणी सिर्फ इसलिए भंग करनी पड़ गई क्योंकि इंदौर और ग्वालियर के कुछ कार्यकर्ता पद न मिलने से नाराज हो गए थे। इसका भी अब तक कोई निराकरण नहीं निकला है।
इसी कड़ी में कांग्रेस के दिग्गज नेता अरुण यादव भी पार्टी से दूरी बनाए बैठे हैं। खंडवा सीट पर अपने दावेदारी को लेकर अरुण यादव ने पूरा जोर लगा दिया लेकिन उन्हें आखिरी में टिकट नहीं मिली। और उस दौरान यह भी अनुमान लगाया जा रहा था कि अरुण यादव भी बीजेपी में शामिल हो सकते हैं। लेकिन उन्होंने स्पष्टीकरण देते हुए यह कहा था कि बीजेपी में कभी शामिल नहीं होऊंगा। हाल ही में हुई राजधानी भोपाल में कांग्रेस की बड़ी बैठक में भी अरुण यादव और दिग्विजय सिंह शामिल नहीं हुए जो एक चर्चित मुद्दा बन गया था।
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ऐसा ही कुछ दृश्य कांग्रेस के दिग्गज नेता अजय सिंह राहुल भैया के साथ भी देखने को मिलता है। दरअसल अजय सिंह पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के सुपुत्र हैं। कई बार उन्हें मौका दिया गया लेकिन वह उस पर खरे नहीं उतरे और पार्टी ने उन्हें दरकिनार कर दिया है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने प्रदेश अध्यक्ष बनने की भी दावेदारी की थी लेकिन कांग्रेस में गुटबाजी के चलते उन्हें वह जगह भी नहीं मिली।
हालांकि मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव में भले ही अभी एक साल से अधिक का समय बाकी हो, लेकिन कांग्रेस में अभी से लॉबिंग शुरू हो गई है। 2018 में बनी कांग्रेस की सरकार गिराने में अहम भूमिका निभाने वाले नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया के गढ़ ग्वालियर-चंबल अंचल पर कांग्रेस अधिक फोकस कर रही है। दिग्विजय सिंह पिछले तीन महीनों से चंबल इलाके में सक्रिय हैं। इसी बीच पीसीसी चीफ कमलनाथ 23 फरवरी को भिंड जिले के दौरे पर रहेंगे। पूर्व सीएम कमलनाथ वहां एक आमसभा को संबोधित करेंगे। इसके साथ ही भिंड के सीमावर्ती जिलों के कार्यकर्ताओं से भी फीडबैक लेंगे।
ग्वालियर-चंबल क्षेत्र प्रदेश की राजनीति में निर्णायक रहा है और 2018 विधानसभा चुनाव में बीजेपी इसी इलाके में पिछड़ने के कारण सत्ता से दूर हो गई थी। ऐसे में भाजपा भी इस क्षेत्र में अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज करना चाहती है, लेकिन क्षेत्र के नेताओं में आपसी मतभेद की वजह से यह दिख नहीं रहा है। कांग्रेस में रहते सिंधिया की मर्जी के बिना इस क्षेत्र में ब्लॉक प्रेसिडेंट भी नहीं नियुक्त होते थे और बीजेपी में भी सिंधिया यही चाहते हैं। लेकिन पार्टी नेतृत्व के लिए चुनौती इस इलाके में नेताओं के बीच सामंजस्य बिठाने का है। यदि बीजेपी ने सिंधिया को ज्यादा तवज्जो दिया तो कई दिग्गज नेताओं की बगावत खुलकर सामने आएगी। बताया जा रहा है कि हाईकमान ग्वालियर-चंबल की गतिविधियों को नजदीकी से मॉनिटर कर रहा है।
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