संसद की कार्यवाही ‘विषम परिस्थितियों’ में ही बाधित की जानी चाहिए: मनीष तिवारी

manish tewari
ANI
मनीष तिवारी ने कहा कि इससे सुनिश्चित होगा कि सरकारी कामकाज में बाधा पैदा नहीं होगी और विपक्ष देश के समक्ष अपनी चिंता के मामलों को रखने में सक्षम होगा, लेकिन दुर्भाग्य से, यह प्रतीत होता है कि सत्ता पक्ष इसे लेकर कुछ खास उत्साहित नहीं है और वह विपक्ष की चिंताओं पर चर्चा की अनुमति देने के बजाय अपने कामकाज को बिना पर्याप्त विचार-विमर्श के आगे बढ़ाना चाहता है।
नयी दिल्ली। संसद की कार्यवाही के बार-बार बाधित होने के बीच कांग्रेस के नेता एवं सांसद मनीष तिवारी ने रविवार को कहा कि सांसदों को इस बारे में गंभीरता से आत्ममंथन करना चाहिए कि क्या संसद की कार्यवाही में व्यवधान पैदा करना एक ‘‘वैध रणनीति’’ है और ‘‘विषम परिस्थितियों’’ में ही संसद के कामकाज में बाधा पैदा की जानी चाहिए। तिवारी ने कहा कि संसद की कार्यवाही में व्यवधान पैदा करना आम बात नहीं बननी चाहिए। उन्होंने कहा कि सदन की कार्यवाही का सुचारू तरीके से संचालन सरकार की जिम्मेदारी है और बार-बार होने वाले स्थगन का दोष कांग्रेस पर मढा जाना ‘‘दुर्भाग्यपूर्ण और अवसरवाद’’ है, क्योंकि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और उसके सहयोगियों ने 2004 से 2014 के दौरान विपक्ष में रहने पर कई बार संसद की कार्यवाही बाधित की थी। तिवारी ने कहा, ‘‘मैंने लोकसभा अध्यक्ष (ओम बिरला) के साथ एक अनौपचारिक संवाद में सुझाव भी दिया था कि शाम छह बजे सरकारी कामकाज समाप्त हो जाने के बाद, विपक्ष द्वारा सामूहिक रूप से सुझाए गए किसी भी विषय पर नियम 193 के तहत संसद के प्रत्येक कामकाजी दिन शाम छह से रात नौ बजे तक चर्चा की जानी चाहिए।’’ 

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तिवारी ने कहा कि समवर्ती नियम के तहत राज्य सभा में भी इसी तरह से चर्चा हो सकती है। उन्होंने कहा कि इससे सुनिश्चित होगा कि सरकारी कामकाज में बाधा पैदा नहीं होगी और विपक्ष देश के समक्ष अपनी चिंता के मामलों को रखने में सक्षम होगा, लेकिन दुर्भाग्य से, यह प्रतीत होता है कि सत्ता पक्ष इसे लेकर कुछ खास उत्साहित नहीं है और वह विपक्ष की चिंताओं पर चर्चा की अनुमति देने के बजाय अपने कामकाज को बिना पर्याप्त विचार-विमर्श के आगे बढ़ाना चाहता है। संसद में चर्चा के बजाय व्यवधान के आम बात हो जाने और मॉनसून सत्र का पहला सप्ताह इसकी भेंट (व्यवधान की) चढ़ जाने पर उन्होंने कहा, ‘‘दुर्भाग्य से, एक संस्था के रूप में संसद और सामूहिक रूप से विधानसभाएं देश के राष्ट्रीय विमर्श के संदर्भ में अप्रासंगिक हो गई हैं।’’ उन्होंने कहा कि इसका मुख्य कारण यह है कि देश भर में सभी दलों के सांसदों और विधायकों ने दशकों से संस्था के महत्व को व्यवस्थित तरीके से कमतर किया है। तिवारी ने कहा, ‘‘आप ऐसी संस्था के बारे में क्या सोचेंगे, जिसका बाधित होना आम बात है और जिसमें कामकाज होना अपवाद है? यदि वकील उच्चतम न्यायालय के कामकाज को नियमित आधार पर बाधित करें, तो आप क्या सोचेंगे? यदि सचिव, संयुक्त सचिव या अन्य अधिकारी नियमित और लंबे समय तक काम बाधित करते रहें, तो आप कार्यकारिणी के बारे में क्या सोचेंगे?’’ 

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सांसद ने कहा कि इसलिए सांसदों एवं विधायकों को गंभीरता से आत्मविश्लेषण करना चाहिए कि क्या संसद के काम-काज में बाधा पैदा करना ‘‘वैध संसदीय रणनीति’’ है। तिवारी ने कहा, ‘‘ यदि इसका (व्यवधान की रणनीति) इस्तेमाल करना ही हो, तो ऐसा सोच समझकर विषम स्थिति में ही किया जाना चाहिए, लेकिन ऐसा करना निश्चित ही आम बात नहीं बननी चाहिए।’’ कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्ष के प्रदर्शन करने और सदन की कार्यवाही बाधित करने तथा विभिन्न मामलों पर चर्चा की मांग करने को लेकर तिवारी ने कहा कि लोगों को 2004 से 2014 का समय देखना चाहिए, जब भाजपा और उसके सहयोगी विपक्ष में थे और उन्होंने कई सत्र नष्ट कर दिए और किसी न किसी बहाने से संसद को काम नहीं करने दिया। पंजाब के आनंदपुर साहिब क्षेत्र से सांसद तिवारी ने कहा, ‘‘इसलिए मेरा मानना है कि कांग्रेस पर दोष मढ़ा जाना दुर्भाग्यपूर्ण और अवसरवाद है। इससे बड़ा और बुनियादी सवाल वह संसदीय संस्कृति है, जो खराब या विकृत हो गई है और दशकों से विधायी संस्थानों को नष्ट करने की अनुमति दी गई है।’’ 

उन्होंने कहा कि इसलिए, भारत की संसदीय प्रक्रिया के हितधारकों - राजनीतिक दलों और सांसदों- को एक साथ मिलकर वह व्यवस्था खोजनी चाहिए, जिससे यह संस्था उस उद्देश्य को फिर से प्राप्त कर सके, जिसके लिए इसे संविधान निर्माताओं ने स्थापित किया था और अपने प्राचीन गौरव को पुनः प्राप्त कर सके। आवश्यक खाद्य पदार्थों की कीमतों में वृद्धि और जीएसटी जैसे प्रमुख मुद्दों पर चर्चा की सरकार द्वारा अनुमति नहीं दिए जाने के विपक्ष के आरोप पर तिवारी ने कहा कि ऐसा पहली बार नहीं है, जब किसी सरकार के पास संसद में भारी बहुमत है, बल्कि 17 लोकसभा में से, 10 में सरकारों को भारी बहुमत प्राप्त था। उन्होंने कहा कि 1980 के दशक के अंत तक भले ही विपक्ष का आकार छोटा था, लेकिन सत्ता पक्ष के कर्तव्यनिष्ठ सदस्य उसे निरंतर सहयोग और प्रोत्साहन देते थे। तिवारी ने आरोप लगाया कि सबसे ज्यादा चिंता की बात यह है कि सरकार न केवल विपक्ष की आवाज को दबाने की कोशिश करती है बल्कि संसद की कार्यवाही को भी ‘‘सेंसर’’ करके दिखाया जाता है।

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